विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

वर्तमान मैथिली गीत-संगीत हमरा नजरिसँ

मनीष झा बौआभाइ · 2017-01-01 · अंक 217

मनीष झा बौआभाइ
वर्तमान मैथिली गीत-संगीत हमरा नजरिसँ
साहित्यमे अन्यान्य विधा जेंका गीत-संगीतक सेहो अपन वैशिष्ट्यता अछि. विदेह संपादन समूह द्वारा मैथिली गीत-संगीत केन्द्रित विषय पर आलेख हेतु विशेषांक निर्धारित करब एहि विधाक प्रति गंभीरताक द्योतक अछि. उक्त विषय पर विस्तृत आलेख शोधक विषय-वस्तु थिक, तैं एहि सभस’ फराक अपन व्यक्तिगत अनुभव स’ किछु लिखबाक चेष्टा मात्र क’ रहल छी. वर्तमान समयमे पारम्परिक गीतक अपेक्षा आधुनिक लोकगीत बेस प्रचलनमे अछि. कारण स्पष्ट अछि व्यावसायिक दृष्टिकोण. नव तूरक लोककें लटक झटक बेस रुचै छन्हि आ तदनुरूप गवैया ओ गीतकार सेहो ओहिमे रमबाक प्रयासमे वा कही जे फरमाइशकें यथासंभव पूर करबाक चेष्टा करैत छथि. पारम्परिक गीतक श्रोता वा कही जे खाँटी संस्कृति प्रेमी छथि त’ मुदा सीमित संख्यामे. आधुनिकतामे रमल नव पीढ़ीक नहि त’ गवैया लोकगीत कें गंभीरता स’ लैत छथि आ नें श्रोता. मैथिली गीत-संगीतक क्षेत्र वर्तमानमे कत्तेको कलाकारकें जीविकोपार्जन केर साधन बनल अछि. संगीत चाहे पारंपरिक होउ वा शास्त्रीय होउ वा आधुनिक होउ मैथिलीक सेवा क’ अर्थोपार्जन क’ जीवनयापन करब जतबे आह्लादक विषय अछि ततबे साहसिक डेग सेहो. साहसिक डेग स’ अभिप्राय ई जे वर्तमान जुगक अवधारणा अछि जे अहाँकें जाहि कोनो प्रतिभामे आत्मविश्वास अछि ओकरा आगाँ ल’ व्यावसायिक बनाउ आ अपन अभिरुचिक अनुसारे ओहिमे समर्पण भाव स’ योगदान देल जाउ, मुदा मैथिली गीत-संगीतक प्रति एकर विपरीत अवधारणा अछि जकर मुख्य कारण अछि अर्थोपार्जनमे अनिश्चितता. पूर्वक पीढ़ीमे अपवादस्वरूप किछुए लोक मुदा वर्तमान समयक बेसी-स-बेसी युवा एहि मिथककें तोड़बाक प्रयास केलनि अछि आ अपन जीविकोपार्जन केर साधन बनौलनि अछि.
आलेख हेतु देल गेल विषयमे किछु महत्त्वपूर्ण बिन्दु सभ पर अनुभव साझा करबाक प्रयास मात्र क’ रहल छी. गीत-संगीतक भाव पक्ष केर संदर्भमे एतबा जरूर देखल जाइछ जे, गीतकार जे कोनो गीत लिखैत छथि ओ सर्वबोधगम्य हेबाक चाही, जिनक शब्द लेखन आम जनक बोलचाल वा दैनिकीय भाषा मे नियमित प्रयोग मे अबैत होइक आ जकरा संगीतकार लोकनि कर्णप्रिय बना सुन्दर गवैयाक माध्यम स’ जन-जन धरि पहुँचेबाक प्रयास करथि. गीतमे क्लिष्ठता ओ साहित्यिक शब्दक चयन एक वर्ग विशेष धरि सीमित रहैत अछि जे अमूमन एक सामान्य श्रोता द्वारा स्वीकार्य नहि होइत अछि. मूलतः देखल जाए त’ संगीतक प्रारंभिक रूप गीतक शब्द होइछ तैं गीतकारकें शब्द चयन हेतु विभिन्न अभिरुचिक श्रोताकें ध्यान मे राखि