छागरक बलिप्रदानपर चिन्तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्य
हम सोभाव आ कर्मसँ परम्परावादी छी। परम्पराकेँ मानबो करै छी आ परम्पराक सम्बन्धमे लिखबो करै छी तथा परम्परेमे जीवितो रहलौं अछि। परम्परामे बहुत नीको बात सभ अछि तेकरा बारेमे लोककेँ जाग्रत सेहो करैत रहै छी। परम्परा आ प्रकृतिमे सामंजस्य देखैत छी। मुदा परम्पराक पालन, प्रशंसा आ लेखनमे साकांक्ष सेहो रहै छी। परम्परा जे लोक विरूद्ध नहि हो, परम्परा जे हिंसक नहि हो, परम्परा जे केकरो शोषण अथवा दोहनक पुष्टि नहि करैत हो, वएह परम्परा अनुकरणीय परम्परा अछि...।
जखन परम्पराकेँ अमानवीय पक्षपर कियो बात करैत अछि तँ ओकर विरोध होइत छइ। आ एक टटष्ठ शोधार्थी अथवा समाजिक बेकतीकेँ एहि तरहक विरोध सहबाक लेल तैयार रहक चाही। कनी सोचु, अगर राजा राममोहन राय सती-प्रथाकेँ विरोध नहि केने रहितैथ तँ आई की स्थिति रहैत? कोना परम्पराक नामपर जीबैत स्त्रीगणकेँ हुनक पतिक संग चितामे बलपूर्वक झोंइक हुनका जरा देल जाइ छल? आ लोकक सतीमाता केर जयकारक नादमे जरैत महिलाक दर्द, पीड़ाकेँ दबा देल जाइत छल। अखनो जखन परम्पराक नामपर मधुश्रावनी पाबैनमे नव विवाहित महिलाक ठेहुनकेँ टेमीसँ दागल जाइत अछि तँ हम इतिहासक गर्तमे चलि जाइ छी। जहिया सती जरैत छेली! मुदा नचार भऽ परम्पराक समक्ष अपने-आपकेँ असहाय बुझैत छी। छोटे स्तरपर किएक नहि, अपन विरोध अवश्य दर्ज करा लैत छी। जखन हमर विवाह भेल तँ अपन मधुश्रावनीमे हम किनको अपन पत्नीक ठेहुन दगबाक अनुमति नहि देलिऐन। थोड़ेक उपहासक पात्र बनलौं। स्त्रीगण सभ कियो ‘मौगियाह’ तँ कियो ‘घमण्डी’ कहलैन। सुनि लेलौं, मुदा ‘नइ’ कहि देलिऐन तँ नहियेँ करए देलिऐन।
आब अबैत छी छागरक बलिदानक प्रथापर। अपन अनुभवक अधारपर कहि सकैत छी जे ई प्रथा बड्ड नीक परम्परा नहि अछि। छागरक बदला किछु और व्योंत हेबाक चाही जाहिसँ एहि प्रथाक अन्त हो। उत्सव, संस्कार विशेष रूपेण दुर्गापूजा, केतौ-केतौ काली पूजा, उपनयनमे घरक कुलदेवी अथवा कुलदेवताक समक्ष किंवा ब्रह्मस्थान आदिमे छागरक बलिदान जेना मनकेँ विचलित कऽ दैत अछि..!
एहि बातकेँ अपन जीवनक दू अनुभवसँ जोड़ि कऽ देखै छी। एकमे नेना रही तँए लाचार आ दोसरमे परम्पराक आड़िमे माँ, बहिन, भाय लाचार कऽ देने छला। एक घटना पाबैन– दुर्गापूजासँ सम्बन्धित तँ दोसर संस्कार– उपनयन-सँ सम्बन्धित अछि।
प्रारम्भ प्रथम घटनासँ करैत छी। नेना रही तँ दुर्गापूजा सँ सात मास पहिनहि एकटा छागर माँ कीनि लेने छेली बलिप्रदान लेल। भगवतीक नामे राखल छागर बान्हल कम आ खुजल बेसी रहै छल। दियाद सबहक बाड़ी-झाड़ीक तीमन तरकारी चरि जाइ तँ भगवतीक नामक कारणे कियो किछु ने बाजैथ।
बहुत धियान राखल जाइक। पूरा बलन्ठ आ बोतो बनि गेलैक।
अन्ततः अष्टमी दिन ओकरा हमसभ दुर्गास्थान लऽ गेलौं। पूजा पाठसँ पहिनहि ओ छागर दोसर टोलक छागरसँ लड़ल। सिंघसँ सिंघक युद्ध। हमर सबहक छागर जीत गेल। जयकार मचलइ..!
