सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथमे समानता
(लोक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे)
सौराठ मिथिलाक धरोहर-गाम अछि। केतेको सालसँ चलैत सभा हेतु अइ गाम आ सभा-गाछीकेँ के नहि जनैत अछि? कहल जाइत अछि जे सौराठक मूल नाम ‘सौराष्ट्र’ छल। सौराष्ट्रक अर्थ भेल १०० राष्ट्र। लोक कथाकेँ जँ मानी तँ सौराठ रामायण (हमरा हिसाबे सीतायण) सँ जुड़ल स्थान अछि। लोक कथा के मान्यता में कहल जाइत अछि जे सीताक स्वयंवर सौराठमे भेल छल। ओइ स्वयंवरमे १०० राष्ट्रक राजकुमार भाग लेने छला तँए एकर नाम ‘सौराष्ट्र’ भेल जे बादमे अपभ्रंशित भऽ‘सौराठ’ भेल। ऐ बातकेँ थोड़ेक आरो ठोस आधार देबाक लेल चली लोक मान्यता दिस। कहल ईहो जाइत अछि जे सीता-स्वयंवर आ बिआहमे सात लाख लोक आएल छला। ओतेक मनुख रहत केतए? तँए ऐ लेल एकटा पैघ स्थानक निर्माण कएल गेल जे सभ सुविधासँ युक्त छल। ओ स्थान आब ‘सतलखा’ नामक गामसँ विख्यात अछि। सतलखा सौराठसँ सटले अछि। मात्र तीन किलोमीटरक अन्तर छै।
आब दोसर उदहारण, भगवान शिवक धनुष जतए राखल गेल छल ओ स्थान आब ‘धनुखी’ नाओंसँ जानल जाइत अछि अर्थात धनुखी गाम। राजा जनकक छोट भाए छलखिन कनक। कनक ऋषि छला। ओ अपन आश्रम बनौने छला। ओइ स्थानपर आब ‘कनैल गाम’ बसल अछि। सीता प्रति दिन भोरे अपन संगी-बहिनपाक संग ‘मंगलबनी’ नामक फुलबाड़ीसँ फूल लोढ़ै छली। मंगलबनी आब अपभ्रंशित भऽ ‘मंगरौनी’ बनि चुकल अछि आ मधुबनीक बगलेमे ई गाम अछि। भऽसकैत अछि जे सौराठक यएह दन्त-कथा ऐ गामकेँ ‘सभा गाछी’ लेल योग्य बनेने हुअए? खैर! सभा गाछी पर चर्चा कहिओ बाद में करब।
विद्यापतिक पौत्र बादमे सौराठमे आबि कऽ बसि गेला। ओ सभ अखनो छैथ। हुनकर संतति सब एखनो अहि गौरव के समेटने छथि । जखन हम सौराठ में रही त अही कुलक एक महिला विद्यापतिक बहुत गीत अपन मधुर कंठ स सुनेली । एक गीत जे मोन के थैहर-थैहर क देलक ओ छल:
सुरसरि सेबि मोरा किछुओ ने भेल ।
पुनमति गंगा भागीरथ लैल।
हटबह बनिया हाट बजारे।
अही बाटे अबै छथि सुरसरि धारे।।
विद्यापति पर सेहो विस्तार स कहिओ आर बात करब. एखन अपन मूल बात के आगा बढ़ाबी।
सौराठ अपना-आपमे रामायण, भगवान शिवक तंत्र आ राजा सलहेसक आख्यानसँ जुड़ल अछि। सौराठ हिन्दू आ मुसलमानक बीच आपसी सम्बन्धक अद्भुत उदाहण सेहो अछि।
गुजरातमे जे ‘सौराष्ट्र’ अछि जेतुक्का सोमनाथ मन्दिर विश्व प्रसिद्ध अछि आ द्वादस ज्योतिर्लिंगमे एक लिंग अछि, जेहो लोकधारामे मिथिलाक सौराठसँ जुड़ल अछि। बता दी जे गुजराती भाषामे सौराष्ट्रकेँ सेहो सौराठे कहल जाइत छै।
