विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2016-09-15 · अंक 210

मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास

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मैथिली लोकगीतक संसार स्त्रीगणक संसार थिक। पुरुष पक्षक भूमिका गीत निर्माणक आओर किछु गीतक गायन तक सिमित अछि। मैथिलानी एक बेर अर्जित कयल गेल अमूर्त धरोहर जेनाँकि गीत-नाद, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, व्रत-निष्ठा, कथा-पीहानी; अरिपन काढ़ब,ठांव निपब, कोबर लिखब; केथरी, सुजनी सीयब; सीकीसँ पौती-मौनी बुनब, माटिक महादेब, सामा-चकेबा, खेलोना, कोठी, चूल्हा आदि बनेबाक परंपरा कें अपन माय, पितियाईन, दाई, नानी, सासु आदिसँ सिखैत छथि आओर फेर अपन सभटा लुइरकें अपन बेटी, पूतहु, पोती, नातिन आदिकें अदौसँ एहि कलाकें पीढ़ी दर पीढ़ी नीक जेकाँ सिखेबाक परंपराकें हस्तारंतरित करैत निमाहि रहल छथि। हलांकि आधुनिकता आ उपभोक्तावादक युगमे एहि परंपराक पतन भेल जा रहल अछि परञ्च मूल भावमे थोर बहुत जोड़-तोड़क संग ई परंपरा अपन मिथिला समाजक महिला वर्गमे एखनो शाश्वत अछि।
आश्चर्य आ दुःख तखन होइत अछि जखन एहि समाजक स्त्रीगनक चर्चा होइत छैक। आजुक परिवेशमे बहुत स्त्रीगन पुछला पर निधोख कहैत छथि जे “हम किछु नहि करैत छी, निठल्ली छी कियैकतँ हाउसवाइफ/गृहणी छी”। पुरुष पात्र बहुतो एहेन छथि पुछला पर कहता – हमर घरनी किछु नहि करैत छथि घरमे रहैत छथि, हलांकि ओकर बाद कहबाक तात्पर्यकें पूर्ण करैत जरुर करताह – “हमर आँगनसँ सहीमे मात्र गृहणी/हाउसवाइफ छथि"। औजी, कहियो अपन आँगनबालीक भूमिकामे जीवन जीब कS तS देखियौ तखन पता लागत जे आहाँक घरवाली कतेक पैघ जवाबदेहीकें निमाहि रहल छथि ! हुनका नहितँ कहियो छुट्टी, ने कहियो आराम, आने कहियो केओ मदति केनिहार,आओर ताहि जवाबदेहिक मतलब किछु नहि ? ई एकटा बड्ड पैघ प्रश्न अछि। एहि पर विचार जरुर करक चाही।
भोजन आ भोजनक विन्यास सभसँ पैघ, त्वरित आ शाश्वत कला अछि। एकटा कहबी छैक – “जे निक खैएत सैह नीक भोजन बनाएत”। इहो कहल जैत छैक जे जखन कुनो महिला सुचिता आ समर्पणकें भावसँ भाँनस करैत छथि तS भोजन सुअदगर आ रुचिगर हेबेटा करत। यैह कारण छैक जे भगबान राम माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई; सासु सुनयना; गुरुपत्नी अरुंधती, पत्नी सीता सबहक हाथक रान्हल भोजन केलाह, मुदा जे स्वाद हुनका भीलनी सबरी के आंइठ बैरमे लगलनि तेहेन सुआद कत्तहुने लगलनि। ई भेल भोजन बनोनिहारिक आ परोसनिहारिक अनुराग। आजुक समयमे