विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्यमे

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2016-10-15 · अंक 212

सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्य मे
भारतीय लोक आ शाश्त्र दूनू परंपरा में सुग्गा अपन विशिष्ट स्थान आदि काल स रखने अछि। सुग्गा सिनेह, प्रेम, ज्ञान आ श्रृंगार के प्रतीक मानल जैत अछि। अनेक कथा समस्त भारतवर्ष में भेटत जतए सुग्गा अपन बुद्धिमानी स अलग कीर्तिमान स्थापित केलक। जायसीक महाकाव्य पद्मावत में हीरामन सुग्गाक भूमिका के नहि जनैत अछि। कोना हिरामन राजकुमारी पद्मावती अथवा पद्मिनी संग अपन समय बीतबैत छल; कोना पद्मिनी अपन प्रेमक बात आ विवाह नहि होबाक टीस ओकरा संग बाटैत छली; आ कोना हीरामन सुग्गा सिंहलद्वीप के राजकुमारी पद्मावती आ चित्तोडगढक राजा रत्नसेन केर प्रेम में सुत्रधारक भूमिका के निर्वहन करैत अछि, के बारे में सबके बुझल अछि। बात मैथिली लोकगीत में सुग्गाक स्थान पर क रहल छी ताहि पद्मावत के प्रसंग पर विस्तार सं नहि जा रहल छी।
अगर लोक व्यव्हार के बात करी त मिथिला समाज में सुग्गा आ आनो चिरै-चुनमुन एवं जानवर सबहक अपन भूमिका अछि। ओकरा मानवीकरण कए ओकर भाव के देखल जैत छैक। लोक अपन बच्चा, प्रिय लोक, जमाय के सुग्गा कहि संबोधित करैत छथि। ओ बच्चा जकर स्मरण शक्ति तीक्ष्ण होइत छैक तकरा सुग्गा कहि संबोधित कैल जैत छैक।माय, पितियाईन, नानी, दाई इत्यादि अपन बच्चा के सुग्गा कौर, मेना कौर कहि क भोजन खुअबैत छथि। नायक अथवा नायिका के नाक अगर बड्ड सुन्दर छैक त ओकरा सुग्गाक ठोर या चोंच स उपमा देल जैत छैक। मधुर बोली के सुग्गा सनहक बोली कहल जैत छैक। स्त्रीगन सब फ्रेम में कुरुश स सुग्गा मेना बनबैत छली. मिथिला चित्रकला में आ कोहबर घर में स्त्री आ पुरुष सुग्गा के स्नेहालिंगन अवस्था में बॉर्डर पर चित्रित कैल जैत छैक। स्नेहालिंगन के ठेठ मैथिली में लटपटायल अवस्था कहल जैत छैक। मिथिला चित्रकला में बॉर्डर पर वैह लटपटिया सुग्गा आपस में एक दोसर के पकड़ने चोंच में चोंच सटेने अंकित रहैत छैक। कोबरघर में एहि चित्रांकन केर उकेरबाक तात्पर्य ई रहैत छैक कि जेना सुग्गा के पति-पत्नीक जोड़ी में प्रेम रहैत छैक तेहने प्रेम, सिनेह आ आकर्षण एहि वरआ कनिया में बनल रहैक। दुनु एक दोसर स कहियो अलग नहि हो। दुलहिन स्त्री सुग्गा आ दुलहा पुरुष सुग्गा बनि जैत छैक। सुग्गा स्नेहक संग-संग सौन्दर्य आ रंगक प्रतिबिम्ब सेहो बनि जैत छैक। अगर बड्ड सुन्दर हरियर रंग केर सारी अथवा नुआ छैक त ओ सुगबा रंग अथवा सुगापंखी रंग कहेतै। लाल रंग केर मान्यता तखन स्थापित हेतैक जखन ओकर तुलना सुग्गाक ओठ स कैल जेतैक। सुग्गा स सिनेह अतेक जे ओकरा सोनाक पिंजरा में रखबाक कल्पना कैल जैत छैक।
मैथिली लोकपरम्परा में सुग्गा बड्ड महत्त्व रखैत अछि। दुटा एहेन दन्तकथा मिथिला भूमि में व्याप्त अछि जाहि में सुग्गाक भूमिका के बेर-बेर स्मरण गर्व स कैल जैत अछि।पहिला कथा सीता सं सम्बंधित अछि आ दोसर कथा आदि गुरु शंकराचार्य के महापण्डित मंडन मिश्रक गामक यात्रा सं। एहि आलेख के आगा बढ़ाबी ओहि स पहिने ई दुनु दन्तकथा के बुझब जरुरी।
प्रारंभ सीताक प्रसंग सं करैत छी। मिथिला में सुग्गा आ सीता के लऽ कऽ एकटा दन्तकथा प्रचलित अछि। बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी में भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से काम।
झुला लागल प्रेमक डाली।
झुलथि सीता प्यारी ना।।
सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर में गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान में मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ में प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली।
सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल में आनि पिंजरा में राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत!
