वन्दनाक स्वरूप
वर्तमान मे मिथिला क्षेत्र अपरिभाषित अछि। अपना अपना हिसाबें लोक एकर परिभाषा बनबैत अछि, पुरान कृति सब सॅं भौगोलिक सीमा उद्धरित करैत अछि। राजनीतिक कुचक्र तेहन सन बनलैक जे जेना परोसियाक आड़ि लोक काटि कए अपना खेत मे मिला लैत अछि तहिना एकरा लेल होमए लगलैक आ तखन एकर सीमा छोट होमए लगलैक।
एहन स्थिति मे मिथिलाक लेल कोनो राष्ट्रगान ताकब जरूर कठिन काज छैक। तथापि किछु उत्साही संस्था आ कार्यकर्ता लोकनि विद्यापति लिखित भगवती वन्दना “जय जय भैरवि...” कें आगू बढ़ौलनि। प्रचार भेल जे कोनो कार्यक्रमक प्रारम्भ मे भगवती वन्दना जरूर गाओल जाए आ सब गोटे आदरभाव देखबैत ठाढ भs जाइ। ई प्रथा कतए आ कहिया शुरू भेलैक से हमरा ज्ञात नहि अछि। मुदा हमरा जे बात कहबाक अछि तकरा लेल ई जरूरी नहि।
हम मानि लैत छी जे ई नीक बात भेल आ आशा करैत छी जे भगवती वन्दना सबकें पसिन्न परतनि। असली प्रश्न तकर बादे उठैत अछि – एहि वन्दना कें गाओल कोना जाए ? हम गीत संगीत शास्त्रक कोनो ज्ञान नहि रखैत छी आ जे किछु कहब से मात्र स्रोताक अनुभवक आधार पर। मैथिली कार्यक्रम मे हम किछुए दिन सॅं भाग लs रहल छी तें हमर अनुभव बहुत छोट अछि मुदा एतबे मे ई जरूर देखल जे एक ध्रुव पर कतहु कोनो ख्यातिप्राप्त गवैया हलहली सॅं युक्त भास पर रुकिरुकि कए गबैत अनेरे गीत कें बेर बेर तीरैत रहैत भेट्लाह तs दोसर ध्रुव पर कतहु अन्यत्र कोनो एहन बच्चा गीत गओलक जकरा ने पूरा वन्दना रटल छलैक आ ने ओकरा सामने गीत लीखल कागत छलैक। बेसी ठाम जकरा जेना मोन होइत छैक गाबि लैत अछि।
एहन स्थिति मे ठाढ़ भेल लोकक की कर्तव्य ? सहभागी बनए कि मात्र शोक प्रस्तावक स्थिति बला मौन धारण कएने रहए ? सहभागी बनि नहि सकैत अछि कारण लय बूझल नहि रहैत छैक। स्थिति बेसी कष्टकर भs जाइत छैक जखन हलहली आ गीत तीरबाक क्रम मे अत्यधिक समय लागि जाइत छैक। सहभागी नहि रहला सॅं उचिते प्रतीक्षाक समय अखरs लगैत छैक। आ यदि कोनो बच्चा गलतीए गाबि रहल अछि तखन तs आरो खराप लगैत छैक।
ओना तs कहबी छैक जे पूजा आ प्रार्थनाक कोनो निश्चित विधि नहि होइत छैक मुदा राष्ट्रगानक सम्बन्ध मे किछु मानक जरूर रहक चाही। एही दृष्टिकोणें “जन गन मन ...” बला गीतक एकटा मानक लय भास बनलैक जाहि मे कोनो तरहक हलहली आ कि पाँती कें दोहरा कए तीरबाक प्रावधान नहि रहलैक। फल ई भेलैक जे कश्मीर सॅं केरल आ अरुणाचल सॅं राजस्थान तक मिलिट्री सॅं लs कए छोट इसकुलिया बच्चा तक सब लोक एके भास मे गीत सिखलक आ जखन राष्ट्रगान होइत छैक तखन देखनहि हेबैक जे अधिकांशतः लोक स्वतः गीत गाबs लगैत अछि, ओकरा व्यतिक्रमक कोनो डर नहि रहैत छैक। नीक कोरस गान अनेरे प्रस्तुत भs जाइत छैक।
