विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2016-09-01 · अंक 209

फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
राम बियाहने कुन फल भेल।
सीता जन्म अकारथ गेल।
कखनो काल जखन माय तंग भ जैत छलीह त अनायास दोदिल होइएत कहैत छलीह:
“फाटू हे धरती”
एकर बाद सब बुइझ जैएत छल जे माय आब तामसे घोर छथि। फेर हुनका कियोक किछु नहि कहैत छलनि। मुदा हमर नेनमति देखू हमरा होइएत छल माय फाटू हे धरती कथी लेल कहैत छथि। एक दिन जखन माय केर मोन शांत रहनि त बाल सुलभ जिज्ञासा कैल:
“माय, अहाँ फाटू हे धरती कियैक कहैत छियैक?”
माय कहली: “की कहु बाऊ, नारीक स्थिति एखनो सीता दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अच्छिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय में राम के अगुआ देत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि:
बंदौं राम लखन वैदेही, जो तुलसी के परम सनेही।
तुलसीदास अपन रचना रामचरितमानस में १४४३ बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ, दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। लेकिन वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र १४७ पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि ३२५ – १४७ बेर सीता, ६९ बेर जानकी, ५८ बेर बड़भागी आ ५१ बेर बैदेही। अहू में एक राजनीति ऐछ. सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ. ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब वैह सीताक दुःख देखू: लंका में राम रहला १११ दिन आ सीता रहली ४३५ दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन. डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वी क जीवन।”
कहि ने की भेल! माय जेना अपन भावना के फोरि-फोरि हमरा कह्य लगली। हम छोट जरुर रही मुदा अतबो छोट ने जे माय के कहक भाव नहि बुइझ पाबी। कनिक क्षण लेल लागल जेना माय केर शरीर में सीताक आत्मा बैस गेल हो! माय कहैत रहली:
“देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप में आबथि:
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।।
आ राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम में बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि।
आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम. जखन समस्त मिथिला में अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ में एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहि माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप में आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल। सबहक मोन में उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने!”
सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि में डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स?
सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन. यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै”
राम चिंता में आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।”
सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब”
राम बजलाह : हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब।
फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि।
विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली. रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली।
“जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन. कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक?
अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ में खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?”
खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत,के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।”
जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल।
मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह. राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।”
सीता: “से कोना?”
राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।”
सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?”
राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी।”
सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक?”
ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ी करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय!
धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती में बिलुप्त भ गेलीह।”
ई बात कहि माए कनि जोर स सास लेलीह आ कहलनि “ बाऊ ताहि जखन हमरा सबके कोनो कष्ट होइएत अछि त अपना के सीता बुझैत छी आ अनायास मुह स निकलि जैत अछि : “फाटू हे धरती”।
ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि। अपमानित होइएत छथि। बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....”
ई बात कहैत माय केर नयन नोर स भरि गेलनि. ओहि क्षण त नेना रही आब बुझै छी जे माय के नोर कोना खसलनि!!!

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 209, 2016-09-01. https://www.videha.co.in/research/2016/209/फाटू-हे-धरती-सीता-दाई-केर-वेदना.htm

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