२.४.उमेश मण्डल आ पुनम मण्डल- समाद- सगर राति दीप जरय
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
मैथिली लोकगीतमे कौआ सम्बाहक
मैथिली लोकगीतक संसार अपूर्व संसार आ गीतक महासागर अछि। एहि महासागर केर हरेक गीत बेसकिमती सीपी जकां अछि जकर मूंह स्वातिक बूंद पेबा लेल खुजल छैक जाहि स ओ मोती बनि सकै। फेर ओ मोती समुद्रक कछेर में बालु आ अन्य वस्तुक ढेर में ओंघराएल अछि कुनो जौहरीक ताक में जे ओकरा गढि सकए तरासि सकए। मैथिली लोकगीत गंगा के अनेक आयाम छैक। सब आयाम के अपन महत्त्व।
जखन लोकगीतक विस्तृत आ विशाल संख्या के देखैत छी त अनेक बिंदु दिस ध्यान जैत अछि। एहिना ध्यान एक गीतक अनुवाद करैत लोकगीत में कौआ के प्रयोग आ ओकर उपयोगिता दिस चलि गेल। लोकगीत में कौआ के मानवीकरण क नायिका के द्वारा कौआ के विभिन्न तरह स प्रयोग कैल गेल अछि। प्रचलित व्यवहार में कौआ के प्रति लोकक विश्वास पर गेल। अदौं सं लोकधारा में कौआ मनुखक खाश क महिला एवं बच्चा सबहक पल-पल केर मित्र बनल अछि।
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र इथनोग्राफर छथि, आ तंए पाब्लो नेरुदाक ई पद्य हुनका पसिन्न छन्हि/ ऐ आलेखक बीच ऐ पद्यक आनन्द आर बढ़ि जाएत/
Pablo Neruda
"You start dying slowly"
You start dying slowly;
if you do not travel,
if you do not read,
If you do not listen to the sounds of life,
If you do not appreciate yourself.
You start dying slowly:
When you kill your self-esteem,
When you do not let others help you.
You start dying slowly;
If you become a slave of your habits,
Walking everyday on the same paths…
If you do not change your routine,
If you do not wear different colours
Or you do not speak to those you don’t know.
You start dying slowly:
If you avoid to feel passion
And their turbulent emotions;
Those which make your eyes glisten
And your heart beat fast.
You start dying slowly:
If you do not risk what is safe for the uncertain,
If you do not go after a dream,
If you do not allow yourself,
At least once in your lifetime,
To run away.....
You start dying Slowly!!!
Love your life Love yourself...```
अपना स सिनेह करू, अपना के सम्मान करू सदिखन
पाब्लो नेरुदा
मैथिली अनुवाद : डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
पाब्लो नेरुदा स्पेन के कवि छथि। साहित्य में योगदान हेतु हिनका नोबेल पुरस्कार भेटल छनि।
अहाँ नहु-नहु मरै छी
यदि अहाँ यात्रा नहि करै छी
अहाँ अध्ययन नहि करै छी
अहाँ जीवनक स्वर के नहि सुनै छी
यदि अहाँ अपना गुणक स्वयं ग्राहक नहि छी
अहाँ नहु-नहु मरै छी...
जाहि घडी अहाँ आत्म-विश्वास के खून क दैत छी
जखन अहाँ ककरो स मदतिकेर आशा नहि रखैत छी
अहाँ नहु-नहु मरै छी....
एकहि रस्ता पर प्रतिदिन चलैत .....
जखन अहाँ अपन आदति के दास भ जैत छी
यदि अहाँ अपन दैनन्दिनी के नहि बदलै छी
बिभिन्न रंगक परिधान नहि पहिरैत छी
किम्बा अहाँ कुनो अनजान मनुख स बातचीत नहि करैत छी
अहाँ नहु-नहु मरै छी....
यदि अहाँ जीवन में उत्साह आ त्वरित आवेग
दिस उदास भ रहल छी
जे अहाँक आंखि के दिव्य आ झलकैत
आ ह्रदय गति के तीव्र बनबैत अछि
अहाँ नहु-नहु मरै छी....
अगर अहाँ जीवन में कम स कम एक बेर अनिश्चित के सुरक्षित करबाक हेतु जोखिम के स्वीकार नहि करैत छी
सपना के साकार करवाक प्रयास नहि करैत छी
सब जिम्मेवारी स भगबाक हेतु .....
अहाँ नहु-नहु मरै छी....
अपन जीवन स सिनेह करू अपना आप सं सिनेह करू......
विभिन्न प्रकारक जानवर आ चिरै-चुनमुन केर अति प्राचीन समय सं मनुखक जीवन स नाता रहल छैक। मैथिली लोकगीत में चिड़ई-चुनमुन के प्रति प्रेमक अद्भुत वर्णन आ प्रेमाधिक्य देखल जा सकैत छैक। चिरै-चुनमुन कुन क्षण मनुखक जीवनक अभिन्न अंग बनि जैत अछि पते नहि चलैत छैक। भोजन बनबैत काल चिरै-चुनमुन आ जानवर लेल पहिल कौर माय राखि दैत छली। सामूहिक अवसर के निमित्त भोज-भात में भोजन बनबए स पूर्व चिरई-चुनमुन लेल पहिल कौर एखनो निकालि देल जैत अछि।
