मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’
(डॉ. अजीत मिश्र)
“सुस्वरं सरस चैव सरागं मधुराक्षरम्।
सालकारं प्रमाणं व षडविधलक्षणम्।।”
अमरकोशमे गीतक छओ गोट उक्त लक्षण उद्धृत कएल गेल अछि, जकरहि मूल मानि विभिन्न विचारक - आलोचक लोकनि गीत विधाकेँ छान-पगहामे बान्हल करैत अएलाह अछि। यद्यपि गीत विधा सम्बन्धी उल्लेख सामवेदमे सर्वप्रथम दृष्टिगोचर होइछ। पछाति एक स्पष्ट अवधारणा अमरकोश एवं नाट्यशास्त्रमे कएल गेल। विभिन्न समयमे विभिन्न विचारक द्वारा एहि सन्दर्भमे आएल विचारमे भिन्नता दृष्टिगोचर भए सकैत अछि, मुदा ओहि बीच जाहि एक तत्वपर सभ गोटए एक मत देखबामे अबैत छथि ओ थिक गीतक सम्बन्ध गेयतासँ अछि, गीत काव्य एक स्वतन्त्र विधा थिक, जे काव्य आ सङीतक सुन्दर-संयोगसँ उत्पन्न होइछ।
एहि गीत विधाक प्रधान तत्वक प्रतिपादन एहि प्रकारेँ कएल जाए सकैत अछि-
· संगीतात्मकता
· कल्पनाक प्रभावकेर सौन्दर्यपूर्ण ओ कलापूर्ण चित्रण
· रागात्मकता
· अन्तर्दर्शन आ आत्मनिष्ठ, जनिक आधार थिक सुख-दुख, राग, द्वेष, आशा-निराशा
· लयात्मक अनुभूति, आओर
· समाहित प्रभाव।
जँ उपर्युक्त तत्वक माध्यमे कोनो गीत विधाक पोथीक मूल्याङन कएल जाए तँ ओएह होएत ओहि पोथीक उचित मूल्याङन। आइ हमहु एकरहि आधार बनाए आदरणीय श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क गीत विधाक पोथी ‘तोरा अंगनामे’ पर किछु विचार करबाक प्रयास कए रहल छी।
रमणीयताक कारणेँ सङीत जीवनक अभिन्न अङ थिक आओर थिक हृदयक भाषा आ मनक प्रकाश। गीत प्रथमत: आ अन्तत: अपन स्त्रष्टाक मानस-मुकुट थिक, हुनक व्यक्तित्वक दर्शन थिक। रागात्मक अनुभूति जखन आवेशक क्षणमे रहरहाँ उमड़ि कोनो मधुर सङीतक माध्यममे व्यक्त होएबाक लेल प्रस्तुत होइत अछि, तखन मधुर लयमे कविक आंतरिक सहजानुभूति अपन रूप धारण करए लगैछ आ कवि स्वत: प्रेरित भए अपन भावनाक अनुरूप शब्दाभिव्यक्ति कए बैसैत छथि। ठीके, ‘तोरा अंगनामे’मे संगृहीत प्रत्येक पद कविक आंतरिक सहजानुभूतिक स्पष्ट दर्शन करबैत अछि। एको पाइ सन्देह नहि जे गीतकार बिनु प्रयासहिँ अन्तर्मनसँ आएल अभिव्यक्तिकेँ रूप धारण करौलनि अछि। उदाहरण देखबासँ पूर्व दर्शनीय-पठनीय अछि गीतकारक पोथीमध्य उद्धृत हुनक अभिव्यक्ति-
ने कवि छी हम ने गीतकार
ने आलोचक ने लेखक छी
मानी त मानू अपनहि सन
माँ मैथिलीक पद-सेवक छी।
एहि उपर्युक्त पदमे नहि तँ कोनो अकृत्रिमता अछि आ नहि अछि प्रगल्भ विचार, ई तँ थिक अन्तर्मनक एकटा स्वरमात्र। आ तेँ ने कहल जाइत छैक जे अन्तर्मनसँ निकलल शब्दमे, विचारमे कोनो लाइ-लपट नहि होइत छैक, कोनो राग-द्वेष नहि होइत छैक, आ ने होइत छैक कोनो लिप्सा। तेँ गीतकार अपनाकेँ मात्र मैथिलीक सेवक घोषित कएने छथि, नहि कि ओकर नियंता।
एहि प्रकारेँ उपर्युक्त पोथीक अन्तर्गत देखबामे अबैत अछि जे गीतकार मात्र ओहि विचारकेँ व्यक्त कएलनि जे अन्तर्मनसँ निकलल छनि आ सेहो कोन रूपमे? तँ, लोक-जीवनक सङ बढ़ैत सम्पृक्तिक रूपमे, गीतक स्वरूपपर राजनीतिक चेतनाक प्रभावक रूपमे, चोखगर यथार्थ बोधक स्वरमे, गहन निराशामे मानवीय संबलक रूपमे गीत परिकल्पनाक माध्यमे। ओहूना देखल जाइत छैक जे कोनो गम्भीरसँ गम्भीर विषय जँ मधुमे बोरि व्यक्त होइछ तँ ओ अपन प्रभाव तँ देखबैते अछि, मुदा प्रारम्भिक किछु क्षणमे निश्चये अपूर्व आनन्द अबैत छैक। ठीक, तहिना गीतकार ‘अनिल’ बाबू गम्भीरो विषयकेँ एहन-ने लय-तालमे बद्ध कए व्यक्त कएलनि जे श्रोतापर ओकर प्रारम्भिक प्रभाव अत्यन्त रमनगर होइत छनि, मुदा बादमे ओ अपन प्रभाव सेहो खूब देखबैत अछि। द्रष्टव्य थिक किछु ओहने पाँती-