आब ओहि एकरंगी कारी छागरकेँ पोखैरमे नहाएल गेल। गरदैनसँ रस्सी हटा दूटा कबगर समाँग ओकरा अपन कब्जामे लेने रहला।
नहेला बाद छागरकेँ भगवती लग लऽ गेला। पण्डितजी खर्गक पूजा कऽ लेने छला। महाभयानक खर्ग। पैघ, धरगर, तेजगर आ प्रलयंकारी! हम रही ता बारह वर्षक नेना। आब भेल जे एते दिनक पोसल छागर बलि चढ़ि जाएत। आइ सभ किछु समाप्त। स्त्रीगण सभ गीत गेबामे मग्न। गाममे एक पहलमान छला। लोकक कहब रहै जे हुनकापर साक्षात् भगवती सवार भऽ जाइ छथिन। केहनो जुआएल छागरकेँ एक्केबेर-मे ओ धरसँ गरदैनकेँ अलग कऽ दैत छला। खर्ग उठेबासँ पहिने भगवतीक मुर्ती लग एक पैरपर हाथ जोड़ने एक घन्टा ठाढ़ रहैत छला। स्नान केलाक बाद लाल धोती आ बिनु सीअल वस्त्र पहिरने। जखन बाहर अबैत छला हाथमे खर्ग लेने तँ यमक सहोदर लगैत छला। लोक सभ कण्ठ फारि-फारि "दुर्गा महरानी की जय" केर नादसँ हुनका आरो विभत्स बना दैत छल। ओहि जयकारक अवाजमे छागरक अवाज जेना विलुप्त भऽ जाइत छल!
खएर! पण्डितजी पूजा केलैन। मंत्र पढ़ला। फूल, अक्षत आ जल लऽ भिजल छागरक ऊपर फेकलथिन। छागर सिहैर उठल। भूल्लाक गरदैन हिलाबए लागल। कान पटकए लागल। सबहक मन खुशीसँ बताह। लोक चिचियाएल-
"छागर परीक्षा लऽ लेलक।"
समस्त विजयी मुश्कान। एकबेर फेर अवाज भेलै-
"दुर्गा महरानी की जय।"
आब छागरकेँ मन्दिरसँ बाहर लाएल गेल।
भेलै ई जे दोसर टोलबला छागरकेँ पहिने बलिदान पड़तै। बलिदान देमए-बला अपन हाथमे खर्ग लेने बाहर आबि गेला। लोक सभ ‘जय-जयकार’ करैत रहल। छागर सभ कटैत रहल। भगवती लग एक माय केर सन्तान दोसर माय केर सन्तानक स्वाद, आयु, उन्नति, विकास लेल कटैत रहल। खूनक धार बहैत रहल। छागरक मेमियेनाइ जय-जयकार आ गीतक ध्वनिमे गौण होइत रहल...।
हमर बाल्य-मन भरि रास्ता कनैत रहल। दुर्गा लग जा-जा ई पाँति बेर-बेर गबैत रहलौं-
"गे माय, तोरा बेटाकेँ खाइत केना नीक लगलौ?”
