जानकी आ गांधी सं सीखय अप्पन समाज
प्रो. अरविंद कुमार झा, डीन (शिक्षा निकाय), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
हम सब सौभाग्यशाली छी जे ओहि पवित्र भाषामे बजि रहल छी, जे कहियो जगतजननी जानकीक सेहो मात्रभाषा छल. रामायणमे एकरा मानुषी कहल गेल अछि. हनुमान जखन लंका पहुन्चाल्खिन, अशोक वाटिकामे ओ सीतासं संस्कृतमे नै बाजैत छैथ. क्या, क्याकि संस्कृत लंकोमे सब जानैत छल, तें सीताजीक विश्वास प्राप्त करय लेल, करबाक लेल अति बुद्धिमान हनुमान मानुषी अर्थात मैथिलीमे बाजय लागैत छैथ. क्या ते मैथिली लंकामे जानतय के? आ दोसर बात जे एतेक दिनक बाद ओहि प्रदेशमे अप्पन मातृभाषा सुनिके आह्लादित भेनाय स्वाभाविक छल. ई कहल जाय छै जे आत्मीयाकताक संबंध मातृभाषा बनबैक छै ओ दुनियाक कोनो भाषा नै बना सकैत छै.
आब सवाल उठे छै जे एक तरफ जानकीजी, एक तरफ तरफ गांधीजी आ एक तरफ हमर आजुक समाज. ते हम कहब चाहब कतय मिथिलाक बेटी, मर्यादापुरुषोत्तम रामक जीवन संगिनी जनक दुलारी जानकी, आ कतय गुजरातक साबरमती नदीक तट सं सत्य, अहिंसाक बल पर जग-जीतनहार महात्मा गांधी आ कतय वैश्विकरण आ औद्योगिकीकरणक चौबटिया पर ठकमुडी लगौने ठाड़ अप्पन समाज. तीनों तीन दिशा जाय छय. तखन ओ कोन फार्मूला अछि जे तीनो के एक सूत्रमे बान्हैत अछि.
संजोग से ओ महत्वपूर्ण फार्मूला हमरा बाल्मीकि रामायणमे जाके भेटल. दंडकारण्यमे जखन ऋषि-मुनि अप्पन दुर्दाशक वर्णन करैत कहैत अछि, जे हम सब तपस्या क’ के पुण्य कमाबैत छी, तकर छठम भाग राजाक जायत छै, तखन हमरा लोकके राक्षसक उत्पातसं बचायब अहाँक राजधर्म छी. ताहि पर उत्तेजित भ’ के राम प्रतिज्ञा करैत छैथ जे हम अहाँ लोकेन लेल शत्रु राक्षसक वध अवश्य करब. अहि पर जानकी के उक्ति महत्वपूर्ण अछि. ओ राम सं कहैत छथिन, ‘हम सब एतय बनवास करय लेल आयल छी, शस्त्र उठाबय नै, कतय तपोवृत आ कतय क्षत्रिय धर्म. दुनू में कोनो मेल नै. एतय देश धर्म के पालन करब सर्वथा उचित. अहाँ जखन वनवासक अवधि पूरा क’ के, अयोध्या लौटब तखन शस्त्र धारण करब किया ते शस्त्रक सेवन सं बुद्धि मलिन भ’ जायत छै.’ जानकीजीक ओ बात भगवान राम नै मनालखिन, मुदा तकर हजारों साल बाद महात्मा गांधी मायक ई वचनक अनुसरण केलेन आ बिना शस्त्र आ शास्त्रक प्रयोग केने सत्य अहिंसाक बल पर मातृभूमि के परतंत्रता सं मुक्ति दियेलेन. हमर सौभाग्य अछि जे हम जन्मना जानकीजी सें सम्बद्ध छी, आ कर्मना हम गांधीजीसं. अपने सब जानैत छी जे जाहि वर्धा विश्वविद्यालयमे हम रहैत छी, तकरा पासेमे सेवाग्राम आश्रम छै, जतयसं गांधीजी अहिंसक लड़ाई लड़ने छलाह. जानकीजी जन्म लेली सीतामढक पुनौरा गाम में, मुदा हुनकर लालन-पालन भेलैन जनकपुरमे, तें भारत आ नेपालक बीच उनका सं बढ़के कियो सांस्कृतिक सेतु आर की भ’ सकैत छै? ई हमर व्यक्तिगत धारणा सेहो ये, राष्ट्र आओर समाजक बीच जों कोनो संबंध होय छै ते ओ सांस्कृतिक संबंध होय छै.
जानकीक एकटा लोकप्रिय नाम सीता सेहो छै. सीता नाम के की अर्थ होय छै. खेतमे हरक फारसं से क्यारी बनैत छै, ओकरा संस्कृतमे सीता कहल जायत छै. सीताक उत्पत्ति राजा जनक द्वारा हर जोतैत काल भेल छलैन. मान्यता अछि जे एकबेर बहुत बड़का अकाल पड़ गेल, वर्षा करबैक लेल राजा जनक स्वयं हरके मूठ पकड़लाह आ हर जोतय लागल. अहि क्रममे एकटा कुम्भ उखड़ल, जाहिसं जगतजननी प्रकट भेली, ओ महाशक्ति छलीह आ हुनका दृष्टिपातक बादे अवधक राजकुमार श्री राम शिव धनुष तोड़ी सकल छलाह. बादमे लंका जाके असुर संहार क’ सकल छलाह. आखिर राम-रावण युद्धक कारण ते भगवती सीते छलीह.