राजमहल में अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी में सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ीमनुखक आवाज़ में मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी में स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"।
सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी में स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा में बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा में देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली।
ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरुहमर पत्नी के बदला में अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा में बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक।
अपन पत्नी के प्रेम में मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल में आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन!
बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट में हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!"
कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना में मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल में कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी।आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था में घर स निकालि देता”।
आव सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन।
आब दोसर दन्तकथा दिस बढ़ी। दोसर दन्तकथा शकाराचार्य आ महापण्डित मंडन सं जुड़ल अछि। मिथिला में अगाध पण्डित आ विद्वान सब भारतवर्ष केर सब कोनस अबैत छलाह। अतए अर्थात मिथिला में परम्परानुसार एक बेर में अनेक दिन धरि चलए बला शास्त्राथ में जीवन-जगत सं संबंधित विषय एवं उप-विषय पर वाद-विवाद चलैत छल। जे विद्वान शास्त्रार्थ में जितैत छला हुनकर विशेष सम्मान होइत छल। मान्यता ई अछि जे शंकराचार्य मिथिला के परम विद्वान आ कुमारिल भट्ट केर शिष्यमहापण्डित मंडन मिश्रक प्रसिद्धि सं प्रभावित भ स्वयं हुनका सं भेट करक हेतु आ शाश्त्रार्थ करबाक हेतु भ्रमण करैत मंडन केर गाम पहुचला। गामक इनार पर पनिहारिन सब पानि भरैत आपस में संस्कृत में वार्तालाप क रहल छलि। शंकराचार्य पनिहारिन सबके पुछलथिन: “महापण्डित मंडन मिश्रककुन घर छनि?”पनिहारिन में स एक महिला आगा अबैत बजली: “आगा बढ़ल जाऊ। जाहिदरबज्जा पर सुग्गो आपस में शास्त्रार्थ करैत हो, वैह घर महापण्डित मंडन मिश्रकहेतनि”। शंकराचार्य अपन शिष्य मण्डलीक संग आगू बढ़लनि। कलम, पोखरि, बसबट्टी, फुलक कियारी, लहलहातइत हरियर धानक खेत होइत थोरेक काल में महिषी गांव पहुंचला। महापण्डित मंडन मिश्रक घर ताक में कुनों दिक्कत नहि भेलनि। एक घर के दरबज्जा पर पिंजडा में सुग्गा आपस में शास्त्रार्थ क रहल छल। शंकराचार्य के भांगठ नहि रह्लनि जे यैह घर महापण्डित मंडन मिश्रक छनि।
आब लोकगीत केर आंगन में प्रवेश करी आ देखी जे सुग्गा अपन कहेन स्थान बनेने अछि। एक नायिका के दर्द देखू. बेचारी के पति परदेस गेल छैक। बहुत दिन भ गेलैक परदेस स गाम एला। अखाढ़ मास समाप्त होम पर छैक लोक खरही काटि घर लग जमा करैत अछि। कथी लेल? जे घर के छारत। मनुखक त बाते छोडि देल जाओ चिरै-चुनमुन सब एक-एक खर के चुनि अपन खोता अथवा नीड़ के निर्माण क रहल अछि। सब आब मधुमास अर्थात बरसात में अपन-अपन जोड़ी संग रहत। मधुमसक मिलन यामिनीक सुख भोगत। देह आ नेह एक बनतैक। मुदा हाय रे दुर्भाग्य! बेचारीक कंत त एखनो परदेसे में छैक।लगैत अछि जे नायिका अही वियोग स शरीर ने त्यागि दे!
