विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली संस्कृति केर अवयव

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2016-11-15 · अंक 214

मैथिली संस्कृति केर अवयव
मैथिली संस्कृति के समग्रता में मिथिलाम कहल जा सकैत अछि। कुनो सांस्कृतिक क्षेत्र अपन किछु विशेष खानपान, विध बेबहार, गीत संगीत आदि के कारणे विशेष स्थान आ पहिचान रखैत अछि। मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलाम के सेहो अपन विलक्षण विशेषता छैक। कनिक ओहि विलक्षणता पर विचार करी।
मिथिलाम के संक्षिप्त रूप सँ 6 भाग में देखल जा सकैत अछि:
क) खानपान, ख) वस्त्र विन्यास, ग) गीत आ संगीत, घ) वाद्ययंत्र, च) भाषा , छ) धार्मिक संप्रदाय आ परंपरा।
क. खानपान
खानपान कोनो समाज के संस्कृति के मूल होइत अछि। मिथिला में खानपान के दू दृष्टिकोण सँ देखल जा सकैत अछि। भोजन के मुख्य आ स्थानीय तत्त्व आ दोसर भोजनक सचार। जखन बहुत रासक वस्तु सँ भोजनक थारी अथवा थार सजैल जैत अछि त ई भेल सचार। सचार में कोनो जरुरी नहि जे सब वस्तु अथवा भोज्य सामग्री स्थानीय हो। जखन भोज्य सामग्री के बात करैत छी त मिथिलाक मूल भोज्य सामग्री के बुझ पडत।
एक फकरा में कहल जैत छैक:
तिरहुतीयता के भोजन तीन। कदली कबकब मीन।।
आब कनि एकरा देखी:
कदली (केरा): केरा गाछक सब चीज़क प्रयोग मिथिला में होइत अछि। थम्ब के भीतर केर तरकारी, कोषा केर तरकारी, कांच केरा केर तरकारी, पाकल केराक विविध रूप में प्रयोग। कोनो भार बिना केरा के पूर्ण नहि अछि। केराक प्रयोग सब बिध, बेबहार, पूजा पाठ, उत्सव, सत्यनारायण कथा आदि में होइत अछि। कांच केराक तरकारी पथ्य के रूप में प्रयुक्त अछि। केरा थम्भ के बहुत शुभ कार्य में प्रयोग होइत अछि। केराक पात पर भोजन करब अदौ सँ अबैत परंपरा अछि।
कबकब: कबकब के अंतर्गत भेल ओल, खमहारु , कौआं पात , ओलक पेंपी, कन्ना पात, अरिकंचक लोढ़हा, आदि। ओल शुद्ध आ सुपाच्य वस्तु अछि। सामूहिक भोज में ओलक सन्ना अनिवार्य रहैत अछि। ओलक तरकारी सेहो खूब चाव सँ हमरालोकनि खाइत छी। खमहारु के तरुआ अथवा खमहारुआ मिथिलाक विशेषता अछि। अरिकोंच ओना त सब खाइत छथि मुदा स्त्रीगनक मध्य ई कनि अधिक प्रिय अछि। कबकब भोज्य पदार्थ के बनेबा में कागजी, ज़मीरी नेबो, कांच आम, आ आमिल के प्रयोग होइत अछि।
मीन : मीनक अर्थ भेल माछ। माछ त अपना सभक भोजनक मुख्य पदार्थ अछि। अनेक तरहक माछ आ माछक संग संग ओहि प्रजातिक अन्य चीज़ जेना कांकोड, डोका, काछु आदि खेबाक परंपरा मिथिला में अछि।
ई त भेल तीन मुख्य तत्त्व। एकरा अतिरिक्त किछु पदार्थ अछि जे मैथिल के बहुत प्रिय छनि। ई सब अछि:
दही-चूरा, चीनी: समस्त विश्व में मिथिले एहेन क्षेत्र अछि जत दही-चूरा-चीनी के मुख्य भोजन आ भोज इत्यादि में सामूहिक भोजन के रूप में खैल जैत अछि।
आ सब व्यंजन पर भारी पड़ैत अछि अपन मिथिलाक तिलकोरा । सर्वत्र उपलब्ध, ने दाम ने छदाम, आ स्वाद केर की कहब? छोट पैघ सब में अपन स्थान रखने अछि। ई एहेन भोज्य पदार्थ अछि जकरा केवल मैथिल खाइत छथि।
मखान: भारतवर्ष में सबसँ अधिक मखान अपन मिथिला में होइत अछि आ सबसँ बेसी एकर उपयोग सेहो हमरे लोकनि करैत छी।
