मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद
लोक गाथाक परिवेश
हमर नानी लोक-परम्परा केर संरक्षिका छली।शायद अक्षरमालाके ज्ञान हुनका नहि छलनि मुदा लोकज्ञान जेना कंठमें कंप्यूटरके कोनो चिप जकाँ सेट छलनि। जखन हुनका लग जाई ओ किछु नव आ महत्त्वपूर्ण लोकव्यव्हार अथवा कथा अथवा गीतअ थवा फकरा, देव ीदेवता, स्थानक विशेषता आदिकसन्दर्भमें बात करथि। गंभीर बात। एक-एक चीज़क अर्थ स्पष्ट करैत विवरण दैत छली। नानी छली बड़ा कुलीन घरसं। नाना सेहो अपना समय केरजमींदार छला। मुदा बजबाक शैलीमे ंनानी मधु छली। हमरा कखनो “रौ” के त छोडू “हौ” नहि कहलनि। सदरिकाल “यौ” कहि सम्बोधन करथि।बजबाकशैली विलक्षण। भेटथि त कुशल क्षेम पुछबाक अद्भुत अंदाज़। जखन कहियो नानी लग जाई अपन गामक संस्कारके तिलांजलि द दी। बिना डांट-फटकार केनिक संस्कार कोना सिखाबी ई कियो नानीक व्यवहार संग्रहण क सकैत छल। हमर जेठ बहिन केर नाम विद्या आ सरोज छनि। जखन कखनो नानी लगजाईत हुनका सबहक कुशल क्षेम अहि तरहे पुछथि:
“विद्या कुमारी कोना छथि? सरोज कुमारी कोना छथि?” ई छलनि नानी के व्यवहार अपन बेटीक बेटीके प्रति; सेहो परोक्षमे।
कहि नहि कथी लेल नानी के हमरापर बड्ड विश्वास छलनि। जखन जाई नानी घंटों बात करथि – कखनो घरमे, कखनो चिनबार लग, कखनोदलानपर त कखनो आमक गाछीमे।नानी के शायद ई भान छलनि जे:
“कैलाश कहियो ने कहियो मैथिली लोकपरंपरा लेल किछु करताह!”
बहुत रास अजगुत गीत सब नानी गबैत छली। कतेको बेर सोचलौं रेकॉर्ड करब आ लिखियो लेब। किछु लिखबो केलों। मुदा देव संयोग ई छलजे नानी बिचहिंमें बैकुंठक रस्ता ध लेली।
एक बेर नानी लग दालान पर बैसल गप्प करैत रही ततबे में एक नाथ जोगी हाथ में सारंगी लेने, बढ़ल दाढ़ी आ भगबा वस्त्र में सारंगी के तार के झनकबैत आबि गेलैक। बिना ककरो आज्ञा के इंतजार केने तारक झनकार तेज भ गेलैक। करुण रस झहरए लगलैक। नानी हमरा कहलनि : “कैलाशजी, जोगी जी के कुर्सी दियौन बैसबाक हेतु”। हम तुरत एक कुर्सी के झारि जोगी जी के द देलयनि। जोगी जी सारंगी बजबैत मस्त भेल चुपचाप कुर्सी ग्रहण केलनि आ कनिकाल में सारंगी केर तान संगे उच्च स्वर में गोपीचंद के गीत गाबय लगला। धीरे-धीरे अगल-बगल सं बहुत स्त्रीगन आ नेना सब जमा भ गेल। किछु पुरुख सेहो एला। जोगी महराज गीत गबैत रहला, सारंगी बजबैत रहला आ स्त्रीगन सब कनैत रहली।पूरा वातावरण उदासी के भाव सं ओतप्रोत छल। पूरा त नहि परन्तु आंशिक बात हमहु बुझलियैक आ थोरेक द्रवित सेहो भेलौं। जोगी डेढ़ घंटा धरि सारंगी के तान पर गीत गबैत रहला।जखन समाप्त भ गेलनि त कियोक पाई, कियोक अन्न, कियोक वस्त्र आदि देलकनि। मामी किछु जलखई देलथिन आ चाह सेहो भेटलनि।
जलखई समाप्त क जखन जोगी जी चाह पीब लगला ओही क्षण एक आश्चर्यजनक दृश्य उपस्थित भ गेलैक।एक 90 वर्ष केर महिला हाथ में लाठी पकड़ने आबि गेली। जोगी के पकडि कानय लगली: “रे बुधना! हम छियौ तोहर माय! रे हमर बेरा पार लगा दे तखन फेर जोगी बनि जैहें। बाप बुधना बुधना रटैत प्राण त्यागि देल्थुन। अपटी खेत में हुनकर आत्मा भटकैत हेतनि। रे बइमान! रे बाप के तर्पण दे। संस्कार कर। रे वंशक रक्षक कर!” बेचारा जोगी हतप्रभ! बुढ़िया किछु बजबाक अवसर देबाक हेतु तैयार नहि। जोगी कहलकै, “बूढी माँ, मै छपरा जिले का हूँ और जाति से कुम्भकार हूँ।मै चार भाई हूँ और मेरी माँ मर चुकी है। मै आपका पुत्र या कोई बुधना नही हूँ। मेरी नाथ सम्प्रदाय में दीक्षा से पहले मेरा नाम रमेश पण्डित था। दीक्षा के बाद मेरा नाम जोगी मोतीनाथ है।” लेकिन बुढ़िया ओकर तर्क सुनबाक हेतु तैयार नहि। बड़ा बिपत्ति!
