विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

गामके अधिकारी तोहे बड़का भैया हो

आशीष अनचिन्हार · 2016-02-01 · अंक 195

गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो
(आलोचना)
[18, November 2015केँ भवनाथजी अपन फेसबुक वालपर एकटा बहस शुरू केला जे शारदा सिन्हा द्वारा आओल सामा गीतक पाँति "हाथ दस पोखरि खुना दैह कि चम्पा फुल लगा दैह हे।" गलत अछि जकरा ऐ लिंकपर देखल जा सकैएhttps://www.facebook.com/bhavanath.jha/posts/1004404362949791 एही संदर्भमे प्रस्तुत अछि हमर आलेख जाहिमे ई सिद्ध करबाक प्रयास कएल गेल अछि जे सामा गीतक बोल ठीक छै आ भवनाथजीक तर्क गलत अछि।-आशीष अनचिन्हार]
किछु शब्द एहन होइ छै जकर अर्थ भूतकालमे तँ किछु होइत छै मुदा वर्तमान कालमे बदलि जाइत छै। ओना बहुत बेर जबरदस्ती अपन महत्व देखेबाक लेल सेहो बदलि देल जाइत छै। भारतमे जखन भाषाविज्ञानक काज शुरू भेल तँ ओकर कर्ता-धर्ता संस्कृत भाषामे बान्हल लोक सभ छला। जकर परिणामस्वरूप भाषाविज्ञानक सभ अध्याय संस्कृतसँ शुरू भेल आ संस्कृतेपर खत्म। ओ लोक सभ संस्कृत छोड़ि आन भाषाक महत्व नै स्वीकारलथि आ तँए भारतीय भाषाविज्ञान बहुत अर्थमे एकांगी अछि। कोनो कालक भाषा शुद्ध नै होइ छै। हरेक समयमे हरेक आन भाषाक शब्द ओ व्याकरणक प्रभाव एक-दोसरापर पड़ैत रहलैक अछि। मुदा हुनका सभ लेल मात्र संस्कृते सभ किछु। ई सत्य जे संस्कृत भारतक राजकीय ओ धार्मिक (जनताक नै) भाषा छल तँए ओकरो प्रभाव आन भाषापर पड़लै मुदा सभ भाषा संस्कृतेसँ निकलल अछि या सभ भाषाक मूल संस्कृते टा अछि एहन विचार संकुचित विचार अछि। आधुनिक कालमे जखन लोक सभ शब्दक मूल ताकऽ लगला तँ अनयासे किछु लोक संस्कृते टाकेँ मूल मानि लेलनि आ दोषपूर्ण परिणाम निकलैत रहल। मात्र शब्दें नै श्लोकक अनर्थपूर्ण व्याख्या सेहो भेल। दूटा उदाहरण देखू---
एतदेव विपर्यस्तं संस्कार गुण वर्जितम्
विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नाना वस्थान्तरात्मकम्।
(भरत मुनि)
मने जे मूल शब्दक अक्षरकेँ आगू-पाछू कए वा सरलीकृत कए बाजब प्राकृत पाठ कहाइए। ऐठाम मूल शब्द कोनो भाषाक भए सकैए मुदा ओ सभ मूल शब्द मने संस्कृतक शब्द मानि लेलनि। की भरत मुनिक समयमे एकमात्र संस्कृते भाषा छल? स्पष्ट अछि जे भरत मुनि हरेक भाषाक मूल शब्द लेल कहने छथि हँ जेना पहिने कहलहुँ संस्कृत केंद्रीय भाषा छल तँए बेसी शब्दक मूल ओतत्हिसँ भेटत। वर्तमानमे "डरेबर", "इस्कूल", "औड़ी-नौड़ी" आदि सभ बहुत प्राकृत शब्द भेटत मुदा तँए कि ओकरा संस्कृतेसँ निकलल मानि लेबै डरेबर driver शब्दसँ अछि, इस्कूल school शब्दसँ तँ औड़ी-नौड़ी ordinary शब्दसँ। तेनाहिते आर आन शब्द सभ अछि। भाषामे वर्णविपर्य सेहो होइत छै मुदा आधुनिक भाषा वैज्ञानिक मात्र अपन श्रेष्ठता सिद्ध करबाक लेल एकर प्रयोग करै छथि। तेनाहिते आचार्य भर्तृहरि जी प्राकृतक सम्बन्धमे कहै छथि जे--
दैवीवाक् व्यवकीर्णेयम शकतैरभि धातृभिः
मने जे दैवीवाक् अशक्त लोकक मूँहमे आबि भिन्न-भिन्न रूपमे आबि जाइ छै।
आब ऐठाम प्रश्न उठैए जे दैवीवाक् की? तँ सभहँक मूँहसँ उत्तर भेटत संस्कृत मुदा ई गलत हएत कारण जेना ओइ समयक एकटा पंडित लेल दैवीवाक् संस्कृत रहल हेतै तेनाहिते ओइ समयक आन भाषा सेहो ओकर बजनाहर लेल दैवीवाक् रहल हेतै। तखन फेर संस्कृते टा किएक?