गुजरातक सौराठ आ मिथिलाक सौराठक मध्य एक कथा ऐतिहासिक अछि। ऐ कथाक इतिहासमे चली। सौराठ गाममे दू गोट ब्राह्मण कुमार भेला- गंगदत्त (गंग देव) आ भागीरथ दत्त (भागिरथ देव)। दुनू सहोदर भाए। नैनेसँ संस्कृतमे उत्कृष्ट आ कर्मकाण्डमे मग्न। एक बेर दुनू भाँइ निआरलैन जे द्वादस ज्योतिर्लिंगक दर्शन करब। फेर की छल दोसरे दिन निकैल गेला। सभ लिंगक दर्शन करैत सौराष्ट्र[1]क सोमनाथ मन्दिरमे पहुँच खूब नियम निष्ठासँ पूजा-अर्चना केलैन। भगवान शिव जेना हुनकर आत्मामे बसि गेलखिन। आब हुनका सोमनाथ छोड़बाक मोने ने होनि! बाह रे भक्त! बाह रे समर्पण! पाँच दिन ओतै रहि गेला। छठम राति सोमनाथ महादेव मन्दिरक देख-रेख करैबला मुखियाक सपनामे आबि कहलखिन-
“दू संस्कारी आ विद्वान् मैथिल ब्राह्मण कुमार अतए आएल छैथ। ई सभ बहुत नीक लोक छैथ। विद्वान त छथिए एक नंबर केर भक्त सेहो थिकाह । अहाँ सभ हिनका लोकैनकेँ निवेदन करू जे ऐ मन्दिरक मुख्य पण्डित केर भार स्वीकार कऽ लेथि।”
..सोमनाथ बाबा ऐ दुनू भाँइक हुलिया सेहो बता देलखिन। जखन मुखिया भोरमे उठल तँ देखलक जे सहीमे दू ब्राह्मण बालक शिवक ध्यानमे मग्न छैथ। हुनका लग गेला। परिचए-पात भेलैन। आ अन्ततः निवेदन केलखिन-
“हे मिथिलाक पण्डित द्वय! ऐ भूमिपर अपनेक स्वागत अछि। सोमनाथ महादेव केर ई इच्छा छैन जे अहाँ सभ मुख्य पुजारिक भार ग्रहण कए हमरा लोकनि के चरितार्थ करी?”
गंगदत्त आ भागीरथ दत्त ऐ भारकेँ स्वीकारि लेलैन। मुदा ई अबस्स कहि देलखिन जे छह मास एकटा भाए सोमनाथमे रहता आ दोसर मिथिलामे आ हरेक छह मासमे पार बदैल जेतैन। दुनू भाँइ आब कर्मकाण्डमे आरो लीन भऽ गेला।
ओइ समय सोमनाथ भारतक सभसँ सम्पन्न मन्दिर छल। प्रतिदिन वनारससँ भरल गंगाजलसँ शिव लिंगक स्नान आ पूजा होइत छल। कहल जाइत अछि जे वनारससँ सोमनाथ धरि पीत-वस्त्र पहीरल भक्तक चेन (श्रृंखला) लागल रहैत छल। सबहक हाथमे स्वर्ण कलश। पहिल बेकती कलशमे गंगाजल भरि लगभग डेढ़ किलोमीटर जा ओ कलश दोसर आदमीकेँ दऽ दइत। दोसर आदमी पहिनहिसँ खाली कलश लेने ठाढ़ रहैत। फेर ओ आदमी भरल कलश हाथमे लऽ डेढ़ दू किलोमीटर चलैत छल आ तेसर आदमीकेँ भरल कलश दैत खाली कलश लैत गंगा दिस आबि जाइ छल। ..अही तरहेँ वनारससँ सोमनाथ धरि मानव श्रृंखलासँ गंगाजल स्वर्ण कलशमे पहुँचै छल। सभकेँ अपन समय बूझल रहइ।
वनारससँ सोमनाथक दूरी अछि १७९२ किलोमीटर। एकर अर्थ भेल जे २४०० स्वर्ण कलश गंगाजल लेल प्रयोगमे अबैत छल आ २४०० पीत वस्त्रमे लोक ऐ कार्यक सम्पादनमे अपन श्रमदान करैत छल।
गुजरात प्रान्तक काठियावाड़ क्षेत्रमे सोमनाथ अछि। प्रतिहार वंशक राजा नागभट द्वतीय ८१५ इसवीमे लाल रंगक पाथर (Red sandstone) सँ एक भव्य आ विशाल मन्दिरक स्थापना केलैन। ई मन्दिर अपन स्थापत्य कला, क्षेत्र गौरव, आ स्वर्ण, चानी, हीरा, एवं अनेक बहुमुल्य पाथर, रत्न, द्रव्य संगे मुद्राक भण्डारण लेल सेहो विश्व विख्यात छल।