मन बेर-बेर असहाय छागरक काटल मुड़ीसँ बहैत शोनितक स्मरण कऽ रहल छल। लोकक जय-जयकार तेहेन जेना बुझि पड़ए कान फाड़ि देत। मनमे डर घुसि गेल। स्त्रीगणक समवेत गान आ दुर्गाक भजन सोहनगर नहि लागि रहल छल। घर एला बाद ओहि छागरक मौस बनल। ओना, ‘मौस’ कहैसँ माँ परहेज केने छेली। कहने छेली ई ‘दुर्गाक प्रसाद’ छी। दियादी परिवारमे प्रसादक बेन बँटाएल। अपनो घरमे रनहाएल। सभ खेलक खूब प्रेमसँ खेलक। परसन-पर-परसन लऽ कऽ खेलक। मुदा हम नहि खेलौं। माँ कहैत-कहैत रहि गेली मुदा हम नइ खेलौं।
आब दोसर अनुभव दिस चली। हमर पुत्र शशांक केर उपनयन हएब निसचित भेल। तिथि छल, जून 2014 माने दू-अढ़ाइ साल पूर्व। हमर कनियाँ शाकाहारी छैथ। ओ किएक शाकाहारी छैथ तहूमे एक बलिप्रदानेसँ जुड़ल घटना अछि। हमर पूनम माछ-मौस खूब खाइत छेली। एकबेर–भाइक उपनैनमे–छागरक बलि चढ़लै। ओहो अपना आँखिए देखलखिन। अतेक वीभत्स लगलैन जे ओही दिनसँ माछ-मौस खेनाइ छोड़ि देलैन। तेतबे नहि, हिनकर अनुकरण करैत अपन छोट बहिन सेहो शाकाहारी भऽ गेलैन। ..जखन हमर पुत्र शशांक माँक शाकाहारी प्रवृतिकेँ देखलैन तँ ओहो शाकाहारी भऽ गेला। हमरा एहिसँ कुनो समस्या नहि अछि। जे खाए चाहै छैथ खाथु जे नहि चाहैत छैथ नहि खाथु। मुदा एहिसँ एक चीज तँ स्पष्ट भाइए गेल जे हमर पत्नी, हम आ हमर पुत्र तीनू गोरे छागरक बलिप्रदानक पक्षमे साफे नहि छी। खएर, संस्मरणकेँ आगाँ बढ़बैत छी। हमर गामक एक संस्कृतक विद्वान पण्डित- राघवेन्द्र झा दिल्लीक स्कूलमे शिक्षक छैथ। वएह हमर पुत्रक उपनयनक दिन निर्धारित केलैन। पण्डित राघवेन्द्र झाजी स्वयं वैष्णव छैथ। हम अपन समस्या हुनका समक्ष राखल। ओ कहलैन-
“एकर उपचार छै, अहाँ चिन्ता नहि करू। जेतेक ओजनक छागर छै तेतेक पसेरी मिठाइ अर्थात् लड्डू भगवतीकेँ आ ब्रह्मस्थानमे सेहो चढ़ा देयौ।”
हुनकर एहि व्योंतसँ हम तीनू परानी बड्ड प्रसन्न भेलौं।
दोसरे दिन हम गामपर माँ, भैया एवं अन्य सम्बन्धीकेँ उपनयनक दिनक सम्बन्धमे जानकारी दैत सभ तैयारी करबाक निवेदन कएल। तेसरे दिन माँक फोन आबि गेल जे ओ पाँचटा छागरक बेवस्था कऽ लेलीह। ई सुनिते हमर माथ पकैड़ लेलक। गृहयुद्धक पृष्ठभूमि बनि गेल परिवारमे। माँ अपना आगूमे केकरो टेरती नहि, आ पत्नी छागरक बलि लेल तैयार नहि हेती। पुत्र सेहो अपन माइयेक पक्षमे रहता...।
अन्तत: हम हिम्मत करैत माँसँ निवेदन केलौं-
“मॉं, राघवेन्द्र-गुरुजीक कहब छैन जे जेतेक छागर तेतेक पसेरी लड्डूसँ काज चलि जाएत।”
माँ हमर व्योंत सुनिते बिकराल रूप पकैड़ लेली-
“की कहैत छी? अहाँ सभ आब देवता-पितर सभकेँ समाप्त करए चाहैत छी? छोटकी काकी[1] मरैसँ पहिने कहलैन ‘कैलाशक माय, सुनु हम आब नहि बाँचब। मुदा अहाँ चिन्ता नहि करू। हम भगबान लग जा भगबानसँ लड़ि कऽ कैलाश लेल बेटा भेजब। अहाँ एक काज करब एकरा बदलामे अहाँ एकटा एकवर्ण कारी-छागर अँगनाक भगवतीकेँ आ एकटा एकवर्ण-छागर ब्रह्मबाबाकेँ ओहि बच्चाक उपनयनक समयमे चढ़ा देबैन। छोटकी काकी थोड़बे दिनमे मरि गेली। आ हुनक पहिल बरखीसँ पहिने शशांकक जन्म भऽ गेलैन। बिसैर गेलौं की?”
