विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

बाबा लालदास

चन्दना दत्त · 2016-10-15 · अंक 212

आलेख- बाबा लालदास
“जे क्‍यो ई कथा मनदय सुनतीह तनिकाँ सन्‍तति, सम्‍प्रत्ति एवं सौभाग्‍यक वृद्धि होयतन्‍हि। अन्‍तकाल तक धर्मराजक प्रसादेँ निर्भय रहतीह।”
प्रात: स्‍मरणीय माँ सावित्रीकेँ गोड़ लगैत सभ स्‍त्रीगण बड़क गाछमे जल ढारए लगलीह।
“ईकथा बड्ड नीक लगैत अछि सुनबामे, तँए गाछ तर बैसल रहैत छी पिंकी माइक आसमे। हुनकेँ लग छन्‍हि ई पोथी,एक गोटा बजलीह। सुनि हमर माइक ठोरपर मुस्‍की आबि गेल।”
‘हमर परबाबा लिखने छथि’ गवौक्‍ति छलनि हुनकर कथमे।
माइक संग हमहूँ गेल छलहुँ बड़ए गाछ तर। खिस्‍सा-पिहानी नीक लगैत छल सुनबामे। ताहि दिनमे स्‍त्रीक लेल ‘सम्‍पत्ति, संतति आ सोगाह’क महात्ता की अछि से बुझल कहाँ छल? ज्ञज्ञन भेलापर ज्ञात भेल जे ई पोथी ‘स्‍त्री धर्म शिक्षा’ हमर माइक परबाबाक लिखल छन्‍हि,जनिकाँ ओ बहुमूल्‍य थाती जकाँ रखने छलीहकिएक तँ हमर माएकेँ दहेजमे ई पोथी भेटल छलनि। ओ छलाह महाकवि पण्‍डित लालदास।
कतेक अल्‍प शब्‍दमे बाबा लालदास कतेक पैघ आशीर्वाद स्‍त्रीगणकेँ देलखिन्‍ह अछि ई हुनक विचार एवं लेखनीक विशेषता छन्‍हि।
कोनो नारी लेल संततिक की महत्‍व अछि ई हमरा सभकेँ सद्यप्रसवा नारीक ठज्ञेरक मुस्‍की देखि बुझना जाइत अछि जे कोरमे शिशुकेँ लए जखन स्‍तनपान करबैत छथि तँ अपन तमाम कष्‍ट बिसरि जाइत छथि जे ओहि बालककेँ जन्‍म देबा काल उठौने रहैत छथि।
सम्‍पत्तिक महत्ता तँ आदिकालसँ सभ स्‍वीकार कयने छथि मुदा स्‍त्रीगणक लेल अपन घर-गृहस्‍तीकेँ सुचारू रूपसँ व्‍यवस्‍थित रखबाक लेल सम्‍पत्ति भेलाइ अत्‍यावश्‍यक रहैत छन्‍हि। भनहि ओ धन सम्‍पत्तिक अर्जन नहि करैत छलीह मुदा सम्‍पत्तिक संरक्षण करबामे कतेक व्‍योंत लगबय पड़ैत छन्‍हि एहि बातकेँ संयुक्‍त परिवारमे रहनिहार बाबा खूब जनैत छलाह।
सौभाग्‍य तँ स्‍त्रीकेँ नीक पति भेटलाक उपराँते प्राप्‍त होइत छन्‍हि ताहि सौभाग्‍यक लेल सावित्री पिता, नारद मुनि आ अन्‍त धरि धर्मराजोसँ अपन बात मनबा कऽ रहलीह। एहि कथामे ईहो लिखने छथि जे मिथिलामे माए सभ अपन पुत्रीकेँ बाल्‍यावस्‍थासँ लिखाय-पढ़ाय, उत्तम उत्तम उपदेश ओ गृह परिचर्य्या आदि स्‍त्री धर्मसँ सुशिक्षित कय लोक हेतु आदर्श बनबैत छथि।
कोनो धर्म-संस्‍कृति वा संस्‍कारक प्रचार-प्रसार वा संरक्षण समाजमे स्‍त्रीगणेँ द्वारा होइत आएल अछि। आइ जँ विद्यापति विश्‍वप्रसिद्ध भेला तँ एहिमे हुनक काव्‍यकेँ अपन गोसाउनि गीत बनाय, अपन स्‍वरलहरी देबय वाली स्‍त्रीगणक महत्‍व कतहु कम नहि कहल जा सकैछ।
आइ जखन स्‍त्री-शिक्षापर विश्‍व स्‍तरपर जोर अछि। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’क नारा बुलन्‍द भऽ रहल अछि ओतय आइसँ सैंकड़ो वर्ष पूर्व मिथिलाक बेटी सीता-सावित्री अपन आचरण, धर्म-शास्‍त्रक ज्ञानसँ विश्‍वक लेल आदर्श उपस्‍थित कयने छथि। महाकविक लेखनी स्‍त्री धर्म शिक्षासँ रामायण तकमे अपूर्व चललनि।
मकाकवि लालदासकेँ विश्‍वास छलनि जे सीता हिनका रामायण लिखबाक लेल प्रेरित कएल। ‘ब्रह्मर्वेवर्त पुराण’क अनुसारेँ लक्ष्‍मीक जन्‍म कुशध्‍वजक पुत्रीक रूपमे भेलनि। लंकापति रावण अंहकार मदसँ भरल छल ओ हिनक सौंदर्यपर आकृष्‍ट भए लक्ष्‍मीसँ विवाह करबाक लेल उद्दत छल। लक्ष्‍मी रावणक एहि प्रकारक व्‍यवहारसँ क्षुब्‍ध भए सराप देलथिन्‍ह आ तकरे परिणामस्‍वरूप सीताक रूपमे मिथिलामे जन्‍म लेल जे रावण सपरिवार समूल नष्‍ट भए सकए।
लालदास कविवरक हेतु सीता वा माँ मैथिली सर्वशक्‍तिमान छथिन।
