‘गीत-गंगा’क प्रवाह
(डा.अमर नाथ ठाकुर)
विचित्र विरोधाभासक कवि छथि जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’| ह्रदयसं काव्यक धारा स्वतः प्रसृत होइत रहनि आ मोन लगा क’ पढ़ैत रहथि विज्ञान |किन्तु, पूर्वजन्मार्जित कविताक गुनगुनाहटि हिनका ‘बोटनी’ दिस ल’ अनलक |प्रकृतिक प्रति अनुराग,सस्य श्यामला मातरम्’ के प्रति सहज उद्वेग हिनक ह्रदय आ मोनकें एकीकृत क’ कृषि वैज्ञानिक बना देलक | विज्ञान हिनका बैंकमे चाकरी देलकनि आ रिक्त समयमे ह्दयतोषक कविता कामिनीक सेवाक हेतु प्रभूत समय | कवित्वक सतत उद्रेक हिनका अपन उपनाम ताकक हेतु बाध्य क’ देलक | अपन आत्म-गीतमे एहि उच्छ्वासक उल्लेख करैत गुनगुनाइत छथि :
चलिते-चलिते भेटलाह रमण
आ भेटि गेला श्री सोमदेव
कोइलख विद्यापति पावनिमे
भेटल आशीष मधुप,किरणक
सस्वर दू रचनाक पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल |
यात्री,हरिमोहन,जीवकान्त,
शेखर,रवीन्द्र, मणिपद्म,अमर
बाबू, कक्का आ भैया सन छल नाम कतेको जोड़ा गेल |
एहि कविक संदर्भमे इहो अपन नाम ‘अनिल’ तय कएलनि |अनिल, जकर शाश्वत सम्बन्ध अनलक संग छै |पवन जगावत आग को , एकटा पांती पहिने पढने रही | अपने कविवर की सोचि ई उपनाम चुनलनि| किन्तु, भारतक अध्यात्मक कथन छै जे मोन रूप वायु (अनिल) कायाग्नि रूप अनल पर जखन भावनाक उत्थानसं प्रहार करैत अछि तँ इच्छा कविता भ’क’ निकलै छै |हवाक अर्थे छै जे सतत बहैत रहय आ हिनक कविता ध्वनि अपन प्रथम उद्रेकक क्षणसं सतत प्रवाहमान छनि |सुबोध्य भाषा,ह्रदयावर्जक विषय वस्तु,जीवनक हास-अश्रुक चिंतन,अपन शैली, तुकांत पद संयोजन,गेय पद | जहिना कविता लिखबाक सौख तहिना मधुर स्वरमे गएबाक कला हिनक कवित्वक भास्वर पक्ष अछि अपने कहने रहथि, मैथिली अकादमीक अध्यक्ष व्यासजीक उद्गत भाव | हिनक कविताकें पढि ओ जिज्ञासा प्रकट केलखिन, ई सभ अहाँ गाबि लै छियै ?
ई मनोरम स्वरमे मुरलीधर प्रेसमे गाबि उपेन्द्र नाथ झा’व्यास’जी कें अपन स्वर माधुयॅ सं मंत्रमुग्ध क’ देलखिन |ओ प्रहर्षित होइत कहलथिन , तखन त अहाँ अखवारोकें गाबि देबै |ई नैसर्गिक स्वर हिनका जन्मजात प्राप्त छनि |
एक बेर सिवानमे फगुआक उपलक्ष्यमे ‘भांगक भोज’क आयोजन भेलै | किन्तु, आयोजनक मुख्य लक्ष्य रहै फगुआमे ठाकुरजीक मादक स्वर आ फगुआक हेतु अभिनव पद-विन्यासक श्रवण |कविवर श्रोता आ आयोजक्क मनोभाव कोना नइ बुझितथिई | इहो एक टा टटका रचना ल’क’ उपस्थित छलाह | भांग पीबाक प्रक्रिया हास-परिहासक संग समाप्त भेल | सब अपन गप्पक खजानासं गोष्ठीकें गेय वातावरणक हेतु तैयार कएलक |आ ‘मधुरेण समापयेत’क अनुरूप ठाकुरजीकें आग्रह केलकनि | ककरो अनुमान नै रहै एहन नूतन पदबंधक स्वर लहरीक :
चाह चाही आ पान चाही
कलाकारकें कने भांग चाही |
घोरि नीक जकां चिन्नी मिला क’
देखि लिय’ रसगुल्ला खुआ क’
मोन पंछी बनय, कतौ उड़ि-उड़ि चलय ......