माँ ई कहैत फ़ोन हमर भौजीकेँ दऽ देलथिन।
आब भौजी शुरू भेली-
“देखू बौआ! अहाँ दुनू परानी जे करब से करू। मुदा शशांक लेल कुनो अशुभ ठाढ़ नहि करू। बुझल अछि, हमर बाबा वैष्णव छैथ मुदा जखन छागर चढ़ै छै तँ बलि-प्रदानक भूमिसँ एक ठोप रक्त भगवतीक प्रसाद मानि अपना जीभसँ अवश्य सटबैत छैथ। माँ ठीके कहैत छैथ। छोटकी दाइ भरि अँगनामे शशांक लेल कबुला-पाती केने छेली। निसचित रूपसँ ओ भगबानसँ लड़ि कऽ शशांक अहाँ सभ लेल भेजलैन अछि। जे परम्परा अदौंसँ आबि रहल छै तेकरा अहाँ सभ केना समाप्त कऽ देबइ! अहाँ मर्द बनू आ बेटाक शुभकार्य करू। पूनमकेँ बुझा दियौन जे हुनकर दालि एतए नहि गलतैन। जहाँ तक छागरक दामक प्रश्न अछि तँ कुनो बात नहि। शशांक हमर सबहक बेटा पहिने अछि आ अहाँ सबहक बादमे। हम छागरक दाम दऽ दइ छी। एकर अतिरिक्त अहाँ सभ जेतेक मिठाइ, लड्डू आ छप्पन भोग करब से करू। कियो ने मना करत।”
अहि तरहेँ माँकेँ तैयार कएल विचारकेँ भौजी ठोस भावनात्मक अधार दऽ देलैन। सभसँ पैघ बात ई जे अपन बात कहि भौजी बिनु हमर बात सुननहि फोन काटि देली। हम चाहियो कऽ अपन पत्नी लग ई बात नहि बजलौं, मुदा रणभूमि युद्ध लेल तैयार भऽ चुकल छल। ओही दिन रातिमे मामाक फोन सेहो आएल। कहलैन-
“बौआ, कुनो एहेन काज नहि करू जइसँ बहिनकेँ अहाँक पिताक कमी अनुभव होनि। ई हुनकर अन्तिम पोताक उपनयन छिऐन। अही लेल आइ धरि एकादशी यज्ञक उद्यापन नहि केली। अहाँ सभ जखन अपन पोताकेँ उपनयन करब तँ जेना-जे इच्छा हएत सएह करब। ताबेत धरि ने बहिन रहती आ ने हम। आधा घन्टा धरि फोनपर कनैत छेली। हुनका अनिष्ट केर आशंका भऽ रहल छैन। हमरा कहै छेली जे जहियासँ कैलाशक ओहि परिवारमे विवाह केला, तहियासँ सभ संस्कार बिसरने जा रहल छैथ। अगर छागरक बलिप्रदान नहि हएत तँ हम कुनो आर गाम चलि जाएब। घुमि कऽ ऐ नग्रमे प्रवेश नहि करब। मरला उत्तर हम कैलाशक पिताकेँ की कहबैन जे तमाम मर्यादाकेँ सर्वनाश कऽ हम आबि रहल छी! आब मिसर अर्थात अहाँक पिता नहि छैथ ताहि सम्बन्धमे श्रेष्ठ रहबाक कारण हमर ई उत्तरदायित्व होइत अछि जे अहाँ सभकेँ उचित रस्ता देखाबी। अहाँ हमेशा अपन माता-पिताक आज्ञाकारी रहल छी, कैलाश। कम-सँ-कम ऐ उपनयन धरि ई परम्पराकेँ कायम राखू। रहल कनियाँक प्रश्न तँ अहाँक मामी कहैत छैथ जे ओ अपन पुतोहु अर्थात् शशांक केर मायकेँ समझा-बुझा देथिन।”
