विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

गजल गंगा

जगदानन्द झा ‘मनु’ · 2015-12-01 · अंक 191

जगदानन्द झा 'मनु')

सभसँ पहिने अनिल जीकेँ ई गजल संग्रह लिखबाक लेल बहुत बहुत बधाइ आ शुभकामना । मैथिली गजलक आकाश गंगामे एकटा आओर नव गजल संग्रह "गजल गंगा"क आगमन मैथिली गजलक दशा आ दिशा लेल बहुत शुभ संकेत अछि । एक बेर फेरसँ अनिलजी सहित आन सभ गजल प्रेमी मैथिलकेँ बधाइ। हमर अपने गजल ज्ञान बेसी नहि अछि तथापि एहि संग्रहक मादे हम किछु नीक बेजए कहैक चेष्टा कए रहल छी ।
कुल 81 टा गजल अपना भितर समेटने ई संग्रह बहुते नीक-नीक गजलक सुन्दर गजल गंगा बनल अछि। आब एहि गंगामे असनान कतएसँ शुरू करी अर्थात हम अप्पन गप्पक शुरूआत कतएसँ आरम्भ करी । तँ हम शुरूआत करैत छी;
गजलक व्याकरण पक्षसँ :- आ गजलक व्याकरणक अ आ अछि मतला, काफिया, रदीफ, बहर आ मकता।
सभसँ पहिने मतला, मतला अर्थात गजलक पहिल शेर जे कि काफिया आ रदीफक निर्धारण करैत अछि। एहि संग्रहक सभ गजलमे अनिलजी मतलाक पालन बहुते सुन्दरसँ केने छथि । आब,
काफिया आ रदीफ : संग्रहक शुरूआतेमे अनिलजी संग्रहकेँ बहरक भिन्नताकेँ आधारपर दू भागमे बँटैत ई लिखने छथि जे काफिया आ रदीफक पालन भेल अछि । आ ठीके रदीफक पालन एहि संग्रहक सभ गजलमे बड़ नीकसँ भेल अछि । सगरो संग्रहकेँ पढ़ला बाद बुझलौं जे बहुतो गजलमे काफियाक पालन सेहो नीकसँ भेल अछि । ओतए 37% गजलक काफियाकेँ ठीक करैक गुँजाइश अछि । चूँकि ई संग्रह एखन अप्रकाशित अछि तेँ जँ सम्भव होइ तँ अनिलजी किछु संशोधित कएला बाद एकरा आओर बेसी उत्कृष्ट बना सकैत छथि ।
जेना कि संग्रहक प्रथमे गजलक मतला-
"पढ़बाक मोन होइए “लिखबाक” मोन होइए
किछु ने किछु सदिखन “सिखबाक” मोन होइए"
एहिठाम काफिया भेल "ि0खबाक" मुदा गजलक आन आन शेर सबहक काफिया अछि बिछबाक, झिकबाक, निपबाक, “चिखबाक”, छ्टबाक, छिनबाक । एहिठाम चिखबाक छोरि कए बाद बाँकी ????
एकबेर भाग पहिलकेँ गजल संख्या 5 केर मतला देखू-
"काँट फूस अछि “भरल” बाटपर जहाँ-तहाँ
नढ़िया कूकुर “मरल” बाटपर जहाँ-तहाँ"
आब एहि मतलाक रदीफ भेल "बाटपर जहाँ-तहाँ" जे की दुनू पाँतिमे एकसमान अछि । आब काफिया भरल आ मरलसँ भेल "रल" । मुदा आन शेर सबहक काफिया अछि दखल, पड़ल, जड़ल, महल, उड़ल, गड़ल । एहिमे पड़ल, जड़ल, उड़ल, गड़ल तँ ठीक मुदा दखल आ महल ?????
आगू बढ़ैत गजल 14 केर मतला-
"बहरक झंझटिसँ हमरा आजाद करु
हम गजल छी हमरा नै बरबाद करु"
एहि मतलाक काफिया भेल आकार बाद द (ाद) मुदा एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेल गेल अछि याद, फरियाद, अनुवाद, लाज, काज, बात । याद, फरियाद, अनुवाद ठीक तँ लाज, काज, बात ???
एक बेर गजल 16 केर मतला देखल जेए -
"कानहापर गंगाजल ल' क' “बढ़लौं”कोना-कोना
मोन पड़ैए ऐ पहाड़पर “चढ़लौं”कोना-कोना"
एहिठाम काफिया भेल बढ़लौं, चढ़लौंसँ "ढ़लौं" मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया अछि; खसलौं, बचलौं, कटलौं, रखलौं आब ई सबटा कतेक ठीक ????
कनेक आओर आगू बढ़ैत गजल 27 केर मतला-
"जुनि पूछू की “करै”छी हम
नित्य स्वयंसँ “लड़ै” छी हम"
एहि मतलाक काफिया भेल "0रै" वा "0ड़ै" । आब एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया जे लेल गेल अछि- डरै, बुझै, जगै, कनै, बजै, नचै, जनै, तकै । एहिमे "ड़रै"केँ छोरि बाद बाँकी सबटाकेँ की ठीक कहल जेए ??????