संसारमे सीतासं सुन्दर नै कोनो स्त्री भेल, नै कोनो स्त्री हेताह. स्वामी तुलसीदास रामक एहन भक्त छलाह, जे हुनकर सुन्दरताक आगू करोड़ों कामदेव के फेल मानैत छलाह. ‘कोटिक काम लजावन हारी’. तुलसी जखन सीताजीक देखैत छैथ, ते अवाक रहि जायत छैथ आ कहैत छैथ, ‘सब उपमा कवि झुठारी’. मने सीताके कोनो उपमा भैये नै सकैत छै. ओ तुलसी बडबड छंदमे रामसं कहैत छथिन, ‘गर्व करहु रघुनन्दन जानी मन मानी, आपनी सूरत सिया के छांह’. हे रघुनन्दन राम, अहाँ आपन रूप पर घमंड नै करू, अहाँके रूप ते सीताके छाहियो बराबर नै अछि. रूपक ल’ क’ दू शब्द आओर कहेल चाहब. ई रूप जे सामने देखय छियै अहाँ, ई रूप सिर्फ चर्मक या हड्डीक मिश्रण नै होयत छै. हम मानैत छियै आ शेक्सपीयर सेहो कहने अछि अहाँ जे केकरो रूप देखय छियै, ओ अहि मस्तिष्कमे जे विचार, जे आचार, जे सोच होय छै, ओकरे रिफ्लेक्सन देखय छियै. तें तुलसी एकदम सही छैथ.
तुलसी जानैत छलाह जे हुनकर उद्धार पुत्रवत्सला माता सीता क’ सकैत छैथ. विनय पत्रिकाक एकटा पदमे तुलसी माँ जानकी सं निहोरा करैत छैथ, ‘कबहुक अंब अवसर पाई, ध्यावी सुधि मेरी किछु करून कथा सुनाई’. की अर्थ भेल एकर? एकर अर्थ भेल, ‘हे माँ कहियो मौका देखके भगवान रामके हमरो सुधि दिये देबैन, सेहो पहिने किछु करून कथा सुना के.’ दुनिया के कोनो रामायमे लंकाकांडमे पूरा युद्धकालमे सीता अशोक वाटिकामे बैसल की क’ रहल छलीह, तकर वर्णन नै आयल अछि. मुदा की ई संभव छै जे आद्यशक्ति सीता मर्यादा पुरुषोत्तम राम के असगरे युद्ध करय देथिन. असली युद्ध ते महादुर्गा सीता अशोक वाटिकामे बैस के क’ रहल छलीह. राम ते माध्यम मात्र छलाह.
हम रामके भगवान् नै, पुरुषोत्तम मानैत छी. बहुत सं लोक पुछैत छै जे अहाँ राम के भगवान् किया नै मानैत छियै, किया मर्यादा पुरुषोत्तम. रामक पिता दशरथ के सेहो तीन रानी, मुदा देखियो, सीता के तेज, जानकी माता के तेज, जे पहिल रातमे, पहिल वचन जे ओ अप्पन पत्नीके देत छैथ, ओ यहै कहैत छैथ जे आय के बाद अहीं हमर पत्नी रहब, कियो आओर नै. पहिल व्यक्ति पुरुष हेबाक बावजूद अपनाके मर्यादाके मर्यादित राखैत अछि ते ओ मर्यादा पुरुषोत्तम छैथ. आय मैथिल समाजक आवश्यकता अछि जे हम सब अपनके मर्यादित करि.
आब बचल समाज. वस्तुतः आय हमरा लोकेन समाज कहैत छियै, तकरा किछु सदी पहिने ‘ज्यांपद जन’ कहल जायत छल. सम्राट अशोक अपन धर्मयात्राक उद्देश्य घोषित करैत छैथ आ कहैत छैथ, ‘ज्यांपद जन क’ दर्शन’. ज्यांपद जनके धर्मके नीति सिखायब, ज्यांपद जन के संग नीति विमर्श करब. समाजक अर्थ कहियो टोली छल. आय समाज ते अछि, भारतीय संस्कृति सं प्रभावित समस्त समाजमे सीता पवित्रतम नारीक प्रतीक छैथ, सर्वथा पूज्य, लोकमे हुनकर एहन प्रतिष्ठा जे रामसं पहिने हुनकर नाम लेल जायत छै.
तहिना अगर भारत के पूरे विश्वमे जानल जायैत छै ते दू व्यक्तिक वजह सं. एक महात्मा बुद्ध आ दोसर महात्मा गांधी. विष्णु, ब्रह्मा आ महेशक द्वारा नै. महात्मा गांधी के जे प्रतिष्ठा लोकमानसमे छै ओ कोनो हुनका समकालीन नायकमे नै भेट सकैत छै. भारत नै सम्पूर्ण विश्वक समाज महात्मा गांधीक आध्यात्मिक नेतृत्वमे अप्पन भविष्य सुरक्षित पाबय अछि. जब लन्दनमे वकीलक रूपमे गांधी आ ई गांधी जखैन चंपारण पहुँचैत छैथ, ते कम्पलीट ट्रांस्फोर्मेशन, जेकरा अहाँ काया रूप कहि सकैत छियै. बहुत लोग अहिमे आओर भी विशेषण देने अछि, लेकिन हम कहैत छी जे ई रूपांतरण अछि. जों हम एकटा चीज गांधीसं सीखैय लेल चाही ते ई जे ‘हाउ टू ट्रांसफॉर्म योरसेल्फ’.
मैथिल बहुत बढ़िया क’ रहल अछि अप्पन अप्पन फील्ड में. जे जतय छैथ सिरमौर पर छैथ. मुदा ‘बेटी बचाउ, बेटी पढाउ’, ई सिर्फ हरियाणाक लेल नै छै, देशक लेल नै, ई मिथिलाक लेल बेसी सटीक अछि.