अखाढहि मास अखाढी रोप कि नब खरही सब काटए लोक
चिडै चुनमुनी सब खोता लगाएल कि हमरो कंत रहल
घर छोडि कि हम मरि जइहें।।
छठि माता के प्रसन्न करबाक हेतु महिला सब रंग-विरंगक गीत गबैत घाट दिस जैत छथि। हरेक गीत में प्रसाद सामग्री के वर्णन, विधक विधान, माता के गुणगान, आ सुचिताक ध्यानक वर्णन रहैत छैक। एक गीतक दू पांति देखू जे केना ओहि में सुगा के वर्णन अछि। कांच बांस के आधार बना केराक दू घौर के बीचो बीच फसा देल गेल छैक। दुनु कात घौर में हत्थाक हत्था पाकल-पाकल पीयर-पीयर केरा लुबझल छैक। केरा के आकर्षण देखि झुण्डक झुण्ड सुग्गा ओहि पर लुधकि रहल छैक। पबनौतिन मनुख जकां सुग्गा के बुझबैत छथिन के हे सुग्गा ई केराक घौर छठि महरानी के निमित्त छैक। एहि पर तों चोंच मारि एकरा अपित्र नहि कर। जखन पूजा पूरा भ जेतैक त तोरा तोहर हिस्सा भेट जेतौक।सम्बाद एहेन जेना सुगा एक एक शब्द के बुझैत हो आ आज्ञा के मानबक हेतु तत्पर। ई भेल लोक परमपरा में मनुख आ चिरै के बीच तारतम्य आ सामंजस्य।
कांचहि बांस के बगहिया बह्गी लचकत जाए
केरा फरल घौर स ओहि पर सुगा मंडराय
छठि महरानी के दोसर गीत में कनि पबनौतिन तमसा जैत छथि कियैक त सुग्गा कनि लुबधि-लुबधि क आवश्यकता स अधिक परेशान क देने छनि। अहि बेर गीत में ओकरा सावधान भ जएबाक लेल कहैत छथिन: “देख सुग्गा! बड्ड भ गेल. लाख बुझेलाक बादो तों समरह के नाम नहि ल रहल छै। कहि देल्युक ने जे ई केराक घौर छठि महारानी के निमित्त छैक! मुदा तों आजिज क देलै। आब किछु नहि कहबौ। बौआ के पिताजी आबि रहल छथिन बन्दुक हुनका संगे छनि। गोली मारि देथुन। फेर हमरा नहि कहिहैं जे सावधान नहि केलयौक?” ई भेल लोकक चिरै आ चुनमुन के प्राति सिनेह। जेना माय अपना बच्चा के डरबैत छथि तहिना ओही सिनेह आ अनुराग स पबनौतिन सुग्गा के डरा रहल छथि। गोली मरबाक बात होइत छैक। मारल नहि जैत छैक। एहन अवस्था में जौ प्रकृति आ संस्कृति में समन्वय नहि बनत त कोना बनत?
