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गीत-गंगा
(कामिनी)
मैथिलीक सुपरिचित गीतकार श्री अनिलजीक नाम आइ के नहि जनैत अछि |एकर एकमात्र कारण अछि अनिलजीक सौम्यतासं पूर्ण भाषा, जकरा ल’क’ ओ पैघ सं पैघ बातकें बड सहजतासं राखि पाठकक हृदय धरि प्रवेश क’ जाइत छथि |
पाठक अनिलजीक विचार, भाव, समर्थन,विरोधसं अपनाकें अलग नहि क’ पबैत अछि |पानिमे घुलल चीनी जकां पाठक आ गीतकार एकाकार भ’जाइत अछि |अनिलजीक भाषा सहज रहितहु संवेदनासं परिपूर्ण अछि जे हृदयकें स्पर्श करैत दूर धरि ल’ जाइत अछि जतय पाठक सोचबाक लेल विवश भ’ जाइत अछि |ओ अपन सम्पूर्ण जीवनक सार कें एहि रूपमे अभिव्यक्त करैत छथि :
ई देह अतिथि ई प्राण अतिथि
सम्मान अतिथि अपमान अतिथि
अछि लोभ मोह आ माया केर
अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि |
जीवनक नश्वरता आ लोभ-मोहक विराटता दुनूकें अनिलजी अतिथि कहि लोककें धैर्यवान हेबाक सन्देश देलनि अछि |ओ कहैत छथि जीवनमे कोनो बात शाश्वत सत्य नहि |परिवर्तन जीवनक नियम थीक |समय-चक्र बदलिते रहैत अछि |अतिथि जकां सुख-दुःख दुनू अल्पायु होइत अछि |अतिथि शब्द अपना आपमे यायावरी अछि |अर्थात कोनो परिस्थितिमे मनुक्खकें अपन धैर्य नहि गमेबाक चाही |ओ कहैत छथि :
‘हम सोचि रहल छी जीवनमे,
की भेटल आ की हेरा गेल |’
आत्मगीतक माध्यमसं ओ अपन सम्पूर्ण जीवनक मूल्यांकन करबाक प्रयास केलनि अछि |
अनिलजीक दृष्टिकोण एकटा स्त्री,एकटा बेटीक लेल सेहो आत्म गौरवसं परिपूर्ण अछि |ओ बड निश्चिन्तता आ सहजतासं कहैत छथि :
‘बुच्ची बढती पढ़ती लिखती
हमरा चिंता कथी के’
ओहि समाजमे जतय भ्रूण हत्या सन पाप करैमे लोक संकोच नहि करैत अछि, पेटमे बेटीकें मारबासं डेराइत नहि अछि,ओतय बेटीकें दुर्गा रूपमे प्रतिष्ठापित कय महिषासुर सन दानव के संहार करबामे सक्षम बतौलनि अछि |स्त्री-शक्ति एतय सर्वोपरि रूपमे आयल अछि | ई स्त्री कखनो बेटी,कखनो पत्नी,कखनो माय बनि बनि पुरुषक जीवनकें परिपूर्ण करैत अछि | अनिलजीक ‘गीत गंगा’मे ई स्त्री परिपूर्ण रुपमे सर्वत्र विद्यमान अछि | ओ कहैत छथि :
‘ माइक कोरा सिनेहक सरोवर
अही सरोवरमे जी भरि नहाउ ....’
सरिपहु मायक कोरा सिनेहक सरोवरे होइत अछि जाहिमे डूब देलाक बादे ओ स्वाद भेटैत अछि जे कतहु आरो नहि भेटैत अछि |मायक छत्रछाया, ओकर आँचर बच्चाक लेल छितवनक छाँह जकां शीतल आ सुखद ओइत अछि |शायद दुनियामे कोनो आरो एहन सम्बन्ध होइत होइ जे मायक कोराक बराबरी करैत हो | अनिलजी सब संबंधक महत्व जनैत छथि | ओ जनैत छथि मायक ममताक बेगरता | ओ जनैत छथि ओकर त्याग,तपस्याक महिमा |
अनिलजीक ‘गीत गंगा’ सामाजिक विषमता पर सेहो प्रहार करैत अछि |ओ कहैत छथि :
‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें
एना रे बिलटू कतेक दिन रह्बें’ ?