अंततः भोजनक पूर्णता मुखशुद्धि सँ होइत अछि आ मुखशुद्धि पान सुपारी संगे।
ख. वस्त्र विन्यास
परंपरागत वस्त्र मिथिलाक पुरुष लेल धोती, गमछा, या मुरेठा आ स्त्रीगण लेल नुआ, आंगी अछि। किछु विशेष वर्ग केर लोक या त विशेष अवसर पर अथवा ओहुना पाग सेहो धारण करैत छथि। धोती त।मिथिलाक मुसलमान सेहो पहिरैत छला। आब मुस्लमानक बाते छोड़ू हिन्दू सब सेहो धोती सँ बप्पा बैर केने जा रहल छथि। पहिने अपना ओत कोकटा बाँग होइत छल जाकर प्राकृतिक रंग ऑफ वाइट होइत छलैक। ओही बांग केर धोती के कोकटा धोती कहल जैत छलैक।
प्राचीन समय में पुरुष गाम गमैत भ्रमण करबा काल धोती, मिर्जई, दुपट्टा, गमछा, आदिक प्रयोग करैत छला। पैर में खराम पहिरबाक प्रथा हाल तक छल। पाहून परख के पैर धोबक हेतु खराम देल जेबाक परंपरा एखनो बहुत ठाम अछि। उच्च वर्ण में खराम पहिरक व्यवस्था उपनयन संग प्रारम्भ भ जाइत छल। किछु लोक खरपा सेहो पहिरैत छला। खरपा के आधार आर्थत तरवा काठ के आ ऊपर में आँगुर लग प्लास्टिक अथवा चाम लागल रहैत छलैक।
बाद में लोक गोल गला सेहो पहिरनाइ प्रारम्भ केलनि।
मिथिलाक स्त्रीगण सब व्यवहार कैल वस्त्र यथा धोती आ नुआ सँ केथड़ी आ सुजनीक निर्माण सुई ताग सँ करैत छली। केथड़ी मोटगर होइत छैक जकर व्यवहार मोटगर गद्दा जकाँ जारक समय बिछेबक हेतु कैल जाइत छैक। सुजनी कलात्मक होइत छैक। सुजनी में अनेक तरहक ताग के सुन्नर संयोजन सँ बहुत रास डिजाईन , मोटिफ, वोटिफ, पैटर्न आदि बनेबाक प्रथा मिथिला में छलैक। सब वर्ग आ जातिक स्त्रीगण एहि कला में निपुण होइत छली। सुजनीक प्रयोग ओछाइन केर चद्दरि के रूप में होइत छैक। किछु लोक गरीबी में केथड़ी सेहो ओढ़ैत छथि।
ग. गीत संगीत
मिथिलाक लोकगीत एक महासागर अछि। एकर संख्या कतेक अछि से कहब असंभव। मैथिली लोकगीतक विशेषता एकर समवेत गायन शैली छैक। लगभग 98 प्रतिशत गीत बिना कोनो वाद्ययंत्र और विशेष राग सँ गैल जाइत अछि। मुदा गीतक शब्द, भाव, गबैय्या के उत्साह आ समर्पण, विध बेबहार के प्रति ध्यान , ऋतुक संग स्वभाव, क्रियाकलाप सँ प्रतिबद्धता, काज में लगाव, आपसी प्रेम आ प्रकृति सँ अनुराग बिना कोनो वाद्ययंत्र के सेहो मैथिली लोकगीत के अलग संसार में ल जाइत अछि। विद्यापतिक पदावली, ताहू में उत्सव विशेष केर गीत, सोहर, समदाउन, उदासी, साँझ, प्राती आ शिवक गीत में महेशवानी , नचारी आ कंरथुआ गीत बहुत हर्षित करैत अछि तन के आ मोन के। सीता, राजा सलहेस, कारिख महाराज, दीनाभद्री, आदिक लोकगाथा आ गीत सेहो अपन अलग स्थान रखैत अछि। सब शास्त्रीय गीत मिथिला में बहार सँ आयातित अछि, यद्यपि ध्रुपद मैथिली लोकशैली संगे तारतम्य बना सकल अछि। बटगबनी, तिरहुत, लगनी तीव्रगति सँ चलैत गीत आ मोन लगबे बला गीत अछि। उदासी संत परंपरा, कबीरपंथी परम्परा, सँ प्रभावित भ रचल गेल अछि।
मिथिलाक उच्चवर्ग विशेष रूप सँ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अपन महिला के पब्लिक स्पेस में गायन, वाद्ययंत्र संगे गायन, नृत्य आदिक स्वतंत्रता नहि देने छथि जाहि सँ एहि वर्ग केर महिला में नृत्य, नृत्यगीत, नृत्यनाटिका आदिक शैली नहि विकशित भ सकल छनि। अन्य जाति सब में डोमकच्छ, जटा-जटिन, झ्झिया, आदिक रूप भेटैत अछि। शामा चकेबा में बहुत साधारण तरहक नृत्य आ उत्साहक स्वतंत्रता देखैत छी।
