मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग
लेखक
हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"
संपादक
श्रीगोपाल पंडित
हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद
विनीत उत्पल
समर्पण
ऋष्यश्रृङ्ग आश्रमक महान साधक आ श्रृङ्गेश्वर (सिंहेश्वर नाथ) मंदिरक एकनिष्ठ आराधक गोलोकवासी हमर नानाश्री बेनी प्रसाद, हमर मामाश्री सहदेव प्रसाद, लक्ष्मी प्रसाद आ रामचंद्र प्रसादक पावन स्मृतिमे तर्पण तरहे श्रद्धाश्रु निवेदित- तृप्यन्ताम! तृप्यन्ताम! तृप्यन्ताम!!!
-हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’
श्रृङ्गेश्वर (सिंहेश्वर नाथ) महादेवजीक पौराणिक कामना लिंगक अनुपम चित्र, जे मधेपुरा (बिहार) मे अछि.
परमपुरीवासीने परमगुरु परमात्मने नमः
सम्पादकीय
भारतक अइ पूब क्षेत्र, एखुनका कोशी अंचलमे भारतीय सांस्कृतिक उदय प्रागैतिहासिक कालमे भेल छल आ ऐतिहासिक प्रक्रियाक सामानांतर एकर विकास भेल. इतिहाससँ संबद्ध भेलाक बादो ई अंचल अप्पन इतिहास केँ आवश्यक नै बुझलक. तकर बादो ई अप्पन पुरना धरोहरकेँ महाकाव्य आ पुराणमे मणि मुक्ता सन सम्हारि क’ राखलक. एतौका संस्कृति नै तँ राजा, महाराजा आ उच्चवर्गक अछि, मुदा ई संस्कृति विश्वामित्र आ ऋष्यश्रृंग सन वैज्ञानिक तपस्वी ऋषि सबहक देन अछि जकरा उत्तर वैदिक कालसँ ल’ क’ आइ धरि अइ ठामक लोक आत्मसात केने अछि. तइसँ ई सामान्य लोकक संस्कृति अछि, विशुद्ध जनवादी संस्कृति. कतेक जातिक परस्पर संघर्ष, संपर्क आ संतुलनसँ एकटा दीपसँ असंख्य दीप श्रृंखला जोड़ैत आ ओकर अधिग्रहण आ अस्वीकार करैक परंपराकेँ विकसित करैक संस्कृति. कतेक रास अलग-अलग जातिक संस्कारक, उत्तर वैदिक कालसँ आइ धरि, अप्पन सर्वोच्चताकेँ सुरक्षित राखने अछि.
कोशी अंचलक सभसँ महान सांस्कृतिक पीठ श्रृंगेश्वर स्थान (सिंहेश्वर स्थान) क स्मरण करैत एतौका तपः पूत ऋष्यश्रृंग अप्पन समग्रतासँ उपस्थित भ’ जाइ छथिन. हुनकर सम्पूर्ण जीवन एकटा आदर्श अछि. बाल्यावस्थामे ब्रहमचर्य पूर्वक अध्ययन, गृहस्थ आश्रममे निःस्वार्थ समाजसेवा, यज्ञानुष्ठान, अनार्य संस्कृतिक आर्य संस्कृतिमे समन्वित करब आ ओकर राष्ट्रक मुख्य धारामे प्रबल टकरावक बादो जोड़ैमे सक्रिय हएब, ई अइ ऋषिराजक महान उपलब्धि छल.
ऋष्यश्रृंगक जीवनवृत बाल्मीकीय रामायण, महाभारत, भागवत आ अन्यान्य पुराण आ भवभूतिकृत ‘उत्तररामचरित’ मे कनीटा संकलित अछि. हुनकर सम्पूर्ण जीवनक वृत्तात्मक अध्ययन अखैन धरि नै भेटैत अछि. कोशी अंचलक वरिष्ठ साहित्यकार आ क्षेत्रीय इतिहासकार श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ बड निष्ठा आ परिश्रमसँ अइ अभावकेँ दूर करैत ऋष्यश्रृंगसँ संबंधित ऐ प्रामाणिक, वैज्ञानिक आ गवेषणात्मक पोथी लिख क’ आबएबला पीढी आ शोधार्थी लेल मार्ग प्रशस्त केने अछि.
जखन सम्पूर्ण भारत युद्धक आगिमे झुलसि रहल छल, देवासुर संग्रामक नाम पर लाशसँ धरती पाटल जा रहल छल आ ऋष्याश्रममे शताघ्नी तैयार होइत छल, तखन कोशी कातक ऋष्यश्रृंग आश्रम एक दीपसँ दोसर दीप केँ बारि उत्तर भारतसँ दक्खिन भारत मे शांति–मंत्र बिछाबैत छल. ई तहियोका इतिहासक एकटा महत्वपूर्ण इतिहास अछि. व्रात्यक क्षेत्रमे व्रात्यक स्वामी भगवान शिवक इष्ट लिंगकेँ पुनर्जागृत क’ ई महान तपस्वी वेदविरुद्ध आ वेदविहित मतकेँ समन्वित करैबला काज केलक जे देश, जाति आ समाजक समन्वयवादी ऋषिराजक सुकृत्यसँ प्रभावित भ’ भगवान राम, सागरक कात शिवलिंगक स्थापना केने छल जे ठाम तहियोका रक्ष-संस्कृतिक केंद्र छल आ भगवान शिव अइ संस्कृतिक संपोषक रावणक आराध्य देव छल.
अइमे मत-भिन्नता हेबाक बादो प्रमाण तथ्य ई अछि जे अइ महान ऋषिक जन्म कोशीक कात अखुनका सिंहेश्वर स्थानमे भेल छल. ई ठाम महर्षि विश्वामित्रक तपस्याक ठाम सेहो रहल छल. हुनकर नामपर अखनो कोशीक कातमे ‘कुसहा’ नामक कतेक रास गाम बसल अछि जे कौशिक ऋषि विश्वामित्रक स्मृति केँ अप्पन नाममे संजोगने अछि.
ऋष्यश्रृंगक आश्रम अइ देशमे कतेक ठाम अछि. हम लगभग सभटा आश्रमक परिभ्रमण केने छी. मुंगेरसँ 30 किलोमीटर नैऋत्य कोणमे आ भीम बांधसँ पंद्रह किलोमीटर वायव्य कोणमे दुर्गम पर्वत शिखरपर जनशून्य आ प्रकृति अप्पन चमत्कारी हाथसँ सजल एकटा दर्शनीय ऋष्यश्रृंग आश्रम अछि. एतौका गोपालक सँ हम पुछलौं जे ऋष्यश्रृंगक मूर्ति कतए अछि? ओ सहज भावसँ बाजल, ई पैघ पहाड़, गाछ-वृक्ष, पाथरक टुकड़ा यएह तँ ऋष्यश्रृंग छथिन. कतेक रास रस्तासँ बहि क’ आएल निर्झरिणीक जल एतेक शीतल छल जे हम नहाबैक लोभ छोड़ि नै सकलौं. गोपालक अप्पन गमछा देलक आ हम नहेलौं. हमरा बताएल गेल जे अइ निर्झरिणीक जल अखैन गर्मीमे जतेक शीतल अछि, ठार मे ओतबे गरम. मुंगेरसँ दक्खिन ऋष्यश्रृंगक तप्त कुंड अछि आ सीताकुंडसँ दस किलोमीटरपर हिनकर आश्रम अछि. ऋष्यश्रृंग आश्रमक आस-पास कतेक रास वैष्णव आ बौद्ध मूर्ति भग्न स्थितिमे भेटल अछि. ई निश्चते सनातन हिन्दू आ बौद्धक पारस्परिक संघर्षक परिणाम रहल हएत. अइ मनोरम ठामक ‘एशियाटिक रिसर्च’ क अंक सातक पृष्ठ 376 पर उल्लेख अछि. किंवदन्ती अछि जे राजा दशरथ एतए अप्पन चारू बेटाक मुड़न करेने छल.
वएह पर्वतमाला पश्चिम दक्खिन दिस बढ़ैत गेल अछि. अखुनका भागलपुरसँ 42 किलोमीटर दूर पश्चिम आ बरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिममे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि. ऊ मैरा पहाड़ीसँ बनल एकटा गोल सन घाटीमे अछि. ऐ आश्रम लग ऋषिकुंड नामक एकटा पोखैर अछि, जे ठार आ गरम जल स्रोतक एकटा समन्वित जलराशि अछि. अइ पोखैरक उत्तर दिस ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिता विभांडक साधनामे रत रहै छल. कजरा रेलवे स्टेशनक दक्खिन 12 किलोमीटर दूर ऋष्यश्रृंग पहाड़ क ऋषिराजक तपोवन हेबाक सम्मान अछि. ‘प्राचीन भारतक ऐतिहासिक भूगोल’ नामक पोथी मे डा. विमल चरण लाहा एकरा ल’ क’ पृष्ठ 429 मे लिखने अछि. एहन लगैत अछि जे अइ ऋष्यश्रृंग पर्वतमालाकेँ ऋष्यश्रृंगक ससुर राजा रोमपाद हुनका कन्या-दानमे देने छल. अइ पर्वत श्रृंग पर तपस्या क’ ऋष्यश्रृंग एकरा आ सम्पूर्ण क्षेत्र केँ महिमा मंडित क’ देलक.
अइ ऋषि केँ धारक कात आ वन्य पर्वत श्रृंगक कोरा बेसी प्रिय छल. ओ प्रकृति पूजक छल आ हुनकर आराध्य प्रकृति जगतक रूप-रूपान्तर अछि. जाज्वल्यमान रश्मिवंत सूर्य, रातिमे मधु वर्षा करैत शीतल चंद्रमा, यज्ञवेदी बा पाकशाला मे धधकैत आगि, मेघक तूणीरसँ तीर सन निकलैत विद्युत्माला, दिनक स्वच्छ आ रातिक नक्षत्रमंडित आकाश, धारमे बहएबाली वेगमयी जलधारा, प्रकृतिक अचिन्त्य शक्तिक प्रतीक अइ चेतन रूपमे ऋषिराजक स्पष्ट आ रचनात्मक कल्पना हुनका देवत्वक दर्शन देलक. वेदमंत्रमे कतेक देवता सभकेँ प्राकृतिक जगत अधिष्ठाता मानि, हुनकर आवाहन आ स्तवन कएल गेल अछि, जेना आकाशक देवता द्यौ, वरुण, सौर मंडलक देवता सूर्य, मित्र, सवृत, पृषण, आ विष्णु, प्रभातक देवता अश्विनी आ उषा, अन्तरिक्षक देवता इंद्र, अपानापात, रूद्र, गरुड़, वायु, पर्जन्य आ आपः, धरातलक देवता पृथ्वी, अग्नि आ सोम आ सिन्धु, विपाशा, शतद्रु आ सरस्वतीक धार.
ऋष्यश्रृंगक आरंभिक जीवन प्रकृतिमे एतेक रमल, रचल आ बसल छल जे महाकवि वाल्मीकि हुनकर ‘स वने नित्य सम्वृद्धो मुनिर्वनचरः सदा’ वन्य प्रकृति मे एकाकार भ’ जाइक कल्पना केने अछि. एहन ऋषि गूढ़ रहस्यक जानकार, तथ्यक अन्वेषक, शोधकर्ता आ गवेषणात्मक चिंतन आ विचारसँ पूर्ण समलंकृत होइत अछि आ निष्णात वैज्ञानिक सेहो. कौशिकीसँ ल’ क’ तुंगभद्राक तीर आ हिमालय सँ ल’ क’ नीलगिरिक उपत्यका आ वनखंड हुनका बेसी प्रिय छल. ओ कतेक रास यज्ञक आचार्य छल. हुनकर सम्पादित वृष्टि यज्ञ, पुत्रेष्टि यज्ञ, द्वादश वर्षीय यज्ञादिक अनुष्ठान तहियोका भरतखंडक इतिहासमे कतेक रास स्वर्णिम अध्याय जोड़लक. हुनका तँ जलप्रबंधनमे सेहो विशेषज्ञता छल. एखौनका चम्पानगरक चम्पानालाक निर्माण, महानदीक उद्भव आ ओकर मार्गक निर्धारणकेँ ओकरा खेती जोगर बनाएब, हुनकर वैज्ञानिक सूझबूझक जवलंत प्रमाण अछि.
कोशी अंचलक एहन महान सपूत ऋष्यश्रृंगपर पूर्ण पोथी लिखि क’ ई विद्वान लेखक बड़ पैघ काज केने अछि. अइ विषयपर आगू जे कोनो गवेषणात्मक काज हएत, ओकर आधार यएह पोथी हएत. हमर एहन विशवास अछि.
एतदर्थ ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि सिंहेश्वर स्थानमे ऋष्यश्रृंग शोध संस्थानक स्थापना अइ विद्यान लेखकक संजोकत्वमे कएल गेल अछि. सिंहेश्वर मंदिर न्यासक प्राथमिकता मे ई उल्लिखित अछि-
क्रमांक 3 : न्यासक दिससँ धार्मिक पोथी, वार्षिक पंचांग, धार्मिक फोटो, कलेंडर, पत्र-पत्रिका आदि लागत मूल्य पर विक्रय आ प्रकाशन.
क्रमांक 4 : सार्वजनिक वाचनालयक निर्माण.
क्रमांक 6 : सिंहेश्वर मंदिरक ऐतिहासिक, पुरातात्विक, धार्मिक वृतांत आ लोक कथा सबहक संकलन अ शोध.
क्रमांक 8 : युग आ संस्कृत शिक्षणक व्यस्था.
जतए धरि क्रमांक 3 आ 6 क प्रश्न अछि, अइ ग्रंथक विद्वान लेखक श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ सिंहेश्वर स्थानपर पहिलुक शोधात्मक पोथी ‘शैव अवधारणा और सिंहेश्वर स्थान’ लिखि क’, ऋष्यश्रृंगक पुनर्जागृत सिंहेश्वर स्थानक पावन इष्ट लिंगक पहिलुक सारस्वत अर्चना केने अछि. अइ पोथीक पाँच सौ प्रति मंदिर न्यास दिससँ कीन क’ न्यासक विद्यानुरागी आ उदार सचिव श्री राम नारायण मंडल, अनुमंडल पदाधिकारी, मधेपुरा लेखकक उत्साह बढ़ेलक अछि. तइसँ ऋष्यश्रृंग शोध संस्थान दिससँ अइ पुनीत काज लेल हम न्यासक अध्यक्ष श्री ज्योतींद्र नाथ पाण्डेय, अपर समाहर्ता, मधेपुरा आ श्री राम नारायण मंडल, अनुमंडल पदाधिकारी, मधेपुरा केँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करै छी.
न्यासक प्राथमिकताक कंडिका 3 आ 6 क मोताबिक, न्यास द्वारा भूमि आ भवन केँ आवंटित करै लेल लेखक द्वारा अनुरोध कएल गेल अछि, जइसँ ऋष्यश्रृंग शोध संस्थान सिंहेश्वर स्थानमे कार्यरत भ’ सकए. जाधरि भूमि आ भवनक आवंटन नै भ’ जाएत, ताधरि एकर मुख्यालय कला कुटीर, अशेष मार्ग, लक्ष्मीपुर मुहल्ला, मधेपुरामे रहत. हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे न्यासक माननीय विद्वान पदाधिकारीगण जल्दिये अइ शोध-संस्थान लेल भूमि, भवनक व्यवस्था करत.
हमर ममतामयी मामीजी स्वर्गीय सावित्री देवी सिखवाल आ अनंत श्री विभूषित, पूर्व अध्यक्ष अखिल भारतीय सिखवाल महासभा, हमर पूज्य मामा श्री स्वर्गीय कन्हैया लालजी पंडित अप्पन अध्यक्ष पदसँ मुक्त होइ क’ बाद राजस्थान गेस्ट हॉउस, कलकत्ता मे अप्पन कार्यकालमे कएल गेल काजमे सँ एक केँ पूरा नै होइसँ दुखी छल. ऋष्यश्रृंगक पावन चित्रक संग-संग हुनका सँ संबंधित एकटा प्रामाणिक आ गवेषणात्मक पोथीक रचना नै भेल. हुनकर इच्छा अइ पोथी रचनाक संग पूरा भ’ रहल अछि. आह, आइ जौं ओ दुनू जीवित रहतिऐ तँ कतेक प्रसन्न हेतिऐ.
ऋष्यश्रृंगक भव्य संगमरमरक मूर्ति सिंहेश्वर मंदिरमे हमर माताश्री पार्वती देवीक आदेशानुसार हमर पूज्य पिताश्री (स्वर्गीय) मोहनलाल जी पाण्डेयक स्मृतिमे हमरा द्वारे स्थापित कएल गेल अछि. दिनांक 20.06.2002 क गंगा दशहराक दिन वैदिक मंत्रोच्चारणक संग एकर प्राण प्रतिष्ठा कएल गेल. अइ तरहे ऋष्यश्रृंग महाराज सेहो एतए स्थापित भ’ चुकल छथिन. हुनकर संबंध मे ई गवेषणात्मक पोथी प्रकाशित भ’ चुकल अछि. आब दोसर शोध कार्य, अध्ययन आदि चलैत रहए, ऐ लेल भूमि, भवन आ वित्तक आवश्यकता अछि, जेकरा पूरा करै लेल मंदिर न्यास सँ अनुरोध कएल जा चुकल अछि.
ऋष्यश्रृंगः महाप्राज्ञः शान्तः शान्ताधिनायकः
प्रज्ञानिमानी मूर्वाणि सफलानि कुरिस्वंगे.
ऋष्यश्रृंगाय मुनये, विभाण्डक सुते वै
नमः शान्ताधिपतयेसद्यः सद वृष्टि हेतये.
पर्जन्य सूक्तक उपरका चारि लाइनक संग हम अप्पन पूर्वज ऋष्यश्रृंग केँ सादर प्रणाम करैत छी. विद्यान लेखक केँ साधुवाद दै छी आ
सिया राम मय सब जग जानी
करहु प्रणाम जोरि युग पानी.
श्री गोपाल पंडित
फाइव-236,
सेक्टर-12,
नोएडा-201301
लेखकीय
ऋष्यश्रृंगक विराट व्यक्तित्वकेँ आंकब हमरा सन मंत्रहीन, क्रियाहीन आ तुच्छ प्राणी लेल कतेक संभव अछि, एकरा हम स्वयं बुझैत छी. मुदा संतोषक गप ई अछि जे अप्पन युगक अइ महान वेदपुरुषक जन्म जइ कौशिकीक तटपर भेल छल, ओइ तटक वासी हमहूँ छी. हमरो जनम ओइ कौशिकीक तटपर भेल अछि. हम सभ एक्के ठामक वासी छी.
वन्ध्यानां पुत्रकर्ता त्वं सद्यो वृष्टि प्रदायिने.
श्री विभांडकक पुत्राय कौशिकी तीर वासिने.
अइ तरहेँ ऋष्यश्रृंगक संबंधमे किछु कहैक दायित्व हमरो अछि. हम अइ दायित्वक निर्वाह कतए धरि केलौं, ई विद्वान पाठक अइ ग्रंथक अनुशीलन क’ हमरा सूचित करैक कृपा करब.
हमर ऋषिराज कोशी क्षेत्रक सांस्कृतिक संवाहक छल, मुदा सहिष्णु. उत्तर वैदिक कालमे विरोधी सभकेँ पराजित करै लेल ऋषिगण शास्त्र, शस्त्र आ शापक सहारा लैत छल. प्रायः सभटा ऋषि एहन केने अछि. मुदा ऋष्यश्रृंग एकर अपवाद छल. ओ कहियो शस्त्र नै उठैलक आ नै केकरो शाप देलक. ओ शास्त्रक अध्ययन, अध्यापन, अनुशीलन, कतेक रास यज्ञक संपादन, लोक कल्याण आ लोक मंगलमे अप्पन सम्पूर्ण जीवन लगा देलक.
ई अछि कोशी अंचलक विभूति ऋष्यश्रृंगक गौरवोज्ज्वल वृतांत आ हुनकर द्वारा पुनर्जाग्रत श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) क संक्षिप्त परिचय.
ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारबिसगंज, अररिया निवासी, सम्प्रति नोएडामे व्यवसायरत श्री गोपाल पंडितक ऋणी छी, जे तगादा पर तगादा भेज हमरासँ पोथीक रचना करेलक आ एकर संपादन केलक. हुनकर ममतामयी माता पार्वती देवीक सेहो आशीर्वाद हमरा भेटैत रहल.
मधेपुराक वरिष्ठ अधिवक्ता आ साहित्यकार श्री शिवनेश्वरी प्रसादसँ अनवरत प्रेरणा भेटैत रहल आ सदिखन हुनकर देल गेल परामर्श अमूल्य सिद्ध भेल. कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मलेन, मधेपुराक सचिव आ कवि लेखक डा. भूपेंद्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ पोथीक पाण्डुलिपि अप्पन देख-रेखमे तैयार करेलक. ओ हम्मर भारकेँ हल्लुक क’ देलक.
मित्रवर श्री भोला प्रसाद सिन्हा आ श्रीमती विमला सिन्हाक विदुषी आत्मजा डा. लीना सिन्हा, हमर विद्वान आत्मज डा. अरविन्द कुमार श्रीवास्तव आ हमर धर्मपुत्र श्री संजीव कुमार सिन्हा, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय आ ऋष्यश्रृंगक वंशज श्री एस.एन.त्रिपाठी. डी.सी.पी. राजस्थान पुलिस, जयपुर सेहो कतेक रास सामग्री द’ क’ अइ पोथीक विषय वस्तु विश्लेषण क’ बेसी गन्वेषणात्मक बना देलक. हम हुनका प्रति प्रेम आ स्नेह व्यक्त करै छी. ई सभ लोक अप्पन सारस्वत साधना सँ अइ कोशी अंचल केँ पल्लवित, पुष्पित आ हरित करैत रहए, यएह कामना अछि.
ऋष्यश्रृंगक ससुर चम्पानगर, नाथनगर, भागलपुरक निवासी हम्मर सम्मानित समधि श्री चाँद बिहारी लाल आ हुनकर जमाता हमर जेष्ठ आत्मज आनंद कुमार श्रीवास्तव सँ बड रास महत्वपूर्ण तथ्यक जानकारी भेटल. हुनका प्रति हमर असीम स्नेह अछि.
अइ पोथीमे जे दुर्लभ चित्र संलग्न कएल गेल अछि, ओ श्रीमती राजरानी पंडित आ हुनकर कनिष्ठ आत्मज श्री कामेश्वर सिखवाल आ ओइ फोटो सबहक फिनिशिंग आ कवर पृष्ठ हुनकर दोसर आत्मज श्री संजय सिखवाल, नोएडा तैयार केने अछि. एकर संगे अहि पोथीक मुद्रणक सबटा काज श्रीमती संगीता राजेश शर्मा (सिखवाल), शाहदरा, दिल्ली अप्पन देखरेखमे सम्पन्न करेने छथिन. हुनका प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करै छी.
सर्वोपरि हम परमपुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री केशवानन्द पुरीजी महाराज महामंडलेश्वर (निरंजनी) क आभारी छी जे अइ पोथीकेँ मुद्रण पूर्व पढ़ि क’ एकर तथ्य प्रमाणिकतापर अप्पन मोहर लगाक’ हमर अप्पन स्नेहाशीष प्रदान केलक.
हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’
कला कुटीर,
अशेष मार्ग, मधेपुरा,
बिहार-852111
विषय-सूची
क्रम सं. विषय वस्तु पृष्ठ संख्या
सम्पादकीय
लेखकीय
प्रथम परिच्छेद:
अंग महिमा, प्राचीन निवासी, कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम
दोसर परिच्छेद
ऋष्यश्रृंगक जन्म, वृतांत, ब्रहमचर्य आ अध्ययन, अंग नरेश रोमपाद, वृतांत, ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान, मालिनीमे वृष्टि आ पुत्रेष्ठी यज्ञ.
तेसर परिच्छेद
अयोध्या मे अश्वमेघ यज्ञ आ पुत्रेष्ठी यज्ञ
चारिम परिच्छेद
ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना. वेदक मंत्रदृष्टा ऋष्यश्रृंग, यजुर्वेदक विभाजन, माध्यन्दिन शाखा, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, सभ्यताक समन्वय, दक्षिणात्यमे तपस्या, श्रृंगवेरपुर वृतांत, पुण्याश्रममे द्वादश यज्ञ, महानदीक प्रगट होयब, वंश-विस्तार
पांचम परिच्छेद
ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम, सिद्धाश्रम, राजा जनकक आश्रम, भारद्वाज आश्रम, अगस्त्याश्रम, महर्षि अत्रिकक आश्रम, बाल्मीकि, वशिष्ठ, शौनक, सुतीक्ष्ण आदिक आश्रम.
छठम परिच्छेद
ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर स्थान) पौराणिक आ परवर्ती साक्ष्य, किरातक भूमि, कुषाण वंशीय राजभर, निषादक धरती, मूर्ति स्थापना, सिंहेश्वर मेला.
सातम परिच्छेद
उपसंहार
परिशिष्ट
पुत्रेष्ठी यज्ञ
ऋष्यश्रृंगक सासुर मालिनी (इतिहासक आइनामे चम्पानगर)
शंकराचार्य आ सिंहेश्वर (जगत प्रसिद्द शंकर मंडन मिश्र शास्त्रार्थ सिंहेश्वरमे)
सहायक आ सन्दर्भ ग्रंथक सूची
ऋष्यश्रृंग आ हुनकर आश्रमक दुर्लभ रंगीन आ श्वेत श्याम चित्र
पहिलुक परिच्छेद
अंग महिमा
प्राचीन अंगक निर्माणकेँ लऽ कऽ कतेक रास कथा प्रचलित अछि। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक, जतए शोभाशाली कामदेव अप्पन अंग छोड़ने छल, ओ अंग देशक नामसँ विख्यात भेल।
अयोध्यासँ सिद्धाश्रम जाए कऽ बाटमे राम-लक्ष्मणक संग विश्वामित्र एक राति गंगा आ सरयूक कातमे बितौने छल। ओतए शुद्ध अंत:करणबला महर्षि सबहक पवित्र आश्रमक परिचय दैत विश्वामित्र बाजल छल जे कहियो एतए भगवान शिव चित्तकेँ एकाग्र कऽ तपस्या करैत छल। ओइ काल कामदेव मूर्तिमान छल। ओ अप्पन देह धारण कऽ विचरण करैत छल। एक दिन भगवान शिव समाधिसँ उठि कऽ मरुद्गणक संग कत्तौ जा रहल छल। ओइ काल ओ दुर्बुद्धि हुनकापर आक्रमण कऽ देलक। भगवान शिव हुंकार कऽ हुनका रोकलक आ अवहेलनापूर्वक ओकरा दिस ताकलक।
फेर तँ कामदेवक सभटा अंग हुनकर देहसँ जीर्ण-शीर्ण हुअए लागल। कठिन तापसँ दग्ध भेल कामदेव ओतएसँ भागि गेल। जइ ठाम पर कन्दर्पक देह पूरा तरहे नष्ट भेल, वएह प्रदेश अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। 1
अंग देशक नामकरण ओतुक्का एकटा राजा अंगक नामपर भेल छल। आनव राज्य, जकर धूरी अंग छल, पाँच टा राज्यमे विभक्त छल, जकर नामकरण राजा बलिक पाँचटा पुत्रक नामपर भेल छल। आनवक अधिकारमे संपूर्ण पूर्वी बिहार, बंगाल आ उड़ीसा छल, जइमे अंग, बंग, पुण्ड्र, सुहा आ कलिंङ्क राज्य छल। अइ मे अंग एकटा बड़ शक्तिशाली जनपद छल।
वाल्मीकि रामायणक मुताबिक सुग्रीव सीताकेँ ताकै लेल अप्पन वानर सैनिककेँ पूरबक देशमे भेजने छल,जइमे अंग सेहो एकटा छल।2 तइ कालमे अंगक विस्तार असीम छल। किएकि बलि पुत्र अंगक बाकी चारि भायक राज्यक सत्ताक केंद्र अंग राज्य छल।
ई तथ्य सेहो विचारणीय अछि जे महाभारतक (शांतिपर्व, 296) मुताबिक, आदिकालमे चारि टा गोत्र छल, भृगु, अंगिरा, वशिष्ट आ कश्यप। ऋग्वेदक दोसर, तेसर, चारिम, छअम आ आठम मंडलमे जइ ऋषि सभकेँ मंत्र प्राप्त होइत अछि ओ अछि, गृत्समद, गौतम, भारद्वाज आ कण्व। आचार्य अश्वलायन अष्टम मंडलक वंशकेँ गोत्र द्योतक मानैत अछि, संग-संग अइ मंडलक ऋषिक प्रगाथा सेहो कहल जाइत अछि। हुनका अनुसार, अइ मंडलक पहिलुक सूक्तक ऋषि प्रगाथ छल जे स्वयं कण्व वंशी छल। अइ मंडलक एगारह वालखिल्य मिल कऽ कुल १०३ सूक्त कण्वक अछि। गौतम आ भारद्वाज अंगिरा वंशक मानल जाइत अछि आ कण्व सेहो अंगिरसेक अछि। अइ तरहेँ अइ पाँच मंडलमे अंगिरसक प्रधानता स्वयं सिद्ध अछि।
अइ मंडलक ऋषि कुल अंगिरस, अंग द्वीपक ऋषि छल। स्वयं इंद्रक ऐरावत हाथी पदमर्दन कऽ देने छल, अइसँ तमसाएल दुर्वासा इंद्रकेँ शाप दऽ कऽ हुनका सत्ताच्युत कऽ देलखिन। इंद्र राजा बलिसँ सहायता मांगलक। राजा बलि इंद्रक संकेतपर देवलोकेपर अधिकार कऽ लेलक। बलि अंगद्वीपक राजा छल।4 ओ अप्पन पाँच शक्तिशाली पुत्रमे अंगक जनपद बाँटि हुनका सभकेँ ओइ ठामक राजा बना देलक। एकर बादो अंग असुर-सुर संस्कृतिक मुख्य केंद्र छल। ऋग्वेदसँ स्पष्ट ज्ञात होइत अछि जे अंगिरस आ हुनकरे वंशज यज्ञ कर्मक जनक छल। ओ अइ रहस्यक पहिलुक ज्ञाता छल जे यज्ञाग्नि काष्ठमे निहित छल। अइ तरहेँ अंगिरिस सभ अग्निक प्रयोगसँ सभसँ पहिलुक यज्ञोत्सवक नींव देने छल।
प्राचीन भारतमे जे सोलह महाजनपदक चर्चा अछि, ओइमे अंग प्रमुख छल। शेष महाजनपद छल,मगध, काशी, कौशल, बज्जि, मल्ल, वत्स, चेदि, पांचाल, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति,गान्धार आ कम्बोज।
अंग आ मगधमे निरंतर संघर्ष चलैत रहैत छल। बुद्ध कालमे मगधक राजा बिम्बसार अंगकेँ जीत कऽ मगधमे मिला लेने छल।
अंग वा अइ पूर्वी प्रदेशक लोग आ राजतंत्र ब्रााह्मण ग्रंथमे व्रात्य नामसँ जानल जाइत अछि। व्रात्यक शाब्दिक अर्थ अछि व्रतकऽ धारण करैबला मुदा एतए एकर प्रयोग बड़ गर्हित अर्थमे भेल अछि। एकर तात्पर्य अछि अनार्य, वैदिक कर्मकांड विरोधी आ वर्णसंकर। सावित्री आ उपनयनसँ भ्रष्ट द्विजातिकेँ मनुस्मृतिमे ब्राात्य कहल गेल अछि।
द्विजात्य: सवर्णास्त जनयन्तवुतास्तयान।
तान सावित्री परिभ्रष्टान व्रात्यानिति विनिर्दिशेत।।
मनुस्मृति 10/20
महाभारतमे व्रात्यकेँ पातकी कहल गेल अछि। एकरा मुताबिक, व्रात्यकेँ आग लगाबैबला, विष दैबला,मदिरा बेचैबला, कुसीद भक्षण करैबला, मित्र द्रोही, भ्रूण हत्यारा, व्यभिचारी आ ब्रह्मघाती कहल गेल अछि।5
अइ तरहेँ व्रात्यकेँ ब्रााह्मण ग्रंथमे पतित कहल गेल अछि।
वेदमे सेहो अइ ठामकेँ बड़ हेय दृष्टिसँ देखल गेल अछि। ऋग्वेदक प्रमगन्द शब्द अंग भंग आ मागध लेल प्रयुक्त भेल अछि। मागधकेँ वेदमे कीकट कहल गेल अछि। एहन लागैत छै जे संपूर्ण पूर्वी प्रदेश कोनो सांस्कृतिक अभिशापक आगिमे झुलसि रहल अछि आ वैदिक राजनीतिक शिकार बनि गेल अछि। अइ ठामक लोकक लेल चुनल-चुनल खराब शब्दक प्रयोग करैमे नै तँ वेद मंत्रकार पाछाँ रहल आ नहिये महामुनि व्यासे।
ऋग्वेदमे एकटा ऋषि इंद्रसँ प्रार्थना करैत अछि, मगधक गाय कोन काजक अछि जकर दूध यज्ञमे अहाँक काज नै आबैत अछि। (यानि कीकटक गायक दूध सेहो अपवित्र अछि आ ओकरासँ यज्ञ कर्म करैक लेल वर्जना अछि) सोमरसक संग मिल कए ओ दूध यज्ञपात्रकेँ गर्म नै करैत छै। तइसँ हे इंद्र! ओइ नैचाशाख प्रमगन्दक (निचला शाखाक अंग बंग आ मागध) ओ धन हमरा दिअ।6
अथर्ववेद तँ एक डेग अओर आगू अछि। अथर्ववेदक एकटा ऋषि कहैत अछि, जेना मनुख आ उपभोगक अन्य सामान एक ठामसँ दोसर ठाम भेजल जाइत अछि, ओइ तरहेँ ज्वरकेँ गन्धार भूजवान,अंग, मगध प्रदेशमे भेजि देल जाइत अछि।7
आखिर वेद ब्रााह्मण ग्रंथकेँ अइ प्रदेशपर एतेक कोप किए अछि? आउ, विचार करी। ब्रााह्मण द्वारा विनिर्मित जइ यज्ञ-योगादि क्रियाक उदय सप्त सिंधुक घाटीमे भेल, बड़ जोर मारलाक बादो ई विधि-क्रिया भारतक अइ पूब क्षेत्रमे अप्पन जड़ नै जमा सकल आ ने ब्रााह्मणवाद आ ब्राह्मण विचारधारा अइ भागमे अप्पन सत्ता काएम कऽ सकल। किएकि व्रात्य आर्य भेलाक बादो वैदिक कर्मकाण्ड, पशु हिंसाबला यज्ञ आ बड़ खर्चबला विधि कर्मक विरोधी छल।
ब्रााह्मण अपनो अइ धरतीपर बसै लेल नै चाहैत छल। एतुक्का निवासी स्वतंत्र विचारक, ज्ञानी आ तपस्वी छल। ओ अपन आचरण, व्यवसाय आ संस्कृतिपर ब्रााह्मणक छाया धरि सहन करै लेल तैयार नै छल। जे कोनो ब्रााह्मण तपस्वी तपस्याक लेल अइ क्षेत्रमे छल, सेहो कमलक तरहेँ जलसँ ऊपर छल। हुनका एतुक्का व्रात्यसँ कोनो संपर्क नै छल। स्वयं ऋष्यश्रृंङ्ग लऽ कऽ रामायणकार वाल्मीकि कहैत अछि- सदिखन पिताक संग रहैसँ विप्रवर ऋष्यश्रृंङ कोनो दोसराकेँ नै जानैत छल।"8 अइसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण ऋषि जन-सामान्यक संपर्कसँ अपनाकेँ अलग राखैत अछि।
कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम
विश्वामित्र सेहो तपस्याक लेल अइ पूर्वी इलाकाकेँ चुनने छल। कोशीक कातपर ओ बड़ कठिन तपस्या केने छल जइसँ सृष्टिक मूलचक्रे हिल गेल छल। एहन भूभागमे कतेक तत्वज्ञानी क्षत्रिय-ब्रााह्मण केर चलाएल गेल विधि क्रियाकेँ त्यागब प्रतिष्ठित करैपर जोर देलक। अइ भागक पिछड़ल आ गरीब जनताक लेल ई नब आ क्रांतिकारी मार्ग-पद्धति अनुकूल सिद्ध भेल।9
चारू दिस नदीसँ आच्छादित अंगक ई उत्तरबरिया हिस्सा, घना जंगलसँ परिपूर्ण छल। एकर रमणीयता सेहो अद्वितीय छल। तइसँ महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक नामक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ भूभागकेँ नीक बुझने छल।
ब्रााह्मण ग्रंथक मुताबिक, राजा बलि अंगक शासक छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर स्त्री सुदेक्षणा दीर्घतमा नामक ऋषिसँ पाँचटा पुत्रकेँ जन्म देलक। ई ऋषि आन्हर छल। 10 महाभारतक मुताबिक, ई ऋषि सभ लोकक सोझाँमे स्त्री संभोग करैत छल। 11 हुनकर पिता छल उत्तथ,जिनकर स्त्रीकेँ वरुण भगा कऽ लऽ गेल आ हुनका संग संभोग करलक। बादमे वरुणकेँ दंडित कऽ उत्तथ अप्पन स्त्रीकेँ वापस आनि सुखपूर्वक रहए लागल।12
गर्हित पौराणिक मिथकीय कथा जाल आ ओकर टीकाकार, भाष्यकार, रचनाकारसँ बचैत ई कहएमे कोनो संकोच नै अछि जे पूरा अंगक वासी आ राजतंत्र आर्य आ अनार्य संस्कृतिक संगमपर फल-फूलि रहल छल। विभिन्न जाति, विचार आ संस्कृतिसँ समन्वित ई इलाका प्राचीन षोडश महाजनपदमे प्रमुख छल।13
वैदिक ग्रंथमे जलाशय, जल आ धारक प्रशस्ति अछि। ऋग्वेदमे तँ कतेको ऋचामे ई अछि। जलक पवित्रता प्राकवैदिक अछि यानी आर्यकेँ आबएसँ पहिनेसँ अछि। एकर जीवात्मा आ उर्वरतासँ गहींर संबंध अछि। तइसँ महर्षि कश्यपक तेजस्वी पुत्र विभाण्डक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ कोशिकाच्छादित भूभागकेँ सभसँ उपयुक्त बुझलक।
तीर्थ तपस्याक लेल नै होइत अछि। तीर्थक प्रथा तँ अनार्य स्रोतसँ ग्रहीत भेल अछि। हिन्दूक सभटा तीर्थ आर्यक मूल स्थानसँ बाहरक अछि। आर्यक आगमनसँ पहिने एतुक्का धर्ममे तीर्थ छल। आर्यक सम्मिलन स्थल यज्ञ छल आ अनार्यक तीर्थ। ई तीर्थ शब्द सेहो वेदवाह्य अछि किएकि वेद विरोधी मतकेँ तैर्थिक मत कहल जाइत अछि। तइसँ तपस्याक लेल तीर्थ नै, अरण्य आ पवित्र धारक कात सभसँ उपयुक्त अछि। तइसँ व्रात्यक भूमि भेलाक बादो महर्षि विभाण्डक उत्तरबरिया अंगक सघन अरण्य क्षेत्रमे कौशिकीक धारक कातमे अप्पन आश्रम बनेने छल। कोशी एकटा पौराणिक धार अछि। एकर कातमे साक्षात भगवान शंकर बसै छै। इंद्र, विष्णु आ ब्रह्मा केँ भगवान शिवसँ भेंट करहि कऽ पूर्व, निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम ई कोशीक मनोरम तीर अछि।14 अप्पन बहिन कौशिकीक संबंधमे स्वयं विश्वामित्र कहैत अछि,
दिव्य पुण्योदकारम्या हिमवन्तमुपाश्रिता।
लोकस्य हित कार्यार्थो प्रवृत्ता भगिनी मम।।15
अप्पन बहिनक प्रति स्नेहक कारण अइ काजमे विश्वामित्र निअमसँ बड़ सुखसँ निवास करैत छल। ओ यज्ञसँ जुड़ल अप्पन निअमक सिद्धिक लेल अप्पन बहिन कौशिकीक सानिध्यकेँ छोड़ि सिद्धाश्रम आएल छल। अइ कौशिकीक कात विश्वामित्र सहस्र बरख धरि घनघोर आ अतिशय कठोर तपस्या केने छल जइसँ सभटा सृष्टि चक्र हिल गेल छल।
कौशिकी तीर मसाध तपस्तेपे सुदारुणम
तस्य वर्ष सहस्त्रणि घोरं तप उपासते।
रामायण 1-34-25
वाल्मीकि रामायणमे कतेको बेर कौशिकी सरितां वरा (सभ धारमे श्रेष्ठ कौशिकी) बालकाण्ड श्लोक 11,कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलो द्योतकारी इव (धारमे श्रेष्ठ कौशिकी सेहो अप्पन कुलक कीर्ति केँ प्रकाशित करैवाली छथिन। श्लोक 21) जेहन उक्ति आएल अछि, जइसँ पुण्य सलिला कोशीक महिमा रेखांकित होइत अछि। तइसँ कश्यप पुत्र महर्षि विभाण्डकक तपस्या लेल कोशीक कात सभसँ उपयुक्त छल,जतए विश्वामित्र कठोर तपस्या कऽ कतेक रास सिद्धि प्राप्त केने छल।
धारक कात सुदूर धरि फैलल पैघ पाथरक अद्भुत श्रृंखला सेहो विद्यमान छल, जे कोशीक तीव्र धारकेँ नियंत्रित करैत छल। लगभग साढ़े सात हजार बरखक भौगोलिक परिवर्तनक परिणामस्वरूप ओ पाथरक (चट्टान) श्रृंखला जमीनक भीतर गहींरमे चलि गेल आ ओकर ऊपर माटिक मोटका परत जमैत गेल।16
वेगवती नदी, विशाल चट्टान, रमणीय प्रकृति, समिधा बाहुल्य, आैषधियुक्त वनस्पतिसँ आच्छादित अरण्य आ कुलांच भरैत मृगादि वन्य पशु, एहन शांत स्थानमे छल विभाण्डक ऋषिक आश्रम, कोशीक धारक कज्जल वनमे।
कोशी आ ओकर छाड़न धारक कातपर अप्पन सघनताक लेल प्रसिद्ध कज्जल वन स्थित पुण्याश्रम पूरे आर्यावर्तमे प्रसिद्ध छल। ई क्षेत्र असुरक प्रभावसँ सेहो मुक्त छल। तइसँ एतए कऽ ऋषि आश्रम निरापद छल। एतए निर्विध्न वेद पाठ चलैत छल आ आश्रमवासीक समए समिधा संचय, अग्निहोत्र आ कृषि काजमे व्यतीत होइत छल। ई आश्रम ऋषि आ कृषि परंपराक अद्भुत संगम स्थल छल। भूमि बड़ उर्वरा छल। महर्षि विश्वामित्र अप्पन कालक महान कृषि वैज्ञानिक सेहो छल। हुनकर तपस्या आ प्रयोग स्थल कोशीक मनोहर तट सेहो छल। पूरा इलाका वन्य पशुक अभ्यारण्य छल। विश्वामित्र केर अप्पन कठोर तपस्यासँ ऊर्जावान बनाएल इलाका मुनि विभाण्डक लेल सर्वथा उपयुक्त छल। अप्पन वंश परंपराक अनुरूप ओ सेहो विपुल प्रतिभाक पुंज छल। महर्षि व्यास हुनकर वंश परिचय एना देने अछि:-
मरीचि: मनसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:।
मश्यपात्कारश्यप: जात: तस्यसुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ तस्य पुत्रोस्ति।।17
ब्रह्माक मानस पुत्र मरीचक पौत्र विभाण्डक छल। उच्च वंशोद्भव ई ऋषि वेद विहित संस्कारसँ संपन्न छल। कोशीक कातक ई कज्जल वन हुनकर साधना तपस्याक लेल पूर्ण उपयुक्त आ निरापद छल।
अति प्राचीन कालमे (महाभारत, पुराण, वराहमिहिर आ भास्काराचार्यक मतानुसार) भारत नौ खंडमे विभक्त छल। ई खण्ड छल, इंद्र, कसेरुमत, ताम्रवर्ण, गभस्तिमत, कुमारिक, नाग, सौम्य, वरुण आ गान्धर्व। पौराणित साक्ष्य आ एकर पहचानक जे संकेत भेटल अछि, ओकर मुताबिक पूर्वी भारतक ई क्षेत्र इंद्रखण्ड छल। अइ क्षेत्रपर इंद्रक विशेष कृपा छल। तइसँ ई सदिखन हरिअर फल-फूल आ धान्यसँ संपन्न क्षेत्र छल। धार सदानीरा छल।
