विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली लोकगीत मे प्रोफेसर चण्डेश्वर झा केर सी.डी./डी.वी.डी. केर प्रयोग

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2017-01-01 · अंक 217

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसरचण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग
जीवन में किछु एहेन क्षण अबैत छैक जखन लोक अपना के अनेरे असहाय अनुभव करैत अछि सब किछु रहैत छैक आ किछु नहि रहैत छैक। एहने सन अवस्था एखन हमर भेल अछि। स्वर्गीयप्रोफेसरचण्डेश्वर झा के गीतक सी. डी. अथवा डी. वी. डी. पर तीन दिन सं लिखक प्रयास क रहल छी मुदा नहि क पाबि रहल छी। से कथी लेल? एहि लेल जे हुनकर सब किछु हुनके हाथक देल हमर व्यक्तिगत संकलन में हमर पुस्तकालय केर एक कोण में रहैत अछि। अचरज ई भ रहल अछि जे नहि त कुनो पोथी आ नहिये कुनो सी. डी./ डी. वी. डी. भेट रहल अछि। ऐना में आशीष अनचिन्हार हमरा पर उपकार केलनि आ यू टयूब केर लिंक भेजलनि जाहि में आ आरो लिंक सं तकला पर सब मिलाक प्रोफेसर चण्डेश्वर केर निम्नलिखित चारि गीत भेटल अछि:
(क) जोगिया मोर जगत सुखदायक दुःख ककरो नहि देल https://youtu.be/buED_dpmsxg
(ख) हे हरि हे हरि सुनिय श्रवण भरि अब ने बिलासक बेरा https://youtu.be/klSuYBZko4s
(ग) सबहक सुधि अहाँ लै छी हे अम्बे हमरा कियैक बिसरै छी हे https://youtu.be/KpKbUeeLG-0
(घ) बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटुम्ब भए गेल https://youtu.be/mXPmW8I-Dgg
एहि चारि गीतक माध्यम सं हुनका बारे में किछु लिखब झुझुआन सन लगैतअछि मुदा दोसर कोनो उपाय नहि अछि। जे अछि तहिये मे संतोष करैत लिख में भलाई।
प्रोफेसर चण्डेश्वर झा अपन सहज स्वभाव, गीत-नाद आ नाट्यक प्रति समर्पण, मैथिली वांग्मय के प्रति सोच, शास्त्र के प्रति ध्यान आ लोकज्ञान के प्रति अभिमानक कारने हमर प्रिय, सम्मानित आ अभिभावक तुल्य विद्वान आ गायक रहल छथि। हुनका संग आत्मीय लगाव १९९२ ईस्वी सं जे शुरू भेल से ४ जनवरी २०११ अर्थात हुनकर देहावसान दिन तक शाश्वत रहल। नित प्रगाढ़ होइत रहल। लगाव भौतिक आ शास्त्रीय ज्ञान दूनू कारने दुनू स्तर पर छल। भौतिक अहि हेतु जे जखन कखनो दिल्ली सं गाम जाई त हुनका सं भेंट अनिवार्य छल। सब तरहक गप्प – पारिवारिक शास्त्रीय। शास्त्रीय में साहित्य आ समाज; लोक आ शास्त्र दुनू के बीच परस्पर सामंजस्य, लेन-देन, आवाजाही। ओ एक के देह त दोसर के आत्मा बुझैत छला। भावुक होइत गप्प करैत छला। बीच-बीच में किछु गाबय लगैत छला। अतेक विषय सं लगाव रहैत छलनि जे बिना कहने हमहू भावुक भ जैत छलहुं।
प्रोफेसर चण्डेश्वर सं गप्प करैत ई अनुभूति होइत छल जेना ओ उपनिषद परंपरा केर ऋषि (गुरु) होथि आ हम घनघोर अज्ञानी शिष्य। हमर काज मात्र एक प्रश्न पुछब तक छल। ओ कनि गंभीर होइत शुरू भ जैत छला। उत्तर देथि। अपना आपके हमर मनोदशा में आनि जे हमर जिज्ञसा अथवा शंका भ सकैत छल तकरा बुझि जाथि आ कहथि, “कैलाशजी, अहांके एकर बाद एहनो प्रश्न भ सकैत अछि?” हम मंत्रमुग्ध होइत गरदनि हिला हाँ कहि दैत रहियैनआ ओ प्रश्नों केने जाथि आ ओकर निराकरण सेहो। ओहमरमनोदशा के ऐना हृदयंगम क लैत छला जे हम भाव विह्वल भ हुनका घंटों सुनैत रही। अहु चिंता सं मुक्त रही जे कुनो प्रश्न अथवा जिज्ञासा करबाक अछि। एकौ मिसिया समयक बरबादी नहि। भले हम विवेकानन्द नहि रही मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर झा कम-सं-कम हमर मोनक जिगेसा हेतु रामकृष्ण परमहंस सं एकौ रत्ती कम नहि छला। हमेशा अपन शोध, नव राग में अन्य रागक मिश्रण, निक गीतक रचना, फेर ओहि गीत के गेनाई, आदि विषय पर गप्प करैत छला। सेहो सहज आ निश्छल ह्रदय सं।