ऐतेक बात कहि मामा सेहो अपन फोन बिना हमर बात सुननहि काटि देलैन! हमर माथ भारी भऽ गेल। ब्लड-पेसर बढ़ि गेल। माथ घुमय लागल। ऑंखिक आगू पूज्य पिताजी आबि गेला। होइत छल जे अगर पिताजी रहितैथ तँ अवश्य हमरा भावनाकेँ बुझितैथ..! मामा आ भैया तँ एक नम्मर-के पुरानपंथी छैथ। पिताजी हमेशा श्राद्धमे सांढ़ दागबकेँ विरोध करै छला, विरोधी छला। मुदा जखन ओ मरला तँ माँ आ मामा जिद्द ठानि देलैन जे ब्रिखोद्सर्ग श्राद्ध आ सांढ़ दागब अनिवार्य। माँ कहली जे हुनका परिवारमे केकरो अइक बिना श्राद्ध नहि होइत छैन। भावनामे बहैत माँ कहली अगर हमरा अछैत अहाँ सभ अपन पिता लेल ई नहि करब तँ हमर की करब? अन्तमे माँ आ मामाक जिद्दक आगाँ नतमस्तक होइत हम सांढ़ दगबा लेल तैयार भऽ गेलौं। एहि प्रकरणमे भैया सेहो जूमक-जूम तमाकुल खाइत रहला आ मुड़ी डोला-डोला माँ आ मामाक हँ-मे-हँ मिलबैत रहला।
आब भयसँ कण्ठ सुखा रहल छल। परम्परा हमरा परास्त कऽ रहल छल। सभ शिक्षा, सभ तर्क धराशायी भऽ रहल छल। भावना ज्ञानकेँ ध्वस्त कऽ रहल छल..! भेल कनी पानि पीबी। पानि-दे पत्नीकेँ कहए चाहलयैन कि बिच्चेमे भैयाक फोन आबि गेल। नहियोँ चाहैत फोन उठा लेलौं। ‘हेलो भौया!’ कहिते मातर भैया दुर्वाषाक रौर्द रूपमे आबि गेला-
“ई की भेल! हम अधा घन्टासँ फोन कऽ रहल छी आ अहाँक फोन व्यस्त जा रहल अछि? अहाँ सभ हरेक चीजकेँ मजाक बना देने छी!”
हम कनी झल्लाइत मुदा विनम्र भावे भैयाकेँ कहलयैन-
“भैया, हम मामासँ गप्प करैत रही। हुनके फोन ऐल छल।”
ई बात सुनि भैयाक तामस थोड़ेक शान्त भेलैन। फेर शुरू भेला-
“बौआ, एकटा बात मोन अछि। जखन पिताजी दरभंगासँ पटना लऽ जएबाक क्रममे रस्तामे अपन अन्तिम साँस लेलैन तँ हम अहाँकेँ की कहने रही?”
हम जवाब दितयैन कि ओइसँ पहिनहि ओ स्वयं बाजए लगला-
“हम अहाँकेँ कहने रही जे हमर पिता मरला अछि, अहाँक नहि। आईसँ अहाँक पिता हम छी। कहू कहने रही की नहि?”
हम बजलौं-
“हाँ भैया, अहाँ कहने रही। आ सैह मर्यादाक पालन अहाँ एखन धरि कऽ रहल छी।”
भैया दम्माक रोगी छैथ, तँए जोर-जोरसँ हकमबो करैथ बजबो करैथ-
“आब अहाँ कहू, जे हमरा रहैत शशांकक उपनयनक दिन ताकए-बला अहाँ के?”
भैया भावनामे कनबो करैथ आ बजबो करैथ-
“फेरो, केना करक अछि, की करक अछि। केहेन भोज करक अछि, इत्यादिपर अहाँक की निर्णय? ई निर्णय तँ हमरा लेबाक अछि। अहाँ राखू अप्पन पाइ। हम करब शशांकक उपनयन। माँ दिन भरिसँ अन-पानि तियागने छैथ। बुझल अछि अहाँकेँ? सुनू, अहाँ सबहक खटराग नहि चलत। माँ तँ पाँचटा छागर किनली अछि। हम पाँचटा आरो कीनब। देखै छी हमरा के रोकि लैत अछि? कनियाकेँ कहि दियौन जे अपन सभ नियम दिल्लीए-मे राखैथ। एतय हमर नियम चलत। ऐ घरक मुखिया पिताजीक पछाइत हम छी। आर कियो नहि। अहाँ सम्बन्धमे हमर छोट भाए जरुर छी मुदा हम अहाँ के कहियो अपन पुत्रसँ कम नहि मानल अछि।”
भैया ई बात सभ कनैत कहैत रहला आ जखन अपन बात कहल भऽ गेलैन तँ फोन राखि देलैन।
हम प्रलयमे पड़ि गेलौं। करी तँ की करी? किंकर्तव्यविमूढ़ भेल किछुकाल ठाढ़ रहलौं। मनमे उठल- आब पत्नीकेँ की कहबैन? ओ तँ छागरक बलिप्रदानबला बात लेल किन्नहु तैयार नहि हेती!