ऋग्वेदमे अंगक उल्लेख नै अछि। तइसँ एहन लागैत अछि जे उत्तर वैदिक कालमे अंग जनपदक उदय भेल अछि। ऋग्वेदमे कीकट शब्दक प्रयोग भेल अछि जेकरा मगध आ अंग क्षेत्रक लोक लेल प्रयोगमे आनल गेल हएत। मुदा कतेक रास आचार्य एकरा सप्त सिन्धुक पर्वतीय भाग लेल सेहो प्रयुक्त करैत अछि।18 जे भी भेल हुअए, रामायण युगक आर्य सभ्यता केर अइ क्षेत्रमे उदय भऽ चुकल छल। मुदा राक्षसी सभ्यता अओर आर्येतर वानरी सभ्यता एतए अप्पन जमीन नै बना सकल छल। अइ क्षेत्रमे स्थापित ऋषि आश्रम अध्ययन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रियाक संपादन लेल उपयुक्त छल।
दोसर परिच्छेद
ऋष्यश्रृङ्क जन्मक वृतान्त
महाकाव्य, पुराण आ दोसर पुरना ग्रंथक निर्मल जलमे प्रक्षेपक शैवाल जाल कम नै अछि। प्रक्षेपमे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर क्षीर विवेचन निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। महाभारतक वनपर्वक 110 केर ई वृतांत विश्वसनीय भऽ सकैत अछि जे महर्षि विभाण्डक मृगिसँ संभोग केने छल। कतेक परवर्ती ऋषिकेँ लऽ कऽ एहेन चर्चा अछि। ऋषि दम सेहो मृगिक संग संभोग केने छल। मृगवेशमे अप्पन कनियाक संग रतिक्रीड़ा करैत एकटा ऋषि पांडुक द्वारा वध कऽ देल गेल छल, आदि। (आदि पर्व 118)
मुदा, नहि तँ ई विश्वसनीय अछि आ नहिये कोनो चिकित्साशास्त्रक आधार पर तथ्यपरक अछि जे कोनो मृगिक पेटसँ मनुखक शिशु जन्म लेने अछि। ऋष्यश्रृंङ्ग केँ लऽ कऽ कतेक आधारहीन लोकोक्ति प्रचलित अछि। कतेक कथामे हुनका मृगिक पेटसँ जन्मल मनुखक नेनाक रूपमे देखाएल गेल अछि, जे पूरा तरहे भ्रामक अछि। महाभारत (शांतिपर्व 296) सँ ज्ञात होइत अछि जे वशिष्ठ, ऋष्यश्रृङ्ग, कश्यप, वेद, तांड, कृपाचार्य, कक्षिवत, कमठ, यवक्रीत, द्रोणाचार्य, आयु, मतंग, दत्त, द्रुमद, मात्स्य आदि ऋषि अशुद्ध योनीमे जन्म लऽ कऽ तपस्या कऽ मूल पिताक वर्णमे पहँुचल। ऐसँ ई स्पष्ट अछि जे ऐ सभ ऋषिक माय आर्येतर आ ब्रााह्णेतर स्त्री छली। तइसँ हुनका अशुद्ध योनि कहल गेल। मुदा कर्मक सिद्धांतक अनुसार, ओ ऋषि अप्पन कठोर तपस्या आ साधनाक बल पर अप्पन पिताक कोटिमे पहुँचल। ई स्मरण रहबाक चाही जे स्त्री योनीक बिना मनुखक संततिक उत्पति असंभव अछि।
पुरना भारतक संस्कृतिमे आत्मसात आ समन्वयक प्रवृत्ति एत्ते प्रबल छल जे तहियौका दूटा आदिम समूह आर्य आ अनार्यक परवर्ती जुग मे ऐ तरहेँ परस्पर समन्वय भऽ गेल जे ओ अप्पन गुणक कर्मक अनुसार चारि वर्णमे बँटि गेल। पूर्व वैदिक कालमे आठ तरहक विवाह नै छल। ई उत्तरकालक देन अछि, जे सूत्रकाल धरि आबैत-आबैत पूरा तरहे संगठित भऽ गेल छल। तहियौका समाज विवाहक सभ रूप केर मान्यता देने छल। स्थापना उत्तर वैदिक कालमे बड़ प्रचलित छल आ ऐ समन्व्यवादी प्रवृत्तिक प्रवर्तक दूरदर्शी ऋषिगण छल। ई भारतीय समाजक उत्कर्षक द्योतक छल।
महर्षि विभाण्डक उत्तर वैदिककालक ऋषि छल। कोनो संदेड नै जे हुनकर स्त्री आर्येत्तर नारी छल। हुनका गर्भसँ एकटा प्रखर शिशुक जन्म भेल जे ऋष्यश्रृङ्गक नामसँ विख्यात भेल अछि। “भागवत दर्शन"क मुताबिक, विभाण्डक त्यागी, तपस्वी, संयमी आ स्वाध्याय-परायण छल। एक दिन पोखरिमे ठाढ़ भऽ कऽ मुनि तप कऽ रहल छल। ओइ काल स्वर्गसँ उतरि कऽ उर्वशी ओतए नहाबै लेल आएल। हुनकर अनुपम रूप लावण्य देखि कऽ मुनिक मन विचलित भऽ गेल। ओ अपलक ओइ अप्सराक सौंदर्य देखैत रहल। अनजानमे हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। ओइ काल आश्रममे पलय बला एकटा हिरणी जल पीबय लेल आएल छल। ओ जलक संग ओइ अमोघ वीर्यकेँ सेहो पीब लेलक। ओ गर्भवती भऽ गेल। ओकर उदरसँ महामुनि ऋष्यश्रृङ्क जन्म भेल।1
कहल जाइत अछि जे ओ साधारण हिरणी नै छल। पूर्व कालमे ओ एकटा देवकन्या छल। कोनो पुण्यात्मा राजाकेँ देखि कऽ ओ हिरणी जकाँ अप्पन पैघ-पैघ आँखिसँ राजाक अनुराग पाबैक लेल हुनक विलोक कऽ रहल छल। ब्राह्माजी कन्याक ऐ अविनय व्यवहारकेँ देखि कऽ तमसा कऽ शाप दऽ कऽ मृत्य लोकक हिरणी बना देलक। शापमे आगू ई व्यवस्था देल गेल जे ओकर उदरसँ यशस्वी ऋषिक जन्म हएत, तखन ओ शापसँ मुक्त भऽ जाएत। वएह देवकन्या एतए हिरणी बनि कऽ रहए लागल। ओ अप्पन शापक खत्म हेबाक प्रतीक्षा करैत रहल। एक दिन उर्वशी ओम्हरसँ निकलल। जखन ओ अप्पन सखीकेँ हिरणीक रूपमे देखलक तँ ओइपर ओकरा बड़ रास दया आबि गेलै। ओ सोचए लागल जे कोन तरहेँ ओकर उदरमे ऋषिक शुक्राणु पहुँचए। ओइ काल पोखरिमे तपस्यारत विभाण्डक ऋषिपर उर्वशीक दृष्टि पड़ल। ओ लज्जा भरल भावकेँ देखाबैत पोखरिमे उतरल आ नहाबैक बहानासँ अप्पन समूचा अंगकेँ अनावृत करए लागल।2 विधिक विधान, मुनिक दृष्टि हुनकापर पड़ल। ओ कामातुर भऽ उठल आ हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। मृगी ओकरा पीब गेल आ एकटा पुत्रकेँ जन्म दऽ कऽ स्वर्ग सिधारि गेलि। मुनि विभाण्डक ओइ नेनाकेँ गो दूध पिया कऽ पालन-पोषण करए लागल।
महाभारत आ श्रीमद्भागवतमे, विभाण्डक आश्रममे शापित देवकन्या मृगीक उदरसँ ऋष्यश्रृङ्गक जन्मक उल्लेख अछि।3 आजुक काल मे आदिवासी लोकमे पशुक नाम पर ओकर गोत्र जानल जाइत अछि, जेना डुंगडुंग (माछ), कच्छप (कछुआ), हांसदा (हंस) आदि। ओइ तरहेँ ऋष्यश्रृङ्गक मां मृग गोत्रीय आर्येतर कन्या छल। ओ एकटा रूपवती छल उर्वशी तरहे। तइसँ पुराणकार हुनका उर्वशीक सखिक तरहे उल्लेख केने छल। ऋष्यश्रृंगक मां केँ एकटा हिरण हेबाक एकटा मिथक अछि। ओ अयोनिज संस्कृतिमे जन्म लऽ कऽ ओकर नैसर्गिक गुण व रूप सौष्ठवक परिचायक छल। ओकर नाम मृगम्बदा छल। ओ रूपवती कन्या आषाढ़ पूर्णिमाक दिन एकटा महान शिशु केँ जन्म देलक जे संपूर्ण आर्यावर्तक तत्कालीन इतिहासकेँ एकटा नब धारा प्रदान कऽ गरिमा युक्त कऽ देलक।4
वाल्मीकि रामायणमे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक आ महर्षि विभाण्डक पुत्र सुप्रसिद्ध मुनि ऋष्यश्रृङ्ग भेला।5
शास्त्रक गहन अनुशीलनसँ एहन लागैत अछि जे ऋष्यश्रृङ्ग अप्पन पिताक संग वनमे रहैत छल आ वनमे हुनकर लालन-पालन भेल छल। कोनो पुरनका महाकाव्य, काव्य वा पौराणिक ग्रंथमे हुनकर माँक उल्लेख नै भेटैत अछि। प्राचीन आख्यानमे योनिज आ अयोनिज, ऐ दू तरहक जातक उल्लेख भेटैत अछि। योनि शब्दक अर्थ मूलत: “घर" होइत अछि आ पुरान ग्रंथमे ऐ अर्थमे एकर प्रयोग भेटैत अछि।6 जिनकर जन्म घरमे नै भेल अछि, ओ अयोनिज संतान अछि। सीता, शकुंतला, द्रौपदी आदि अप्पन माता-पिताक अयोनिज संतान अछि। यज्ञभूमि मे 'वामदेव्यव्रत" केर उत्पन्न नेना सेहो ओइ कोटिमे आबैत अछि। जइ नेनाक जन्म अप्पन घरमे भेल ओ योनिज कहाबैत अछि। हम्मर विचारसँ ऋष्यश्रृंङ्ग अप्पन पिताक योनिज आैरस संतान छल। जन्मक पश्चात ऋषि अप्पन नेनाकेँ आर्येतर माँ सँ अलग कऽ विद्याध्ययन केर अप्पन तपोस्थलीमे राखलक।
एकटा दोसर वृतान्तक मुताबिक, शिशुकेँ जन्म दऽ कऽ माँ स्वर्ग सिधार गेलि। तइसँ पिता विभाण्डक अपना लग राखि कऽ शिशुक लालन-पालन आ सभटा संस्कार देलक। महर्षि विभाण्डक ब्राह्माक मानस पुत्र मरीचिक वंश परंपरामे परम तेजस्वी आ वेद केर प्रकांड पंडित छल। महर्षि व्यास एकर वर्णन एना केने अछि,
मरीचिॅ मानसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:।
मश्यपात्काश्यप: जात: तस्य सुतो विभाण्डक:
ऋष्यश्रृङ्ग तस्य पुत्रास्ति।।7
महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृङ्गक छह बरखक आयुमे उपनयन संस्कार करा कऽ यज्ञोपवीत धारण करौलक आ वेद विधिसँ वेदारंभ संस्कार कऽ गायत्री मंत्र प्रदान केलक। ब्राह्मचर्य धारण करा कऽ ब्राह्मचारी कठिन व्रत, तप, स्वाध्याय, प्रात: सायं गायत्री जप आदि कराबैत वेदक अध्ययन करौलक।8
ब्राह्मचर्य एवं अध्ययन
श्री भागवत दर्शक अनुसार, विभांडक सोचैत छला जे अप्सरा उर्वशीक देखलेसँ हुनकर तेज नष्ट भेल। तइसँ ओ अप्पन नेनाकेँ गलतीयोसँ कोनो स्त्रीक दर्शन नै कराएत। ओकरा विशुद्ध ब्रह्मचारी बनाएब, ई सोचि कऽ ओ अप्पन नेना ऋष्यश्रृंगकेँ आश्रमसँ बाहर नै जाइले दै छल। ओ हुनकासँ तप, अग्निहोत्र कराबैत छल, वेद पढ़ाबैत छल आ पैघ-पैघ ऋषिकेँ छोड़ि कऽ ओकरा केकरोसँ भेँटो नै करऽ दै छल। स्त्रीकेँ तँ ओ अप्पन आश्रमक परिधि धरिमे पएरो नै राखऽ लेल दै छल। कोनो बूढ़ ऋषिक स्त्री सेहो ओतए नै आबि सकैत छल। आबैक गप तँ दूर, ओ अपन नेनाक आगू कोनो स्त्रीक नाम धरि नै लैत छल। ऋष्यश्रृंग जानितो नै छल जे मुनिक अलाबे कोनो अओर स्त्री-पुरुख होइत अछि। ओ नै तँ कोनो नग्र देखने छल आ नहिये नग्रक कोनो वस्तुए।9
ऋष्यश्रृंगक समय अग्नि आ अप्पन तपस्वी पिताक सेवामे बितैत छलै। स्त्रीक अस्तित्वक तँ हुनका पतो नै छलनि। तकर बादो ओ वेदक परगामी विद्वान छल।10
रामायणकार हुनका शक्तिशाली महर्षि कहने छथि। हुनका विषय-सुखक कनियो टा ज्ञान नै छल। ओ अखंड ब्रह्मचारी छल।
अप्पन समाजमे एहन मान्यता अछि जे बच्चा सभकेँ विषय-सुखक कनियो ज्ञान नै दियौ तखने ओ पक्का ब्रह्मचारी बनि सकैत अछि। ई विचार प्राकृतिक निअमक विपरीत अछि। ऐ ढोंगसँ जइ दुर्गक रक्षा कएल जाइत अछि, ओ बड़ आसानीसँ शत्रुक हाथ मे चलि जाइत अछि। ऋष्यश्रृंग वृतांत सेहो एहने अछि। हुनकामे काम चेतना सुप्त छल, ओकर संबंधमे रामायणकारक ई टिप्पणी द्रष्टव्य अछि।– “राजन! लोकमे ब्रह्मचर्यक दूटा रूप विख्यात अछि आ ब्रााह्मण सदा ओइ दुनू स्वरूपक वर्णन केने अछि। एक तँ अछि दंड, मेखला आदि धारण रूप बला मुख्य ब्राह्मचर्य आ दोसर अछि ऋतुकालमे स्त्री समागम रूप गौण ब्रह्मचर्य। ऋष्यश्रृंग जेहन महात्मा ऐ दुनू प्रकारक ब्रह्मचर्यक पालन केने हएत।"11
अप्पन विद्वान पिताक कठोर अनुशासन मे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग कतेक रास व्यवहारिक ज्ञान सेहो प्राप्त केने छल। कौशिकीक तट पर निवास करबाक कारण एकर जलक समुचित उपयोग आ व्यवस्थामे हुनका विशेषज्ञता प्राप्त छल। आश्रमक चारू कात ओहिना नदीक जल-प्रवाहकेँ व्यवस्थित कऽ ओ रंग-बिरंगक फूल-मूल उपजाबै छल, सेहो पर्याप्त मात्रामे। वाल्मीकि रामायणक बालकांडक “चित्राण्यत्र बहूनिस्र्यमूलानि च फलानि" 10/27 मे उपयुक्त गप रेखांकित अछि।
अंग नरेश रोमपाद वृत्तांत
ओइ काल रोमपाद अंग प्रदेशक नरेश छल। ओ राजा दशरथक मित्र छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर दुख देखि कऽ दशरथ अप्पन पहिलुक रानी कौशल्याक गर्भसँ उत्पन्न शान्ता नामक पुत्रीकेँ हुनकर पुत्रीक रूपमे दऽ देने छल।12
रोमपाद शान्ताकेँ पुत्रीक रूपमे पाबि नेहाल भऽ गेल छल। ओकर लालन-पालन महाशक्तिशाली अंग नरेशक राजकीय गरिमाक अनुरूप राज प्रासाद मे भेल।
राजा रोमपाद ययाति वंशक क्षत्रिय छल। “वंशोमन्मन्तरानि च" कऽ मुताबिक, पुराणमे ऐ वंशक राजाक संबंधमे सूचना अछि। विष्णुपुराण 4/18 क मुताबिक, ययातिक चारिम पुत्र “अनु" केँ तीन पुत्र भेल, समानल, चक्षु आ परमेषु। ई वंश अनुवंश कहैलक। समानलक पुत्र कालानल भेल आ कालानलक सृंजय, संृजयक पुरंजय, पुरंजयक जनमेजय, जनमेजयक महाशाल, महाशालक महामना, महामनाक उशीनर आ तितिक्षु नामक दूटा पुत्र भेल।
उशीनरक शिवि, नृग, नर, कृमि आ वर्म नामक पाँचटा पुत्र भेल। ऐ मे शिविक वृषदर्भ, सुवीर, केकय आ मद्रक नामक चारि टा पुत्र भेल। विविक्षुक पुत्र रूशद्रथ भेला। हुनकर हेम, हेमक सुतपा अओर सुतपाकेँ बलि नामक पुत्र भेल। ऐ राजा बलिक रानी सुदेक्षणासँ आन्हर ऋषि दीर्घतमा पाँच पुत्रकेँ जन्म देलक, जे अंग, बंग, कलिंग, पुण्ड्र आ सुहा भेल। राजा बलिमे पुत्र उत्पन्न करबाक क्षमता नै छल। हुनकर प्रथम पुत्र अंगसँ अनपान, अनपान सँ दिविरथ, दिविरथसँ धर्मरथ आ धर्मरथसँ चित्ररथक जन्म भेल। ऐ चित्ररथक दोसर नाम रोमपाद छल।
श्रीमदभागवतक अनुसार, वस्तुत: शान्ता महाराज दशरथ आ कौशल्याक पुत्री छल आ अंग नरेश रोमपाद दशरथक सखा छल।13
“भवभूति" सेहो अप्पन “उत्तर रामचरित..." मे ऐ गपक उल्लेख केने अछि।
कन्या दशरथो राजा शान्ता नाम व्यजीजनत।
अपत्य कृतिका राज्ञे रोमपादाय या ददौ।।
उत्तर रामचरित प्रथमांग
अपत्य शब्द संतान लेल प्रयुक्त होइत अछि आ कृतक (स्त्रीलिंग कृतिका) केर अर्थ अछि कृत्रिमा। ऐसँ स्पष्ट अछि जे शान्ता राजा रोमपादक कृत्रिम (दत्तक) पुत्री छल।
ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान
रामायणमे रोमपादकेँ महाप्रतापी आ बलवान राजा कहल गेल अछि।14
एहन कहल गेल अछि जे ऐ राजाक धर्मक उल्लंघनक कारण हुनकर राज्य मे घोर अनावृष्टि भऽ गेल छल। ऐसँ जनता भयभीत भऽ गेल। मालिनी सेहो गंगा कात अवस्थित छल। अंगमे जल संसाधनक प्रचुरता छल। तकर बादो जलक समुचित उपयोग नै हेबाक कारणसँ अकालक स्थिति आबि गेल छल। राजा ऐ लऽ कऽ बड़ दुखी छल। ओ एकर निवारणक लेल वेदज्ञ पंडितसँ मंत्रणा केलक। सभटा पंडित, सर्वमतसँ अनुशंसा केलक जे महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृंग वेदक पारगामी विद्वान अछि। हुनका कोनो तरहे ऐ राज्यमे बजा कऽ नीकसँ सत्कार कएल जाए आ वैदिक विधिक अनुसार अप्पन कन्या शान्ताक ब्याह कऽ देल जाए।
दूरदर्शी राजा रोमपाद सहर्ष ऐ प्रस्तावक अनुमोदन कऽ देलक। मुदा हुनका ऐ गपक चिंता छल जे ऐ शक्ति संपन्न ऋषिकुमारकेँ कोना ओतए आनल जाए? ओ अप्पन मंत्री आ पुरोहितकेँ पठा ऋष्यश्रृंगकेँ सत्कारपूर्वक मालिनी अनबाले चाहै छल। मुदा ऐ दबंग ऋषिक स्वभावकेँ ओ जानैत छला तइसँ ओ राजाकेँ स्पष्ट कहि देलनि जे ओ ऐ ऋषिसँ डरैत अछि, तइसँ हुनका ई कार्य नै देल जाए। तकर बादो मंत्रीगण सोचि-समझि राजाकेँ जे उपाय बतौलखिन, ओकरा करएमे कोनो दोष नै छल। संगे-संग ऐ कार्यमे कोनो विध्न-बाधा अएबाक कोनो संभावना सेहो नै छल।
वनचर जीवन व्यतीत करऽ बला ऋषिकुमार श्रृंग कहियो कोनो स्त्री केँ नै देखने छल। ओ स्त्रीकेँ चिन्हितो नै छल आ विषय सुखसँ अनभिज्ञ छल। एहन कठोर चित्तकेँ मथि दैबला मनोवांछित विषयक प्रलोभन दऽ कऽ हुनका मालिनीमे अनबाक योजना बनए लागल। ऐ योजनाक सफलताक लेल तय कएल गेल जे सुंदर आभूषणसँ विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्या ऋष्यश्रृंग कतय जा कऽ अनेकानेक उपायसँ हुनका लोभा कऽ मालिनी आनए। राजाज्ञासँ एहने व्यवस्था कएल गेल।
कतेक रास नाओकेँ जोड़ि कऽ बेड़ा बनाओल गेल। ओकरा मनोरम पातसँ सजाओल गेल। नाओमे कतेक रास मिष्ठान आ मधुर फल राखल गेल। नगरक मुख्य-मुख्य रूपवती वेश्याकेँ सभ मंत्रणासँ अवगत करेलाक बाद जलमार्गसँ आश्रम दिस पठा देल गेल। आश्रमसँ कनी दूर ठाम कोशीक पावन कात बेड़ा रोकि देल गेल। वेश्या ओतएसँ ऋषिकुमारसँ मिलय कऽ उपाय करए लागल। अंतर्मुखी स्वभावबला ऋष्यश्रृंग बड़ धीर-गंभीर छल। हुनका अप्पन पिताक सानिध्य बेसी सुखकर लागैत छल। यएह कारण छल जे ओ आश्रमसँ बाहर नै कऽ बराबर निकलैत छल। ओ एत्ते एकांतशील व्यक्ति छल जे वन मे रहि कऽ अप्पन पिताक अलावा स्त्री सभक गप तँ छोड़ू, कोनो दोसर पुरुख धरि केँ नै देखने छल। तखैन भला ऐ ऋषिमे चेतना कोना आैतिऐ? कोनो अज्ञात प्रेरणासँ ऋषिकुमार घुमैत-फिरैत कोशीक ओइ धारक कात पहुँचल, जतए रूपवती वेश्याक बेड़ा ठाढ़ छल। मंद-सुगंध पवनक संग मीठ आवाजमे संगीत सुनाइ दऽ रहल छल। अगरू धूम आ दोसर सुगंधित द्रव्यसँ वातावरण बड़ रमणीय भऽ रहल छल। ऋषिकुमार सुन्नर वेश आ बड़ आकर्षक रूपवाली वनिता सभकेँ देखलक। ऋषिकुमारकेँ अप्पन एतए आएल देखि कऽ वनिता सभ हर्षोत्फुल भऽ गेल। ओ मंद मानक स्वरमे गाबैत ऋषिकुमार लग आएल। ऋषिकुमार सेहो हतप्रभ छल। वनिताक कल्पना तँ ओ केने नै छल। हुनका भान भेल जे ई ऋषिगणे अछि, जे कोनो दोसर लोकसँ आएल अछि। एखैन धरि ओ स्त्री केँ देखने नै छल तँ ओकरा संबंधमे ओ की सोचतिऐ? वनिता हुनकर सत्कार केलक आ स्नेह प्रदर्शित करैत कहलक, हे ब्रााह्मण! अहाँ के छी? की करैत छी? स्त्रीक कमनीयता देखि कऽ ऋषिकुमार मंत्रमुग्ध छल। हुनकर अंतर्मनसँ स्नेहक धारा फूटए लागल। ओ अप्पन पिताक आ अप्पन परिचय देलक। ऋष्यश्रृंग बाजल जे महर्षि कश्यप वंशक महर्षि विभाण्डक हमर पिता छथि। भूमंडलमे प्रसिद्ध छथि। ठामे हमर आश्रम अछि। अहाँक दर्शन हमरा लेल कतेक रास सुखक मूल अछि। अहाँ सभ देखयमे बड़ सुनर छी आ देह सँ आभा सेहो फूटि रहल अछि। अहाँ सभकेँ हम प्रणाम करैत छी। ऋषिकुमार वनिताकेँ अप्पन आश्रम लऽ कऽ आएल। संजोगवश हुनकर पिता आश्रममे नै छल। ऋषि हुनका ऋष्योचित सत्कार आ विधिवत पूजन कऽ कन्दमूल फल-फूल दऽ कऽ संतुष्ट केलक। वनिता सभकेँ ऋषिकुमारक पिता विभाण्डकक एबाक डर सेहो लागि रहल छल। तइसँ ओ तुरंत आश्रमसँ जाइ लेल उत्सुक छल।
ऋषि कुमारक पूजा आ फलक उपहार स्वीकार कऽ वनिता हुनका पर्याप्त आत्मसंतुष्ट केलक। संगे-संग अप्पन संग आनल मिष्ठान आ फल सेहो ऋषिकुमारकेँ भेंट केलक। ओ जल्दीसँ ओकरा खाइ लेल अनुरोध केलक। ऋषि ऐ पदार्थ आ फलकेँ खा कऽ अपूर्व सुखक अनुभव केलक। किछु कालक लेल ओ स्वर्गिक आनंदमे डूमि गेल। वनिता सभ हर्षसँ भरि हुनकर आलिंगन केलक आ कतेक रास फल आ भांति-भांतिक मधुर देलक। ऋषि कुमार मधुरकेँ फल बुझि कऽ खा लेलक। किएकि ओ वनमे रहैत कहियो मधुर नै खेने छल, तइसँ ओ ओकर रसास्वादनसँ अनजान छल। भला सदिखन वनमे रहएबला लोककेँ एहन पदार्थक स्वाद लेबाक अवसर कतए अछि। एकर बाद महर्षि विभाण्डकेँ एबाक आशंकासँ डरल वनिता व्रत आ अनुष्ठानक बहाना बना कऽ अप्पन वेड्रापर घुरि गेल। मुदा ऋषि कुमारकेँ गाढ़ालिंगनमे भरि चतुर वनिता हुनका मनमे कामदेवक विजयी दुन्दुभिकेँ बजा देलक। चिरकालसँ सुप्त भावना एक-एक कऽ जागए लागल। ऋषि ओइ वनिता सभक जाइक पश्चात दुखमे डूमि गेल आ इम्हर-उम्हर टहलय लागल। नै नीन, नै चैन, ऋषि कुमार ओइ कमलमुखी वनिताक चिंतनमे डूमल रहल।
दोसर दिन शक्तिसंपन्न ऋष्यश्रृंग बेर-बेर ओइ वनिताक संबंधमे सोचैत-विचारैत अपनेसँ ओइ बेड़ा लग पहुँचल जतए वेश्या हुनकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल। ऋषि कुमार आकर्षक डोरमे बन्हि अपनेसँ उपस्थित भऽ गेल। वेश्या पहिनेसँ तैयार छल। ऋषिकुमार हुनकर रूपाकर्षणक जालमे फँसि चुकल छल। वनिता सभ अप्पन स्वरमे रस घोरैत बाजल- सौम्य! हमर आश्रमपर चलू। एतए कतेक रास फल-फूल अछि, मुदा ओतए सेहो ऐ पदार्थक कोनो अभाव नै अछि। ई कहि वनिता हुनका अप्पन बेड़ामे बैसा लेलक आ भरि बाट ऋषिकुमारक मनोविनोद करैत अंगक राजधानी मालिनी लऽ आनलक। जीवनमे पहिल बेर ऋष्यश्रृंग कोनो नगरकेँ देखलक। हुनक नगरमे प्रवेश करते इंद्र पूरा जगतकेँ प्रसन्न करैत पानि बरसाएब शुरू कऽ देलक।
ऋष्यश्रृंग जेहन विद्वान ऋषि कुमारकेँ वेश्या मालिनी लऽ आनएमे सफल भऽ गेल। हुनका ई सफलता एक-दू दिनमे नै भेटल हएत। एकर एकटा दोसर वृत्तान्त स्वामी अद्वैतानन्दपुरी प्रवचन संग्रह सच्चिदानन्द प्रकाश (पृष्ठ सं. ३१८) मे भेटैत अछि।
रोमपादक माँजल चतुर वनिता कोशीक धारक कात अप्पन शिविर लगा आ पुण्याश्रमसँ किछु दूर रहि ऋषिकुमारक दिनचर्याक सूक्ष्म निरीक्षण करए लागल। ऐ काजमे महीनो लागि गेल। वनिता सभ अप्पन गहन अध्ययनमे देखलक जे तपस्तयारत ऋषिकुमारकेँ जखन भूख लागैत अछि तँ ओ विशेष जातिक गाछक तनामे अप्पन मुँह सटाबैत अछि आ भरपेट ओकर रस चुसि कऽ वापस तपस्यामे बैसि जाइत अछि। वेश्या सभ एकांत पाबि ओइ विशेष गाछ आ रस चूसए कऽ ठाम पर चिन्ह लगा देलक। संगे-संग ओइपर मीठ तरल पदार्थ (संभवत: गुड़) लेप देलक। फेर दूर ठाम ठाढ़ भऽ कऽ ऋषिकुमारक गतिविधिकेँ देखैत रहल। ऋष्यश्रृंग गाछक रसमे किछु दोसरे स्वाद पेलक। ओ अतृप्त भावसँ ऐ तरल पदार्थकेँ चाटए लागल। ई क्रम चलैत रहल। वेश्या आब ऐ तरहक स्वादिष्ट मधुर ऋष्यश्रृंगकेँ खुआबए लागल। आब हुनका पूर्ण विश्वास भऽ गेल जे ऋषिकुमारकेँ स्वादिष्ट मधुरमे आनंद आबए लागल अछि, तखन ओ ऐ क्रमकेँ एकाएक रोकि देलक।
ऋष्यश्रृंगकेँ पुछलापर वेश्या बाजल जे ऐ तरहक स्वादिष्ट भोजन बनाबैमे धन लागैत अछि आ ओ धन राजाकेँ एतएसँ आबैत अछि। राजा आब धन नै दऽ रहल अछि। जौं अहाँ राजा लग जाइ तँ धन भेटि सकैत अछि।
अप्पन इच्छा पूर्तिक लेल ऋष्यश्रृंग वनिता सभक संग राजा एतए जाइ लेल तैयार भऽ गेल।
राजा रोमपाद राजप्रसादसँ बाहर आबि कऽ ऐ महान तपस्वीक अगवान केलक आ पृथ्वीपर माथ टेक कऽ हुनका साष्टांग प्रणाम केलक। फेर एकाग्रचित भऽ ऋषिसँ वरदान मांगलक जे हुनका ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिताश्री महर्षि विभाण्डक असीम कृपाक प्रसाद भेटए। राजाकेँ शंका सताबए लागल जे कपटसँ ऋषिश्रृंगकेँ मालिनी आनए लेल जौं महर्षि विभाण्डक हुनकापर रूष्ट भऽ जाएत तँ राजाक कल्याण नै अछि।
फेर ऋषिकुमारकेँ अप्पन अंत:पुरमे आनि कऽ अप्पन पालिता कन्या शान्तासँ हुनकर बियाह कऽ देलक। ऐ शुभ काजसँ राजपरिवार आ प्रजामे प्रसन्नता पसरि गेल।
इम्हर जखन महर्षि विभाण्डक अप्पन आश्रम घुरल तँ अप्पन पुत्रकेँ ओतए नै देखि बेचैन भऽ गेल। हवन सामग्री इम्हर-उम्हर पसरल छल। आश्रममे बाढ़नि धरि नै लागल छल। लता आ गाछ टूटल छल आ पात सभ इम्हर-उम्हर बिखरल छल। आश्रमक मृग शावक आब उछलि नै रहल छल। ओ पूरा जंगल ताकि लेलक मुदा ऋषिकुमारक कोनो पता नै चलल। की कोनो राक्षसक माया छी। ओ तपस्यामे विघ्न-बाधा दैक ताकमे रहैत अछि। महर्षि दुख आ क्रोधसँ भरि उठल। ओ ध्यानस्थ भऽ बैसि गेल आ ध्यानमे सभटा चित्र आबैत गेल। अंग नरेशकेँ दंडित करै लेल ओ मालिनी दिस प्रस्थान केलक। ओ नदी आ गाम-घर पार करैत आगू बढ़ल जा रहल छल। उम्हर राजा रोमपाद सेहो शंकित छल जे पुत्रकेँ नै देखि महर्षि विभाण्डक क्रोधक अग्नि जौं धधकि उठल तँ अनर्थ भऽ जाएत। मंत्रीसँ सलाह कऽ राजा ई प्रबंध केलक जइसँ महर्षिक क्रोध शांत भऽ जाए। एकरा लेल राजा जंगलसँ लऽ कऽ राजधानी धरि सभटा बाटपर एक सएसँ बेसी दुधारू गायक संग ओकर ग्वालकेँ सेहो ठहरा देलक। ग्वालसँ कहल गेल जे महर्षि विभाण्डक ऐ बाट देने आबैबला अछि। हुनकर भरपूर स्वागत-सत्कार करब आ कहब जे ई खेत, ई गाय-बड़द सभटा अहाँक पुत्रक संपत्ति अछि। हम सभ अहाँक अनुचर छी, हमरा आदेश दियौ जे हम सभ अहाँक लेल की करी। एहन कहि-सुनि सभ तरहसँ मुनि विभाण्डक क्रोधकेँ शांत करबाक प्रयास कएल गेल। रोमपाद अप्पन योजनामे सफल रहल। क्रोधसँ मुनिक आँखि लाल भऽ रहल छल, एना लागैल छल जे ओ रोमपादकेँ जरा कऽ भस्म कऽ देथिन। मुदा बाट भरि ग्वाल सभ हुनका दूध आ दोसर दुग्ध पदार्थ (दही, घी, पायस, तक्र आदि) सँ खूब स्वागत केलक आ सभटा गोधन आ खेतकेँ हुनकर पुत्रक संपदा बता कऽ हुनकर क्रोधकेँ शांत कऽ देलक।
रोमपादकेँ राजभवन पहुँचैत विभाण्डक ऋषिक क्रोधाग्नि ममता आ प्रेममे बढ़ि गेल छल। राजाक अपूर्व सत्कारसँ ओ धन्य भऽ चुकल छल। ओ देखलक जे हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग राजभवनमे ओना विद्यमान अछि, जेना अमरावतीमे इंद्र। हुनका बगलमे राजा रोमपादक राजकुमारी शान्ता ऋष्यश्रृंगक स्त्री विराजल छल, जेना इंद्रक संग शची। ऐ शोभाकेँ देखि विभाण्डक रोम-रोम पुलकित भऽ उठल। ओ राजा रोमपादकेँ आशीर्वाद देलक आ राजाक इच्छाकेँ पूर्ण करबाक आदेश अप्पन पुत्रकेँ देलक। संग-संग इहो कहलक जे एकटा पुत्रक प्राप्तिक बाद वन घुरि आएब। ऋषिश्रृंगक ई कथा महाभारत वनपर्वमे लोमश ऋषि सुनौने छल। 5
अप्पन पुत्र ऋष्यश्रृंग लग पहुँचि विभाण्डक बड़ प्रसन्न छल आ हुनकर उत्कर्ष देखि कऽ हर्षोत्फुल छल। राजा सेहो हुनकर सत्कारमे कमी नै केलक। मुदा महर्षि राजमहल परिसरमे रहबाकेँ उचित नै बुझलक। हुनका सघन वन आ गुफा चाही जतए ओ निर्विघ्न ध्यान, तप, व्रत, अनुष्ठान आदि कऽ सकए। राजा रोमपाद हुनकर इच्छाक सम्मान करैत मालिनसँ पश्चिम मेरूक पर्वतपर हुनकर आश्रम बना कऽ हुनकर रहैक व्यवस्था कऽ देलक। ई महर्षि विभाण्डक अस्थायी आश्रम छल। ई स्थल वर्तमान भागलपुरसँ ४२ किलोमीटर पश्चिम आ वरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम कोनपर छल। ई ऋषिकुंड वा ऋष्यश्रृंग आश्रमक नामसँ प्रसिद्ध मरूक पर्वत या भैरा पहाड़ीसँ बनल गोलकार घाटीमे स्थित छल। ऐ आश्रमक लग एकटा पोखरि छल जे ठार आ धीपल रुाोतक एकटा समवाचित जलराशि छल। ओइ पोखरिक उत्तर दिस ध्यान स्थली अछि जतए ऋषि ध्यान लगाबैत छल। कजरा रेलवे स्टेशनसँ बारह कि.मी. दक्षिण स्थित ई पहाड़ ऋष्यश्रृंग पर्वतक नामसँ प्रसिद्ध अछि। एखन ई ठाम पर्यटकक लेल आकर्षणक केंद्र अछि।
मालिनीमे वृष्टि यज्ञ आ पुत्रेष्ठि यज्ञ
मालिनीमे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद आ हुनक विद्वान मंत्रीसँ अंग देशमे अनावृष्टि आ सूखासँ प्रजाकेँ बचाबैक लेल उपायपर विचार-विमर्श केलक। एकर संगे ऐ देशमे उपलब्ध जल-संसाधनक समुचित उपयोगक संबंधमे सेहो मंत्रणा केलक। ओ मालिनीमे वृष्टि यज्ञ केलक जइसँ राज्यमे दीर्घकाल धरि अकाल नै पड़ए।
आजुक चम्पानाला ओइ ऋषिश्रृंगक गहन पर्यवेक्षणमे तैयार कएल गेल हएत जकर उपयोगिता साढ़े सात हजार बरख बादो सिद्ध अछि।
काल बितैत गेल। राज्यमे वर्षा हुअए लागल। प्रजा धन-धान्यसँ संपन्न हुअए लागल। आब शान्ता एकटा सुनर आ स्वस्थ पुत्रक जन्म देलक, जकर नाम सारंग राखल गेल। संपूर्ण राज्यमे आनंदक लहरि छा गेल।
एक दिन शान्ता अप्पन पतिदेव ऋष्यश्रृंगसँ सविनय अप्पन मनोरथ कहलक। ओ बाजल जे हुनका कोनो भाय नै अछि, तइसँ हुनकर माता-पिता बड़ दुखी रहैत छन्हि। हुनकर दुखसँ हम बेचैन रहैत छी। शान्ता साग्रह केलक जे अहाँ एहन कोनो उपाय करू जे हमरा एकटा भाय भऽ जाए।
विद्वान ऋष्यश्रृंग चिंतन कऽ कहलक जे ओ विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतक पालन कऽ वेदक अध्ययन केने अछि। ओ पुत्रक निमित्त अप्पन ससुर महाराज रोमापादक पुत्रेष्ठि यज्ञ कराएत। ऐ यज्ञक प्रधान देवता इंद्र रहत। ओ महाराजकेँ यशस्वी पुत्र प्रदान करत।
शान्ता हर्षोत्फुल भऽ उठल। ओ यज्ञ संपादनक सूचना अप्पन माता-पिताकेँ देलक। राजा रोमपाद कतेक रास वेदज्ञ पंडितकेँ बजा यज्ञक संपूर्ण तैयारी केलक। कतेक रास राजा-महाराजा आमंत्रित कएल गेल। ऐ मे राजा रोमपादक परम मित्र अयोध्या नरेश दशरथ सेहो हएत। बड़ धूमधामसँ यज्ञ संपन्न भेल। एकर तत्काल फल सेहो भेट गेल, इंद्र प्रसन्न भऽ राजाकेँ पुत्रवान हेबाक वरदान देलक। रानी गर्भवती भेल आ समय एलापर एकटा पुत्रकेँ जन्म देलक। माता-पिता ओइ शिशुक नाम चतुरंग राखलक। अंग देशक राजाक वंशावली, जे चतुरंगसँ शुरू भऽ महाभारत कालक कर्ण धरि जाइत अछि, ओ निम्नलिखित अछि-
रोमपादक पुत्र चतुरंग, चतुरंगक पुत्र पृथुलाक्ष आ पृथुलाक्षक चम्पा नामक पुत्र भेल, जे चम्पानगरी बसौने छल। चम्पाकेँ हर्यंग नामक पुत्र आ हुनकर पुत्र भेल भद्ररथ, भद्ररथकेँ वृहद्रथ आ वृहद्रथकेँ वृहत्कर्मा नामक पुत्र भेल। वृहत्कर्माकेँ वृहदभानु, वृहदभानुकेँ वृहन्मना आ वृहन्मना संजयद्रथक जन्म भेल। जयद्रथकेँ ब्राह्मण आ त्रिय संयोगसँ उत्पन्न भेल स्त्रीक गर्भसँ विजय नामक पुत्रक जन्म भेल। विजयकेँ धृति, धृतिकेँ धृतव्रत, धृतव्रतकेँ सत्कर्मा आ सत्कर्माकेँ अधीरथ नामक पुत्र भेल। यएह अधीरथ नहाइ लेल गंगा तटपर गेल रहथि जिनका पिटारमे सुरक्षित राखल एकटा बालक भेटल छल। ऐ बालककेँ पृथा (कुंती) जन्म देलाक बाद गंगामे बहा देने छल, जेकरा अधीरथ पुत्रक रूपमे ग्रहण केने छल। ई बालक कर्ण भेल जे महाभारतक सुप्रसिद्ध महारथी छल। कर्णक पुत्र वृषसेन। १७ अंग नरेशक एतबेटा वंशावली पुराणमे उपलब्ध अछि।
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तृतीय परिच्छेद
अयोध्यामे अश्वमेध आ पुत्रेष्ठि यज्ञ
अवध नरेश राजा दशरथक राजधानी अयोध्या छल। ई नगरी सरयू धारक कातमे बसल अछि। ई प्रचुर धन-धान्यसँ संपन्न, सुखी आ बड़ समृद्धशाली छल। अयोध्या सभ लोकमे विख्यात छल। एकरा महाराज वैवश्वत मनु बसौने छल। हुनके पुत्र छल इक्ष्वाकु, जिनकर तीन शक्तिशाली पुत्र (विकुक्षि, निमि आ दण्डक) मे विकुक्षिक वंशमे दशरथ एकटा चक्रवर्ती सम्राट छल।1
वाल्मीकीय रामायणक अनुसार, ई महापुरी बारह योजन नम्हर आ तीन योजन चौड़ा छल। अयोध्यासँ दोसर जनपदमे जाइ लेल जे बड़ प्रशस्त आ चौड़ा राजमार्ग छल, ओकर दूनू कात कतेक रास सघन गाछसँ आच्छादित हेबाक कारण ओइ कालक दोसर मार्गसँ अप्पन फराक पहचान बना रहल छल। अयोध्यामे कतेक रास बाजार छल। ई सभ तरहक यंत्र आ अस्त्र-शस्त्रसँ संचित छल। अप्पन नामक अनुसार ई युद्धमे पराजित होइबला नगरी नै छल। एतए ऊँच-नीच अट्टालिका छल, जकर ऊपर ध्वज लहरा रहल छल आ गुंबदपर शतध्नि (तोप) लागल छल। सुरक्षाक दृष्टिसँ अयोध्या अजेय छल। ओकर चारू कात गहींर खधाइ छल, जेकरा लांघब बा पार करब कठिन छल। नगरमे कतेक रास सांस्कृतिक कार्यक्रम लेल नाटक मंडल छल। ओकरामे स्त्रिये टा नृत्य आ अभिनय करैत छल। चारू कात आमक गाछ छल। नगरमे कतेक रास कूटागार (नुकायल घर आ स्त्री क्रीड़ा घर) छल। राजा दशरथ ऐ संपन्न नगरमे रहि कऽ अप्पन प्रजाक पालन करैत छल। रामायणमे अयोध्यापुरीक वर्णन आ राजा दशरथक शासनकालमे अयोध्या लोकक उत्तम स्थिति अवलोकन करैमे आदि कवि वाल्मीकि कोनो तरहे कृपणता नै कएने अछि।2
रामायणक अनुसार अयोध्यामे कत्तौ कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख आ नास्तिक मनुख देखबामे नै भेटैत अछि। सभ लोक धर्मशील, संयमी, प्रसन्न, शीलवान आ सदाचारी छल। सभ लोक कुंडल, मुकुट आ पुष्पहार धारण करैत छल आ हुनकर अंग चंदनक लेप आ सुगंधी संयुक्त छल। एतुक्का सभ लोक श्री संपन्न, रूपवान आ राजभक्त छल। इंद्रक अश्व उच्चैश्रवाक तरहे काम्वोज आ वाह्लीलक देशमे उत्पन्न भेल शक्तिशाली अश्व आ सिंधुनदमे पालल दरियाइ घोड़ा अयोध्यामे भरल छल। विन्ध आ हिमालय पर्वतमे जन्मल मत्त गजराज सेहो बड़ संख्यामे अयोध्याक शौर्यक अनवरत वृद्धि करैत छल। अयोध्या सभ तरहेँ सुरक्षित छल। एतए आबि कऽ केकरो लेल युद्ध करब असंभव छल, तइसँ ई पुरी अयोध्या सत्य आ सार्थक नामसँ प्रकाशित होइत छल।
ऐ यशस्वी राजा दशरथक राजकीय काजक संपादन लेल मंत्री-परिषदमे आठ मंत्री छल, धृष्टि, जयंत, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल आ सुमन्त। सुमन्त अर्थशास्त्र उद्भट विद्वान छल। एकरा संगे महर्षि वशिष्ठ आ वामदेव, महाराज दशरथक दूटा विद्वान ऋत्विज (पुरोहित) छल। एकर अलावा, सुयश, जावलि, काश्यप, गौतम, दीघार्य, मार्कण्डेय आ कात्यायन जेहन तपायल ऋषिक दरबारमे मंत्रीपद प्राप्त छल।3 ऐ महर्षिक संग कौशल नरेशक पहिलुका परंपरागत ऋत्विज सेहो मंत्रीक कार्य करैत छल।
सभ तरहेँ ताकत भेलाक बादो राजा पुत्र विहीन छल। हुनकर तीनटा रानी छल। मुदा, सूर्यवंशकेँ चलाबै बला कोनो पुत्र नै छल। राजा मंत्रसँ मंत्रणा कऽ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठान करबाक विचार केलक। वेद विद्याक पारंगत विद्वान ऋषिमे श्रेष्ठ सुयश, वामदेव, जावलि, काश्यप, वशिष्ठ सभकेँ ससम्मान बजा कऽ नरेश अप्पन मंतव्य देलक। दशरथ अप्पन इच्छा व्यक्त केलक जे शास्त्रोक्त विधिसँ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञसँ भगवानक भजन करब हुनका लेल एकमात्र उपाय अछि। वेदज्ञ पंडित एकर अनुमोदन केलक।
राजा दशरथ व्याकुल भऽ कऽ महर्षि वशिष्ठसँ ऐ फलदायक पुत्रेष्ठि यज्ञ अपनेसँ कराबैक अनुरोध केलक। ओ कनमुँह भऽ अप्पन कुल पुरोहित वशिष्ठसँ बाजल जे हुनकामे तपस्याक एतेक विपुल शक्ति अछि जे हुनके लऽ कऽ ब्रह्मा युगमे परिवर्तन कऽ देने अछि। फेर एकटा साधारण पुत्रेष्ठि यज्ञ ओ किअए नै कऽ सकैत अछि?