काक़ भुशुंडी त कौआ छला जे पक्षीराज गरुड़ के रामकथा पहिने सुना देने छलथिन। अहि बातक वर्णन बाल्मीकी के रामायण आ तुलसीदास केर रामचरितमानस में भेटैत अछि। भगवान शिव पार्वती सँ कहैत छथिन: "कि हम जे सुंदर कथा अहाँ के सुनेलौ अछि ओहि कथा के काक़ भुशुंडी गरुड़ के सुना चुकल छथि। नारद केर ज्ञान सँ भगवान राम के नागपाश सँ मुक्त कए गरुड़ ज़खन अपन धाम घुरैत रहथि त एकाएक हुनकर मोन में एक शंका उत्पन्न होईत छनि कि केहेन भगवान छथि राम जे एक तुच्छ राक्षस द्वारा फ़ेकल नागपाश में बन्हा गेला? गरुड़ एहि शंका केर समाधान ऋषि नारद सँ पुछला। नारद अहि शंका के समाधान बतेबा में असमर्थ छथि। नारद गरुड़ के ब्रह्मा लग भेज दैत छथिन। ब्रह्मा जी सेहो अहि शंका के समाधान बतेबा में असमर्थ छला। आब ब्रह्माजी गरुड़ के महादेव लग पठा देलथिन। महादेव कहलथिन: "भगवानक माया बतेनाइ असम्भव अछि। एक चिरै दोसर चिरै के ठीक सँ बुझा सकैत छैक ताहि अहाँ काक़ भुशुंडी लग जाऊ। वैह अहाँ के सब बात नीक स बुझा देता। आ अंतत जखन गरुड़ काक़ भुशुंडी लग गेलाह त काक़ भुशुंडी अपन अद्भुत वैदुश्य के परिचय दैत गरुड़ के पूरा रामायण के कथा समझा देलथिन। ई कथा कौआ के बुद्धिमान प्रमाणित करैत अछि संगहि मानव मोन में चिरै-चुनमुन संगे गूढ़ बात के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार के सेहो प्रमाणित करैत अछि।
चिरै-चुनमुन आ कौआ केर मनुखक जीवन में महत्त्व के सब स उत्तम उदाहरण विष्णु शर्मा द्वारा रचित कालजयी रचना पंचतन्त्र अछि।
प्राचीन भारत में गुरुकुल जंगल में होइत छल। गुरु अपन शिष्य के प्राकृतिक वातावरण में राखि ओकरा प्रकृति आ प्रकृति के अवयव जे गाछ-बृक्ष, चिरै-चुनमुन, जड़ी-बूटी, नदी-नाला, झरना, पोखरि, पहार, वन्यजीव आदिक जानकारी दैत छलथिन आ ओकरा संग कोना तारतम्य स्थापित हो से गुण सिखायल जैत छलैक। विष्णु शर्मा त चिरै-चुनमुन आ वन्यजीव के मानवीकरण कए पूरा पंचतन्त्र केर निर्माण बच्चा के ज्ञान विकसित करबा लेल क लेला।
बात पंचतन्त्र के क रहल छी आ प्रसंग कौआ के अछि त पंचतन्त्र केर एक कथाक उल्लेख करब अनिवार्य बुझना जा रहल अछि जकर सम्बन्ध कौआ स छैक। कथा किछु ऐना छैक:
बहुत पहिने एक झमटगर बर कौआ सबहक राजधानी छल। हजारो के संख्या में कौआ ओतए कागराज मेघवर्ण संग रहैत छल।
बरक गाछ एक पहाड़ी रहैक जाहि में असंख्य गुफा रहैक। ओहि गुफा सब में उल्लू सब रहैत छल।
उल्लुक राजा अरिमर्दन छल। अरिमर्दन पराक्रमी छल। कौआ सब के ओ अपन सबस पैघ दुश्मन बूझैत छल। कौआ स ओक़रा अतेक घृणा रहैक जे बिना कौआ के वध केने ओ भोजन तक नहि करैत छल। ज़खन बहुत संख्या में कौआ मरए लगलैक त मेघवर्ण बड्ड चिंतित भेल। अहि विषय पर विचार करबाक हेतु मेघवर्ण कौआ सभक एक बैसार केलक। मेघवर्ण बाजल: "हमर प्रिय कौआ सब, अहाँ सबके त बुझले अछि जे बेर-बेर उल्लू के आक्रमण केर कारण अपन सभक जीवन असुरक्षित भ गेल अछि। अपन सभक शत्रु शक्तिशाली आ एक नम्बर केर अहंकारी सेहो अछि। अपना सब पर रातिक हमला करैत अछि किएक जे अपने सब रातिक देखि नहि सकैत छी। हमर सभक विवसता ई अछि जे हमरालोकनि दिन में जवाबी आक्रमण नहि क सकैत छी कारण जे उल्लू सब गूप्प अनहार गुफ़ा में सुरक्षित बैसल रहैत अछि।
ई कहि मेघवर्ण चतुर आ ज्ञानी कौआ सब स अपन-अपन सुझाव देबाक़ निवेदन केलक।
एक डरपोक कौआ बाजि उठल: "हमरा सबके उल्लू सँ समझौता क लेबाक चाही। ओ सब जे कुनो शर्त रखैत छथि ओक़रा स्वीकार क लेबा में अपन सभक हित अछि। अपना स चफ़्फ़र शत्रु सँ बेर-बेर पराजित हेबा में कुन फ़ायदा?"
अहि बात के काँव-काँव कए बहुत कौआ सब विरोध केलक। एक कौआ चिचियाएल: "हमरा सबके अहि दुष्ट सब स किन्नहुँ बात नहि करक चाही। सब गोटे उठु आ चढ़ाई करु।"
एक निराशावादी कौआ बाजल: "शत्रु शक्तिशाली अछि। हमरासबके ई स्थान छोड़ि कतौ आर चलि जेबाक चाही।"
एक बुझनुक़ कौआ बाजल: “अपन घर छोड़नाई ठीक नहि रहत। अगर हम सब अतए सँ चलि गेलौ त कतहुँ के नहि रहब। बिलकुल टुटि जाएब। अपना सब के एतहि रहि आरों चिरै सब सँ मदति लेबाक चाही जाहि सँ एकर समाधान भ सकय”।
स्थिरजीवी ओहि कौआ सभ में सब सँ चतुर आ बुद्धिमान छल जे चुप चाप बैसल सभक तर्क ध्यानमग्न भ सुनि रहल छल। राजा मेघवर्ण ओक़रा दिस मुखाकृति भेला आ कहलथिन, "परमज्ञानी स्थिरजीवी, अहाँ चुप छी? हम अपनेक विचार जानए चाहैत छी।"
स्थिरजीवी बाजल: “महाराज, हमर सोचब अछि जे शत्रु अधिक बलशाली हो त छलनीति के सहारा लेबाक चाही”।
"केहेन छलनीति? कनि स्पष्ट करु, श्रीमंत स्थिरजीवी।" कागराज बजला।
स्थिरजीवी: "अहाँ हमरा ऊँच-नीच कहु आ हमरा पर जानलेवा हमला करू।"
मेघवर्ण अकचकेला, "ई अहाँ की बाजि रहल छी स्थिरजीवी?"
स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण बला ठाढि पर गेला आ कान में कहलथिन, "छलनीतिक हेतु हमरा ई नाटक कर पड़त। अपना सबके अग़ल-बग़ल के गाछ सब पर उल्लू जासूस अपन सबहक़ सभाक सब क्रिया-कलाप के देख रहल अछि। ओक़रा सबके देखाक अपना सबके आपसी फूट आ फ़सादक नाटक करए पड़त। ओक़र बाद अहाँ सब कौआ के लक' ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँच हमर प्रतीक्षा करु। हम उल्लूक दल में शामिल भ ओकर सबहक़ विनाश केर समान एकत्रित करब। घरक भेदी बनि लंका डाहि देबाक़ व्योंत करब।"
फेर की छल। नाटक शुरू भेल। स्थिरजीवी चिकरैत बाजल: “हम जेना कहैत छी तेना कर राजा, राजा केर बच्चा। किएक हमरा सब के मारबाब' पर तुलल छैं?”