नाना तरहक सुविधा जेनाँकि रसोई गैस आकि आनो तरहक जारैन उपलब्ध अछि जाहिसँ चट्टहि भाँनस भअ जाइत अछि। कल्पना ओहि समयक करू जखन साओन-भादबक मुसलाधार बरखामे खड़हक छप्पर चुबैत घरमे अपन सभक बहुतो गोटेके माय, पितियाईन, दाई कोन धरानी भाँनस करैत छली! जारैनमे भीजल चेरा, गोइठा, करची, झाँखी चुल्हामे घोंसिया कखनो मूंहसँ तS कखनो बियनि होंकि आंच पजारब, धुआंसँ आँखिमे नोर भरल आ तैयो रंग-बिरंगक पकमान आ भोजनक सचार। ताहूमे अगर घरमे केओ पैघ पाहून जेनांकि जमाय, समधि इत्यादि आबि गेलाह तS घोर बिकट, तथापि बिना मोन मलीन केने हुलसित मोनसँ भोजनक विन्यासमे लागि जैत छली। तरकारीक अभावमे बारीक़ साग, कंद, खम्हारु, ओल, लती-फत्तीक पात जेना कन्ना, तिलकोड़क पात; लटकल चारक सजमनि,कदीमा; झाड़क झीमनी, करैल; घर-पछुआरमे लागल गाछक फल जेनाँकि- केरा, कटहर आदिसँ चीज़ जोरिया कS अनेक तरहक तरकारी, तरुआ-बघरुआ, भुजिया-सन्ना-चटनी बनबैत छली तकरा बादो टारासँ नाना तरहक़ अंचार जाहिमे फारा, कुच्चा, खटमिट्ठीबला आदि ब्यंजन परोसि पाहूनक सत्कारमे २०-२५ तरहक सचार लागि जैत छलै। आब जखन पाहून भोजन पर बैसता आ महिला लोकनि गीत नहि गेती से कोना हेतैक तें बिनु थकने विहुँसैत मोनसँ दाई-माई सभकें संगौर कS गीत-नाद शुरू होइत छल। पाहून खाईतो रहैत छलाह आ गीतक आनंद लैत छलाह। जखन कखनो हम कोनो पांच सितारा होटल में भोजन करैत छी आ कोनो गीतगैन के गबैत देखैत छी तS होइत अछि जे एहिसँ बढ़ियाँ कोरसमे गीत हमरा सभक समाजक महिला गबैत छथि। वैह खानसामा, वैह परोसय बाली, वैह गीत गेनिहारि, वैह वस्तुक व्यवस्था केनिहारि। मल्टीटास्किंग कें अहिसँ पैघ उदाहरण भला आर की भS सकैत अछि?
पहिनेकें समयमे लोक सभ बियाहसँ पहिने एहि बातक खाँझ-भाँझ करैत छलाह जे जाहि घरमे कन्यादान करबाक अछि ओहि घरक चीनबार कहेन छैक। मतलब कतेक साफ़-सफाई, कोन तरहक द्रव्य केर बरतन-बासन बड़ पक्षक ओहिठाम उपयोग होइत छैक। हिनका लोकनिक खान-पान कहेन छन्हि, घर-परिवारक भोजनक विन्यास, दु:खक भोजन, सुखक भोजन, पाबनि-तिहारक भोजन, यात्रा पर जएबाक काल बाटमे खेबाक जोग भोजन, खाद्य भोजन, अखाद्य भोजन, पथ्य बला भोजन, कोन समयमे की खाई आओर की नञ खाई, इत्यादि नाना तरहक जानकारीकें अगर ठीकसँ ओहि भावकें विवेचना कयल जाय आओर विभिन्न अवसर पर मैथिलानी सभक द्वारा गाओल गीत सभकें देखलासँ एहसास होयत जे ओ गीत सब विधपुरौआ आकि मनोरंजने वला गीत मात्र नहि अछि अपितु ज्ञानक खान अछि। ओहि गीतमे ज्ञान,विज्ञान, संस्कार, सामग्रीक वर्णन आ विवरण सब किछु समाविष्ट अछि।