पुराण लोक सब ऐल। ओकरा चीन्हबाक प्रयत्न केलक। सब कहलकै जे ई बुधना नहि थिक. मुदा पुत्रविछोह सं तरपैत माय के बुझेनाई अतेक सहज कहाँ? अंत में सब कहलकै “ठीक छै, कोनो एक चिन्ह बताऊ जे बुधना के खाश छलैक?” कनिकाल लेल बुढ़िया चुप भ गेल। फेर सोचैत बाजलि: “हमर बुधना के मध्य पीठ पर तीन टा नमहर-नमहर तील छैक।” लोक सब जोगी के पीठ देखेबा लेल कहलकै। जोगी शुरू में पीठ उघारबा लेल तैयार नहि छल। अहि बात सं बुढ़िया के शंका आर प्रबल भ गेलैक। बुढ़िया जोर-जोर सं कानि-कानि लोक के कहए लागलि: “देखू हे माई दाई! ई बुधने अछि। पीठ नहि उघारि रहल अछि. हम दूध पियेने छी एकरा। हमरा आंखि सं कोना अपना आप के बचा लेत?” बुढ़ियाक कानब सं द्रबित होइत लोक सब में एक प्रमुख व्यक्ति जोगी के सम्बोधित करैत बजला: “देखू जोगी जी! एहि 90 वर्ष केर महिला पर दया करू। हिनका पीठ उघारि देखा दियौन। जं तीन तील लगातार एक ठाम मध्य पीठ में नहि हैत त अहाँ के हमरालोकनि छोडि देब अन्यथा अहाँ अतए सं नहि जा सकैत छी।” कनि ना नुकुर केलाक बाद जोगी पीठ उघारबा लेल तैयार भ गेल। सब जिज्ञासा सं जोगी के पीठक निरिक्षण केलक मुदा मध्य पीठ में तीन तीलक त बाते नहि एकौ तील नहि रहैक। बुढ़िया झमा खसलि। जोगी प्रफुल्लित होइत सारंगी उठा सारंगी बजबैत दोसर गाम दिस बिदा भेल।
राति में सुते सं पहिने नानी सं हम जोगी आ समस्त चीज़ के सम्बन्ध में जिज्ञासा कैल। नानी कहली: “हमरा ज्ञात छल जे अहाँ ई प्रश्न करब. अगर अहाँ नहि करितों तैयो हम जोगी आ सारंगी के सम्बन्ध में आई चर्चा करितौं.” हमरा नानीक ई कहब बड्ड निक लागल.
नानी कहली जे ई सब नाथ सम्प्रदाय जकर आदिगुरु गोरखनाथ छथि केर सदस्य छथि. हिनका सबके अपन मिथिला में जोगी, सारंगीबला जोगी, सिध्ह जोगी, गुदडियाबाबा, घुनाबाबा, गोपीचंद बाबा सेहो कहल जैत छैन। मान्यता छै कि जे रुईसक घर सं भागि जैत छला वो गोरखपुर जा बाबा गोरखनाथ के नाथ सम्प्रदाय केर चेला भ जैत छला। घर-द्वार सं उन्मुक्त। ने उधो को लेना ने माधो को देना। ओ सन्यासी के श्रेणी में आबि जैत छथि। संसारिकता केर मोहजाल सं मुक्त। ओतए हरेक जोगी के एकटा सारंगी देल जैत छनि। वैह सारंगी बजबैत आ गीत शिक्षा में निपुण भेला पर नगर आ ग्राम में घरे-घरे भीख मांगि बारह बर्ष धरि ओ जीवन व्यतीत करैत छथि। बारह बरिख सं पहिने हुनका अपन माए सं भीख लेबा में सफल होबाक छनि। जे सफल भ गेला ओ सिद्ध जोगी आ ओकर बाद ओ आनो के गुरु के रूप में दीक्षा द सकैत छथि।
ओहि समय में जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्ति पर जोर दे लिख रहल छी। अहि लोक स्मरण में जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओ नानीक छनि आ जतएकथा इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक।
लोक परंपरा में जननायक के रूप में प्रतिष्ठित भर्तृहरि राजा के जीवन वृत्तान्त, नीति आ उपदेश के लोक शैली में भरथरी में नाथ जोगी सब गाबि-गाबि सुनबैत अछि. एहि लोकगाथा के गोरखपंथी साधु अपन सारंगी पर गबैत छथि. सारंगी के कतौ- कतौ चिकारे सेहो कहल जैत छैक। नाथ सम्प्रदाय केर गुरु गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ केर निर्गुण सिद्धांत सं प्रेरित एहि लोकगाथा में सामदेवी रानी आ समस्त विलासिता आ राजभोग के त्यागि भरथरी राजा केना वैराग्य लेलनि आ फेर जोगीक वेश में रह्लनि एकर बहुत करुण विवरण अछि।