मेघवर्ण गरजल: "ग़द्दार, राजा सँ एहेन बदतमीजी बला भाषा में आ सहो ज़ोर सँ तोरा बज़बाक हिम्मत केना भेलौक?" अनेक कौआ एकहि संगे चिचियैत बाजल: "अहि ग़द्दार के जान सँ मारि देल जाओ महाराज।"
आब राजा मेघवर्ण अपन पंख सँ स्थिरजीवी के कनपट्टी में धेले चमेंटा मारैत ठाढि सँ नीचा खसा देलथिन आ तुरंत घोषणा केला की "हम ऐ ग़द्दार स्थिरजीवी के तुरंत के प्रभाव स कौआ समाज सँ बहिष्कृत क रहल छी। आब एखन सँ कुनो कौआ अहि अधम सँ कुनो तरहक़ नाता नहि राखत। ई हमर आज्ञा अछि।"
अग़ल-बग़ल के गाछ पर नुकाक बैसल उल्लू जासूस के आँख़ि ख़ुशी स चमकि उठल। जासूस सब तुरंत उल्लू के राजा के संवाद देलक जे कौआ सबमें फूट पड़ि गेल अछि। मारि-पीटक संग-संग गारि-गरौअल भ रहल छैक। अतेक बात सुनितहि उल्लूक सेनापति राजा के सम्बोधित करैत बाजल: "महाराज, यैह मौक़ा अछि कौआ सब पर आक्रमण करबाक हेतु। अहि समय में हम सब ओक़रा सबके आसानी सँ हरा देबैक़।"
उल्लू सम्राट अरिमर्दन के अपन सेनापति के बात नीक लगलैक। ओ तुरंत आक्रमण केर आदेश द देलक़ैक़। फेर की छल हज़ारों केर संख्या में उल्लूक सेना बरक गाछ पर आक्रमण करक हेतु विदा भेल। यद्यपि ओतए एकौ टा कौआ नहि भेंटलैक।
भेटबो कोना करितै? योजनाक अनुसार मेघवर्ण सब कौआ के ल क ऋष्यमूक पर्वत दिस कूच क गेल छल। खाली गाछ देखि उल्लूक राजा थूक फेकैत बाजल: “हम्मर सबहक सामना त की डरे कौआ सब भागि गेल। एहेन काएर पर एक हज़ार बेर थू-थू।” सब उल्लू जीतक मद में मातल ‘हू-हू’ के आवाज निकालि अपन जीतक घोषणा करए लागल। नीचा में जमीन पर झाड़ झंखाड़ में खसल स्थिरजीवी कौआ ई सब ध्यानपूर्वक देख रहल छल। स्थिरजीवी कांव-कांव केर आवाज़ निकाललक। ओकरा देखते मातर जासूस बाजि उठल: “अरे, ई त वैह कौआ अछि जकरा एकर राजा धक्का दए माटि पर खसा देने रहैक आ अपमानित करैत रहैक।”
उल्लूक राजा सेहो ओतय आबि गेलैक ओ पूछलकैक: “तोहर एहेन दुर्दशा केना भेलह?” स्थिरजीवी बाजल “हम राजा मेघवर्णक नीतिमंत्री छलहु। हम ओकरा एक नेक सलाह देलयैक जे आई-काल्हि उल्लू सबहक नेतृत्व एक अति पराक्रमी राजा क रहल छथि। हमरालोकनि के उल्लू सबहक अधीनता स्वीकार क लेबाक चाही। हमर बात सुनि राजा मेघवर्ण तामसे लाल भ गेल आ फटकारलक, दूतकारलक, एवं अपमानित कए कौआ समाज सं निष्कासित क देलक। हे महाराज, हमरा अपन शरण में ल लीय।”
उल्लूराज अरिमर्दन आब गहन सोच में पडि गेल। ओकर नीति सलाहकार कान में कहलकै “राजन, शत्रुक बात पर कखनो भरोसा नहि करक चाही। ई अपन सबहक़ शत्रु थिक। एकरा जान स मारि देल जाए।” एक चापलूस मंत्री बाजल “नहि राजन! एकरा नहि मारल जाए। एहि कौआ के बल्कि अपना दल में राखि लेबा में अपना सबके फायदा अछि. ई कौआ सबहक घरक भेद समय-समय पर बतबैत रहत।”
राजा के सेहो भेलैक जे स्थिरजीवी के उल्लू सबहक साथ मिला लेबा में लाभे-लाभ अछि. ई सोचि उल्लूक झुण्ड स्थिरजीवी कौआ के अपने संगे लेने गेल। ओतए अरिमर्दन अपन उल्लू नौकर-चाकर के निर्देश दैत बाजल, “स्थिरजीवी के गुफा के शाही अतिथि कक्ष में रहबाक व्यवस्था कैल जै। हिनका कुनो तरहक कष्ट नहि होबाक चाही।”
चतुर स्थिरजीवी कौआ हाथ जोड़ैत बाजल: “महाराज, अपने हमरा शरण देलहु, हमरा लेल ई बड्ड पैघ बात अछि। हमरा अहाँ अपन शाही गुफ़ा के बाहर एक पाथर पर एक सेवक जकां रह देल जाओ। हमर इच्छा अछि जे एतहि बैसक हम अहाँक गुणगान करैत रही।” एहि तरहें स्थिरजीवी शाही गुफ़ा के बाहर डेरा जमा लेलक।
गुफ़ा में नीति सलाहकार एकबेर पुनः राजा के सावधान करैत कहलकैक: “महाराज, शत्रु पर कखनो विश्वास नहि करक चाही। शत्रु के अपन घर में शरण देब आत्महत्याक सामान अछि।” घमंडे मातल उल्लू सम्राट अरिमर्दन अपन नीति सलाहकार के दिस आंखि तरेरैत बाजल: “तों हमरा जादे नीति बुझाबए के कोशिश नहि कर। अगर तोरा ई लगैत छौ जे तोरा उचित सम्मान नहि भेट रहल छौक त तों अतए सं जा सकैत छै।” नीति सलाहकार उल्लू हारि मानि आब अपन दू-तीन मित्रक संग ओतय सं ई कहैत विदा भ गेल: “विनाशकाले विपरीत बुद्धि।”
किछु दिनक बाद स्थिरजीवी अगल-बगल स लकड़ी अथवा काठी इत्यादि आनि गुफ़ा के द्वार लग एकत्रित करे लागल। कहला पर बाजल: “सरकार सर्दी आबै बला छैक। हम काठ आ झांखर सबहक फुसही मडैया बनबै चाहैत छी ताकि जार सं बचि सकी।” शनैः-शनैः लकड़ीक बड्ड पैघ ढेर जमा भ गेलैक। एक दिन जखन सब उल्लू सुति रहल छल तखन स्थिरजीवी उडिक सोझे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुचल। ओतए योजना के अनुसार मेघवर्ण सब कौआ संग ओकर प्रतीक्षा क रहल छलैक। स्थिरजीवी बाजल: “आब अहाँ लोकनि समीप के जंगल सं जतए आगि लागल छैक एक-एक जरैत लकड़ी अपन-अपन चोंच में उठा हमरा पाछा-पाछा आउ।”
समस्त कौआक सेना अपन-अपन चोंच में जरैत लुकाठी लेने स्थिरजीवीक पाछा-पाछा उल्लूक गुफ़ा में आबि गेल। स्थिरजीवी द्वारा एकत्रित कैल लकड़ीक ढेर में आगि लगा देल गेलैक। एक-एक टा उल्लू या त जडि क मरि गेल अथवा दम घोटला सं मरि गेल। कागराज मेघवर्ण स्थिरजीवी के योजना आ चातुर्य सं गद-गद होइत ओकरा कौआ रत्नाक उपाधि सं सम्मानित केलक।
पंचतन्त्र केर ई कथा एहि बात के प्रमाणित करैत अछि जे चिड़ई-चुनमुन मनुखक जीवनक अभिन्न अंग जकां थिक। एकरा सब स सीख लेल जा सकैत अछि आ तारतम्य स्थापित क जीनाई निक।
अर्थ भेल जे अपन लोक समाज आ व्यवहार ई कहैत अछि जे एकरा सब स प्रकृति में सामंजस्य स्थापित करू। एक दोसरक बिना जीवन अपूर्ण अछि। पशु आ चिरै स तारतम्य स्थापित केने लाभ। हलांकि एखन किछु वर्ष स ई सुनबा में आबि रहल अछि जे कौआ हेंजक-हेंज में मरि रहल अछि। मोन एहि तरहक बात सुनि आहत होइत अछि। कौआ त पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी थिक आ सैह मरि रहल अछि तखन पर्यावरण के की हैत?