गजल संख्या 29 केर मतला-
"एतेक बाझल किएक रहै छी “अपनामे” अहाँ
अबै छी बड़ी बड़ी राति क' “सपनामे” अहाँ"
एहिठाम काफिया भेल अकार संग "पनामे" । मुदा शाइर एहि गजलक आगाँक शेर सभमे काफिया लेने छथि; पटनामे, सतनामे, घटनामे, अयनामे, बधनामे, गहनामे । मतलाक हिसाबे आन आन शेरक काफिया मेल नहि क' रहल अछि ।
कनिक आगू जा कए गजल संख्या 40 केर मतला-
"चिन्ता तनकेँ “दागि” रहल अछि की करियौ
मोन कतौ नै “लागि”रहल अछि की करियौ"
एहि मतलासँ जँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल, "0ागि" । मुदा शाइर एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया देने छथि; भागि, ताकि, मांगि, कानि, आबि, काटि, कहब बेजए नहि जे " भागि"केँ छोरि आन कोनो मतलासँ मेल खाइत नहि अछि ।
एहि तरहे कम बेसी एहि संग्रहक भाग 1 केर गजल संख्या 6,9,13,30,33,35,37,51,53,54,55 केर काफिया ठीक नहि अछि ।
आब एहि भागक अन्तिम गजल, गजल 61 केर मतला एक बेर देखल जेए-
" नदी छोड़ि क' “नहरमे”एलौं
गाम छोड़ि क' “शहरमे”एलौं"
आब एहि मतलासँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल "हरमे" मुदा शाइर एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेने छथि- कहलमे, जहलमे, महलमे, जूड़शितलमे, सहलमे, गजलमे । मतला आ आन-आन शेरक बिचमे काफियाक कोनो मिलान नहि ।
आब आबी संग्रहक भाग दूमे । पहिल भाग जकाँ एहि भागमे सेहो शाइर मतला आ रदीफक पालन नीकसँ केने छथि । आब देखी काफिया तँ सबसँ पहिले भाग दू केर गजल संख्या 4 केर मतला-
"खेल सभटा “उसरि” जाइए
लोक सभटा “बिसरि” जाइए"
आब एहि मतलासँ काफिया भेल "सरि", मुदा आगाँक शेर सबहक काफिया अछि झखडि, ससरि, पिछरि, बिगरि, कुतरि, नचरि । मतलासँ मेल खाति एकौटा शेरक काफिया नहि ।
भाग 2, गजल 6 केर मतला-
"जीवनकेँ “आशा” बदलल
प्रेमक “परिभाषा” बदलल"
एहिठाम काफिया भेल आकार बादक शा, षा अथवा सा । आशा, परिभाषा, बारहमासा, भाषा, अभिलाषा, तक तँ ठीक मुदा अन्तिम दूटा शेरक काफिया मौसा आ पाछाँ ।
आब एकबेर देखी भाग 2, गजल 17 केर मतला-
"सभ जिवइत अछि सुबिधामे
हम रहइत छी दुबिधामे"
एहिठाम काफिया भेल उकारकेँ बाद "बिधामे" । सुबिधामे, दुबिधामे केँ बाद आगाँक शेरक काफिया अछि, कवितामे, अनकामे, अपनामे, पटनामे, बसुधामे । एहिमे सँ एक्कोटा काफिया मतलासँ ठीक मेल नहि कए रहल अछि ।
किछु एहने-सन भाग 2 केँ गजल 9,12,18 आ 20 केर काफिया सेहो ठीक नहि अछि । एहि संग्रहक अन्तिम गजलक मतला एकबेर देख लेल जेए-
"नीक बात किछु “कहू” अहाँ
गीत गजलमे “रहू” अहाँ"
कहू/रहूमे समान भेल "हू" । मुदा शाइर आन आन शेरक काफिया लेने छथि; चलू, धरू, करू, बड़ू । खाली ू ू ू ू तँ बिना "ह"केँ ू ू ू ू के की कहल जेए ???
कतेक रास गजल एहनो अछि जाहिठाम काफिया तँ ठीक बनिरहल अछि मुदा काफियामे एक्के आखरक प्रयोग एकसँ बेसी बेर कएल गेल अछि । जेना भाग एकक गजल 9,20,36,42 आ भाग दू केर गजल 10 मे ।
मतला, रदीफ, काफियाक बाद गजल व्याकरणक एकटा मुख अंग अछि मकता । मकता, अर्थात गजलक अन्तिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम वा उप नामक प्रयोग केने होथि । एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकता़क प्रयोग नहि कएल गेल अछि ।