महमूद गज़नी (९७१-१०३०) जेकरा ‘महमूद जाबुली’ अथवा ‘यामीन-उद-दवला अब्दुल कासिम महमूद इब्न सेबुक्तेगिन’क नाओंसँ सेहो इतिहासमे जानल जाइत अछि–ओ अपन सेना सबहक संगे भारतक–औझुका गुजरात प्रान्त स्थित–प्रसिद्ध सोमनाथ मन्दिरपर १०२५ ईस्वीमे आक्रमण केलक। प्रारम्भमे मन्दिरक रक्षक-प्रहरी-स्थानीय सेना– आ चालुक्य वंशक राजा भीम प्रथम (काठियावाडक राजा) राजक सेना ग़ज़नीक विरोध करैत लड़ल मुदा अन्ततः हारि गेल। निरंकुश आ जीतक मदमे मातल गज़नी अपन सेनाक संग समस्त सोमनाथ मन्दिरक परिसरकेँ मटियामेट करए लगल। मन्दिरसँ सभ मूर्ति एवं बहुमुल्य वस्तु, हीरा-सोना-चानी-मूंगा-पन्ना-पुखराज-स्फटिक-माणिक्य इत्यादि आर ने जानि की की, सभकेँ लूटलक। मन्दिरकेँ तोड़ि कऽ ध्वस्त कऽ देलक। आ जे कियो ओतए आएल ओकरा मौतक घाट उतारि देलक। भक्त, सेवादार आ पण्डित सभ या तँ भागि गेला वा जे नहि भागि सकला सेहो सभ अपन प्राणसँ हाथ धोलैन आ निर्मम हत्याक शिकार भेला।
किछु सेवादार आ मन्दिर संचालन समितिक सदस्य सोमनाथ मन्दिरक लिंग बँचबैक अन्तिम प्रयास केलैन आ हिम्मत करैत गज़नी लग गेला। हाथ जोड़ी विनम्र भावसँ निवेदन करैत कहलखिन-
“श्रीमान! अपने जे ध्वस्त केलौं तइले कुनो बात नहि। आरो अगर हीरा, मोती, द्रव्य जात लेबाक अछि तँ हम सभ आनि दइ छी। जेतेक लिंगमे लागल अछि तेकर ५० गुणा, मुदा लिंगकेँ ध्वस्त नहि कएल जाओ!”
ई बात सुनिते गज़नी क्रोधसँ लाल भऽ गेल। चिचियाक बाजल-
“अही लेल हम युद्ध जितलौं! हम जखन अपन देश आपस जाएब तँ लोक की कहत? कहत ने ‘गज़नी बुत पूजक काफ़िरक देवताकेँ बिना ध्वस्त केने आबि गेल?’ अल्लाह हमरा कहियो माफ़ नहि करता?”
कहैत गज़नी सभकेँ ओतै मारि देलक। रक्त केर धार बहए लगल...।
ऐ तरहेँ सोमनाथ मन्दिरकेँ लूटैत काल गजनी लगभग ५०,००० ब्राह्मण एवं हिंदू सबहक नृशंस हत्या केलक। एतेक शोणित बहेलाक बादो गज़नीकेँ मोन शांत नहि भेलइ। लिंगक सभ कीमती वस्तुकेँ समैट अपना कब्ज़ामे लेलक। आ स्वयं अपना हाथमे पैघ हथौरा लऽ शिव लिंगपर दानवी प्रहार तेना करए लगल जेना मदमे पागल भेल हो। प्रहारपर प्रहार! निर्दय प्रहार। निरंकुश प्रहार! आस्थावादी आ मूर्ति-पूजक देवतापर मूर्ति भंजक प्रहार! इतिहासपर प्रहार! वर्तमानपर प्रहार! भविष्यपर प्रहार! संस्कृतिपर प्रहार! संस्कारपर प्रहार! हिन्दू धर्मक भावना आ बिश्वासपर प्रहार! मान्यतापर प्रहार! आरो नहि जानि कथी-कथीपर प्रहार! आब गज़नी सैकड़ो संख्यामे गाइक वद्ध कए मन्दिरक प्रांगनमे भोजन बना अपन आसुरी सेना आ लूटेरा सभ संगे खाए लगल...।