हाय रे आबि गेल रंगदार फगुआ
देखू मौसम बनल अछि अगुआ
धरती कनियाँ बनल,कोहबर दुनियां बनल
आसमान चाही आ चान चाही
से देखै ले’ मोन जुआन चाही |
सभ झूमि उठल | भाव-विभोर भेल | अपनाकें बिसरि गेल |ई छनि अनिलजीक काव्य माधुर्य |
बरखोसं बैसल मैथिली साहित्य परिषद्, सिवानमे हिनक कविता नवजीवन फूकि देने रहै |अपन एहि अतीव मधुर क्षणक वर्णन करैत आत्मगीतमे स्वयं लिखने छथि :
‘लिखबा आ पढबा केर नशा
सूनब आ सुनयबा केर नशा
शब्दक सोना,हीरा,मोती
देखब आ देखयबा केर नशा
सदिखन आनंदित रहबा ले’ जीवनक अर्थ छल बुझा गेल |’
विगत शताब्दीक अष्टम दशकक मध्यमे ‘तोरा अंगनामे वसंत नेने आएब सजना’ क वासंती स्वर नेने कविवर मैथिली साहित्यक क्षितिज पर अवतीर्ण भेल छलाह |युवावस्था, रंगीन दुनिया,चह्कैत वातावरण, श्रृंगार रसक अनुपम समय होइछ |सिवान प्रवासमे श्रृंगार प्रधान गीतक बाहुल्य रहनि |
‘मोन होएए अहाँकें देखिते रही,
किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही|’
‘अहाँ नील गगन केर चंदा,हम मृत्यु भुवनक चकोर
हम विरहक राति अन्हरिया,पिया अहाँ वसंतक भोर |’
मैथिलीक विकास क हेतु पल-पल प्रतिबद्ध | अजब ऊर्जा हिनक युवावस्थामे देखने छियनि| गोष्ठीक आयोजन,विद्यापति पर्वक आयोजन,कवि सम्मेलन, कवि सबहक समायोजन हिनक प्रिय विषय रहनि |
किन्तु इ त पर्वत केर शिखर पर बैसि ,प्रकृतिक नग्न रूपक अवलोकन करैत मध्यप्रदेशक मध्यमे मैथिलीक स्वर मुखरित करबाक लेल छटपटा इत रहथि, तखने ने मिथिलाक मनोनुकूल विरह व्यथासं छटपटाइत गीत गंगामे लिखैत छथि :
‘कोना कहू जे कोन हालमे जीबि रहल छी |’
“हम पहाड़ पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी’क रचना करैत ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान’ के चरितार्थ करैत ‘मा निषाद प्रतिष्ठां रूप अचिंतित, अतर्कित पादवद्धः अक्षरसम तंत्रीस्वर समन्वितः’ स्वरक अन्वेषणमे मध्य भारतक उत्तुंग शिखरपर जीवनक उत्तरार्ध व्यतीत करब स्वीकार कयलनि |
मैथिलीक भक्तिक प्रवलता त एहिसं स्पष्ट होइछ जे ई अपन दोसर पुत्रीक नामकरनणे ‘मैथिली’क’ देलखिन |गीत गंगामे अनेक स्थान पर मिथिला मैथिलीक प्रति उदगार उच्छलित भेल अछि :
‘आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर, ह्रदयमे हो माटिक ममता
माएक सेवामे जीवन बितादी, अछि बस एएह एकटा सिहंता’
‘मैथिलीक प्रतिमा सजाउ’
‘आजुक राति कथी ले’
‘तीन कोटि मैथिल’
‘ मैथिलीले’ अहाँ की करै छी’
‘मैथिल केर परिभाषा’
‘पत्रिका नै किनै छी’
‘बजबाक समय आएल अछि’
‘हमरा गाममे’
‘मिथिलामे’
‘भूख,अशिक्षा आ अन्हार अछि मिथिलामे’
आदि शीर्षक रचनामे मिथिलाक दशा आ मैथिलीक दुर्गति जीवंत रूपें वर्णित अछि |
मैथिलीक विकासक केहन प्रदीप्त आगि हिनका हृदयमे छनि से एही संस्मरणसं स्पष्ट अछि :
‘माटि-पानि’ पटनासं प्रकाशित होइत रहै |’समय-साल’ स्तम्भमे हमर एकटा लेख प्रकाशित भेल छल ‘सूतल नहि अछि सिवान’|मोन गदगद छल |प्रकाशनसं लिखबाक गति तीब्रतर भेल छल |ताबत अगिला शीर्षक पढलौं ‘जगैत जयनगर’| मोनमे प्रतिक्रया उठल, जयनगर पर लेख त वासोपट्टी पर किएक नहि |