या ईहो भऽ सकै छै जे भरत मुनि या भर्तृहरि लेल मूल या दैवीवाक् केर मतलब संस्कृते टा रहल हो। एहन अवस्थामे ई मानए पड़त जे हिनक दूनूक अवधारणा संकुचित छल जैसेँ एकौ डेग आगू वर्तमान ओ आधुनिक भाषावैज्ञानिक नै जा सकलाह अछि।
किछु दिन पहिने भवनाथ झाजी फेसबुकपर एकटा पोस्ट देला जे—
“सामाक एकटा गीत गबैत छथि शारदा सिन्हा- "हाथ दस पोखरि खुना दैह कि चम्पा फुल लगा दैह हे।" कहू तँ, दस हाथक पोखरि केहन होएत?
मुदा एकर बोल कें ठीक कए लिय- हथदह पोखरि खुना दैह..............। हाथी दहाएबला पोखरिक कामना थिकैक”
एकर उत्तरमे हम ओहीठाम लिखलहुँ जे—
"बीतो भरिक जे खोपड़ी रहितै। एकर मतलब ई थोड़े छै जे एकै बीतक खोपड़ी होइ छै ऐ गीतमे बहीनक आग्रह छै जे नै नमहर तँ कमसँ कम दसे हाथ पोखरि खुना दिअ। साहित्य अभिधामे बेसी नै चलै छै। ओनाहुतो हथदह नै हथिदह हेबाक चाही हाथीक संदर्भमे"
एकर बाद बेस घमर्थन चलल आ बहस दह शब्दपर भेल जाहिमे भवनाथजीक कहब छलनि जे दह शब्दकेर निर्माण संस्कृतक "ह्रद" शब्दसँ भेल अछि। मुदा हमर कहब छल जे दह शब्द संस्कृत शब्दक नै आन भाषाक शब्दसँ आएल अछि। बेस घमर्थन चलल आ दूनू पक्ष अपन-अपन खुट्टापर कायम रहला। जँ ओ पूरा बहस देब तँ अनावश्यक रूपें पन्ना बढ़ि जाएत। तँए ओइ बहसकेँ हम ओत्तहि छोड़ी आ आगू चली (मूल बहस भवनाथजीक वालपर छनि, ओना काजक लेल हमहूँ ओकर काँपी-पेस्ट रखने छी)। ऐठाम ई स्पष्ट करी जे हम ऐठाम दूनू पक्ष राखब संस्कृतसँ सेहो दह केर संबंध जोड़ब आ बाहरी भाषासँ सेहो मुदा हमर मूल उद्येश्य अछि शारदा सिन्हा जीक गाओल आ अनाम गीतकारक गीतक रक्षा करब, ओहीक्रममे दह केर विवेचन हएत। बहुत संभव जे दह संस्कृतेसँ निकलल हो मुदा शारदा सिन्हाजीक जै गीतपर भवनाथजीकेँ आपत्ति छनि ताहिमे "ह्रद" बला दह केर कोनो जरूरति नै छै। ऐठाम ईहो देखब जरूरी जे भवनाथजी बिना कोनो विवेचनाकेँ अपन मंतव्य सुना देलनि जे गीतक बोल गलत अछि आ झट ओकर निराकरण सेहो दऽ दै छथि जे गीतक बोल ई हेबाक चाही।हमर ई नै कहब अछि जे लोकगीतक उपर चर्चा नै हेबाक चाही मुदा हम ई जरूर कहब जे बिना तर्क ओ तथ्यकेँ कोनो लोकगीतक बोलकेँ बदलब ओतबे खराप छै जते की कोनो जीवित आदमीकेँ जानसँ मारब।