..किम्बदन्तिक अनुसार सोमनाथ शिव लिंगक प्रस्तरक भग्नावशेषकेँ गज़नी अपना संगे लेने गेल। आ ओ अपन शहरक जमा मस्जिदमे ओइ प्रस्तर अवशेषकेँ सीढ़ी बनबैमे प्रयोग केलक। दुनियाकेँ ई बतेबा लेल जे “देखू हिन्दू धर्मक सभसँ पैघ देवताक ऊपर हम सभ लात-दऽ नित्य नमाज पढ़ए जाइ छी।” धन सम्पैतक अतिरिक्त गज़नी अपना संगे हजारक संख्यामे स्त्रीगण एवं बच्चा सभकेँ सेहो गुलाम बना कऽ एतएसँ लऽ गेल।
आब फेर कनी मिथिलाक सौराठ दिस आबी। लोक मान्यता ई अछि जे सोमनाथ महादेवकेँ पहिनहि भान भऽ गेल रहैन जे गज़नी प्रांगणकेँ ध्वस्त कऽ देत। तँए ओ ऐ घटनासँ एक दिन पहिनहि सोमनाथ मन्दिरक पुजारी श्री गंगा उपाध्याय (देव) के रातिमे स्वप्नमे आबि कहलखिन-
“आब हम अतएसँ पलायन कऽ रहल छी। अहाँ जँ हमर पूजा करए चाहै छी तँ हमर निर्माल लऽ लिअ आ अहाँ एकरा जेतए राखब हम ओतइ पहुँच जाएब आ अहाँ हमरा पुनः पूजा-अर्चना करब। हँ, ऐ बातक धियान अबस्स राखब जे केकरो ऐ बातक भान नहि हुअए।”
ई कहि सोमनाथ महादेव अन्तर्धयान भऽ गेला। गंगदेव जखन सुति कऽ उठला तँ सपना जेना सत्य बुझमे आबै लगलैन। मन्दिरकेँ प्रांगनमे जेना भियौन लागए लगलैन। पूजा–पाठ, स्वाध्याय आदि कुनो कार्यमे मोने ने लगैन..! तखन गंगदेव अपन छोट भाए भागीरथदेवकेँ बजेला आ सपनाबला बात सुनेलखिन। सुनिते भागीरथदेव कहलकैन-
“भाय, हमरो बाबा सोमनाथ यएह सपना देला अछि। आब अतए रहनाइक अर्थ भेल अनिष्टकेँ अनेरे निमंत्रण देब।”
ई सोचैत दुनू भाँइ समस्त परिवारक संग शिब निर्माल लऽ चुपचाप अपन गाम अर्थात सौराठ विदा भेला। सौराठ आबि–एखन जे सोमनाथ छैथ ताही ठाम–शिव निर्माल राखि पूजा-अर्चना करए लगला। पूजा तँ करैथ मुदा सोमनाथ महादेवक सपनाबला बात केकरो नहि कहलखिन। पछाइत ओइ स्थानपर स्वतः एक लिंग प्रगट भेल। दुनू भाँइ गद-गद भऽ गेला। पूजा पाठमे लीन रहए लगला।
सौराठ एलाक उपरान्त दुनू भाँइक जीवन शैलीमे सेहो परिवर्तन भेल। दुनू भाँइ खेतीक तरफ़ सेहो धियान देमय लगला। अहीठाम दुनू भाँइ अपन-अपन बेवस्था सेहो अलग कऽ लेला। आ तइ निमित्ते ऐ गामक रकबा जे चौदह साए बीघा अछि तेकर बँटबाराक चर्च उठल। दुनू भाँइ सोचलैन जे जमीनक बँटबारा कऽ ली मुदा दुनू भाँइ एहिमे अपनाकेँ असमर्थ पेला। आब की करी? तखन गंगदेव महादेवक आराधना कए हुनकेसँ प्रार्थना केलैन जे उक्त जमीनक बँटबारा करू। लोक मान्यता कहैत अछि जे तखन कमला राता-राती ऐ गामक रकबा चौदह साए बीघाकेँ बीचो-बीच धारक रूपमे आबि सात-सात साए बीघा कएल। जेठ भाय–गंगदेव–केँ कमलाक पूब आ छोट भाए–भागीरथदेव–केँ कमलाक पच्छिम जमीन भेटलैन। जेकर प्रमाण आइयो जिला कार्यालयमे जे उपलब्ध नक्शा अछि, जेकर निर्माण १९०१ इस्वीक जनगणनाक संग भेल छल। तइमे चादर नम्बर-१ पछवरिया शीटबला नक्शापर सौराठ भागीरथ आ पुवरिया शीटबला नक्शापर चादर नम्बर-२ केर सौराठ गंगा अछि। संग-संग दुनूक रकबा सात-सात साए बीघा सेहो अछि।