ऐपर गुरु वशिष्ठ गंभीर भऽ कऽ बाजल, -हे राजन! पुत्रेष्ठि यज्ञ कोनो साधारण यज्ञ नै अछि। ई यज्ञ वएह करा सकैत अछि जे ब्रह्मचर्य अवस्थामे शास्त्रमे कहल गेल आठ तरहक मिथुनक दृढ़तासँ त्याग केने हएत। स्त्रीक स्मरण, स्त्रीकेँ लऽ कऽ गप, स्त्रीक संग क्रीड़ा करब, स्त्रीकेँ देखब, स्त्रीसँ नुका कऽ गप करब, स्त्रीसँ भेँट करबाक निश्चय आ संकल्प करब आ स्त्री प्रसंगक गप करब।4 ऐ आठ तरहक अवगुणसँ जे पूर्णत: रहित हुअए, निष्ठावान ब्रह्मचारी हुअए, ओ अप्पन ब्रह्मचर्य कालमे कोनो गृहस्थक अन्न नै खेने हुअए, वएह ऐ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। हम अहाँक वंशक राजाक कतेक तरहक अन्न खेने छी। तइसँ ऐ यज्ञक संपादन हम नै कऽ सकैत छी।
महर्षि वशिष्ठ ध्यान लगौलक, फेर आँखि खोललक आ बाजल, पुण्याश्रममे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक ऋषि अछि आ हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग अप्पन पिताक संग रहि रहल अछि। ओ सभ तरहेँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। ओ उक्त शास्त्रोक्त कठोर ब्रह्मचर्यक पालन केने छल। ओ ब्रह्मचर्य कालमे ई जानबे नै केलक जे स्त्री की होइत अछि।
ऐ यज्ञक संपादनार्थ अंग नरेश राजा रोमपादक जमाए ऋष्यश्रृंगकेँ सादर आमंत्रित करबाक निश्चय कएल गेल। रोमपाद राजा दशरथक अभिन्न मित्र छल। ओ नीक कालमे मंत्री आ रानीक संग अप्पन मित्र अंग नरेशक एतए प्रस्थान केलक, जतए ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्री शान्ताक संग निवास करैत छल। प्रज्ज्वलित अग्निक संग तेजस्वी ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद लग विराजमान छल।
गहींर मित्रताक कारण रोमपाद अप्पन मित्रक विधिवत सत्कार केलक आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार पूजन केलक। संगे-संग अप्पन विद्वान जमाएसँ अप्पन अभिन्न मित्रक परिचय करेलक। ऋष्यश्रृंग सेहो राजा दशरथक बड़ सम्मान देलक। राजा दशरथ अंग नरेशक एतए सात-आठ दिन धरि मित्र पाहुन तरहेँ रहि गेल। एकर बाद राजा दशरथ राजा रोमपादकेँ अश्वमेध अनुष्ठान केँ लऽ कऽ अप्पन मनक इच्छा बतौलखिन आ एकर निअमसँ संपादनार्थ ऋष्यश्रृंग आ शान्ताकेँ अयोध्या लऽ जाए लेल अनुमति मांगलक। रोमपाद दुनू गोटेकेँ सहर्ष अयोध्या जेबाक अनुमति दऽ देलक।
रामायणकारक अनुसार, रोमपादक अनुमति लऽ कऽ ऋष्यश्रृंग आ शान्ता महाराज दशरथक संग अयोध्याक लेल प्रस्थान केलक।5 राजा दशरथकेँ विदा करैत काल रोमपाद बड़ भावुक भऽ गेल। दुनू गोटे हाथ जोड़ि कऽ एक-दोसराकेँ छातीसँ लगा कऽ अभिनंदन केलक।
दशरथ अप्पन द्रुतगामी दूतकेँ अप्पन नगरवासी सभकेँ समाद भेजि कऽ सूचित केलक जे विभाण्डक तनय ऋष्यश्रृंग अयोध्या आबि रहल अछि। नगरमे तोरण द्वार बनाओल जाए, एकरा सजाओल जाए। सभ ठाम अगरू धूमक सुवास हेबाक चाही। नगरक सभटा बाट बहारल जाए आ ओकरापर पाइन छींटल जाए, जइसँ ओकरापर कनियोटा गरदा नै रहै। पूरा नगरकेँ ध्वज पताकासँ अलंकृत कऽ देल जाए। राजाक आदेशक पालन भेल। नगरमे शंख, दुन्दुभि आ दोसर वाद्ययंत्र बाजए लागल। बाटक सभटा कठिनाइ केँ बिसुरि कऽ राजा स-दलबल प्रफुल्लित छल। राजा ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कऽ नगरमे आएल। ऐ द्विजकुमारक दर्शन कऽ नगरक लोग, कृतार्थ भऽ उठल। सभ कियो पराक्रमी महाराज दशरथक संग ऋष्यश्रृंगकेँ अयोध्यामे आबैत पुष्पवृष्टिसँ स्वागत केलक। राजा अप्पन महान पाहुनकेँ अंत:पुरमे आनि कऽ शास्त्रोक्त विधिसँ पूजा-अर्चना केलक। ओतुक्का स्त्री सभ देवी शान्ताकेँ अप्पन बीच पाबि बड़ खुश छल।6
वाल्मीकीय रामायणक बालकांडक द्वादश सर्गक अनुसार, अंत:पुरमे ऋष्यश्रृंग सपत्नीक रहए लागल। बड़ काल बीत गेल। वसंत ऋतुक आगमन भेल। दशरथ एहन कालमे यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल विचार केलक। एकर बाद देवता सन सुकान्ति बला ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कर जोड़ि कऽ दशरथ प्रणाम केलक आ अप्पन विमल वंशक परंपराक रक्षाक लेल पुत्र पाबैक निमित्त यज्ञ करबाक लेल हुनका वरण केलक। ऋष्यश्रृंग तथास्तु कहि हुनकर प्रार्थना स्वीकार केलक। ऋषिक आदेशक मुताबिक, यज्ञ सामग्री जमा हुअए लागल, भूमंडलमे भ्रमण करबाक लेल महाराज दशरथक अश्वकेँ छोड़बाक व्यवस्था हुअए लागल, पारंगत आ ब्रह्मवादी ऋषि आ पंडितकेँ बजैलक। सुयज्ञ, वामदेव, जावलि, काश्यप आ वशिष्ठ संग दोसर पंडित सेहो आएल। दशरथ सभ लोकक विधिवत पूजन केलक। पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठानक गप दोहराएल गेल आ विश्वास व्यक्त कएल गेल जे ऋष्यश्रृंगक प्रभावसँ हुनकर सभटा कामना पूर्ण हएत।
ऋषि सभ राजाक ऐ महान संकल्पक लेल साधुवाद देलक। ऋष्यश्रृंग आ दोसर ब्राह्मण भविष्यवाणी केलक जे ऐ यज्ञसँ चारिटा पराक्रमी पुत्र प्राप्त हएत। राजा प्रसन्न भेल। मंत्रीकेँ आदेश भेटल जे गुरुजनक आदेशानुसार यज्ञक सामग्री जुटाओल जाए आ शक्तिशाली वीरक संरक्षणमे यज्ञक अश्वकेँ छोड़ल जाए। अश्वक संग प्रधान ऋत्विज सेहो रहता। सरयूक उत्तर दिसक तटपर यज्ञशालाक निर्माण भेल आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार क्रमश: शांतिकर्म पुण्याह वाचन आदिक विस्तारपूर्वक अनुष्ठान कएल जाए, जइसँ विघ्नक निवारण हुअए। अहाँ सभ कियो एहन साधन प्रस्तुत करू जइसँ ई यज्ञ निर्विघ्न विधिपूर्वक संपन्न भऽ जाए।
मंत्री सभ राजाक आदेशक पालन केलक आ ओइ मुताबिक व्यवस्था सेहो केलक। ऐ तरहेँ एक वर्ष बीत गेल। दोसर वर्ष वसन्तागमन भेल। अयोध्याक आमक गाछी कोइलीक कूँक सँ गूँजि उठल। राजा अश्वमेधक दीक्षा लै लेल गुरु वशिष्ठ कतए पहुँचल। ओ न्यायत: गुरुक अर्चना केलक आ अनुरोध केलक जे शास्त्रविधिसँ ओ ऐ यज्ञकेँ संपन्न कराबथि आ एहन व्यवस्था करथि जे कोनो ब्रह्म राक्षस ऐ मे विघ्न नै उत्पन्न कऽ सकए। दशरथ कहलखिन, -अहाँक बड़ स्नेह हमरापर अछि, अहाँ हमर सुहृदए, हितैषी, गुरु आ परम महान छी। ऐ महान यज्ञक भार अहीं वहन करू। पुलकित भऽ कऽ गुरु वशिष्ठ अप्पन स्वीकृति देलखिन आ कहलखिन, -हे नरोत्तम! हम वएह सभ काज करब जइ लेल अहाँ प्रार्थना केने छी।
तकर बाद, गुरु वशिष्ठ यज्ञ काजमे निपुण आ यज्ञ विषयक शिल्प काजमे कुशल, परम धर्मात्मा, वृद्ध ब्राह्मण, यज्ञ काज खत्म हुअए धरि ओइमे सेवा करए बला सेवक, शिल्पकार, कमार, खधाइ खोदएबला, ज्योतिषी, कारीगर, नट, नचनियाँ, विशुद्ध शास्त्र वेत्ता आ बहुश्रुत पुरुख सभकेँ बजा कऽ हुनका सभसँ कहलक, -अहाँ सभ महाराजाक आज्ञासँ यज्ञकाजक लेल आवश्यक प्रबन्ध करु। जल्दीसँ हजार ईंटा मंगाबियौ। बजाओल गेल राजाक रहैक लेल, हुनका भोजन योग्य आ पीबए आदिक उपकरण युक्त कतेक रास महल बनाओल जाए। ब्राह्मणक लेल आन्हर-पाइनक निवारणमे समर्थ सैकड़ो आवास बनाओल जाए। ऐ तरहेँ पुरवासीक लेल घर आ दूर ठामसँ आएल भूपालक लेल सभ सुविधासँ युक्त महल तैयार कएल जाए। हाथीक लेल हथसाल आ घोड़ा लेल घुड़साल, सामान्य लोकक विश्राम करबाक लेल रैन बसेरा आ दोसर देशक सैनिक लेल छावनी बनाओल जाए। बड़ रास मेहनत करए बला सेवक आ शिल्पी केँ धन आ अन्न दऽ कऽ सम्मानित कएल जाए। सभ अप्पन-अप्पन काजमे लागि गेल। तकर बाद वशिष्ठ मंत्री सुमंतकेँ आदेश देलक जे ऐ धरतीक सभटा धार्मिक राजा आ चारू वर्णक सभटा लोककेँ ऐ यज्ञमे भाग लेबाक लेल आमंत्रित कएल जाए। मिथिलाक नरेश शूरवीर सत्यवादी जनक, देवता सन सुकांतिबला काशी नरेश, महाराज दशरथक ससुर वृद्ध केकेय नरेश, अंग देशक महाधनुर्धर राजा रोमपादक पुत्र सहित कौशल राज भानुमान, मगध राज प्राप्तिज्ञ आदि केँ अपनेसँ जा कऽ सादर सत्कारपूर्वक बजओने आएल। महाराजक आदेश लऽ कऽ पूब देशक नरेश, सिंधु सौवीर आ सुराष्ट्र देश व दक्षिणक नरेशक विशेष दूतसँ निमंत्रण भेजल जाए। निर्धारित दिन विभिन्न राज्यक नरेश महाराज दशरथक लेल बहुमूल्य रत्न भेंट लऽ कऽ अयोध्या जाए लागल। वांछनीय वस्तुक संग सरयूक उत्तरबरिया कातपर यज्ञशालाक तुरंत निर्माण भऽ गेल। लागल एना जे मनक संकल्पसँ ई बनि गेल।
मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगक आदेशसँ शुभ नक्षत्र बला दिन राजा दशरथ यज्ञक लेल राजम वनसँ निकलल। एकर बाद वशिष्ठ जेहन श्रेष्ठ द्विजवर ऋष्यश्रृंगक नेतृत्वमे यज्ञकार्य शुरू केलक आ तखने राजा दशरथ अप्पन स्त्रीक संग ऋष्यश्रृंगसँ यज्ञक दीक्षा लेलक।7
इम्हर वर्ष पूर्ण होइक संग अश्व भूमंडलक परिक्रमा कऽ वापस घुरि आएल। अश्वमेध यज्ञ शुरू भेल। ऋष्यश्रृंग आदि महर्षि अप्पन अभ्यास कालमे सीखल अक्षर संयुक्त स्वर अ वर्ण सँ संपन्न मंत्रसँ इंद्र आदि श्रेेष्ठ देवता सबहक आह्वान केलक। सभ हुनकर योग्य हविष्यक भाग समर्पित केलक। यज्ञशालामे तीन सए पशु बान्हल गेल छल आ दशरथक ओइ अश्वरत्न केँ सेहो ओतए बान्हल गेल छल। रानी कौशल्या ओइ अश्वक संस्कार कऽ ओकरा तलवारसँ तीन बेर स्पर्श केलक आ धर्म पालन करबाक इच्छासँ ओइ अश्व लग एक राति निवास केलक। सभटा वर्ण द्वारा अश्वक स्पर्शक पश्चात चतुर जितेंद्रिय ऋत्विक विधिसँ अश्वकंदक गूदा निकालि शास्त्रोक्त विधिसँ पकौलक। ओइ गूदाक आहुति सेहो देल गेल। राजा दशरथ अप्पन पापकेँ दूर करबाक लेल ओकर धुआँ सूंघलक। अश्वमेध यज्ञक अंगभूत जे हवनीय पदार्थ छल, ओइ सभक संग सोलह ऋत्विक अग्निमे विधिवत आहुति दिअए लागल।
अश्वमेध यज्ञ पूर्ण भेल। ऋत्विककेँ जे धन दक्षिणामे भेटल, ओ सभटा ओ मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगकेँ सौंपि देलक। ई दूनू महर्षि न्यायपूर्वक बँटवारा कऽ सभ ब्राह्मणकेँ संतुष्ट केलक। एम्हर दशरथ ऐ उत्तम यज्ञक पुण्यफल प्राप्त कऽ मने मन प्रसन्न भेल। ओ ऋष्यश्रृंगसँ बाजल, -उत्तम व्रतक पालन करएबला मुनीश्वर! आब जे कर्म हमर कुलक परंपराकेँ बढ़बै बला हुअए, ओकर संपादन कएल जाए। ऋष्यश्रृंग राजाक चारिटा यशस्वी पुत्र हेबाक भविष्यवाणी केलक। राजा प्रसन्न भेल आ ऋष्यश्रृंगसँ एकरा लेल पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल अनुरोध केलक।8 ओ कनी कालक लेल ध्यान लगा अप्पन भावी कर्तव्यक निश्चय केलक। फेर ध्यान भंग भेलापर दशरथसँ बाजल, -राजन! हम अहाँकेँ पुत्र प्राप्तिक लेल अर्थवेदक मंत्रसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करब। वेदोक्ति विधिक अनुसार, अनुष्ठान केलापर ई यज्ञ अवश्य सफल हएत।
ऋष्यश्रृंग अप्पन जुगक महान चिकित्साशास्त्री छल आ शरीर विज्ञानमे हुनकर गहींर पइठ छल। ओ दीर्घकाल धरि आयुर्वेदक सेहो अध्ययन केने छल आ ओइमे अर्हत्व प्राप्त केने छल। ओ राजा दशरथ आ हुनकर तीनू रानीक चिकित्सा शास्त्रीय परीक्षण केलक। ओ ओकरे मुताबिक जड़ी-बूटी आ आयुर्वेदिक गुण संयुक्त समिधा सेहो इकट्ठा केलक।10 परम तेजस्वी ऋष्यश्रृंग पुत्र भेटबाक उद्देश्यसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ केलक। ओ श्रौत विधिक अनुसार, चिकित्सीय गुण युक्त समिधा सभक आहुति अग्निमे देब शुरू केलक। ऐ महान यज्ञमे देवता, सिद्ध, गंधर्व आ महर्षिगण अप्पन अप्पन भाग लै लेल पहुँचल। पापी सभक विनाश आ संतक कल्याणक लेल सभटा देवता यज्ञस्थल पर उपस्थित भेल आ अप्पन भाग प्राप्त कऽ यथेष्ट आशीर्वाद देलक। यज्ञकुंडक आैषधि तैयार भऽ गेल। ई खीरक रूपमे तैयार कएल गेल। प्रज्ज्वलित अग्निक समान ई दिव्यौषधि दैदीप्यमान भऽ रहल छल। ई जम्बूनद नामक सुवर्णसँ बनल बड़ पैघ रास परातमे चांदीक ढक्कनसँ झाँपल छल। आैषषि तैयार हेबाक संग एकर सुगंध सभ दिशामे पसरि गेल। ऋष्यश्रृंग अप्पन सफलतासँ प्रफुल्लित छल। ओ यज्ञाग्निसँ ओइ अमोघ आैषधिसँ भरल पात्रकेँ निकालि महाराज दशरथकेँ देलक आ कहलक, -राजन! अहाँ एकरा ग्रहण करू। राजाक अंत:पुरक स्त्री सभमे हर्षोल्लास भरि गेल, जेना निर्धनकेँ कुबेरक खजाना भेट गेल। राजा ओइ खीरक आधा हिस्सा महारानी कौशल्याकेँ देलक। फेर बचल आध हिस्सा रानी सुमित्राकेँ। फेर दुनूकेँ देलाक बाद जतेक खीर बचल छल ओकर आध हिस्सा रानी कैकेयीकेँ आ हुनका देलाक बाद जे खीरक अवशिष्ट भाग बचल, से चतुर नरेश किछु सोचि-समझ कऽ फेर सुमित्राकेँ दऽ देलक। रानी श्रद्धा आ विश्वासपूर्वक ऐ आैषधि युक्त खीरक सेवन केलक। जल्दीये ओ अलग-अलग गर्भधारण केलक। (देखू परिशिष्ट क)
चतुर्थ परिच्छेद
ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना
किछु दिन अयोध्याक रनिवास मे रहैक बाद ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्रीक संग मालिनी घुरल। मालिनी सं पश्चिम भाग स्थित अप्पन आश्रम कऽ सुव्यवस्थित केलक।1 ओहि आश्रम मे वेदक अध्ययनक व्यवस्था करल गेल, जे कतेक रास आचार्यक देख-रेख मे संचालित छल।
एकर बाद ऋष्यश्रृंग शान्ताक संग कौशिकीक कातक कज्जल वन स्थित अप्पन पुण्याश्रम सेहो घुरल। ई वहि पुण्याश्रम छल, जतय सं गणिका हुनका अंगक राजधानी मालिनी लऽ गेल छल। अंतर्मुखी युवक ऋष्यश्रृंगक बिना ई आश्रम सून छल। मन सं वेदक सार्थक पाठ करय बला ऋष्यश्रृंग के आबैत लता हिल-हिलकऽ स्वागताभिवादनक मुद्रा मे आबि गेल। पिता विभाण्डक अप्पन पुत्रक अहि उपलब्धि पर हर्षोत्फुल छल। शान्ता जेहन पुत्रवधू कऽ पाकऽ ओ पुलकित भऽ उठल।
अहि पुण्याश्रम मे ऋष्यश्रृंगाश्रमक स्थापना केल गेल, जाहि के पहिलुक कुलपति ऋष्यश्रृंग छल। उत्तर वैदिक काल मे विश्वविद्यालयक स्तरक मान्यता अहि आश्रमके प्राप्त छल। तहियौका आर्य जातिक शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक, भौतिक आ सांग्रामिक उन्नतिक कारण हुनकर शिक्षा प्रणाली छल। रामायण काल में ऋष्यश्रृंगाश्रम बड़ चर्चित छल। महाभारत मे सेहो एकर संक्षिप्त विवरण भेटैत अछि। पंडित रामदीन पांडेय लिखैत अछि जे ऋष्यश्रृंग अप्पन युगक महान आचार्य छल। चिकित्सा शास्त्र मे हुनकर अद्भुत प्रवेश छल। महाभारत युग मे ई आश्रम बड़ रास हरिहर छल। युधिष्ठिर वनवास काल मे लोमश ऋषिक संग अहि आश्रम मे आयल छल। आश्रम मे दस हजार छात्र सभोजन, सवस्त्र आ निशुल्क शिक्षा प्राप्त करैत छल।2
अहि आश्रमक ब्रह्मचारी मे भक्ति, शुद्धता आ पवित्रताक संग धार्मिक वृत्तिक उदात्त आ गरिमामय छल। ओ सभ दैनिक क्रिया, संध्योपासन, व्रतक अनुपालन आ धर्म समन्वित उत्सव से हुनक जीवन मे उन्नति, आत्मविश्वास, आत्मबल आ आत्मिक शक्ति प्रचुर रूप सं भेटैत छल। आचार्य कुल मे अग्नि-परिचर्याक सभ दिन पालन, ब्रह्मचारीक लेल एकटा धार्मिक व्रतक समान छल आ ई आश्रमक अनुशासनक महत्वपूर्ण अंग छल। आचार्य ऋष्यश्रृंगक कुशल कुलपतित्व मे ई आश्रम जम्बूद्वीप में चर्चित भऽ गेल। वेद आ ओकर सभटा अंगक संग चिकित्सा शास्त्रक गहन ज्ञान ब्रह्मचारी छात्र सभके देल जायत छल। समिधा आ मेखला सं अप्पन व्रतक नियम सं पालन करैत ब्रह्मचारी श्रम, तप आ गुरुसभक आशीर्वादक प्रभाव सं अध्ययन मे सफलता प्राप्त करैत छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम मे तप ब्रह्मचर्य जीवनक आवश्यक अंग छल। तप सं हुनका मे आत्मसंयम, आत्मचिंतन, आत्मविश्वास, आत्मविश्लेषण, न्याय प्रवृत्ति, विवेक भावना अ आध्यात्मिक वृत्तिक उदय होयत छल।
कुलपति ऋष्यश्रृंग अपने यज्ञ देवताक साकार रूप छल। कहल जायत अछि जे ओ जीवनभरि यज्ञ केलक आ करौलक। ओ एहन कतेक रास यज्ञक संपादन करैलक जकरा लेल मात्र वहि टा सक्षम छल। गृहस्थक लेल ओहि युग मे पांच महायज्ञक विधान छल। ओ यज्ञ छल, व्रह्म यज्ञ, पितृ यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ आ नृयज्ञ।3
पहिलुका विद्वान ऋषिक प्रति श्रद्धा व्यक्त करैत वेद मंत्रक पाठ कऽ अप्पन बौद्धिक उत्कर्ष करब आ याज्ञिक समारोहक अवसर पर स्वाध्यायक व्यवस्था करब ब्रह्मयज्ञक विधानक अंतर्गत छल। पितरक श्राद्ध तर्पण सभ पितृ यज्ञक अंतर्गत संपन्न होयत छल। देवताक लेल अग्निक आहुति आ इंद्र, अग्नि, प्रजापति, सोम, पृथ्वी अदि देवताक नाम अग्नि मे समिधा प्रदान करव देव यज्ञ छल। अनिष्टकारी प्रेतात्माक तुष्टिक लेल भूत यज्ञ आ अतिथि देवताक सत्कार नृयज्ञ छल।
वेदक मंत्रद्रष्टा ऋष्यश्रृंग
वेदक महत्ता सार्वदेशिक आ सार्वकालिक अछि। सभ्यताक उषाकाल सं वेद समादृत आ अपौरुषेय अछि। अहि देशक प्रज्ञा पर्वत सं निकलल पतित पावनी गंगाक संस्पर्श पात्र सं सभटा विश्व चमत्कृत आ आह्लादित भेल अछि। शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मणक स्पष्ट कथन अछि,
'यावन्तुं ह वै इमा पृथिविं वित्तेन पूर्ण ददत लोकं जयति त्रिभिस्तावनां जयति: भूयांसं च अक्षयं च य एवं विद्वान: अदृश्व: स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्याये अधेयतव्य:।'
शतपथ व्राह्मण 11-5-6-11
(अर्थात धनसं परिपूर्ण पृथ्वीक दान करहि सं जतेक फल भेटैत अछि, वेदक अध्ययन से सेहो ओतेक फल भेटैत अछि। ओतबै टा नहि, ओकरो से वढि़ के मनुख अविनाशशाली अक्षय लोक कऽ प्राप्त करैत अछि। ताहि सं वेदक स्वाध्याय करब वड़ आवश्यक आ उपादेय अछि।)
पुरान कालक ऋषि वड़ निष्ठावान आ तप:शील मनुख छल। समाधिस्थ अवस्था मे ओ अप्पन परिवेशक अतिक्रमण कऽ मंत्रक दर्शन केलक। ताहि सं ऋषि वेदमंत्रक रुाष्टा नै, द्रष्टा कहल जायत अछि। ऋग्वेदक प्रत्येक मंत्रक द्रष्टा कियो नै कियो ऋषि अछि। हुनकर संख्या लगभग तीन सौ टा अछि। अहि मे किछु ऋषिक नाम अछि4-
मधुच्छन्द, शुन:शेष, कण्व, गौतम, अगस्त्य, गुत्समद, विश्वामित्र, ऋषभ, देवश्रव, वामदेव, अत्रि, पृथु, कृष्ण, अपाला, देवल, भृगु, च्यवन, सुमित्र, अग्निपूर्य, वर्हिष, सुदास, श्रष्यश्रृंग, प्रचेता, उध्र्वग्रीवा, अधमर्षण, भारद्वाज, वीतहव्य, गर्ग, वशिष्ठ, मेधातिथि, वत्स, शशकर्ण, नारद, विश्वमना, नाभाग आदि। ई पुरुष सभक अलावा स्त्री सेहो मंत्रद्रष्टा छल। अहि मे लोपमुद्रा, गौरी, जुहू, शची, घोषा, लोमशा, विश्वधारा आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। ई ऋषि सभ अप्पन मंत्रमे मूलत: ईश्वरक दिव्य विभूतिक प्रति अप्पन श्रद्धात्मक उद्गार व्यक्त केने अछि।
यजुर्वेदक विभाजन
चतुर्वेद मे यजुर्वेदक संबंध यज्ञानुष्ठान से अछि। अहि मे संकलित मंत्रक विषय यज्ञ विधिक संपादन करब अछि आ कोन यज्ञ मे कोन कांडक मंत्रक व्यवहार करबाक चाहि, ओकर विधि यजुर्वेद मे देल गेल अछि। ताहि सं वेद कर्मकांड प्रधान अछि। वर्षक गणना ते कठिन अछि, मुदा ऋष्यश्रृंग सं लगभग पांच पीढ़ी पहिने यजुर्वेदक विभाजन भऽ गेल छल, जे कृष्ण यजुर्वेद आ शुक्ल यजुर्वेदक नाम से जानल जायत अछि।
अहि संबंध मे विष्णु पुराणक तृतीय अंशक अध्याय पांच मे एकटा कथा अछि। महर्षि वैशम्पायन यजुर्वेद जेहन वृक्षक सत्ताइस शाखाक रचना केने अछि। ओकरा अप्पन शिष्य के पढ़ौलक। हुनकर परम धार्मिक आ हुनकर सेवा मे तत्पर रहि बला शिष्य याज्ञवल्क्य छल। एकटा काल मे सभटा ऋषि सभ ई नियम बनौअलखिन जे कियो ऋषि महामेरु पर स्थित हमर अप्पन समाज मे शामिल नहि होयत ओकर सात राति के भीतर ब्रह्महत्याक पाप लागत। अहि तरह जाहि काल के ऋषि सभ नियत केने छल,ओकर वैशम्पायन अतिक्रमण कऽ देलक। एक बाद ओ प्रमादवश अप्पन भानजाक हत्या कऽ देलक। एकर बाद ओ अप्पन शिष्य सं बाजल, अहां सभ कोनो तरहक विचार नै कऽ हमरा लेल ब्रह्महत्याक पाप के दूर करहि बला व्रत करू।
अहि पर याज्ञवल्क्य बाजल, 'भगवन! ई सभ ब्राह्मण बड़ निस्तेज अछि। हुनक कष्ट दैके कोन जरूरत अछि? हम असगरे अहि व्रत अनुष्ठान करब। अहि सं वैशम्पायन तमसा गेल। ओ बाजलखिन, अहां ई सभ ब्राह्मणक अपमान केने छी। अहां जे किछु हमरा सं पढ़ने छी,ओ छोडि़ दिओ। अहां अहि द्विज श्रेष्ठ के निस्तेज कहैत छी। हमरा अहां जेहन आज्ञा भंगकारी शिष्यक कोनो प्रयोजन नहि अछि।
'लिओ, हम जे किछु अहां से पढ़ने छी, ओकरा घुरा रहल छी'।
ई कहि याज्ञवल्क्य रुधिर सं भरल मूर्तिमान यजुर्वेद वमन कऽ हुनका घुरा देलक आ स्वेच्छा सं चलि गेल। याज्ञवल्क्य के वमन करल यजुश्र्रुती के दोसर शिष्य तीतर बनिके ग्रहण कऽ लेलक। ताहि सं ई सभ तैत्तिरीय कहौलक।
याज्ञवल्क्य यजुर्वेदक प्राप्तिक इच्छा सं संयम चित्त सं सूर्यनारायणक स्तुति करलक। भगवान सूर्य अश्व रूप मे प्रगट भऽ कऽ अभीष्ट वर मांगहि लेल कहलक। तखन याज्ञवल्क्य हुनका प्रणाम कऽ बाजल, अहां हमरा ओहि यजुश्र्रुतीक उपदेश दिये जे हमर गुरु नहि जानैत अछि। हुनकर एहन कहला पर सूर्य हुनका 'अयातयाम' नामक यजुश्र्रुतीक उपदेश देलक, जकरा हुनकर गुरु वैशम्पायन सेहो नहि जानैैत छल।
माध्यन्दिन शाखा
याज्ञवल्क्य ओहि वाज श्रुत के अप्पन कण्व आदि पंद्रह शिष्य के प्रदान करलक। ओहि मे मध्यन्दिन महर्षि द्वारा प्राप्त यजुर्वेदक विशेष शाखा के माध्यान्दिन कहल जा लागल। शुक्ल यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक मंत्र के महर्षि कात्यायन महर्षि कश्यप के, महर्षि कश्यप महर्षि विभाण्डक के आ महर्षि विभाण्डक ऋष्यश्रृंग के देलक। ऋष्यश्रृंग अहि मंत्रक प्रखर दृष्ट छल। अहि मंत्रक सं अे राजा रोमपादक एतय वृष्टि यज्ञ केने छल। ऋष्यश्रृंग अहि शाखाक मंत्रद्रष्टाक संग अहि शाखा स्वरूपक ओत-प्रोत ब्रह्मनिष्ठ छल, जाहि सं ओ जतय कत्तौ जायत छल, ते हुनकर पदार्पणक संग ओहि भूमि पर इंद्र देवता वर्षा कऽ दैत छल।5
वाजसेनी पुत्र याज्ञवल्क्य द्वारा नष्ट हय के कारण शुक्ल यजुर्वेदक अहि संहिताक नाम वाजसनेय संहिता पड़ल। अहि प्रकार यजुर्वेदक तैत्तरीय आ वाजसनेय अहि दोनों शाखाक निर्माण भेल। वाजसनेय संहिता मे राष्ट्रक उन्नति आ ओकर सुख-शांतिक लेल बड़ रास भावना सभ अभिव्यक्त केने अछि। 'हे पितृदेवो! नमस्कार! अहांक कृपा से वसंत ऋतु राष्ट्र के सुखी करय'। 'हे पितर नमस्कार! अहांक कृपा से देश मे ग्रीष्म अनुकूल रहय'।6
ऋतु सभके राष्ट्रक अनुकूल बनाबै आ जल प्रबंधन मे विशेषज्ञता प्राप्त करय बला ऋष्यश्रृंग अप्पन समय मे मंत्रक सिद्धता प्राप्त कऽ चुकल छल। बाल्मीकिक काल मे शुक्ल यजुर्वेदक बड़ प्रभाव छल। ऋष्याश्रम मे एकर गहन अध्ययन होयत छल। मुदा ओहि काल तैत्तिरीयक शिक्षालय सेहो कार्यरत छल। अयोध्यामे एहन एकटा शिक्षण संस्थानक उल्लेख वाल्मीकि केने अछि। अयोध्या काण्ड (32-15,16) मे राम लक्ष्मणक आदेश दैत अछि, लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तरीय शाखाक अध्ययन करहि वला व्राह्मण के जे आचार्य आ संपूर्ण वेदक विद्वान अछि, संग ही जाहि मे दान प्राप्तिक योग्यता अछि आ जे माता कौशल्याक प्रति भक्तिभाव राखि प्रतिदिन हुनका लग आवि के हुनकर आशीर्वाद प्रदान करैत अछि, हुनका सवारी, दास, दासी, रेशमी वस्त्र आ जतेक धन सं व्राह्मण संतुष्ट हुयअ, ओतेक धन खजाना से दियाविओ।
आश्रम व्यवस्था
रामायण कालक विभिन्न ऋष्याश्रमक अध्ययन सं ई ज्ञात होयत अछि जे आश्रम मे गुरुक वाद आचार्य आ कुलपतिक गणना केल जायत छल। कुलपतिक अधीन दूर-दूर ठाम सं आयल सैकड़ों छात्र विद्याध्ययन करैत छल। श्रोत्रियक संज्ञा ओहि अध्यापक वर्ग कऽ देल जाय छल जिनकर तामसिक वृत्तिक परंपरागत वैदिक अध्ययन आ तपस्या सं शमन भऽ चुकल अछि। तापसगण तपोनिरत रहैत आ अपना लग आवहि वला के शिक्षा दैत छल। ओ वनवासी छल अ हुनकर उपदेश अरण्यक मे लिपिवद्ध अछि। उपाध्याय लोक शुल्क लऽ कऽ शास्त्र विशेष वढ़ावैत छल। ललित कलाक अध्यापक शिक्षक छल। तुंवरू अप्सराक गान-शिक्षक छल। एकर अलावा, आश्रम मे परिव्राजक सेहो रहैत छल। ओ निवृत्ति मार्गी होयत छल। ओ अवकाशक काल घूमि-घूमि कऽ निर्वेद आ वैराग्यक जीवनक सर्वोच्य ध्येयक तरहे प्रचार करैत छल।7 दोसर आश्रमक तरहे अहि ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे अध्यापक के कोनो वान्हल आय नहि छल। शिष्य सं नियत शुल्क लै के प्रथाक प्रमाण नै भेटैत अछि। एतय गुरु पुरोहित सेहो होयत छल। अहि सं यज्ञ याज्ञादिकक अवसर पर दान दक्षिणा पर्याप्त भेट जायत छल। एकर अलावा, अतिरिक्त आश्रम के कृषि सं सेहो पर्याप्त आय होयत छल। आश्रमक छात्र मे तपस्वी जना त्याग आ सहिष्णुता अपेक्षित छल। स्नातक वनहि धरि हुनकर नैष्ठिक व्रह्मचर्य व्रतक पालन करव अनिवार्य छल। अहि आश्रम मे ज्ञान-विज्ञानक अजरुा धारा वहैत छल। विद्यार्थी पिता-पुत्रक परंपरा सं वरावर आवैत रहैत छल। अहि आश्रम मे कतेक रास परिवारक कतेक पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कऽ चुकल छल। अहि आश्रम मे मुनि-शिक्षक अप्पन स्त्री (मुनि पत्नय:) आ संतान (मुनि दारका:) संग रहैत छल।