मर्यादित गीत लिखक चाहियनि. वर्तमान मे मैथिली गीत संगीत मे देखौंसक प्रक्रिया बेस हाबी भ’ रहल स्थिति मे विकृतता आएब स्वाभाविक अछि. संगीत जहिना मनोरंजन हेतु आवश्यक विधा अछि तहिना भाषा-संस्कृति केर रूपमे वाहकक श्रेणीमे सेहो अबैछ तैं गीतकार-संगीतकार आ गायक लोकनिकें एहि बातक समुचित धेआन रखबाक चाही. तकनीकी पक्षक जत’ तक प्रश्न अछि गीतक शब्दक अनुरूपे संगीत वा संगीतक अनुरूपे गीतक शब्दक तालमेल परम आवश्यक होइछ, कोन गायकक कंठ मे कोन गीत बेसी रोचक लगैछ एहि सभ विषय पर सेहो ध्यान देल जाए त’ गीत आर बेसी अपन सुन्नर रूपमे निखरि क’ सोझा आबि सकैत अछि. प्रस्तुतिक दू गोट रूप वा त’ मंच वा स्टूडियो रेकॉर्डिंग जाहिमे वाद्य-वादन सेहो गीतकें तकनीकी रूप स’ मजगूती प्रदान करैत अछि. आइ-काल्हि स्टूडियो रेकॉर्डिंग के नवका चलन आएल अछि डी-टोन केर. डी-टोन कोनो आवाजक टोन कें अपना स्तर स’ बदलि देइत अछि जकर प्रभाव मे गायकक मौलिक स्वर केर अंदाज करब सेहो मोसकिल अछि. सुर स’ भटकैत गवइया लोकनि एखन एकर प्रयोग बेसी स’ बेसी करैत देखल जाइ छथि आ ई प्रथा हरियाणवी आ भोजपुरी संगीत स’ बेस प्रभावित अछि. यत्र-तत्र कम स’ कम लागत मे दिनानुदिन पसरि रहल स्टूडियो,कैसेट कंपनी आदि स’ मैथिली संगीतक कमजोर गुणवत्ता त’ देखबामे अबैत अछि मुदा नव-नव कम्पनी के खुजला स’ नव प्रतिभावान कलाकार लोकनिक वास्ते एकटा नीक माध्यम बनि सोझा अबैत अछि. मार्केटिंग पक्षक दृष्टिकोण ज’ देखल जाए त’ मैथिली गीत-संगीतकें व्यावसायिक रूप प्रदान करबा लेल मार्केट एखनो धरि व्यापक स्तर पर सक्रिय नहि भेल अछि. आन-आन भाषा के तुलना मे मैथिली गीत-संगीतक बाजार एखनो बड्ड छोट आ सीमित अछि. कीनिक’ सुन’ बला मनोवृति एखनो धरि नहि जागल अछि. एकर दुन्नू कारण भ’ सकैइयै, पहिल जे लोककें मनमोताबिक संगीतक उपलब्धता नहि होइ छनि वा दोसर जे विधा स’ जूड़ल लोक द्वारा फ़ोकट मे बंटबा बला प्रवृति जकर स्थिति कमोवेश साहित्ये बला अछि. हालांकि डिजिटल व्यवस्था भेला स’ उपलब्धता सहूलियत स’ भ’ रहल अछि आ कलाकार लोकनिकें मंच, एलबम,सिनेमा आदिमे लिखबाक,गेबाक ओ धुन बनेबाक अवसर भेटैत छनि जेकि कएक टा मायनेमे महत्त्व रखैत अछि. एहि डिजिटल जुगमे दर्शक/श्रोताक पसीनकें धेआनमे रखैत प्रायः अधिकाधिक कम्पनी वीडियो बना बजार मे वितरण करै छथि वा सोशल नेटवर्कक विभिन्न श्रोत स’ जन-जन धरि पहुँचेबाक प्रयास करै छथि. अधिकाधिक संख्या मे देखल जाए त’ विडियो शूटिंगमे गीतक केन्द्रित विषय स’ आंशिको रूप स’ तालमेल नैं खाइत अछि, मने गीतक विषय किछु आर मुदा अभिनय द्वारा किछु आर दर्शाओल जाइत अछि.एहि पक्ष पर गंभीरता लाएब सेहो ओतबे आवश्यक अछि.