एहि लोकगाथा के दू पाट में बाटि बुझल जा सकैत अछि। प्रथम भाग में राजा भरथरी के वैराग्य तथा पिंगला द्वारा पूर्व जन्म केर कथा। दोसर भाग में जंगल में गेलाक बाद भरथरी राजा द्वारा कारी मृग के वध करब तथा माता मैनावती के आज्ञा के शिरोधार्य करैत जोगी अथवा वैरागी होबाक कथा छैक। एहि गेय गाथा में योग-भोग केर अंतर्द्वंद तथा करुण विप्रलम्भ केर प्रयोग चरमोत्कर्ष पर भेटैत छैक।
कथा ऐना शुरू होइत छैक। राजा भरथरी के एकाएक वैराग्य उत्पन्न होइत छनि।एकर कारण हुनकर जन्म कुण्डली में वैराग्य लिखल छनि. फेर की, भरथरी राजा सामदेवी रानी के छोडि भरल जुआनी में वैराग्य लेल जा रहल छथि। रानी पहिने त मना करैत छथिन लेकिन जखन भरथरी राजा नहि मानैत छथि त पुछैथ छथिन: “ठीक छैक स्वामी! अहाँ जा रहल छी मुदा जएबाक कारण त बता दिय हमरा?” भरथरी राजा कहैत छथिन: “हे रानी, एकर एकमात्र कारण थिक हमर जन्म कुण्डली में वैराग्यक योग।” मुदा सामदेवी रानी एहि जवाब सं संतुष्ट नहि होइत छथि आ भरथरी राजा के बाहर जएबाक अनुमति नहि दैत छथिन। भरथरी मोन मसोसि क रहि जैत छथि।भरथरी राजा एक प्रश्न रानी सं पुछैत छथिन: “हे रानी एक बात के उत्तर हमरा अहाँ दिय! अपन सबहक सोहाग राति में पलंग केर पाटी कुन कारने बिखंडित भ गेल?” भेल ई रहनि जे जखने सोहागराति के समय राजा अपन रानी सं काम क्रिया करबा लेल उद्दत भ रानी के बाहुपास में लेमै लगला एकाएक पलंग केर फट्ठी टूटि गेलैक। रानी आ राजा के एहि बात सं किछु अशुभ केर शंका भेलनि। निर्णय केलनि जे आई राति सोहाग नहि मनेता आ ने कामेक्रिया में लिप्त हेता। एक दिन में कोनो बैकुण्ठ थोरे ने खासि पड़तैक? ओकर बादे राजा भरथरी के मोन में विचित्र तरहक उचाट होबए लगलनि। कखनो रानी लग जएबाक मोने ने करनि। वैह प्रश्न आई राजा अपन रानी सामदेवी सं पुछि देलथिन।
रानी सामदेवी बजली: “राजन, एहि बात के हम नहि जनैत छी। हलांकि हम्मर छोट बहिन पिंगला अग्रज्ञानी अछि। ओकरा भुत, वर्तमान आ भविष्य सब चीज़ के अपूर्व ज्ञान छैक। मुदा पिंगला दिल्ली में रहैत अछि।” राजा तुरत अपन सारि पिंगला के चिट्ठी लिख दिल्ली सं मालवा एबाक प्रार्थना केलनि। चिट्ठी पाबि पिंगला झट दनि राजा लग जैत छथि आ कहैत छथिन: “हे राजन! जों हम सत्य कहब त अहाँ स्वीकार नहि क पैब। ताहि पूर्व जन्मक सत्य जनबाक हठ छोडि देल जाओ।” मुदा भरथरी राजा अपन जिद्द पर अटल रहला। कहलथिन: “हे हमर सुन्नरि, दुलारू आ गुनमति सारि पिंगला, अहाँ सत्य कहू। हम चेतन्य आ कठोर ह्रदय केर पुरुख छी।केहनो सत्य के स्वीकार करबाक क्षमता हमरा में अछि। अहाँ निश्चिन्त भ जे सत्य छैक तकर बखान करू।” आब पिंगला गंभीर भेली आ बजली: “ठीक छैक भरथरी राजा, अगर अपने सत्य सुनबा लेल आतुर छी त हम आई एहि क्षण अहाँ के सत्य बता दैत छी। हम्मर बहिन सामदेवी रानी जे अहि जन्म में अहाँक पत्नी छथि पूर्व जन्म में अहाँक माँ छली। ई बात अही लेल हम अहाँके नहि बता रहल छलों। ओना रानी सामदेवी के सेहो पूर्व जन्म के बात ज्ञात छनि मुदा एहि जन्म में त ओ अहाँक पत्नी छथि ताहि नहि बतेली। आब ई अहाँ ऊपर अछि की भोगमय बिलाशिता पूर्वक जीवन जीबी अथवा योगमय कोनो जोगी अथवा संयासिक जीवन।” ई बात सुनि भरथरी राजा उदास भ जैत छथि। माथा टनकए लगैत छनि। संसार आ मानवीय सम्बन्ध सब में मिथ्याभाव लगैत छनि।