मैथिली साहित्‍यमे लालदास सीताकेँ गरिमा प्रदान कएलनि आ मिथिलाक बेटीकेँ सर्वोच्‍च स्‍थान देलनि।
“सीता चरित ललित अनुमानि।
रामकथा भए कहब बखानि।।”
महाकवि लाल दास अपन रामायणमे मिथिलाक सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक चित्रण विशद रूपेँ कएलनि अछि। मुख्‍य रूपेँ गिरिजा अर्चना,सीता अर्चना, परदा प्रथा, विवहोत्सव, अतिथि सत्‍कार, महुअक, डहकन, उचिती, विधकरी, दुरागमन, समदाउन, भार-दउर केर विशेष वर्णन कएलनि अछि।
अपन मातृभूमिक प्रति महाकविकेँ प्रेम हुनक लेखनीकेँ मिथिलाक गौरव गान करबामे दृष्‍टव्‍य अछि-
“जन्‍मभूमि नैहर सीताक। जतय स्‍वयं शिवरूप पिताक।।
शक्‍तिपीठ उत्म स्‍थान। उग्रभूमि सभ भाँति महान।।”
अपन मातृभूमिक वर्णन कए महाकवि मिथिला राज्‍यक शोभा सुन्‍दरता, मिथिलाक उद्यान, नदी, जलाशय, खेत-पथार संगहि मिथिलावासीक सदाचारिता, तपस्‍या,धर्मप्रियता प्रभृतिक वर्णन अनेक दृष्‍टिसँ कएलनि। ई मर्त्‍यलोकमे मिथिलाक तुलना सुरलोकक विष्‍णुधामसँ कयने छथि-
“आसमान मिथिलापुरी, रवि सन तेज प्रचण्‍ड।
बुझि पड़ अनुमप देश जनि, महिगत स्‍वर्गक खण्‍ड।।”
मिथिलाकेँ प्राकृतिक सौन्‍दर्य अनुपम अछि। गाछ-बिरीछ, नदी, पोखरि, जीव-जन्‍तु चिड़ै-चुनमुनीक विविधता कविवरक लेखनीमे मुखरित भए आएल अछि। यथा-
“कति विध मृग पशु-जन्‍तु बिराज
से जनि तपसिक प्रजा-समाज,
गरजे मृगपति बैर-बिहाय
मुनि पहरा तनि पड़ए सदाय,
शुक पिक चातक चक्र चकोर
गुंजय मधुकर मधुर सुराग
वीण वाद्य सम सुनि प्रिय लाग...।”
ऐ प्रकारेँ हम कहि सकैत छी जे बाबा लालदास जे उद्भट विद्वान, शक्‍ति पूजक, गद्यकार, चित्रकार, लिपिकार, भाषाविद्, कलाकार,समाज सुधारक, राष्‍ट्रीय चेतनाक सम्‍पोषक, ओजस्‍वी वक्‍ता छलाह।
हुनक विराट व्‍यक्‍तित्‍व आ नवीन मार्ग प्रदर्शक तथा उदार दृष्‍टिकोणक फलस्‍वरूप हम कहि सकैत छी गर्वसँ कि हम एहन जातिसँ छी जतय सभ महिला साक्षर छलीह आ ई महाकविक देन छल। किएक तँ दहेज स्‍वरूप एहन अनमोल पोथी बेटीकेँ देल जाइत छल जे ओ बेटी सभ दुहू कुलक नाम रौशन करैत छलीह।
महाकवि लालदास निज भाषानुरागी छलाह। माँ मैथिलीक संग अपन मातृभाषाक हुनक प्रेम मैथिलीक प्रति लिखल एहि पंक्तिमे देखल जा सकैछ-
“निज भाषा जननी निज देश
स्‍वर्गोसँ जानथि जन वेश।”
आखिरमे हम खड़ौआक माटि-पानिक प्रति अपन भाव कहब। हमर माँ-पापाक विवाहक पचासम वर्षगाँठ छल- 16 मई 2012 केँ। फारबिसगंज स्‍थित निज निवास आचार्यपूरीमे, छोट-छीन कार्यक्रमक संग हम सभ भाए-बहिन आ बहुत रास परिजनक संग हमर प्रिय नानी सेहो उपस्‍थित छल। पूजा-पाठ भोज भातक पश्‍चात रात्रिमे नाति-नातीन, पोता-पोती सांस्‍कृतिक कार्य-क्रमक आयोजन भेल। सभ खूब आनन्‍दित छल।
धिया-पुताक नाच-गानक पश्‍चात हम मायसँ पुछलहुँ- “अहाँ अपन विवाहक पश्‍चात पापासँ गप्‍प-सप्‍पक किछु प्रसंग कहू।”
माँ बजलीह- “ई तँ विवाहेक रात्रिसँ हमरा अंगरेजी सिखबय लगलाह, मुदा हम लालदासक परपोती अपन मैथिली कोना छोड़ितहुँ।”
ताहिपर हमर बड़की बहिन ‘पिंकी दीदी’ चुटकी लेलक-
“अंगरेजीक विभागाध्‍यक्ष हमर बाबूजीकेँ माँ मैथिली लिखबा कऽ मानल तहन ने साहित्‍य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्‍करसँ सम्‍मानित भेलाह।”
सम्‍पर्क-
राँटी (मधुबनी)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: चन्दना दत्त. “बाबा लालदास.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 212, 2016-10-15. https://www.videha.co.in/research/2016/212/बाबा-लालदास.htm

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