हम डेरा आबि ओही तर्जपर ‘बैसल वासोपट्टी’ एकहि बैसकीमे लीखि गेलहुँ |किन्तु दोसर दिन विचित्र द्वन्द्वमे ई आलेख पड़ि गेल |एहनो लेख होइत छै ? हम ओकरा संजोगि क’ राखि देलहुँ |तीन मास बीति गेल |एक दिन सांध्यवेलामे ठाकुरजीसं भेंट भेल दरबार परिसरमे |कतहु आवश्यक काजसं जाइत रहथि |अपन आलेख खराब अछि की नीक से निर्णायक द्वंद्व सं तंग आबि गेल रही | हम मंदे स्वरें कहलियनि ,एखन एक घंटा समय अछि? ओ कार्यक जिज्ञासा प्रगट केलानि | अपन हृदयगत द्वंद्व कहलियनि | ठाकुरजी प्रहर्षित होइत कहलनि, एहिसं मुख्य काज की हएत ? चलू पहिने आलेखे पर विमर्श करी | डेरा आबि हम हिनका आलेख सुनाओल | अंतिम पैराग्राफ प्रारम्भे केने रही की ई आलेख हाथसँ झपटि लेलथि | कहलनि अहाँ राति भरिमे अपने फेयर क’लेब त ठीक नै त हमरा द’ दिय’, काल्हि हम पटना जा रहल छी,स्वयं फेयर क’क’हम द’देबै ‘माटि पानि’क कार्यालयमे |ई भोरे-भोर तैयार भेटला | हम आलेख द’ देलियनि |ह्रदयक भार हल्लुक भेल |अगिला अंक प्रकाशित भेलै|सम्पादक शीर्षक बदलिक’ ’पायाक कातमे गाड़ल वासोपट्टी’क’ देलखिन |प्रकाशित अंक ठाकुरेजी कें पहिने भेटल नि |भेटितहि हमरा डेरा पर एलाह सरप्राइज दैत—‘मैथिलीक परिचित युवा लेखक’ संबोधन करैत | हम किछु बुझलियै नहि |तखन ई अंक दैत्त्त सभ कहलनिई सम्पादक आलेख मंताव्यमे ई बात लिखने रहथिन पढि कए रोम-रोम पुलकित भ’ उठल |
सब काज छोड़ आलेखकें सूनब,कार्यालय तक पहुँचायब आ प्रकाशित अंक डेरा पर पहुंचा लेखकक अमित आनंदमे सहभागिता करब कतेक व्यक्ति करैत छथि ? मैथिलीक प्रति ई समर्पण सोचि आइयो मोन विह्वल भ’ जाइत अछि |गीत-गंगाक साठि टा कवितामे बारहटा मिथिला-मैथिलीए पर लिखल भेटल |
राष्ट्र भक्तिक सेहो प्रभूत-प्रमाण ‘गीत-गंगा’में मुखरित भेल अछि |’हम भारत केर पूत’ शीर्षक रचनामे केहन सुन्दर कहल गेल अछि -----
‘पुजै छी भारतीकें हम,जपैछी बन्दे मातरम्’
‘जय जवान, जय जय किसान नारा लगबै छी हम,जपै छी बन्दे मातरम्’
ताल ठोकैए हमर हिमालय,ललकि कहै छथि जमुना गंगा,फहराइते इ रहत अमर भए लाल किला पर हमर तिरंगा,अपन स्वतंत्रता गमा एको क्षण रहि ने सकै छी हम,कही तें वन्दे मातरम्’
‘जय भारत जय भारती’में भारतकें एकटा गाम कहल गेल अछि |लिखै छथि —
हम कल्पना करी एकटा भारतवर्षक गामके ,जै मे हो बस जाति एकटा मात्र भारतीय नामकेर |
पुराण साहित्यमे एक पुरुष के रूपमे भारतक वर्णन करैत कहल गेल अछि, भारतक दू टा आँखि छै -दक्षिणक कांची आ उत्तरक काशी | एक पुराणकार आँगनके रूपमे भारतक स्वरुप दृढ़ करैत कहने छथि : तपस्या नर्मदा तट पर, दान गयामे शरीर त्याग गंगाक तट वाराणसीमे करबाक चाही| महर्षिगण त –समुद्र वसने देवि पर्वत स्तन मंडले,विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्षं क्षमस्व मे’ पढैत भारत भूमिक एकत्व प्रदर्शित कैने छथि |
एकटा विशाल गामक रूपमे कथन सर्वथा उपयुक्त अछि |
‘स्वतंत्र भारत अमर रहय’ मे कवि कहैत छथि—भारतहु सं प्रियगर भारतवर्षक स्वतन्त्रता,तें हम हुलासि-हुलासि क’ बाजी स्वतंत्र भारत अमर रहय |’
‘भारतक स्वतंत्रता केर खातिर हम लड़िते टा नै,मरितो छी,तें हम ताल ठोकि क’ बाजी स्वतंत्र भारत अमर रहय |’