कनि काल बाद भरथरी राजा अपन नव व्याहित रानी सामदेवी सं आज्ञा लै सिंहलद्वीप केर घनघोर बोन में कारी मृग के शिकार हेतु प्रस्थान करैत छथि। मृग केर पत्नी हरिनी भरथरी राजा के शिकारी के खेमा देखि अनिष्ट केर आशंका सं घबरैत अपन पतिक प्रानक रक्षा में लागि जैत अछि। जखन कोनों व्योंत नहि भेटैत छैक त स्वयं राजा भरथरी लग आबि जैत अछि आ निवेदन करैत छैक: “हे राजा, अहाँ हमर पति केर प्राण केर रक्षा करू। हुनकर शिकार नहि करू। हुनका बदला में हम्मर शिकार क लिय!” लेकिन भरथरी राजा ओकर निवेदन के स्वीकार नहि करैत छथि. हरिणी निराश भ जैत अछि।
हरिणी हारि नहि मानैत अछि आ पतिक प्राण केर रक्षा कोनो ने कोनो हालत में कर चाहैत अछि। दौर क कारी हरिण लग जैत अछि आ हाफैत कहैत छैक: “हे प्रिय, भरथरी राजा अपन शिकारी दल के संग बोन में घुसि गेल छथि। ओ अहाँक शिकार करता। अहाँ तुरत एहि बोन के छोडि कोनो आन ठाम चलि जाऊ।” कारी हरिण सोचलक: “आखिर भरथरी राजा अकारण हमरा कथी लेल मरता? हमरा हुनका संग कोनो तरहक वैमनस्य नहि अछि। कथी लेल एहेन सुन्दर बोन के छोड़ी, अनजान बोन में धक्का खेबाक हेतु जाई?” यैह सोचैत ओ हरिणी के सम्बोधित करैत बाजल: “हे हमर दुल्लरि! अहाँ चिंता जुनि करू। हमरा राजा नहि मारता। हम हुनकर कोनो अहित नहि केने छी। केवल वैह प्राणी दोसर प्राणी के मारि सकैत अछि जे ओकरा कोनो तरहक दुःख देने होइक अथवा अहित केने होईक। हमरा कोनो आन बोन में अनेरे नहि जएबाक चाही।” आब हरिणी मोन मसोसि क रहि जैत अछि।
इम्हर भरथरी राजा अपन शिकारी दल संगे गहन बोन में बढ़ल जैत छथि। एकाएक कारी मृग के देखैत छथि आ ओकरा वध करबाक हेतु तीर के धनुष के प्रत्यंचा पर चढ़ा लैत छथि। माजल शिकारी जकाँ लगातार सात तीर सं प्रहार करैत छथि। सात में स छ तीर गंगा माता, वनस्पति देवी, गुरु गोरखनाथ, एवं कारी मृग केर सिंघ सं बेकार भ जैत छनि मुदा सातम तीर सं मृग घायल भ जैत अछि। शोनित सं भरल देह, तीरक टीस सं व्यथित मृग वेदना के आधिक्य में भरथरी राजा के श्राप दैत छनि: “हे राजन! अहाँ त नृशंश भ हमरा मारि देलौं! आब हमर नेत्र अहाँ अपन रानी के श्रृंगार करबा लेल द देबनि; हमर सुन्दर कलात्मक सिंघ कोनो राजा के दरबज्जा पर मढबाक हेतु द देबनि; हमर चाम के कोनो साधु के आसन बनेबा लेल द देबनि; आ अन्ततः हमर माउस अहाँ रान्हि बघारि क खा लेब। मुदा एक बात स्मरण राखब, जहिना हम्मर सत्तरि सै रानी कलपि रहल छथि तहिना एक दिन अहुक रानी सब कलपती।” अपन बात के समाप्त करैत कारी मृग जे ओहि बोनक हरिण सबहक राजा छल, अपन प्राण त्यागि देलक।
भरथरी राजा द्रवित भ गेला. तुरत हुनका अपना आप सं घृणा होबए लगलनि। कोनो तरहें ओ आब कारी मृग के जानक रक्षा करै चाहैत छथि। व्यथित भ गुरु गोरखनाथ के कुटिया में घुसैत छथि आ अपन गलती के स्वीकार करैत निवेदन करैत छथिन: “हे गुरु गोरखनाथ! हमरा सं बड्ड पैघ पाप भ गेल। अहाँ कोनो तरहें अपन दैवीय शक्ति सं अहि कारी मृगराज के प्राण के पुनः वापस क दियौक!” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “हे राजन! आब एकरा पुनः जीवित केनाई हमरा वशक बात नहि अछि।” भरथरी राजा पागल जकां कर लगैत छथि। माटि में ओहरिया मरैत छथि। कनैत बेहाल भ जैत छथि आ गुरु गोरखनाथ के कहैत छथिन: “अगर अहाँ अहि मृगा के प्राण नहि वापस केलौं त हम अही ठाम अपन प्राण त्यागि लेब!” विवश भ गुरु गोरखनाथ कारी मृगराज के अपन दैवीय शक्ति सं पुनः जीवित क दैत छथिन। मृग उठि क बैस जैत अछि। राजा पर एकबेर फेर दयाभाव देखबैत कारी मृग अपन श्राप वापस ल लैत अछि।समस्त हरिण समुदाय में उत्सव केर वातावरण भ जैत छैक। हरिणराज केर सत्तर सए रानी मस्त भ नाचए लगैत छैक। कस्तूरी केर सुगन्ध सं बोनक वातावरण महो-महो भ जैत छैक। कारी मृग अपन रानी सब लग बिचरन करए चलि जैत अछि। एहि दृश्य के देखि भरथरी राजा आनन्दविभोर भ जैत छथि।
