विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलामे कोनो भेदभाव नै छल

आर. के. सिंह · 2016-06-15 · अंक 204

मिथिलामे कोनो भेदभाव नै छल
श्री आर.के. सिंह, लोकसभा सदस्य
पहिने ते हम अमरनाथजी कें धन्यवाद दिअ चाहब जे ओ अपना सबके अप्पन जड़सं भेंट करैलखिन. हम सहरसाके रहय बला छी, हमर नानी गाम मधुबनीमे अछि, हमर सासुर भोजपुरमे अछि.
कियो लोक जखन अप्पन जड़सं फराक भ’ जायत अछि ते ओ सूइखि जाइत अछि. कियो समाजसं कटि जाइत अछि ते ओ सूख जाइत अछि. ओ समाजमे चलि नै सकैत अछि, ओकरामे ओ आत्मविश्वास, आत्मबल नै रहि जाइत अछि. ई अपना सबहक संस्कृति अछि जे अपना सबके आत्मविश्वास दैक अछि, आत्मबल दैक अछि.
हम सब आपन प्रान्तके छोडि के आयल छी. हम एतय प्रवासी छी. हम सब आपन प्रांत के छोडिके अहि द्वारे अहिलहूं, क्याकि शनै-शनै ओतय शिक्षा व्यवस्था धराशायी भ’ गेल. स्कूली शिक्षा धराशायी भ’ गेल. आब ते विश्वविद्यालय धरि शिक्षा धराशायी भ’ गेल. अप्पन नेना सबके कतय पढ़ाबी, ई अहम प्रश्न अछि.
एकटा हमर जेनरेशन छल जे एतय आयल. हमर पिताजी हमरा कॉलेजमे पढैक लेल एतय भेजने छल. हम लोक जाहि काल एतय आयलहूं, ओहि काल साइंस कॉलेज नीक छल, पटना कॉलेज सेहो नीक छ्हल मुदा कनि गिरावट आयब शुरू भ’ चुकल छ्ल. तइयो नीक छल. आब नै अछि. ताहि सं अपना दिस सं बेसी सं बेसी लोक इम्हर आबि रहल अछि. सम्पूर्ण पूर्वांचलसं लोक इम्हर आबि रहल अछि, बिहारसं ते आबिये रहल अछि. जों अहाँ पढ़-लिख ली ते ओतय नौकरी सेहो नै अछि, ते एत्ते आयब आवश्यक अछि.
जों हा एतय आबी आ अप्पन संस्कृतिसं दूर भ’ जाय ते अप्पन सबहक बाल-बच्चा एकटा जड़विहीन अस्तित्वमे चलि जायत, जेकरा संस्कृतिक बंधन नै अछि, ओ दोसर संस्कृतिक दिस चलि जायत अछि. ई दोसर जे संस्कृति अछि, मिलल-जुलल संस्कृति अछि, ओकर स्तर बड नीचा अछि आ अपना सबके अप्पन संस्कृति पर गर्व अछि. ताहि सं अहि तरहक बीच-बीचमे एहन कार्यक्रम हैत रहय जाहिसं हमसभ बीच-बीचमे भेंट क’ सकी आ अप्पन संस्कृतिक एतय जिन्दा राखि सकी.
आजुक विषय बड महत्वूर्ण अछि आ अपना सबसं संबंधित अछि. हम सब ओतुका रहय बला छी जतुका सीताजी छलीह. अपना सबहक एतय पहिने कोनो भेद नै छल, नारीक लेल बड इज्जत छल. ताहिसं हम सब दुर्गाजीक पूजा करैत छी. अपना एतय मनमे कोनो भेदभाव नै छ्हल. अपना कतय, अप्पन समाजमे जतेक महिला नेतृत्व भेल, ओतय कोनो आओर देशमे, कोनो समाजमे नै भेल. ऐना अहि द्वारे, अपना सबहक़ पूर्वज अप्पन संस्कृतिमे सबके बराबरीक दर्जा देने छल. हमसब ‘सीताराम’ कहैत छी, ‘रामसीता’ नै. पहिने सीता, तकर बाद राम.