मुस्लमान महिला सब ताजिया के समय झिझिया छाती पीट पीट गाबैत छथि। हुनकर स्वर आ टोन बहुत हद तक उदासी आ समदाउन सँ मेल खाइत छनि।
घ. वाद्ययंत्र
मिथिलाक मूल वाद्ययंत्र रसनचौकी में प्रयुक्त होइत अछि। दुर्भाग्य सँ एकरा कहियो मिथिलाक तथाकथित विद्वान लोकनि प्रोत्साहित नहि केला। एकरा बारे में कहल जाइत अछि जे जखन सीता कुम्भ सँ बहार भेली त भगवान स्वर्ग सँ प्रसन्न होइत अप्सरा, वाद्ययंत्र आ ओकरा बजबय बला कलाकार सेहो मिथिला पठेला। किछु लोकक कहब छनि जे चूँकि ई वाद्ययंत्र चमार बजबैत छथि ताहि एहि पर विशेष ध्यान नहि देल गेल।
च. भाषा:
मैथिली भाषा प्राचीन भाषा अछि। एकर अपन लिपि छैक मुदा आब लोक देवनागरी में लिखैत छथि। बंगला लिपि मिथिलाक्षर सँ प्रेरित भ बनल अछि। एहि भाषा में विद्यापति, ज्योतिरेश्वर, चंदा झा, लाल दास, हरिमोहन झा आ यात्री सनहक़ साहित्यकार भेल छथि। आन भाषा जकाँ मैथिली में सेहो स्थान आ लोक ज्ञाने भाषा के बजबाक शैली, शब्द व्यवहार, टोन, आदि में परिवर्तन पैल जाइत अछि। बेगूसराय, बरौनी, मुंगेर आदिक मैथिली दक्षिण प्रभाव सँ ओत प्रोत अछि आ शैली में स्थानीय आनंदक अनुभूति भेटत। यद्यपि दरभंगा, मधुबनी में रहनिहार मैथिल सब अपन बोली के प्रमाणित करबा लेल बेहाल रहैत छथि। तहिना मिथिला केर पश्चिम में प्रयुक्त भाषा में कनि अलग स्थानीय भाव भेटैत अछि। भागलपुर, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, दुमका, बांका में व्यवहृत मैथिली के अंगिका कहल जैत अछि। वैशाली क्षेत्र के मैथिली के बज्जिका कहल जाइत अछि। उच्च आ निम्न वर्ग ज्ञाने सेहो मैथिली बजबाक शैली में किछु उतार चढ़ाव भेटैत अछि। सब क्षेत्र, समुदाय, के स्थानीय शब्द, शैली, उपमा, अलंकार, पिहानी, फकरा, गीत नाद आदि के आधार मानि एक प्रामाणिक मैथिली भाषा के विकशित करबाक जरुरत अछि जे सबके मान्य हो, सब के सोहनगर लागनि।
छ. धर्म आ संप्रदाय
मिथिला में सब वर्ण के लोक, सब धर्म के लोक रहैत छथि। अतै केर हिन्दू पंचोपासक छथि। महादेव केर पूजा माटिक महादेव बना अद्भुत ढंग सँ कैल जैत अछि। बुद्ध केर भाषा आ चार्यपद के एखनो मैथिली अपना में आत्मसात केने अछि। तंत्र में बौद्ध तंत्र के स्पष्ट प्रभाव छैक। सिद्ध पीठ आ बज्रयान केर तंत्र स्थल मिथिला में आबि जेना संगम जकाँ एक दिशा में एक भे बहे लगैत अछि। मुस्लमान सब सेहो अपन धर्म केर पालन करैत छथि संगहि किछु लोक परंपरा केर तत्व के अपना में समावेश क लेत छथि।
सीता के मिथिलाक स्त्री नायिका के प्रतिनिधि आ राजा सलहेस के पुरुष नायक के प्रतिनिधि कहल जा सकैत अछि।
मिथिला चित्रकला
मिथिला चित्रकला जकरा मधुबनी चित्रकला सेहो कहल जाइत अछि, अपन स्थान आ नाम कला संसार में नीक जकाँ दर्ज करा लेने अछि। एहि पर बड्ड लिखब अनिवार्य नहि। इंगित भ गेल अतेक पर्याप्त अछि।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “मैथिली संस्कृति केर अवयव.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 214, 2016-11-15. https://www.videha.co.in/research/2016/214/मैथिली-संस्कृति-केर-अवयव.htm

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