आब आबी गजलक बहरपर । तँ जेना स्वयं शाइर स्वीकार केने छथि जे भाग 1 केर 61 टा गजलमे ओ सरल वार्णिक बहरक प्रयोग केने छथि । आ जेकर निर्वाह ओ बहुते नीकसँ केने छथि । आब भाग दू जाहिमे कुल 20 टा गजल अछि, कोनो निर्धारित अरबी बहरक प्रयोग तँ नहि कएल गेल अछि, हाँ एहि गप्पक धियान जरूर राखल गेल अछि जे सब पाँतिमे समान मात्रा क्रम रहेए । अर्थात समान मात्रा क्रमक प्रयोग करैक सफल प्रयास केएने छथि । किछु ठाम छोरि दी तँ । सबसँ पहिने तँ चन्द्रविन्दूकेँ जगह विन्दूक (अनुस्वार) प्रयोग कएल गेल अछि । ई शाइद टाइपिंग ग़लती हुए मुदा एहि कारणे बहुतो जगह मात्रा क्रम बिगैड़ गेल अछि । दोसर जतअ जतअ संयुक्ताक्षरक प्रयोग कएल गेल अछि ओतअ ओतअ मात्रा क्रम केर गलती भ गेल अछि ।
जेना गजल संख्या 5 केर अन्तिम शेरक प्रथम पाँति-
"मोन केर प्रश्न अछि कते"
21 21 21 - 2 12 (शाइर द्वारा मानल)
21 22 21 - 2 12 (वास्तविक)
एकटा आओर उदाहरण गजल 11 केर तेसर शेर देखल जेए-
"देश हमर अछि प्राण भाइजी"
21 12 - 2 21- 212 ( शाइर द्वारा मानल)
21 12- 1 2 21 - 212 (वास्तविक)
एहने तरहक दोख गजल 12 केँ दोसर शेरमे आ 18 म' गजलकेँ दोसर शेरमे अछि ।
भाषा आ भाव पक्ष ; भाषापर जबरदस्त पकड़ लेने सम्पूर्ण संग्रहमे भाषाक एकरूपताक दर्शन होइत अछि । संग-संग नव रचनाकार सभ लेल सिखबाक लेल नीक प्लेटफार्म थिक अनिलजीक ई गजल संग्रह। अनिलजी बिना कोनो बेसाहल शव्दक प्रयोग केने एतेक सरल व्यबहारिक मैथिलीक शव्द सबकेँ गूँथि कए एकता नव शुरूआत केने छथि । समान्यसँ समान्य लोक, एक-एकटा गजलक एक-एकटा शेरक आनन्द ओहि छन अर्थात पढ़ैत वा सुनैत मातर ल' सकैत अछि ।
भाषा शिल्पक गप्प करी तँ एक-एकटा छोट-छोट शेरमे एतेक बेशी गप्प नुकेएल अछि जे सुनि आ सोचि कए मनक भितर ख़ुशिक लाबा फुटै लगै छैक । एकटा उदाहरण एहि संग्रहक पहिल गजलक एकटा शेर-
"दुइ ठोर थिक अथवा तिलकोर केर तडुआ
होइए तँ लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए"
मिथिलाक भोजनक पाक-कलाक श्रेष्ठताक प्रतिक तिलकोरक तडुआ । जेकर स्वाद, कुड़कूड़ेनाइक जवाव नै, सुनिते मातर मुँहमे पानि एनाइ स्वभाविक । स्वादिष्ट, पातर, कड़कड़ तिलकोरक तुलना पातर ठोरसँ । जबरदस्त उपमेय आ उपमानक प्रयोग । ओकर बादो, लाज होइतो चिखबाक मोन ।एहेन एहेन सरल व पारम्परिक शव्द चयन हिनक गजल कौशलमे चारि चान लगा रहल अछि ।
सम सामयिक मिथिला मैथिलीक समाजमे जतेक कोनो समस्या वा वाद विवाद अछि सभपर अपन कलम चलबैत सुन्दर-सुन्दर शेरक द्वारा अनिलजी लोकक आ समाजक धियान ओहि दिस दियाबैमे सफल भेल छथि । समाजक अव्यवस्थाकेँ देख संघर्ष आ छिनबाक गप्प एक्के संगे कोना, देखू एहि शेरमे-
"आजादीक लेल एखनहुँ संघर्ष अछि जरूरी
व्यर्थ गेल सभ मांगब छिनबाक मोन होइए"
संग्रहक नामे अनुरूपे एहि "गजल गंगा"मे अनिलजी सभ किछु समेटने एकरा सुन्दर रूप देबैमे सफल भेल छथि ।
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Suggested citation: जगदानन्द झा ‘मनु’. “गजल गंगा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 191, 2015-12-01. https://www.videha.co.in/research/2015/191/गजल-गंगा.htm

मूल विदेह अंक / Original issue