दुनू भाँइ केकरो सोमनाथ केर सम्बन्धमे बिना बतेने मरि गेला। एकर बहुत दिनक बाद शिव निर्मालक पूजा धीरे-धीरे बन्द जकाँ भऽ गेल। आ उक्त धरतीपर खेती-बाड़ी तँ नहि, मुदा चरौर बनि गेल। जैपर गामक चरवाहा सभ अपन-अपन माल-जालकेँ चरबैले जाइ छल। अहिना होइत होइत २०० वर्ष बीति गेल।
अही क्रममे फ़कीरचन्द नामक एक सूफी (मुसलमान कृषक, जेकर नामसँ फकोरमा नामक खेत अखनो धरि अछि) अपन टेंगारीसँ उक्त स्थानक झाड़ आ घास पातकेँ साफ़ करै छल। एकाएक फ़कीरचन्दक टेंगारी सोमनाथ नामक महादेवक लिंगपर लगलैन। टेंगारीक चोट लगिते लिंगसँ शोणित बहए लगल। स्थितिकेँ देखते फ़कीरचन्द घबराइत टेंगारी ओतै छोड़ि घर आबि गेला।
फ़कीरचन्द ओना तँ मुसलमान छला मुदा हिन्दू धर्मसँ सेहो हुनका सिनेह कम नहि छेलैन। भोजन कए ओ दिनमे कनीकाल लेल आँखि मुनला तखन हुनका सोमनाथ महादेव स्वप्न देलखिन आ कहलखिन-
“अहाँक टेंगारीसँ जइ पत्थरकेँ चोट लागल ओ साधारण पत्थर नहि अपितु शिव लिंग अछि। हम छी सोमनाथ महादेव। गज़नीक आक्रमणक समय ऐ गामक दू गोट ब्राह्मण गंगदेव आ भागीरथदेव हमर आज्ञापर सौराष्ट्रसँ हमरा निर्मालक रूपमे अनलैन। हुनकर मृत्युक पछाइत आब कियो हमर पूजा नहि करैए। ओना, अइले गामक लोकक कुनो दोख नहि। अहाँ दूटा काज करू। पहिल तँ ई जे गामक लोक सभकेँ लऽ कऽ अहाँ ओइ स्थलपर जाउ आ लोक सभकेँ कहियौ जे पीसल भाँग, बेलपत्र, गाइक घी, चन्दन, दही आदिक लेपसँ हमर लिंगकेँ पवित्र करैत। पूजा प्रारम्भ करैथ। अहाँकेँ हम असीरवाद दइ छी जे खूब फली-फूली। मुदा अहाँ ऐ गामसँ थोड़ेक दूर अर्थात १४०० बीघा केर सीमानसँ बाहर बास करू। तुर्क लूटेरा गज़नी हमरा बहुत परेशान केलक आ तंग तंग कऽ देने छल।”
एतेक बात कहि सोमनाथ अन्तर्धान भऽ गेला। फ़कीरचन्द अकचका कऽ उठल आ मुँह-हाथ धोइ कऽ गामक लोककेँ बजा सभ बात कहलक। आब गामक समस्त लोक- बच्चा, स्त्रीगण, बुढ़, युवा सभ चरौर दिस गेल। देखलक जे लिंगसँ शोणित बहि रहल अछि..! लगले पीसल भाँग, बेलपत्र, चन्दन, गंगाजल, गाए घी, दही, मधु, आदिसँ मालिश कए शिवलिंग के पवित्र कएल गेलैन तखन आब लिंगसँ रक्तस्त्राव बन्द भेल।
पूरा गाम ऐ चमत्कारसँ नाचए लगल। ढोल, पिपही, शंख, डमरू, झालि बाजए लगल, भजन कीर्तन शुरू भेल। ‘हर-हर बम-बम’ केर उद्घोषसँ वातावरण प्रफुल्लित भेल। लोक फ़कीरचन्दक प्रति अपन कृतज्ञता अर्पित करए लगल। फ़कीरचन्दक आँखिसँ खुशीक नोर झहरए लगलैन। मनमे उठलैन- अनेरे किए लोक धर्मक नाओंपर कटै-मरैए? की महमूद गज़नी सोमनाथ मन्दिरकेँ ध्वस्त केलाक बाद अमर भऽ गेल? अल्लाहकेँ आँखिमे तँ ओ गुनहगारे ने भेल..?
