विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

धारक ‘अइ’ पार

आशीष अनचिन्हार · 2015-12-01 · अंक 191

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धारक "अइ" पार
(आशीष अनचिन्हार)
सीमान जे शब्द थिक तकर मतलब होइ छै एखन रेखा जाहिसँ अपन-आनक बोध हो। ऐ सीमानक नाम वस्तु बदलिते बदलि जाइत छै। जेना खेतक सीमानकेँ आरि तँ गाछी केर सीमान हत्था भेल। तेनाहिते घर-घड़ारीक सीमान टाट-फरकी भेल। टोलक सीमान "ऐ टोल-ओइ टोल" होइत अछि। तेनाहिते नदी-धार-पोखरि लेल सेहो " ऐ पार- ओइ पार" केर प्रयोग कएल जाइत छै। जखन कियो कहै छै जे "धारक ओइ पार" तँ एकर अर्थ कहनिहारक उल्टा बला दिशाकेँ लेल जाइ छै। मानि लिअ कियो पछबारि पारमे ढ़ाठ भऽ कऽ कहै जे "धारक ओइ पार" तँ एकर मतलब जे कहनिहार "धारक" पुबारि पार बला दिस इशारा कऽ रहल छथि। आब चली असल उद्येश्यपर। मानि लिअ जे हम कहलहुँ- जे "धारक ओइ पार" नीक लोक सभ छथि तँ एकर मतलब मात्र एतबे नै रहै छै जे "धारक ओइ पार" नीक लोक सभ छथि, एकर मतलब ईहो होइ छै जे "धारक" ऐ पार खराप लोक सभ छथि। तेनाहिते मानि लिअ जे हम कहलहुँ- जे "धारक ओइ पार" खराप लोक सभ छथि तँ एकर मतलब मात्र एतबे नै रहै छै जे "धारक ओइ पार" खराप लोक सभ छथि, एकर मतलब ईहो होइ छै जे "धारक" ऐ पार नीक लोक सभ छथि। एकटा आर रोचक प्रसंग बूझि लिअ जे ई सीमान मात्र लोकेँ लेल नै छै बल्कि लोक, प्रकृति आ आन वस्तुसँ सेहो छै। मने ओइ पारक जमीन उपजाउ छै मने ऐ पारक जमीन उस्सर छै।
आलोचकक काज मात्र गदगदी आलोचना करब या पूरा किताबक सारांश प्रस्तुत करब नै छै। आलोचकक काज तँ सैद्धांतिक पक्षक सही विवेचनाक संगे ईहो छै जे रचनामे जे किछु अघटित रहि गेल छै तकरा पाठकक सोंझा आनि ओकर रस-स्वादकेँ आर बेसी नीक करब।
आब कने विस्तारमे चली--- मानि लिअ एकटा कवि एलाह आ लिखलाह जे "धारक ओइ पार" तँ एकर की मतलब हेतै। एकर मतलब ई छै जे कवि "ओइ" पारक संगे-संग समानांतर रूपें "अइ" पारक सेहो वर्णन कऽ रहल छथि। किछु उदाहरण देखू—
"हम बिसरि जाए चाहलहुँ
अपन देखल सपना.............
मुदा बिसरि ने सकलहुँ"
कवि धारक "ओइ" पार लेल ई प्रयुक्त केने छथि मुदा ई कटु सत्य जे धारक "अइ" पार ओ देखल सपना बिसरिए नै गेला बल्कि ऐ दुनियाँसँ ओसपने बिला गेलै। 1947 केर बाद भारत दू बेर आजादीक सपना देखलक। पहिल बेर जयप्रकाशजीक संगे आ दोसर बेर अन्ना हजारेक संग मुदा आश्चर्य जे ओ सपना अजादीक नै रहै सीढ़ी बनेबाक लेल रहै। पहिल बेरमे लालू-नितीश-रामविलास तँ दोसर बेरमे अरविंद केजरीवाल।
"जठरानलक दर्दसँ
आहत भेल हम
थुस्स दऽ बैसि जाइत छी"
कवि धारक "ओइ" पार लेल कहै छथि मुदा धारक "अइ" पार बिजनेस सम्राट अनिल अंबानीक बेटा थुल-थुल, मोटापासँ ग्रसित भऽ थुस्ससँ बैसि जाइत अछि। "ओइ" पार लोक भुखले मरै छै तँ "अइ" पार बेसी खा कऽ।
"अरे रे रे ई की
बहुत रास मूँह तँ
चिन्हारे जकाँ लगैत अछि..........
भेल रहय परिचय"
कवि धारक "ओइ" पार लेल ई कहने छथि मुदा धारक "अइ" पार तँ भाए-भाएमे झगड़ा छै। बुढ़ारीमे बेटा अनचिन्हार बनि जाइ छै तँ जवानीमे लोक पाइ कमा लेल अपने परिवारसँ अनचिन्हार बनि जाइत अछि।
क्यो हमर उपस्थितिक
मान्यता नहि दैत अछि
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सभहँक मौन स्वीकृति