आब लोकगीत पर अपन ध्यान केन्द्रित करी। माय अपन बच्चा के मुँह में कौर दैत काल भांति-भांति के चिरई सब स सम्बन्ध जोड़ैत कहैत रहैत छथि ले बौआ ई कौर कौआक छौ; ई कौर मैनाक छौ, आदि-आदि। कदाचित एहि तरहे सामाजिक रुपे हमरालोकनि चिरै-चुनमुन स एक मानवीय सम्बन्ध बना लैत छी। चिरै केवल चिरै नहि अपितु, भाई, बहिन, सखा आ सम्बन्धी बनि जैत अछि। एकटा नेनाक गीतक किछु पंक्ति देखु:
मेना के बच्चा चिरैया गे
दू टा जामुन खसा
लाली खसैबए त मारबौ गे
दू टा कारी खसा
तू छै बहिन तोहर हम भैया
जौ ने खसेलें त बुझि ले दैया
मारब खुआ तोरा जहर गे
दू टा जामुन खसा
मेना के बच्चा चिरैया गे
दू टा जामुन खसा।।
काली कान्त झा “बूच” अपन कविता “दीनक नेना” जे गीत सेहो कहल जा सकैत अछि में कौआ के सम्बाहक जकां प्रयुक्त करैत छथि। एहि गीत में कवि एक गरीब माय जकर पति बाहर कमेबा लेल गेल छैक, घर में ने अन्न ने ढउआ छै। छोट दुधपीबा बच्चा कखनो चाकलेट, कखनो बिस्कुट त कखनो कुनो आरो वस्तु लेल माय स जिद्द करैत छैक आ कनैत छै। लाचार माय एक कौआ के कुचरैत देखैत छैक आ ओकरे सहारा लए अपन कनैत होरिला के गीत सुना बौंसबाक प्रयत्न क रहलि छैक। बौआ देखु-देखु, ई क़ुआ गाबि रहल अछि। ई तोरे कुचरि क सुना रहल छौ रे बाऊ। तों ओसारा के बीच में सुतल छै आ ई कौआ पूब दिस तोरा देखि ख़ुशी स नाचि रहल अछि। अते सुन्नर पुरबा बसात जेना कौआ के नाचब लेल आ तोरा मस्त करक लेल बसातक छनन-छनन लहरि सं बाँसुरी बजा रहल छौक। रे बौआ तोहर जन्म निर्धन घर में भेल छौक ताहि तोरा लेल बिस्कुट आ चाकलेट बनले नहि छौक। बिसरि जो एहि वस्तु सबके। तोहर गोलगर पेट नोन रोटी सं भरि जाऊ त भाग्य! लेकिन, चिंता के कोन बात? बसातक धुन आ कौआक मस्त भ नाचब मधुर बातक स्वरलहरी तोरा लेल तैयार केने छौ। अनका थोरे ने ई भाग्य छैक? तोहर पिता परदेसिया छौ रे बाऊ। कतेक दिन भ गेल मुदा निरमोहिया कुनो चिट्ठियों नहि भेजलक अछि! ई कोनो बात भेलै, कह ने? केना एहि अवस्था में ई कौआ अपन कुचरब सं आ बसातक झोंका अपन मधुर धुन स तोहर नींद स झकमैत माय के टीस जगा रहल छौक! रे नेना! तों की बुझबैं जे गरीबी ककरा कहै छैक? श्रमजीवी के सपनों में सुख नहि लिखल छैक। बेचारा श्रमजीवी अपने त अन्हार घर में डिबिया जरा क राति बीतबैत अछि आ अपन परिश्रम सं समस्त नगर के जगमग करैत अछि। देख ने कोना ई हुलसगर बियनि अपन नहु-नहु मिठगर बसात सं तोरा सुता रहल छौक! निनियारानी, झटकि क बौआ लग आउ ने! बौआ के सुताउ ने! रे सोन, तों बिना वस्तु सब खेने उपासल छै। हम ग्लानि सं मरल जा रहल छी। मुदा हम छी लाचार करू त की करू रे बौआ?”