मैथिलीमे अगर अंग्रेजीक शब्द culture कें अनुवाद कयल जाय तँ हमरा बुझने ओ शब्द जे culture कें सभसँ लगमे अछि मैथिलीमे ओकरा “मिथिलाम” कहल जायत आओर इयैह मिथिलाम अछि जे मैथिल सभकें भारते टा नहि अपितु समस्त संसारमे अलग पहचान दैत अछि। मिथिलामक चर्चा बिनु भोजन विन्यास, बिनु महिला सभक भूमिका, बिनु गीत-नाद आकि विध-व्यवहारक संभव नहि अछि। वस्तुतः भोजन विन्यास, गीत-नाद, विध-व्यबहार, जीवन जीबाक अंदाज़, वस्त्र विन्यास, धर्मक आचरण, प्रकृति आ संस्कृति मे समन्वयक नाम भेल मिथिलाम।
बात भोजन विन्यासक चलि रहल अछि तें कनेक मिथिलाक इतिहास कें सेहो ध्यान देमय पड़त।
ज्योतिरीश्वर अपन कृति वर्णरत्नाकर मे ११म् शताब्दीक मिथिलाक भोजन विन्यास पर प्रकाश देलनि अछि। हिनका अनुसारे मिथिलाक प्रमुख भोजन भात, दालि, तरकारी, चूडा, दही, शक्कर, फल तथा दूध छल। ज्योतिरीश्वर अपन दोसर पोथी प्राकृति-पैँगलम् मे कहैत छथि जे “ओ गृहणी धन्य छथि जे अपन पति केँ केराक पात पर भात आ घी परोसि खोअबैत छथि”। एहि पोथी मे रंग-बिरंगक माँछ रान्हव आ तरकारी बनेवाक विधि सेहो लिखल अछि। वर्णरत्नाकर मे जे मिथिलाक प्राचीन परम्परागत भोजन समिग्रिक सूची प्रस्तुत कयल गेल अछि ताहिमे “चाउर, चूडा, मुंगवा, लडुबी, सरुआरि, माँठ, फ़ेना, मधुकूप्पी, तिलबा, सिरोल, खिरसा, सिरनी, झिल्ली, फरही, भूजा, मोतीचूड़, अमृतकुंड आदिक उल्लेख अछि संगहि भोजनमे दहीक प्रधानता सेहो भेंटल अछि।
आब लोकगीत पर अबैत छी, लोकगीतमे फकरा, पीहानी, गीत, लोकवृति आदि सब किछु समाहित अछि। एहिठाम दू गोट फकरा मैथिल समुदायक भोजन विन्यास आ भोजनक प्रति आसक्तिकें बुझबाक हेतु पर्याप्त अछि ।
पहिल : मिथिलाक भोजन तीन/ कदली, कबकब मीन।।
दोसर: तीन तीरहुतीया तेरह पाक। ककरो लेल चुडा दही ककरो लेल भात।।
अही दू गोट गीतक आधार बना सब विवरणकें देखल जा सकैत अछि।
मिथिलाक भोजन तीन। कदली, कबकब मीन।।
एकर अर्थ भेल जे मिथिलाकें लोक सभ लगभग नीकसँ लकS अधलाह तकमे जेनाँकि- उत्सव, काज-राज, संस्कार, पाबनि-तिहार धरिमे केरा, ओल बा ओले परिवारक आन कंद जेनाँकि खम्हरुआ; आओर अंततः नाना प्रकारक माछके प्रयोग भोजनमे अवश्य करैत छथि। विवाह -दान, मुड़न, उपनयन, पाबनि तिहार सबमे केराक प्रयोग हेबेटा करैत अछि। ओहुना लोकसब केराकें पाकल, काँच आ केराक फुलक सेहो खेबाक विन्यासमे प्रयोग करैत छथि। केराक तरुआ, तरकारी, सत्यनारायण भगवानक कथामे घोरुआ प्रसाद आ ओहुना पाकल केराक प्रयोग शाश्वत अछि।