इम्हर भरथरी राजा के ह्रदय परिवर्तित भ जैत छनि। संसार क्षद्म लगैत छनि। मोन में सांसारिक सुख सं वैराग्य उत्पन्न भ जैत छनि।गुरु गोरखनाथ के चरण पर बैस जैत छथि। कहैत छथिन: “हे गुरुदेव! हमर उद्धार करू। हमरा अपन शरण में लेल जाओ। अपन शिष्य बना हमरा धन्य करू।” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “राजन! हम कोनो स्थिति में अहाँ के अपन शिष्य नहि बना सकैत छी। एकर एकमात्र कारण थिक अहाँक राजसिक वृत्ति। अहाँ राजा थिकहूँ। राजा भला जोगी कोना क बनत?” भरथरी राजा उत्तर में कहैत छथिन: “हे गुरु श्रेष्ठ! हम अहाँक पथ पर अहाँक चेला बनि चलए चाहैत छी। एहि लेल सब किछु भौतिक पदार्थक संग-संग अपन चित्तक चीज़ के सेहो त्याग करक हेतु तैयार छी।” अंतत गुरु गोरखनाथ एहि शर्त पर की भरथरी राजा सन्यासी त बनि जेताह मुदा हुनका अन्तिम दीक्षा गोरखनाथ तखन देथिन जखन भरथरी राजा अपन रानी सामदेवी सं ‘माए’ कहि भीख मंगताह।
आब एतहि सं भरथरी राजा नाथ जोगी के रूप धारण क, गेरुआ वस्त्र पहिर, हाथ में सारंगी लेने गामे-घरे होइत राजक द्वार पर अलख जगेने गीत गाबि रहल छथि। रानी साम देवी जखन भरथरी राजा के जोगी के भेष में देखैत छथि त परेशान भ जैत छथि।रानी हुनका कोनो स्थिति में भीख देबाक हेतु तैयार नहि भ रहल छथिन। भरथरी राजा अहि बात पर हुनका कहैत छथिन जे ओ अपन नैहर चलि जाथु। मुदा रानी नैहर नहि जैत छथि आ उलटे भरथरी राजा के राजमहल में कोनो एकांत स्थान में रहि जोगी के भेष में तपस्या करक हेतु कहैत छथिन। भरथरी राजा कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर अहाँ गंगा के निर्मल धार एते ल आबी त हम राजमहल में रहि क तपस्या क लेब।” रानी छली परम सती. तुरत अपन सत सं गंगा के धार के ओतहि ल एली। आब भरथरी राजा हुनका बतबैत छथिन जे कोना एक जोगी के सर्वाधिक पुन्य तीर्थ स्थल केर भ्रमण सं भेटैत छैक। ई सुनि रानी गंगा के धार के वापस चलि जएबाक हेतु कहैत छथि। रानीक बात के सम्मान करैत गंगा केर धारा वापस चलि जैत छैक। एकर बादो रानी सामदेवी भरथरी राजा के भीख देबाक लेल तैयार नहि भेली। भरथरी राजा के भेलनि “अगर रानी भीख नहि देती त साधना बीचहि में अटकि जैत। फेर की हैत? गुरु दीक्षा भेटबे ने करत. फेर बैकुण्ठ कोना प्राप्त हैत?” अंततः गुरु गोरखनाथ स्वयं अबैत छथि. रानी सामदेवी के पूरा बात बुझबैत छथिन। आब रानी मानि जैत छथि आ भरथरी राजा के भीख द दैत छथिन। एकर बाद भरथरी राजा के अपना संगे गुरु गोरखनाथ जोगीक गहन तपस्याक हेतु बोन में लेने जैत छथि।
ओही दिन सं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माए सं भीख मंगबा में सफल भ जैत।मिथिला कहियो वैराग्य के स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवन में रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक। ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माए सं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक।