फ़कीरचन्दक सभसँ बेसी ई रहै जे हमरे कारण सौराठक सोमनाथ प्रगट भेला। आब जहिया धरि ई शिवलिंग रहत तहिया धरि फ़कीरचन्द अमर रहब। ई ने भेल गांगी-जमुनी तहजीब।
पुन: फ़कीरचन्दकेँ सपनाक दोसर बात मन पड़लैन। मन पड़िते गुनधुनमे पड़ि गेला- बाबा सोमनाथ तँ हमरा ऐ गामक चौहद्दी छोड़ि देमाक लेल कहने छला!आब की करी, केना करी? फ़कीरचन्द असमंजसमे पड़ि गेला- जे गाम हमर जीवन छी ओकरा केना छोड़ब? मुदा नहियोँ छोड़ब उचित नहि। तखन हमरामे आ महमूद गज़नीमे अन्तरे कुन? अगर एक मुसलमान सोमनाथ बाबाकेँ ध्वस्त आ तवाह करबा लेल जानल जाइत अछि तँ एक मुसलमान सौराठक सोमनाथकेँ पुनर्स्थापित करबाक लेल जानल जाएत। आ ओ मुसलमान आर कियो नहि फ़कीरचन्द हएत..।
..सोचैत-विचारैत फ़कीरचन्द दृढ़ मुद्रामे अपन घर जा कनियाँ आ बेटा सभकेँ बैसा कऽ सभ बात कहलखिन। संगे ईहो देलखिन जे ‘देख, ई निर्णय हमर अन्तिम अछि। हम पाँच वक्त सभ दिन नमाज पढ़ै छी। सुच्चा मुसलमान छी, तँए हम तँ ऐ गामसँ बाहर जेबे करब।’
..किछु काल ना-नुकर केलाक बाद फ़कीरचन्दक घरवाली, बेटा सभ मानि गेली। तखन फ़कीरचन्द गामक लोककेँ बजेलक आ बाजल-
“देखू, बाबा सोमनाथ हमरा ईहो कहलैन जे हम ऐ गामक अर्थात सौराठक चौहद्दीसँ बाहर अपन घर बनाबी। तँए हम ई गाम छोड़ि १०-१५ दिनक भीतर केतौ दोसर ठाम चलि जाएब।”
समस्त सौराठक लोक फ़कीरचन्दक ऐ तियागसँ मन्त्र-मुग्ध भऽ गेल। गामक लोक अपन कृतज्ञता देखबैत फ़कीरचन्दकेँ जमीनक बदला दोसर गाममे दुन्ना जमीन कीनि देलकै आ ऐठामक घरसँ पैघ आ बेवस्थित घरो बना देलकै। फ़कीरचन्द सेहो गामक लोकक उपकार के जीवन पर्यन्त यादि रखलक आ जाबेत धरि जील ताबेत धरि सौराठ सप्ताहमे एक दिन अबस्स अबैत रहल।
फ़कीरचन्दकेँ गाम छोड़ला बाद कुनो मुसलमान ऐ गाममे बसबाक हेतु नहि आएल। गामक लोकके ई कथन छैन जे अखनो धरि ओइ मोजेमे मुसलमान सम्प्रदायक बासकेँ शुभ नइ मानल जाइत अछि। इमहर आबि कऽ एक-दू गोटे उत्साही मुसलमान युवक सभ सड़कक पच्छिम–पोखरौनी टोलपर बसबाक प्रयास केलैन मुदा हुनका सभकेँ एतेक प्राकृतिक उपद्रव भेलैन जे अन्ततः बाध्य भऽ सौराठ मौजासँ हटए पड़लैन।
आब बात फेर सोमनाथ महादेवक करी। बहुत दिन धरि ओइ रूपमे बाबाक पूजा होइत रहल। बहुत दिनक बाद ऐठाम एक हकरू गोसाईं नामक सिद्ध महात्मा[2] भेला। ओ अहीठाम कुटिया बना रहए लगला आ सोमनाथ मन्दिरक समस्त परिसरक विकास कार्य जुटि गेला।
सोमनाथ महादेव केर लिंग गर्भ गृहमे बहुत नीचाँ छैन। केतेको बेर गौआँ सबहक बीच विचार भेलैन जे हुनका ऊपर अनैक प्रयास कएल जाए। मुदा तइमे एक बिडम्बना सदिकाल देखल गेल। कोरैत-कोरैत लोक जौं-जौं नीचाँ जाथि तौं-तौं शिव लिंग विशाल होइत गेल। जड़िक अन्ते नहि! सभ गोटे हारि कऽ अन्तिम निर्णय ई लेलैन जे आब कोरनाइ बन्द कऽ दी। सएह भेल, लोक नतमस्तक भऽ भाव-भिभोर होइत ह्रदयसँ शिवक महिमाकेँ स्वीकारलैन। शिव के प्रणाम केलैन।