“दुःख हरहु द्वारकानाथ शरणमे तेरी..।”
अही गुनधुनमे पड़ल रही, कि एतबेमे हमर सासु आबि गेली, हमरा सभसँ भेट करबाक हेतु। हमरा लग अबिते बजली-
“की मिसरजी, कुनो चिन्तामे छैथ की?”
हम चुपे रहलौं। फेर ओ हमरा अपना लग बैसा सभ बात पुछए लगली। हम सभ बात बता देलिऐन। ओ कनी गंभीर भेली, कारण हमर पत्नीक उग्र सोभावसँ ओ परिचित रहबे करैथ। फेर निर्णयक मुद्रामे अबैत बजली-
“मिसरजी, ओना हमहूँ बलिप्रदानक विरोधीए छी, मुदा हिनकर परिवारक लोक सभकेँ कियो नहि बुझा सकैतैन। ई चिन्ता जुनि करौथ, हम पूनमकेँ समझा दइ छिऐ।”
हमर सबहक बात चलिए रहल छल कि हमर मामी हमर पत्नीकेँ फोन केलथिन। आब हमर मन घबराए लगल। भेल आब भयंकर कलह हएत घरमे। ईहो डर छल जे पूनम ने कहीं तामसमे हमरा मामीकेँ किछु अन्ट-शन्ट बात कहि दनि!
..खएर, सासु हमर भावनाकेँ बुझि गेली। ओ पूनम लग जा हाथक इसारासँ कहलथिन जे शान्तिसँ गप्प करैथ...।
मुदा आशाक विपरीत मामी जनु पूनमे-सन बात बजली। तथापि ई कहलखिन जे हमर नैहरमे बलिदान बन्द भऽ गेल अछि। मुदा मामा सभ एहि बातकेँ कखनो मानैले तैयार नहि। तैपर मामी पूनमकेँ बुझबैत कहलथिन-
“की करबै कनियाँ, दीदी आब कते दिन रहती। हुनकर बात मानि जाउ। अहीमे बच्चोकेँ आ अहूँ सबहक कल्याण अछि। नहि तँ ओ सभ पाहुन-परक लग यएह बातक चर्चा करैत रहती।”
पूनम छेली अन्तत: एक माए। ई सोचैत जे बच्चा के उपनयनमे कुनो अवग्रह नहि हो मामीक बात मानि गेली।
जखन उपनयन प्रारम्भ भेल तँ घरक भगवती लग छागरकेँ जाबे तक परीक्षा भेलै ताबे तक हमर पत्नी, पुत्र आ हम रहलौं। घरक सभसँ पैघ हेबाक कारणे भैया लाल धोती पहिरने भगवती-पूजा लग हमरा संगे बैसल रहला। विजय प्राप्त केलैन आ बलिप्रदान अन्ततः भऽ रहल छेलै ऐ बातक आत्मिक संतुष्टि छलैन। आभा मण्डल जीतक घमण्डमे चमकैत रहैन। शरीरसँ खिन्न भेल माँ सेहो बड़ आह्लादित छेली। भौजी कण्ठ फारि-फारि स्त्रीगण सबहक-संगे गीत गाबि रहल छेली। माँक संग-संग हमर दुनू बहिन सेहो उत्साहित छेली। माँकेँ आ भैयाकेँ आब हमरासँ कुनो शिकबा-शिकायत नहि छेलैन...।
अस्तु, एकर विपरीत एकर ‘हम’ हारल, थाकल, लगैत रही। एतेक पैघ उत्सव मुदा आनन्द नइ लऽ पबैत रही। खचाखच भरल भीड़मे असगर..! मुदा संतोषक बात ई छल जे सदिखन तामसे घोर रहैबाली हमर ‘पुनम’ आइ एक मातृत्वक सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत एकदम शान्त छेली। सभ विध-बेवहारकेँ ओही तरहेँ पालन कऽ रहल छेली जेना हमर माँ, हमर बहिन आ ऑंगनमे उपस्थित बुढ़-पुरान सभ निर्देशित करैत छेलखिन।
जेना कि पहिनहि निर्धारित रहै, जखने बलिदानक समय एलै कि हम सभ ओतएसँ हटि गेलौं।
दू दिनक बाद माँ कहलैन-
“पिपही बजबैत शशांक, शशांक केर माता-पिता आ परिवारक सभ सदस्य ब्रह्मस्थान जाएब। आ ब्रह्मबाबाक पूजा अर्चना हेतैन आ ओत्तो जोड़ा छागर चढ़तै।”
हम सभ हुनकर आज्ञाकेँ मानैत विदा भेलौं। पूजा अर्चनाक पछाइत, जखन छागरकेँ बलि चढ़बैक सुरसार भेल, तखने हमर नेन-कालक मित्र-पण्डित कहलैन-
“कैलाश भाइ, अहाँ ठाढ़ रहू।”