प्राचीन भारतक इंद्र खंडक (पूर्वी भाग) दूटा आश्रम मिथिलाक सीरध्वज जनकाश्रम आ अंगक उत्तरवरिया भाग स्थित कज्जल वनक ऋष्यश्रृंग आश्रम तत्वक विवेचन, विश्लेषण, चिंतन, अनुसंधान आ निर्णयक लेल प्रसिद्ध छल। तहियौका भारतक सभ आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षा देल जायत छल। स्वयं राम वशिष्ठाश्रम सं दोसर विषयक संग संग्रामिकता मे स्नातक आ विश्वमित्रक सिद्धाश्रम से स्नातकोत्तरक शिा पायल छल। आश्रम मेे संग्रामिकताक शिक्षा शत्रु (असुर) के संहार शक्ति के चुनौती दैक लेल छात्र के देल जायत छल। जतय-जतय असुरक सैन्य छावनी छल ओतय स्थित आश्रम मे संग्रामिकताक उच्चा शिक्षा दैक व्यवस्था छल।
ऋष्यश्रृंग आश्रम आसुरी गतिविधि सं दूर एकांत प्रदेश मे छल। ताहि सं अहि आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षाक कोनो महत्व नहि छल।
यज्ञ
ऋष्यश्रृंग अपने वृष्टि यज्ञक अद्वितीय आचार्य छल। अप्पन ससुर अंग नरेश रोमपादक राज्य मे कहियो अकाल नहि पड़य, एकरा लेल ओ शुक्ल यजुर्वेद संहिताक वाजसेनीय मध्यन्दिन शाखा सं कतेक रास ऋषि-मुनिकऽ साक्षी राखि सफल वृष्टि यज्ञ केने छल।
वैदिक युग मे यज्ञक सवसे वेसी महत्ता छल। यज्ञ अग्नि संपन्न होयत छल। उत्तर वैदिक काल मे सेहो यज्ञक महत्व कम नहि छल। देवता आ मनुखक वीच संवंध स्थापना मे यज्ञक महत्वपूर्ण स्थान छल। उत्तर वैदिक काल धरि कतेक रास यज्ञ प्रचलित भऽ गेल छल जहि मे अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चतुर्मास्य, आग्रयण, निरूढ़, सौत्रामणी, पिण्डपितृ यज्ञ, सोम यज्ञ, षोडशी, अतिरात्र, पुरुषमेध आ पंचमहायज्ञक अलावा गवामयन, वाजपेय, राजसूय आ अश्वमेध जेहन यज्ञ तहियौका भारतीय समाज मे मान्य छल। यज्ञ आर्यक मिलन स्थल सेहो छल। ऋष्यश्रृंगाश्रम मे यज्ञक संपादनक विशेष पाठ¬क्रम छल। कज्जल वनक पुण्याश्रम वेद ध्वनि सं गुंजायमान छल।8
सभ्यताक समन्वय
उत्तर वैदिक कल मे भगवान शिवक महत्ता वड़ वढ़ल छल। ओ युग आर्य आ आर्येतर जाइतक सम्मिलन, सम्मिश्रण आ समन्वयक युग छल। भगवान शिव आर्येतर जाइतक अराध्य देव छल। हुनका दरकिनार कऽ समन्वित आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक गठन असंभव छल। एहन स्थिति मे युगद्रष्टा ऋषि केर भगवान शिव दिस आकृष्ट होयव स्वाभाविक छल। वैदिक रुद्र जे उपहन्तु (ध्वंसक) छल, ओ उत्तर वैदिक काल मे कल्याणकारी शिव वनि गेल। वेद मे रुद्र सं कतेक रास रुद्र के उद्भूत मानल गेल अछि, जे भगवान शिवक व्यापकता कऽ रेखांकित करैत अछि। ताहि सं अहि रुद्र के गणपति, कुम्भकार, कर्मकार, रथकार, वाजीगर आ निषाद जेहन दलित, उपेक्षित आर्येतर जाइतक स्वामीक तरहे स्वीकार करल गेल अछि। अहि तरहे भगवान शिव उपर्युक्त शोषित, दलित, उपेक्षित आ अनार्य जाइतक उपास्य आ आराध्य देव छल।9 तत्कालीन तत्वदर्शी ऋषि अहि आर्येतर जाइत के आर्य सभ्यता संस्कृतिक महासिन्धु मे विलीन कऽ दैक लेल संकल्पित छल। एकरा लेल ओ शिवक सामान्य देवक तरहे नहि मुदा महादेवक रूप मे पूजा करलक।
अनार्यक परमपूज्य आराध्य देवता रहैत भगवान शिवक प्रतिष्ठा, महानता आ व्यापकताक कारण ई छल जे ओ अप्पन ऐश्वर्य सं देवता के, शक्ति सं असुर के आ योग सं प्राणि सभके पराभूत केने छल।10 ई निर्विवाद अछि जे भारतीय सभ्यता आ संस्कृतिक गठन मे भगवान शिवक विराट भूमिका अछि। जौं शिव के अहि सं अलग कऽ देल जाय ते अहि सभ्यता, संस्कृति के स्थित हेवाक लेल कोनो आधार नहि भेट सकत।
ऋष्यश्रृंग आश्रमक समस्त क्षेत्र मे व्रात्यक निवास छल। अथर्ववेदक (11-2-7) अनुसार देवता सभ महादेव के विभिन्न दिशाक व्रात्यक स्वामी नियुक्त केने छल। संभवत: अहि प्रतीकक स्वरूप भगवान विष्णु एतय व्रह्मशिला पर शिवलिंगक स्थापना केने छल। वराहपुराणक उत्तराद्र्धक एकटा पुरा कथा मे अहि तथ्य कऽ रेखांकित करल गेल अछि।
विष्णु द्वारा स्थापित शिवलिंग के ऋष्यश्रृंग फेर सं पुनर्जागृत करलक। एकर उल्लेख शिव पुराणक चतुर्थ रुद्र संहिताक सातम श्लोक मे भेल अछि। एकर अनुसार, कौशिकी कात स्थित शिव धाम मे दधीचिक रणभूमि मे श्रृंगेश्वर, वैद्यनाथेश्वर आ जपेश्वर नामक शिवलिंग प्रसिद्ध अछि।
'श्रृंगेश्वरश्च नाम्नावै वैद्यनाथ स्तथैव च।
जप्याश्वरस्तथा ख्यातौ यो दधीचिरण स्थले।'
चौवीस हजार श्लोक वाले वायु पुराणक एकटा अंश शिवपुराण अछि। ऋष्यश्रृंग द्वारा पुनर्जागृत केल जाय वला भगवान शिवक ई इष्टलिंग उत्तर वैदिक काल सं आय धरि मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय वा पूजनीय अछि।
दूर ठाम धरि फैलल विशाल व्रह्मशिला सं ई इष्टलिंग जुड़ल अछि। एखुनका शिवलिंग सं तीन गुना वेसी मोट ओ दस फीट नीचा व्रह्मशिला धरि अछि। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत अछि। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर उत्कीर्ण अछि। ऋष्यश्रृंग अहि शिवलिंग के पुनर्जागृत कऽ आर्य आ आर्येतर संस्कृति कऽ एकाकार कऽ देने छल। ऋष्यश्रृंग द्वारा एकरा पुनर्जागृत करहि के कारण ई इष्टलिंग श्रृंगेश्वरक (या सिंहेश्वर) नाम सं विख्यात भेल।
दक्षिात्य मे तपस्या
उत्तर वैदिक काल धरि आर्य संपूर्ण उत्तर भारत मे पसैर चुकल छल। अे कतेक रास समृद्ध जनपदक सेहो स्थापना केलक। उत्तर भारत मे कतेक रास ऋष्यश्रृंग आश्रम स्थापित छल। कनि-कनि असुर दक्षिणापत्य दिस सिमटैत गेल। एतय मुख्यत: हुनकरे शासन छल। तकर वादो आर्य सभ्यता आ संस्कृति के दक्षिणात्य मे पसारैलक उद्देश्य सं कतेक रास ऋष्याश्रम मिशनरीक तरहे काज कऽ रहल छल। अहि ऋष्याश्रम के समय-समय पर निरीक्षण करैक दायित्व भगवान शिव पर छल। ओ अहि ठाम अवाध आवैत-जायत छल। क्याकि ओ असुर सभहक सेहो अराध्य देव छल। राम सवसे पहिलुक आर्य देवता छल जे दक्षिणात्व मे पइर राखलक। ओ एतय कार्यरत आर्य ऋष्याश्रम के असुर सं अभय कयलक। निशिचर हीन करौं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह।
उत्तर भारतक ऋषि सेहो दक्षिणात्य जा कऽ तप करैत छल। तपक लेल दक्षिणात्यक ठाम वड़ उपयुक्त चल। ऋष्यश्रृंग सेहो दक्षिणात्यक जे ठाम मे अखण्ड तपस्या केने छल ओ तप:पूत स्थल आय श्रृंगेरी क्षेत्रक नाम से चर्चित अछि। श्रृंगेरी ग्राम, श्रृंगेरी पर्वत आ श्रृंगेरी तालाव आययो ओहि महान तपस्वीक तपस्याक साक्षी अछि। हजार वरखक वाद आद्य शंकराचार्य अप्पन पहिलुक मठ श्रृंगेरी मे स्थापित केने छल आ ओतय सं दिग्विजयक लेल अप्पन अभियान शुरू केने छल। शंकराचार्य ओहि ठाम पर देखलक जे प्रकृति विरोध धर्म प्रेम, सेवा आ दयाक आगू प्राणी कोन तरह अप्पन स्वाभाविक धर्म के विसुरि के कल्याण काज मे निरत भऽ जायत छल। थाकल-मांदल योगी शंकर एकटा वटवृक्षक नीचा वैसल छल। वड़ गर्मी चल। आपसी द्वेष के विसुरि के एकटा नेवला आ सांप खेल रहल छल। ओतय सांप अप्पन आहर एकटा वेंग कपा मुंह सं पकडि़ पइन मे छोडि़ दैत छल। ओ विस्मित भऽ जायत अछि। ई ऋष्यश्रृंगक तपस्या स्थली छल, जकर महत्ता आय धरि दृष्टिगोचर होयत अछि। अे महान ऋष्यश्रृंगक प्रति श्रद्धावनत भऽ कऽ अप्पन शिष्य सं कहै छथिन, जतय व्रह्म मे अप्पन अंतकरण के लगा दै वला ऋष्यश्रृंग आय धरि तपस्या कऽ रहल अछि। आ जतय स्पर्श मात्र सं कल्याण दहि वला तुंगभद्रा सुशोभित होयत अछि, जतय अभ्यागत पुरुषक पूजा सं कल्पवृक्ष के सेहो लजावै वला, समस्त वेद कऽ पढ़य वला, सैकड़ों टा यज्ञ सं प्रसन्न हैय वला शान्तचित्त सज्जन लोक सभ निवास करैत अछि।11
शंकराचार्य अहि तपस्थलीक स्तुति करलक आ ओतय विद्याग्रहण मे समर्थ विद्वान शिष्य के अप्पन मुख्य भाष्यक अध्ययन सेहो करैलक। एतय सं वौद्ध के सेहो शास्त्र से पराजित कऽ सनातन धर्मक पुनस्र्थापनाक लेल दिग्विजयक लेल चलल छल शंकराचार्य। अभियानक पूर्व आचार्य शंकर श्रृंगेरी मे अप्पन पहिलुक मठ निर्माण कऽ वेदांत विद्यापीठक स्थापना कएलक। एत्ते सं सनातन धर्मक प्रचारार्थ मीमांसक व्रह्मचारीक समुदाय सन्यास सम्प्रदाय मे दीा ग्रह करैत छल।12 ऋष्यश्रृंग सेहो अप्पन कालक अद्वितीय मीमांसक छल। ओ ऋषि कुल आश्रम मे कतेक ऋषिक आत्मज आ मानस पुत्र के मीमांसाक अध्ययन करावैत रहल।
श्रृंगवेरपुर वृतान्त
ऋष्यश्रृंग अप्पन प्रताप सं उत्तर पश्चिम गंगाक वाम कात पर सेहो तपस्या करले छल। ई ठाम निषाद शासकक अधीन छल। आजुक काल मे ई ठाम इलाहावाद-उन्नाव राजमार्ग पर स्थित अछि। एतय गंगा कात पर एकटा वड़ पैग टील अछि जकर लगभग आधा हिस्सा गंगा मे कटि चुकल अछि। यहि ठाम अछि ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि श्रृंगवेरपुर। एतय मंदिर मे ऋष्यश्रृंग आ मां शान्ताक भव्य मूर्ति स्थापित अछि। रामायण मे श्रृंगवेरपुरक वड़ महत्व अछि। अप्पन वनवासक काल श्रीराम अप्पन अनुज आ स्त्रीक संग एतय नाव सं गंगा पार केने छल। पुरवासी सभक संग भरत जखन राम मे मिलैक लेल चित्रकूट गेल छल, तखन ओ श्रृंगवेरपुर आयल छल। कालिदासक रघुवंश आ भवभूतिक उत्तर रामचरित मे अहि पुण्य स्थलक गौरवपूर्ण उल्लेख अछि। तुलसीदास एकर सिंगरौरक प्राचीन नाम सं उल्लेख केने अछि-
'केवट कीन्ह वहुत सेवकाई
सो जामिनी सिंगरौर गंवाई।'
ई ठाम ऋष्यश्रृंगक तपस्या भूमि अछि। ऋष्यश्रृंग मंदिर सं आध किमी दूर गंगा मे विभाण्डक कुण्डक नाम सं घाट सेहोवनल अछि।
श्रृंगवेरपुर निवासी राजा रामदत्त सिंह (18वीं सदी) आध्यात्म-रामायणक टीक मे एतय ऋष्यश्रृंग आश्रम हेवाक संग अहि महर्षिक जीवनक अन्यान्य वृतान्त के अहि ठाम सं जोड़वाक यत्न केने अछि। हमर विचार सं अप्पन जन्मभूमिक प्रति मोह हेवाक कारण राजा एहन केने होयत। श्रृंगवेरपुर के ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि मानवाक एतिहासिक भूल अछि क्याकि महाभारत मे स्पष्ट लिखल अछि-
'एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ
विश्वामित्राश्रमौ रम्य एश चात्र प्रकाशते।
आश्रमश्चैव पुण्याख्य: काश्यपस्य महात्मन:।
ऋष्यश्रृंग सुतौ तस्य तपस्वी संयतेन्द्रिय:।'
कौशिकीक कात पर जतय विश्वामित्रक आश्रम छल, ओतय पुण्याश्रम मे महर्षि काश्यपक जितेन्द्रिय वंशज ऋष्यश्रृंगक आश्रम छल। एक ऋषिक अप्पन मुख्य आश्रमक अलावा कतेक ठाम हुनकर उपआश्रम होयत छल।
पुण्याश्रम मे द्वादश वर्षीय यज्ञ
ऋष्यश्रृंगक मुख्य आश्रम कौशिकीक कात पर पुण्याश्रम मे छल। ओ जतय-जतय तप करलक ओतय उपाश्रम वनौलक। ओ अप्पन जीवन मे कठिन तप आ योग साधनाक संग यज्ञ के मोक्ष प्राप्तिक साधना वनैलक। ओ समस्त भारतक पवित्र स्थलक सेहो भ्रमण केलक।
ओ कतेक रास कठिनतम यज्ञ केलक, जाहि मे द्वादश वर्षीय यज्ञ सेहो छल। अहि यज्ञक वड़ पैग मार्मिक वर्णन भवभूति अप्पन उत्तर रामचरितक प्रथमांक मे केने अछि।
अयोध्या मे सभ दिन कोनो नै कोने उत्सव हैत छल। अहि वीच एकटा विदेशी अयोध्या आवैत छल आ राजधानी मे उत्सव नै हैत देखि के एकर कारण जानैल चाहैत अछि। नट एकर उत्तर दैत अछि जे उत्सव नै हैक कारण अछि जे रामक माता महर्षि वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग अप्पन दामाद ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे यज्ञ देखहि लेल गेल छथिन।
'वशिष्ठाधिष्ठिता देव्यो गता रामस्य मातर:।
अरुन्धती पुरस्कृष्य यज्ञे जामातुराश्रमम्।'
ई सुनि के ओ विदेशीक प्रश्नाकुलता आरो वढि़ जायत अछि। ओ पूछि दैत अछि जे ई जमाता के अछि? नट उत्तर दैत अछि जे राजा दशरथक पुत्री शान्ताक पति अछि ऋष्यश्रृंग, हुनके कते हैवला यज्ञ मे भाग लैक लेल रामक माता सव गेल छथिन।
'विभाण्डक सुतास्ताम ऋष्यश्रृंग उपयेमे
तेन च साम्प्रतं द्वादश वार्षिक सत्र माख्यं।
तदपुरोधात कठोर गर्भापति वधूं जानकी विमुप्य
गुरुजनस्तत्र: गत:।'
ई स्पष्ट अछि जे रामक माता ऋष्यश्रृंग के अप्पन जमाता मानैत अछि। यहि कारण अछि जे गर्भवत सीता के छोडि़ के अप्पन पुत्री शान्ता आ जमाता ऋष्यश्रृंगक प्रति अकूत स्नेहक कारण माता ऋष्यश्रृंगक अश्रम मे पधारैत अछि।
मुनि अष्टावक्र सेहो यज्ञ मे उपस्थित छल। ओ अहि महान यज्ञक समाचार लऽ कऽ पहिने अयोध्या घुरैत अछि। राम शान्ता के अप्पन पैग वहीन आ ऋष्यश्रृंग के अप्पन पैग वहनोई जेहन सम्मान दैत यज्ञ कऽ लऽ कऽ पूछैत अछि
'निर्विघ्न: सोमपीथी आवुंते मे
भगवान ऋष्यश्रृंग आर्या च शान्ता।।'
राम ऋष्यश्रृंग के आवुंत (वहनोई) आ भगवान (पैग) आ शान्ता के पैग वहीन (आर्या) जेहन सम्मान दैत अछि।
सीता सेहो कुशल पूछैत अछि,
अवि कुशलं स जमातु अस्स।
एतवे टा नै सीता के ईहो जिज्ञासा अछि जे ऋष्यश्रृंग के हुनकर याद आवैत अछि की नै?
अहमेव सुमरेति?
अष्टावक्र एकर उत्तर त्वरित दैत अछि
अथ किम्? (आैर क्या?)
मुुनि अष्टावक्र सीताक लेल हुनकर ननद शान्ता के ई प्यार भरल संदेश सेहो राम के दैत अछि जे सीताक गर्भावस्थाक काल जहि वस्तुक इच्छा हुए, ओ हुनका उपलव्ध कराओल जाय।
गर्भ दोधेअस्या भवति सोऽवस्यम चिरात सम्पादयित्व।
एकर संगे अष्टावक्र सं संदेश भेजकऽ ऋष्यश्रृंग सलहज के यज्ञ मे नहि वजावैक कारण वुझावैक संग संवोधोचित परिहास सेहो कऽ लैत अछि
वत्से! कठोर गर्भेति नानितासि।
वत्सोऽपि रामभद्रस द्विनोदार्थमेव स्थापित:। तत्पुत्र पूर्णोत्संगामायुष्यति दक्ष्याम्।
अर्थात वत्से! (वच्ची) गर्भवती हेवाक कारण अहां एतय नहि आवि सकलहुं आ वत्स राम ते अहांक मनोरंजनक लेल अयोध्यामे अछियै। हम ते अहां के पुत्र सं भरल गोदवाली देखव। ऋष्यश्रृंग द्वारा राम के वत्स आ सीता के वत्से कहिके पुरारव सं स्पष्ट अछि जे दूनूक प्रति ऋष्यश्रृंगक छोट साढ़ आ सलहजक प्रेम छल।13
ई द्वादश वर्षीय महायज्ञ कौशिकी तट स्थित ऋष्यश्रृंगक मूल आश्रम मे भेल छल। किछु विद्वान एकरा रेवा नदी (नर्मदा) आ समुद्रक संगम स्थल पर हय के गप करैत अछि।14 जे संदिग्ध अछि। ओहि साधन विहीन युग मे अप्पन मूल आश्रम सं हजार मील दूर एतेक वृहद दीर्घकालीन कठिन यज्ञक संपादन करव उपयुक्त नहि जानि पड़ैत अछि। ओहि ठाम पर अहि यज्ञक कोनो चिह्न सेहो नहि अछि। कोनो ठोस वहिर्साक्ष्य सेहो नहि अछि जे सिद्ध कृ सकय जे यज्ञ अमुक ठाम पर भेल छल। मुदा ऋष्यश्रृंगक कौशिकी तट स्थित मूल आश्रम अहि महान यज्ञक साक्षी अछि। आश्रमक लग कोशीक कात मे सतोखर गाम वसल अछि। एतय हजारों वरख पुरान सात विशाल यज्ञ कुण्ड तालावक रूप में एखनो अछि। दू टा कुंड ते कोशी के पेट मे चलि गेल मुदा पांच टा एखनो अछि। किछु दशक पहिने अहि कुंडक जीर्णोद्धार करय लेल खोदल गेल ते ओहि मे राखक वड़ मोट-मोट परत निकलल छल। परत एतेक मोट छल जे ओ कोनो एक दिन या एक माहक यज्ञक राख नहि भऽ सकैत अछि। ई निश्चित रूप सं वरख भरि चलल यज्ञक राख होयत। सात कुंड एक संग रहवाक कारण एकरा सप्त पुष्कर कहल जायत छल। कुंड पुष्करेक रूप छल। वहि सप्त पुष्कर आव सतोखर वनि गेल अछि।
ऋष्यश्रृंग जेहन महान वैज्ञानिक द्वारा संपादित अहि तरहक यज्ञ कतेक अर्थ मे महत्वपूर्ण अछि। ई आैषधिक अनुसंधान, शोध आ परीक्षण सेहो अप्पन यज्ञशाला मे करैत छल। आयुर्वेदिक गुण सं युक्त समिधाक चयन आ प्रयोग, वनस्पतिक गुण-दोष विवेचन आ हुनकर व्यवहारक गवेषणात्मक अध्ययनक लेल अहि ठामक अतिरिक्त आैरो ठाम ओ एहि तरहक महान यज्ञ करने होयत ते ऋष्यश्रृंग जेहन महान याज्ञिकक लेल असंभव नै। मुदा सभी कोण सं परीक्षणक पश्चात ई निर्विवाद अछि जे ओ ऋष्यश्रृंग आश्रम (वर्तमान सिंहेश्वर) मे द्वादश वर्षीय यज्ञ केने छल, जाहि मे आर्यावर्तक सभ ऋषि-मुनि भाग लेने छल। संगेसंग अयोध्या सं रामक माता, वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग यज्ञ मे भाग लैक लेल आयल छल। वारह वरख तक अनवरत ई क्षेत्र वेदमंत्रक समूह गान सं गूंजैत रहल छल।
महानदीक प्रगट हेवाक
प्राकृतिक जल रुाोत के सुव्यवस्थित कऽ ओहि सं सिचार्ईक व्यवस्था करहि मे ऋष्यश्रृंग सिद्धहस्त छल। एखुनका छत्तीसगढ़क सिहोवा मे महानदीक उद्गम अछि। ऋष्यश्रृंग सं पहिने अहि नदीक अस्तित्व नहि छल। विशाल पत्थर सं झांपल उद्गम के भगीरथक प्रयास सं ई ऋषि नदी मे अवतरित केने छल। परीक्षण सं हुनका ज्ञात भेल जे सिहोवाक शिला मे अगाध जल रुाोत अछि। जौ जल रुाोतक निकासी आ वहाव सुव्यवस्थित कऽ देल जाय, ते ई एकटा वड़ पैग नदीक रूप लऽ सकैत अछि।
ऋष्यश्रृंग एहने करलक। ओ लोककल्याण, लोक रंजन आ लोक मंगलक लेल जनसहयोग सं अहि दुष्कर काजक संपादन करलक। अहि प्रकार महानदी प्रकट भेल। किंवदंति ते ई अछि जे हुनकर कमंडल मे पुत्रेष्ठि यज्ञक वचल मंत्रसिक्त जल छल। ओहि से ऋष्यश्रृंग महानदीके प्रगट केलक।15 कथा जे भी हिए, सिहोवा एखुनका रायपुर जिला मे अचि। ई दण्डकारण्य क्षेत्रक प्रमुख स्थान अछि। सिहोवा पर्वत शिखर पर ऋष्यश्रृंगक मंदिर अछि आ माता शान्ताक नाम पर एकटा गुफा सेहो अछि। प्राकृतिक वातावरण सं संपन्न ई एकटा दर्शनीय स्थल अछि। महानदीक उद्गमक रमणीयता ते अकथनीय अछि। मध्य प्रदेश मे चांदा (चन्दनपुर) मे सांदक या भाण्डक आश्रम अछि जे विभाण्डकक विगड़ल रूप अछि। सोयतकलां (शाजापुर) मे ऋष्यश्रृंगक मंदिर सेहो अछि। वेहट (जिला ग्वालियर) ऋष्यश्रृंग गुफा मे हुनकर मूर्ति स्थापित अछि। उज्जैन मे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि, जतय वर्षाक लेल हुनकर मूर्ति वनाके अनुष्ठान केल जायत अछि।
वंश विस्तार
ऋष्यश्रृंगक वंश विस्तार सेहो भेल अछि। हुनकर पुत्र सारंग ऋषि छल। ओ वड़ तपोनिष्ठ छल। ओ वेदक गहन अध्ययन केने छल। हुनकर चारि टा पुत्र भेल। चारो पुत्र उग्र, वाम, भीम आ वामदेव आजन्म व्रह्मचर्य व्रत धारण कऽ योग साधनारत भऽ कऽ व्रह्म मे लीन भऽ गेल। शेष चारि पुत्र वत्स, धौम्यदेव, वेददृग आ वेदवाहु व्रह्मचर्य पूर्वक गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कयलक। हुनकर वंशज शिखवाल (श्रृंगीवाल) व्राह्म अछि, जे संपूर्ण देश मे पसरल अछि। ओ समृद्ध, विद्यानुरागी आ उत्कृष्ट समाजसेवी अछि।
वेदवेत्ता सारंगक पुत्र वत्सक वंश मे मीमांस शास्त्रक रचयिता जैमिनी भेल।
ओना ऋष्यश्रृंग वैदिक कर्मकाण्ड आ याज्ञकर्म मे विशेष दक्ष छल। मुदा अहि ऋषिराजक पश्चात व्राह्मण ग्रंथ आ उपनिषदक रचनाकाल मे ऋषि सभ द्वारा जीव व्रह्म संवंधी विशेष चिंतन मनन अन्वेषण करैत रहय सं वैदिक यज्ञादि परंपरा मे विकृति आ विभिन्नता आवि गेल। तखन महर्षि जैमिनी यज्ञ मे पूर्ववत एकरूपता आनय के उद्देश्य सं वेदक प्रमाणक मुताविक, यज्ञक निरूपण आ प्रतिपादन करैत यज्ञादि कर्मक सार्थक विवेचन करलक। अप्पन कामनाक पूर्तिक लेल विधिवत यज्ञ करव जैमिनीक अनुसार धर्म अछि। ताहि सं ओ मीमांसाक दर्शन आरंभ अथातो धर्म जिज्ञासा सूत्र सं केने अछि।
ओना तै वैदिक कर्मकाण्डक विधान मे तहियौका विरोधक निवारण आ वैदिक उक्तिक अर्थक समुचित निरूपण दिस श्रुतिकाल मे ऋषि सभहक ध्यान गेल छल जकर प्रमाण वैदिक संहिता मे प्रयुक्त मीमांस आदि संज्ञा पद सं भेटैत अछि। ई दर्शन कर्म पर विशेष वल दैत अछि आ वेदक अपौरुषेय आ नित्य मानैत अछि। एकर साहित्य संपत्ति सेहो विशाल अछि।
पांचम परिच्छेद
ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम
रामायणकालक शिखर पुरुख छल ऋष्यश्रृंग। हुनकर आश्रम विद्याक स्थायी केंद्र छल। एकर अलावा पूरे देश सेहो आश्रम सं भरल-पुरल छल। ओहि मे ज्ञान-विज्ञानक अजस्त्र मंदाकिनी प्रवाहित छल। रामायण काल आसुरी शक्ति पर आर्यक विजयक जुग छल। ई विजय अस्त्र-शस्त्र सं संभव नै छल। अहि काल मे आर्यावर्त छोट-छोट राज्य मे वंटल छल। सव राज्य स्वतंत्र छल आ सभहक अप्पन पृथक सेना छल। महर्षि वनहि सं पहिने विश्वामित्र लग सेहो चतुरंगिणी सेना छल। सेना मे हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सभ चल। चित्रकूट यात्राक काल भारतक अक्षौहिणी सेना मे नौ हजार हाथी, साठ हजार रथ, दोसर-दोसर आयुधधारी असंख्य धनुर्धर आ एक लाख अश्वारोही सैनिक छल। अहि तरहे रामायणकाल शस्त्र परिचालनक युग छल। अहि कारण देश मे पसरल प्राय: सभटा आश्रम मे सैन्य शिक्षा, आयुध परिचालन, शोध आ निर्मणक शिक्षा अनिवार्य छल। सिद्धाश्रम, भारद्वाजाश्रम, अगस्त्याश्रम, सुतीक्षण आश्रम, वाल्मीकि आश्रम, वशिष्ठ आश्रम आदि मे संग्रामिकताक शिक्षाक भरपूर प्रवंध छल।
आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक समूल नष्ट करहिक लेल रावण मलद, करुष आ जनस्थान मे अप्पन विशाल सैन्य छावनी वनैने छल। अहि स्थान मे आर्य ऋषि-महर्षिक वड़ पैग-पैग आश्रम छल जतय रहि के विद्यार्थी सव तरहक शिक्षा आ व्यावहारिक ज्ञान ग्रहण करैत छल। विश्वामित्रक सिद्धाश्रम आ अगस्त्याश्रम मे जखैन कहियो अध्ययन, चिंतन-मनन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रिया होयत छल, तखैन आसुरी छावनी मे तैनात सेना विघ्न उपस्थित करैत छल। ई राक्षस वलवान आ युद्ध कला मे निपुण छल। स्वयं विश्वामित्र एकरा दशरथक आगू स्वीकार केने छल-
मारीचश्च सुवाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ
रामायण वालकांड 20/5
एहन वलवान राक्षसक संहारक लेल सिद्धाश्रम मे गहन शोध कऽ निर्माण करल गेल दूटा विद्या उल्लेखनीय अछि। ई दूटा विद्या सभ तरहक ज्ञानक जननी छल। वला आ अतिवला, एकर प्रभाव सं भूख-प्यासक कष्ट नहि होयत छल। राम पहिने आचमन करि के अपना के पवित्र केलक आ फेर महर्षि विश्वामित्र सं अहि दूनू विद्या के ग्रहण करलक।
अहि प्रकार कतेक रास रहस्यमई विद्या सेहो आश्रम मे सृजित केल जायत छल।
आश्रमक वायुमंडल वैदिक मंत्रक घोष सं गुंजायमान रहैत छल। ई वैदिक मंत्रक पूर्ण फल प्राप्त करहि के लेल एकरा शास्त्रानुसार यथा स्वर पढ़हि के विधान छल। अर्जित ज्ञात कतो शिथिल या विस्मृत न भऽ जाय, एकरा लेल प्राचीन शिक्षाविद दैनिक स्वाध्याय आ अभ्यास प्रणाली निकाललक। स्वाध्याय के अपने मे स्वयं शिक्षण विधि करव वेसी उपयुक्त अछि। मुनि कुमार ऋष्यश्रृंग छात्र जीवन मे पितृ सेवा आ स्वाध्याय मे एत्ते निमग्न रहैत छल जे हुनक मे काम चेतनाक उदय नहि भेल।
स्नातक मे सामाजिक कत्र्तव्यक पालन करावैक लेल तत्कालीन शिक्षाविद ऋणानि त्रीणि केर सिद्धांतक प्रतिपादन केलक, जकर समाज मे महत्वपूर्ण ठाम अछि। एकर मुताविक, संसार मे जन्म लय वला सभ लोक पर देव ऋण, ऋषि ऋण आ पितृ ऋणक भार आवि जायत अछि। यज्ञक अनुष्ठान, शास्त्रक स्वाध्याय आ संतानोत्पादन सं मनुख अहि सभ ऋण सं मुक्त भऽ सकैत अछि। स्नातक सभ मे पवित्र सामाजिक उत्तरदायित्वक भावना उत्पन्न करहि के लेल ई सिद्धांत वड़ उपादेय छल।
ऋष्यश्रृंगक काल मे दोसर जे महत्वपूर्ण आश्रम आर्यायर्त मे संचालित छल, ओकर संक्षिप्त परिचय एना अछि-
सिद्धाश्रम
मलद प्रदेश मे आधुनिक वक्सर लग विश्वामित्रक ई चर्चित आश्रम छल। एकरा महाश्रम सेहो कहल जायत अछि। एतय छात्र सभके अलग-अलग तरहक अस्त्र-शस्त्रक शिक्षा देल जायत छल। एतय नव-नव अस्त्र-शस्त्रक अविष्कार आ ओकर परीक्षण सेहो करल जायत छल। आर्य सभ्यता-संस्कृतिक ई पूर्वी केंद्र छल। रावण जेहन महाप्रतापी सम्राट सेहो अहि महाश्रम सं सदिक्खन डरल रहैत छल। यहि कारण छल जे ओ एकटा सैनिक छावनी एतय वनैले छल जे मारीच, सुवाहु, ताड़का जेहन महाभट सं संचालित होयत छल। करुष मलदक स्त्री सेहो वड़ वहादुर आ साहसी होयत छल। विश्वामित्र भगवान राम के एतय सैनिक शिक्षा देने छल। संगेसंग ओ कतेक रास नव आ परंपरागत पचपन दुर्लभ अस्त्र देलक आ हुनकर प्रयोग करहि के विधि वतौलक।1 कोशी तट पर सेहो हुनकर तपस्या स्थल छल। एतय ओ एतेक कठिन तपस्या केने छल, जाहि सं सृष्टिक मूल चक्र धरि हिल उठल छल। ओ कोशी तट पर पइन माइट आ वातावरणक अनुसार चीना, मडुआ, खेरही जेहन अनाज आ भैंस जेहन पशुक विकास करलक। ओ अप्पन कालक प्रख्यात कृषि आ पशु वैज्ञानिक सेहो छल।
उत्तर वैदिक काल मे आर्यक वीच ई विवाद भऽ गेल जे विजित दस्यु कऽ की करल जाय? जौ ओकर वध करल जाय ते आर्यक सेवा चाकरी के करत? जौं ओकर जीवित राखल जाय ते समाज मे ओकर की पद होयत आ दासी-पुत्रक कुटुम्व मे कोन स्थान होयत?