एक बात जे हुनका संगे भेलनि आ शायद ओ बात हुनका दीर्घायु नहि होमय देलकनि ओ बात छल विश्वविद्यालयकेर प्रबंधन आशिक्षक समुदाय केर तुच्छ राजनीति।एहि कारने ओ बहुत दुखी रहैत छला। अगर दरभंगा छोडि कोनो आन ठाम रहितथि त पद्मश्री कोनो पैघ बात नहि। मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर त ललित नारायण मिथिलायूनिवर्सिटी में बारिक पटुआ छला। लोक सभ जे शैक्षणिक कार्य में घासलेट आ तुच्छ राजनीति आ बितंडावाद में माहिर ओ सब हमेशा हिनकर संगीत साधना के वाधित करैत रहलथिन। कल्पना करू की जाहि यूनिवर्सिटी में एक जॉइंट रजिस्ट्रार अनेरे एक विद्वान प्रोफेसर केर विद्या क्षेत्र में बलगेंग करैक आ दोसर विद्वान सब इर्ष्या सं विद्वान के विपरीत जाथि ओत की भ सकैत अछि? सरस्वती भोकासी पारि कानती। सैह ने? सैह भेल। ओ मैथिली गीत, संगीत, लोक विद्या आदि पर बहु विषयक विद्वानक संग परियोजना करए चाहैत छला। कतेक बेर विश्विद्यालय अनुदान आयोग एवं अन्य संस्था सं अपन वैदुश्यक बल सं परियोजना हेतु धन सेहो आनि लैत छला मुदा विश्विद्यालय केर लोक सब हुनकर सब मनोरथ के अनेरे अड़ंगा लगा ध्वस्त क दैत छलनि.प्रश्न ई उठैत अछि जे एहेन संस्था के की हैत? परिणाम प्रत्यक्ष अछि।अकादमिक स्तर पर ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी के की हाल अछि से ककरो सं अज्ञात नहि अछि।
चण्डेश्वर जी मिथिलाक गामे गामे घूमि क लोक सब सं १५०० गीतक अद्भुत संग्रह केने छथि,विभिन्न राग पर आधारित एक सए सं अधिक गीतक रचना केने छथि।एकर अतिरक्त निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण सी. डी./ डी. वी. डी. (केसेट) केर निर्माण हिनकर मधुर स्वर में भेल छनि:
(अ) दुर्गति दूर करू माँ (सी. डी. एवं केसेट्स निर्माण)– २००५ ईस्वी
(आ)जागू गिरिजाजागू महेश (सी. डी. निर्माण) – २००६ ईस्वी
(इ) चंदा झा रचित मैथिली रामायण केर सुन्दरकाण्ड (सी. डी. निर्माण) – २००७ ईस्वी
मिथिला में रागक बात करैत चण्डेश्वर कहैत छला जे मैथिली साहित्य में धूर्त समागम पहिल रचना अछि जाहि में रागोल्लेख भेटैत अछि। उदाहरणस्वरूपरचना में राग एवं तालक विवरण प्रस्तुत अछि। प्रथम अंक में - विभास रागे गीतं, सालंगी रागे – पणिताले गीतम, वराली रागे – एकताली ताले गीतम, ललित रागे – एक ताली ताले गीतम, मालव रागे – एक ताली ताले गीतम, नटरागे – यति ताले गीतम, कानल रागे – प्रति ताले गीतम, द्वितीय अंक में – शालंगी रागे – यतिक त्रिताले गीतम, देशाख रागे – एकताली ताले गीतम, कोलाव रागे – परिमंठ ताले गीतम, धनछी रागे – एक ताली ताले गीतम अछि. एहि तरहें अगर प्रोफेसर चण्डेश्वर के मानी त मैथिली साहित्य में राग परंपराक यात्रा ज्योतिरेश्वर ठाकुर के समय सं प्रारंभ होइत अछि।