मूल गीतमय कविता कनि देखू:
देखहीं रौ बौआ, ई कौआ गवै छौ।
सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।।
एम्हर तों सूतल छे माँझे ओसार पर
ओम्हर ओ नाँचै पुवरिया मोहार पर
पुरबा वसात बाँसुरी बजवै छौ.........।
सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।।
तोरा लय बनलौ ने बिस्कुट आ चाकलेट
नोनो रोटी सं भरतौ ई गोल पेट
बातक मधुर स्वरलहरी अबै छौ .....।
सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।।
बापे तोहर बनलौ परदेशी
चिट्ठी ने एलौ भेलौ दिन वेशी
माँ केर निनायल व्यथा जगबै छौ।
सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।।
की बुझबैं ककरा कहै छै गरीबी
सपनो में सुख नहि जतऽ श्रमजीवी
लुत्ती लगाकऽ नगर बसबै छौ.......।
सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।।
कोरा में तोरा सुताबै छौ बिनियाँ
झटकल औ अविहें रौ नूनूक निनिया
तोहर उपास हमरा लजबै छौ
सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।।
कौआ मिथिला में दू प्रकारक पैल ज़ैत अछि सामान्य कौआ आ कार कौआ। दुनू के अपन-अपन स्थान मैथिल समाज आ लोक परम्परा में छैक। कार कौआ अशुभ के सूचना दैत अछि । आ सामान्य कौआ शुभक संकेत। दुनू जे बजैत अछि तक़रा लेल अलग-अलग शब्द छैक। कार कौआ "डकै" छै आ सामान्य कौआ "कुचरै" छै। ड़कनाई अशुभ के सूचक आ कुचरनाई शुभक सूचक। किछु लक्षण छैक जाहि स ई पता चलैत छैक जे कौआ के कुन परिस्थिति में बेसब, उठब, कुचरब शुभ आ कोन परिस्थिति में अशुभ केर सूचना दैत अछि।
कौआ जखन घरक चार अथवा आंगन में कुनो ऊँच चीज़ पर चढिक कुचरे त कहल जैत छैक जे ई शुभक संकेत अछि; संगहि घर में कियोक पाहून एता कतेको बेर एहि तरहक बात सत्य भ जैत अछि।
यदि कौआ घरक छत (अथवा चार) अथवा आंगन में हरियर गाछ पर बैसए त हेरायल वस्तु भेटब निश्चित बुझु। एहन स्थिति में कोर्ट कचहरी में दबदबा बनैत छैक आ मुक़दमा में जीत हासिल होइत छैक एवं धन-धान्य में बृद्धि होइत छैक।
कौआ अगर बखारी, अन्नक ढेर आदि पर बैसय त धनक लाभ होइत छैक। गाय केर माथ पर कौआ बैस गेल त प्रियजन सं भेट हेबेटा करत।
एहो मान्यता प्रबल अछि अपन मैथिल समाज में कि अगर कौआ सुखैल मांटि किंवा गर्दा में ओंघराए लागल त एकर अर्थ ई भेल जे प्रचुर मात्र में वर्षा हैत।
एहि सबहक बिपरीत कौआ जों कुनो सुखैल गाछ पर बैस क कुचरि रहल हो त ई कुनो महामारी फैलबाक पूर्व सूचना थिक।
अगर ककरो माथ पर कौआ अपन चोंच स हड्डीक टुकड़ी खसा दैक त ओहि व्यक्ति के मृत्यु निश्चित बुझु।
मैथिली लोकगीत महाकवि विद्यापति के बिना अपूर्ण अछि। एक विरही नायिका जकर पति परदेस गेल छैक केर वेदना आ केना ओ कौआ के अपन समदिया बनबैत अछि, केना ओकरा लोभबैत अछि इत्यादिक बहुत सुन्नर वर्णन महाकवि निम्न लोकगीत में करैत छथि:
मोरा रे अंगनमा चनन केर गछिया ताहि तर कुरुरै काग रे।
सोने चोंच तोहें बांधि देबौ बायस जौं पिया अओता आजु रे।
गाबह गाबह सखि लोरी झूमरि मदन अराधन जानु रे।
चहुं दिसि चंपा मेहुलि फूललि चंद्र इजोरिया राति रे।
कोना कए हम मयन अराधब होयत बड़ी रतिसाति रे।
पांक समय कागा केओ ने अपन हित देखल आंखि पसारि रे।
विद्यापति कविवर इहो गाबए तोकें अछि गुनक निधान रे।
राव भोगीसर सब गुन आगर पदमा देवी रमान रे।।
एहि गीतक संक्षेप में अर्थ ई भेल जे हमरा आंगन में चानन केर गाछ अछि आ ओई गाछ के ठाढि पर एगो कौआ बैसल कुचरि रहल अछि। ई निश्चित रुपे शुभ समाचार केर लक्षण थिक। हे कौआ, अगर आई हमर प्रियतम आबि गेला त हम तोहर चोंच सोन स मढ़वा देबौ। आउ हे सखी बहिनपा सब, सब मिलि झूमर गाउ। आई हम प्रेमक आराधना कर जा रहल छी। चारु दिस चंपा आर भालसरी के फूल फुलाएल अछि। मुदा ई पूर्णिमाक राति? कोना हम कामदेवक आराधना क’ पैब। कारण जे एहि मिलनक सबस पैघ उपहार त कामदेवक आराधने हेतनि। सुन कौआ, खराप समय में कियोक अपन नहि होइत छैक। ई बात आंखि खोलि क देखि चुकल छी। कवि विद्यापति कहैत छथि हे सुन्नरी, अहाँक प्रियतम गुणक खान छथि। जेना राजा भोगेश्वर छथि आर जे पद्मा देवी के साथ रमण करैत छथि।
जाहि समय में आवागमन के सुविधा अतेक उन्नत नहि रहैक ताहि क्षण में कौआ के लोक खाश तौर पर स्त्रिगन आ नेना सब कहौतिया बूझैत छल। नायिका निवेदन करैत छथि जे आउ आ हमर अंगना में कनि कुचरू। अहांके हमर आंगन में स्वागत अछि। हम हम अहाँ के पानि स स्वागत करब, बेसबाक लेल पीढ़ी देब आ अगर अहाँ के कुचरला सं हमर प्रियतम कहीं आबि गेला त ओ जे कोनो सनेश अनता ताहि में पहिल हिस्सा अहींके देब। एतबे नहि, अगर हमर प्रियतम परदेसी आबि गेला त हम अहाँ लेल कंगना सनेश बनाएब। अहाँ चिंता नहि करू। हमर बात पर विश्वास करू। हमर हितग्राहक बनु आ आउ आ हमर अंगना में कुचरू।
कनि देखू एहि गीत के:
हे रे कौआ कुचरि बैस अंगना में।
पानि देबौ पीढ़ी देबौ।
पहिलुक सनेश हम तोरे देबौ।
जौं प्रियतम परदेसी औता।
तोरा सजैब हम कंगना में।
हे रे कौआ कुचरि बैस अंगना में।