विस्तारमे जेबासँ पहिने जँ एक मिनट लेल भवनाथजीक बात मानि ली हथदह मने हाथी दहाए बला पोखरि भेलै आ हाथीक विशालतासँ पोखरिक विशालता बुझाइत छै तखन हमरा ईहो जनबाक अछि जे मिथिलामे "नागदह" सेहो छै तँ की ओइमे नाग दहाइत हेतै आ ओकर विशलाता नागे जकाँ छोट हेतै? मिथिलामे "कमलदह" सेहो छै तखन सहज जिज्ञासा जे कमल एतेटा पोखरि लैए कऽ की हैतै? हमरा बुझने भवनाथजी कनी बेसिए भावुक भऽ गेल छथि विशालताक लेल। आब चली हम अपन मूल विवेचना दिस आ सभसँ पहिने तँ हमहूँ आने पंडित जकाँ संस्कृत दिस जाइ। संस्कृतमे दहन बला शब्दक संबंध ज्वाला,अग्नि आदिसँ छै। बोखारक गर्मी सेहो दाह कहल छै। मैथिलीमे दाह संस्कृतसँ मानल जा सकैए। द्रोह शब्द दहन केर विस्तार थिक जकर मतलब छै केकरो घृणामे जरि जाएब। तँए भवनाथजी द्वारा उपरमे देखाओल दह शब्द दहन शब्दसँ नै भऽ सकैए कारण एक आगि तँ दोसर पानि। केकनो काल कऽ एकै शब्दक विपरीत अर्थ सेहो भेटि जाइत छै मुदा से ऐठाम नै अछि। आब संस्कृतेक दोसर शब्द "दश" केर हाल देखी। जखन प्राकृत भाषा एकै तखन "दश" "दह"मे बदलि गेलै मुदा अर्थ नै बदलि सकलै। मतलब दश ओ दह दूनू संख्यावाची रूपमे रहल। दसोदिसिया या दहोदिसिया दूनू रूप भेटत।
ओना ई रोचक जे जँ प्रचलित शब्द खिया जाइत छै आ ताहीक्रममे दस शब्द दह शब्दमे बदलि गेल हेतै तैयो ओकर अर्थ नै बदलबाक चाही।
भवनाथजीक वालपर अमरनाथ झा नामक पाठक कहै छथि जे शब्द प्रचलनमे आबि खिया जाइत छै, ठीम हमहूँ मानलहुँ मुदा अर्थ????????????????????????? अर्थ तँ वएह रहतै जे भाइ हमरा कमसँ कम दसे हाथक पोखरि खुना दिअ। मुदा से तँ ने भवनाथजीकेँ ई काम्य छनि आ ने अमरनाथ झाजीकेँ । फेर संस्कृतक "ह्रद" शब्दपर आबी। "ह्रद" मने जलाशय, सरोवर, ध्वनि, नाद, किरण, मेढ़ा नामक पशु आदि एकर अर्थ भेल। मुदा एकर प्रचलन जलाशय लेल बेसी भेल। किछु अलग विशेषता लेने "ह्रद" सभ लेल अलग नामाकरण भेल जेना कपिला ह्रद, पुंडरीक ह्रद,आदि। ह्रदिनी मने नदी भेल। संस्कृत भाषाक विसर्ग प्राकृतमे "ह" जकाँ ध्वनि दैत छै। बहुत संभव जे ह्रद: केर उच्चारण ह्रदह=हदह=दह भऽ गेल हो। मुदा ऐठाम धेआन रखबाक थिक जे भवनाथजी पाठककेँ एहन कोनो सूचना नै दै छथि। बस ओ मानै छथि जे संस्कृतसँ विकास भेलै तँ भेलै ओकर कोनो विवेचना नै करऽ चाहै छथि।
जेना कि हम उपरेमे पुछने छी जे भवनाथजीक हिसाबें जँ हथदह मने हाथी दहाए बला पोखरि भेलै आ हाथीक विशालतासँ पोखरिक विशालता बुझाइत छै तखन हमरा ईहो जनबाक अछि जे मिथिलामे "नागदह" सेहो छै तँ की ओइमे नाग दहाइत हेतै आ ओकर विशलाता नागे जकाँ छोट हेतै? मिथिलामे "कमलदह" सेहो छै तखन सहज जिज्ञासा जे कमल एतेटा पोखरि लैए कऽ की हैतै?