जखन वर बरियाती संगे कन्या के घर पर प्रवेश करैत अछि त बरक सुन्दर छवि देखि सासु गदगद भ जैत छथि। बरक मनमोहक छवि के तुलना सुग्गा सं कैल जैत अछि। महाकवि विद्यापति सेहो अपन पदावली में एक गीत में वरक सुन्दरता सुग्गा स करैत छथि।जमाए केर तुलना सोभनगर सुग्गा सं करैत सासु आ बूढ पुरान महिला सब प्रसन्न भ रहल छथि. धिया के भाग्य पर गुमान भ रहल छनि। गीत गाबि-गाबि सोचैत छथि जे ई जे अतेक निक सुग्गा रूपी जमाए छथि से कत स आबि क नेह लगेने छथि? ई सबहक मनमोहना कत बसेरा बनेने छथि? ई सोभनगर सुग्गा अपन गाँव स आबि सासुर में बसेर केने छथि आ सासुरक लोक सभ सं नेह लगेने छथि। हुनकर ससुर पिंजरा बना ओहि में एहि बर रूपी सुग्गा के बझा रखने छथि। पिजरा शब्द दुलहिन लेल कैल गेल छैक. सुग्गा जखन पिजरा में रहत त ओकरा आहार चाही। से आहार देबाक जिम्मेदारी सासु के देल गेल छनि। एहेन आहार देथु जाहि स सुग्गा के उचाट नहि लागै। संगहि सासु के इहो डर भ रहल छनि जे सुग्गा के जखन पाँखि झमटगर आ मजबूत भ जेतैक त भागि ने जाय? ताहि सासु एहो कहैत छथि जे एहेन सुग्गा के पोसने की लाभ।थोरेकबे दिनक बाद ई अपन घर चलि जायेत। आखिर जमाए रूपी सुग्गा कतेक दिन सासुर रूपी पिजरा में सासु हाथक चारा अर्थात व्यन्जन खा रहत? विद्यापति कहैत छथि जे ई गौरी रूपी दुलहिन के भाग्य छनि जे साक्षात् महादेब रूपी मनमोहक वर भेट गेल छनि। हे दाइ-माइ हुलसित भ गीत नाद गाऊ आ विध-बेभार करू।
कहमाँसँ सुगा आयल, नेह लायल।
कहमा लेल बसेरा सुगा मन मोहल।
फल्लां ठासँ सुग्गा आयल, नेह लायल।
फल्लां गाम लेल बसेरा, सुग्गा मन मोहल।
फल्लां ससुर पिजुरा गढ़ाओल, सुग्गा बझाओल।
हे फल्लां सासु देथु आहर सुग्गा मन मोहब।
एहन सुग्गा नहि पोसब जे पोस ने मानत।
हे सुगबा होयत उड़ाँत, अपन गृह जायत।
एहन सुग्गा हम पोसब जे पोस मानत।
हे सुगबा होयत बुधियार, पलटि फेर आओत।
भनहि विद्यापति गाओल, फल पाओल।
हे गौरी केँ बढ़नु अहिबात, सुन्दर बर पाओल।।
विवाह के समय में जखन बरिआत के संग वर अपन सासुर विवाह करक हेतु प्रस्थान करैत अछि त दरबज्जा परदाई-माई सब बरिआती लेल रंग विरंगक गीत समवेत आ उच्च स्वर में गबैत छथि। वर्णन होइत अछि बरिआतिक साज के, श्रृंगार के, उत्साह के, तैय्यारी के, वस्त्र विन्यास के। बरक पितामह एक चीज़क व्यवस्था त पितामह के भाई दोसर चीज केर व्यवस्था में लागल छथि।कियो बाजा-गाजा के व्यवस्था में त कियोकआन चीजक। एक आदमी हरियर सुग्गा के पिजरा के सजा रहल छथि कारण विवाह में सुग्गा नहि जैत से कोना? गीत इहो बतबैत अछि जे बरिआती दल के सदस्य के कत-कत ठहराएल जैत। सुग्गा सेहो ओना थोरे ने जैत? पूरा बनि ठनि क जैत।