सरिपहु बिलटू करजेमे जन्म लइत अछि आ करजेमे मरियो जाइत अछि | ई बिलटूक व्यक्तिगत त्रासदी नहि | बिलटू ओहि निम्न वर्गक प्रतिनिधिक रूपमे उपस्थित अछि जे जीवन भरि अथक प्रयास केलाक बादो भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र लेल तडपैत अछि, तरसैत अछि | जकर परिश्रमसं देशक सब उन्नति होइत अछि ओ जीवन भरि विकासक एको सीढ़ी नहि चइढ़ पबैत अछि |ई बिडम्बने कहल जा सकैत अछि जे आइ धरि समाजक सबसँ निचला वर्ग तक विकासक एको बूंद गंगाजल नहि पहुँचल अछि ,जे दुःख भोगबाक लेल विवश अछि,जकर जीवन कचरेसं शुरू होइत अछि आ कचरेमे मिलियो जाइत अछि, जकर नेना शर्दी-गर्मी जीवनक सब तापकें भोगबाक लेल अभिशप्त अछि | भलेही हम चान पर जेबाक दाबा करैत होइ,ओतय घर बनेबाक लेल सोचैत होइ, आम आदमीक लेल भरि पेट अन्न आ भरि माथ छाहरि आइयो सपने बनल अछि |
एक दिस हमर बखारीमे अन्न सडबाक दाबा होइत अछि, दोसर दिस एहि देशक किसान हताश भ’,प्रकृतिक समक्ष निराश भ’, पारिवारिक पैघ बेगड़ताक समक्ष नग्न आ लाचार भ’आत्महत्या करैत अछि | ई बिडम्बना नहि त और की थीक ? अनिलजी एहि बिडम्बनासं बाहर निकलबाक लेल ओहि आम वर्गक प्रतिनिधि बिलटूकें जगबैत छथि,ललकारैत छथि |
भारतीय समाजमे आइ जाति-व्यवस्था एकटा घोर समस्याक रूपमे उपस्थित भेल अछि | जतय देखू एके झुनझुना लोक बजबैत अछि, हम हिन्दू छी,हम मुसलमान छी,हम सिख छी, हम ईसाई |लोक एक-दोसराकें नोचि लेबा पर आतुर अछि |जाति के नाम पर सब किछु गमा देबाक लेल ब्याकुल अछि |ई जाति की थिक ? सजमनि, कदीमा, भाटा सन अलग-अलग तरकारी त नहि जकर स्वाद अलग-अलग होइत अछि |रूप-रंग अलग-अलग होइत अछि | एना त किन्नहु नहि |फेर एहि जातिकें चीन्हबाक कोन आधार ? टीक कटयलासं, दाढ़ी बढयलासं, पगडी बन्हलासं की नस महक खूनक रंगो बदलि जाइत अछि ? अगर नहि त’ ई जाति-पांतिक मारा-मारी किए’? अनिलजी कहैत छथि :
‘की हिन्दू आ की मुसलमान
एके शोणित एके परान....’
सरिपहुं एके शोणित,एके परान रहैत अछि सबहक देहमे | फेर ई अलग-अलग खेमा तैयार करबाक कोन प्रयोजन ? की हम एक देशमे एक भ’ क’ नहि रहि सकैत छी ?हमर जाति मात्र भारतीय नहि भ’ सकैत अछि ?अगर एना नहि त मानव हेबापर हमरा शर्म महसूस करक चाही | मानवीय संवेदना मनुक्खक प्रथम जाति हेबाक चाही, वैमनस्यता नहि |
अनिलजीक ‘गीत गंगा’ मैथिल जीवनक आधार एतुक्का पर्व-त्यौहार दिस सेहो ध्यान आकर्षित करैत अछि |ओ कहैत छथि :
‘पथिया लीय’ बासन लीय’
कूरा कोसिया ढकन लीय’
चलू-चलू पोखरि मोहार
दिनकर दुःख हरता .....’
दिनकरकें समांगक देवता कहल गेल अछि | शारीरिक कष्टसं मुक्तिक खातिर लोक छठि पावनि मनबैत अछि | सूर्यकें अर्घ्य दैत अछि | परिवारक सुख-शांतिक खातिर लोक प्रार्थना करैत अछि |पोखरिक घाट पर छठि पुजैत अछि | मैथिल समाजक विविधतामे एकता एतय सम्पूर्ण रूपमे उजागर होइत अछि |
‘गीत गंगा’ स्त्री-पुरुखक नोक-झोंक दिस सेहो ध्यान आकृष्ट करैत अछि |पारिवारिक जीवनक आधार बनैत अछि स्त्री-पुरुखक आपसी सम्बन्ध | पति-पत्नीक
लाड-दुलार | दुनूक बीच कखनो मुंहो फुला-फूली होइत अछि, कखनो मानो-मनौवल जे जीवनक सरसता, जीवन्तताकें बड सहजतासं अभिव्यक्त करैत अछि |
ओ कहैत छथि :
‘जखन घरेवला छथि कसाइ
तखन सुख की बुझबै ?...’