अगर कुनो महिला आ नवकनिया कनि ताम-झाम वाली छैथ आ हुनकर दिमाग सातम असमान पर चढ़ल छनि। हरेक चीज़ भोजन स पहिरन धरि में नखरा छनि तकर अलगे बात! मूह-कान कुनो खाके सन मुदा घमंड ऐना जेना विश्वसुन्दरी होथि। यथार्थ में हुनकर मुह कौआ सनहक छनि। कमेंट हुनका पर छोटगर अछि ओहो गीतक रूप में। कनि देखी:
कौआ सनहक़ कारी आ बाकूला सनहक़ ठोर।
बैसल-बैसल चाही हिनका दाली भात तिलकोर।
हमही सबस सुन्नरि छी आ हमरे सुन्नर दूल्हा।
सासु कियैक नहि भानस करती नहि फूकब हम चुलहा।।
ग्राम्यांचल में कौआ के कुचरब भोर होमाक सूचक अछि। नायिका के नायक कहैत छथिन जे कौआ बजलक आ भोर भ गेल; भोर भेल त नगर भरि में शोर भ गेल. आब कतेक काल सुतब? यै फलां बौआ के माय उठू ने! ऐना कोना चलत दिन? चलू आब नित्यकर्म में लागि जाई।
कौआ जगलै भेलै भोर
भेलै भरि नगरी में शोर
आबो जागू यै बौआ के माय।
माय अपन कनैत बच्चा के कौआके नाम लै सूतक हेतु तैयार करैत छथि। लोरी जकां कौआ के गीत में पात्र बना कनैत नेना के सुतबैत छथि। बौआ सुति रहू देखू-देखू आकाश में केना कौआ उडि रहल अछि। चिंता नहि करू अहाँक पिताजी जखन आबए लगता त पटना स अहाँ लेल ढ़ौआ लेने एता।
चुप रहु चुप रहु बौआ
आकाश में उड़ई अछि कौआ
एयता बाबू पटना स लेने औता ढ़ौआ।
चैताबर में नायिका के टीस आ कौआ दुनु के मेल देखल जा सकैत अछि। नायिका के आंगुर में सांप डसि लेने छैक. शायद विरह के डंक? अपन ननदि सं नायिका कहैत अछि जे के ओकरा लेल वैद बजा आनत? के ओकर पीड़ा के समाप्त करत? के ओकरा लेल पलंग के ओछायन तैयार करतै; नायिका के प्रियतमके के बजा अनतै हो राम? नायिका के पिता वैद बजेथिन, और माय पीड़ा मिटेथिन; ननदि पलंग पर ओछायन तैयार करथिन; देबर पिया के बजा अनथिन। नायिका कौआ स निवेदन करैत कहैत छथिन जे रे कौआ तोरा हम दही आ चूडा के भोज खुआ देबौक अगर हमर समाद के हमर प्रियतम तक लेने जयबै। आब कनि कौआ के मानवीकरण देखु, कौआ नायिका के कहैत अछि “ठीक छै हम तोहर समाद तोरा प्रियतम लग ल जेबौक मुदा एकटा समस्या अछि। हम तोहर प्रियतम के नहि जनैत छी फेर कोना तोहर समाद देबैक?” आब नायिका कौआ के अपन प्रियतम के हुलिया बतबैत कहैत अछि: “हमर प्रियतम के पातर-पातर डाँर छनि आ घरक दरबज्जा पर चानन केर गाछ छनि।” आब कौआ सहर्ष नायिका के समाद ल क ओकर प्रियतम लग जएबाक लेल तैयार भ जैत अछि।
अंगुरी में डसलक नगिनियाँ हो रामा
के मोरा जायत बैद बजाएत
के मोरा हरत दरदिया हो रामा।
के मोरा जाएत पलंगा ओछाएत
के मोरा पिया के बजाएत हो रामा।
बाबा मोरा जाएत बैद बजाएत
अम्मा मोरा हरत दरदिया हो रामा ।
ननदि मोरा जाएत पलंगा ओछाएत
दिओर मोरा पिया के बजाएत हो रामा
देबऊ रे कागा दही-चूड़ा भोजन
हमरो समाद नेने ज़ाह हो रामा।
तोहरो बलमुजी चीन्हियो ने जानियौ
कोना समाद नेने जाएब हो रामा।
हमरो बलमुजी के मुठी एक डाँर छनि
दुअरे चनन केर गछिया हो रामा।।
आब कनि सोहर दिस चली. बिना सोहर के मैथिली लोकगीत कहेन? एक सोहर में नायिका जे गर्भ सं अछि कोना अपन भावना के व्यक्त क रहल अछि। संतान केर कामना में व्याकुल नायिका हरेक आगंतुक के सूचना देमए बला कौआ के चोंच के सोन स मढबाक अश्वासन दैत अछि आ अपन जानि बड्ड सिनेह स कौआ के कहैत अछि कि हे कागा अगर हमर अंगना में तोहर कुचरब शुभ सिद्ध भ गेल – आ यदि हमर परदेसी प्रियतम घर आबि जाथि त हमर बांझपन ख़तम भ जायेत। आ से भ गेल त हम तोहर चोंच के सोन स मढ़ा देबह।
जों मोरा कगबा रे पिया अयताह
होरिला जनम लेत रे।
कगबा सोन में मढएबो दुनू लोल
त बोलिया बर सोहाबन रे।
चुपे रहू चुपे तिरिया जनिअ करू रोदन हे।
तिरिया आजुए आओत घरबइआ बझिनिया पाप छुटत हे।।
दोसर सोहर में नायिका के संतान प्राप्ति में आब देर नहि छैक। कखनो ई शुभ सूचना आबि सकैत छै। आब छठिहार में ककरा-ककरा सूचित कैल जाय आ निमंत्रित कैल जाय ताहि पर पति आ पत्नी में बात भ रहल छैक। होरिला के जनम भेल छैक से सूचना त कौआ ने देतैक? सगुन केर नौत त काग ने भाखत। हाँ जी हाँ. नायिका अपन पति के चिढ़बैत कहैत छथि जे दियाद आ लोक आ समाज के नौत त जैत मुदा हे पिया हम अहाँ बहिन के नहि नोतब कारण जे अहाँक भागिन नहि आबि पेता। कौआ के सगुनिया बनेबाक विधान सरिपहु बड्ड सोहनगर लगैत छैक।
आरे-आरे कागा सगुनिया सगुन नौत भाख़ब रे
कागा रे मोर घर उचित कल्याण कहाँ-कहाँ नौतब रे ।
दर जे नोतब दिआद लोक आओर समाज लोक रे।
पिया हे आहाँक बहिन नहि नोतब कि भागिन कहाँ आओत रे।।
एक विरह गीत में नायिका केर बेहाल हालक दारुण व्यथा व्यक्त कैल गेल अछि। तमाम चिड़ई जाहि में कागा सेहो सम्मिलित अछि गाछक डारि बैस गेल अछि। प्रात भ चुकल अछि आ प्रात होइतहि नभ मंडल में सूर्य केर लालिमा छटकि रहल छैक। नायिका अपन सखी के संबोधित करैत कहैत छथि “हे सखी, हमर प्रेमक पियास कोना मेटत? हम त विरह वेदना में तडपि-तडपि क दिन आ राति काटि रहल छी. राति बीत गेल; हम बेर-बेर चारू कात चकुयैल देखैत छी मुदा हे सखी, एखन धरि हमर पिया कहाँ अएला?