हमरा मनमे उठल, जखन सभठाम हारि मानिए लेलौं तँ..। तँए एतौ अपना-आपकेँ समर्पण कऽ देलौं। पहिल छागर तँ एक्केबेर-मे कटि गेलैक मुदा दोसर छागर बेरमे–जइ छागरकेँ रस्सीसँ गरदैन गतानल रहइ–गरदैनक रस्सी टुटि गेलइ। आब अधा गरदैन काटल छागर दौड़ए लगलै। शोनितक धार फुचक्का जकाँ बहए लगलैक। बहुत विभत्स दृश्य भऽ गेलइ। पछाइत लोक हिम्मत केलक। छागरकेँ पकैड़ खर्गसँ ओकर गरदैनकेँ रेति बलि चढ़ौल। बलि देबए-बलाकेँ धोती आ सौंसे देह छागरक रक्तसँ रंगा गेलैक। मुदा ओ एहि बातसँ प्रसन्न छल जे बलिप्रदानक बदलामे ओकरा जोड़ भरि लाल धोती आ 101 टाका नगद भेटलैक।
अपन मन घोर भेल छल। अपन कायरतापर मने-मन पश्चाताप होइत रहए। सभ शिक्षा, सभ ज्ञान, सभ सेमिनार आ पब्लिक भीड़मे बजबाक क्षमता सुड्डाह भऽ गेल छल। मनमे ई जरुर अबैत छल जे एतेक विवश केना भऽ गेलौं हम? मनकेँ कुनो कोनमे छिपल दुष्ट जेना बेर-बेर हमर पौरुष आ निर्णय-क्षमतापर अट्टहास कऽ रहल हो..!
अस्तु, आब बुझैमे आबि रहल अछि जे राजा राममोहन राय सन समाज सुधारक बनब कतेक दुष्कर कार्य अछि। जे समाज हमरा एकटा बलिप्रदान सन प्रथाकेँ, समाज परिवार तँ दूर अपन बेटाक उपनयनमे नहि समाप्त करए देलक, वएह समाज 19म शदीमे केना राजा राममोहन रायकेँ सती-प्रथा सन विशाल प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल जनजागरण करए देने हेतैन? केना परम्परा, धर्म, तंत्र आ पुन्यक मोहजालमे पुरुष प्रधान समाजकेँ धियानमे रखैत जीवैत स्त्रीगणकेँ मृत पतिक संगे ओही चितामे बैसा, सुन्दर लाल-पीयर बिऔहती नुआ-अंगी-लहठी-गहना पहिरा; लाल सिन्दुरसँ मांग भरि अग्निमे जरा दैत छल! ई पूण्य भेल की नृशंसता? ई सोहागिनक सम्मान भेल आकि मातृशक्तिक अपमान? ई सभ्य समाजक कृत्य भेल आकि हत्याराक अपराध? वेचारी स्त्री केना जीबैत जरैत छल हेती? आ लोक सभ सती माताक गीतक जय-जयकारमे केना हुनकर क्रंदन आ वेदनाकेँ समाप्त कऽ दैत छल हएत! कहल जाइत अछि जे राजा राममोहन रायक जेठ भौजी हुनका पुत्रतुल्य मानैत छलथिन। जखन हुनका पता चललैन जे ई सती-प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल आन्दोलन कऽ रहल छैथ आ अइक विरुद्ध अंग्रेजसँ मिलि कऽ कानून पास करबा रहल छैथ तँ ओही दिनसँ ओ राममोहन रायसँ बातचीत बन्न कऽ देलथिन। अपन पुत्रवत् देओरकेँ घृणा करै लगलैथ। आ ओहू स्थितिक सामना करैत ई महापुरुष अपन संघर्षमे लागल रहला। सतीप्रथाक अमानवीय रूढ़ अन्ततः टुटल, समाप्त भेल।
अगर ‘सती-प्रथा’ गलत छल तँ ‘छागरक बलिप्रदान-प्रथा’ सेहो गलत अछि। एकरो समाप्त भऽ जएबाक चाही। कतेक लोक ई तर्क दैत छैथ जे मिथिला तंत्रक केन्द्र रहल अछि। एतुक्का लोक शक्तिक उपासक छैथ। की एतए छागरक बलिप्रदान उचित अछि? ओना, कतेक लोकक ईहो तर्क छैन जे दिल्ली, कलकता, मुम्बई आदि महानगरमे बुचरखानामे विभत्स दृश्य होइत अछि, छागरकेँ काटि कऽ दोकान सभमे उघारे टाँगि कऽ लोक रखने रहैत अछि। ऐ सभकेँ विरोध किएक नहि होइत अछि। अगर से नहि तँ भगवती घर, ब्रह्मस्थान, मन्दिर परिसर आदिमे बलिप्रदानपर विरोध कथी लेल?
