गीत गंगामे अनिल
(केदार कानन)
जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" कवि गीतकार छथि। कविता ई लिखैत रहलाह अछि मुदा हिनक गीतकारे बला रूप बेसी प्रखर आ मुग्धकारी अछि।अपन गीत सभमे कोमल भाव चित्र विन्यस्त करबामे हिनक जोड़ नहि अछि। सूक्ष्म आ सांकेतिक अर्थ ग्रहण करयबामे हिनक गीत समर्थ अछि। मैथिलीमे गीत कारकजे श्रृखंला अछि ताहिमे अनिल विशिष्ट छथि। खाहे ओ अभिव्यक्ति कौशल हो वा सहज-सरल ढ़ंगे अपन मनक बातकेँ कहि देबाक आतुरता अनिल निश्चये अपन लक्ष्य प्राप्त करैत देखाइत छथि।
1973 मे हिनक एक गीत संग्रह "तोरा अंगना मे" आ १९९९मे दीर्घ कविता संग्रह "धारक ओइ पार" एलनि आ २०१३मे गीत संग्रह "गीत गंगा"। पहिलसँ दोसर संग्रहमे एक्कैस बर्खक तँ दोसरसँ तेसर संग्रहमे चौदह बर्खक अंतराल। बहुत नमहर अंतराल की हुनक भितरक रचनाकारकेँ सुषुप्तावस्थामे रखने रहल? एतऽ हम कहब नै। पाठकेँ प्रायः बूझल हेतनि जे अनिल हिंदीमे सेहो निरंतर लिखैत छपैत रहलाह अछि। अपन मनक आवामे हुनक शब्द संसार, भाव-संपदा पकैत रहल आ बाहर एबा लेल छटपटाइत रहल। तकरे प्रतिफल थिक "गीत-गंगा", जे हिनक श्रेष्ठ आ मानक गीत संग्रह थिक। एहि संग्रहमे जे गीत सभ अछि से संपूर्ण मिथिलाक तीत-मीठकेँ बहुत सहजता संग कहैत अछि। कतहु हिनक दृष्टि परंपरागत शोषणक औजार दिस जाइत अछि आ आवश्यक परिवर्तन नै देखि गीतकार झूर-झमान होइत छथि आ एक नव बाट देखबैत छथि। आ बाट देखेबाक जे हिनक कुशलता छनि से हमरा विभोर करैत अछि।
"दिल्लीसँ दरभंगा धरि अछि
"निर्भयाक चित्कार
कृष्ण आबि कऽ लाज बचेता
से सोचब बेकार"
प्रकृतिक समीप जाइत गीतकार प्रकृतिसँ एकमेक होइत जे जयजयकार करै छथि से चित्रमनकेँ मोहैत अछि-
जंगल झाड़ पहाड़क जय हो
पोखरि धार इनारक जय हो
जय हो झरना नदी समुद्रक
हरियर खेत खम्हारक जय हो
शहरक जय हो गामक जय हो
जामुन आम लतामक जय हो
जय हो मकइ गहूम आ धानक
भूसा नार पुआरक जय हो
एहि गीतमे हुक दृष्टिमे जे किछु अबैत अछि से ई सिद्ध करैत अछि जे जीवनक जे आधारभूमि थिक, अस्तित्व बचेबाक वा दैनंन्दिक जीवनमे जकर जकर बेगरता मनुक्खक जीवनमे अछि करा संग हिनक अद्भुत तादात्यम्य अछि। आ एहि सभहँक बहुत सार्थक आ अर्थगर्भ अभिव्यक्ति हिनक गीतमे भेल अछि। गीत गंगामे संकलित हुनक आत्मगीत (जे विषय सूचीमे सम्मिलित नै अछि आ ओ अपन बाबाक समृतिकेँ नमन करैत लिखलनि अछि) एहि संग्रहक श्रेष्ठ गीत मानल जेबाक चाही। आत्मगीतमे स्वभावतः ओ अपन जीवन, जिवनक संपूर्ण परिस्थिति आ परिवेशकेँ चित्रित केलनि अछि आ अतीतक पुनरावलोकन करैत देखाइ छथि। किछु पाँतिकेँ एतऽ उद्धृत करबाक लोभ संवरण नहि कऽ पबैत छी—
सपना पाहुन बनि कऽ आयल तन्नुक सन निन्नक आँगनमे
हम देखलहुँ दुन्नू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल
नागर्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल
छल जहाँ जतऽ जे चिड़ै कतहुँ आकाश छोड़ि कऽ पड़ा गेल
सभ बाट अहिल्या सन शापित नित बाटे राम केर तकै छली
कयटा पिच्छर छल बा जतय खसवासँ हमरा बचा गेल
माइक हाथक पाड़ल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल
क्षमा करु हे मित्र हमर नहि आँखि मूनि कऽ चलब हम
उपरोक्त पाँति सभ गीतकारक जीवनमे घटित अतीत, हुनक संकल्प आ हुनक प्रतिबद्धता आदिकेँ रेखांकित करैत एक विस्तृत फलक अवश्य तैयार करैत देखाइत अछि। मुदा जतऽ ओ कहै छथि जे -नागर्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल- से हिनक गीत सभमे विरल देखाइत अछि। एतऽ मोन पड़ै छथि हिंदीक गोरख पांडेय। हमरा लगैए गीतकार अनिल लग शब्द संपदा आ विपुल अभिव्यक्ति कौशल छनि। जव ओ जीवनक वास्तविक गीत लिखथि, समाजक अंतिम आदमीक गीत लिखथि, निराला आ नागर्जुनक वैचारिक प्रतिबद्धताक गीत लिखथि तँ ओ निश्चये हिनक गीतकारक व्यक्तित्वकेँ आरो ऊँचाइ आ व्यापकता देतनि आ हुनक गीतकारक एकटा प्रखर रूप मैथिलीकेँ भेटत। उद्बोधन गीत, प्रेरणा गीत, प्रकृतिसँ संबंध गीत, अपन छोट-छोट सुख आ दुखक गीतक जमाना लदि गेल अछि। एहन गीत सभ भारतक सभ भाषा-साहित्यमे ततेक लिखल गेल हछि जे पाठक अपनासँ ओहि गीत सभहँक संग तादात्म्य स्थापित नहि कऽ पबैत अछि। हम व्यक्तिगत रूपें गीतकार अनिलसँ बहुत रास अपेक्षा रखैत छी, जे ओ ओही पंथकेँ चुनथि जे पंथ हुनका बहुत-बहुत ऊँचाइपर लऽ जानि आ हम सभ गौरव बोधसँ भरि उठी।
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