ई धारक "ओइ" पारक कथा अछि मुदा धारक "अइ" पार तँ सभ एक-दोसरकेँ मान्यता दैत अछि। तों महान तँ तों महान। बिना एककेँ मान्यता देने अइ पारमे दोसरक मान्यता भैए ने सकैए। तँए "अइ" पार सभ एक दोसरकेँ मान्यता दैत अछि। आइसँ करीब 5 बर्ख पहिने हम मैथिलीक महान व्यंगकार रूपकांत ठाकुरजीक आलोचना "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि " शीर्षकसँ केने रही तकर ई अंश देखू--
"आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "मैथिली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--
1) मोमक नाक (व्यंग संग्रह)
2) धूकल केरा (व्यंग संग्रह)
3) लगाम (नाटक)
4) वचन वैष्णव (नाटक)
5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक।
आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । ई शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मने रूपकांत ठाकुरजी अपन भविष्यक बात लीखि गेल छलाह।"
तहिना "धार ओइ पार" केर कवि सेहो लीखिए देने छथि-
"क्यो हमर उपस्थितिक
मान्यता नहि दैत अछि"
एकरा मात्र संयोग नै मानल जा सकैए जे आलोचनामे मात्र ओहने लेखक स्थान पबैत छथि जे नाना प्रकारक तिड़कम भिड़बैत छथि।
"-----आम जामुन लतामसँ भरल
गाछी बिरछी छै
बाड़ी झाड़ी छै
फूल-फुलवारी छै
मंदिर-मस्जिद छै..."
ई धारक "ओइ" पार छै मुदा "अइ" पारमे तँ भागलपुर, गोधरा, मुजफ्फरनगर आ दादरी सभ छै। उपरका पाँतिसभ "ओइ" पारसँ बेसी "अइ" पारक बात अछि।
"-- गाँधी सुभाष भगत सिंहक खिस्सा"
लगैए धारक "ओइ" पारमे ई खिस्सा सभ मोनसँ सूनल जाइत हेतै। धारक "अइ" पार तँ आब नाथूराम गोडसे शहीदक दर्जा पाबि गेल। ओकर मूर्ति आब गाँधीक बराबरमे लागि गेलै।
ने तँ हम ऐ जीवनमे धारक "ओइ" पार जा सकै छी आ ने हम धारक "अइ" पारक पूरा व्याख्यान कहि सकै छी। भऽ सकैए जे धारक "ओइ" पार देखाबए लेल जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक बदला आकर कियो आबि जाथि आ धारक "अइ" पारक पूरा व्याख्यान कहबा लेल हमरा बदला कियो आर आबि जाथि मुदा एतेक तँ सत्य जे धारक "ओइ" पारक हाल-चाल बुझलासँ धारक "अइ" पारक हाल-चाल सेहो बुझा जाएत।
ई साहित्य केर बड़का गुण छै जे ओ अपना समयसँ आगू हुअए मुदा........................
जे रचना पढ़लापर आगुओकेँ बुझाए आ पाछुओकेँ तखन ओकरा की कहबै। "धारक ओइ पार" नामक रचना आपना समयसँ बहुत आगू समय केर कविता अछि मुदा ओकर आवृत आ पाठक करैत काल ई बहुत नीक जकाँ फड़िच्छ हएत जे ओ अपना समयसँ पाछुओकेँ रचना अछि। जखन अहाँ रमायण की महाभारत पढ़बै तँ ई बेसी स्पष्ट हएत जे ई दूनू ग्रंथ आगू आ पाछू दूनू समयक रचना छै। ई दूनू ग्रंथक जे दृष्टि आ विजन छै से आगू समय केर छै मुदा पाठ ओ आवृति पाछू समयक। हम एतए ई नै कहए चाहै छी जे जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक दीर्घ कविता संग्रह "धारक ओइ पार" रमायण की महाभारते जकाँ अछि मुदा एतेक तँ सत्य जे ई दीर्घ कविता मैथिली साहित्य केर 90 प्रतिशत कवितासँ नीक आ प्रभावी अछि।
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Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “धारक ‘अइ’ पार.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 191, 2015-12-01. https://www.videha.co.in/research/2015/191/धारक-अइ-पार.htm

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