चिरै रूपी सुग्गा वरक ससुर के पोखरिक भीड़ पर चानन गाछ के ठारि पर बैसत आ वर रूपी सुग्गा अपन सासु के बनाओल कोहबर घर में दुलहिन संगे बैसता।सुगा के फल भोजन करक लेल देल जेतैक आ रहबाक लेल सोनाक पिजरा। बरिआत सब दरबज्जा पर विश्राम करता। आंगन केर सोझा में आजन-बाजन राखल जैत। बरिआती सब के लाल पीयर धोती पहिरक हेतु देल जएतैक। सुग्गा, सुग्गा संग सोनाक पिजरा आ फल भोजन जेना अनिवार्य होइक? बरिआतक लोक सब धोती पाबि प्रसन्न भ जेता आ जमाए बेटी देख खुश भ जेता।
कोने बाबा साजल आजन बाजन
कोने बाबा साजु बरिआत हे।
कोने बाबा सजथु हरियर सुगबा
सुगा लय जायब बरिआत हे।
बड़का बाबा साजल आजन बाजन
मझिला बाबा साजु बरिआत हे।
छोटका बाबा साजथु हरियर सुग
सुगा लय जायब बरिआत हे।
कहमा बैसायब आजन-बाजन
कहमा बैसायब बरिआत हे।
कहमा बैसाएब हरियर सुगा
सुगा लय जायब बरिआत हे।
पोखरि बैसायब आजन-बाजन
दुअरे बैसायब बरिआत हे।
पिजड़े बैसायब हरियर सुगा
सुगा लए जायब बरिआत हे।
कथी लए जायब बरिआत हे।
कथी लय बुझायब बरिआत हे।
कथी लए बुझायब हरियर सुगा
सुगा कथी लए बुझायब जमाइ हे।
टारा लए बुझायब आजन-बाजन
धोती लए बुझायब बरिआत हे।
फल लए बुझायब हरियर सुगा
बेटी लए बुझाएब जमाइ हे।
एहेन जमइया कतहु ने देखल
सुगा लए आयल बरिआत हे।
दोसर बरिआत गीत में एहेन कल्पना कैल जैत अछि जे दुलहा घुमबाक हेतु तथा खेलबाक हेतु बहुत दूर हरियर क्षेत्र दिस चलि जैत छथि। रस्ता में अनेक तरहक गाछ-बृक्ष, पोखरि, फुलवारी भेटैत छनि।जैत-जैत एक गाछ पर सोहनगर हरियर कचोर सुग्गा भेटैत छनि जकरा पकडि क ल अबैत छथि। सुग्गा मांझ आंगन में बैस जैत अछि आ रुसि रहैत अछि जे ओकरा सेहो बरिआती जएबाक छैक। मुदा बरिआती में ओना थोरे ने जैत सुग्गा। सुग्गा के ओहि लेल अँगिया आ टोपी चाही। ओ सजि क सुन्दर बनि क बरिआत में जाए चाहैत अछि। सुग्गाक अतेक मानवीकरण केवल लोकगीत में भ सकैत अछि। आगा- आगा देखैत जाऊ सुग्गा के नखरा। सब बरिआतिक सदस्य दरबज्जा पर स्थान ग्रहण केलक। अतए सुग्गा के एकाएक चिरै छी ताहि बातक अनुभूति भेलैक। ताहि बरिआती के कन्या पक्ष के ओतए पहुचला उत्तर सुग्गा एक आमक गाछक ठारि पर चढि गेल आ ओतए स सब विध व्यवहार देखि पुलकित होइत रहल। सुग्गा के ठोर बड्ड रमनगर। जेहने सुग्गा के ठोर तेहने वरक ठोर। सासु आनंदे बताहि। प्रेमाधिक्य में मातलि कखनो सुग्गा के ठोर निहारथि त कखनो जमाय के ठोर आ नैन नक्श। सासुरानी के फेरो इहो डर बीच-बीच में भ रहल छनि जे कियोक दाई-माई कुनो करामात ने क देथि! की पता नजरि लागि जैक सुग्गा के, जमेईया के, या दुनु के? इहो सोचैत छथि जे सुग्गा त वनक प्राणी अछि ताहि अंतत वन में वापस चलि जैत मुदा बेटी आ जमाए त कम-स-कम थिर भ क रहत ने!