खग उड़ि बैसल तरुवर डाली
भेल गगन में प्रात सुलाली
हमर पियास मेटत कोना सजनी
तडपि-तडपि बितए दिन-रजनी
रैन बितल मोरा पिया नहि आएल
रहि-रहि चहुँ दिश ताकल सजनी।।
मैथिली लोकगीतक सब सं सुन्दर रूप तखन द्रष्टिगोचर होइत अछि जखन कौआ संग-संग दोसर जंतु के सेहो मानवीकरण कए ओकर श्रृंगार आ प्रेम भाव के गीतक माध्यम सं व्यक्त कैल जैत अछि। एहि तरहक उदाहरण में सब सं सुन्नर उदाहरण विषहरि आ कौआक थिक। एक विषहरिक गीत में एहेन स्थिति अबैत छैक जे विषहरि के अंगूठी कौआ आ सोनक ग्रीमहार चिलहोरि ल क भागि गेलनि। आब विषहरि कानए लगली। लोक सब विषहरि के मनेबाक प्रयास क रहल अछि। सोनरा के बजा सोन देल जैत अछि आ पटबा के रूपा। दुनु के तुरत आदेश देल जैत अछि जे यथाशीघ्र विषहरि मुद्रिका आ ग्रीमहार गढ़ल जाय।
कागा ल' गेल मुद्रिका चिलहोरि ग्रीमहार
राम ताहि लेल विषहरि रोदना पसार।
सोन ले रे सोनरा रूपा ले रे पटबा
राम गढि दए सोनरा भैया सोने ग्रीमहार
पहिर लीअ विषहरि मैय्या गले ग्रीमहार।।
विषहरि के दोसर गीत में एक गहीर पोखरि में घुसि क जकर उचगर भिड छैक विषहरि स्नान क रहल छली। नहेला-सोनेला के बाद अपन नमहर-नमहर केश के थकरेत छली। एकाएक कौआ सोनाक ककबा ल क भागि गेल। आब कनैत-खीजैत विषहरि अपन माय लग आबि कहलथिन जे कोना कागा हुनकर ककबा चोंच में ल क पर उडि गेलनि। माय बौंसति कहलथिन: “हे विषहरि दाई, अहाँ कानू-खिजू नहि हम अहाँ लेल फेर स सोना के ककबा बनबा देब”। आब विषहरि चुप भ गेली।
नीची रे पोखरिया के ऊँची रे मोहार
राम ताहि पइसि विषहरि करु स्नान।
नहाय सोनाय विषहरि थकरथि केश
राम सोना के ककहिया आजु काग लए गेल।
कनैत खीजैते विषहरि आमा आगु ठाढि
राम सोना के ककहिया आजु काग लए गेल।
जुनि क़ानु जुनि खोजू विषहरि माय
राम सोना के ककहिया हम देब बनबाय ।।
तेसर बिषहरि गीत में एहेन कल्पना कैल गेल छैक जे एक छोटछिन जमुना के कछेर में बान्ह पर छोट कदम्बक गाछ छैक। ओहि गाछक छाहरि में बिषहरि जुआ खेल लगली। जुआ खेल काल ततेक बेसुध भ गेली की कखन कौआ उडिक एलई आ झपट्टा मारि बिषहरि के हार ल गेलनि से पते नहि चललनि। जखन होश में एली त कनैत खिजैत कौआ के पाछा-पाछा दौडली। रे कौआ तों जते बैसबैं हम तोरा छोरबौ ने ओतहि तोहर ठोर दागि देबौक।
छोटी-मोटी जमुना-दह में छोटी नील गाछ
राम ताहि तर विषहरि खेलू जुआसारि।
ज़ुअबा खेलइते विषहरि भेली बेसूधि
राम ताहि खन काग उड़ि हार लए गेल
कनइते-खीजइते विषहरि धयल पछोर
राम जहाँ धय बैसबह दागब तोर ठोर।।
अहि तरहें मैथिली लोकगीत आ व्यवहार में कौआ आ मनुखक बीच प्रेम अनंत अछि। जतेक भीतर जैब आ जतेक मंथन करब ततेक अमृत भेटत। ओना चर्चा मैथिली लोकगीत आ कौआ पर क रहल छी मुदा कहि नहि कथीलेल यात्रीजीक (नागार्जुनक) “अकाल और उसके बाद” कविता स्मरण आबि रहल अछि। भुखक ज्वाला में एहि कविता में केवल नायिका नहि तड़पि रहल छैक अपितु ओकरा संगे गिरगिट, कुकुर, कौआ, मुस सब ओहि भुखक वेदना के सहयात्री छैक।
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।
बाबा ई कविता हिंदी में लिखला। चूँकि ई लेख हम मैथिली में लिख रहल छी त सोचलौ एक बेर एहि कविता के मैथिली में अनुवाद करबाक प्रयत्न करी। कहेन भेल से नहि बुझल अछि मुदा प्रयत्न त केलहु। कनि देखू
कतेक दिन धरि कानल चुलहा जांतो रहल उदास
कतेक दिन धरि कनही कुकुर सुतलै ओकरा पास
कतेक दिन धरि घरक भीत में गिरगिट केलक गश्त
कतेक दिन धरि मुसो के रहलै हालत शिकस्त।
दाना आएल घरक भीतर कतेक दिन के बाद
देखल धुआं अंगना स ऊपर कतेक दिन के बाद
मोन भेलै घर भरि के हरियर कतेक दिन के बाद
सुगबुगेलक पाँखि के कौआ कते दिन के बाद।।
एकटा बसन्त के गीत में नायिका कागा के सम्बाहक बना कतेक बात बता दैत छैक। बेचारी नायिका, फगुआ नजदीक आबि गेलैक। लोक के देखि ओकरो रंग रभस करक इच्छा भ रहल छैक मुदा रंग खेलत त ककरा संग? पाहून त परदेसिया छथिन. दूर देस में बैसल छथि। हे कागा अहाँ हमर समदिया बनु आ उडि क हमर कंत के हमर समाद द अबियौन। ओ हमरा हीरा मोती आ नग सं सुसज्जित एक चोली पठा देने छला से तार-तार भ गेल। हुनकर बिरह वेदना अलग रहि-रहि हमरा सता रहल अछि. आब रहल नहि जैत अछि।
ककरा संग खेलब ऋतु वसन्त।
निरायल फागुन दूर बसु कन्त।।
उड़ि-उड़ि कागा जाहु बिदेश।
हमरो ललाजी के कहब उदेश।।
चोलिया एक पहु देल पठाय।
चारु दिश हीरा-मोती लाल जड़ाय।।
चोलिया फाटल तारम्तार।
विरह सताओल बारम्बार।।
सूरदास जे गाओल वसन्त।
एहि जग बहुरी ने आयल कन्त।।
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सत्य नारायण झा