एतय कसाइ शब्द उलहनक अर्थमे आयल अछि, हत्याराक लेल नहि | जकरासं लोककें नेह रहैत छै ओकरापर ओ अपन विशेष अधिकार बुझैत अछि आ ओकरा लेल ओ कोनहु शब्दक प्रयोग करैसं हिचकिचाइत नहि अछि |इएह कारण अछि जे मानवती पत्नी अपना पतिकें कसाइ कहि अपना दुःखक लेल जिम्मेवार ठहरौलनि अछि | माँ कालीसं गोहारि लगौलनि अछि |लोककें जखन अपन शक्तिपरसं विश्वास उठि जाइत छै तखन ईश्वरीय शक्तिकें आह्वान करैत अछि |सुख-दुःखक सागरसं पार उतरबाक लेल मनबैत अछि |
एक दिस जतय स्त्री पुरुषसं शिकायत करैत छथि जे ओ हुनक इच्छा-आकांक्षाक पूर्ति नहि क’ हुनक उपेक्षा करैत छथिन, दोसर दिस वएह स्त्री पुरुषकें अपना जीवनक आधार बनाक’ कहैत छथि :
‘हम एके निन्नक दू सपना
हम आगि थिकहु अहाँ धूमन छी |’
एतय पति-पत्नी एक-दोसराक परिपूरक रूपमे आयल अछि जतय एक के बिना दोसर आधा अछि |सरिपहु स्त्री-पुरुषक सम्बन्धे एहिना होइत अछि जतय कोनो लाग-लपेट नहि | कोनो परदा नहि |सुच्चा सम्बन्धक महकैत फुलवारी जतय विविध रंगी फूल दमकइत अछि,चमकैत अछि |
आजुक विकसित युगमे विकटतम समस्याक रूपमे जे किछु उभरल अछि ओ थीक आतंकवाद | ई कोनो शर्दी-खांसी नहि,ज्वर-वात नहि जाहिसं एक मनुक्ख पीड़ित होइत अछि, प्रभावित रहैत अछि |
ई एहन रोग अछि जे महामारी जकां एके बेरमे गाम-गाम, नगर-नगर के सुडडाह क’ दैत अछि, बम-बारूदसं उड़ा दैत अछि, जतय विनाशे-विनाश देखाइत अछि,आहे-आह सुनाइत अछि | ई एहन ह्रदय-विदारक घटना घटबैत अछि जतय शायद पत्थरो पसीझ जाएत | ई आतंकवाद आदिम युगक राक्षसी हमला नहि, आधुनिक युगक दुष्प्रवृत्ति जतय आदमीक विरुद्ध आदमी षड्यंत्र रचैत अछि,अमानवीय व्यवहार कें अंजाम दैत अछि, जे देखि क’ समाजक सब वर्गक लोक क्षुब्ध होइत अछि, शोक मनबैत अछि | साहित्यकारो एकटा सामाजिक जीव होइत अछि, ओकरो लोकक सुख-दुःख माजैत अछि,तोडैत अछि |
‘गीत गंगा’क रचयिता अनिलजी सेहो क्षुब्ध छथि, कहैत छथि :
‘गोली-बारूदक मौसममे हम कविता केहेन सुनाबी
हाल देखि बेहाल भेल छी, गीत कोना क’ गाबी |’
सरिपहु एहन भयावह समयमे ककरो मुंहसं गीत कोना निकलत |जखन कि गीतक सम्बन्ध मोनक उमंग-
तरंगसं अछि, ख़ुशी-उल्लासक संग अछि | अगर हम एहन स्थितिमे गीत गेबो करैत छी, कविता लिखबो करैत छी त ई अनर्गल प्रयास सन मात्र हास्यास्पद हएत |
एतेक के बावजूदो अगर कवि कविता लिखैत छथि, साहित्यकार गीत रचैत छथि त मात्र ‘स्वान्तः सुखाय’| जे लोक ककरो कहि नहि पबैत अछि,ककरो बुझा नहि पबैत अछि, ओ लिखि लैत अछि, शब्दक माध्यमसं दुःख बांइट लैत अछि |एकटा रचनाकारक हाथमे मात्र एकटा कलम टा रहैत अछि जे आदिसं अंत धरि ओकर संग दैत अछि, संग निभबैत अछि |
‘गीत-गंगा’क रूपमे स्वयं अनिलजी मानवीय संवेदनाक संग हमरा अहाँक समक्ष उपस्थित भेलाह अछि, जतय एकटा साहित्यकारक ह्रदय सब सुख-दुःखक अनुभव करैत अछि, गहराइसं सोचैत अछि,भावपूर्ण भाषामे लिखैत अछि |
ई ‘गीत-गंगा’ सरिपहु गंगेक भांति निर्मल अछि,पवित्र अछि जाहिमे डुबकी लगेलाक बादे ओकर महत्त्व बूझल जा सकैत अछि, गूनल जा सकैत अछि |
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"गजल गंगा"
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