हमरो दुलहा के फलां दुलहा
खेल जेता बड़ी दुर हे।
ओत स जे लएला दुलरुआ हरियर सुगबा
सुगबा बइसल माँझे ठाम हे।
सभ केओ साजल जाइ बरिअतिया
सुगा लेल अंगुरी पसारि हे।
हमहु त लेब बाबा अँगिया टोपिया
हमहु त जायब बरिआत हे।
सभ बरिअतिया अटकल दरबज्जा
सुगबा अटकल आमक ठारि हे।
सभ केयो निरेखथि जाइत बरिअतिया
सासु निरेखि सुगा ठोर हे।
आइ हे माइ पर हे पड़ोसिन
सुगा जुनि नजरि लगाउ हे।
वनहि के सुगबा बनहि उडि जायत
रहि जायत धीअहि जमाई हे।
झरनी जे मिथिलाक मुसलमान महिला सब आ ओकरा संगे कतौं-कतौं हिन्दू सब सेहो दहा संगे चलैत रहैत अछि आ गबैत रहैत अछि। यद्यपि झरनी उदासी के तर्ज पर आ तेज़ी स चलैत बटगबनी जकां गैल जैत छैक जाहि में मक्का मदीना आ हसन हुसैन के सहादत केर गुणगान तथा हुनकर सौन्दर्य एवं सौर्य केर गाथा गैल जैत छैक। माहोल उदास मुदा जोश आ ओज सं भरल।लोक अही बहाने हसन आ हुसैन के कुर्बानी के याद करैत अछि। हसन आ हुसैन मोहम्मद साहेब केर नाति छला। इस्लाम, न्याय आ शांति के रक्षा के लेल अपन जान गमा लेला मुदा सत्य केर रस्ता सं नहि भटकलनि। हुनकर सहादत केर गाथा कतौं अज़ादारी त मिथिला में झरनी के रूप में गैल जैत अछि। केवल चरित्र अरब के होइत छैक मुदा चित्रण स्थानीय भावक अनुकूल। उपमा आ अलंकार वैह जे मिथिलाक लोक उदासी में अथवा आर कुनो कारुणिक गीत में प्रयुक्त करैत छथि। गीत गेबा में सेहो हिन्दू महिला जकां मुसलमान महिलाक प्राबल्य।
एक झरनी में छाती पिटैत महिला सब गबैत छथि हाय अल्ला सुन्दर आ सोहनगर लाल सुग्गा के जन्म कोन ठाम भेल आ कोन ठाम ई दुनु भाई अर्थात हसन आ हुसैन जन्म लेलाह? फेर उत्तर में बजैत छथि जे पर्वत पर हरियर गाछ पर ललका सुग्गा जन्म लेलक आ अरब के मक्का शहर में हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के जन्म भेलैक। हे दाई- माई, कथी खुआक क लाल सुग्गा के हम पोसब आ कथी खुआ क दुनु बच्चा के? चारा अथवा आहार खुआ क सुग्गा के पोसब आ दूध पिया क हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के प्राण बचायेब। सोना के पिजरा में सुग्गा के बाजब सिखायेब आ इसकुल में भेज क दुनु बच्चा के पढ़ेएब। अगिला अंश में उदासी प्रबल भ जैत छैक। गीतक बोल कहैत छैक जे लाल सुग्गा उड़ात भेला पर कत उडि जैत आ बच्चा नमहर भेला पर कत चलि जैत? प्रश्न आ उत्तर के तर्ज पर झरनी गैल जैत अछि। एहि प्रश्न के उत्तर में कहल जैत छैक की उड़ात भेला पर सुग्गा फेरो पर्वत पर उडि जैत आ दुनु बच्चा नमहर भेलाक बाद मक्का चलि जेतैक कारण ओकरा धर्म केर रक्षा करबाक छैक।