“छथि उदासे बहिन मैथिली
आइ जागृतिक भोरमे
स्नेह ने पाबि रहलि बेचारी
अपनो माइक कोरमे
देखि मलिन आकृति निज जनकक
डूबल सदिखन नोरमे
हो पौरुश तं एहि फन्दासं मिथिलाकें स्वच्छन्द करू
चाही जं उद्धार मैथिलीक, तिलक प्रथाकेँ बन्द करू।”
के एहन कठोर हृदय होएत जे एहि पदकेँ सुनि-पढ़ि अपन हाथ हृदयपर नहि लए जाएत? के एहन विचारहीन होएत जे एहि पदकेँ सुनि-पढ़ि किछुओ कालक हेतु एहि उचित बाटपर चलबाक दिशामे नहि सोचत? बस, साहित्यक तँ इएह काज थिकैक जे पाठककेँ उचित बाट धराबए, ओहि दिशामे सोचबाक हेतु बाध्य करए। एहि दिशामे उपर्युक्त पोथी पूर्ण रूपेण सफलता प्राप्त कएलक अछि।
गीत तँ ओ थिक जे एक कण्ठसँ दोसर कण्ठ होइत जगभरि पाटि जाए। मिथिलाक प्राय: केओ एहन व्यक्ति नहि होएताह जे एहि गीत-संग्रहक कोनो-ने-कोनो गीतक किछु पाँती कखनो-कतहु सुनाए नहि पाबथि। किछु गीत तँ मैथिलीक प्रत्येक मञ्चपर अदौसँ अपन स्थान छेकि चुकल अछि। देखल जाए किछु ओहने पाँती-
“हम मुग्ध भेलौं, धरतीक श्रृंगार देखि क’
नव कलष नव मज्जर आ पात देखि क’
बुझि पड़ैछ आबि गेल नव दुनियां जेना
आइ धरतीयो लगैछ नव कनियां जेना।”
आ
“मोन होइए अहांकें देखिते रही,
किछु बाजी अहां हम सुनिते रही।
आइ आयल मिलन केर
मधुर यामिनी
बनि बैसलौं अहां
मानिनी-कामिनी।” आदि
एतावता, कहल जाए सकैत अछि जे ‘तोरा आंगनमे’ एकटा एहन गीत संग्रह भए पैंतीस-चालीस वर्ष पूर्व मैथिली साहित्यिक संसारमध्य पएर रोपने छल, जे शीघ्रहि अपन प्रभाव मिथिलामध्य पसारि बहु प्रशंसित भेल। एक दिस जतए ई अपन व्यङ्यक माध्यमे समाजकेँ शिक्षित करबाक प्रयास कएलक ओतहि दोसर दिस अपन लोक-विचारसँ समाजकेँ जागृति। एतबे नहि, एहि संग्रहक एकटा अपूर्व विलक्षणता ई अछि जे एहिमे व्यवहृत विचार गहन निराशामे मानवीय संबल बनि ठाढ़ भए जाइछ। इएह तँ थिकैक साहित्यक कार्य, इएह तँ थिकैक साहित्य प्रभाव। एहि सभमे ‘तोरा अंगनामे’ मैथिलक प्रत्येक अङनामे ठाढ़ भए एहन-ने विचार, एहन-ने प्रभाव पसारलक जे चहु दिस एकर स्वर कर्णगोचर होअए लगलैक, चहु दिस एकर जाल पसरए लगलैक।
हँ, जखन चन्द्रमामे सेहो करिआ दाग छनि तखन ई तँ मात्र एकटा पोथीमात्र थिक। एहिमे व्यवहृत किछु शब्द अपन मूल रूपसँ मेल नहि रखैत अछि। एकर पाछाँ कारण कोन? एकर जिज्ञासा बनले रहल अछि, मुदा ओहि किछु शब्दकेँ देखि अपनहुँ सभसँ विचार प्राप्त भए सकैत अछि। द्रष्टव्य थिक किछु ओहने शब्द- देष, षंकर, सुभाशो, विष्व, आषा, ष्यामल, सृश्टि आदि। एतए ध्यातव्य अछि जे छन्द-ताल आदिक ज्ञान नहि रहबाक कारणेँ भए सकैछ जे उक्त विषय हमर माथक उपरे दनेँ चल गेल हो। ओना इहो सुनल अछि जे कवि लोकनिकेँ विभिन्न क्रममे शब्दकेँ तोड़बाक-जोड़बाक सामर्थ्य प्रदान कएल गेल छनि, तेँ भए सकैछ जे एहि शब्द सभक पाछाँ ओएह कारण हो। मुदा, एहिमे कोनो भाङट नहि जे ‘अनिल’ बाबू अपन पोथी ‘तोरा अंगनामे’क माध्यमे एहन-ने अनिल बहौलनि जे ओकर बिड़ड़ोमे सम्पूर्ण मैथिली गीत विधाक आङन सज्जित-चमत्कृत भए उठल अछि।
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