ई विवाद युद्धक रूप लऽ लेलक। शास्त्रक अनुसार, वशिष्ठ आ विश्वामित्र मे अहि समस्याक लऽ कऽ विरोधभाव वढि़ गेल। वशिष्ठ रक्त शुद्धिक पक्षधर छल आ विश्वामित्र दस्यु सभ के आर्य वनावैल चाहैत छल। विश्वामित्रक अनुसार, आर्यत्व जन्म सं नै गायत्र मंत्रक जप सं शुद्ध भऽ कऽ सत्य आ ऋत सं प्रेरित भऽ कऽ यज्ञोपवीत धारण करहि सं ओकर शुद्धि होयत अछि। कोनो मनुख अहि प्रकार सं नया जन्म ग्रहण कऽ सकैत अछि। द्विज वनि के आर्य भऽ जायत अछि। तहियौका समाज मे ई उदारवादी रीति वहि सिखैने अछि। अहि तरहे तहियौक भारतीय समाज संरचना मे विश्वामित्रक वड़ पैग योगदान अछि। ई हुनकर कौशिकी तटक चिंतन-साधनक प्रतिफल अछि।2
राजा जनकक आश्रम
महर्षि याज्ञवल्क्य अहि आश्रमक आचार्य छल। ई मिथिलाक विद्वान नरेश सीरध्वज जनकक देख-रेख मे संचालित होयत छल। एतय जागतिक रहस्य, जीवनक विभिन्न जटिल गुत्थी, जीवन-मरणक समस्याक समाधान आ ज्ञान-विज्ञानक तत्व के सार्थक अन्वेषण करल जायत छल।3 अहि आश्रमक नाम एतेक पसैर गेल छल जे मिथिलाक अमराई के संचालित गौतम आश्रम फीका छल।
भारद्वाज आश्रम
ई आश्रम प्रयाग मे छल। एकरा विश्वविद्यालयक मान्यता प्राप्त छल। ई सर्वशक्ति आ साधन संपन्न आश्रम छल। श्रीराम के मना कऽ भरत सदलवल फेर सं अयोध्या लऽ जाय के लेल चित्रकूटक वाट मे प्रयागक भारद्वाज आश्रम मे एक रात्रि निवास केने छल। वाल्मीकीय रामायणक अयोध्याकण्डक अध्याय 89-90 मे एकर वर्णन अछि। ई स्वागत वृतांत सं पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक साधन संपन्न छल। भारद्वाज विश्वकर्मा, इंद्र, यम, वरुण, कुवेर, पृथ्वी, आकाश, नदी, देव, गंधर्व, अप्सरा, चित्ररथ वन (जेकर गाछ अलंकार सं लदल अछि), उत्तम अन्न, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आ चोष्यक प्रचुर मात्रा मे व्यवस्था करैत भगवान सोम आदि देवताक आह्वान कयलक आ देवता सभ हुनकर आदेशानुसार भरत केर स्वागतक सभ व्यवस्था कयलक। एतवे टा नै, हुनकर योगवल सं मलय अ दर्दुर नामक पर्वतक सुगंध युक्त शीतल हवा सभ लोकक थकान ह लेलक। आमंत्रित नदी मे मैरेय भरि गेल। सैनिक छक कए एकर रस पान केलक। पांच योजन धरि समतल धरती पर नीलम आ वैदुर्य मणिक समान कतेक तरहक कोमल घास उगि गेल। आश्रम मे वेल, कैथ, कटहल, आंवला, विजौरा आ आमक घना वृक्ष छल। चारि-चारि कोठली सं युक्त असंख्य चवूतरा छल। हाथी, घोड़ाक राखहिके लेल अलग शाला छल। राजपरिवारक लेल सुनर द्वार युक्त दिव्य भवन छल। एतय सव तरहक दिव्य रस, दिव्य भोजन आ दिव्य वस्त्र छल। भरतक लेल कतेक प्रकारक रत्न सं सज्जित महल छल। अतिथिक स्वागत लेल हजार दिव्यांगनाएं छल। एतय अप्सराक नृत्य आ गीत चलि रहल छल। सभ लोक भरपेट मन जोगर भोजन केलक आ छककय मैरेय केर पान केलक। अप्सराक संयोग पावि के भरतक सैनिक हम अयोध्या नहि घुरव, अहि दण्डकारण्य मे रहव, जेहन परस्पर गप करि रहल छल। मृग, मोर अ मुर्गाक मांसक संग मदिरापान कऽ सैनिक झूमि रहल छल। आजवाइन मिलाकऽ वनाओल गेल, वराही कंद सं तैयार करल गेल आ आम आदि फल के गरम करल रस मे पकाओल गेल उत्तमोत्तम व्यंजनक संग्रह, सुगंधमय रसवला दाल आ श्वेत रंगक भात सं भरल सहस्त्र स्वर्ण आदि केर पात्र ओतय सभ दिस राखल छल, जेकरा फूलक ध्वजा सं सजाओल गेल छल। भरतक संग आयल सभ लोक हुनका आश्चर्यचकित भऽ के देखलक। आश्रम मे सहस्त्र सोना के अन्न पात्र, लाख व्यंजन पात्र आ एक अरव थाली संग्रहित छल। सात-आठ तरुणी स्त्री मिलकऽ एक-एक पुरुख के नदीक मनोहर तट पर उवटन लग के नहावैत छल। पैग-पैग आंखि वाली रमणी अतिथि सभ के पैर दवावैक लेल आयल छल। ओ हुनकर भीजल अंग के सूखल वस्त्र सं पोछि के वस्त्र धारण कराकऽ हुनक स्वादिष्ट पेय पियावैत छल।
महर्षि भारद्वाज द्वारा सेना सहित भरत के करल गेल ई अनिर्वचनीय आतिथ्य सत्कार अद्भुत आ स्वप्नक समान छल। अहि वृतांत सं ई पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक समृद्ध आ साधन संपन्न छल। सैनिक शिक्षाक उद्देश्य सं ई आश्रम वनल छल, एहन प्रतीत होयत अछि।4
अगस्त्याश्रम
नासिक सं 36 किलोमीटर दक्षिण पूर्व वर्तमान अगस्तिपुर मे ई आश्रम छल। एकर कुलपति महर्षि अगस्त्य छल। ई सैनिक शिक्षा, आयुध-अनुसंधान आ व्रह्म विद्याक केंद्र छल। ई क्षेत्र जनस्थान कहल जायत अछि। महर्षि अगस्तक आश्रम ते ओहि युग मे भय आ आदरक सम्मानित छल। अहि आश्रम मे एतेक विध्वंसक शस्त्र-अस्त्र तैयार होयत छल जहि सं राक्षसराज रावणक ह्मदय मे सदिक्खन आतंक वनल रहैत छल। रावण अहि डर सं ओतय अप्पन पैग सैनिक छावन कायम कऽ देने छल। राम रावणक वध पैतामह नामक अस्त्र सं केने छल। महर्षि अगस्त्य अप्पन आश्रम मे रावण-वधक लेल एकर अविष्कार केने छल। भगवान राम के ओ अहि उद्देश्य सं हुनका भेंट केने छल। पैतामह अस्त्र मे पहाड़ के वेधय के शक्ति छल।5 एकर अतिरिक्त अगस्त्य राम के हीरा आ सुवर्ण जड़ल दिव्य धनुष, सूर्यक समान देदीप्यमान अमोघ वाण, तीक्ष्ण आ प्रज्जवलित अग्निक समान वाण सं सदिक्खन भरल रहि वला अक्षय तरकस आ सोनाक म्यान आ सोनाक मूठ वला तलवार भेंट दऽ कऽ राक्षस केर संहारक लेल आह्वान केने छल।6
अगस्त्य आश्रम मे ज्ञानक विभिन्न विभाग छल। व्रह्म थान, अग्नि थान, विष्णु थान, महेंद्र थान, विवस्वान थान, वायु थान, वारुण थान प्रभृति। व्रह्म थान मे वेदक अध्ययन होयत छल। अग्नि थाम मे साम गान होयत छल। एतय मंत्रोच्चारणक संग समिधा आहूत होयत छल। विष्णु थान मे राजनीति, अर्थाशास्त्र, पशुपालन, आक्रमणकारी आ रक्षणशील आयुधक ज्ञान प्रदान करल जायत छल। विवस्थान थान मे ज्योतिषक पढ़ाय होयत छल। चिकित्सा विज्ञान सेहो एतय पढ़ौओल जायत छल। गरुड़ थान मे यातायात, यान आदि के ज्ञान उपलव्ध होयत छल। कार्तिकेय थान मे व्रह्मचारी गुल्म,पत्ति, वाहिनी आदिक संचालनक शिक्षा प्राप्त करैत छल। कौवेर थान मे जल संतरण, पोत संचालन आदि केर शिक्षा देल जायत छल।7
महर्षि अत्रि आश्रम
ई आश्रम चित्रकूटक दक्षिण मे संचालित छल। ई तहियौका आर्य सभ्यताक मुख्य केंद्र छल। हस्तशिल्प कला मे ई अग्रणी छल। वनवास काल मे महर्षि अत्रिक स्त्री अनुसूइया सीताजी के एहन दिव्य वस्त्र आ आभूषण पहिनेने छल जे नित्य नवीन, निर्मल आ सुहावना वनल रहैत छल। संगेसंग ओ सीताजी के पतिव्रत धर्मक सेहो शिक्षा देने छल।8
वाल्मीकि आश्रमक संवंध मे इतिहासकार मे मत अलग-अलग अचि। ई तमसाक तट पर स्थित छल। ई विश्वविद्यालय अप्पन काल मे शिक्षाक महान केंद्र छल। महाकवि भवभूतिक अनुसार, एतय छात्रा सभ सेहो अध्ययन करैत छल। एतय अलग-अलग शास्त्रक संग शस्त्र/अस्त्रक सेहो शिक्षा देल जायत छल। एकर प्रमाण स्वयं रामक पुत्र लव-कुश छल। वशिष्ठ आश्रम अयोध्या मे स्थित छल, जतय भगवान राम शिक्षा पाओल।
गुरु गृह गये पढ़न रघुराई, अल्पकल विद्या सव पाई।
रामचरितमानस, वालकाण्ड
महर्षि वशिष्ठक दोसर आश्रम हिमालयक तलहटी मे सेहो छल, जकर वर्णन रघुवंश नामक महाकाव्य मे कालिदास केने अछि। अहि आश्रम मे छात्र संघ सेहो छल, जकर वाल्मीकि मेखलीना महासंघा कहि के उल्लेख केने अछि। अहि संघक राजसभा मे सेहो प्रभाव छल। नैमिषारण्य मे महर्षि शौनक के सेहो चर्चित आश्रम छल। एतौका अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सभ वड़ प्रसिद्ध छल। अहि मे धार्मिक, राजनीतिक आ वैज्ञानिक विचार पर संवाद होयत छल।9
एकर अलावा, महर्षि सुतीक्ष्ण, महर्षि शरभंग, महर्षि मतंग आ महर्षि जावालिक आश्रम शिक्षाक प्रमुख केंद्र छल।
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षष्ठ परिच्छेद
श्रष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर)
विहार राज्यक जिला मुख्यालय मधेपुराक रेलवे स्टेशन दौरम मधेपुरा कहलावैत अछि। एतय सं आठ किलोमीटर उत्तर ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर आव सिंघेश्वर या सिंहेश्वर थानक नाम सं प्रसिद्ध अछि।
लगभग दू सौ वरख पहिने हरिचरण चौधरी नामक एकटा लकड़ीक व्यवसायी कोशीक जलमार्ग सं नेपाल सं लकड़ी आनि के व्यवसाय करैत छल। एक वेर हुनका व्यवसाय मे वेसी लाभ भेल। ओ शिवभक्त व्यवसायी श्रृंगेश्वर नाथ (सिंहेश्वर नाथ) केर एकटा भव्य मंदिर वनैलक। जखन भागलपुर केर जिला आ सत्र न्यायाधीश केर एतय क्षेत्रीय सनातन धर्मी वनाम पंडागण (जय नारायण ठाकुर आ 13 अन्य) वाद संख्या 3/1937 चलि रहल छल, ओहि सिलसिला मे हरिचरण चौधरी के पैंसठ वर्षीय प्रपौत्र दरवारी चौधरी अप्पन गवाही मे वाजल छल जे वर्तमान मंदिरक पूव भरि दीवाल पर स्वयं हरिचरण चौधरी, पश्चिम भरि दीवाल पर लालजी चौधरी आ उत्तर भरि दीवाल पर शिवू चौधरी के चित्र अंकित अछि। अहि तथ्यक पुष्टि ओ अप्पन साक्ष्य मे केने छल। ताहि सं कतिपय स्थानीय वुद्धिजीवी द्वारा मंदिर मे उत्कीर्ण अहि चित्र के वुद्ध आ दोसर वौद्ध भिक्षु केर मानव सरासर भूल अछि।
ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि आ कर्मभूमि हेवाक कारण अहि क्षेत्रक प्राचीन महत्व अछि। एतय के कण-कण मे ऋष्यश्रृंग एखनो रमैत अछि। एतय के माटि अहि ऋषिराजक यज्ञाग्निक वुझल भस्म अछि। ताहि सं नदी सं आच्छादित ई क्षेत्र वड़ उर्वर अछि। एकर प्राचीनता के वुझैक लेल सवसं पहिने श्रृंगेश्वर नाथ (स्ंिाहेश्वर) केर नदी सभ (कोशी आ ओकर दोसर सभ धार) केर अध्ययन करव आवश्यक अछि। कोशीक कतेक रास छाड़न धार सूखि गेल अछि आ ओकर धार आव निस्तेज भऽ गेल अछि। मुदा भारत सरकारक कोशी नियंत्रण योजना सं पहिने चीन के ह्वांगहो नदी सं वढि़ के अप्पन विनाशकारी वाढ़ कोशी जग जाहिर छल। देखू जे भोलानाथक नगरी आ ऋष्यश्रृंगक तपस्थली मे कोशी आ ओकर छाड़न धारक स्थिति की छल?
कोशी धार भगवान शिव के वड़ प्रिय अछि। महाकवि कालिदासक अनुसार, कोशीक तट पर साक्षात शंकर वसैत अछि। ताहि सं कोशी शंकरक तरहे तांडव करैत अछि।
महाभारत मे कौशिकी तीर्थक वृहत चर्चा अछि2, जे अहि देशक सांस्कृतिक भूगोल केर रेखांकित करैत अछि। एकरा जानैक लेल सिंहेश्वर मे प्रवाहित कोशीक विभिन्न धारक जानकारी आवश्यक अछि।3
मुख्य कोशी नदी भीमनगर सं दक्षिण चलिके शिवनगर गामक निकट दू भाग मे वंटि जायत अछि। ओतय पूव भरि वला धार से वैवाह (धसान) आ चिलौनी नामक धार वनैत अछि आ पश्चिम भरि वला धार सं परवाने, तिलावै, वड़हरी आ सोनेह नामक धार अपन स्वरूप ग्रहण करैत अचि। तिलावै नदी एखन सुपौल जिलाक थुमहा, वसहा, तुलापट्टी, रामनगर, रामपुर आदि गाम के स्पर्श करैत सिंहेश्वर स्थानक चर्चित गाम वभनी भेलवा आवैत अछि। ई गाम रामपुरक अग्निकोण मे आ तिलावै के पाश्र्व भाग मे अछि। कहल जायत अछि जे कहियो ई गाम भववावा थानक नाम सं प्रचलित छल। मुगल सम्राट शाहजहांक काल मे भववावा एकटा समाज सेवी छल, जिनकर जन्म अहि ठाम पर भेल छल। 350 ईपू अहि गाम मे हुनकर स्मारक छल।
तिलावै वभनी भेलवा गाम सं कनि नैऋत्य कोण मे झुकि के सिंहेश्वर थानक मार्र्ग मे स्थित गम्हरिया नामक गाम आवैत अछि। अहि गाम मे सोनाय महाराज नामक एकटा धार्मिक आ समाज सेवी लोकदेवक स्मारक अछि, जिनका प्रणाम करि के तिलावै सं आगू वढि़ जायत अछि।
सोनेह एकटा छोट धार अछि जे सिंहेश्वर थानक नैऋत्य कोण स्थित दलदली चौर सं प्रवाहित होयत अछि। ई परवाने धारक एकटा टूटल धार अछि। ई अप्पन उद्गम सं दक्षिण दिस चलि के लंवा दूर तय करि के वंशीरौता गाम मे तिलावै धार मे प्रवेश करि जायत अछि।
परवाने धार रूपौली सं दक्षिण चलि के सिंहेश्वरक चर्चित गाम रामपट्टी मे प्रवेश करैत अछि, जतय धसान आ वरहरीक धार अहि मे मिलिकए एकर जलभंडारक वृद्धि करैत अछि। परवाने आ धसानक ई संगम सिंहेश्वर आ गौरीपुर सं कनि दूर ठाम अछि। धसानक अलग अस्तित्व अछि मुदा वरहरी परवानेक एकटा उपधार अछि, जे आव मृत भऽ गेल अछि। एक चौर सं चलि के वरहरीक धारा परवानेक समानांतर दक्षिण भरि चलैत अछि आ अप्पने वाम भाग सं डंडारी, चम्पानगर, वैरवन्ना आदि गामक स्पर्श करैत अछि।
परवाने धार रामपट्टी सं चलिके सिंहेश्वर थान आवैत अछि, जतय ओ भगवान शंकरक चरण स्पर्श करैत अछि। कोशीक चिलौनी धार लालपुर सं दक्षिण चलिके दाहिना पाश्र्व मे सरोपट्टी गाम के स्पर्श करैत अछि। लालपुर गाम के लगभग दू सौ वरख पहिने भानुदास नामक कुशाग्र वंशीय राजभर सरदार वसैने छल। अहि गामक लग गौरीपुर अछि। सिंहेश्वर नाथ मंदिर लग चिलौनी दू भाग मे वंटिके समानांतर मधेपुरा आवैत अछि। गौरीपुर सं दक्षिण पूर्वी धारक कात रामपुर नामक गाम अछि, जतय दू सौ वरख पुरान एकटा व्रह्मस्थान अछि।
चम्पारण्य तीर्थ
महाभारत मे वर्णित कौशिकी तीर्थ मे एकटा तीर्थ अछि चम्पारण्य। ई क्षेत्र तत्कालीन अंग नरेशक अधीन छल। महाभारत सं पूव अंग देशक राजधानी मालिनी छल। वाद मे राजा रोमपादक प्रपौत्र चम्पा नामक एकटा राजाक नाम पर चम्पा या चम्पावती कऽ देल गेल।4 महाभारत काल मे ई चम्पा नगरी चम्पकक वाग सं परिवृत छल।5 ताहि सं अहि चम्पारण्य सं चम्पा राज्यक अरण्य भाग वुझवाक चाहि। एकरा एखुनका चम्पारण जिला वुझवाक भौगोलिक भूल अछि। छठम शताव्दीक रचना शक्ति संगम तंत्रक अनुसार विदेह भूमिक सीमा अहि तरहे देल गेल अछि,
'गण्डक तीरमारम्य चम्पारण्यान्तक शिवे
विदेह भू समाख्याता तैरमुक्त भिवं सुत।'
शक्ति संगम तंत्र 7/27
विदेह भूमि पश्चिम मे गण्डकी तीर आ पूव मे चम्पारण्य धरि पसरल अछि। विदेह भूमि मिथिलाक पूव ई क्षेत्र चम्पारण्य अछि। वर्तमान चम्पारण जिला मिथिलाक पश्चिम मे स्थित अछि।
महाभारतकार जे चम्पारण्य तीर्थक वर्णक केने अछि, ओ तीर्थ वड़ पुण्य प्रदान करय वला अछि। महाभारतक अनुसार, ओतय एक रात्रि रहय सं सहरुा गाय केर दानक फल भेटैत अछि।6 ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि कौशिकी तीर्थ मे वीराश्रम आ कुमारतीर्थ सेहो अछि, जे चम्पकारण्य तीर्थक उत्तर भरि के सीमा आ पूव सीमा पर स्थित क्रमश: वीरपुर आ कुमारखंड के रेखांकित करैत अछि। ई चम्पकारण्य तीर्थ सिंहेश्वर थान निर्दिष्ट होयत अछि। ई समस्त क्षेत्र चम्पा नरेशक अरण्य भाग छल। एतौका वेसी गाम मे चम्पा देवीक पूजा होयत अछि। शंकरपुर मे वरहगाडि़याक जमींदार वावू एकदेश्वर सिंह चम्पा देवीक मंदिर वनाय के ओतय चम्पाक मूर्ति स्थापित केलक, जतय प्रत्येक वर्ष मेला लागैत अछि। अन्य देवी-देवताक अलावा वांतर जाइतक मान्य कुल देव चम्पावती सेहो अछि।8 वांतरक अलाा दोसर कतेक रास जाइत चम्पादेवीक भगैत गावैत अछि। ताहि सं सिंहेश्वर थानक चम्पारण्य तीर्थ नै मानव एकटा एतिहासिक भूल अछि।
परवाने नदी सिंहेश्वर सं दक्षिण दिस चलि के जोतनार गाम के स्पर्श करैत अछि। कौशिकी तीर्थ मे एकटा ज्योतिस्मर तीर्थ सेहो अछि, जतय ह्मद मे नहावय सं वड़ पुण्य भेटैत अछि। ई जोतनार गाम महाभारत कालीन ज्योतिस्मर तीर्थ अछि।9 तहयौका भौगोलिक साक्ष्यक आधार पर समूचा क्षेत्र चम्पा राजाक वनभाग छल। चम्पावतीक वनदेवी सेहो कहल गेल अछि।10 जो एकटरा पौराणिक मान्यता अछि। महाभारतक अनुसार ऋषि आ राजाक एकटा दल प्रभास तीर्थ सं यात्रा शुरू कऽ कौशिकी तीर्थ सेहो गेल छल। अहि दल मे भृगु, वशिष्ठ, गालव, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, यजदग्नि, अष्टक, भारद्वाज, अम्वरीष आ वालखिल्य ऋषि छल आ राजा मे शिवि, दिलीप, नहुष, अम्वरीष आदि छल।11 अहि यात्रा वृतांत अहि क्षेत्रक पौराणिकता आ दर्शनीयता के रेखांकित करैत अछि।
पौराणिक सिंहेश्वर थान
सिंहेश्वर स्थान भगवान शंकरक पावन तपस्थली अछि। षोड महाजनपद मे शीर्षस्थ जनपद अंग देशक ई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल अछि। अंग देशक निर्माण मे सेहो भगवान शिवक उल्लेखनीय योगदान अछि।
दक्षिण मे मन्दराचल पर्वत आ उत्तर मे मूजवान पर्वत धरि पसरल विशाल वन्य प्रदेश श्लेषात्मक वन छल, जतय कन्दर्प दहनक पश्चात भगवान शिव समाधिस्थ भेल छल। कोशी के कतेक धार वन मे वहैत छल। वाराह पुराणक उत्तरार्धक एकटा पुरा कथाक अनुसार, ओहि वन मे भगवान शिव के खोजैत देवराज इंद्रक संग विष्णु आ व्रह्मा पहुंुचल। भगवान शिव एकटा सुनर हरिणक रूप मे विचरण करैत छल। तीनों अंतयार्मी देवता अहि हरिण के देखहि के वुझि गेल जे ई भगवान शंकर अछि आ ओ हरिण के पकड़हि मे सफल भऽ गेल। इंद्र हरिणक सींगक अग्र भाग, व्रह्मा मध्य भाग आ विष्णु निम्न भाग पकड़लक। एकाएक सींग तीन भाग मे टूटिके विभाजित भऽ गेल। तीनो देवताक हाथ मे सींगक एक-एकटे भाग रहल आ हरिण लुप्त भऽ गेल। तखनै आकाशवाणी भेल कि आव शिव नहि भेटत। देवता सभ अप्पन-अप्पन हाथ मे आयल सिंहक भाग के पावि के संतोष कऽ लेलक।
कहल जायत अछि जे विष्णु लोक कल्याणार्थ अप्पन भागक सींग के जहि ठाम पर स्थापित करलक, ओ वर्तमान सिंहेश्वर (श्रृंगेश्वर) अछि। अहि तरहे एकर सिंहेश्वर नाथ नाम सार्थक भेल।
वाराह पुराणक अहि पुरा कथाक अनुसार तीनों देवता कोशीक तीर पर भगवान शिव से भेंट करय लेल पहुंचल छल। अहि तथ्य के कालिदास कृत कुमारसंभव मे स्पष्ट करल गेल अछि। ओकर अनुसार, कोशी के प्रपात लग भगवान शिवक निवास अछि आ देवता सं ओतय भेंट करयक स्थान निर्दिष्ट करल गेल अछि।12
अत: कोशीक तीर पर इंद्र, विष्णु आैर व्रह्मा का शंकर सं भेट करव पूर्व निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम दिस हुनकर आगमनक सूचक अछि।
मुदा वाराह पुराणक अंतिम अध्यायक कथा जे प्रमाणक रूप मे प्रचलित अछि, ओ स्पष्ट नै अछि जे मृग रूप महादेवक श्रृंग मूल पावैक भगवान विष्णु ओकरा एतय स्थापित केने छल। ताहि सं अहि विषय पर प्रवुद्ध पाठक अपने सं विमर्श, विश्लेषण आ विवेचन करय, यहि उचित अछि। मिथिला तत्व विमर्श, पृष्ठ 80 मे विद्वान लेखक महामहोपाध्याय परमेश्वर झाक सेहो यै मत अछि।
चौवीस हजार श्लोक वला वाराह पुराण एकटा सतोगुण पुराण अछि, जहि मे विष्णुक वराह अवतार वर्णित अछि। महाभारत आ पद्मपुराण ओहि वड़ क्षेत्रक उल्लेख तऽ नै अछि, मुदा अहि क्षेत्रक स्थान निर्देशक लेल अप्पन जानकारी केर वेस स्पष्ट करैत अछि। ओहि मे अतीतकालीन पुरा कथा अछि, जे जागतिक रहस्य केर उद्घाटन करैत अछि। एहन पुराणक निर्मल जल मे प्रक्षेपक शैवाल जाल सेहो कम नै अछि। प्रक्षेप मे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर-क्षीर विवेचन निष्पक्ष-प्रवुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि।
परवर्ती साक्ष्य
कहल जायत अछि जे सिंहेश्वरक जंगल मे पर्याप्त गोचर भूमि छल। एतय दूर-दूर ठामक गोपाल अप्पन गाय कऽ चरावैक लेल आवैत छल। एहन मान्यता अछि जे एकटा विशेष ठाम पर कुंआरी गाय आवैत छल आ ओकर थन सं दूध टपकैत लागैत छल। ई सिलसिला अनवरत चलैत रहल। एक दिन गोपालक दूध टपकैत दृश्य अप्पन आंखि सं देखलक। ओकर वाद कतेक दिन धरि ओ ई देखैत रहल। ओहि निर्दिष्ट ठाम पर ओहि गाय के आविके आ ओकर थन सं दूध टपका केर ओहि ठाम के सिंचित करव एकटा कौतूहल छल। ओहि गोपालक जिज्ञासावश ओतय सं माटि हटाकऽ देखलक ते ओ विस्मित भऽ गेल। एकटा शिवलिंग माटिक नीचा झांपल छल, जतय गायक धन सं दूध टपकैत छल। ओ गोपालक सेहो नियमित अहि शिवलिंगक पूजा करय लागल। दोसर सव गोपालक सेहो ओतय भक्ति अर्चना करय लागल। वाद मे कोनो भक्त ओतय छोट-सन मंदिर वनैलक। कहल जायत अछि जे यहि ठाम ओ पूर्वकालक गोचारण स्थल अछि आ सिंहेश्वर मंदिरक शिवलिंग वहि अछि जेकरा कोनो अनाम गोपालक माटि सं हटा के दर्शन-पूजन केने छल।
सिंहेश्वरक थानक अलावा देवघर आदि मंदिरक शिवलिंगक कथा किछु एहिने तरहे अछि। जे भी हुए सभ शिवलिंगक स्थापना आ ओकरा खोज निकलैक श्रेय गोपाल केर जायत अछि। मुदा एकर प्रत्यक्ष लाभ दोसर समुदायक लोक के भेटैत अछि।
शिवलिंगक तीन रूप अछि, भावलिंग, प्राणलिंग आ इष्टलिंग। भाव कलाविहीन, सद्रूप काल आ दिक् सं अपरिच्छिन्न आ परस्पर अछि। एकर साक्षात श्रद्धा सं होयत अछि। प्राण लिंग कलाहीन आ कला युक्त दूनू अछि। वुद्धि सं एकर साक्षात संभव अछि। इष्ट लिंग कला युक्त होयत अछि ताहि सं नेत्र सं एकर दर्शन संभव अछि। अहि तीनो के क्रमश: सत, चित आ आनंद कहल गेल अछि। परम तत्व भाव लिंग अछि, सूक्ष्म प्राण लिंग अछि आ स्थूल इष्ट लिंग अछि। सिंहेवर थान मे स्थापित शिवलिंग इष्ट लिंग अछि, जे मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय आ पूजनीय अछि।
कहल जायत अछि जे लगभग एक सौ वरख पहिने सिंहेश्वर मंदिर मे स्थापित शिवलिंगक सव तरफ जलढ़रीक निमित संगमरमर वैसावैक लेल खोदल गेल छल। मजदूर सभ करीव आठ फीट नीचा खोदलक। ओ किछु अद्भुत दृश्य देखलक। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत छल। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर मुद्रित छल। वाह्य रूप सं तीन गुना मोटा आकार नीचा पसरल छल। एकर विशालता देखहि के ओ चकित रहि गेल। किछु मजदूर ते अप्पन संतुलन सेहो विसुरि गेल। एहन स्थिति मे खुदाईक काज स्थगित कऽ देल गेल। एकर सत्यापन किछु अभियंता केने अछि। ओ शिवलिंग सं अलग खुदाई केलक ते आठ-दस फीटक गहराई मे एकटा विशाल चट्टान देखलक जाहि सं शिवलिंग जुड़ल छल। एकटा विशाल चट्टानक कारण कोशीक उफनावैत धार अहि मंदिर के क्षति नहि पहुंचा सकल। अहि मंदिरक पौराणिकताक देखैत आय धरि एकर जाहिना के ताहिना वनरल रहैक श्रेय अहि चट्टानी आधारशिला के देल जा सकैत अछि।
किरातक भूमि
अहि मे कोनो मत भिन्नता नहि अछि जे प्राचीन काल मे एतय घनघोर जंगल आ नदीक संग पहाड़ सेहो छल जे कतिपय भौगोलिक कारण सं धरतीक संग धंसि गेल। एहने ठाम भगवान शिवक लेल उपयुक्त छल क्याकि उपनिषदकरक मुताविक भगवान शिव निर्जन जंगल आ पहाड़ मे निवास करैत छल।14 जंगल, गिरिगह्वर मे रहै वला किरात जेहन निवासी मे हुनकर लोकप्रियता वढ़ैत गेल। कालांतर मे ओ जगत्पति आ देवताक द्रष्टा मानल जा लागल आ ओ आर्य आ अनार्य दूनूक द्वारा पूजित हुए लागल।
प्राचीन काल मे जहि कियो विदेशी जाइत भारत पर आक्रमण कऽ अप्पन विस्तार केलक आ अप्पन राज्य स्थापित केलक हुनकर वर्णन महाभारत, पातंजलिक महाभाष्य, मनुस्मृति आ अन्यान्य स्मृति ग्रंथ मे अछि। महाभारतक अनुसार, यवन, शक, पह्लव, किरात, चीन आदि जाइतक प्रवेश भारत मे भऽ चुकल छल।15 मनुक मुताविक, पौण्ड्रक, द्रविड़, कम्वोज, किरात, दरद, चीन, खश, यवन, शक, पारद आ पह्लव विदेशी जाइत छल।16 अहि विदेशी जाइत आर्य सभ्यता अा संस्कृति पर प्रभाव डालैत भारतीय धर्म आ संस्कृति मे अपना केर आत्मसात कऽ देलक। कलांतर मे ओ विदेशी नहि रहि गेल। हुनकर पूर्ण रूप सं भारतीयकरण भऽ गेल। एहने विदेशी जाइतक एकटा जइत किरात छल, जकरा प्राचीन वर्ण व्यवस्था मे मनु शुद्रक रूप मे मान्यता देलक।
तहियौका हिन्दू समाज जहि समुदायक तिरस्कर केलक, ओ भगवान शिवक शरण मे गेल। क्याकि अमरकोश मे किरात के म्लेच्छक एकटा भेद मानल गेल अछि।17 कुमार संभव (8.29) केर मुताविक, ई जाइत हिमालयक परवर्ती प्रदेश मे रहैत छल। भगवान शिव हिमालयक कैलास शिखर पर रहैत छल ताहि सं ई जाइत के भगवान शिव के तादात्मक कथा जुड़ल अछि। वायु पुराण (47.48) आ व्रह्मांड पुराण मे हुनकर धारक कात मे रहय वला जाइतक तरहे उल्लेख करल गेल अछि। संगेसंग विष्णु पुराण (2.3.8) मे एकर निवास स्थान पूर्वी भारत मानल गेल अछि।
भले ही भारतीय पुरा साहित्य मे अहि जाइत के विदेशी आ अनार्य मानल गेल अछि, मुदा एकर मूल पुरुष आर्य छल। एकर प्रमाण हरिवंश पुराणक महाराज सगरक चरित-वृतांत मे स्पष्ट अछि जे राज्य मे लोग सं विजयी क्षत्रिय देशांतर गेल छल, मुदा ओ अप्पन व्राह्मण पुरोहित के नहि पावि के अप्पन मूल आर्य धर्म सं भ्रष्ट भेल गेल जाहि सं कतेक रास जाइत व्राह्मणक वर्चस्व के स्वीकार नै भेल ताहि सं म्लेच्छ कोटि मे दऽ देल गेल।
भागवत पुराणक स्कन्द 9 के 23म अध्याय मे उल्लिखित अछि जे महाराज ययातिक पुत्र द्रुह्यक संतान उत्तर दिश जाइके म्लेच्छक राजा भऽ गेल। अहि तरहे गतायातक प्रक्रिया चंद्रगुप्तक काल धरि भेल गेल। एकर अलावा, अहि देशक लोग तहियौका सैन्य-वल मे नियुक्त भऽ कऽ म्लेच्छक देश मे जा के म्लेच्छ वनि गेल। मुद्राराक्षस नाटकक पंचम अंक मे एकर उल्लेख अछि।
अहि देश मे वर्जन (जाइत-च्युत) कऽ प्रथा वड़ पुरान अचि। जौं केकरो सं ज्ञात आ अज्ञात, छोट या वड़ अपराध भेल अछि ते धर्मक ठेकेदार हुनक जाइत सं वहिष्कार कऽ देत छल आ ओकर एत्ता वेसी तिरस्कार करैत छल जे ओकर लाख अनुनय-विनय करहि के वादो ओकर जाइत मे नहि घुरावैत छल। नतीजा ई हैत छल जे हुनकर दोसर उदार समुदाय मे शामिल भऽ मूल सनातन धर्म सं विस्थापित भऽ तथाकथित म्लेच्छ मे शामिल हेवाक कारण हुनकर संख्या वढ़ैत गेल। हुनका फेर सं सनातन धर्म मे आनय केर प्रयास नहि भेल। हालांकि याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकार एहन तरहक अपराधक प्रायश्चितक व्यवस्था देने अछि मुदा ई स्मृति मे सिमटल रहि गेल। जेकर हाथ मे न्याय आ धर्मक व्यवस्था छल हुनकर हठधर्मिता आ सदा सर्वथा समाज मे वर्चस्व स्थापित राखवाक प्रवृति अहि समाज कऽ क्षीणकाय कऽ देलक।19 किरात आदि जाइत केर अहि धरती पर वहुलांश अहि रहस्य के रेखांकित करैत अछि। महाभारत काल मे अहि क्षेत्र पर किरातक वाहुल्य छल। गंगा सं उत्तर आ महानन्दा सं पूरव नेपाल धरि ई जाइत पसरल छल। अहि क्षेत्र मे हुनकर सशक्त संस्कृति फलफूल रहल छल। राजा विराटक दोसर स्त्री सभ मे एकटा किरात कन्या सेहो छल, जे मोरंग वा नेपालक तराई मे रहि वाली छल। किरात एक शक्तिशाली जाइत छल। तहियौका किरातार्जुन कीर्ति जेहन परवर्ती साहित्य मे एकर चर्चा आयल अछि।20 अहि क्षेत्र मे अन्यान्य जाइतक संग किरता के सेहो वड़ संघर्ष करय पड़ल।21
महाभारत मे अर्जुन पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि हिमालय जाइत अछि। ओतय भगवान शिव अप्पन प्रिय भक्त किरातक वेश मे भेटैत अछि। शिव के नहि चिन्ह सकय के कारण अर्जुन ओहि किरात वेश शिव सं युद्ध करैत अछि, मुदा हुनका सं परास्त भऽ जायत अछि। फेर शिवक वास्तविकता के वुझि अ अहि अवढरदानी के प्रसन्न करहि के लेल अर्जुन माटिक वेदी वनाके हुनकर अराधना करैत अछि आ वेदी पर पुष्प अर्पण करैत अछि। ओ ई देखहि के आश्चर्यचकित रहि जाइत अछि जे जे फूल शिवक लेल ओ मृत्तिका वेदी पर चढ़ावैत अछि ओ ओहि किरात पर आवि जायत अछि। आव अर्जुन किरात वेश शिव के चिन्है मे विलम्व नै होयत अछि।22 विक्रमोर्वशीयम (1.11) मे कालिदास सेहो लिखने अछि जे पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि के लेल अर्जुन कठिन तपस्या केने छल।
भारत मे जखैन शिशुनाग वंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, शुंग वंश, आंध्र वंश आदि केर राज्य छल। ओकर समानांतर नेपाल मे लगभग सात सौ वरख धरि किरातक राज्य छल। अशोकक धर्म चक्र विजय काल मे नेपाल मे किरात राज्य स्थ्यांकु छल। वौद्ध धर्मक अनुश्रुति मे सम्राट अशोक अप्पन कन्या चारुमति आ जामाता देवपालक संग नेपाल जाकऽ किरात शासकक सहायता सं कतेक रास विहार आ वौद्ध स्तूप वनैने छल।23
किरात दवंग आ स्वतंत्र विचार वला जाइत छल। सातम शतावद् मे व्राह्मणवादी व्यवस्था आ कर्मकाण्ड के सर्वथा नकारैक कारण एतौका किरातक नव नामांकरण वांतर करल गेल जकर अर्थ अछि कुपथ्य आ त्याज्य। तहियौका समाज व्यवस्थाकार एकरा संगठित हिन्दू समाजक लेल कुपथ्य मानलक। जहि जाइतक सभ्यता संस्कृति महाभारत सं लऽ कऽ गुप्त-स्वर्ण-युग धरि अप्पन यशोज्जवल गाथा कहय मे सक्षम हुए, जाहि जाइत हजार वरख धरि राज्य सत्ताक संचालन केने हुए, ओ म्लेच्छा आ शुद्रे टा नै, समाजक लेल कुपथ्य सेहो भऽ गेल।
व्यस्थाकार वर्ण व्यवस्थाक वंधन एतेक मजवूत कऽ देलक आ शासक के सदण्ड एकर कार्यान्वयनक दायित्व सौंपलक जाहि सं सामाजिक कलस्विनीक प्रवाह स्थिर भऽ गेल। ई सच अछि जे मनु द्वारा संचालित वर्ण व्यवस्था मे ऊंच-नीचक भावना आ भेद-भावक दृष्टि छल, जे परवर्ती हिंदू समाज के जर्जरित करय के कारण वनि गेल। भगवान वुद्ध अहि व्यवस्था पर एतेक वेसी प्रहार करलक जे मरणासन्न अवस्था मे आनि के छोडि़ देलक। मुद शुंगक काल मे ई फेर जीवित भऽ गेल।
अलवरुनी ग्यारहम शताव्दी मे भेल छल। हुनकर कथन अछि, प्राचीन काल मे कर्म परायण राजा जनता के कतेक रास श्रेणी आ कर्म मे विभक्त करहि मे जोड़ दैत छल। संगेसंग हुनक एक-दोसरा सं भेंट आ क्रम तोड़ैक सं रोकहि के यत्न करैत छल। ताहि सं ओ भिन्न-भिन्न श्रेणीक लेक के एक-दोसरा सं संवंध राखहि सं रोकि देलक आ प्रत्येक श्रेणीक लोग के विशेष प्रकारक काज आ शिल्प सौंप देलक। ओ कोनो लोक के अप्पन वर्गक अतिक्रमण करहि के लेल अनुज्ञा नै दैत छल। जे अप्पन श्रेणी सं संतुष्ट नहि छल, हुनका दंड देल जायत छल।24 एहने समाजक संवेदनशीलता मारल गेल आ एक-दोसरा सं नै मिलय आ पारस्परिक संपर्कक अभाव मे हुनकर गतिशीलत अवरुद्ध भेल। व्राह्मण सेहो व्यवस्थाक नाम पर अप्पन अधिकार के खुलि के दुरुपयोग केलक। विराट भारतीय समाज मे रहि के कतेक रास जाइत अहि सं विमुख भऽ कऽ अप्पन दायरा मे सिमटल चलि गेल। जे कहियो गतिशील जाइतक रूप मे चर्चित छल, ओ अंतर्मुखी वनैत गेल।
ग्यारहम सदी मे निशिहरदेव किरात वंशी राजा भेल जिनकर राजधानी निशिहरपुर छल ई वर्तमान शंकरपुर अंचल अछि। हुनकर भवन आ दुर्गक अवशेष एकटा टीलाक रूप मे अवस्थित अछि आ जाहि पर एकटा मंदिर निर्मित अछि। मंदिर परिसर मे राखल गेल राजभवनक स्मृति चिह्न, नक्काशीदार प्रस्तर खण्ड, प्रस्तरक चौखट आदि पालयुगक प्रतीत होयत अछि। संभवत: ई किरातक अंतिम राजा छल। हुनकर अराध्य उगरी महाराज नामक एकटा सिद्ध पुरुष छल जे गुडि़या (त्रिवेणीगंज निवासी) कमार जाइत छल। हुनका लोक देव खेदन महाराज सं वैर छल। टेंगराहा चौर मे ओ मायाक वाघिन के भेजि के खेदन महाराजक वध करैने छल, जे खेदन महाराज के भगैत गीत सं ज्ञात होयत अछि।
कर्नाट क्षेत्रीय नान्यदेव 1097 ई. मे अहि क्षेत्र पर अप्पन अधिकार जमा केर सत्तासीन भऽ चुकल छल। आहि काल सिंहेश्वर मे किरात आ कुषाण वंशक छोत्त-छोट राज्य छल जे वाद धरि कर्नाटक करद वनल रहल।
कुषाण वंशी राजभर
कुषाण चाइत चीनक गोवी प्रांत मे रहय वला यू-ची जाइतक एकटा शाखा छल। यू-ची जाइतक पांचटा शाखा छल, हिऊमी, चाउयांग-मी, ही-तुम, ताउ-मी आ कोई-चाउआंग। कोई-चाउआंग के कुषाण कहल जायत अछि। गोवी प्रांत मे हुं-ग-नू जाइत यू-चि जाइत पर आक्रमण कऽ हुनका सभ के गोवी प्रांत से निकालि कऽ वाहर कऽ देलक। ई सभ लोक भागि के सरदरिया आयल। मुदा ओतय सं सेहो हुनका सभ के भागय पड़ल। सरदरियाक यु-सुन नामक एकटा जाइत हूणक सहायता सं हुनका सभ पर आक्रमण कऽ देलक आ ओतय सं सेहो विस्थापित कऽ देलक। लगभग 140 ईपू ई सभ वैक्ट्रिया आयल। ओहि काल वैक्ट्रिया मे शकक शासन छल। एहि पर रहैत कुषाण अप्पन शेष चारि शाखा पर विजय प्राप्त कऽ वेसी शक्ति संपन्न भऽ गेल।
ओकर प्रथम राजा कुजूल कैडफिसेस छल, जे शक्तिशाली आ महत्वाकांक्षी छल। ओ पह्लव शासक के परास्त कऽ गन्धार आ सीमाप्रांत केर अप्पन अधीन कऽ लेलक। ओ वाद मे वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ अस्सी वरख धरि युद्ध मे संलग्न छल। ओ कुषाण वंशक नीव के आओर मजवूत करलक।
एकर वाद ओकर पुत्र विमकैडफिसेस सत्तासीन भेल। ओ अप्पन योग्य पिताक योग्य पुत्र सावित भेल। भारत विजयक सेहरा हुनके सिर वान्हल गेल। हुनकर मृत्युक वाद हुनकर पुत्र कनिष्क प्रथम आ ओकर वाद कनिष्क द्वितीय कुषाण वंशक शासक भेल। कनिष्क अप्पन राजधानी सीमा प्रांतक पुरुषपुर मे वनौअलक। ओ अप्पन प्रभुत्व पुरुषपुर से पाटलीपुत्र धरि स्थापित केलक।
मान्यताक अनुसार, कनिष्क कठोर संघर्षक वाद पाटलीपुत्र के पराजित केलक आ वौद्ध विद्वान अश्वघोष के जमानतक रूप अपना संगे लऽ गेल। अश्वघोषक संपर्क मे आवि के ओ सेहो वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ पहिलुक शैव धर्मावलम्वी छल।25 संभावत: अश्वघोष जेहन वौद्ध विद्वान अप्पन अधिकार मे लहि के लेल ओ मगध पर चढ़ाय केलक। ओ पूर्वी भारत पर अप्पन अधिकार जमा के शांति स्थापित केलक। तिरहुत प्रमंडल मे कनिष्कक छिद्रांकित ताम्र-मुद्रा प्राप्त भेल अछि अहि क्षेत्र मे सेहो नवीन प्रशासनिक इकाईक रूप मे विभक्त कतेक रास राज प्रतिनिधिगण कुषाण शासक अधन क्षेत्र विशेषक सत्ताक संचालन करैत छल।