एहि झरनी के गंभीरता स देखला आ मनन केला सं ई अनुभूति होइत छैक जे उदासी आ झरनी में कतेक समानता छैक। जमाए के जखन सुग्गा स तुलना हिन्दू महिला सब अपन गीत में करैत छथि त कहैत छथि: “वनक सुग्गा वने उडि जायत”, “सुगबा हैत ओड़ियात अपन घर जायत” आदि। अतए पहार स सुग्गा अबैत छैक आ पहार में वापस चलि जैत छैक।
हाय-हाय कहमा जलम लेल लाल एक सुगबा
कहमा जलम दुनू बचबे हाय।
हाय-हाय परबत जलम लेल लाल एक सुगबा
मक्का जलम दुनू बचबे हाय।
हाय-हाय कथिये खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा
कथिये खिअयबइ दुनू बचबे हाय।
हाय-हाय आहरा खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा
दुधबा पिलयबइ दुनु बचबे हाय।
हाय-हाय कथिये पढ़ेबइ हम लाल एक सुगबा
कथिये पढ़ेबइ दुनू बचबे हाय।
हाय-हाय पिजड़े पढ़ेबइ हमें लाल एक सुगबा
इसकुल पढेबइ दुनू बचबे हाय।
हाय-हाय कहाँ उडि जेतइ लाल एक सुगबा
कहाँ चलि जेतइ दुनू बचबे हाय।
हाय-हाय परबत उडि जेतइ लाल एक सुगबा
मक्का चलि जेतइ दुनू बचबे हाय।।
मुसलमान महिला में हरियर रंग के सारी अथवा आनो वस्त्र के क्रेज रहैत छैक। हरियर के झरनी में सुगबा रंग कहल जैत छैक। एक अन्य झरनी में महिला सब अपन उत्सव आ सिंगारक चर्च करैत छथि। अते स्थान, उपमा, अलंकार, विधान सब खांटी देसी भ जैत छैक।झरनी के प्रकृति प्रश्न आ उत्तर सं छैक। एहि गीत में गीत गाईन सब अपने में चर्च करैत प्रश्न करैत छथि जे हाजीपुर, पटना आ बेतिया शहर के जा रहल छैक? फेर उत्तर दैत कहैत छथि, पिताजी हाजीपुर, भैया पटना आ पतिदेब बेतिया शहर जा रहल छथि। कथी लेल? पिताजी सुग्गा रंगक सारी लेबाक लेल, भैया कंगना लेबाक लेल आ पतिदेब माथक सिन्दुर लेबाक लेल। देखू कोना स्थानीय परंपरा में रंगा जैत छथि मुसलमान स्त्रीगन मिथिला में। सिन्दुर आ सोहाग के महत्त्व एकाएक प्रबल भ जैत अछि। धर्म अपन स्थान पर मुदा स्थानीयता कुनो कम थोरे? अगर सिन्दुर हिन्दू स्त्रीक श्रृंगारअइहबहोबाक प्रमाण त मुसलमानस्त्रीगन केलेल कियैक नहि। फेर गीत लिखनिहार आ गेनीहारिके के रोकि सकैत अछि?