नानी कथो कहथि आ बीच-बीच में गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल।नानी सेहो कानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथा में मस्त – एक सुनेबा में मस्त आ दोसर सुनबा में मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैत छलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़ में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्य कलाकार नानी आ एक मात्र श्रोता हम मुदा दुनु के आंखि, ह्रदय, आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथा वाचिका केर गुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतःकरण में कथा के बसेला सं अबैत छैक।
हमरा एकाएक स्मरण भेल जे दिन में नाथ जोगी किछु मैनावती आ गोपीचंद केर गीत सेहो गबैत छल। हम नानी के स्मरण दियेलएनि। नानी कहली: “गोपीचंद आ मैनावती केर प्रसंग भरथरी राजा के जोगी बनलाक बाद अबैत छैक। गोपीचंद केर प्रसंग सेहो बड़ा रोचक छैक। बड्ड राति भ गेल। आई सुनब की काल्हि?” हमर जिज्ञासा प्रबल छल। भेल एखने सुनि ली। नानी के कहलिएनि: “हमरा निन नहि लागल अछि। गाथाक अन्तिम भाग जानबाक उत्कंठा सेहो अछि। ताहि निक यैह रहत जे लगले में मैनावती आ गोपीचंद केर कथा सेहो सुना दी अहाँ?” नानी सहज भाव सं हमर निवेदन के स्वीकार करैत कथा कहनाई प्रारंभ केलनि।
गोपीचंद एक संस्कारी पुत्र छथि पदामसेन राजा आ मैनावती रानी के।मैनावती भरथरी के बहिन छथिन।गोपीचंद के चंद्रावल नामक एक सहोदर बहिन छथिन। जवान भेला पर गोपीचंद के विवाह होइत छनि। संयोग सं पहिल पत्नी सं हिनका पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लोभ में ब्याकुल रानी पद्मावती अपन असगर पुत्र गोपीचंद के दोसर विवाह कर दैत छथिन। दोसरो पत्नी सं गोपीचंद के पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लालषा में मैनावती गोपीचंद के तेसर, चारिम, पाचम करैत १६ टा विवाह करा दैत छथिन। विधनाक विधान देखू, गोपीचंद के १६ रानी सं १२ पुत्री त भ जैत छनि मुदा बेटा एकौटा नहि।मैनावती अंत में अपन भाई भरथरी जे नाथ जोगी भ गेल छथि के बजबैत छथि आ अपन रोदना पसारैत छथि। कहैत छथिन: “अगर हिनका पुत्र नहि भेलनि त समस्त राजपाट समाप्त भ जैत। वंशक अंत भ जैत। कियोक पितृ के तर्पण देब लेल नहि रहत। एहेन जीवन जीब सं बढियाँ जे आत्महत्या क ली? किछु उपाय करू हे भाई भरथरी जाहि सं गोपीचंद के एक पुत्र भ जाईन।”
जोगी भरथरी कनि ध्यानस्थ होइत छथि। फेर चिंतित भ कहैत छथिन: “बहिन दाई, बड्ड दुखक बात! भागिन गोपीचंद के संतानक योग नहि छनि। हम एहि में किछु करबा में असमर्थ छी।” ई बात सुनि रानी मैनावती बिलाप करै छथि। बड्ड जोर-जोर सं कनैत छथि।कहैत छथिन: “हम किछु नहि जनैत छी। अहाँ कोनो युक्ति निकालू जाहि सं गोपीचंद के पुत्र होनि!” आब आरो गंभीर होइत भरथरी कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर भागिन राजमहल त्यागि घनघोर बोन में नाथ जोगी बनि तपस्या करथि त हिनका पुत्र भ सकैत छनि।” ई बात सुनि मैनावती रानी झमा खसैत छथि। मुदा भरथरी के बुझेलाक बाद अपन पुत्र के जोगी बना बिजन बोन में जएबाक लेल कहैत छथिन।
गोपीचंद माए केर आज्ञा पाबि सोलहो रानी लग जैत छथि आ भरथरी जी के निर्णय बतबैत छथिन। सोलहो रानी पुत्र आकांक्षा के ध्यान में रखैत छाती के पाथर क लैत छथि आ अपन पति राजा गोपीचंद के जोगी बना बीजन बोन में भेजि दैत छथि।