आब कने संस्कृतकेँ विराम दैत आन भाषा दिस देखी---
अरबीमे Dahaha मैथिलीमे- दह (دَحَاهَا ई मूल उच्चारण अछि) केर दूटा मतलब होइत छै-- पहिल भेल " पसारनाइ" आ दोसर भेल “पसरल”,अर्थविस्तारक कारणें सभ चीजक पसारनाइ लेल एकर प्रयोग होइत छै ।किछु विद्वान अरबीमे Dahaha केर मतलब अण्डाकार धरती मानै छथि आ तैपर बेस घमर्थन भेल छै। कने हटि कऽ अरबिएमे दोहा (Doha) الدوحة केर मतलब वर्गाकार जलाशय होइत छै। तेनाहिते तुर्कीमे Daha केर मतलब बेसी होइत छै। तुर्कीमे कम-बेसी लेल एकरा उपसर्ग जकाँ प्रयोग कएल जाइत छै जेना-
faster लेल daha hızlı
slower लेल daha yavaş
more intelligent लेल daha zeki
more hardworking लेल daha çalışkan
more beautiful लेल daha güzel
आदि-आदि
जँ गौरसँ देखबै तँ पता चलत जे अरबी-तुर्कीमे जे दह केर अर्थ छै सएह अर्थ भवनाथजी द्वारा देल गेल दह शब्दसँ बेसी मेल खाइत अछि। मने ओहन विशाल पोखरि, गहींर जलाशय, सुंदर जलाशय आदि जाहिमे किछु अलग विशेषता हो । मिथिलाक अनेक गामक नाम भेटत जे पोखरिक नामपर या भौगलिक विषेशताक नामपर अछि जेना नागदह, चकदह, कमलदह। आब एकर अर्थपर आबी ।अर्थ हम अरबी-तुर्की केर हिसाबें लऽ रहल छी। दह मने बेसी वा पसरल भेल आ ओइसँ पहिने विशेषण लगा एकरा आर अर्थ विस्तारित कएल गेलै, जेना कमलदह ( ओहन पोखरि वा जगह जाहिमे बहुत रास कमलक फूल हो), जमुनदह (ओहन पोखरि जकर भीड़पर जामुनक गाछ हो वा ओहन जगह जाहि ठाम बेसी जामुनक गाछ हो) नागदह (ओहन पोखरि जकर भीड़पर नाग वा साँपक बिल हो वा ओहन जगह जाहि ठाम बेसी संख्यामे साँप-नाग हो, समान्यतः मिथककेँ रूपमे नागकेँ पानिमे रहब सेहो देखाएल जाइत छै) चकदह ( ओहन पोखरि जकर बनावट चक्राकार हो या ओहन जगह जे चक्रकार हो) आदि, आदि। हमर ऐ विवेचनासँ स्पष्ट अछि जे संस्कृत बला “ह्रद” शब्दसँ बनल दह केर अपेक्षा अरबी-तुर्कीसँ लेल गेल दह बहुअर्थी शब्द अछि।
संगे-संग ईहो स्पष्ट अछि जे शारादा सिन्हाजीक द्वारा जे सामा गीतक जे बोल अछि-- "हाथ दस पोखरि खुना दैह कि चम्पा फुल लगा दैह हे" से अपन अर्थमे ठीक अछि। जँ शब्द खिया कऽ "हाथ दस" बदला "हथदह" हेतै तैयो ओकर अर्थ नै बदलतै। ओकर अर्थ संख्येवाची रहतै।
मिथिला की हरेक क्षेत्रक जनानी अपन-अपन पंडित वर्गसँ प्रताड़ित रहल अछि। भाषा बदलि गेलै, खान-पान ओ भेष-भूषा धरि बदलि गेलै मुदा पंडित वर्ग द्वारा जनानीपर आक्रमण करबाक प्रवृति नै बदललै। आधुनिक युगमे पंडित सभ आर खुंखार भऽ कऽ आएल अछि। आजुक पंडित सभ कोट-पैंट-टाइ पहिरैए मुदा एतेक आधुनिक भेलाक बादो ओ आन की अपनो घरक जनानीकेँ बढ़ल नै देखऽ चाहैत अछि। बेसी पढ़ल-लिखल आ पाइ बला पंडित वर्गमे ई