कुषाणक पतन आ गुप्त साम्राज्यक उदय आ मध्यवर्ती युग मे दूटा प्रमुख राज्य सत्ता अस्तित्व मे आयल। पहिलुक नाग वंश आ द्वितीय वाकाटक वंश। अहि दूनू के अतिरिक्त भार शिव वंश कुषा साम्राज्यक भग्नावशेष पर सत्तासीन भेल, जकर प्रभुत्व अहि पूर्वी क्षेत्र मे वेसी छल। हिन्दू पालिटी (भाग-2 कलकत्ता, 1924) मे डॉ. काशी प्रसाद जायसवालक अभिमत अछि कि ई भार शिव नागा, अपने कंधे पर भगवान शिव के भार को ढोते थे। ई वहि जाइत अछि जे कुषाण वंशक पतनक वाद सेहो लगभग दू सौ वरख धरि अहि क्षेत्र मे सत्तासीन छल। कोशी आ दरभंगा प्रमंडल मे वहि लोक 15म शताव्दी धरि कतो-कतो शासक रूप मे अवस्थित छल।
एहन मान्यता अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक संग विहारक कुषाण वहुलांश मे प्रवेश केलक। ई उत्तर आ दक्षिण विहार दूनू दिस पसैर गेल। ई वहादुर आ कष्ट सहिष्णु छल। जा धरि राज्य सत्ता पर हिनकर अधिकार रहल ता धरि ई क्षत्रपक रूप मे सम्मलित होयत रहल। सिंहेश्वर थान मे ई वड़ संख्या मे छल। ओ शैवमत अपनैलक आ कालांतर मे शिवक भार ढोयै के कारण ई भार शिव नागा सेहो कहावय लागल। वड़ वाद शिवनागा शव्द गौण भऽ गेल आ ओ मात्र भार या राजभरक नाम पर चर्चित भऽ गेल। डॉ. के.पी. जायसवालक अनुसार उत्तर विहारक अधिकंश ठाम पर गुप्त युगक उदय सं पूर्व भार शिव नागा द्वारा राच्य करहि के संकेत अछि।26 सिंहेश्वर के रायभीर, वसंतपुर आदि गाम मे भर जाइतक निवास अछि। रायभीर सं ओ अप्पन राज्यक संचालन करैत छल। ओतय हुनकर दुर्ग सेहो छल जे कोशीक भीषण वाढ़ धो-पोंछकऽ खत्म कऽ देलक।
एखुनका सिंहेश्वर मंदिर कुषाण वंशीय भर जाइतक छल। दीर्घकाल धरि अहि मंदिरक व्यवस्था करैत आ ओकर भाग खायत छल। पिछला सर्वे मे भानुदास नामक एकटा व्यक्तिक नाम खतियान मे दर्ज अछि, जे सिंहेश्वर थान मंदिरक भूमिक स्वामीत्व दीर्घकल धरि छल। भानुदास मंदिर मे सेवक आ अन्यान्य कार्यकर्ता सभहक नियुक्ति करैत छल आ मंदिरक आय प्राप्त करैत छल। अहि व्यवस्था मे किछु विकृति आवि गेल। भानुदास कुषाण वंशी राजभर जाइतक छल। अव राजभर (या भर) मंदिरक अधिकारी वनि गेल आ प्रत्यक्ष रूप सं दान-दक्षिणा आ चढ़ौआक राशि स्वयं ग्रहण करय लागल। अहि जाइत केर दान-दक्षिणा आ चढ़ौआ ग्रहण करहिक नै ते कोनो धार्मिक आधार छल आ न अधिकार। क्षेत्रीय लोक सभ एकर विरोध केलक आ संघर्ष छेड़ देलक। आखिर दीर्घकाल सं मंदिर मे स्थापित अप्पन स्वामीत्वक जनाक्रोशक कारण राजभर छोडि़ देलक। वाद मे परसरम निवासी वावू हरदत्त सिंह मंदिर पर स्वामीत्व ग्रहण केलक। मुदा हुनको भागय पड़ल। मंदिर परिसर मे रहय वला सन्यासीक दवंगताक आगू हुनको किछु नहि चलल। कहल जायत अछि जे वावू हरदत्त सिंह सं कतेक वेर सन्यासीक घोर संघर्ष भेल। मुदा अहि सन्यासीक प्रवलताक आगू ओ सेहो अप्पन हथियार डालि देलक। अहि सन्यासी मे रघुवरदास आ स्वामी वीर भारती वड़ चर्चित भेल। रघुवरदास मंदिर परिसर मे रामजानकी मंदिरक निर्माण करैले छल।
ऊपर उल्लेख करल जा चुकल अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक पश्चात कुषाण वहुलांश मे विहार मे प्रवेश करलक। ओ उत्तर विहारक संग दक्षिण दिस सेहो गेल। रांची जिलाक वेल्दाग आ कर्रा मे क्रमश: कुषाण राजा जुविष्कक एक स्वर्ण मुद्र आ कनिष्कक ताम्र मुद्रा भेटल अछि।27 जे दक्षिण विहार मे कुषाणक शासनक पुष्टि करैत अछि। राजा सीत आ वसंत कुषाण वंशीय छल। राजा सीतक गढ़ कोडरमा मे अछि। ओ टिकैत राजा छल। छोटा नागपुर मे कहावत अछि, घटले घटवाल वढ़ले टिकैत। यानी धन घट जाने से घटवाल आ धन वढि़ जाय सं ओ टिकैत भऽ जायत छै। छोटा नागपुर मे वड़ संख्या मे घटवाल वसैत अछि। ओ अपना के क्षत्रीय कहैत अछि। मुदा विहार सरकार हुनकर उत्तर विहार के राजभर य भर के तरहे हुनका सेहो पिछड़ी जाइतक सूची मे दर्ज कऽ देने अछि। घटवलक नाक-नक्श आ शारीरिक संरचना भर जइत से मिलैत-जुलैत अछि। दूनू के परंपरा आ धार्मिक कृत्य सेहो समान अछि। दूनू शिवक उपासक अछि। अहि सं ई मानय मे कोनो संकोच नहि अछि जे घटवाल सेहो कुषाण वंशीय अछि। छोटा नागपुरक प्राकृतिक परिवेश हुनका आओर वेसी श्यामवर्ण वना देने अछि जखैनकि हिमालयक पाश्र्वभूमि मे निवास करैक कारण भर या राजभर हुनका सं वेसी साफ अछि। घटवाल सेहो टिकैतक रूप मे कतेको रास राजवंश स्थापित केने अछि। एखनो अहि राजवंशक लोक क्षत्रीय सं अप्पन संवंध जोड़ैत अछि। राजा सीत केर छोट भाय राजा वसंतक गढ़क भग्नावशेष सिंहेश्वरक वसंतपुर गाम मे अछि। छोटानागपुरक घटवल सिंह या राय पदवी धारण करैत अछि। उत्तर विहार के भर या राजभरक उपाधि सेहो राय अछि। रायभीर अहि उपाधि केर द्योतक अछि आ राय उपाधि राजवंशी हेवाक प्रमाण अछि। राय का अर्थ होयत अछि राजा।
वसंतपुरक वड़ भूभाग मे राजा वसंतक गढ़क अवशेष पसरल अछि, जाहि मे ओकर गौरवशाली अतीतक कथा जुड़ल अछि। कालांतर मे सिंहेश्वर सं तीन कुषाण वंशीय राजकुमार श्रीदेव, विजलदेव आ कांपदेव क्रमश; श्रीनगर (मधेपुरा), विजलपुर (पंचगछिया) आ कांप (सोनवर्षा) मे अलग-अलग अप्पन राजधानी वनैलक।28 श्रीनगर मे राजा श्रीदेव निर्मित विशाल गढक अवशेष अछि। अहि गाम मे एहन दूटा अवशेष अछि। दूनू पर मंदिर अछि जतय भगवान शिव स्थापित अछि। मुख्य अवशेषक ऊंचाई 12 सं 15 फीट धरि अछि। अहि अवशेषक उत्तर भागक मंदिर परिसर मे सैकड़ों प्रस्तर खंड पड़ल अछि जाहि पर कोनो अनाम मूर्तिकार वड़ कुशलत, निष्ठा आ शालीनता सं दुर्लभ नक्काशी केने अछि। अवशेष के एकटा प्रस्तर स्तंभ (शिलालेख) पर मकरध्वज जोगी 100 अंकित अछि। अहि पर गहन गवेषण आ पुरातात्विक सर्वेक्षणक आवश्यकता अछि।
मधुवनी जिलाक अन्धराठाड़ गाम मे गंगासागर पोखरि पर स्थित मंदिरक एकटा प्रस्तर स्तंभ कर सेहो मकरध्वज जोगी 700 अंकित अछि। अहि मिथिला तत्व विमर्श मे कोनो वौद्ध भिक्षु सं संवंधित मानल जायत अछि।29 भऽ सकैत अछि जे मकरध्वज योगी नाथ पंथी आ सहजयान सम्प्रदायक कोनो योगी हुए।
निषादक धरती
अन्यान्य उपेक्षित समुदाय मे निषाद जाइत सेहो छल, जाहि पर भगवान शिवक विशेष कृपा छल। अथर्ववेद (6.39.3) मे भगवान रुद्र आदिम जाइतक संग निषादक स्वामीक रूप मे स्वीकार करल गेल छल। चर्म धारण करहि के कारण शिव के कृतिवासन कहल गेल अछि। संभवत: निषाद सं संवंध हेवाक कारण शिव के चर्म परिधान धारण करय वला मानल गेल अछि।
तहियौका समाज मे चतुर्वणक अतिरिक्त अनुलोम प्रतिलोम जेहन अंतर्जातीय विवाहक कारण कतेक रास जाइत आ ओकरा सं कतेक रास उपजाइतक विकास भऽ चुकल छल। वोधायन एहने वर्णसंकर जाइत के व्रात्यक संज्ञा देने अछि।30 अहि सूत्र मे वोधायन निषाद जाइत चर्चा केने अछि, जेकरा मुताविक व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं निषादक उत्पति भेल अछि।31 मुदा गौतम धर्म सूत्र (4.14) केर अनुसार निषाद व्राह्मण पिता आ क्षत्रिय माता से भेल अछि, जे उत्तम संकरताक परिचायक अछि।
विष्णु पुराण मे ते एकर उद्भवक एकटा अद्भुत कथ कहल गेल अछि, जकर मुताविक ऋषि सभ पुत्रहीन मृत राजा वेनक जांघ केर पुत्रक लेल यत्नपूर्वक मंथन करलक। ओकर जांघ के मथय सं एकटा पुरुख उत्पन्न भेल, जे जलल ठूंठक समान कारि, वड़ नाट आ छोट मुह वला छल। ओ अति चतुर भऽ कऽ ओहि सभ व्राह्मण सं वाजल, हम की करी? व्राह्म कहलक, निषीद (वैठ)। ताहि सं ई निषाद कहलायल। ओहि सं उत्पन्न लोग विन्ध्याचल निवासी पापपरायरण निषाद गण भेल।32
अहि कथा लेखनक पांछा पुराणकारक मंशा जे रहल हुए मुदा रामायण मे निषादराज गुहक वृतांत अछि जे सानुज आ सपत्नीक भगवान राम के नदी पार करैने छल। हुनकर भक्तिक प्रशंसा वाल्मीकि आ तुलसीदास सेहो केने अछि।
महाभारतक अनुसार, निषाद व्राह्मण पिता आ शूद्र माताक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि।33 मनु निषाद के मत्स्य धातो निषादानां कहने अछि जे मछली मारय वला जाइत छल।34 मनुक मुताविक, निषाद नाव खेवैत अछि आ हुनकर निम्न जाइत मे गणना करल गेल अछि। जंगल, पहाड़ मे ई आखेटक रूप मे जानल जायत अछि। आखेट कर्मक कारण ई व्याध सेहो कहल जायत अछि। मिथुन-रत क्रौंच के एकटा निषाद द्वारा वध किए जाय सं दयाद्र्र भऽ कऽ महर्षि वाल्मीकि के एत्ते पैग शोक भेल आ वहि श्लोकक रूप मे परिणत भऽ गेल।
निषादक कतेक रास उपजाइत वनल, एहन स्मृति मे उल्लेख अछि। तहियौक पुक्कस जाइत निषाद पुरुख आ शूद्र स्त्रीक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि।35 अहि जाइतक काज विल मे रहय वला जीव के मारव छल। व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं उत्पन्न पारशव जाइत के सेहो निषाद कहल जायत अछ।36 ओहि तरहे शूद्र पुरुष आ निषाद स्त्री से कुक्कुटक जाइतक उद्भव भेल।37 निषाद जाइतक पुरुख आ आयोगव जाइतक स्त्री सं जे संतान होयत अछि ओ मार्गव कहलायल जाइत अछि जे आर्यावर्त मे कैवर्त सेहो कहल जायत अछि। हुनकर कर्म नाव चलावैक छल।
'निषादं मार्गवं सूते दासं नौकर्म जीविनम्
कैवर्त मिमियं प्राहुरार्यावर्त निवासिन:।1'
तैत्तिरीय संहिता (10.34)
निषाद पुरुष आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न प्राचीन काल मे चमड़ाक काज करहि वला कारावर जाइत उल्लेख अछि।38 निषाद स्त्री अ वैदेह पुरुख सं उद्भूत आंध्र जाइतक सेहो उल्लेख वायु पुराण (10.36) आ मत्स्य पुराण(50.76) मे अछि। मनु अप्पन स्मृति (10.37) मे निषाद पुरुख आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न अहिण्डक जाइतक चर्चा केने अछि, जे कारागारक देखभाल करैत छल।
एहन कतेक रास निषाद प्रसूत जाइतक आपस मे मिश्रण भऽ जेवाक कारण समान कर्मा शक्तिशाली जाइतक विलयन भऽ गेल। उपयुक्त उपजाइत आव ते खोजै सं नहि भेटैत अछि। एहन कतेक रास उपजाइत समान व्यवसाय परक निषाद, धीवर, मल्लाह, कैवर्त आदि जाइत मे विलन भऽ गेल। ओहि छोट-छोट उपजाइतक अप्पन अस्तित्व रक्षाक लेल एहन भऽ जायव स्वभाविक छल। वैश्य पुरुष आ क्षत्रीय स्त्री सं उत्पन्न संतान कर्मा जाइत धीवर कहैलक।39
कौरव आ पांडवक दादा शान्तनु धीवर(मछुआरा) जरूथक पुत्री योजनगन्धा (सत्यवती) सं व्याह केने छल। अहि विवाहक पूर्व योजनगन्धा महर्षि वशिष्ठक पौत्र पराशरक संयोग सं कृष्ण द्वैपायन के जन्म देने छल, जे अप्पन कालक महाना आचार्य भेल आ महर्षि वेदव्यासक नाम सं विख्यात भेल। आदिकवि वाल्मीकि के किछु लोग व्याध (निषाद) मानैत अछि। मुदा दूनू व्राह्मण छल। रामायण आ महाभारत एकर साक्ष्य अछि।
रामायण मे वाल्मीकि दू ठाम पर अप्पन परिचय स्वयं दैत अछि। राम द्वारा संपादित अश्वमेघ यज्ञक काल वाल्मीकि अहि यज्ञ मे सीता कऽ लऽ कऽ आवैत अछि आ राम के अप्पन परिचय दैत अछि
प्रचेतसोअहं दशमपुत्रौ (उत्तरकांड 96/19)
अर्थात हम प्रचेताक दसवां पुत्र छी।
एक दोसर ठाम वाल्मीकि परोक्ष रूप सं अप्पन रामायण में अप्पन परिचय देने अछि।
इति संदिश्य वहुशो मुनि प्राचेतसस्तदा
वाल्मीकि परमोदारस्तष्णी मासीन्महा (उत्तरकांड 93/17)
अर्थात अहि तरहे महायशस्वी प्रचेताक पुत्र वाल्मीकि दूनू शिष्यक शिक्षा दऽ कऽ चुप भऽ गेल छल।
प्रचेता व्रह्मक पुत्र छल। मनुस्मृति (1.34.35) केर अनुसार व्रह्मा प्रजाक सृजनक कामना सं घोर तप द्वारा शुरू मे प्रजाक पति दस महर्षि के उत्पन्न केलक। ओ महर्षि मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु आ नारद अछि। वाल्मीकि अहि दस महर्षि मे एकटा प्रचेताक पुत्र छल। ताहि सं हुनकर व्राह्मण हेवाक मे कोनो संदेहक गुंजाइश नहि अछि।
आध्यात्म रामायण (अयोध्या काण्ड, सर्ग6, श्लोक 65, 66) मे राम आ वाल्मीकिक वन मे मिलय केर प्रसंग अछि। वाल्मीकि राम के अप्पन विषय मे वतावय अछि, हम जन्म से द्विज छलहुं मुदा हमर आचरण शूद्र जेना छल। शूद्र स्त्री सं हमरा अजितेन्द्रिय द्वारा कतेक रास पुत्र उत्पन्न भेल। चोरक संग रहैक कारण हम सेहो चोर भऽ गेलहुं।
स्कन्द पुराण मे सेहो उल्लेख अछि जे ओ व्राह्मण छल आ हुनकर नाम अग्नि शर्मा छल। मुदा शिकार (व्याघ्र कर्म) आ दस्युकर्म मे ओ लिप्त छल। वाद मे सप्तर्षिक कृपा सं ओ महर्षि वाल्मीकि वनि गेल छल। 40
ओहि तरहे वेदव्यास सेहो व्राह्मण छल नै कि शूद्र। महाभारतक आदि पर्व मे हुनकर जन्मक कथा अछि। ओ महर्षि पराशरक पुत्र छल। हुनकर मां सत्यवती एकटा अप्सराक कन्या छल। राजा उपरिचर अहि कन्याक पालन-पोषणक भार मल्लाहक मुखिया जरूथ केर सौंपने छल। ओ नाव चलावैक लेल तट पर जायत छलि जतय हुनकर मिलन ऋषि पराशर सं भेल। संपूर्ण कथ महाभारत (आदिपर्व 63.70-86) मे अंकित अछि।
पराशर महर्षि वशिष्ठक पौत्र छल। सत्यवती सं जन्म लऽ कऽ कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) गुण, जाइत आ वर्णक दृष्टि सं महर्षि पराशरक वंश मे आवैत अछि। पराशरक पुत्र भला कोन आधार पर शूद्र कहल जायत अछि?
समान व्यवसाय परक जाइत मे कतेक उपजाइतक तिरोहित भऽ जायके पश्चात निषादक वाइस उपजाइत एखनो अस्तित्व मे अछि। ई उपजाइत अछि, कोवट, कैवर्त, चौरा, तीवर, धीवर, वेलदार, विन्द, मल्लाह, सुरहिया, वनपर, गोढ़ी, खुलवट, कौल, जेठौत, परवतिया, चौदहा, राजवंशी, लहेरिया, महिषी, मुरियारी, केवट आ धोवी।
निषादक अहि उपजाइत मे कैवर्त आ गोढ़ी सिंहेश्वरक कमरगामा, दुलार, तरहा, चम्पानगर, डंडारी, वभनी, गम्हरिया, टोका जीवछपुर, जलवार, महुली आदि गाम मे वहुलांश मे रहैत अछि। ई संपन्न कृषक अछि आ राजनीति मे हिनकर वर्चस्व अछि। ई एखनो भगवान शिवक उपासक अछि।
मूर्ति स्थापना
प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा केर कौशिकी मे नव जल उतरैत अछि। जलधारा तीव्र गति सं आगू वढ़ैत अछि। प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा के इतिहास क्षण भरि एतय रूकि के पद्म पलाश अर्पित कऽ जायत अछि। लागैत अछि, शून्य मे वेद ध्वनी गूंजि रहल अछि। नै जानय कहिया सं श्रृंगेश्वरक कौशिकीक जल पीयर भऽ गेल। तहिया सं कोशी पाण्ड, पडुआ या परवान धार वनि गेल।
श्रृंगेश्वर थान मे ऋष्यश्रृंग एखनो जीवित अछि। श्रीमद्भागवत सुनावैत शुकदेवजी कहैत अछि
'गालवो दीप्तिमान रामो द्रोण पुत्र: कृपस्तथा।
ऋष्यश्रृंग पितास्माकं भगवान वादरायण:।।
इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगत:।
इदानि मासते राजव स्वे स्वे आश्रम मण्डले।।'
(गालव, दीप्तिमान, राम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग, महर्षि वेदव्यास ई सातों ऋषि आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि पद पर आरूढ़ होयत)
अहि श्लोक सं ई सिद्ध भऽ गेल अछि जे ऋष्यश्रृंग आव आवय वला आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि मेे से एकटा पद अवश्य ग्रह कऽ अहि कौशिकी अंचल के फेर सं महिम मंडित करत।
ऋष्यश्रृंगक मूर्तिक स्थापना
ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि सिंहेश्वर थान मे अहि ऋषिराजक भव्य प्रतिमाक अभाव खटकैत छल। ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारविसगंज (अररिया) निवासी गोलोकवासी मोहनलाल जी पाण्डेयक आत्मज श्री गोपाल पंडित (सिखवाल व्राह्मण) कुचामण सिटी जिला नागौर (राजस्थान) निवासी द्वारा संगमरमर निर्मित ऋष्यश्रृंगक भव्य प्रतिमा अप्पन माता श्रीमति पार्वती देवीक आदेशानुसार मंदिर परिसर मे स्थापित करैलक। अहि प्रतिमाक प्राण-प्रतिष्ठा-अनुष्ठान वैदिक मंत्रोच्चारणक संग दिनांक 20 जून, 2002 (गंगा दशहरा) के संपन्न भेल। मंदिरक विकास मे ई एकटा नव अध्याया जुडि़ गेल।
सिहेश्वर मेला
एतय प्रत्येक वरख फाल्गुन शिवरात्रि मे वड़ मेला लागैत अछि। जखैन कोशीक विभीषिकाक कारण अहि क्षेत्र मे यातायातक घोर असुविधा छल, पूर्णिमा आ भागलपुर सं एकर संवंध टूटि जायत करैत छल तखैन अहि ऐतिहासिक मेलाक वड़ उपयोगिता छल। वैलगाड़ी पर सवार भऽ कऽ दूर-दराजक लोग अप्पन रसद-पइनक संग अहि मेला मे आवैत छल, अप्पन शिविर लगावैत छल, मेलाक आनंद लैत छल आ साल भरिक लेल अप्पन घरेलू उपयोगक वस्तु कीनैत छल। एतवेटा नै, पहिने ई मान्यता प्रचलित छल जे वावा (भगवान शिव) केर विवाह भऽ जाय केर वाद लोक अप्पन वाल-वच्चा सभहक विवाह तय करैत छल। एतदर्थ फाल्गुन महाशिवरात्रि के कन्य आ वरक देखा-देखी आ संवंध तय भऽ गेलाक संग व्याहक लेल उपयोगी समानक खरीद-फरोख्त सेहो अहि मेला मे होयत छल आ दहेज मे दैक लेल मवेशी सेहो मेला मे कीनन जायत छल। अप्पन दूरक कुटुम्व से भेंट-मुलाकात सेहो अहि मेलाक विशिष्ट ठाम छल। तहैयौका काल मे अहि मेलाक आर्थिक टा नै सांस्कृतिक महत्व सेहो वड़ छल। कोशीक वाढ़, मलेरिया आ दोसर प्राकृतिक आपदा सं जूझैत लोकक लेल ई एकट उल्लेखनीय विश्राम स्थल छल, जतय आवि के किछु दिनक लेल लोक अप्पन कष्ट कं विसुरि जायत छल, आगूक योजना वनावैत छल, आ अप्पन जिजीविषा के तरंगित कऽ जय भोलानाथ, जीयव के फेर आयव, जेहन प्रार्थना कऽ घुरैत छल।
ई मेला सदी सं उल्लास आ आनंदक संगम रहल अछि। वावा भोलेनाथक पूजा-अर्चनाक वाद माटि खोदि केर वनायल चूल्हा पर अपने सं भोजन वनायव, दिन भरि मेल घूमव, टिकुली-सिनूर सं लऽ कऽ दोसर घरेलू सामान कीनव आ रात मे पन्ना लाल थियेटर कंपनीक नौटंकी देखव मेला दर्शनार्थी सभहक दिनचर्या छल। ई थियेटर कंपनी उत्तरप्रदेश सं प्राय: सभ वरख आवैत छल। एकर संस्थापक पन्ना लाल अपने एकटा कुशल कलाकार छल। लैला मजनूं, शीरी फरहाद, सुलताना डाकू, भक्त पूरन मल, माया मछन्दर, अमर सिंह राठौर आदि हुनकर श्रेष्ठ आ चर्चित नाटक छल जकर अहि मेला मे सफल मंचन होयत छल। नगारेक आवाज पर वहरेतवील मे सभ कलाकार अप्पन भूमिका के गावि के प्रस्तुत करैत छल। मंत्रमुग्ध दर्शक पात्र सं अप्पन साधारणीकृत कऽ अपूर्व आनंद, प्रेम, करुणा, राग-विराग, आक्रोश आदि भावक अनुभव करैत छल। अहि थियेटरक ई एकटा विशिष्ट गुण छल।
गलढर सं चौठारी धरि चारि दिन धर मधेपुरा कचहरीक हाकिम-हुक्काम अहि मेलाक कैम्प करैत छल। सीरिज इंस्टीट्यूशनक चुनल गेल स्काउट कैलाश पति मंडल शिक्षक नेतृत्व मे मेला आ मंदिर परिसरक विधि व्यवस्थाक संचालन करैत छल। अनुमंडल मुख्यालय सं आरक्षी वल आ चौकीदारक ड¬ूटी सेहो मेला मे रहैत छल। कतेक वरख मेलाक अंत मे हैजा आ आगलग्गी सं जान आ सामान के क्षति सेहो भेल अछि।
सभ रविवार आ वुधवार के हाट मे विक्र-वट्टाक अलावा अहि मेला मे भरपूर कमाई कऽ एतौका दुकानदार भगवान शिवक प्रसाद वुझि वरख वाद अगुलका मेलाक प्रतीक्षा करैत छल। मुदा, धीरे-धीरे समय वदलि गेल। यातायातक सुविधा सं लोकक पारस्परिक दूरी कम भऽ गेल। अहि क्षेत्रक कतेक गाम शहर वनि गेल जतय घरेलू उपयोगक सामान वहुलांश मे भेटय लागल। पहिने भगवान शिवक दरवार मे जतेक यज्ञ मुण्डन आ मनौतीक लेल ओयत छल आव वुद्धिवादक विस्तारक कारण ओहि मे गुणात्मक कमी आवि गेल। आव एतवै टा जरूर भेल अछि जे सभ साल हजार व्याह अहि मंदिर परिसर भे हुए लागल। सिनेम थियेटरक महत्व के किछु कम कऽ देने अछि, मुदा थियेटरक रंगीनी दिन-प्रतिदिन वढ़ैत गेल। पन्ना लालक मर्यादित थियेटर आव नै अछि। हुनकर स्थान रौता कम्पनी, शोभा थियेटर आदि लऽ लेने अछि। आव मर्यादित मनोरंजनक स्थान अश्लीलता ग्रहण कऽ लेने अछि। यै कारण अछि जे प्रशासन के विधि व्यवस्था आव आओर कड़ा करय पड़ैत अछि आ समय-समय पर असामाजिक तत्व सं मुकावला सेहो।
अहि मेला मे सर्कस आ मौतक कुआं सेहो दर्शक के वड़ आकर्षित करैत अछि। सरकार द्वारा कृषि, उद्योग आ अन्यान्य नव-नव उपकरणक प्रदर्शनीक संग जनसंपर्क विभाग, खादी ग्रामोद्योग आदिक स्टाल मे दर्शकक भीड़ रहैत अछि। जीप, ट्रैक्टरक वाहुल्यक कारण आव हाथीक उपयोगिता कम भऽ गेल अछि मुदा मवेशी मे घोड़ा, बैल,भैंस आ वकरी सभहक खरीद-विक्री होवत अछि। सरकारी स्तर पर ई मेला पंद्रह दिन धरि, मुदा ओना एक माह धरि चलैत अछि।
सातम परिच्छेद
उपसंहार
उत्तर वैदिक कालसं भारतीय संस्कृतिक जय यात्रा आरम्भ होयत अछि. अहि युगमे नै जानय कतेक संभावना साभ्यतिक यथार्थक विराट समुच्चयमे संग हेबाक लेल तैयार बैसल छल, जे बादमे महाकाव्यात्मक सम्पूर्णतामे अवतरित भेल. अप्पन वर्चस्वक लेल ब्राहमण, क्षत्रियमे भयंकर युद्ध सभ्यताक एहन यथार्थ छल जे अहि देशक सांस्कृतिक जीवनके बेसी क्रियाशील बना देलक.
पुरुष सूक्तक ब्राहमणोस्य मुखमासीद वाहू राजन्यः कृतः, के मोताबिक सभ वर्णमे ब्राहमण श्रेष्ठ छल. अप्पन ज्ञान-विज्ञानक कारण समाजक सांस्कृतिक बागडोर हुनके हाथमे छल. ब्राहमण सत्व शक्ति सम्पन्न छल, ते छत्रिय रजः शक्ति सम्पन्न. उत्तर वैदिक कालमे ब्राहमणक विशिष्टता आ श्रेष्ठताके फेर सं प्रतिपादित करल गेल छल. अहि कालमे समाजक संगठन सेहो शुरू भ’ चुकल छ्ल. संगे वर्ण व्यवस्थाक स्वरूप सेहो निश्चित भ’ रहल छल आ सभ वर्णक श्रेणीक निर्धारण सेहो.
उत्त्तर वैदिककालीन समाज व्यवस्था आ महाकाव्यकालीन समाज व्यवस्थामे कोनो अंतर नै छल. महाकाव्यमे वर्णित समाजक आधारशिला पूर्ववर्ती समाज व्यवस्था छल. अहि समाजमे अध्ययन, अध्यापन, यजन-याजन आ दान-प्रतिग्रह जेहन प्रमुख कार्य सं राज्य आ समाजक सभ क्षेत्रमे ब्राहमणक सर्वोच्च पद भेटल छल. शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आ आर्थिक विशेषाधिकार हुनका प्राप्त छल. ब्राहमण सभ वेदक ज्ञाता आ सभ विद्यामे मर्मज्ञ होयत छल. विद्वता आ ज्ञानक कारण ओ भारतीय समाजमे सर्वश्रेष्ठ छल. अप्पन सक्रियता, दूरदर्शिता आ कर्तव्य परायणता सं ओ समाजक निर्माण करैत छल. धार्मिक क्रियाक उद्देश्य समाजमे एकजुटता आ अटूट संगठन स्थापित करब सेहो छल. अहि धार्मिक क्रियामे राज्य आ समाजक कल्याण निहित छल. ओ राजा आ समाजक कल्याणक निमित्त यज्ञ सम्पन्न करैत छल. ऋग्वेद (10.71.9) के मोताबिक, शत्रुक आक्रमणक काल ओ अप्पन राजाक संग युद्धभूमिमे जाइके सैनिकक उत्साह बढाबैत छल. ब्राहमण राजाके अप्पन प्रजा आ राष्ट्रक प्रति कर्तव्यबोध करबैत छल. शतपथ ब्राहमण (11.5.7.1) के मोताबिक राजाक राज्याभिषेकक काल ब्राहमण पुरोहित उपस्थित जनसमुदायके संबोधित करैत छल, ‘हे प्रजा, ई व्यक्ति अहाँक राजा अछि. ब्राहमणक राजा ते सोम अछि.’
अहि कथन सं स्पष्ट अछि जे ब्राहमण राजासं उपर बेसी आश्रित नै छल, मुदा राजा स्वयं ब्राहमणक मुखापेक्षी छल. क्याकि ब्राहमणक बिना राजाक अभिषेक हैय पायब कठिन काज छल. धार्मिक काजमे ब्राहमणक अनिवार्यता पुरोहितक पदक विकास केलक. संकटकालीन स्थितिमे ब्राह्मण शस्त्र सेहो ग्रहण क’ सकैत छ्ल.
दोसरा दिस, क्षत्रिय सेहो ब्रह्मतेज के पाबय लेल अनवरत क्रियाशील छल. ओ अप्पन श्रेष्ठताक स्थापित करैक लेल कतेक रास प्रयास केलक. क्षत्रिय ब्राहमणक बौद्धिक चुनौती स्वीकार नै केलक, मुदा कतेक रास विद्वान, दार्शनिक आ तत्वज्ञानी क्षत्रिय शासक कतेक रास ब्राहमणके अप्पन शिष्य बनौलक. एहन क्षत्रिय शासकमे जनक, अश्वपति कैकेय, काशिराज अजातशत्रु, प्रावहण जैवलि आदि प्रमुख छल. छान्दोग्य उपनिषद (5.3.7) के मोताबिक पंचाग्नि-विधाक उद्भव आ उन्नयन क्षत्रिय सबहक कारण भेल छल, जेकर दर्शन तत्व छल आवागमनक सिद्धांतक प्रतिपादन. ई विद्या ब्राहमणक लग नै गेल छ्ल. ताहि सं सम्पूर्ण लोकमे अहि विद्या सं क्षत्रिय के शिष्यों क’ ल’ क’ अनुशासन हैत रहल छल. (दृष्टव्य प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, डा. जयशंकर मिश्र, पृष्ठ 121-122)
ब्राहमणक तरहे क्षत्रियक अध्ययन-अध्यापनक अधिकार छ्हल मुदा ओ यज्ञ नै करा सकैत छल. अहि तरहे समाजमे क्षत्रियक अधिकार ब्राहमणसं फरछायल छल.
उपसंहार सात
पेज-९४
ज्ञानक आलोक भेटलासँ क्षत्रिय अपनाकेँ सात्विक दिस मोड़ैक प्रयास केलक. आ सांस्कृतिक क्षेत्रमे अप्पन वर्चस्व काएम करए चाहलक. ई स्मरणीय अछि जे अइ युगमे पौण्डरक, ओडू, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, करद आ खश जेहन हस्ती सभ सेहो अइ देशमे आएल. जे अप्पन कुशलता आ सक्षमतासँ ब्राहमण द्वारा चतुर्वर्णमे विधिवत समाविष्ट कएल गेल. एहन संघर्षशील संगठनात्मक व रचनात्मक कालमे ब्राहमणक सूझबूझ, तत्परता आ याचिक कर्मकांड आ क्षत्रिय कर्तव्य कर्म आ तेजक प्रभाव छल जे तहियाक भारतीय समाज एतेक संवर्धित भेल.
मुदा, जाइ ब्रह्म्बल आ बाहुबलक सामंजस्य ऐ देशक आ भारतीय समाजक अविस्मर्णीय विकास केलक आ राष्ट्रीय धाराकेँ गतिमान केलक ओही स्पर्धा आ ईर्ष्याक कारण ओ एक-दोसराकेँ रणक्षेत्रमे ललकारए लागल.
वशिष्ठ आ विश्वामित्रक युद्ध (देखू पांचम अध्याय), परशुराम आ क्षत्रियक लोमहर्षक संग्राम (दृष्टव्य ब्रहमवैवर्त पुराण, गणपति खंड, अध्याय 40), दधीचि आ क्षुवधु नामक राजाक युद्ध (शिवपुराण, अध्याय 38, 39) आदि एहन वृतांत अछि, जे ब्राहमण-क्षत्रिय स्पर्धा जनित अछि. दधीचिक युद्धभूमि तँ अखुनका सिंहेश्वर स्थान अछि.
श्रृंगश्वरश्च नाम्ना वै वैद्यनाथ स्तथैव च.
जपेश्वर स्तथा ख्यातो यो दधीचि रण स्थले.
शिवपुराण (रुद्रसंहिता) अ.2
अर्थात दधीचिक रणभूमिमे श्रृंगश्वर, वैद्य्नाथेश्वर आ जपेश्वर नामक लिंग प्रसिद्द अछि.
अइ युद्धमे क्षत्रिय राजाक सहायता करै लेल स्वयं भगवान विष्णु आएल छल, जकरा दधीचिसँ हारए पड़ल छल. कतेक रास संघर्षक बादो समाजमे ब्राहमणक श्रेष्ठता बनल रहल. क्षत्रिय एकरा छीन नै सकल. विश्वामित्र क्षत्रिय छल. ओ ब्रह्मर्षि पदक प्राप्तिक लेल कठोर तप केलक. हुनका ब्रह्मर्षि बनि जेबाक प्रमाणपत्र वशिष्ठकेँ दिअए पड़लै. ब्रह्मा सेहो प्रगट भ’ क’ हुनका वर मांगैले कहलक. विश्वामित्र कहलखिन जे हम ब्रह्मर्षि हुअए चाहै छी. मुदा मात्र अहाँकेँ ब्रहर्षि कहलासँ हमरा संतोष नै हएत जाधरि स्वयं वशिष्ठ आबि क’ हमरा ब्रह्मर्षि नै मानि लेत. महर्षि भृगुक विष्णुकेँ लात मारब सेहो ब्राहमण-क्षत्रियक झगड़ाक वृतांतक एकटा कड़ी अछि. ओहि वृत्तांतसँ ई स्पष्ट अछि जे ब्राहमण क्षत्रिय सँ श्रेष्ठ अछि.
ऋष्यशृंग ओइ युगमे उच्च कुलोद्भव ब्राहमण छल मुदा तहियोका ब्राहमणमे व्याप्त युद्धोन्माद सँ ओ दूर छल, बड दूर. ओ अप्पन कालक महान समन्वयवादी ऋषि छल. ओ क्षत्रियक विरोध नै केलक, मुदा हुनकर हितक काज, जाइसँ समाज उन्नति करए, तकरे संपादन केलक. हुनकर आगू जातीय स्वार्थ नै, राष्ट्रक कल्याण आ मंगलभावना छल. ओ क्षत्रिय राजा रोमपादकेँ अप्पन ससुर बनौलक. ई जानैत जे रोमपाद उच्च कोटिक क्षत्रिय नै अछि आ हुनकर वंश शाप भ्रष्ट अछि. ओ ओइ संबंधक सहर्ष स्वागत केलक.
एकटा वृत्तांतक मुताबिक रोमपादक पूर्वज महाराज बलिक स्त्री महारानी सुदेक्षणासँ अंध दीर्घतमा अंग, बंग, कलिंग, पुंडर, सुहा आ आंध्र छहटा नेना जन्म लेलक. कतेक रास वृतांतमे आन्ध्रक उल्लेख नै अछि. पांचटा नेनाक उल्लेख अछि. कहल जाइत अछि जे गर्भाधानक काल किछु एहन घटना भ’ गेल छल जे दीर्घतमा अइ नेनाकेँ क्षत्रियत्व सँ भ्रष्ट क’ देलक.
ई स्मरणीय अछि जे राजा बलि संतानोत्पत्तिक लेल अप्पन स्त्री सुदक्षणाकेँ आन्हर ऋषि दीर्घतमाक पास पठेने छल. रानी ‘हँ’ त’ कहि देलक मुदा ओइ दिस हुनकर रूचि नै छल. ओ सोचलखिन, एकटा त’ ऋषि अछि, दोसर आन्हर. संगे-संग हुनकर देह सेहो कार आ कुरूप छल. ताइसँ ओ अप्पन एकटा दासीकेँ लग भेज देलक. मुनि ओकरासँ कक्षीवान आदि कतेक रास पुत्र उत्पन्न केलक. जखन वस्तुस्थितिक जानकारी राजाकेँ भेटल तखैन राजा बड्ड बुझा-सुझा क’ रानी केँ तैयार केलक आ दीर्घतमा लग पठौलक. दीर्घतमा आन्हर होइक बादो बड रतिप्रिय छल. सुरभिक नेना वृषभसँ ओ गोधर्मक शिक्षा प्राप्त केने छल. आँखि नै रहबाक कारण ओकरा शील संकोच सेहो नै छल. कत’ मानव धर्मक मर्यादित परिवेशमे रहएवाली सुदेक्षणा आ कत’ गोधर्ममे निष्णात दीर्घतमाक उद्दाम रति व्यवहार. भला कोन मेल हुअए? ताइसँ ई तमसाएल ऋषि अप्पन नेनाकेँ क्षत्रियत्वसँ च्युत क’ देलक. ई सभटा पुत्र यशस्वी राजा जरूर भेल मुदा विशुद्ध क्षत्रिय नै भ’ क’ एकटा विशिष्ट जाति बला भेल. अइ वंशमे महाभारत कालमे ‘अधिरथ’ भेल जिनकर ‘सूत’ आ हुनकर पुत्र ‘कर्ण’ ‘सूतपुत्र’ कहल गेल. अइ क्षेत्रक निवासी आ राजवंश ब्राहमण ग्रन्थमे व्रात्य कहल जाए लागल. (देखू, व्रात्य, पहिलुक परिच्छेद) जेना राजा बलि क्षेत्रमे दीर्घतमा आ पुत्र उत्पन्न केलक, जे ब्राहमण भेल. (दृष्टव्य श्री भागवत दर्शन खंड 35, पृष्ठ : 39-46)
ऋष्यशृंग अइ सभटा भेदभावसँ ऊपर छल. ओ अप्पन मनमे ई भाव आनबे नै केलक जे ओ उच्च कुलोद्भव ब्राह्मण आ महान आचार्य होइक बादो निम्न कोटिक क्षत्रिय कन्याक पाणिग्रहण क’ रहल अछि. संगे पहिनेसँ चलल आबि रहल क्षत्रियक प्रति ब्राहमणक द्वेषकेँ ओ समग्र रूपसँ निरस्त क’ देलक.
अइ तरहेँ शान्ताक पाणिग्रहणक बाद क्षत्रिय आ ब्राहमणमे प्रसन्नताक लहर आबि गेल. ई स्वाभाविके छल. आब दुनू एक-दोसराक प्रति युद्धक कटुताकेँ बिसरि शांति, सद्भावना, समन्वय आ समरसताक स्थापनामे जुटि गेल. अइ परिवेशमे विकासक काज बेसी भेल. देशक सभ टा क्षत्रिय राजा ऋष्यश्रृंग केँ जमाय जेना सम्मान देलक. ब्राहमण आ क्षत्रिय शान्ति चाह’ लागल. ओ सभ कियो महासमर, दशराग्य युद्ध, वशिष्ठ-विश्वामित्र, परशुराम आ सहस्त्रार्जुन युद्ध आदि सबहक़ विभीषिका देखि चुकल छल. दशराग्य युद्धमे पचास हजार सँ बेसी ब्राहमणक वध भेल छल.
राजा रोमपादक अइ वैवाहिक अनुष्ठानकेँ सम्पन्न कराबैक पश्चात ब्राहमण-क्षत्रिय एकता सभ दिन लेल स्थायित्व प्राप्त क’ गेल. ईहो एकटा कारण भ’ सकैत अछि जे भारतमे क्षत्रिय सभ ऋष्यशृंगक कतेक रास मंदिर बनबौने अछि.
मुदा, कतिपय कट्टरपंथी केँ ब्राहमण-क्षत्रियक ई मेल आ आर्य-अनार्यक समन्वयक प्रयास नै सोहाएल. समाजमे एहनो लोक रहैत अछि जे स्नेह, सद्भावना आ समन्वयक वातावरण नै, अशांति आ विघटन पसिन्न करैत अछि. अहिने लोक सभ ऋष्यशृंगक प्रतिभा आ लोकप्रियतासँ ईर्ष्या सेहो कर’ लागल. ई गप सर्वविदित अछि जे ऋष्यशृंग सभसँ पहिने पुत्रेष्टि यज्ञ करेने छल आ एकर मंत्रदाता आ मंत्रोचित अनुष्ठानक मंत्रक पुरोधा छल. मुदा हरिवंश पुराणमे संकलित पुत्रेष्टि-यज्ञक सैकड़ासँ बेसी मंत्रक संग कत्तौ ऋष्यशृंगक नाम धरि नै अछि. ओतए मात्र ‘ऋषि उवाच’ टा अंकित अछि. कोनो ऋषिक नाम नै अछि.
हमर विचारसँ ई उत्तर वैदिक कालमे सभसँ पैघ षड्यंत्र छल. तपोपुंच समन्वयवादी ऋष्यशृंगक छविकेँ मैल करैक लेल कट्टरपंथी सभ कतेक रास घृणित षड्यंत्र रचने छल. ओ कट्टरपंथी ऋष्यशृंगक उदारवादी नीतिसँ जरैत छल. ऋष्यशृंग आर्य टा मे नै, अनार्य मे सेहो अप्पन साधना तपस्याक पावन स्थल बनौलक. पूबमे वर्तमान अरुणाचल प्रदेशक सुनसरी नदीक तट पर ओ तपस्या केलक. हुनकर स्मृति चिह्न ई स्थल आइ धरि समेट क’ राखने छल. हुनकर ई तपस्थल ‘श्रृंग गुड़ी’ क नामसँ चर्चित रहल हएत, जे बाद मे ‘सिंगोड़ा’ बनि गेल. अइ क्षेत्रमे ‘गुड़ी’ शब्द ठामक लेल प्रयुक्त होइत अछि. वेगवती सुनसरीक धारक कात सिंगोड़ा घाट आ घाटपर स्थित विभंडक आश्रम एखनो ऋष्यशृंगक तपस्याक साक्षी अछि. एकर आगू वनाच्छादित पहाड़ी अछि. ओकर नीचा ऋष्यशृंग मंदिर. एत’ सभ बरख फाल्गुन कृष्ण पक्षपर शिवरात्रिक मेला लागैत अछि. एतौका मोपा, शर्दुकमेन, दिगारू, निशि, अपतनी, हिलमिरी, तगिन, खुम्परी, बाँचू, तंगसा, मिजि आदि भाषा-भाषी आदिवासी लोकसँ पूछू. ई अहाँकेँ ‘सिंगोमुनी’ केँ ल’ क’ बताएत, कलकल करैत सुनसरी धार आ पहाड़पर झुमैत खेती सभटा ‘सिंगोमुनी’ केर प्रसाद अछि. ईसाई धर्मक अइ इलाकामे प्रचार-प्रसारक बाद अइ ठामक महत्व किछु गौण भ’ गेल अछि. मुदा पुरना पीढीक आदिवासीक मनमे अइ ठामक चमत्कारिक वृत्तांत अखनो पुरान नै पड़ल अछि. किछु दिन बाद भ’ सकैत अछि जे ई स्मृति-चिह्न कालक प्रवाहमे बहि जाए.