हमर बहुत मित्र सभ सेहो हमरासँ नाराज छैथ जे हम एहि बातकेँ अनेरे प्रचार कऽ रहल छी। किछु लोक आ मित्र सभ तँ हमरा विधर्मी कहैत छैथ। बहुत लोककेँ नहि बुझल छैन जे परम्परा आ हमरा मध्य साँस आ शरीरक सम्बन्ध अछि। हम प्रति दिन पूजा करैत छी, देव तर्पण, ऋषि तर्पण आ पितृतर्पण करैत छी। मुदा हमरा ईहो लगैत अछि जे मन्दिर परिसर, भगवती घर आ ब्रह्मस्थान आदि सार्वजनिक स्थान थिक। ओतए कुनो तरहक बलिप्रदान नहि हो। बदलैत समयमे लोक धोती पहिरनाइ छोड़ि देलैथ, बहुत स्त्रीगण सभ सेहो आब उत्सव इत्यादिमे मात्र साड़ी पहिरै छैथ, घरही लोक मुर्गाक मौस खाइत अछि, पीयाउज, लहसुन सहरगंजा भऽ गेल, एहि सभ कर्म लेल धर्म अहाँकेँ किछु ने कहैत अछि मुदा छागरक बलिप्रदान छोड़ि देलासँ अहाँक धर्म भ्रष्ट भऽ जाएत! अहाँ पापक रस्ता दिस चलि पड़ब। वाह रे सोच! जेतेक माछ, मौस खेबाक अछि खाउ। के मना करैत अछि। मुदा पवित्र परिसरकेँ रक्तमय नहि बनाउ। भऽ सकैत अछि नर बलि प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल छागरक एवं अन्य जीव केर बलिक प्रथा प्रारम्भ भेल हो। आब ओकरो बन्द करू। छागरक बदला बेल, कुम्हर आदिकेँ प्रतीक रुपे बलि पड़िते अछि। होबए दियौक। ओकरेमे आरो नीक विधि-विधान जोड़ू। नागा जनजातिमे किछु वर्ष पूर्व धरि नर-बलि केर प्रथा छेलइ। नागाक हेड हंटर अथवा सिरकेँ शिकारी कहल जाइत छेलइ। नागा आब अपनामे सुधार केलक आ ऐ प्रथाकेँ समूल समाप्त केलक। नर-बलि प्रथाकेँ आब स्वांग, नृत्य आ नाटकक रूपमे मनबैत अछि।
हमरो सभकेँ एहिपर गंभीरता पूर्वक सोचबाक खगता अछि। संतोषक विषय ई अछि जे ‘पण्डित’ आ ‘कर्मकाण्डी’क एक पैघ-वर्ग छागर बलिकेँ समाप्त करए चाहै छैथ। वो सभ एकर बदलामे फल, मिठाई एवं अन्य शास्त्र सम्मत विधान बतेबा लेल तत्पर छैथ। केतेको लोक एहि प्रथाकेँ छोड़ियो देने छैथ आ छोड़रो रहल छैथ। एक सर्वसम्मति निर्णय हो। सबहक सहमति हो। सबहक सहभागिता हो। सबहक विचारसँ एकर विकल्प (अल्टरनेटिव) दिस धियान जाए आ ई प्रथा समाप्त हुअए। निर्णय सबहक हो, सहमति सबहक हो, केकरो बीच द्वेष नहि हो आ नव प्रथाक सूत्रपात हो जे सभ लेल कल्याणकारी हो। एहने प्रथाक प्रारम्भ हएत से आशा करैत छी।
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मो.
[1] हमर पिताक पितियाइन
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