प्रवृति बेसी देखल जा रहल अछि। मध्यकालीन समयमे जखन पंडित सभ अपन बहीनि, बेटीकेँ बियाहक नामपर नाँगर, लुल्ह आ बौक-बेरोजगार सभहँक हाथें बेचबाक परंपरा चलेलक तकर विरोधमे जनानी सभ "परिछन" नामक बिध चलेलथि। एनाहिते पंडित वर्गक आक्रमण आ जनानी द्वारा तकर विरोध मिथिलाक वैवाहिक परंपरा आ आन क्षेत्रमे ताकल जा सकैए। जेना कहि आएल छी आजुक आधुनिक युगमे पंडित वर्ग नव व्यूह रचनाक संग जनानी सभकेँ प्रताड़ित करबाक लेल तैयार भेल छथि। आजुक पंडित आब संविधान ओ लोकतंत्रक कारणें जनानी सभकेँ वियाहक की आन देखार तरहें प्रताड़ित नै करैए मुदा तकर बदलामे ओ जनानी सभ केर बोल आ ओकर भावनाकेँ बदलि देबाक ओकरा नष्ट करबाक कुच्रक करैए।
मैथिली लोकगीतक ई सभसँ बड़का विशेषता छै जे ओहिमे तमाम बदलाब केर बाबजूदो पंडित सभहँक आक्रमण आ तकर मुँहतोड़ जबाब दूनूक सबूत एखन धरि बाँचल छै आ तँइ एखनो धरि पंडित वर्ग लोकगीत मारबाक षड्यंत्र करैत छथि।
तँ आउ, हमरा लोकनि ओहन सभ बहीनक पक्षमे ठाढ़ होइ, ओहन सभ जनानी केर पक्षमे ठाढ़ होइ जे पूरा जीवन अपन भावना अपन तर्क अपन शक्तिकेँ लोकगीतमे समाहित कऽ देलनि।
आउ, हमरा लोकनि ओहन सभ बहीनक पक्षमे ठाढ़ होइ, ओहन सभ जनानी केर पक्षमे ठाढ़ होइ जे पूरा जीबन मूँह सीबि कऽ रहृत छथि आ अपन सभ इच्छा,सौख-सेहंता आदिकेँ "बीतो भरि", "दसो हाथ", "दसो धूर", "एकौ घोंट"' "दुइयो कौर" सन छोट आ तुच्छ शब्द खंडमे कहि धरतीसँ विदा भऽ जाइत छथि पंडित सभहँक कुच्रककेँ खंडित कऽ कऽ।
परिशिष्ट----
शारदा सिन्हा जी द्वारा गाएलल ई मूल गीतक प्रारूप अछि ( वर्तनी गीत गेबाक हिसाबें अछि)
गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हो
भइया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ
चम्पा फूल लगाय दिअ हे
गाम के अधिकारी तोहें छोटका भैया हो
भइया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ
चम्पा फूल लगाय दिअ हे
भैया लोढ़ायल भौजो हार गाँथू हे
आहे सेहो हार पहीरि बड़की बहिनी
साम चकेबा खेलत हे
कथी बझाएब बन तितिर हे
आहे कहाँ के बझाएब राजा हंस
चकेबा खेलब हे
जाले बझाएब बन तितिर हे
आहे रौब से बझाएब राजा हंस
चकेबा खेलब हे
गाम के अधिकारी तोहें फलां भइया हे
भइया हाथ दस पोखरि बना दैह
चम्पा फूल लगा दैह हे
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.विन्देश्वर ठाकुर १. एकटा राजनैतिक विहनि कथा २.एकटा प्रेम विहनि कथा २. मुन्नाजी-प्रेम विहनि कथा- सेल्फी

विन्देश्वर ठाकुर

एकटा राजनैतिक विहनि कथा
- अहीसब ला' तोरा कहि दै छियौ तऽ कहै छें जे कहै छी ! ई लाई-मुरहीके मोटा बन्हनाइ छोडि क' कतऽगपास्टिंगमे भीरल छले से कह तऽ !