की “जय जय भैरवि...” वन्दनाक एहन प्रस्तुति सम्भव नहि छैक ? जरूर छैक। एहि सम्बन्ध मे हम अपन अनुभव कहs चाहैत छी। पछिला शताब्दीक पचास--साठिक दशक के आसपास जे व्यक्ति मधेपुर हाइ स्कूलक छात्रावास मे रहल होएताह तिनका नीक जकाँ स्मरण हेतनि जे विद्यापतिक ई वन्दना छात्रावास मे प्रातःकाल सब बच्चा गबैत छल, ई अनिवार्य छलैक। ओहि गान लेल एकटा सरल भास बनल छलैक, कोना बनलैक, के बनौलनि से हमरा नहि बूझल अछि कारण ई परम्परा हमरा समय सॅं पूर्वहिं सॅं चल अबैत छलैक। मुदा एतेक जरूर छलैक जे ओ लय बहुत सुन्दर आ सरल छलैक आ सब बच्चा गाबि लैत छल। ई विद्यालयक प्रार्थना नहि, छात्रावासक प्रातःकालीन प्रार्थना छलैक। तहिना सायंकालीन प्रार्थना छलैक गीता सॅं उद्धरित अंश “त्वमादि देवः पुरुषः पुराणः .....”। एकरो लय भास सरल आ आकर्षक छलैक आ कोनो बच्चा कें गेबा मे दिक्कत नहि होइत छलैक। हम एखनहु ओहि लय मे ई वन्दना जखन तखन गबैत रहैत छी।
ईहो सोचब जे मधेपुर स्कूल एकमात्र एहन जगह छल जतए ई प्रार्थना कराओल जाइत छलैक, सम्भव नहि लगैत अछि। जरूर आनो आन स्कूल मे ई प्रथा रहल हेतैक, नीक प्रथाक नकल हेबे करैत छैक। भs सकैत अछि मधेपुर स्कूलक शिक्षक लोकनि अपनहि एहन निर्णय लेलनि अथवा कतहु आनठाम सॅं नकल केलनि। ईहो सम्भव जे मधेपुरेक देखादेखी अन्यत्र एहन प्रार्थना शुरू कएल गेल। जे छात्र एतुका छात्रावस मे रहि पढलनि आ बाद मे आन ठाम शिक्षक भेलाह हुनको इच्छा भेले हेतनि जे एहन प्रार्थना अपना स्कूल मे शुरू कराबी। एवं प्रकारें हमरा बुझने जरूर बहुत रास स्कूल रहल होएत जतए सरल लय मे ई प्रार्थना गाओल जाइल छल होएत।
जखन कोनो गीत संगीतक नामी कलाकार गाजा बाजा लs कए राष्ट्रगान “जन गन मन ...” गबैत छथि तखनहु हुनका ई विकल्प नहि रहैत छनि जे अपना हिसाबें ओकर लय बनाबथि। एहि गान लेल हुनका अपन प्रतिभा प्रदर्शित करबाक अवसर नहि भेटैत छनि। बाजा सॅं निःसृत धुन ओएह होइत छैक जे लोक कें सिखले छैक।
“जय जय भैरवि ....” वन्दनाक रूप मे सरल छैक, बहुत पैघ सेहो नहि छैक आ यदि लोक कनिको परिश्रम करए तs निश्चिते सीख लेत। यदि हम सब इच्छा रखैत छी जे विद्यापति लिखित वन्दना सर्वमान्य होअए तs पहिल शर्त होएत जे एकर एकटा सरल लय बनाओल जाए। ई काज सिद्धहस्त कलाकारे कs सकैत छथि। हमर लिखबाक प्रयोजन एतबे जे एहन मैथिल कलाकार लोकनि अपना मे मिल कए एहि विषय पर विमर्श करैत एहि वन्दनाक लय बनाबथु आ जे कोनो लय बनि जाइ तकरा सब गोटे सीख ली, ओकर अनुसरण करी। जहिना “जनगन मन ....” गबैत काल लोक रुकैत नहि अछि तहिना हमरा सब कें ईहो ध्यान राखs पड़त जे नव लय मे रुकबाक अथवा कोनो पाँती कें टेक देबाक (दोहरेबाक) प्रावधान नहि रहैक। तखने कोनो आयोजन मे जन साधारण ठाढ़ भs कए वन्दना मे सहभागी भs सकत आ लोक कें ठाढ़ होएब अखरतै नहि। आइ कालि यूट्यूबक जमाना मे गीतक लय कें प्रसारित करब कठिन काज नहि छैक।
आशा करी जे विद्वान मैथिल समाज एहि प्रश्न पर सकारात्मक विचार सॅं ध्यान दैत आगू बढ़ताह।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।