कबकबकें बात करैत ई कहब जरुरी अछि जे ओल मिथिलामे बहुत प्रिय अछि। एक फकरामे भादबक ओल केर बारेमे कहल जैत छैक:
भादवक ओल की खै राजा आकि चोर
मिथिला आ माछ एक दोसरक पूरक अछि। पंचदेवताक एकहि संगे उपासना करे बला मैथिल समाज जाहिमे ब्राह्मण सेहो सम्मिलित छथि कुनो दिन आ कुनो मास माछ खेबासँ परहेज नहि करैत छथि। माछकें जल-पड़ोर, जल-फूल आदि नामसँ बजा कतेक गोटे तँ एकरा मांसाहारी भोजनक श्रेणी तकमे नञ राखय चाहैत छथि। कातिक आ साओन मासमे जखन लोक सामान्यतया मांसाहारी भोजनकें त्यागि दैत छथि, अपन मैथिल अहू मासमे खूब चटकारसँ माँछ खाईत छथि, संगहि एहि मासमे माँछ खाय बलाक हेतु बैकुंठमे जगह बना दैत छथि।
कातिक मास जे गैंचा खाय। ससरि-फ़सरि बैकुंठे जाय।।
एक बारहमासा गीत एहेन भेटल जाहिमे मिथलाक पानिमे उपलब्ध लगभग सब माछक वर्णन तँ अहिए ओकरा कोना बनाबी कोना खाई, कथीक संगे खाई सब वर्णित अछि। एतबे नहि लगभग ७५% माँछ जे मिथिलाक पानिमे भेटैत अछि तकर वर्णन छैक। कने एहि बरह्मासाकें देखू:
मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ा संग यो।
तरल चेचड़ा माछ कुरमुर लागय मोन भरि संग यो।।
पूस हे सखि अन्न नवका संग मांगुर झोर यो।
कबइ कुरमुर दाँत दबइत करय जनजन शोर यो।।
माघ बदरी जाड़ थरथर काँपय तन बड़ जोर यो।
सुख बोआरी खंड लखि कए मन विनोद विभोर यो।।
मास फागुन मदक मातल बहय पछबा बसात यो।
बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यो।।
चैत हे सखि रोग सभदिस रूप नाना देखि यो।
तरल भुन्ना पलइ रान्हल खाइत बड़ सुख लेखि यो।।
मास हे सखि आबि पहुँचल गरम बड़ बइसाख यो।
गेल मन रुचि माछ गामर खंड सभ दिन चाख यो।।
जेठ हे सखि हे हेठ बरखा मुंड भाकुर पात यो।
पड़तु बिसरतु आबि ससरतु कर नवका भात यो।।
मेघ सखि बरसत अखाढ़ जत रसालक डारि यो।
तोड़ि काँचे आम आमिल देल सौरा पाल यो।।
मास हे सखि आओल साओन भरल अंडा घेंट यो।
तरल दही माछ मारा खाथि भरि पेट यो।।
माछ इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यो।
मास आसिन देवपूजा शंख घंटा नाद यो।।
रान्हि रहुआ माछ बइसब पूर्ण भेल परसाद यो।
मास कातिक बारि मरूआ बऽड़ तरल-अपूर्व यो।।
पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यो...
माँछ खेबाक वर्णन तँ अहिए माछक शिरा खेबाक परंपरा प्रबल सेहो अछि, घरक मुखिया, पाहून, बरियाती आदिकें शिरा परोसल गेल आ बुझू हुनकर उचित सत्कार भेल। निम्नलिखित फकरा एहि कथ्य के प्रमाणित करैत अछि:
शिरा खाय से मीरा। पूच्छी खाय गुलाम।।