हाय-हाय के जयतै हाजीपुर के जयतै पटना
के जयतै बेतिया शहरबे हाय।
हाय-हाय बाबा जयतै हाजीपुर भैया जयतै पटना
स्वामी जयतै बेतिया शहरबे हाय।
हाय-हाय के लयतै सारी सुगबा के लयतै कंगना
के लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय।
हाय-हाय बाबा लयतै सारी सुगबा भैया लयतै कंगना
स्वामी लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय।
हाय-हाय के पहनतै सारी सुगबा के पहनतै कंगना
के पहनतै सिर के सिन्दुरबे हाय।
हाय-हाय अम्मा पहनतै सारी सुगबा भऊजो पहनतै कंगना
हमें पहनबै सिर के सिन्दुरबे हाय।
हाय-हाय फाटि जयतै सारी सुगबा टूटी जयतै कंगना
रहि जयतै सिर के सिन्दुरबे हाय।
अपन एक छोट कविता फूलडालीक कनेर में कवि कृष्णमोहन झा लिखैत छथि
जिलेबीक काँट जकाँ
हम अहाँक धानक लाबा सन तरबा मे गड़ि जायब
आ किछु दिन धरि बिसबिसायब।
चतुर्थीक औंठी आ बरसाइतक मेहदी जकाँ
हम अहाँक विकल संसर्ग मे आयब
आ असंख्य सुग्गा बनि
अहाँक मोन मे उड़ियाएब।
कवि नायिका के अंतःकरण के बुझैत छथि। ह्रदय में प्रवेश करबाक हिम्मत रखैत छथि। कहैत छथिन जे झुण्डक झुण्ड सुग्गा जकां नायिका के स्मृति में बेर-बेर आबि अपन होबाक प्रमाण देता. नायिका टीस में पतिक अथवा प्रेमीक अनुभूति करैत रहती।
भगबान केर भजन, प्राति, उदासी आदि में मनुख त मनुखे भगबानो के सिनेहवससुग्गा बना क हुनकर सौन्दर्य, वात्सल्य, मनोहर स्वरुप के लोक स्मरण करैत अछि। कृष्ण लेल सुग्गा मनमोहन त जन-जन के कंठ में जेना रचल बसल हो।भगबान कृष्ण केर मथुरा सं द्वारका केर यात्रा लोक के अतेक दुखी क दैत छैक जे सखी बहिनपा सब अपन जीवन के उद्देश्यहीन बुझैत छथि। पूरा नगर उदास अछि। कखनो मोन होइत छनि जे यमुना के कारी, तीव्र गति सं चलैत अथाह पानि में डूबि क आत्महत्या क लेथि त कखनो होइत छनि जे जहर-माहुर खा प्राण के समाप्त क ली। हे निर्मोही कृष्ण कोना अहाँ मथुरा छोरि सबके ह्रदय दुखा सुग्गा जकां पिजरा सं बाहर निकलिते द्वारका चलि गेलौं? कनिकबोदरेग नहि भेल?
अहि तरहे लोक अपन व्यवहार, संस्कार, संस्कृति सं सुग्गा आ अन्य चिरै-चुनमुन संग प्रेम आ सामंजस्य स्थापित केने अछि। हलांकि तथाकथित आधुनिकता, विज्ञान, विज्ञानक प्रयोग आ मनुष्य केर नित नूतन खोज एहि तरहक परम्परा के शनै शनै कमजोर केने जा रहल अछि। लोक सब अहि तरहक समंजस्य के बिसरल जा रहल अछि। ई कुनो अर्थ में निक बात नहि। सुग्गा आ मैनाक कथा ग्राम्य जीवन स समाप्त भेल जा रहल अछि आ किताब में सिमटल जा रहल अछि। खेत खरिहान, जंगल, पर्वत, पोखरि, गाछ सब खत्म भेल जा रहल अछि। सुग्गे नहि आरो चिरै-चुनमुन धीरे-धीरे अतितक वस्तु बनल जा रहल अछि।अगर संस्कृति के ओ स्वरुप जे सब के संगे चलबाक सामर्थ्य रखैत अछि समाप्त भ जैत त किछु नहि बचत।सब के एहि विषय पर गंभीरता स सोचबाक चाही आ संतुलन के सिद्धांत के मनबाक चाही।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल- लघु कथा-

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्यमे.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 212, 2016-10-15. https://www.videha.co.in/research/2016/212/सुग्गा-आ-श्रृंगार-मैथिली-लोकगीतक-परिदृश्यमे.htm

मूल विदेह अंक / Original issue