प्रजातंत्र एकटा मजाक
बहुत पहिने एकटा फिल्म आयल रहैक जेकर नाम रहैक सत्यकाम ।ओहि मे धर्मेन्द्र एवं संजीव कुमार क्रमशः कलाकार आओर सह कलाकार रहथि ।दुनू सिविल इंन्जिनियर रहथि ।धर्मेन्द्र जाहि कम्पनी मे काज करैत रहथि ओहि कम्पनी के सर्वे करक ठीका भेटल रहैक । सर्वे करबाक लेल ओ मालिक के कहलखीन जे थियोडोलाइट मसीन चाही ।मलिक रहै मूर्ख ,ओ थियोडोलाइट के नामो नहि सुनने रहैक ।ओ इंजिनियर धर्मेन्द्र के कहै जे बहाना नहि कर ,पहिने सर्वे कर तखन मसीन किन देबौ ,कहबाक मतलव मालिक ने सर्वे बुझै आ ने थियोडोलाइट मसीन ओ त मूर्ख रहैक मुदा रहैक मालिक ।इंजिनियर महाशय के मालिकक बात सुनि पसीना देबय लगलनि जे एहि मूर्ख के कोना बुझाउ ।
हमर एकटा पित्ती छथि ओ हमरा पढ़ेनो छथि तै हुनका हम मास्टर साहेब सेहो कहै छियैन ।ओ एकटा खिस्सा कहलनि ।ओ जखन बी काँम कय गेलाह त जीबिका लेल पटना गेलाह ।तत्काल एकटा सेठक लोहाक कारखाना मे काज धेलनि ।कारखाना कोनो पैघ नहि रहैक ,तै काजो साधारणे रहैक जे कतेक लोहा सप्लाइ भेल आ के लय गेल तेकर नाम नोट करू ।मास्टर साहेब छलाह प्रतिभाशाली, बैसल मोन नहि लगनि,तै ओ रेस्ट मे सेठक बेटा रहैक दसवाँ क्लास मे, तेकरा पढ़ा देथिन, से सेठ के नीक लगैक ।पहिने अंग्रेजीक एकटा किताब पढ़ाइ होय 'बुक फोर' ,ओहि मे एकटा चैप्टर रहैक ' द अर्थ' (The Earth )एक दिन मास्टर साहेब सेठक बेटा के पढ़बैत रहथीन वैह चैप्टर द अर्थ ।ओ पढ़बैत रहथीन जे कोना पृथ्वी सूर्यक चारू कात घुमै छैक आ कोना चन्द्रमा पृथ्वी क चक्कर लगबैत छैक .कोना दिन राति होयत छैक ।विस्तृत सँ मास्टर साहेब पढ़बैत रहथीन ,आ गद्दी पर बैसल सेठ सेहो सभटा सुनैत रहैक ।ओकरा किछु नहि बुझाइक ।ओकरा आश्चर्य लगलैक जे कोना पृथ्वी सूर्यक चक्कर कटतैक आ कोना चन्द्रमा पृथ्वीक चक्कर कटतै ,से यदि होयतै त पटना कलकत्ता चलि जयतै आ कलकता दिल्ली ।चन्द्रमा घुमितै त तारा लग लोक रहिते ,हो ने हो ई मास्टरक दिमाग खराब भे गेल छै आ किछु दिन रहत त हमर बेटो पागल भए जायत ।मास्टर साहेब के नौकरी सँ निकालि देलकनि ।
गाम मे घूर तपैत रही त एक दिन रघू काका पुछलनि रे बौआ तू त बरका इंजिनियर छें ,एकटा चीज बता दे जे कलकत्ता सँ गाम फोन अबै छैक से एतेक जल्दी अवाज कोना चलि अबैत छैक ।बात एतेक जल्दी कोना सुनाय लगैत छैक ,हम हुनका टेली कमुनिकेसन के विस्तार सँ बुझाबय लगलियैन मुदा काका कहलनि तू त भूत जका बकै छै ,कि बजै छै से किछु ने बुझायल ।बगल मे हमर जेठ सार स्वामीजी बैसल रहथि ओ कहलखीन जे काकाजी हम बुझा दैत छी ,असल मे टेलीफोन मे तार रहै छै से त आहाँ देखने हेबै ?काका कहलखीन, हँ यौ पाहुन कियै ने देखबै ,हमरा गामे दके रेल गेल छै ,रेलक काते दके तार गेल छै ,स्वामी जी कहलखीन ,बस आब अहाँके बुझा जायत ।ओहि तार मे तरे तर भूर कयल छै ,जहाँ कियो फोन करत कि घंटी बाजत आ जौं बात करबैक कि भूरे भूर अबाज कालिका मेल जका तेज मे आबय आ जाय लगैत छैक ,बस गप्प भए जाइत छैक ।काका कहलखीन आब बुझलियैक ।पाहुन बहुत योग्य लोक छथि आ बौआ त अनेरे लेल इंजिनियर भेल ।
हमरा सभक प्रजातंत्रक सरकार की छी ,एकटा मजाक छी । एहि ठाम विशेषज्ञ पदाधिकारीक उपर अनुपयुक्त वोट सँ चुनल नेता बैसल छैक जाहि मे 90 प्रतिशत अबूझ रहैत छैक जेकर स्थित सत्यकामक सेठ जकाँ छैक ।ओना कहक लेल प्रजातंत्री सरकार मे पारदर्शिता रहैत छैक मुदा एहिठाम त सभटा झूठ पर आधारित छैक ।भारत मे सभके वोट देबाक समान अधिकार छैक मुदा वोट मे ठाढ़ होय बाला लेल योग्यता त रहबाक चाही । आइ ए एस ,इंजिनियर ,डाक्टर ,प्रोफेसर ,एवं सरकारक आओर पदाधिकारीक मंत्री त पदाधिकारी सँ योग्य हेबाक चाही ,एहि लेल कियो अवाज नहि उठायत ।ई केहन प्रजातंत्र छैक जेकर सरकारक मुखिया निरक्षरो भए सकैत अछि ।ई देसक दुर्भागय अछि ।हम त कहब एहि सत्यकामक सेठ ,लोहा कारखानाक सेठ आ ऱघू काका रुपी सरकारक मुखिया वोट मे नहि ठाढ़ हुए ताहि लेल अवाज एक संग उठेबाक प्रयोजन छैक आ कि नहि ?
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
उमेश मण्डल-इतिहास- सगर राति दीप जरय
सगर राति दीप जरय
केर
91म आयोजन
संयोजक : दुर्गानन्द मण्डल
स्थान : मध्य विद्यालय परिसर- गोधनपुर
24 September 2016
अयोजक : स्थानीय साहित्य प्रेमी, गोधनपुर (मधुबनी)
प्रस्तुति : उमेश मण्डल
मो. +91 9931654742
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क्र.सं.
स्थान
तिथि
संयोजक
अध्यक्षता/उद्घाटन
पोथी लोकार्पण
लेखक/लेखिका
लोकार्पण कर्ता
अन्य