- सब किछो कहै छीयै । पहिने ई शान्त होउक न । आइ पबनीओके दिनमे कैला अते तम्साइ है?
- है हम कि शान्त रहूं घण्टा? देखै नै छिही जे दू पहर अहिठाँ बीत गेल आ अते दूरक रास्ता है। कखनी जाइब आ कखनी फेउर घुमि कऽ आइब? ओतऽ बेटीयो तऽ हमर पैरा तकैत होत कि नइ?
- अच्छा, ठीक है ! ई भात खाउक ताबे हम बान्हि दै छीयै मोटरी । गेल छलियै भदौरिया काकीके कनी लाई-मुरही दिअ ला' । से उहे बैठा लेलकै ......
- ओह ! भदौरिया काकी लग गेल छलै ई ? केना है ओकर अवस्था अखनी ?
- कि कहियै टुनमाके पापा ! बेटाक शोग अते जल्दी कहूं माइ सँ बिसरैतै ? आ ओहो अकालमे मरल लक्का जबान बेटाके ?? भरिदिन कनिते रहै छै .....
- ओह ! हे भगवान ........
रमौलबालीके ई गप्प सुनिते 'दामोदर' भैयाके आँखिमे ३ महिना अगाड़ीके मधेश आन्दोलन आ ओहि आन्दोलनमे पुलिसद्वारा मारल गेल भदौरिया काकीक २० बर्षक बेटा बिरजुके दृष्य फनफन क' घुमऽलगलै ........

एकटा प्रेम विहनि कथा
-आलोक ! आब त परीक्षाके बाद १ महिनाके छुट्टी होबऽ बला छै । कोना भेट हेतै आब अपना सबके?
- एह ! एक्के महिनाके बात तऽ छै सोनी ? १ सालके थोडे छै ? आ बीचमे फेसबूक-स्काइप जिन्दाबाद छै ने !!
- हँ रौ मुदा तैयो ... पता नै ब्रेकअप सँ हमरा बड डर लगैए ।
-धुर बताही तुहू ने ! अनेरे अपना दिमाकके दही बनबैत रहै छें । गे ई फिलीम थोडे छै जे आइ अफेयर्स आ काल्हिए ब्रेकअप भऽ जेतै ?
- नै रौ ! तैयो । देखै नै छिही, रियलो जिनगीमे चट्टे अफेयर्स आ पट्टे ब्रेकअप होइ छै से ??
- अच्छा आब बुझलियौ जे तू रणबीर आ कैट्रीना दिस इसारा क' रहल छें । तऽ सून ! ओ फिलीमके जिनगी आ बलिउडके दिनचर्या फराक नै छै । मुदा अपना सबहक जिनगी, व्यवहार, समाज-संस्कार सब ओइसँ अलग छै। तें तो चिन्ता जुनि कर ।
२.
मुन्नाजी
प्रेम विहनि कथा
सेल्फी
यौ, अपन मोनक एक टा बात कह' चाहै छी , कहू ?
कहू ने एत' कियो दोसर त' छै नै.
हमर मोन कहैए- जेना हमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेल ऐछ.
यै हमहू फरिछाइए दी, सत्ते अहाँ हमरा हृदय मे समा गेलौं ऐछ मुदा हम अहाँ सँ प्रेम नै करै छी.
बुद्धु कहीं के !
प्रेम कएल नै जाइ छै, ओ त' अपने भ' जाइ छै.
यै , जे अपने भ' जाइ छै से अनेरूआ कहाइ छै. ओकर कोनो ठौर- ठेकाना नै होइ छै.
तहन दुनू गोटे एहिना रह' दियौ.
" एक दोसरा क् करेज मे समाएल ."
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “गामके अधिकारी तोहे बड़का भैया हो.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 195, 2016-02-01. https://www.videha.co.in/research/2016/195/गामके-अधिकारी-तोहे-बड़का-भैया-हो.htm

मूल विदेह अंक / Original issue