भारतक ई पूर्वी प्रदेश जत’ अस्पृश्य नरभक्षी अनार्य जाति निवास करैत छल, ओइ युगमे आर्य आ अनार्य दुनू फराक-फराक कोनपर अछि. मुदा शांति, तप आ समन्वयक पुरोधा ऋष्यश्रृंगक लेल आर्यावर्तक समुच्चा धरती हुनकर साधना स्थली छल. ओ अस्पृश्यताकेँक धर्मक कलंक आ एकटा दानवीय कृत्य मानैत छल. सनातन धर्ममे अस्थायी अस्पृश्यता कालांतरमे जन्मजात अस्पृश्यताक जे रूप ग्रहण केलक ओ अइ धर्मक विघटनक कारण भेल.
ऋष्यश्रृंग दूरदर्शी रहथिन. ओ अप्पन कालमे देखि लेने छल जे रक्त-शुद्धि आ दस्यु व अनार्यकेँ आर्य धर्ममे संस्कारित करबाक प्रश्नपर महर्षि वशिष्ठकेँ अप्पन दृढ़ सिद्धांतक आकाशचारी आसनसँ नीचाँ उतरि वास्तविक आ जीवनगत यथार्थक सन्दर्भमे लाचार भ’ क’ अप्पन व्यवहार बदलए पड़ल किएकि दुनू जातिक समन्वयसँ राष्ट्रक मुख्यधारा तीव्रगतिसँ प्रवहमान छल. विश्वामित्रक बाद ऋष्यशृंग अइ धाराकेँ बेसी गति देलक. विश्वामित्र शस्त्रक सेहो प्रयोग केलक मुदा ऋष्यशृंग विपरीत सांस्कृतिक क्षेत्रमे भावनात्मक जनसंपर्क, शास्त्र ज्ञान, यज्ञ आ तपसँ हुनका सांस्कृतिक दृष्टि सँ पराभूतकेँ अप्पन धारामे जोड़ै लेल आजीवन क्रियाशील रहल. सुदूर पूबक मोपा, मिज, तंगसा जेहन अति दुर्गम क्षेत्र हुअए बा दक्षिणक तुंगभद्राक सघन वनाच्छादित द्रविड़ क्षेत्र, ऋष्यशृंग निर्भय आ निर्विकार भावसँ एत’ तप करैत छल, शास्त्रज्ञानसँ जनजीवनमे नव आलोक प्रदान करैत छल आ एक दीपसँ दोसर दीपकेँ प्रज्ज्वलित करैत छल.
देशक पश्चिम आ उत्तरमे ऋष्यशृंगक ढेर रास मंदिर अछि, जे या तँ हुनकर तपस्या आ यज्ञस्थलीक स्मृतिक चिह्न अछि या हुनकर वंशक बनाओल स्मारक स्वरूप मंदिर आ समाधि. ओइ ऋष्यशृंग वंशज मे किछु ब्राहमण, किछु क्षत्रिय आ किछु दुनूक बीच एकटा दोसर जाति अछि जना श्रंग्वाल, श्रृंगी, शिखवाल, सिखवाल, श्रीन्ग्पुरी (महाराष्ट्र मे), नायक (मध्यप्रदेश मे), श्रृंगी ऋषि (कर्नाटक मे) ब्राहमण . दोसर दिस श्रिंगा (राजस्थान मे), विशेनवंशी, सेंगर वंशीय, शुंघ वंशीय जेहन कतेक रास क्षत्रिय समुदाय अछि जे अपनाकेँ ऋष्यशृंगक वंशज मानैत अछि. ताइसँ देशक विभिन्न भागमे हुनकर वंशजक बनाओल कतेक रास मंदिर, आश्रम आ समाधिक रूपमे अइ महान ऋषिक स्मृति चिह्न अछि. एकरामे कतेक रास एहन चर्चित स्थल अछि जे ऋष्यशृंगक जन्म आ मृत्युसँ हुनकर संबंध जोड़ैत अछि.
पुराकाल मे ऋषि विशेषक मुख्य समाधिक अतिरिक्त आर ठाम पर कतेक रास समाधि होइत छल. एहन समाधिमे श्रद्धालु दिवंगत ऋषिक दांत, कमंडल, खड़ाम, चुट्टा आदि समाधिक भीतर राखि देल जाइ छल. यवनक आश्रमसँ कतेक मंदिर ध्वस्त भ’ गेल आ समाधिक धरतीकेँ गीरि गेल. कतेक स्मारक पुनर्निर्माण बादमे श्रद्धालुक वंशज करौलक. महाराष्ट्रमे भुसावलमे ऋष्यशृंगक एकटा मंदिर छल. ताप्ती धारमे बान्ह बनलासँ ई मंदिर धारक पानिमे समाधि ल’ लेलक. एत’ स्थापित ऋष्यशृंगक मूर्तिकेँ सरकारक सहयोगसँ श्रद्धालु फराक मंदिर रावेरमे फेर सँ स्थापित केलक. मन्दिरमे ऋष्यशृंगक पूजा होइत अछि मुदा समाधिमे नै. किएकि आर्य संस्कृतिमे समाधि पूजाक विधान नै अछि, एकरा श्मशान पूजन जेहन अशुद्ध कर्म मानल जाइत अछि.
भारतवर्षक प्रायः सभ राज्यमे ऋष्यशृंगक मंदिर अछि. एहन गौरव कोनो दोसर ऋषिकेँ नै भेटल अछि. किछु मंदिरक विवरण नीचाँ देल जा रहल अछि.
बिहार
श्रृंगेश्वर स्थान (सिंहेश्वर स्थान) जिला मुख्यालय मधेपुरासँ आठ किलोमीटर उत्तर ई सुप्रसिद्ध शैव तीर्थ स्थल अछि. मुख्य शिव मंदिरमे ऋष्यशृंग अप्पन मंदिरमे स्थापित छथिन.(देखू परिच्छेद छठम)
ऋषिकुंड (देखू सम्पादकीय)
राजगीर पटनासँ 120 किलोमीटर दक्षिण ऋष्यशृंगक तपस्या स्थल. नीलगिरी पर्वतसँ जुड़ल सप्तकुंड. रत्नगिरि पर्वतक नीचाँ एक तप्त कुंड जेकरा ऋष्यशृंग कुंडक नामसँ जानल जाइत अछि. आइ-काल्हि ई मकदुम कुंडक नामसँ चर्चित अछि.
उत्तरप्रदेश
श्रृंगवेरपुर (देखू चारिम परिच्छेद)
परीक्षितगढ़ मेरठ रेलवे स्टेशनसँ एक किलोमीटर दूर पर ऋष्यशृंग आश्रम.
कन्नौज ऋष्यशृंग मंदिर.
सिहीराम (श्रृंगीराम) फरुखाबाद भगीरथीक कात ऋष्यशृंग मंदिर. एत’ सभ बरख दशहरामे मेला लागैत अछि.
अगस्त्य नगर (अगस्त्य मुनि, चमोली) उत्तरांचलक अलकनंदा पर्वतपर ऋष्यशृंग आश्रम.
नेमिषारण्य (सीतापुर) लखनऊ सीतापुर रेलवे लाइनक कात भव्य मंदिर.
मध्यप्रदेश आ छतीसगढ़
चांदा (चंदपुर) सादक (मांडक) नामक स्थानपर ऋष्यशृंगक पिता श्री महर्षि विभाण्डकक प्राचीन आश्रम (सादक आ मांडक विभाण्डक क बिगड़ल रूप अछि)
झरबाबरवासागर झाँसी मांदेर रोड पर पुत्रेष्टि यज्ञ स्थल आ मंदिर.
सिहोबा (देखू चारिम परिच्छेद: महानदीक प्रगट हएब)
मंदसौर गीताभवनमे ऋष्यशृंग मंदिर आ धर्मशाला.
गुजरात
बिलोद (भड़ोच) नर्मदा धारक कात ऋष्यशृंग आ शान्ताक तपस्या स्थल आ अइ क्षेत्रक प्रमुख ऋष्यशृंग आश्रम.
महाराष्ट्र
कोपरगांव गोदावरी धारक कात ऋष्यशृंगक समाधि आ महर्षि विभाण्डक मंदिर. एत’ सभ बरख चैत्र मासमे मेला लागैत अछि.
तापसवाडी (ल. राकेर, जिला. जलगाँव) ऋष्यशृंगक प्राचीन मंदिर, जे श्रीन्ग्य देवक नामसँ प्रसिद्द अछि.
सींगत (पो. तांदुलवाडी, त. रावेर जिला. जलगाँव), तांदुलवाडी भुसावलसँ 14 किलोमीटर सुखल धारक कात ऋष्यशृंगक प्राचीन मंदिर. रिश्य्श्रीन्ग्य पदमासन मे.
आष्टी (नांदेड़) ऋष्यशृंग आश्रम आ मंदिर.
अनसिंग (जिला. वासिम, महाराष्ट्र) ऋष्यशृंग मंदिर.
कारला (त. पुषद, जिला. यवतमाल) ऋष्यशृंग समाधि.
राजस्थान
ढ्सुक (जिला. अजमेर) मंदिर
सरेडी (जिला भीलवाड़) मंदिर आ स्कूल.
विजय स्तम्भ दोसर, चारिम आ छअम महल पर ऋष्यशृंग आ शान्ता माताक मूर्ति लागल अछि. (महाराणा कुम्भाक सम्मान शोधक विषय).
मात्रिकुंदिया (जिला चित्तौड़गढ़) बनास धारक कातक मंदिर.
बून्दी मंदिर आ धर्मशाला.
संगावदा (जिला बूंदी) त्रिवेणीक कात मे.
चंदेसरा (जिला उदयपुर) मंदिर.
जैतारण (जिला पाली) मंदिर आ धर्मशाला.
केशवराय पाटन (जिला बूंदी) मंदिर.
जयपुर मंदिर आ ऋषि श्रीन्ग्यश्रम.
केकड़ी (जिला अजमेर) मंदिर आया धर्मशाला.
रवैरावाद (जिला कोटा) मंदिर.
भ्रिभासनी (जिला नागौर) मंदिर.
उदयपुर रिश्य्श्रीन्ग्य मंदिर.
भीलवाड़ा ऋष्यशृंग संस्थान. रिश्य्श्रिंग आ माता शान्ताक मंदिर. 19 मई, 1996 केँ मूर्ति मे प्राण-प्रतिष्ठा भेल. विशाल परिसर, स्कूल, धर्मशाला आदि.
पुष्कर. ऋष्यशृंगक मंदिर, अ. भा. सिखवाल ब्राहमण महासभाक कार्यालय.
चित्तौड़गढ़ (बड़ामठ) ऋष्यशृंग आश्रम आ छात्रावास.
कोलर (पाली) अरावली पर्वत श्रृंखलापर मंदिर. फुलाद रेलवे स्टेशनसँ 35 किलोमीटर. मूर्तिक प्राण-प्रतिष्ठा 4 मई, 1987 केँ भेल. वर्षा ऋतुमे प्राकृतिक छटा दर्शनीय.
कर्नाटक
शृंगेरी मठ (देखू चारिम परिच्छेद)
श्रृंग गिरि (देखू चारिम परिच्छेद)
आंध्रप्रदेश
हैदराबाद ऋष्यशृंग मंदिर आ धर्मशाला.
हिमाचल प्रदेश
बागी (बनजार जिला कुल्लू) ऋष्यशृंग मंदिर
संकीर्ण (त. वंजार, जिला. कुल्लू), जे नौ मास बर्फसँ झाँपल रहैत अछि. अति प्राचीन ऋष्यशृंग मंदिर आ लगमे हुनकर योगनी कुंड.
धौंधी (वंजार) ऋष्यशृंग मंदिर (ई पांच सौ साल पुरना अछि)
एकर अलावे दोसर-दोसर ठाम अज्ञात ठामपर सेहो ऋषिराजक स्मृति चिह्न हएत. ई ऋष्यशृंगक गौरवोज्ज्वल कीर्तिक साक्षी अछि.
अइ ग्रन्थक समापनक पहिने हम श्रद्धापूर्वक यजुर्वेदक सर्व शक्तिमान परमेश्वरक विराट स्वरूपक स्मरण करैत छी.
सहस्त्र शीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात.
सह भूमिं सर्वतः स्प्रत्व त्यातिष्ठद्द्शालान्ग्लम.
तस्माद्द्याग्यात्सर्वहुत ऋचः समानी जज्ञिरे.
छंदासी जज्ञिरे तस्मात्यास्त्जुत्तास्माद्जायत.
सृष्टिकक आरम्भ मे परम पूर्ण अत्यंत पूजनीय सर्वहुतः परमात्मा सँ (ऋचः) ऋग्वेद (सामानि) सामवेद (जज्ञिरे) उत्पन्न भेल. (तस्मात) ओइ परमेश्वरसँ (छन्दां॑सि) अथर्ववेद (जज्ञिरे) उत्पन्न भेल. (तस्मात्यजुः अजायत) ओइ प्रभुसँ यजुर्वेद उत्पन्न भेल. आ चराचर मे व्याप्त मंत्रदृष्टा ऋष्यशृंगक असीम अनुग्रहकेँ दुनू हाथ जोड़िक’ प्रणाम निवेदित करैत छी.
ऊं ऋष्यशृंगे नमः
परिशिष्ट (क)
पुत्रेष्टि यज्ञ
ब्रहमचारी कृष्णदत्त 30 बरखक युवक छल. ओ पढ़ल-लिखल नै छल. कोनो विद्यालयमे ओ प्रवेश नै लेने छल. ओ महान योगी छल. ओ योग निकेतन ऋषिकेषक श्री योगेश्वरानंदजी महाराजक शिष्य छल. जखन ब्रहमचारी कृष्णदत्तयोग समाधिमे लीन भ’ जाइ छल तखन हुनकामे दिव्य ज्ञानक धारा प्रवाहित हुअए लागैत छल. कहल जाइत अछि जे ऋषिक आत्मा हुनकापर उतरैत छल आ ओ अर्धचेतन आ अचेतनावस्थामे ओइ ऋषि सभसँ कतेक रास काज-धाज क’ आध्यात्मिक आ वैज्ञानिक व्याख्या करैत छल. एहन लागैत छल जे ओ सतयुग मे पहुँच गेल अछि जाइमे वैदिक संस्कृति देवत्व, सत्य, धार्मिक आ पवित्र आत्मा सर्वोपरि अछि. ब्रहमचारी कृष्णदत्तक अचेतावस्थामे एहन वैज्ञानिक आ आध्यात्मिक व्याख्या आ विश्लेषण विजडम ऑफ़ द एंसियेंट रिसीज (WISDOM OF THE ANCIENT RISHIES)मे संकलित अछि.
एकर प्रकाशक अछि वैदिक अनुसंधान समिति III, E-31 लाजपतनगर, नई दिल्ली-24. अहि ग्रंथक मूल हिंदी मे आब नै भेटैत अछि. अंग्रेजी मे अनूदित ग्रंथ उपलब्ध अछि. पुत्रेष्टि यज्ञक संबंधमे अइ अमूल्य ग्रंथक एकटा उद्धरण प्रस्तुत अछि. अइ ग्रंथमे लेखकके ऋष्यशृंगक पुनरावतार कहल गेल अछि.
PuttreshthiYajna (Sacrificial ceremony for a son’s birth) and medicines.
A herb- ‘Kathakuta’ growing on mountains, blooms with the white flower, keeps one thousand insects in the lower part of its root. Its body is white blue and leaves look like pun sagati. Sweet in its root and bitter in its top, this herbal medicine has to be mixed with another medicine known as ‘ShankhaAnuvat’. Its flower looks like the flower of an Almond plant. It has a bitter bark although its root is replete with ‘Baka’ a tasteless juice which is also known as Akrata. The three doses of its leaves, bark and root be mixed with the five of that of ‘Kirkir’ (an herb I have already mentioned) to make a perfect ‘Astanga’. A leaf like cake should be prepared of this substance and be kept in an earthen pot to absorb its poisonous properties. This refined medicine has a curative effect on all gynecological troubles of urethra, eyes, Anawat (a vein) and other physical deficiency, if administered of a period of forty days. The panchang and the trigat are other prepa rate on like Astang. I had studied all of them along with the other skills of Ayurveda for 84 years before I (Shrangi Rishi) conducted ‘Puttereshthi’ Yajna for the emperor Dashratha. This Yajna can be successful performed only by a master of Ayurvedic knowledge. Only a few crudité scholars of this science know this therapy by which ailing organs of human body viz. eyes, ears, tongue etc. can be cured.
Diagnose of Dashratha
Before setting up a yajnashala or the place for sacrifice of ‘Puttreshthi’, I examined the king Dashratha well and examined closely his ‘Akrata-Dwar’ one of the entrances in human body each haunted by a deity. The two eyes are consecrated by Jamdagni and Vishwamittra. The front of ear and that of nose is enshrined by Bharadwaj and Ashwani Kumar respectively. To purify them, one has to know these different medicines which are named after their name. Accordingly they are called Jamdagni medicine, Bharadwaj medicine and so on. These medicines have different therapeutic range. In Puttreshthi, in addition to other articles, the fuel (woodenslices) of aak, shami, Jatamansi, Trikata, Chandari (AnubhutaSamubhukta) Anikrata are required. The altar hasin in Yajnashala be shaped as virginal canal of womanand that too of the same size which the virginal canal of the woman desiring son, has held. The smoke and odor created by such a sacrifice can cure and make up all diseases and deficiencies of my barren daughters. This is a miracle of Ayurveda which can’t be mastered in a single span of human life.
Diagnose of the Wives of Dashratha
I, (Shrangi Rishi) had also availed the occasion of the examining perfectly all the three wives of Dashratha. On the basis of Ayurvedic Knowledge, I had to see the shape of their virgina-canals without which, I could have never set up the desired Yajnashala. Though a disgraceful act, yet MaharashiVashistha insisted upon showing their vital organs to me, in spite of the reluctance of Arundhati. In this way, I could set up three altars of three different shapes.
Diagnose in one thousand pages
I recordedmy experience of the so called puttreshthi in many articles. These commentaries, compiled in a book, concentrate on various types of diagnose, each covering one thousand pages, are missing. I doubt whether Mahanandji (An unborn soul wandering in space since thousands year and casually interpreting the Bramchachari with its expositions and prophesies) shall be able to find out this volume which made to realize the vastness of the subject, after I wrote it.
परिशिष्ट (ख)
ऋष्यशृंगक सासुर मालिनी
(इतिहासक अएनामे चम्पानगर)
पुराण आ महाकाव्यक अलावा उत्तरकालीन संस्कृति, साहित्य, बुद्ध आ बुद्धोत्तरकालीन संस्कृति, पालि साहित्य, मालिनी (चम्पापुरी) क पूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करै लेल बेसी महत्वपूर्ण अछि. जकर पूरक जैन आ ब्राहमण साहित्य सेहो पर्याप्त अछि. भगवान बुद्धक आविर्भावसँ पहिने आ बाद मालिनी (चम्पापुरी) क इतिहास आ भूगोलक सभसँ महत्वपूर्ण अध्याय षोडश महाजनपदक उत्कर्ष आ विपर्ययक इतिहास, भौगोलिक स्थिति आ दोसर विवरणक लेल जैन ग्रंथ आ महाभारतक कर्ण पर्वक अनुपूरित अन्यान्य पालिग्रंथ प्रमुख स्रोत अछि. आउ, ऐ स्रोतक आधारपर ऋषिराजक सासुर मालिनीक गौरवशाली इतिहासक अध्ययन कएल जाए.
मालिनीक समृद्धि ऋष्यशृंगक मालिनी एबाक संग लखाह दिअए लागैत अछि. जे मालिनी बहुत काल धरि अकालक चपेटमे छल, ओ ऋषिराजक आबएसँ हरित-पल्लवित-पुष्पित आ अकूत धन-धान्य सँ परिपूर्ण भ’ गेल.
संस्कृत कथाकार आ महाकवि दंडी विरचित दशकुमार चरितम (मदन मोहन तर्कालंकार संस्करण, पृष्ठ 59) क मुताबिक चंपामे गंगाक कात महर्षि मरीचि रहैत छल. ई ज्ञातव्य अछि जे महर्षि मरीचि ऋष्यशृंगक पूर्वज छल. ताइसँ जाइ इलाका सँ महर्षि मरीचि अप्पन साधना-तपस्याक लेल नीक बुझलक ओकरा हुनकर विद्वान आ तपोनिष्ठ प्रपौत्र ऋष्यशृंग अप्पन विपुल ज्ञान-विज्ञानसँ बड रास तपोज्ज्वल क’ देलक.
अंगक अलावा आनव सभक राजनैतिक धुरि मालिनी छल. ई निर्विवाद अछि जे रामायण कालमे ऋष्यशृंगक महिमासँ ई नगर समृद्ध भेल छल. महाभारत कालमे अतुलित दानवीर आ शक्ति पुंज कर्णक कारण ई बेसी प्रसिद्द भेल.
राजा रोमपादक प्रपौत्र पृथुलाक्षक पुत्र ‘चम्प’ मालिनीक नाम चंपा राखलक. तहिया सँ ई चम्पापुरी बनि गेल. चम्प बड शक्तिशाली राजा छल. मत्स्य पुराण 48/97 क मुताबिक:-
‘पृथुलाक्ष सुतश्चापी चम्प नामा वभूव वै.
चम्पस्यतु पुरी चम्पा तीर्थ या मालिनी भवत.
अइ श्लोकसँ स्पष्ट अछि जे चम्पा पहिने मालिनी छल. संगे-संग ओ चर्चित तीर्थ सेहो छल. राजा चम्पाक बारहम पीढ़ीमे अधिरथ भेल जे कर्णकेँ गंगामे प्रवाहसँ निकालि क’ पोष्यपुत्र बनौलक.
संभवतः अधिरथक काल अंग कुरुक अधीन हुनकर करद राज्य छल. गंगाक उत्तर ‘कुरसेला’ अछि, जतए कोशी गंगासँ संगम करैत अछि. ओ प्राचीनकालमे ‘कुरुशिला’ छल, जे कुरु सबहक राज्य हेबाक प्रमाण अछि. पुर्णिया गजेटियर पृष्ट 737 क मुताबिक कुरुशिलासँ कुरु राजाक राज्यक पहाड़ी भागकेँ बुझबाक चाही. एखुनका कुरसेलासँ दखिन गंगा कातपर बटेश्वर पर्वत श्रृंखला अछि, जाइपर महादेवक बड रास पुरना मंदिर अछि. योद्धा कर्ण केँ ओकर मित्र दुर्योधन आ दोसर कौरव प्रमुखक आग्रहपर अंग राज्याभिषेक कराएल गेल छल.
‘प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनी नगरी मय’
महाभारत (शांतिपर्व 5/6)
पद्मपुराण (स्वर्ग खंड, 38/72) क मोताबिक भारतक चर्चित सनातन तीर्थमे चम्पापुरीक नाम श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि.
ततश्चम्पा समासाद्य भगीरथ्यांकृतोद्वः
देंडापर्ण समासाद्य गों सहस्त्र फलं लभेत.
पुराणकार भागीरथीक कात पर अइ चम्पापुरीमे ‘दंडापर्ण’ नामक एकटा तीर्थक उल्लेख केने अछि, जेकर दर्शनसँ सहस्त्र गोदानक पुण्य भेटैत अछि.
‘जिनप्रभसूरि’ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’मे लिखने अछि जे कौशिक ऋषिक आर्य शिष्य ‘अंगर्षि’ आ ‘रुद्रक’ चम्पामे विधिसँ एकटा पैघ यज्ञ केने छल. (अस्यां कौशिकार्य शिश्यांगर्षि रुद्रकाभ्याख्यान संविधानकं सुजात प्रियंग्वादि संविधान कानि च जज्ञिरे). ओ आगू लिखने अछि जे मालिनी (चम्पा) मे नीक लोग बासित अछि. ओ मणि-मुक्ता सँ अलंकृत अछि, जे हुनकर समृद्धिक सूचक अछि.
‘उत्तमतम नरनारी मुक्तामणि घोरणिप्रस वसुवतः
नगरी विविधादभुवस्तु शालिनी मालिनी जयति.’
विविध कल्प तीर्थ, पृष्ठ 69
चम्पा तहिया भारतक छहटा महानगरमे एकटा छल. ई महानगर छल साकेत, राजगृह, श्रावस्ती, चम्पा, कौशाम्बी आ वाराणसी. दीर्घनिकाय II-146 क मोताबिक मल्लक शालवनमे जखन भगववान बुद्ध परिनिर्वाण प्राप्त क’ रहल छल तखन हुनकर शिष्य धर्म भण्डागारिक ‘आनंद’ हुनकासँ कोनो महानगरमे परिनिर्वाण करैक लेल प्रार्थना करैत काल चम्पाक सेहो उल्लेख महानगरक रूपमे केने छल.
चम्पा विश्वक पुरना नगर सभमे एक छल. ई उत्तरवैदिक कालमे बसाएल नगर अछि. ई पाटलीपुत्रोसँ पुरना अछि. रामायण आ महाभारत कालमे पाटलीपुत्रक कोनो उल्लेख नै अछि, मुदा मालिनी (चम्पा) ओइ युगमे सेहो चर्चित छल. बौद्ध साहित्यमे पाटलीपुत्रक उल्लेख अछि. ताइसँ चम्पा पाटलीपुत्रसँ बड पुरना नगर अछि.
भारतक ई प्रमुख व्यावसायिक केंद्र सेहो छल. एतौका व्यापारी सुदूर ‘इंडोचीन’ मे जा क’ ‘चम्पा’ नामक नगर बसौने छल. ओइ काल समुद्रसँ व्यापार करएबला व्यापारीक दल अइ चम्पा नगरमे रहैत छल. जिनकर नौबेड़ा सदिखन गंगाक लहरपर चलैत रहैत छल आ चम्पाक गंगामे लंगर द’ क’ ठाढ़ रहैत छल. अइ तरहे कतेक कथा-कहानी आ इतिवृत्ति सँ भरल ई चम्पापुरी अछि जकर प्राचीर गर मे गंगाक लहरक भुजा सदिखन आवेष्टित रहैत छल. चम्पाक व्यापारी सिन्धु सौवीर देशक अनवरत यात्रा करैत छल. (दृष्टव्य विधार की नदी, पृष्ठ 91-93)
चम्पा सनातन हिन्दू सबहक अलावा बौद्ध आ जैन सबहक सेहो महिमामंडित तीर्थ अछि. एकर सर्वाधिक चर्चा बौद्ध आ जैन साहित्यमे भेल अछि.
चम्पाक रानी ‘गर्गरा’ अइ नगरक दक्खिन पच्छिम भागमे एकटा रमणीय पोखैर खुनौने छल. अश्वघोषक मोताबिक अइ पोखैरक कातमे पाँच तरहक चम्पाक फूल सँ युक्त उपवन छल. दीर्घनिकाय (शोणदंड सुत्त I/4) क मोताबिक भगवान बुद्ध अप्पन पाँच सौ भिक्षुक संग अइ उपवनमे रहल छल. चम्पामे भगवान बुद्धक दिनचर्याक विवरण विनय पिटक (1/7 312-315) सँ भेटैत अछि. गर्गरा पुष्करणी परिव्राजक, मुनि आ संन्यासीक विश्राम स्थलक रूपमे प्रसिद्धि प्राप्त क’ लेने छल. ई दार्शनिक परिसंवादक ध्वनिसँ अनवरत गुंजैत रहैत छल. चम्पामे बुद्धक यएह स्थान निवास लेल बेसी उपयुक्त छल.
चम्पामे अप्पन प्रवासक क्रममे चम्पा राज्यक अस्सपुर नगरमे बुद्ध भिक्षुक प्रति ‘महा’ आ चुल्लअस्सपुर सुत्तांतक प्रवचन केने छल. चम्पाक लोक स्वादिष्ट आ शुद्ध भोजन करैत छल. जातक VI-256 क मोताबिक हिमालयक ऋषि पाकल स्वादिष्ट भोजनक रसास्वादन करैले चम्पा आबैत छल.
दीर्घनिकायक शोणदंड सुत्तक मोताबिक चम्पापुरीमे पाँच सौ बहुश्रुत ब्राहमण निवास करैत छल. ओइ ब्राहमणक प्रमुख ‘शोणदंड’ छल, जे दोसर ब्राहमणक संग गर्गरा पुष्करणीक कातपर बुद्धसँ भेंट केने छल. बुद्धक प्रभापूर्ण आकृति देखि क’ ओ अभिभूत भ’ गेल. बुद्धसँ गपक काल हुनकर वचनक खंडन शोणदंड नै केलक. ब्राहमणक परिषद् जे शोणदंडक संग गेल छल, ओ मूक छल. बुद्ध हुनका शील प्रज्ञा आदि विषयमे बुझौलक. शोणदंड बुद्धक उपासक बनि गेल आ दोसर दिन हुनका खाइ लेल नोत देलक. मुदा ओ ब्राहमण परिषदक त्याग नै केलक. यएह कारण छल जे बुद्धक प्रति आस्थावान होइतो चम्पाक ओ दबंग लोक भगवान बुद्धकेँ कखनो झुकि क’ गोर नै लागलक. शोणदंड मगध सम्राट बिम्बिसारक स्थापित चम्पाक अधिपति छल. ओ हाथ उठाक’, रथ पर चढलापर चाबुक उठाक’ बा बुद्धसँ भेँट काल अप्पन मुरेठा उठाक’ संकेत सँ (मुदा, अप्पन माथकेँ उठा क’) बुद्ध केँ गोर लागैत छल.
सम्राट अशोकक माँ ब्राहमण कन्या छलि, जे चम्पाक छलि. ओ संभवतः अइ ‘शोणदंड’ क वंशज छलि. आर.एल. मित्राक नेपालीज बुद्धिष्ट लिटरेचर, पृष्ठ 8 क ‘अशोकवदान’ क मोताबिक चम्पापुरीक एक ब्राहमण समुद्रांगी नामक अप्पन पुत्री राजा बिम्बिसारकेँ उपहारस्वरूप देने छल.
पहिने बौद्ध भिक्षु लेल बिना पदत्राणक चलैक निअम छल. ओ ‘पनही’ धारण नै क’ सकैत छल. मुदा विनय पिटक 1/179 क अनुसार अप्पन चम्पा प्रवासमे बुद्ध अप्पन भिक्षुकेँ चप्पल आ खडामक प्रयोग करबाक आज्ञा देने छल.
चम्पाक निवासी धन-धान्य सम्पन्न छल. एतुक्का कतेक श्रेष्ठि तँ करोड़पति छल. महाबग्गो (5/1) सँ जानकारी भेटैत अछि जे चम्पापुरीमे ‘शोणकोटिविन्श’ नामक एकटा श्रेष्ठि रहैत छल. हुनका लग बीस करोड़ स्वर्ण मुद्रा छल. संगे अइ श्रेष्ठिक निजी कोषागारमे अस्सी बैलगाड़ी हिरण्यमुद्रा छल आ हुनकर द्वारपर उनचास मत्त हाथी छल.
एत’ जैन धर्मावलम्बी ‘कामपाल’ नामक श्रेष्ठि छल जे अठारह करोड़ स्वर्णमुद्रा आ दस करोड़ गायक स्वामी छल. कुमार नंदी नामक एकटा बड धनी स्वर्णकार चम्पापुरीमे महावीर स्वामीक गोशीर्ष चन्दनक प्रतिमा बनबाक’ ओकरा स्वर्णाभूषण सँ अलंकृत क’ स्थापित केने छल. जैन चम्पक श्रेष्ठि कथाक अनुसार चम्पा बड समृद्धशाली छल. एत’ गन्धी, मसाला आ मिश्रीक विक्रेता, जौहरी, चमार, मालाकार, कमार, सोनार आ बुनकरक संख्या बड छल. चम्पापुरी कल्प पृष्ठ 66 क मोताबिक धन, ऐश्वर्य, आंतरिक आनंद आ सुख सभसँ परिपूर्ण चम्पा नगर यथार्थतः धरतीक स्वर्ग छल. प्राचीन जैनागम औपपातिक सूत्रक मोताबिक महावीरक शिष्य सुधर्मणक कालमे ‘पुण्यभद्द’ नामक एकटा देवालय (चैत्य) चम्पाक गंगा कातपर छल, ओ बड महिमामंडित छल.
जैनक बारहम तीर्थंकर ‘वासुपूज्य’ क जन्मभूमि चम्पा छल. एत’ ओ प्रव्रज्या, कैवल्य, ज्ञान आ निर्वाण प्राप्त केने छल. ‘विविध कल्प तीर्थ’ क ‘चम्पापुरी कल्प’ क मोताबिक वासुपूज्यक पुत्रक नाम ‘मधव’ छल, जे ओइ काल चम्पाक अधिपति छल. ओइ ग्रंथक मोताबिक तीर्थंकर वासुपूज्य अश्विनी नक्षत्रसँ युक्त फाल्गुन कृष्ण पंचमीक दिन अपराह्न कालमे छह सौ मुनिक संग परिनिर्वाण प्राप्त केने छल. गुणभ्रद्राचार्य क ‘उत्तर पुराण’ सँ ज्ञात होइत अछि जे हुनकर परिनिर्वाण ‘मंदार’ पर्वत पर भेल छल.
मगधक राजकुमार चम्पाक उपराजा होइत छल. बिम्बिसार सेहो अप्पन पिताक जीवन कालमे चम्पाक उपराजा छल. बिम्बिसारक मरलाक बाद हुनकर पुत्र अजातशत्रु किछु दिनक लेल राजगृहकेँ छोड़ि चम्पा आबि गेल छल. महाभारतसँ ल’ क’ बुद्धकाल धरि चम्पा चम्पक बागसँ भरल छल.
मझिझम निकाय (1/128) क मोताबिक बुद्धक काल चम्पामे कतेक रास महाशाला या स्नातक संस्था छल, जे मगधराज प्रसेनजित आ बिम्बिसारक देल अनुदान आ भूमिदानक माध्यमसँ संचालित छल. महागोविंद सुतांतक मोताबिक महागोविंद अइ तरहक सात स्कूलक स्थापना अपना कार्यकालमे केने छल, जाइमे चम्पा सेहो छल. ओ सभ धर्मशास्त्रीय स्कूल छल, जाइमे केवल ब्राहमण तरुण (माणवका) केँ प्रवेश भेटै छल. अइ स्कूलमे तीन सौ छात्र विद्याध्ययन करैत छल. कुलपतिक बड प्रसिद्धिक कारण कतेक रास ठामसँ छात्र एत’ पढ़ै लेल आबैत छल.
‘चंपेय जातक’ क मोताबिक अंग आ मगध दुनू पड़ोसी राज्यमे युद्धक वर्णन अछि. एक बेर हारलाक बाद अंगक सैनिककेँ पाछाँ करला पर मगध नरेश अंग आ मगधक बीचमे बहएवाली गंगामे कूदि क’ जान बचौने छल. बादमे ओ अंग नरेशक घनिष्ठ मित्र भ’ गेल. ओ सभ बरख चम्पा धारक कातपर एकटा समारोह करैत छल आ अर्घ्य दैत छल.
संयुक्त निकाय (1/195-96) क मोताबिक चम्पाक बौद्धभिक्षुक आचरण विनयक निअमक प्रतिकूल भ’ गेल छल. अप्पन चम्पा प्रवासमे बुद्ध बंगीस नामक एकटा बौद्ध भिक्षुक अप्पन प्रशंसामे एकटा गाथा कहैत सुनने छल. बुद्धकेँ बोधि प्राप्त करबाक एक दशकक भीतर चम्पाक संग महत्वपूर्ण नगरमे बौद्धक प्रमुख वास स्थापित भ’ चुकल छल. ओइमे सँ सभ ठाम पर बुद्ध केँ कोनो ने कोनो प्रसिद्द शिष्यक नेतृत्व आ पथ-प्रदर्शनमे भिक्षुकक एकटा संप्रदाय विकसित भेल.
जैन लेखक ‘जिनप्रभसुरि’ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ मे कत्तौ-कत्तौ चम्पाक नाम ‘लोमपाद्पू’ आ ‘कर्णपू’ सेहो लिखने छल. अइ ग्रंथक पृष्ठ संख्या 65 आ 69 क मोताबिक जैन ऋषि ‘प्रभव’ आ ‘स्वयंभव’ अप्पन चम्पा प्रवासमे केने छल.
एकटा किंवदंतीक मोताबिक चम्पामे सुभद्रा नामक एकटा सती छलि जे चालैन सँ इनारसँ पानि भरै छली. चम्पामे पाथरसँ बनल चारिटा गोपुर द्वार छल, जे बड दिन सँ बन्न पड़ल छल. ई स्त्री चालैन सँ पानि भरि तीन द्वारकेँ भिजा क’ खोलि दै मे सफल भेल रहथि. कहल जाइत अछि जे चौदहम शताब्दी धरि ई द्वार बन्न छल. एकरा लखनौतीक सुलतान शमसुद्दीन विक्रम संवत 1360 मे उखाड़ि क’ शंकरपुर किलामे लगौने अछि. जिनप्रभसूरी अइ वृतांत केँ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ क पृष्ठ संख्या 65 मे लिखने अछि. अइ ग्रन्थमे दानवीर कर्णक कतेक रास ठाम केँ सेहो चिन्हित कएल गेल अछि.
पांचम सदी मे चीनी यात्री फाहियान गंगाक कात-कात पाटलीपुत्र सँ अठारह योजन पैदल चलि चम्पा नगरी आएल छल. सातम शताब्दीमे ह्वेनसांग एत’ आएल छल. हुनकर मोताबिक चम्पा राज्यक परिधि 4000 ली सँ बेसी छल. एक ली छह मीलक बराबर होइत अछि. अइ नगरीमे दू सए सँ बेसी हीनयान बौद्ध भिक्षु रहैत छल. ओ किछु नष्टप्राय बौद्ध विहार सेहो देखने छल. ओइ काल चम्पामे सनातन हिन्दूक कतेक देव मंदिर छल. एतुक्का खेत समतल छल. जमीन उर्वरा छल. एतुक्का लोक सोझ-साझ होइत छल.
ओ चम्पा केँ ‘चेन पो’ कहने अछि. ह्वेनसांगक कालमे चम्पा राज्यक परिधि सिमटि क’ सत्तर मील बचि गेल छल जइमे केवल नगरक परिधि सात मील विस्तृत छल. चम्पापुरीक देवार पजेबाक बनल छल. ई कत्तौ-कत्तौ तँ कतेक रास फीट ऊँच छल. केनिंघम ह्वेनसांगक वृतांतक आधार पर अंगक राजनैतिक सीमा लखीतराय (लखीसराय) सँ राजमहल धरि आ पारसनाथ पहाड़ी सँ भागीरथीक कात कलना धरि रेखांकित केने अछि.
चम्पापुरी अप्पन राज्यमे कतेक रास राजनैतिक उतार-चढाव देखने छल. बौद्ध युग मे वत्स देशक शासक शतानिक परन्तप चम्पाक राजा दधिवाहनपर आक्रमण केने छल, मुदा अइ युद्धक परिणामक जानकरी नै अछि. एतेक तय अछि जे एकर बाद अंग शक्तिशाली होइत गेल. ओ मगध शासक भट्टिय केँ युद्धमे हरेने छल. मुदा अइ भट्टियक पुत्र बिम्बिसार (603 -551) अप्पन पिताक हारिक बदला अंगपर विजय प्राप्त क’ चुका देलक. अइ युद्धमे अंग नरेश ब्रहमदत्तक वध क’ देल गेल आ अंगपर मगधक शासन भ’ गेल. बिम्बिसारक मरलाक बाद अजातशत्रु (551-519 ई.पू.) चम्पा केँ अप्पन राजधानी बनेने छल. मुदा हुनकर पुत्र उदयन (519-503 ई.पू.) चम्पासँ अप्पन राजधानी पाटलीपुत्र ल’ आनलक.
परतंत्र भेलाक बाद चम्पाक लोकमे आस्ते-आस्ते नैतिकताक ह्रास हुअए लागल आ अप्पन ख़राब चरित्रक कारण लोक उद्दंड हुअए लागल.
दशकुमार चरितम अध्याय 1, पृष्ठ 3-6 आ अध्याय 2, पृष्ठ 7,11 आ 12 मे सेहो उल्लेख अछि जे चम्पा मे दुष्टक बाहुल्य छल.
अंग शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग आ गुप्त युग सेहो देखलक. संगे कुषाणक आधिपत्य आ राजभरक सेहो शासन देखलक. गुप्त सम्राट माधव गुप्तक पुत्र आदित्य सेनक मंदर पर्वतपर भेटल शिलालेखक अनुसार अइ क्षेत्रक शासकक कीर्तिक बड रास साक्ष्य आगू आबैत अछि. आदित्य सेन आ हुनकर धर्मपत्नी कोणदेवी मंदार पर्वतपर विष्णुक नरसिंह मूर्तिक स्थापना केने छल आ ओत’ पापहरणी नामक पुष्करणी केँ खोदबेने छल. कहल जाइत अछि जे यएह शासक अश्वमेघ आ कतेक रास यज्ञ सेहो केने छल.