मुदा एक बात जे महत्वपूर्ण अछि ओ ई थिक जे एक तरह सं ओ स्वीकार करैत छथि जे मिथिला के इलीट या विशेष वर्ग में शास्त्रीय गीत आ संगीत केर परंपरा बहुत पहिने आबि गेल परन्तु जखन ओ गीत गबैत छथि त लोक सं अपना आपके जोडि लैत छथि आ वैह संपर्क, वैह सरोकार, वैह परिवेश आ अंत में आर त आर अपना आपके कतौं-कतौं नारी ह्रदय में घुसा लैत छथि। एकर निवारण हुनकर चारि गीत के जौ गंभीरता सं देखल जाय त स्वतः भ जैत।
आबएक-एक गीत पर कनि विचार करी:
प्रथम गीत प्राती अर्थात भोरक गीत छैक जे विद्यापति रचित थिक:
हे हरि हे हरि सुनिअ स्र्वन भरि, अब न बिलासक बेरा।
गगन नखत छल से अबेकत भेल, कोकुल कुल कर फेरा।
चकबा मोर सोर कए चुप भेल, उठिअ मलिन भेल चंद।
नगरक धेनु डगर कए संचर, कुमुदनि बस मकरंदा।
मुख केर पान सेहो रे मलिन भेल, अबसर भल नहि मंदा।
विद्यापति भन एहो न उचित थिक, जग भरि होएत निंदा।
ई गीत शृंगार आ भक्ति के सोन्हगर आंच में पाकल प्राती थिक। एकर चुनाव बहुत गंभीरता सँ चण्डेश्वर जी केलनि अछि। अपन बोलक उतार चढ़ाव सँ भोरक भान करबैत छथि। पुरुष स्वर में नारी मनोदशा के चित्रण केने छथि। से तखने संभव छैक जखन ओहि भाव आ संवेदना के आत्मसात कैल जाए। एक गायक के रुप में ओ नारीक ह्रदय के तह में प्रवेश क जाइत छथि। गीत पुरुष के बुझना जाइत मुदा अंतर्मन स्त्रीगण केँ। भोरक अनुभूति जखनो कखन एहि गीतके सुनब तखने हैत। गीत केवल ऑडियो छैक तकर लाभ श्रोता के ई भ सकैत छनि जे आँखि मुनि गीत सुनथि आ भाव के स्वप्नलोक में भ्रमण करथि। सुरुज केर इजोत, कोइली के बोल,भोरक सुगंध, नव् ऊर्जा सब किछु त भेटबे करत ओकरा संगे प्रेम, सृंगार आ भक्ति के अनुपम समंजस्यक भान अलग। एहि गीत में शास्त्रीय आ लोक दुनु केर मध्य आश्चर्यजनक मिश्रण भेटैत छैक। बुझना ऐना जाइत जेना ई गीत लिखले अछि प्रोफेसर चण्डेश्वर झा के गेबाक लेल। गीत सुनला बाद मोन में बैकुंठक शान्ति भेटैत छैक।
दोसर गीत:
सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे।
हमरा कियै बिसरय छी हे माताहमरा कियै बिसरय छी हे।
छी हम पुत्र अहीं के जननीसे तऽ अहाँ जनय छी हे।
एहेन निष्ठुर कियै अहाँ भेलौंकनिको दृष्टि नै दय छी हे।
क्षण-क्षण पल-पल ध्यान करय छीनाम अहीं के जपय छी हे।
रैन दिवस हम ठाढ रहय छीदरसन बिनु तरसय छी हे।
छी जगदम्बा जग अवलम्बातारिणी तरणि बनय छी हे।
हमरा बेरि कियै न तकय छीपापी जानि फेरय छी हे।
सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे।।
उपरोक्त गीत में जे की एक भक्ति गीत छैक जाहि में एक भक्त आर्त भाव सं भक्ति में लीन भेल भगबती सं अपन सम्बाद गीतक रूप में क रहल छैक,में एक नूतन प्रयोग ई छैक जे एहि में कनि झटकारकेर गति छैक मुदा संतुलन यथावत छैक। गति एहेन जे गायक एकरा बटगमनी के बाट देखबैत आड़िये धुडिये जेना भक्ति में लीन कुनो मंदिर दिश जा रहल होथि। भक्ति भावना में कोनो कमी नहि। अहि गीतक एक अद्भुत अनुभूति जँ पहिल गीत जकाँ एकरो आँखि मुनि आ कान खोलि क सुनब त अनुभूति हैत जेना एक भक्त स्नान ध्यान सँ निबृत भ अपन हाथ में अछिन्जल आ नाना तरहक फूल आ बेलपात सँ भरल फुलडाली लए भगबनाक ध्यान में लीन भेल गीत गबैत कुनो मंदिर में भगबती जगदंबा केर पूजा अर्चना के हेतु जा रहल हो। एकपेडिया रास्ता संगे शरीरक संग गीतक संतुलन बनएबाक हेतु गीत जेना कनि दौड़ैत हो। मुदा गति सँ गीत सुगीत बनैत छैक। एकर भाव आरो प्रबल भ जाइत छैक। भक्त केर आर्त भाव स्पष्ट होइत रहैत छैक। श्रोता अपना आपके गायक संगे ताल में ताल मिला ई गीत सुनि आ गाबि सकैत अछि।
बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल।
पहिरन में शिव के पीताम्बर देल।
सेहो छोड़ि शिवजी मृगछाला ओढ़ि लेल।
कोबर में शिब के जे तेल फुलेल देल।
सेहो छोड़ि शिबजी जे भसम लोपि लेल।
भोजन में शिबके खीर पूरी देल।
सेहो छोड़ि शिबजी जे भांग पिब लेल।
बड़ अजगुत भेलगिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल।।
ई लोककंठ में बसल महेशबानी अछि। एहि विलक्षण महेशबानी के गेबाक हेतु चयन कैल गेल अछि। गीत सुनब त मोनक घबराहट, बेमेल विवाहक पीड़ाक सँग-सँग भक्तक भगबान सँ स्नेहाधिक्य केर स्वतः आवेगक अप्रतिम अनुभूति भेटत। भावक सँग शब्दक उतार-चढ़ावक सँग लय में सेहो उतरब चढ़ब केर परंपरा में चलि जैब। शास्त्रीय राग चलैत छैक लेकिन एखुल्ला नहि लोकक ताल आ व्यवहारक सँगे। भाव भक्तिक आह्लाद केर अनुभूति हैत, खिदांश नहि। हिनक स्वरक पक्ष अतेक प्रवल छनि जे तमाम भाव के पाछा छोड़ैत आगु बढ़ैत जाइत छैक। गीतक आखर-आखर मोन में छपल जाइत छैक। शब्दक अर्थ छिलका जकाँ बाहर भेल जाइत छैक। तमाम अवगुणक सँग शिब प्रशंशनीय, वंदनीय, आ सहज स्वीकार्य छथि। शब्द कखनो काल भले भावना केर संप्रेषण में कमजोर भ गेल हो परंतु चण्डेश्वर जीक स्वर, हुनक सतत संगीत साधना आ शोधक कारणे एक एक शब्द के कान में जेना मिशरी के घोल जकाँ घुसा दैत हो। वाद्य यंत्र बोलक सहचर अछि, गीतक प्राबल्य छैक हुनकर सधल स्वर।
अन्तिम गीत पुनः विद्यापतिक रचित एक महेशबानी छैक:
आगे माई , जोगिया मोर जगत सुख दायक , दुख ककरो नहि देल।
दुख ककरो नहीं देल महादेव, दुख ककरो नहि देल।
एहि जोगिया के भांग भुलेलक, धतुर खोआए धन लेल।
आगे माई, कातिक गणपति दुइजन बालक , जग भर क नहि जान।
तिनका अभरन किछुओ न थिकईन, रतिएक सोन नहि कान।
आगे माईसोना रूपा अनका सुत अभरनअपन रुद्रक माल।
अपना सुत लए किछुओ ने जुरइनिअनका लए जंजाल।
आगे माईछन मे हेरथि कोटि धन –बकसथि
ताहि देबा नहि थोर।
भनहि विद्यापतिसुनुहे मनाईनथिका दिगम्बर भोर।।
अहु गीतक अन्तस में प्रवेश क जैत छथि गायक-साधक चण्डेश्वर झा. स्वर साधना में अतेक प्रवीन जे बिना कुनो अवरोध के गबैत रहैत छथि। गीत घुसकैत नहि दौरैत अछि।शब्दक अनुरूप आरोहन अवरोहन अवश्य होइत छैक मुदा भावना के सम्प्रेषण त बेजोड़ छैक। गायक गीत संगे न्याय करैत छथि, विद्यापति संगे न्याय करैत छथि, आ अंततः गीतक भाव संगे न्याय करैत छथि।
स्पष्ट किनाई आवश्यक अछि जे हिनकर उपलब्ध सी. डी. अथवा डी. वी. डी. केर सम्बन्ध में हम कुनो छंद, ताल, मात्रा, अथवा रागक व्याकरण आ गणित केर सूत्र के आधार पर नहि लिखने छी। अहेन नहि त हमर शिक्षा अछि आ नहिये हमर सामर्थ्य। हमर प्रयास गीत सुनि, बुझि जे गीतक कोग्निटिक आ बोल केर भाव आ गायन के प्रति सामान्य श्रोता केर भाव जैत छैक तकर सम्बन्ध में वार्तालाप करब। सैह एहि में कएल गेल अछि।

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “मैथिली लोकगीत मे प्रोफेसर चण्डेश्वर झा केर सी.डी./डी.वी.डी. केर प्रयोग.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 217, 2017-01-01. https://www.videha.co.in/research/2017/217/मैथिली-लोकगीत-मे-प्रोफेसर-चण्डेश्वर-झा-केर-सी-डी-डी-वी-डी-केर-प्रयोग.htm

मूल विदेह अंक / Original issue