कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा
(परमानन्द प्रभाकर )
जहिना पहाड़क आंतरिक विह्वलता झरनाक रूपमे, नदी आ समुद्रक विह्वलता तरंगक रूपमे, मेघक विह्वलता जल-बूंदक रूपमे आ फूलक विह्वलता सुगंधक रूपमे आकार ग्रहण करैत अछि तहिना कोनो संवेदना संपृक्त व्यक्तिक आंतरिक रागात्मक विह्वलता साहित्यक विविध विधाक रूपमे प्रस्फुटित होइत अछि जकरा कविता,गीत,गजल,कथा,लघु कथा,निबंध इत्यादि नामसँ अभिहित कयल जाइत छैक आ तकर मुखर प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक पोथी ‘गीत गंगा’|
अनिलजीसं हमरा सदेह त भेंट नै अछि मुदा हुनक एहि पोथीक कविता सभसं हमरा हुनक यथार्थ परिचय भेटल अछि | किएक त हमर ऐकांतिक विश्वास अछि जे कोनो रचना अपन रचनाकारक नैसर्गिक संरचनाक प्रतिविम्ब होइत अछि |एहि अर्थें हमरा ई बुझबामे भांगठ नहि भेल जे अनिलजी संवेदना संपृक्त, सहज ओ सरल व्यक्तित्वक आगार छथि | हुनक ह्रदय-भूमि रेगिस्तानक भूमि नै छनि अपितु हुनक ह्रदय-भूमि सरैसाक उर्बर भूमि छनि |
पोथीक कविता सभ सरल ओ खांटी मैथिली भाषामे रहबाक कारण आ छन्दाश्रित होयबाक कारण जेहने आकर्षक अछि तेहने गेय |
सामाजिक विभिन्न आ ज्वलंत समस्या सभपर केन्द्रित कविक ई पोथी पाठकक ह्रदयमे स्थिर श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर आदि रसक स्थायी भावक नदीकें तरंगायित करैत अछि |
कविकें बूझल छनि जे ----
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ना ब्रूयात् सत्यमप्रियं |
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एषः धर्मः सनातनः -मनुस्मृतिः
(सत्य बाजक चाही, प्रिय बाजक चाही,अप्रिय सत्य नहि बजबाक चाही, संगहि संग प्रिय असत्य सेहो नहि बजबाक चाही)
मुदा कविकें सत्यो बजबाक छनि आ अप्रिय सत्य नहि बाजी अहूसं बचबाक छलनि तें ओ नवका बाट धेलनि, सामाजिक वर्तमान सत्यकें कविताक रूपमे रागात्मक (प्रिय) बनाक’ पाठकक सोझाँ रखलनि अछि | हुनका बूझल छनि जे लोक जीवन पर कविताक असरि चिर काल धरि रहैत छैक तें ओ कवितेकें अपन वक्तव्यक वा अभिव्यक्तिक माध्यम बनौलनि |
कवि द्वारा कयल गेल छांदिक प्रयोग एहि विश्वासकें मजगूत केलक अछि जे कवि नीक छ्न्दज्ञ टा नहि नीक छंद-प्रयोक्ता सेहो छथि |अपन कवित्वक प्रदर्शनक लौलमे कवि कतौ भसिआएल नै बुझि पडैत छथि |बौद्धिक अराजकताक परिचिति कतौ नै भेटल अछि एहि कृतिमे | कविकें अपन बात रागात्मिका विधामे रखबाक सिद्धहस्तता प्राप्त छनि |
‘नोरे के जिनगी कतेक दिन उघबें ?’ ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?’ ‘पटना घुमलौं दिल्ली घुमलौं’ ‘सभ लोक आकुल’ आदि शीर्षक कवितामे कवि देश ओ समाजक वर्तमान दशाक चित्रण मार्मिक रूपसं केने छथि |‘नब्बे टा बरियाती एलै’ शीर्षक कविता आजुक बरियातीमे पसरल नवका संस्कृति पर चोट करैत अछि |
‘पाथरकें भगवान् बुझै छी’
एहि शीर्षक कविताक ई पांति ---
‘ब्रह्म थिका ओ जे आतुर छथि
सुंदर सृष्टि रचैले’
और मनुक्खक जीवनमे
आनंदक वृष्टि करैले’
हमरा दिनकरजीक ‘जनतंत्र का जन्म’ कविताक ओ पांति मोन पाfM देलक जाहिमे ओ कहलनि अछि ----
‘आरती लिए तू किसे ढूंढता है मूरख
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानो में
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में’
कवि, विलोपित होइत भारतीय संस्कृतिक लेल चिंतित बुझि पडैत छथि मुदा निराश त कथमपि नहि छथि |
हुनका भावनात्मक विश्वास छनि जे हमरा भारतीय संस्कृति पर क्यो कोनो प्रकारक आघात नहि क’ सकत |हमर भारतीय संस्कृति कथमपि नष्ट नहि होयत | तें सविश्वास आ सगर्व कहैत छथि ------
‘हमर संस्कृतिकें कियो सोखि ने सकैए |’
मुदा एहि ठाम हम कविसं कह’ चाहैत छियनि ----
‘घर तो अपना जल गया
घर के चिराग से |’
पोथीक आरम्भ ‘आत्म-गीत’सं भेल अछि जकरा गीतात्मक आत्मकथ्य कहल जा सकैत अछि | एहिमे कवि अपना द्वारा देखल, सूनल,पढ़ल आ भोगल यथार्थकें रेखांकित केलनि अछि, से बडड नीक लागल |
पोथीक अधिकांश कविता भावुकता ओ वैचारिकतामे संतुलन बनाक’ रखबामे सक्रिय त अछिए, अपन सकारात्मक भूमिकाक निर्वाह सेहो करैत अछि |
हं, एहि ठाम प्रसंगवश एकटा बात कहि देब आवश्यक बुझैत छी ---
‘नोरेके जिनगी कतेक दिन उघबें ?’
आ
‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?’
एहि दूनू शीर्षक कवितामे किछु पांतिक पुनरावृत्ति भ’ गेल छैक, यदि प्रेसक दोष हो त किछु कहबाक प्रयोजन नहि, यदि से नहि त एकरा लोक पुनरावृत्तिक दोष कहत आ पाठक लोकनि सेहो मानता |
जे-से, पोथी व्यक्तिगत रूपसं हमरा सर्वात्मना खूब अरघल अछि, तें हम अपन सीमा आ मर्यादाक ध्यान करैत कविकें धन्यवाद त नहि देबनि मुदा अपन अधिकारो त नहिये छोड़बनि |
तें एहि सुंदर आ प्रेरणाप्रद कृतिक लेल भूरि-भूरि प्रशंसा करैत नमन करैत छियनि
6