‘जय जय हिन्दुस्तान’ शीर्षक रचनामे केहन नीक पद्य रचल गेल अछि :
‘एकहि मंदिर एकहि पूजा आ एकहिटा ध्यान,
एकहि मंत्र जपब जीवन भरि जय जय हिन्दुस्तान |’
राष्ट्रक निर्माता पुरुषक संस्मरण ‘गीत –गंगा’क प्रवल विशेषता अछि |
‘सत्य अहिंसा केर पुजारी मे’ महात्मा गांधीक स्वतंत्रता अभियानक वर्णन करैत कहैत छथि :
‘सत्याग्रह केर केलनि केहन प्रचार
इंगलैंडोमे मचि गेल हाहाकार
भागल भुल्ला लत्ते-पत्ते सात समुद्रक पार
ब्रह्मा,विष्णु और त्रिपुरारी छला महात्मा गांधी |
बूझि पड़ैए भव-भय हारी छला महात्मा गांधी |
आठम रचनामे कहल गेल अछि :
कह जय गांधी जय जय प्रकाश
जय जय सुभाष, जय भगत सिंह
ओ नै रहला लेकिन अछिए
ओइ कर्मवीर केर चरण-चिन्ह |
.’की हिन्दू आ की मुसलमान’ शीर्षक रचनामे कहल गेल अछि :
‘एक्के शोणित,एक्के परान’
‘मंदिर पूजी,मस्जिद पूजी,
प्रार्थना करी आ नवाज पढ़ी
गीता पढ़ि ली आ कुरान पढ़ी
अल्लाह कही, सियाराम कही
पोथी अनेक, अछि सूत्र एक, बस एक मन्त्र हम जानै छी |’
एहि प्रकारें भारतक विविधतामे एकताक सूत्रक अन्वेषण, धर्म समरसता दृढीकरण हिनक लेखनक समाधानात्मक आ उत्साहवर्धक पक्ष अछि |
विषय-वस्तुक दृष्टिसं विचार कएला पर ‘गीत-गंगा’ शीर्षक अत्यंत उपयुक्त लगैछ | गीतक अर्थ अछि ह्रदयगत भावक उच्छलन |
एक कवि ह्रदय वैयक्तिक, सामाजिक,राष्ट्रीय,वैश्विक परिदृश्य पर सतत चिंतन करैत अछि |खराबक यथावत चित्रण क’ समाज आ राष्ट्रक नग्न चित्रक लेखनक समाज के दर्पणभूत साहित्यमे ओकर यथार्थ स्वरुप देखबैत अछि | एकर अनुरूप बेटीक बियाह,पुत्रक गुणवत्ताक प्रयास सन अनेक समस्यासं सीदित समाजक जीवंत चित्र एत’ प्राप्त अछि |
‘बुच्ची बढ़ती,लिखती पढती ‘ शीर्षक रचना नारी शिक्षाक विकास क’ विवाहकें दहेज़ रूप अवसादसं मुक्तिक मार्ग प्रदर्शित करैत अछि |कवि कहैत छथि :
भाग्य अपन अपनेसं गढ़ती, हमरा चिंता कथीके
रेप,दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि भारतमे
महिषासुर ले’ दुर्गा बनती, हमरा चिंता कथीके
नव सुरुज आ चान बनेती/संगी अप्पन अपने चुनती/किरण,सुनीता,मीरा बनती | एक मात्र शिक्षाकें अंगीकार कैने संभव होइछ |एहि प्रकारें मुखर समस्याक समाधानक चेष्टा एहि लघुकाय पोथीक प्रबल हुंकार अछि | जेना सभ नदी गंगामे एकाकार भ’ समुद्र पहुँचैत अछि तहिना राष्ट्रक व मानव जातिक समुद्रमे ई गीत-गंगा उच्छलित होइत पहुँचैत अछि |
कविकें यथार्थ वक्ता कहल गेल अछि |तें साहित्यमे स्वभावोक्ति एकटा प्रशंसित अलंकार मानल गेल अछि |एहि यथावत वर्णनसं गीत-गंगा व हिनक अन्य काव्यात्मक पोथी आद्यंत व्याप्त अछि |हिनक लेखनक विषय अछि दुर्दिनमे जीवन व्यतीत करैत विपन्न लोक | कतहु बेटीक विवाह्सं चिंतित व्यथित पात्र त’ कतहु कर्जामें डूबल कृषक | कतहु तीसीक तेलमे छानल जिलेबी,झिल्ली खाइत दुर्गापूजा देखैत तरुण,तरुणी | कतहु कन्याक पिताकें व्यथित करैत बरियातीक वाहुल्य | एकटा उद्यमी रहितो विपन्न किसान आ घोटालामे रत संपन्न तथाकथित नेताक साम्य वैषम्य जीवनक केहन जीवंत वर्णन अछि :
करजेमें जीबे आ करजेमें मरबे
एना रे बिलटू कतेक दिन रहबें ?