जमाय जखन भोजन करक हेतु बैसति छथि तँ नाना तरहक गीत गाबि हुनका मनोरंजन कयल जाइत अछि। एकटा डहकन जाहिमे देखियौ, ओना तँ गारि देबाक परंपरा अछि मुदा गारिक संग-संग भोजन विन्यासक वर्णन सेहो अछि।
खाजा मूंगबा आर पिरिकिया
ता पर गरम सोहारी जी।
माजी के गारी पिताजी के गारी
आ बाबाजी के पढथि गारी जी।
पढु हे सारि हमरो के गारी
हम लेब देह के पसारी जी।।
एहि गीतमे गारि तँ छैहे जे डहकनक मूल प्रकृति अछि, मुदा गारिकें संगे-संगे भोजन सामग्री – खाजा, मूंगबा, पुरुकिया, सोहारी आदिक विवरण सेहो छैक।
सामा-चकेबाक एक गीतमे बहिन सब भोजनक बात करैत छथि:
साम-चको साम-चको अबिह हे अबिह हे।
जोतला खेतमे बैसिह हे बैसिह हे।
लाले रंग पूरी पकबिह हे पकबिह हे।।
मिथिलामे साग खेबाक परंपरा सेहो अदौसँ अछि। अयाची मिश्रक जीवनवृत्त ककरा नहि बुझल छैक। मात्र ११ कट्ठा खेतमे साग-पात कंद-मूल खाकS जीवन यापन करैत छलाह आ अध्ययन-अध्यापन करैत छलाह। कतेक बेर राजा बजौलखिन मुदा अपन गामक गुरुकुलकें छोडि कत्तहु नहि गेला। स्वयात संप्रभुताकें सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत छलाह। माँछक तुलनामे सागक अधिक प्रधानता देबाक प्रथा मिथिलामे सहज अछि। एकटा फकरा एहि बातकें प्रमाणित करैत अछि:
माछ-भात पांच हाथ। साग-भात सात हाथ।।
विन्यासमे सागक अलावे सागकें आन चीज़ सब जेना अरिकोच, गुजिया, इत्यादि बनबैत छथि, खेसारी, बथुआ, केराव, चना, कर्मी,गेनहारी, पटुआ आदिक साग मिथिला लोक खाईत छथि। अपना ओतय साग तोडल नहि अपितु खोटल जैत अछि। कोनो भोजमे साग एक महत्वपूर्ण तरकारी होइत अछि। मिथिलाक एहि परंपरासँ प्रभावित होइत ठीके कहल गेल अछि:
कोकटा धोती पटुआ साग। तीरहुत गीत बड़े अनुराग।
भाव भरल तन तरुणी रूप। तैं तँ तिरहुत होइछ अनूप।।
अपन माटि सँ गुजरियाकें एतेक सिनेह जे साग-पात खोंटि लेती, साग-भात खा लेती मुदा रहती मिथिलेमे :
साग-पात खोंटि- खोंटि दिवसों गेमेबै यौ हम मिथिलेमे रहबै
नहि चाही हमरा सुख-आराम यौ हम मिथिलेमे रहबै।।
तिलकोर आ कन्ना साग बिना की मिथिलाक पाहुनक सचार लागि सकैत अछि? चाउरक पीठारमे डुबा शुद्ध सरिसबक तेलमे छानल तिलकोर दुरो देसमे रहनिहार मैथिल सबके जीभमे पानि आनि दैत अछि।
सजमनि, भाटा इत्यादिमे अदौरी तँ चाहबे करी तखनने भाटा-अदौरिक चहट्गर तरकारी बनत! भाँटाकें तरुआ, भटबर आर की-की नहि बनैत अछि। बारिक भाँटातँ बेर बिपत्तिक समय इज्जत रखैत अछि।
भांटाकें भटबर, ठोपेके तेल। खेलक जमैया ठेलम ठेल।।
मिथिलाक लोककें खिच्चरिमे सेहो पापर, घी, दही, अचार, चटनी इत्यादि संग खाईत छथि। खिच्चरिमे चारि बस्तु नहितँ केहन खिच्चरि?