बोन में गेलाक बाद गोपीचंद घोर साधना में लागि जैत छथि। दिनभरि जंगल में साधना आ साँझ पहर भिक्षाटन लेल नगर आ ग्राम केर यात्रा हाथ में सारंगी लेने वैराग्य केर गीत गबैत। यैह हिनकर सब दिनका जीवन भ गेल छनि।
एक दिन भिक्षाटन के क्रम में घुमैत-घुमैत गोपीचंद अपन बहिन चंद्रावल के सासुर चैल जैत छथि। जोगी के देखि चन्द्रावल घर सं भीख देबा ले बाहर भेली। देखैत छथि जे ई जोगी कोनो आन नहि अपितु हुनकर सहोदर भाई राजा गोपीचंद छथि।कुहेस फाटि गेलनि। आंखि अन्हार भ गेलनि. धम्म सं धरती पर चित्ते खसली। जखन लोक उठेलकनि त पता चललैक जे प्राण त्यागि देने छथि। गोपीचंद के सहोदर के ममत्व जागि जैत छनि। बफारि मारि-मारि कनैत छथि। मुदा आब की चंद्रावल बहिन त समाप्त भ गेल छथिन! हिम्मत नहि हारेत छथि गोपीचंद। चट्टे गुरु गोरखनाथ लग बहिन के पुनः जियेबाक हेतु जैत छथि. बहुत अनुनय विनय करैत छथिन. कहैत छथिन: “बरु हम्मर प्राण ल लिय मुदा बहिन दाई के जिया दियौन।” गुरु गोरखनाथ द्रवित भ जैत छथि आ गोपीचंद संगे चंद्रावल केर मृत शरीर लग अबैत छथि। हुनकर स्पर्श मात्र सं चंद्रावल जीब जैत छथि आ उठि क बैस जैत छथि। आब चंद्रावल अपन भाए गोपीचंद लेल गुरु गोरखनाथ सं निवेदन करैत छथिन जे हुनका पुत्र होबाक बरदान देथुन।गुरु गोरखनाथ भाए-बहिन के अपूर्व प्रेम देखि बड्ड प्रसन्न होइत गोपीचंद के पुत्र प्राप्त हेबाक आशीर्वाद त दईते छथिन संगहिं अमर होबाक बरदान सेहो दैत छथिन। गोपीचंद ख़ुशी-ख़ुशी अपन राजमहल वापस आबि जैत छथि।
एहिकथा गाथा के प्रसंग बहुत निक अछि। एक बात त ई छैक जे राजा भरथरी,रानीसामदेवी,रानीमैनावती, गोपीचंद, चंद्रावल, आ गुरु गोरखनाथ सब कियोक मिथिला के चरित्र नहि छथि। मुदा जोगी परंपरा सं जुड़ने कथा में स्थानीय भाव आबि जैत छैक। लोक जोगी के केवल भीख देबाक हेतु नहि बजबैत छैक। जोगी अपन सारंगी आ सुमधुर कंठ के कारण एक लोक कलाकार सेहो बनि जैत अछि। गाथाक भावनात्मक पक्ष अतेक प्रबल छैक जे मिथिलाक लोक सेहो कथा के अनेक प्रसंग के उदासी, चौमासा, छौमासा, बारहमासा के रूप में लोकगीतक स्वरूप में गबैत छथि।अहि तरहे ई कथावाचना जोगी आ गृहस्त दुनु के द्वारा गैल जैत अछि।एक कला के मात्र कलाप्रशंशक अथवा श्रोताक संग-संग अनेक प्रकारक कलाकार– गीतकरचना करनिहार, गेनिहार/गीतगैन, कथावाचक, कथावाचिका – सेहो भेट जैत छैक।रचना के कारण भाषा सेहो संपन्न होइत छैक। नव शैली, शब्दाबली के प्रयोग होइत छैक। ई मूल कथा मालवा सं बहुत क्षेत्र के भ्रमण करैत भोजपुरी क्षेत्र होइत मिथिलाक माटि में प्रवेश करैत छैक। गोरखपुर भोजपुरी क्षेत्र छैक ताहि कारने नाथ जोगीक भाषा भोजपुरी भ जैत छैक। ओ मूल गीत भोजपुरी के लोक स्वरुप में गबैत छैक।ओहि स्टाइल के कॉपी मिथिला में सेहो लोकगीत (जोगी गीत) में बहुत उत्तम रूप में भेटैत छैक। दुनु भाषा – मैथिली आ भोजपुरी – सहोदरा अर्थात गंगा जमुना जकां एक भय भव्य रूप सं हिलकोरा मारैत कल-कल करैत बहैत रहैत छैक।जखन गरीबी, भावनात्मक टूटन, असफलता, अपमान आदि सं व्यथित भ कुनो युवक नाथ सम्प्रदाय के सदस्य बनि जोगी भ जैत छथि त कथा ओहि व्यक्ति, ओकर माता-पिता, पत्नी-संतान, भाए-बहिन, समाज आ गाम लेल एकभावनात्मक आ जिवंत बात भ जैत छैक।लोक झट दनि अपना आप के चरित्र सं जोड़ लगैत छथि। भरथरी, मैनावती, गोपीचंद एकाएक सब जीब जैत छथि। गीत में नव रक्त प्रबह्मान भ जैत छैक, स्वक्ष आ फ्रेश ऑक्सीजन साँस लेबाक लेल भेट लगैत छैक।मालवाक कथा एकहि क्षण में मिथिला के कथा भ जैत छैक।