बादमे जखन दोसर-दोसर संस्कृति आयल, ओकरा सुसंस्कृत ते नै कहि सकैत छी, अपना कतय इन्वेडर्स (आक्रमणकारी) आयल, तखन पर्दा प्रथा शुरू भेल. ओकर बाद जे अप्पन समाजक महिलाक स्थिति भ’ गेल, ओकरा सुधारब आवश्यक भ’ गेल अछि. ई अहि द्वारे क्याकि 50 प्रतिशतक बल पर कोनो समाज प्रगति नै क’ सकैत अछि.
एकटा पुरुष प्रधान समाजक प्रासंगिकता तखैन छल जखैन लड़ाई तीर-तलवारसं लड़ाल जायत छल. लोक खायक लेल शिकारक लेल जायत छल. आब नॉलेज सोसाइटी भ’ गेल अछि. आब कंप्यूटरसं लड़ाई लड़ल जा रहल अछि. आब नौकरीकक लेल नॉलेजक आवश्यकता अछि, बाहुबलक नै.
ताहिसं हम चाहि या नै चाहि, समानता ते अइबे करत आ आबइये पडत. जों प्रगति आनैक अछि ते समानता आनय पडत. जों अपना सभ लगातार अहि दिस काज करि ते अपना सभ तेजीसं तरक्की करब. ई अपना सबके मानय पडत.
दोसर गप ई सेहो अछि जे कोनो समाजमे जों समानता नै हुए ते ओ समाज बेसी प्रगति नै क’ सकैत अछि. समानताक मतलब अछि विचार राखयके स्वतंत्रता, अप्पन गप कहैक स्वतंत्रता, अप्पन डिग्निटी मेंटेन करैक स्वतंत्रता. ई नै भ’ सकैत अछि ते बुझू ओ समाज बीमार अछि. जाहि समाजमे आध जनताके अप्पन अभिव्यक्तिके खुलिके कहैक अधिकार नै हुए, ओ समाज बीमार अछि. अपना सब्बके अहि बीमारीसं निकलबाक अछि. अहि दिश बहुत दिनसं काज सेहो चलि रहल अछि.
हम सब दहेज़ उन्मूलन क’ ल’ क’ कानून आनलहूं. हम सब ई कानून आनलहूँ जे लड़का आ लडकीक समान अधिकार संपत्ति पर भेटत. ओकरा हमसब एखैन धरि वास्तविकतामे ट्रांसलेट नै क’सकलहूँ. हम सब अप्पन परिवारेमे देख लिअ, अप्पन्न समाजमे देखि लिअ. एकटा ट्रांसलेट करहिके जरुरत अछि तकरा बादे सहीमे क्वालिटी आयत. अपना सबके ई मेंटिलिटी छोड़बाक होयत जे हम सबहक देखभाल बेटे टा क’ सकैत अछि. बेटी माय-बापक नीक देखभाल करैत अछि. बेटीके अप्पन माय-बापक बेसी चिंता अछि.
ई बुझे पडत अपना सबके. समाजके बुझय पडत. एखन अहिमे अपना सबके आओर सुधार आनय पडत आ आनय के आवश्यकता अछि. मुदा लोक के ठाम-ठाम ई बुझाबय पडत. ओकरासं पहिने एकरा ल’ क’ अपना के अंगीकृत करय पडत. हम सब बाजि दैत छी, भाषण द’ दैत छी मुदा व्यवहार करैक होयत अछि ते अप्पन निजी जिनगीमे ऐना नै करैत छी. ऐना करय पडत. अपना आपमे अपनाक प्रति ईमानदार हुए पडत. अप्पन विचारक प्रति ईमानदारी आनय पडत. केकरोमे ईमानदारी नै अछि. पहिने अप्पन विचारमे ईमानदारी आनि लिए ते समाजक ओहिना कतेक रास कुरीति कनि-कनि दूर भ’ जा लागत. अप्पन सबके जे प्रकृति अछि, संस्कृति अछि, ई सब करब दोसराक बनिस्पत अपना सबहक लेल बेसी आसान अछि. एकरा अंगीकृत करब बेसी आसान अछि.

Suggested citation: आर. के. सिंह. “मिथिलामे कोनो भेदभाव नै छल.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 204, 2016-06-15. https://www.videha.co.in/research/2016/204/मिथिलामे-कोनो-भेदभाव-नै-छल.htm

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