शिव लिंगक सटल उत्तर दिशामे एक जलधरी अछि। ई जलधरी शिव लिंगक संगहि अंकुरित अछि। ऐ जलधरीक स्रोतकेँ समुद्र तलसँ जुड़ल बताएल जाइत अछि। कहियो काल ऐ जलधरीसँ आपरूपी जल निकैल बाबाक मन्दिरमे प्रवेश करैत शिव लिंगकेँ पूर्णतया जलमग्न कऽ लैत अछि। जल बहुत स्वच्छ आ हरियर कचोर होइत अछि। कियो-कियो ऐ जलक तुलना गंगाजलसँ करै छैथ। ऐ जलक स्वतः प्रस्फुटन होइक कुनो निश्चित तिथि, अवधि अथवा मौसम नहि अछि। कखनो भऽ सकैत अछि। कोनो-कोनो बेर सौन-भादोमे तँ कोनो-कोनो बेर बैशाख-जेठमे सेहो निकलैत अछि। जलक स्वतः प्रस्फुटन केर अवधि दू-सँ-सात दिनक रहैत अछि। ओकर बाद ई स्वतः सुखा जाइत अछि आ जल प्रवाह बन्द भऽ जाइ छै। बेसी काल शिव लिंगमे साँपकेँ लटपटाएल सेहो देखल जाइए।
सौराठ गाममे अनेकानेक विभूति भेला। जइमे महामहोपाध्याय पण्डित राजनाथ मिश्र उर्फ़ रजे मिश्र छह विषयक अद्भुत ज्ञाता। हुनक लिखल कएकटा पोथी अखनो उपलब्ध अछि। ऐ गाममे हुनक लिखल तांत्रिक पद्धतिसँ निर्मित दुर्गा पोथीसँ अखनो धरि दुर्गा पूजा होइत अछि। महामहोपाध्याय डॉ. गंगानाथ झा हिनक शिष्य छलाह । रजे मिश्र काशी वास केलाह आ ओतहि भगबान भोलानाथ के नगरी में गंगा कात में अपन अहि नश्वर काया के त्याग केलनि । ऐ भूमिपर एक विभूति भेला श्री गंगाधर मिश्र जिनकर योगदानक फलस्वरूप चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालय केर स्थापना भेल। ऐठाम महान क्रांतिकारी श्री भागीरथ झा भेला,जिनकासँ ब्रिटिश हुकूमत त्राहि-कृष्ण करै छल आ ‘शूट एट साईट’क आदेश सेहो देने छल। जे हिनका जीबैत अथवा मुइल पकड़ैबला अथवा जानकारी दइबलाकेँ लेल इनाम देल जाएत...।
..देशक आज़ादीक पछाइत भागीरथ झा जिवकोपार्जन हेतु महाराष्ट्र गेला आ बादमे सौराठ गामक नामक पताका फहरेला आ महाराष्ट्र विधान-सभाक सदस्य चुनल गेला। सौराठमे एक विभूति छला बाबु अबध विहारी झा। ई अंग्रेजक समयमे डिप्टी भेल छला बादमे विधान पार्षद सेहो भेला। ऐ गामक डॉ. सुरेन्द्रनाथ ठाकुर नामक प्रख्यात चिकित्सक भेला। ई जीवन पर्यन्त गाम आ परोपट्टाक लोकक मुफ्त सेवा आ चिकित्सा केलैन। ऐ गामक अन्य विभूतिमे पण्डित फेकू मिश्र, पण्डित हरीशचन्द्र झा, पण्डित कृष्णदेव झा, तांत्रिक नारायण मिश्र तथा डॉ. कलिका दत्त झा आदि प्रमुख छैथ।
सौराठसँ जखन हम आबए लगलौं तखन एक व्यक्ति हमरा भेँट करए एला। ओ गामक विद्यालयमे शिक्षक छला। सौराठ गामक इतिहास आ एकर गौरवकेँ ओ अपन एक कवितामे बहुत सुन्दर वर्णन केने छैथ। ओ कविता हम सुधी पाठक लेल दऽ रहल छी-
तपोभूमि जगजननी मिथिला ह्रदयस्थली जकर सौराठ/
श्री शारद नव निधि केर नैहर संग-संग जते सिधहु आठ//