ओ महिला सब जिनकर पति मिथिला सं बाहर रहैत छथिन काज धंधा के चक्कर में ओ सब अपन परदेसिया अथवा बिदेसिया पति के जोगी के रूप में देखि गीत गबैत छथि। विरहअपन चरम अवस्था में पहुच जैत अछि। एक एक आखर मर्म के आखर भ जैत छैक।एहने एक गीत देखू:
कथीलै प्रीति लागौलें रे जोगिया
प्रीति छोड़ेने चलि जाय
आंगन मोरा लेखे विजुवन रे जोगिया
घर लागै दिवस अन्हार
लाली पलंगिया सुन्न भेलै रे जोगिया
तकिया मोहि ने सोहाए
खुजल केश नीड़ भेलै रे जोगिया
काजर गेल दहाए
एहि गीत में विरहिणी नायिका के अपन पति बिना आंगन एकांत वन; घर दिनों में अन्हरिया राति जकाँ अन्हार, ललका सजल पलंग अनसोहानगर, तकिया मारुक लगैत छैक। खुजल केश बेकार लागि रहल छैक, अंखि सं नोरक धार कम होबाक नामे नहि लैत छैक। नोर केर धार काजर के मेटा देने छैक। ऐना लगैत छैक जेना ओकर पति नाथ जोगी बनि गेल हो। घर सं भागि गेल हो!
दोसर गीत में ई प्रदर्शित कैल जा रहल छैक जे राजा भरथरी जंगल में कारी मृग(हरिण) के शिकार करक हेतु गेल छथि। रानी के अपना राजा पर गर्व छनि। बुझल छनि जे बिना शिकार के नहि औताह। रानी रातुक रभस के तैय्यारी क रहल छथि. सोहागिन रानी अपन सौन्दर्य के चानन के लेप सं सुगन्धित, फुलक हार सं सुशोभित, आ माथक सिन्दूर सं मनमोहक केने छथि. मुदा ई की? आंगन केर प्रवेश पर एक जोगी सारंगी लेने गीत गाबि रहल छैक: “हे रानी! हम दूर देस केर जोगी छी. हमरा जल्दी-जल्दी भीख द दिय, हम अहाँक दुआरि छोडि दोसर अंगना भीख लेल चलि जैब।” बेचारी रानी के की बुझल जे ई जोगी आर कियो आन व्यक्ति नहि अपितु हुनके पति राजा भरथरी छथिन।
चानन रगड़ी सोहागिन हे गले फूलक हार
सिंदुरा से मंगिया भरलअछिहे सुख मास अखार
राजा गईले मृग मारन हे वन गईले शिकार
जोगी एक ठाढ़ आंगन में हे रानी सुनले मेरी बात
दए दीय भिक्षा जोगी के
हे ओ त छोड़त दुआर...
ओही दिनसं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माएसं भीखमंगबामें सफल भ जैत। मिथिला कहियो वैराग्यके स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवनमें रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक।ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माएसं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक।
नानी कथो कहथि आ बीच-बीचमें गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल। नानी सेहोकानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथामें मस्त – एक सुनेबामें मस्त आ दोसर सुनबामें मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैतछलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्यकलाकार नानी आ एकमात्र श्रोता हम मुदा दुनुके आंखि, ह्रदय. आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथावाचिका केरगुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतः करणमें कथाके बसेलासं अबैत छैक।
नम्रनिवेदन
ओहि समयमें जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्तिपर जोर द' लिख रहल छी। अहि लोकस्मरणमें जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओनानीक छनि आ जतए इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक।
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