खिच्चरि के चार यार। घी पापर दही अचार।।
ई त भेल पद परन्तु सही अर्थ में खिच्चरि के छौ यार थिक: घी, पापर, दही, अचार, चटनी, तरुआ।
एक उचती गीतमे जखन विवाहक बाद वर भोजन करवा लेल बैसैत छथि तS सासु आ आन स्त्रीगन सब अपन गीतमे व्यंजन केर वर्णन करैत छथि:
जाहि दिन राम जनकपुर अयला देखहु दुनिया के लोके
भाति-भाति के भोज्य लगाओल नयना बिनु परकारे जी
केरा नारियल खण्ड सोहारी परबल केर तरकारी जी
जीमय बैसला ओ चारू भाई परसथु प्रेम पीयारी जी //
दोसर उचती में बर के कृष्ण स्वरुप मानि किछु अहि तरहक विवरण भेटैत अछि:
खाजा खुरमा तपत जिलेबी तापर सक्त सुपाड़ी जी।
जेमय बैसला कृष्ण-कन्हाई सारि जे पढ़थिन गारि जी।।
भगबान कृष्णक बालकालकें एक भक्ति गीतमे भोजनक किछु वर्णन भेटैत अछि:
करथि पुकार जशोदा माई मोहन प्रात नाहाई।
दही केरा गरम जिलेबी खोआ भोग लगाई।।
लोकगीतमे भूख, निर्धनता, कुअन्न आदिक ऐतिहासिक संदर्भक वर्णन
लोकगीत लोकविद्या होइत अछि, लोकइतिहास होइत अछि। एहेन इतिहास जे अपन प्रमाणिकता एवं शैली कें कारण जन-जन केर कंठमे लिखा जैत अछि। एहेन लिखान जकरा ने कुनो पानि गला सकैत अछि ने कुनो आगि जरा सकैत अछि आने कुनो कीड़ा खा सकैत अछि। एकबेर जनकंठमे रचि गेल त पीढ़ी-दर-पीढ़ी अबाध गति सँ चलैत रहैत अछि। मधुबनी ज़िलाक शाहपुर गाममे एक जनमान्ध लोक कवि भेला। हुनकर नाम छलनि फतुरी लाल। फतुरी लाल एक बेर मिथिलाक भयानक अकालक सामना केलनि आ अकालक विभीषिकाक ह्रदयविदारक विवरण अपन कवित्तमे केलनि। ओ रचना अकालकवित्त कें नाम सS जानल जैत अछि। अब्राहम ग्रिएर्सन १८८७ ईस्वीमे फतुरी लाल केर अकाल कवित्त हुनके मुहें सुनिकS लिखलनि। एहि कवित्तमे ई विवरण अछि जे भुखमरी केर अवस्थामे लोक प्राणरक्षा हेतु की-की नहि करैत अछि। किछु पंक्ति मात्र देखलासँ दुखक असीम वेदनाक अनुभूति सहजे भS जैत छैक:
भेल धनतरि दुई फ़ासिल जग-राहडिऔर मकई।
अकाल पडल तिरहुति में भारी-तैं बही गेल हवा।
घर-घर मांगन करे नर नारी-फाँकि मकई केर लावा।
मालीक आउर महाजन सभ-कै-घर-घर ढेरीक अन्न।
लोक बुझओल ओहो तकै छथि मुंह्गा ऋणक शान।
सभै देखि बनियान सभ सनकल-डरें लगाओलक टट्टी।
सुन्न दोकान शहरमे परि गेल-सुन्न भेल सभ चट्टी।
सूखल गात भात भौ लटपट-कतेक बात अब सहना।
नर नारी सभ सान तेआगल-बेकारी भेल अब गहना।।
बारहमासा एवं अन्य गीतमे गरीबीकें चित्रण करैत कोना कियोक महिला कम भोजन अथवा कुअन्न खा कS दिन खेपैत छथि तकर मर्मस्पर्शी वर्णन कैल गेल अछि। आईसँ करीब ३०-३५ सालक इतिहासमे अगर जा सकी आ अपन मानस पटल पर ओहि स्थिति आ गरीबीकें ऐनाँके रिफ्लेकशन जेकाँ देख पाबी तS सहज रूपमे ई अनुमान लगा सकैत छी। एकटा बारहमासा एहेन भेटल जाहिमे एकटा निर्धन महिला जिनकर पति परदेस गेल छथिन ओ कोन धरानी अपन समय नितांत निर्धनतामे बिता रहल छथि तकर विवरण देल गेल अछि।
पूस गोइठा डाहि तापब
माघ खेसारिक साग यो
फागुन हुनका छिमरि माकरि
चैत खेसारीक दालि यो
बैशाख टिकुला सोहि राखब
जेठ खेरहिक भात यो
अखाढ़ गाड़ा गाड़ि खायब
साओन कटहर कोब यो
भादव हुनको आंठी पखुआ
आसिन मडुआक रोटी यो
कातिक दुख-सुख संगहि खेपब
अगहन दुनू सांझ भात यो
उपरोक्त गीतमे कोना एक महिला खेसारीक साग, खेसारीक दालि आमक टिकुला, खेरहिक उसिना, पाकल आमक गाड़ा, कटहरक कोआ,नेढा, आमक पखुआ, मडुआ रोटी, एक मास अनिश्चितता केर स्थिति आ अंततः अगहनमे भात। कहू तS कतेक सत्यकें जे आई लगभग इतिहास भS चुकल अछि तकरा ई अपना मानसमे रखने अछि मिथिलाक गीत-नाद।
गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। ओहने विधवाक दुःखसँ द्रवित होइत बाबा “यात्री” लिखैत छथि:
बांसक ओधि उपारि करै छी जारनि...