पूर्व पवित्र धार जीबछ केर उत्तर लोहा ग्राम/
पश्चिम पोखरौनी दक्षिण धनुखिक मध्य ई धाम//
पुन्यस्थल सौराठ सभा मिथिला संस्कृति प्रतिक/
दर्शनीय सुन्दर शिव मन्दिर माधवेस्वरक थिक//
तुर्क लूटेरा महमूद गज़नी जखन उपद्रव कएल /
गुजरातक सौराष्ट्र तेजि शिव पथ सौराठक धैल//
ईस्वी एक हज़ार पचीसिक अछि ई गप्प करू विश्वास/
सोमनाथ शिव कमला केर छारनि पर आबि बनोलनि बास//
जंगल झार मशान मध्य शिव बसला गामक भेल उद्धार/
पुरना मन्दिर बोधकृष्ण सम्प्रति कयलनि अछि जीर्णोद्धार//
दतकट कथा सुनब तँ लागत मुदा जुरायेबदेखने नयन/
कार्तिक जेठक विषम ज्वालामे शिव लै छथि अपनहि जलशैन//
साधक सिद्ध समाज सुधारक न्यायी न्यायविज्ञ भरमार/
कुशल प्रशासक अभिनेता डॉक्टर प्रबुद्धजन अपरम्पार//
बानी केर बरदानी बेटा मिथिला केर संचित अध्याय/
राजनाथ मिथिला केर गौरव विश्रुत महामहोपाध्याय//
न्यायविज्ञ पण्डित गंगाधर साधक शिक्षा प्रेमीप्रज्ञ/
सूत्रधार सी. एम. कॉलेजक मिथिलावासी जिनक कृतज्ञ//
हरिश्चन्द्र ज्योतिष केर ज्ञाता कृष्णदेव व्याकरणाचार्य/
नाम कतेको गनब अन्त नहि छथि नवीन नामी प्राचार्य//
पद्मकान्त प्रियपात्र समाजक जिनका जन-जन केर आशीष/
सब तरहेँ मिथिला के गौरव सबतरि अपन बढ़ोलनि शीस//
विश्वविदित कवि विद्यापति केर बंसज आबि बनोलनि बास/
के नहि जनैछ शिव उगना भए भेलथि विद्यापति केर दास//
विद्यापति पुस्तक केर आलय केन्द्र चिकित्सा शिक्षा शोध/
संग्रहालय पत्रालय करैछ विकसित गामक बोध//
सोभा सभ्य सुशिक्षित जन-जन मुँह पर चौअनिया मुस्कान/
बाल ब्रिद्ध युवजन मृदुभाषी बुझि परत नहि छथि ई आन//
पग-पग पोखरि भव्य शिवालय रम्य बाग़ देखि होइछ हर्ष/
थिक सौराठ गाम सब तरहेँ मिथिला मैथिल केर उत्कर्ष//
आभार- हम ऐ लेखक लेल श्री शिव कुमार मिश्र, श्री समरेन्द्र नाथ ठाकुर एवं सौराठ गामक महिला आ पुरुषकेँ धन्यवाद दइ छिऐन, किएक तँ हुनके सबहक देल जानकारीसँ ऐ आलेखक रचना कएल गेल अछि। हम अपन कृतज्ञता स्वर्गीय प्रोफेसर बैद्यनाथ सरस्वती के प्रति अर्पित करैत छी कारण ओ इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय कलाकेन्द्र में unesco चेयर केर प्रोफेसर छलाह आ हम unesco स्कॉलर । unesco –UNDP और इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय कलाकेन्द्र के सम्मिलित प्रयास स भारत केर १०० गामक संस्कृतिक आ संरचना केर अध्ययन करक रहैक. डॉ. कपिला वात्स्यायन आ प्रोफेसर सरस्वती हमरा कहलनि जे अहाँ एकटा एहेन गामक अध्ययन करू जकरा सब स्कॉलर आधार मानि काज करथि आ १०० गामक काज संपन्न हो. हम तुरते सौराठ केर नाम लेलौ आ दुनु गोटे स्वीकार क लेलनि.
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[1] गुजरातक सौराष्ट्र
[2] बबाजी
२
दीर्घ कथा