तोरे पसेनासं हरियर ई भारत
ई राकेट ई प्लेन ई उँचका इमारत
तों नारे पुआर पर कतेक दिन सूतबें ?
तोरा ले’ एखनो ने लोटा ने थारी
ओम्हर घोटाला महल हावागाड़ी
दोस और दुश्मनके कहिया तों चिन्हबे ?
बाट कोनो गांधीक कतेक दिन तकबें ?
करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?
आदि पांती सामाजिक विषमताक जीवंत चित्र ल’ प्रस्तुत कएल गेल अछि |
‘चोर कहू ककरा’ शीर्षक रचनामे कविक व्यथा-द्वंद्व केहन जीवंत अछि :
‘भरि गाम चोरे त चोर कहू ककरा
कोतवालो सएह तखन सोर करू ककरा ?’
भ्रष्ट्राचार सं त्रस्त भारतवर्षक नग्न चित्र प्रस्तुत करैत अछि |
संवेदनहीन समाजक अंतसमे लोभक सफल चित्रण भेल अछि :
‘नब्बे टा वरियाती एलै’ शीर्षक रचना देखू :
दस हजार रसगुल्ला बनलै नब्बे टा वरियाती ले’
आ पचास टा छागर कटलै हल्ला भेलै गाममे |
दारू पीने टंच रहै सभ छौंडा मोटरसाइकिल पर
खाधिमे खसलै, टंगले एलै, हल्ला भेलै गाममे |’
दहेज़क पाईसं टंच भेल लड्काक पिताक उज्ज्वल वर्णन प्रस्तुत करैछ : ‘समधि एला बनि-ठनि क’ कवितामे :
लाजो ने भेल जे टाका गनेलिऐ
,बेटाकें बेचि क’ खेतो किनलिऐ |
समस्याग्रस्त, विपदापूर्ण परिवेशसं त्रस्त कविकें सम-समाधानक रस्ता जखन अवरुद्ध भेटैत छनि त लोकेकें पूछै छथिन :
‘कहू भागि क’ जाएब कहाँ ?’
गीत-गंगामे कविवर समाजक, राज्यक,राष्ट्रक व्यथाक चित्र आ समाधान प्रस्तुत करबाक स्तुत्य प्रयास कएलनि अछि | भाषा सरल,गेय,हृदयसं उच्छलित अछि | हृदयसं उच्छलित भावेकें गीत कहल जाइत अछि |एहि हृदयगत भावक यथावत चित्रणसं पोथी आद्यांत व्याप्त अछि |जेना समुद्र वा गंगामे अनेक प्रकारक झड़ना, जलश्रोत,नद,नदीक संगम होइछ तहिना एहि पोथी रूप गंगामे अव्यक्त माधुर्यसं पाठककें आनंद प्राप्त करबैत,सोचबाक लेल वाध्य करैत, समाजक कुरीतिक दर्शन करबैत,नव,पुरान व्यक्तित्व दर्शन करबैत साठि कविताक संग्रह प्रकाशित भ’ पाठकक हाथमे आएल अछि |कविक वर्णन क्षमता,लेखन सरलता अभिव्यक्त भेल अछि |
उक्त गुणगण के आलोकमे अनलपूर्ण अंतसवला ‘अनिल’जीक ई कविता संग्रह गंगा जकां कल-कल निनाद करैत उच्छलित होइत समुद्र दिस बढैत रुचिरा,पवित्र,वेगवान,औषधिभूत कविता रूप जलधारासं व्याप्त अछि |
----------डा.अमर नाथ ठाकुर
प्रोफेसर, पी.जी.संस्कृत विभाग,जे.पी.यू.,छपरा-८४१३०१
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-१.