हमर दिन की नै घुरतै जगतारिनि //
मैथिली लोकगीतमे भोजन विन्यास आ औषधि
लोकगीत लोकविद्याकें अंग अछि। लोक विद्याकें अनेक पक्ष वैज्ञानिक होइत अछि। कृषिकार्य एवं अन्य सब कार्यमे डाक बचन कतेक सटीक अछि से हमरा लोकनि बहुत निक जेकाँ बुझैत छी। बहुतो लोकगीत एहेन अछि जे कहेन अन्न अथवा भोज्य सामग्री सेहो कुन दिन, कुन मासमे खेलासँ की भS सकैत अछि तकर बहुत तथ्यपरक जानकारी दैत अछि गीत सुनब अथवा पढ़ब तँ लागत जेना आयुर्वेदक कोनो वैद्यक देल नुस्खा हो। हरेक गाछ आ हरेक भोज्य सामग्रीमे प्राचीन भारतीय परंपराकें अनुसार किछु-ने-किछु औषधिक तत्व छैक। भारतीय परम्परामे औषधि आ भोजन अलग-अलग चीज़ नहि छैक। ताहि अपना सबहक भोजनमे पथ्य आ कुपथ्यकें बात प्रबल मानल जाइत अछि।
अपन शोधकार्यकें अवधिमे जखन मिथिलाकें गाम सभसँ गीतक संकलन करैत रही तS एकटा गीत एहेन भेटल जाहिमे ओ ई बतबैत छल जे कोन दिन कथिक प्रयोग भोजनमे करक चाही जाहिसँ तन आ मन दुनु स्वस्थ्य रहत। ई वर्णन ज्योतिष विचार पर सेहो आधारित अछि।
रबि के पान सोम के दर्पण
मंगल के किछु धनियाँ चर्पण
बुध के गुड़ बृहस्पति राई
शुक्र कहे मोहे दही सुहाई
शनिबार जे अदरख खाई
कालौं काल कटति घर जाईं।।
ई त भेल कहिया की खेबाक चाही। एक एहेन गीत भेटल जे बारहमासाक रूपमे रचित भेल अछि। ई एकटा वैद्य जेकाँ बहुत वैज्ञानिकताकें आधार पर लिखल अछि। गीत अर्थकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि:
सावनक साग ने भादबक दही।
आसिनक ओस ने ने क़ातिकक मही।
अगहनक जीर ने पूसक धनी।
माघक मिसरी ने फ़ागुनक चना।
चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल।
ज़ेठक चलब ने अषाढ़क बेल।
कहे धनवनतरि अहि स बचे।
वैद्यराज काहे पुरिया रचे।।
मैथिली लोकगीत अनंत महासागर अछि। अहि महासागरमे सँ भोजनक सम्बन्धमे जे किछु जानकारी छल से समयसीमा कें ध्यानमे राखि पाठकक समक्ष राखल। नीक लागल तS मैथिली लोकगीत परम्परा केर महानता अधलाह लागल तखन हमर ज्ञानक विपन्नता।
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Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 210, 2016-09-15. https://www.videha.co.in/research/2016/210/मैथिली-लोकगीतमे-भोजनक-विन्यास.htm

मूल विदेह अंक / Original issue