अइ तरहेँ कर्ण सुवर्णक शासक शशांक आ ओकर बाद हर्षवर्धनक अधीन अंग आबि गेल छल. चीनी यात्री ह्वेनसांग अइ सम्राटक कालमे भारत आएल छल. हुनकर आगमन काल चम्पापर खातौरीक शासन छल. ई शक्तिशाली छल (दृष्टव्य भागलपुर गजेटियर 1962, पृष्ठ 41). पालवंशक अभ्युदय आ चम्पापर पालवंशक अधिकारक बाद एकर विकास भेल. विश्वचर्चित विक्रमशिला विश्वविद्यालयक स्थापना (वर्तमान अन्तीयक) भेल.
तकर बाद सँ वंशक शासनमे चम्पा आएल. ई शासन लक्ष्मणसेन धरि शक्तिशाली रहल. मुदा अंतिम समय हुनकर शासन अवसाद सँ भरल रहल. मुसलमानक भीषण आक्रमण हुअए लागल. बख्तियार खिलजी बंगालपर विजय प्राप्त केने छल. ओ बिहारपर सेहो कब्ज़ा करै लेल बड रास संख्यामे सैनिकक संग चढ़ाइ केलक. एतुक्का सभटा विश्वविद्यालय केँ ओ दुर्दांत आगिमे झोंकि देलक. मास भरि आगि जरैत रहल जाइमे भारतीय ज्यां-विज्ञान, धर्म, साहित्य-संस्कृति जरैत रहल.
अइ तरहे चम्पा मुसलमान आ फिरंगीक कालमे अप्पन सभ्यता-सांस्कृतिक चम्पक वन केँ नष्ट होइत देखने अछि.
चम्पा राज्यक नदीमे चाननक विशिष्ठ ठाम अछि. एकर मूल स्रोत मुंगेर प्रमंडलक पठारी भाग अछि. अइ मूलक स्रोत लग दखिन पठार पर ‘बारो’ गाम आ वर्तमान बांका जिलाक कटोरिया थानाक ‘बाक’ गाम किउल-आसनसोल रेलमार्गक आरपार बसल अछि. अइ दुनू गाम सिमुलतल्ला आ ‘गढ़जोरा’ रेलवे स्टेशनक एक्के सामान दूरी अछि. एतएसँ चाननक मुख्यधारा बहैत मुंगेर प्रमंडलक ‘करपा’ आ ‘बारो’ गाम होइत भागलपुर जिलामे आबैत अछि आ ‘बांक’ गाम सँ होइत पूब दिश बढैत अछि. अइ पूब प्रवाहमे देवघरक उत्तर भागक किछु छोट पर्वतीय स्त्रोत चाननमे खसि ओकर जलभंडार केँ बढ़ाबैत अछि. ई ज्ञातव्य अछि जे दक्खिन पहाडीक बेसी जलभंडार चानन ग्रहण करैत अछि. भागलपुर गजेटियर 1962 (पृष्ठ 11)क मोताबिक, चाननक उद्गम देवघरक पहाडी सँ भेल अछि, ई सत्य नै अछि. अइमे कतेक रास छोट-छोट पर्वतीय जलधार आबि क’ सेहो मिलैत अछि. ई लगभग पांच सौ वर्गमीलमे पसरल अछि आ ऐ धारमे भरि बरख पानिक पर्याप्त मात्रा रहैत अछि. ई संथाल परगनाक पर्वतीय भाग सँ पर्याप्त पानि ग्रहण करैत अछि, मुदा चम्पा राज्यक दक्खिन वर्तमान बांका जिलाक समतल भूमिमे बहिक’ ई बड पैघ भूभाग केँ अप्पन विपुल जलराशि सँ पटबैत अछि. अप्पन गंगा संगम स्थल सँ लगभग 50 किलोमीटर दक्खिन एकर एकटा शाखा पूब दिस बढैत अछि आ दक्खिन दिस मुड़ि क’ घोघा लग ई गंगामे मिल जाइत अछि.
चानन (चन्दन) क ऊपर बला जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ आ वन सँ आच्छादित अछि. ई धार तीन सौ वर्गमील जंगल पहाड़पर विचरैत आ अलग-अलग जलस्रोत केँ अप्पन उदरमे लैत लगभग दू सौ वर्गमील मे कतेक रास स्रोत, नहर आ उपनहरसँ समतल भूमि केँ पटबैत गंगासँ संगम करैत अछि. चाननक धार लगभग 15 अलग-अलग स्रोतमे बहैत अछि, मुदा ओकर तीन टा स्रोत गंगासँ संगम करैत अछि. जगदीशपुर लग चानन छिन्न-भिन्न भ’ जाइत अछि. एकर दू टा पातर धार ‘नाढा’ आ ‘अन्हरी’ क नाम सँ पश्चिम उत्तर कोण दिस बढैत अछि. ई ‘बडुआ’ क बरसाती पानिकेँ समेटैत ‘जमुनिया’ क नामसँ गंगामे प्रवेश करैत अछि.
प्राचीन अंगक अइ कटी प्रदेशक सुरक्षा लेल प्रकृति गंगाक दक्खिन कात धरि मुंगेरसँ ल’ क’ कहलगांव, लगभग एक सौ किलोमीटर धरि तीन किमी सँ बेसी चाकर, चून-पाथरक बड पैघ पट्टीक निर्माण क’ देने अछि. अइ अजेय पट्टीपर प्राचीन अंगक राजधानी चम्पापुरी हजार बरख पहिने सँ बसल अछि. अइ चून-पाथरक पट्टीक कारण गंगाक कटाव सँ ई नगर मुक्त अछि.
अइ तरहेँ प्राकृतिक जलस्रोतसँ चम्पा परिपूर्ण अछि. एकर माथपर अक्षय जलराशि ल’ क’ स्वयं गंगा अछि आ गंगाक ओ भाग जाइमे कौशिकी सन सदानीरा धार अप्पन दर्जन भरि छाड़न धारक संग गंगासँ संगम करैत अछि आ पार्श्वमे मालिनी अछि जे महाकवि कालिदासक अगाध प्रेमक धार अछि. महाकवि कालिदास शाकुंतलमक तेसर अंकमे ऐ धारक उल्लेख केने छल, जकर पुलिनपर अप्पन सखी संग शकुंतला विहार करै लेल गेल छल. बिहारक नदी: ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक सर्वेक्षण पृष्ठ संख्या 91 क मोताबिक गंगा प्रवाह भागलपुर नग्र पहुँचैसँ पहिने चम्पा नगरक पश्चिम कात दिस जमुनिया धार गंगासँ संगम करैत अछि. ई कोनो कालमे बडुआक संगम छल. बादमे बडुआ आ जमुनिया मिल क’ एत’ संगम करए लागल. बडुआक पुरना नाम बहुला छल, जकर चर्चा महाभारत (भीष्म पर्व अध्याय 9 श्लोक 27) मे भेटैत अछि. भागलपुर जिलामे चाँद सौदागार आ हुनकर पुत्रवधू सती बिहुलाक पूजा होइत अछि आ हुनकर गाथा गाएल जाइत अछि. भ’ सकैत अछि जे वर्षा ऋतुमे मनाओल जाएबला बिहुला पर्व अइ बिहुला नदीक गाथा अछि. जे किछु हुअए, ई पर्व शिवपूजा, नागपूजा आ एकटा सतीक उच्चादर्शक गाथा अछि.
ई बडुआ धार जमुई जिलाक चकाई सिमुलतल्ला मार्गक कात ‘कर्णगढ़’ आ ‘चरघरा’ गामक कातसँ बहैत अछि आ कतेक रास पहाडी स्रोतकेँ ल’ क’ ओ चम्पा राज्यक दक्खिन-पश्चिम भागमे हनुमनापर्वतक लग ‘सुइयाथान’ गाम लग समतल भूमिपर उतरैत अछि. (ई ज्ञातव्य अछि जे ई सभटा पर्वत ऋष्यशृंग पर्वतक पसरल श्रृंखला अछि). अइ ठाम धारमे पक्का बान्ह बना क’ एकटा भारी जलभंडारक निर्माण कएल गेल अछि, जतएसँ मुंगेर आ भागलपुर जिलाक बड पैघ भागमे पटाबै लेल नहर निकालल गेल अछि. निर्जन पहाडीक बीच एकटा पैघ झील बनि गेलासँ अइ बान्हक दृश्य बड नीक देखाइए. ई सुरम्य ठामसँ चलि क’ ‘बडुआ’ धार उत्तर दिस बढैत अछि आ साहेबगंज, मोहनपुर, सिलौटा आदि गाम लगसँ होइत तारापुरसँ पूब आबि जाइत अछि. एतए ई कतेक रास धारमे बँटि जाइत अछि आ ओ धार करहरिया, दीनदयालपुर, रतनपुर, दौलतपुर, बाथू सन ठामसँ होइत अन्हार, कटहरा, ऊँचा गाँवक तालमे हरा जाइत अछि. जहियासँ बडुआ धारपर हनुमना बान्ह बनाओल गेल अछि आ नहर निकालल गेल अछि, तहियासँ अइ धारक निचला भागमे पानिनक प्रवाह कम भ’ गेल अछि आ पानिक मात्रा कम आबैत अछि. ई बडुआ कोनो कालमे चम्पा नगरसँ सटि क’ पश्चिमसँ बहि क’ गंगामे प्रवेश करैत छल, जतए आब जमुनिया धार बहैत अछि.
जमुनिया धार चानन धारक एकटा उपधारा अछि जे राजपुर आ खंजरपुरमे चाननक मुख्यधारासँ फराक होइत अछि. ई धारा मोहद्दीपुर, कनकैथी, बहादुरपुर आदि गामक लगसँ होइत नाथनगरसँ सटल पश्चिममे आबैत अछि आ उत्तर दिस मुड़िक’ गंगामे प्रवेश करैत अछि. जमुनियाक उपरी हिस्साक नाम ‘अन्हरी’ अछि.
चम्पानगरक एकटा भाग नाथनगर अछि. कहल जाइत अछि जे प्राचीनकालमे ‘नाथमल’ नामक एकटा मैथिल ब्राहमण संत एतए रहैत छल आ कालांतरमे हुनकर नामसँ अइ गामक नाम ‘नाथनगर’ पड़ि गेल (देखू भागलपुर गजेटियर पृष्ठ 623). आब ई नगर बनि चुकल अछि आ ई 2.51 मीलमे पसरल अछि. चम्पानगरमे जैन धर्मक दिगंबर संप्रदायक एकटा मंदिर आ धर्मशाला अछि. अइ मंदिरमे पाँचटा वेदी अछि, जाइमे चारिटा तँ चारि कोनपर अछि आ एकटा वेदी मध्यमे अछि. अइपर जैन प्रतिमा चाँछल गेल अछि आ ओइपर तीर्थंकर वासुपूज्यक चरण चिह्न अंकित अछि. चरण चिन्हक आगू किछु पंक्ति अंकित अछि, जइसँ ज्ञात होइत अछि जे अइ ठाम वासुपूज्य जन्म ल’ क’ ध्यान आ ज्ञान प्राप्त केने छल. चम्पाक अइ पैघ जैन मंदिरमे वासुपूज्यक श्वेत प्रस्तर प्रतिमा अछि, जकर प्रतिष्ठा संवत 1932 क माघ शुक्ल दशमी तिथि केँ भेल अछि. एकर अलाबे, वासुपूज्यक दोसर प्रस्तर प्रतिमा, पार्श्वनाथ स्वामीक दूटा प्रस्तर प्रतिमा आ स्वामी ऋषभदेवक एकटा प्रतिमा सेहो स्थापित अछि. वेदीक मध्य धर्मचक्रक चिन्ह सेहो अंकित अछि, जकर दुनू कात दूटा हाथीक प्रतिमा उत्कीर्ण अछि। मध्य वेदीक ऊपर चांदीक सिंहासनपर साढ़े चारि फीट ऊँच पीतवर्णक पाषाणक प्रतिमा सेहो दर्शनीय अछि. अइ मंदिरक आगू एकटा 35 फीट ऊँच आ दोसर 55 फीट ऊँच दूटा पाषाण खुट्टा सेहो ठाढ़ अछि, जकर बगेबानी मुगलकालीन अछि.
अइ पैघ जैन मंदिरसँ लगभग एक किमी दूर चम्पा नहर लग श्वेताम्बर सम्प्रदायक एकटा जैन मंदिर आ धर्मशाला अछि. अइ मंदिरमे आदिनाथ आदि कतेक रास जैन मुनिक प्रतिमा स्थापित अछि.
अइ मंदिरक बड रास प्रतिष्ठित प्रतिमा एहन अछि जे पार्श्वमे बहएबला चम्पा नहर सँ भेटल अछि. ई विधर्मी सबहक कएल गेल धर्मस्थल आ शिक्षालयक विध्वंसक जीवंत साक्ष अछि.
दिगंबर जैन सबहक पैघ मंदिरसँ श्वेताम्बर जैनक ई मंदिर बेसी पुरना अछि. अइ आलेखमे जे ‘पुण्यभद्द’ नामक देवालय आ चैत्यक उल्लेख अछि, ओ संभवतः ई जैन मंदिर भ’ सकैत अछि, किएकि औपपातिक सूत्रक मोताबिक, ‘पुण्यभद्द’ चैत्य गंगा कात स्थित छल.
वर्तमान चम्पा नाला (चम्पा नहर) सेहो ऐतिहासिक घटनाक साक्ष्य रहल अछि. स्थानीय लोक आपसमे अंगिका भाषामे बजैत अछि, ‘चम्पा नाला छोटो-मोटो नहरो नै छै. एकरो कोनो आदमी नय बनैलो छय. ई रोमपाद के जमाय ऋष्यशृंग के दूतभूत के बनैलो छय. बहुत बड़ो अकाल पडलो छलय, तभिये ई नहरों के रूप में बनलो छय जथि में बहुते नदी के पानी मिलै छै.’ ऋष्यशृंग विश्वक पहिल वैज्ञानिक छल जे कतेक रास धार केँ परस्पर जोड़ि क’ ओइ क्षेत्र विशेष केँ बाढ़िसँ मुक्त आ अकालमुक्त क’ देने छल.
लगभग बीस बरख पहिने नाथनगर स्थित अप्पन आवासपर वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी पुण्यश्लोक रास बिहारी लाल अइ लेखककेँ बतौने छल जे चम्पा नाला सामान्य नाला नहर नै अछि, मुदा चम्पा राज्यमे अकाल पड़लापर राजा रोमपाद नहरक रूपमे एकरा बनबौने छल जाइमे चम्पा, बडुआ आ जमुनियाक अक्षय जलस्रोत प्रवाहित होइ छल. ओ अप्पन ठेठ अंगिका भाषामे एकर संबंध मे कतेक रास कथा आ मिथकक सेहो उल्लेख केने छल.
जातक IV पृष्ठ 454 क मोताबिक, चम्पा धार पूबमे अंग आ पश्चिममे मगधक सीमा अछि. डा. विमल चरण लाहाक मोताबिक, ई वएह धार अछि जे चम्पानगर नाथनगरक पश्चिम मे अछि, जेकरा पहिने मालिनी कहल जाइ छल (दृष्टव्य : प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल, पृष्ठ 360). पुर्णा अंगक सभटा धार एक-दोसर सँ कोनो नै कोनो तरहे जुड़ल अछि. एहन ठामपर बाढ़ि एबाक संभावना नै रहैत अछि. सम्प्रति चम्पा तसर उद्योग मे आगू अछि.
ई छल ऋषिराज ऋष्यशृंगक ससुर मालिनी (चम्पा)क संक्षिप्त एतिहासिक आ सांस्कृतिक वृतान्त.
परिशिष्ट ‘ग’
शंकराचार्य आ सिंहेश्वर
(जगत प्रसिद्ध शंकर-मंडन मिश्र शास्त्रार्थ सिंहेश्वर मे नै)
सिंहेश्वर मंदिर न्यास किछु बरख पहिने एकटा हस्तपत्रक छपने छल जइमे ई उल्लेख छल जे आदि शंकराचार्य आ मंडन मिश्रक शास्त्रार्थ सिंहेश्वर स्थानमे भेल छल. ई हस्तपत्रक जतेक विवादस्पद अछि, अइ विषयक अध्ययन ओतेक रोचक.
पुण्यश्लोक मंडन मिश्र आ शंकराचार्य अप्पन कोनो ग्रंथमे आपसमे भेंट करैक, शास्त्रार्थ करैक बा परस्पर जीतब-हारबक संबंधमे एकोटा शब्द नै लिखने अछि. शंकराचार्यक विजय विषयक कतेक रास ग्रंथ अछि, जे हुनकर जीवनकालमे नै, मुदा लगभग छह सौ बरख बाद हुनकर धर्म-ध्वजधारी शिष्य लिखलक, हुनका महिमामंडित करैमे अप्पन विशेष योगदान द’ क’ गुरु-ऋण सँ मुक्त हेबाक उपक्रम केलक. अइ ग्रंथमे माधवाचार्य रचित ‘शंकर दिग्विजय’, सभसँ बेसी प्रसिद्द अछि. अइ ग्रंथक प्रामाणिकतापर तखने प्रश्नचिन्ह लागि जाइत अछि जखन अइमे शंकराचार्यक संग महाकवि बाणभट्ट, मयूर, दंडी, अभिनवगुप्त, श्रीहर्ष आदि केर शास्त्रार्थ वर्णित अछि, जे शंकरसँ पूर्ववर्ती बा परवर्ती छला. आठम शताब्दीक शंकराचार्य ग्यारहम शताब्दीमे जन्म लेल उदयनाचार्य आ श्रीहर्षकेँ शास्त्रार्थमे केना हरा सकैत अछि, ई अइ ग्रंथक लेखकक छल-छदम आ अनर्गल प्रतापक अलावा की भ’ सकैत अछि.
शंकराचार्यसँ संबंधित दोसर विजय ग्रंथमे आनंदगिरी कृत ‘शंकर विजय’, राजचूड़ामणि कृत ‘शंकराभ्युदय’, चिलविलासेन्द्र कृत ‘शंकरविजय’, सदानंद कृत ‘शंकर जय’, कांचीपीठक अध्यक्ष रहल सर्वज्ञ सदाशिव बोध कृत ‘पुण्यश्लोक मंजरी’, महादेवेंद्र सरस्वतीक शिष्य आत्मबोध रचित ‘पुण्यश्लोक मंजरी परिशिष्ट’, कांची मठाधीश परम शिवेंद्र सरस्वतीक शिष्य सदाशिव ब्रह्मेन्द्र कृत ‘गुरुरत्नमाला’ आ काशीलक्ष्मण शास्त्रीकृत ‘गुरुवंश काव्य’ बेसी चर्चित अछि. एकर अलाबे, स्कंद्पुराणक नवमांश, मार्कंडेय संहिता, शिव रहस्य पुराण, श्री विर्धानव आ शक्ति-संगम तंत्रमे श्री शंकर चरित उपलब्ध अछि. ई सभटा वर्णन इतिहासकार आ शोधार्थी, अध्येता सबहक दृष्टिसँ अप्रमाणिक अछि. ऐ सभ रचनामे शंकरक चरित्रकेँ चमत्कारी बा लोकोत्तर बना केँ प्रस्तुत कएल गेल, जइसँ जनसाधारणमे हुनका प्रति श्रद्धा आ भक्ति बढ़ए.
मंडन मिश्र आ शंकराचार्य दुनू समकालीन छल. दुनूकेँ एक-दोसराक सिद्धांतक सभटा जानकारी छल. दुनू अद्वैत वेदान्तक पृष्ठक पोषक छल. मुदा शंकरक अद्वैत वेदान्त संन्यासीक अछि जखन कि मंडन मिश्रक अद्वैत गृहस्थ आ कर्मयोगीक रहल अछि. ऐ तरहेँ दुनू एक-दोसरासँ असहमत अछि. ई दुनू विद्वान अपन-अपन ग्रंथ मे एक-दोसराक मतक खंडन केने अछि. विद्वान विचारक एलेन राइट थ्रेशर सेहो अइ बिन्दुपर विस्तारसँ विचार केने अछि. ओ अप्पन शोध ग्रंथ ‘द अद्वैत वेदांत ऑफ़ ब्रह्मसिद्धि’ मे मंडन मिश्र रचल ‘ब्रह्मसिद्धि’ आ शंकराचार्यक रचल ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ क पंक्ति सेहो उद्धृत केले अछि, जइसँ ई तथ्य सत्यापित होइत अछि. अइ दुनू विद्वानक विचारक तुलनात्मक विवेचनक लेल पंडित सहदेव झा विरचित ‘मंडन मिश्र आ हुनकर अद्वैत वेदांत’ आ आचार्य धीरज रचित ‘विज्ञानमक्षरम’ (भूमिका हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’) अवलोकनीय अछि.
अलग-अलग साक्ष्यक आधार पर मंडन मिश्रक जे काल निर्धारण कएल गेल अछि, ओ निम्नांकित अछि-
पी.वी. काणे (धर्मशास्त्र का इतिहास) (690-710 ई.)
कुप्पूस्वामी शास्त्री (ब्रह्मसिद्धि भूमिका) (615-690 ई.)
एल. स्मिथसेन (विभ्रम विवेक टिप्पणी) (700 ई.)
बी.ए.रामास्वामी शास्त्री आ के.ए. शिवरामकृष्णन (भावना विवेक टिप्पणी) (650 ई. क बाद)
टी. बेट्टर (ब्रहमसिद्धि भूमिका)(700 ई.)
टी.आर. चिन्तामणि (स्वतंत्र लेख मे) (650-70 ई.)
पी. हेक्कर (विवर्त) (सातम शताब्दी)
एस. एन. दास गुप्ता (भारतीय दर्शन का इतिहास) (800 ई.)
के. कुन्जुनिराजा (मंडन एंड धर्मकीर्ति) (8-9वम सदी)
मंडन मिश्रक जन्मभूमिक विषयमे माधवाचार्य अप्पन ‘शंकर दिग्विजय’ पोथी मे ‘महिष्मति’ आनाद्गिरी अप्पन पोथी ‘शंकर विजय’ मे ‘विजल विन्दु’ (संभवतः उत्तर प्रदेशक बिजनौर), चिद विलास यति अप्पन पोथी ‘शंकर विजय विलास’ मे कश्मीर आ काशी लक्ष्मण शास्त्री अप्पन पोथी मे ‘गुरुवंश काव्य’मे मगध मानल अछि. अइ संबंधमे हमर मान्यता अछि जे माधवाचार्यक ‘शंकर दिग्विजय’ भ्रामक आ अप्रमाणिक पोथी अछि. ‘विजल विन्दु’ लेल बिजनौर जिलाक कोनो गाम अप्पन दावेदारी प्रस्तुत नै केने अछि. यएह स्थिति कश्मीरक अछि. ओतए कोनो गाम आ नगर मंडन मिश्रक जन्मभूमि होइक दावा नै करैत अछि.
माधवाचार्यकक आधारपर गोवर्धन पीठक शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ मंडन मिश्र केँ नर्मदा कातक वासी (उज्जैन, मध्य प्रदेश) बतौने अछि आ ओतुक्का मंडला नगरकेँ महिष्मती सिद्ध केने छल. मध्य प्रदेशक नर्मदा कात बसल ‘महेश्वर’ नामक उपनगर छल, ओकरा मान्धाता, मंडला या मंडलेश्वरक नामसँ उद्धृत कएल गेल अछि. ‘महेश्वर’ ‘महिष्मती’ अछि. ई तर्कसँ असंगत लागैत अछि. मत्स्य पुराणमे ‘महेश्वरपुर’ क उल्लेख एकटा तीर्थक रूपमे अछि. ओतए ‘स्वाहा’ नामक देवी सती स्थापित छल. अखैन ओतए जे देवी अछि, ओ ‘मंगला गौरी’ क नामसँ पूजित अछि. ब्रहमांड पुराणक मोताबिक ‘स्वाहा’ प्रसूतिक गर्भसँ उत्पन्न दक्षक पुत्री अछि, जिनकर पति अग्नि अछि. ((मंडन मिश्र और उनका अद्वैत वेदांत, पृष्ठ 16)
महेश्वरक अप्पन अलग गरिमा अछि, ओकर पहिचान महिष्मतिक रूपमे क’ वितंडा ठाढ़ करैक अलावा की भ’ सकैत अछि? भाषा वैज्ञानिक सभ एकर परीक्षण करए जे महिष्मतिक ध्वनि साम्य महिषीसँ बेसी वैज्ञानिक बैसैत अछि जतए ‘म’, ‘ह’, ‘ष’ आ ‘ई’ क वर्ण आ मात्रा विद्यमान अछि, आ फेर माहेश्वर, मान्धाता, मंडला आ मंडलेश्वर सँ वाचस्पति मिश्र सेहो अप्पन पोथीमे महिष्मतिक उल्लेख पाटलीपुत्रक संग केने अछि (मंडन मिश्र और उनका अद्वैत वेदांत, पृष्ठ 22, विज्ञानक्षरम, पृष्ठ 51) पटनाक संग मिथिलाक महिषीक उल्लेख समीचीन अछि, स्वाभाविक अछि आ भूगोल सम्मत अछि.
मिश्र उपाधि धारण करएबला महान दार्शनिक मिथिलामे भेल अछि, जइमे वाचस्पति मिश्र, सुचरित मिश्र, पक्षधर मिश्र, जीवनाथ मिश्र, भवनाथ मिश्र (अयाची मिश्र), शंकर मिश्रक संग जगत प्रसिद्द अद्वैत वेदांती मंडन मिश्र प्रसिद्द अछि. सभ कोणसँ परीक्षणक बाद लगैए जे मंडन मिश्र महिषी (कोशी प्रमंडल, बिहार) क रहएबला छल.
मंडन मिश्र आ शंकराचार्यक बीच शास्त्रार्थ भेल छल बा नै, ओइ संबंधमे दुनूमे कियो अप्पन पोथीमे चर्चा नै केने अछि. हमर मत अछि जे पंडित वाचस्पति मिश्रक मंडन मिश्रक प्रति अकूत श्रद्धा देखैत शंकरक अनुयायी हुनकासँ तमसाएल रहए आ वाचस्पति मिश्रक प्रति असम्मानजनक विशेषण प्रयोग केने छल. ओकर बाद मंडन मिश्रक कद छोट करबा लेल माधवाचार्य आ दोसर लेखक शंकराचार्यक पक्षमे कतेक रास पोथी लिखने छल.
ई लेखकक मात्र कल्पना कहल जा सकैत अछि. ई इतिहास सम्मत सेहो नै अछि. स्वामी अपूर्वानन्द अप्पन पोथी ‘आचार्य शंकर’ (प्रकाशक: रामकृष्ण मठ, नागपुर) मे भारती शंकराचार्य सँ शास्त्रार्थ करैत जे प्रश्न पुछने छल, ओकरा अइ तरहेँ लिखने अछि, कामक लक्षण की होइत अछि? काम कला कतेक तरहक होइत अछि? देहक कोन अंगमे काम रहैत अछि? कोन-कोन क्रियासँ ओकर अविर्भाव आ तिरोभव होइत अछि? शुक्ल पक्ष आ कृष्ण पक्षमे पुरुष आ नारीक शरीरमे कामक ह्रास-वृद्धि कोना होइत अछि आ नारी कोन तरहेँ पुरुषक ऊपर कामकलाक विस्तार करैत अछि? आब प्रश्न ई उठैत अछि जे कोनो संस्कार वाली विदुषी शास्त्रार्थमे कोनो बाल ब्रह्मचारीसँ कामशास्त्र संबंधित प्रश्न पूछत?
शंकरमतक अनुयायी आ तलस्पर्शी विद्वान स्वामी सच्चिदानंद भारतीक कन्नड़ कृति ‘श्री शंकर भगवत्पाद वृतांत सार सर्वस्य’ केँ संदर्भित करैत श्री नारायण दत्त धर्मयुगक अप्रैल, 1996 मे प्रकाशित अप्पन लेख मे उपयुक्त विचार देने छल. स्वामी अपूर्वानंदक दृष्टिमे शंकर दिग्विजयमे वर्णित परकाया प्रवेशक मिथक शंकराचार्यक मूल व्यक्तित्वकेँ खंडित क’ दैत अछि. की हुनकर सन जितेन्द्रिय ब्रहमचारी महज शास्त्रार्थ जीतै लेल अप्पन अनमोल व्रत तोड़ि काम शास्त्रक व्यावहारिक ज्ञान सीखै लेल तैयार भ’ जाएत? स्वयं शंकर संप्रदायक अनुयायी ई स्वीकार करैत अछि जे अइ मिथक द्वारा हुनकर सभक परमगुरुक उज्जवल छविकेँ धूमिल कएल गेल अछि. स्वामी अपूर्वानन्द पोथी ‘आचार्य शंकर’ (पृष्ठ 95)मे आगू लिखैत अछि जे भारतीक संग शंकराचार्यक संग कोनो शास्त्रार्थ भेलैने नै. तइसँ शंकरक परकाया प्रवेशक कोनो प्रश्न नै उठैत अछि. माधवाचार्य ई लिख क’ शंकरकेँ अलौकिक शक्ति सम्पन्न प्रतिपादित केने अछि. मुदा अनजान वंशजक आचार्यक जितेन्द्रीय हेबापर प्रश्न चिन्ह लगाक’ ओकर महान चरित्रक संग खिलवाड़ क’ देने अछि.
शंकराचार्यक सन्दर्भमे सिंहेश्वरपर विचार करैत काल ई कहल जा सकैत अछि जे वर्तमान कोशी अंचल रामायण काल मे ‘ऋष्यशृंग आश्रम’ आ महाभारत काल मे चम्पकारण्य (चम्पा राजक असंख्य भाग) छल. ई क्षेत्र बुद्धकाल मे ‘आपण निगम’ क नामसँ प्रसिद्द छल. गंगाक उत्तर विशाल क्षेत्रमे पसरल छल ‘आपण निगम’.
हिंदी आ अंगिकाक प्रसिद्ध विद्वान डा. तेज नारायण कुशवाहा चिट्ठीसँ सूचित केने अछि जे कटिहार जिलाक सेमापुरकेँ ओ ‘आपण निगम’ क रूपमे चिन्हित केने छथिन. जखन कि श्री हवलदार त्रिपाठी सहृदय महिषी वनगाँवके ‘आपण निगम’ मानने छथिन. आपणक अर्थ बजार होइत अछि आ ‘निगम’ समितिक बोध करैत अछि. अर्थ विस्तारमे ई ‘कारपोरेशन’ क रूपमे लेल जा सकैत अछि. अइ तरहेँ ‘आपण निगम’ क क्षेत्र विस्तार ओइ कालमे सम्पूर्ण कोशी प्रमंडलमे छल, जइमे कतेक गाम समाहित छल. एकर मुख्यालय जन बहुल गाम एखौनका महिषी-बनगाँव छल. प्रशासनिक दृष्टिसँ ई व्यवस्था दीर्घकाल धरि चलल. भ’ सकैत अछि जे मंडन मिश्रक कालमे अइ क्षेत्रक यएह स्थिति रहल हएत. सिंहेश्वर शैव तीर्थ आ महिषी शक्तिपीठक रूपमे ख्याति प्राप्त छल आ दुनू एक्के निगमक अंतर्गत छल. जौं शास्त्रार्थ आ विचारक आदान-प्रदान करै लेल शंकराचार्य एखौनका महिषी (जिला सहरसा) आएल हेतिऐ तँ सिंहेश्वर सेहो आएल हएत. सभ कोनसँ परीक्षणक पश्चात ई पूर्णतः निर्विवाद अछि जे मंडन मिश्र, मैथिल ब्राहमण छल आ महिषी ग्रामक निवासी छल. ओ तहियोका भारतवर्षक सर्वाधिक प्रखर अद्वैतवादी वेदांती छल. एक ठामक तीर्थ हेबाक कारण महिषी आ सिंहेश्वरक संबंध अटूट रहल छल आ ओ आइयो अछि.
सहायक आ सन्दर्भ पोथीक सूची
ऋग्वेद, वैदिक संशोधन मंडल, पूना
यजुर्वेद, संपादक श्रीपाद शर्मा, औंधनगर
अथर्ववेद, संपादक श्रीपाद शर्मा, औंधनगर
बाल्मीकीय रामायण, गीता प्रेस, गोरखपुर
महाभारत, पारडी संस्करण (श्रीपाद दामोदर सातवलेकर)
हरिवंश पूरण. चौखम्भा, वाराणसी
श्रीमदभगवत पुराण, चौखम्भा, वाराणसी
तैत्तिरीय अरण्यक, चौखम्भा, वाराणसी
छान्दोग्योपनिषद, चौखम्भा, वाराणसी
विष्णु पुराण, गीता प्रेस, गोरखपुर
शतपथ ब्राहमण, अच्युत ग्रंथमाला, वाराणसी
वायु पुराण, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई
गौतम धर्मसूत्र, आनन्दाश्रम संस्कृत सीरिज
बोधायन धर्मसूत्र, आनन्दाश्रम संस्कृत सीरिज
श्वेताश्वर उपनिषद, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई
मनुस्मृति, कुल्लकभट्ट टीका, बम्बई
अमरकोश, भंडारकर रिसर्च इंस्टिट्यूट, पूना
कुमारसंभव, चौखम्भा, वाराणसी
मत्स्य पुराण,बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई
दशकुमार चरितम, चौखम्भा, वाराणसी
पदमपुराण, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई
विविध तीर्थ कल्प, हिंदी जैन पीठ, शांति निकेतन
दीघनिकाय, नालंदा पालि प्रतिष्ठान
विनय पिटक, नालंदा पालि प्रतिष्ठान
महाबग्ग आर्य भूषण प्रेस, शिवनग रपूना
मझिझम निकाय, नालंदा पालि प्रतिष्ठान
संयुक्त निकाय, महाबोधि, सारनाथ
औपपातिक सूत्र, जैन विद्यापीठ, भारतीय विद्या भवन, बम्बई
पुर्णियाँ गजेटियर
भागलपुर गजेटियर
नेपालीज बुद्धिस्ट लिटरेचर, कोलकाता
शैव अवधारणा आ सिंहेश्वर, हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’, मधेपुरा
बौद्ध धर्म आ बिहार, हवलदार त्रिपाठी सह्रदय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
बिहार की नदियाँ, वहि
रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर
प्राचीन भारत मे संग्रामिकता, पंडित रामदीन पाण्डेय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
भागवत दर्शन, 35वां खंड, प्रभुदत्त ब्रहमचारी, झूंसी
महाभारत कथा, चक्रवर्ती राजगोपालचारी, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली
भागवत कथा, सूरजमल मेहता, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली
रिश्य्श्रिंग स्मृति ग्रंथ, कुंवरलाल शर्मा, कोटा, जस्थान
सिखवाल ब्राहमण परिशीलन, लेखक श्री बुद्धिप्रकाश देव उपाध्याय, ब्यावर, राजस्थान
मिथिला लोक संस्कृति कोश, डा. लक्ष्मीप्रसाद श्रीवास्तव, दरभंगा
रामायण कालीन संस्कृति, शांति कुमार नानुराम व्यास, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली
लोपमुद्रा, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, नवयुग प्रकाशन, दिल्ली
मिथिला तत्व विमर्श, म.म. परमेश्वर झा, तरौनी, दरभंगा
प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, डा. जयशंकर मिश्र, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना
प्राचीन भारत का एतिहासिक भूगोल, डा. विमल चरण लाहा, उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, लखनऊ
ग्यारहवीं सदी का भारत, डा. जयशंकर मिश्र, वाराणसी
प्राचीन भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, ए.के. मित्तल, आगरा
कल्याण, मासिक, गोरखपुर
अखंड ज्योति, मासिक, मथुरा
कादम्बनी, मासिक, नई दिल्ली
सहरसा, गजेटियर, 1965
जर्नल ऑफ़ रायल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल
विजडम ऑफ़ द एंसियेंट रिसीज, ब्रहमचारी कृष्णदत्त, वैदिक अनुसंधान समिति, नई दिल्ली
सच्चिदानंद प्रकाश, भाग एक, स्वामी अद्वैतानन्द पुरीजी महाराज
स्मारिका राज. प्रदेश सिखवाल ब्राहमण सभा, जयपुर, प्रधान संपादक एस.एम. त्रिपाठी, जयपुर
कैप्सन
हिमाचल प्रदेशक कुल्लू अंचल मे सभ वाहन पर ऋषिराजक जयकारा लिखल भेटैत अछि. ऋषिराज एतौका पहिलुक देवता अछि. तइसँ एतए श्री गणेशजी महाराजसँ पहिने हिनकर पूजा होइत अछि.
ऋष्यश्रृंग पहाड़ी (बंजार हिल रेंज, हिमाचल) क मनमोहक चित्र. सामनेबला पहाड़ीकेँ मारकण्डे पहाड़ी कहैत अछि, जतए देवी त्रिपुरबाला सुन्दरीजी प्रकट भेल छल आ एतए ओ दुर्गा सप्तसी आदि देवी-पोथीक रचना केले छथिन.
हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग श्री ऋषिराजक महानताकेँ मानैत अछि. ई चित्र एकर प्रमाण अछि.
श्रृंगी ऋषि मार्ग जे जलोड़ी-पास मार्गसँ अलग भ’ क’ श्रृंगी ऋषि पहाड़ीक परिक्रमा मंदिरक पैदल मार्ग धरि जाइत अछि, क चित्र.
हिमाचल प्रदेशमे ऋषिराजक मंदिर धरि 30 मीटर पैदल चढ़यके संकेत चिन्ह.
हिमाचल प्रदेशमे पूजित ऋष्यश्रृंगजी महाराजक दिव्य मूर्ति जेकरा स्थानीय लोक श्रृंगाऋषिक नामसँ पूजा करैत अछि.
बागी (हिमाचल प्रदेश) क लगभग छह सौ पुरना ऋष्यश्रृंगक महाराजक मंदिरक दृश्य, जे सालमे आठ मास बर्फसँ झापल रहैत अछि. ई मंदिर समुद्रतल सँ छह हजार फीटक ऊँचाईपर अछि.
हिमाचल प्रदेशक श्रृंगा ऋषि (ऋष्यश्रृंग) क सोनाक पालकी केँ ल’ जाइत भक्तगण. अइ प्रदेशक मान्यता अछि जे ई देवता सभसँ बेसी ठामक भ्रमण करैत अछि.
ऋषिराजक महानदीक प्रकट स्थल सिहोवा पहाडीसँ लेल गेल अइ धारक चित्र, जइमे दक्खिन दिससँ उत्तर वाहिनी बहैत ई धार.
ऋषिराजक तपोभूमि महानदी उद्गम स्थल सिहोवा पहाड़ीपर तपस्यारत साधु-संन्यासी.
ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि ‘सिहोवा’ छतीसगढ़क पहाड़ी पर जाइत श्रद्धालु.
श्री सिंहेश्वर मंदिरक मुख्य प्रवेश द्वार.
श्री सिंहेश्वर मंदिरक मध्य प्रवेश द्वार.
श्री सिंहेश्वर महादेवजीक मंदिर.
श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) मंदिर स्थित शिव-गंगा (पुरातन नाम श्रीविभांडकक कुंड) क दृश्य.
श्री सिंहेश्वर मंदिर (बिहार) मे श्रद्धालुक भीड़. संगे विभांडक कुंडसँ नहाक’ दंड प्रणाम करैत (लेट-लेटा क’) मंदिरमे प्रवेश करैत श्रद्धालु.
श्री सिंहेश्वर स्थापित मंदिरक प्रांगणमे ऋष्यश्रृंगक प्रतिमाक मनोहारी दृश्य.
श्री सिंहेश्वर मेलामे कुटीर उद्योगक सामान बेचैत ग्रामीण स्त्रीगण.
श्रृंगवेरपुरमे ऋष्यश्रृंग आ माता शान्ताक मुरुत.
रावेर, जिला जलगाँव, महाराष्ट्र लग ‘श्रृंगार ऋषि’ क मंदिरक दृश्य.
अनसिंग, जिला वासिम, महाराष्ट्र क ऋष्यश्रृंग मंदिरमे ऋष्यश्रृंग आ भगवान शिवक मुरुतक अलौकिक दृश्य. संगमे पुजारी श्रीसदाशिव पाटिलजी.
कारला, यवतमाल, महाराष्ट्रमे ऋष्यश्रृंगक समाधि मंदिरक मुख्य द्वार.
कारला, यवतमाल, महाराष्ट्र ऋष्यश्रृंग समाधि मंदिर जइ लेल भव्य सीढ़ीक दृश्य.
सिंगत, तहसील रावेर, जिला जलगाँव मे ऋष्यश्रृंग जी महाराजक समाधि मंदिर जे नौ मास जलक भीतर रहैत अछि.
ऋषिकुंड, मुंगेरक तेसर गरम जलक कुंडक दृश्य.
भीमबांध, मुंगेर, बिहारक झरनासँ बहि क’ आबैत गरम पानिक जलधारा, जे भीमबाँधक नामसँ प्रसिद्द अछि.
भीमबांध सँ आबएबला गरम जल धारक संग ठाढ़ पानिक दोसर धारक संगम. दृष्टव्य-अंगराज रोमपाद ऋष्यश्रृंगकेँ ई क्षेत्र कन्यादानमे देने छल आ ऋषिराज अइ गरम पानिक कुंड आ झरनाक निर्माण केलक. कालांतरमे द्वापर युगमे अइ विशाल जल प्रपातपर भीम बान्ह बनौने छल आ जाइ कारणसँ अइ गरम पानिक झरनाक नाम भीमबाँध पड़ि गेल जे खड़गपुर अनुमंडल, जिला मुंगेर, बिहारमे अछि.
ऋषिकुंड (गरम पानिक कुंड), जे बरियारपुर, जिला मुंगेर, बिहारमे अछि, क दृश्य. संगमे संपादकक माँ श्रीमती पार्वती देवी. अइ तरहक तीन गरम पानिक कुण्ड अइ ठाम अछि. ऊपरका पहाड़ीपर श्री ऋष्यश्रृंगक मंदिर आ गुफा सेहो अछि.
ऋषि कुंड, जिला मुंगेर, बिहारमे दोसर गरम पानिक कुंडक दृश्य.
सिगंरीरिसी ऋषि स्थल, क्यूल, बिहारक दुर्गम बाटक मनोहारी दृश्य.
सिंगरीरिसी, क्यूल, बिहारक पंचधाराक दृश्य. ऐ जलस्रोतक स्रोत कतए अछि केकरो आइ धरि जानकारी प्राप्त नै भेल अछि.
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