मैथिली गीत-संगीत मे नैं गीतकारक अभाव छै आ नैं गौनिहार कें अभाव छैक मुदा सभस’ बेसी अभाव संगीतकारक देखबामे अबैछ. बनल-बनाएल धुन (ओ चाहे हिन्दी फिल्म संगीतक तर्ज पर होए वा आन-आन क्षेत्रीय भाषा केर तर्ज पर होए) आखर फिट क’ गीतकार द्वारा लिखब आ तदनुरूप गायक द्वारा ओकरा गाएल जेबाक प्रथा बेस जोर पकड़ने अछि. ओना संगीत विधा स’ जूड़ल प्रत्येक व्यक्ति के चाहियनि जे अपन-अपन अभिरुचिक क्षेत्रमे प्रशिक्षित होथु मुदा ताहूमे सभस’ बेसी खगता धुन बनेनिहारक अछि जेकि वर्तमान समयमे गीतकार ओ गायकक संख्याक तुलनामे बड्ड कम वा कहल जाए जे मात्र गिनल-चुनल लोक छथि. ओना एहि विधामे सभ दिने स’ गीतकार-संगीतकारक तुलनामे गायकक प्रसिद्धि बेसी रहल अछि, कारण गायक लोकनि अपन एक विशेष प्रकारक स्वरक बले समाजमे चिन्हल जाइ छथि संगहि मंचक सोझा स’ श्रोता/दर्शक स’ प्रत्यक्ष संवाद हेतु समय-समय पर उपलब्ध होइत रहैत छथि, एहेन सन स्थितिमे गायक लोकनिक एक इमानदार प्रयास अपेक्षित रहैत अछि जे ओ मंच पर वा कोनो साक्षात्कार मे गीत प्रस्तुति स’ पूर्व संगीतकार ओ गीतकारक नाओं केर उल्लेख करथि, कारण हुनकर प्रसिद्धिक पाँछा हिनका लोकनिक जोगदानकें नकारल नैं जा सकैत अछि. मैथिली गीत-संगीतमे कतबो विकृति आबि गेल छैक मुदा आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखबा लेल संख्या मे बढ़ोत्तरी अपेक्षित अछि. आलोचना वा तुलना ओत’ प्रभावी होइत अछि जत’ संख्या केर उपलब्धता अधिकाधिक होइछ. मैथिली गीत-संगीतकें अपन कर्मक्षेत्र बना गुजर-बसर केनिहार एक-एक कलाकारकें साधुवाद जे चाहे जाहि कोनो तरहें मुदा अपन मातृभाषाकें सेवैत अर्थोपार्जन क’ रहल छथि, बहुत हिम्मत के काज छैक. निवेदन जे भाषा संरक्षणक संग-संग संस्कृति संरक्षण पर सेहो ध्यान केन्द्रित करैत एहि क्षेत्रमे आगाँ बढैत छथि त’ से आर बेसी आह्लादक गप्प हएत. जय मिथिला. जय मैथिली.
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसरचण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग २.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली सी.डी. एल्बम

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसरचण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग
जीवन में किछु एहेन क्षण अबैत छैक जखन लोक अपना के अनेरे असहाय अनुभव करैत अछि सब किछु रहैत छैक आ किछु नहि रहैत छैक। एहने सन अवस्था एखन हमर भेल अछि। स्वर्गीयप्रोफेसरचण्डेश्वर झा के गीतक सी. डी. अथवा डी. वी. डी. पर तीन दिन सं लिखक प्रयास क रहल छी मुदा नहि क पाबि रहल छी। से कथी लेल? एहि लेल जे हुनकर सब किछु हुनके हाथक देल हमर व्यक्तिगत संकलन में हमर पुस्तकालय केर एक कोण में रहैत अछि। अचरज ई भ रहल अछि जे नहि त कुनो पोथी आ नहिये कुनो सी. डी./ डी. वी. डी. भेट रहल अछि। ऐना में आशीष अनचिन्हार हमरा पर उपकार केलनि आ यू टयूब केर लिंक भेजलनि जाहि में आ आरो लिंक सं तकला पर सब मिलाक प्रोफेसर चण्डेश्वर केर निम्नलिखित चारि गीत भेटल अछि:
(क) जोगिया मोर जगत सुखदायक दुःख ककरो नहि देल https://youtu.be/buED_dpmsxg
(ख) हे हरि हे हरि सुनिय श्रवण भरि अब ने बिलासक बेरा https://youtu.be/klSuYBZko4s
(ग) सबहक सुधि अहाँ लै छी हे अम्बे हमरा कियैक बिसरै छी हे https://youtu.be/KpKbUeeLG-0
(घ) बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटुम्ब भए गेल https://youtu.be/mXPmW8I-Dgg
एहि चारि गीतक माध्यम सं हुनका बारे में किछु लिखब झुझुआन सन लगैतअछि मुदा दोसर कोनो उपाय नहि अछि। जे अछि तहिये मे संतोष करैत लिख में भलाई।
प्रोफेसर चण्डेश्वर झा अपन सहज स्वभाव, गीत-नाद आ नाट्यक प्रति समर्पण, मैथिली वांग्मय के प्रति सोच, शास्त्र के प्रति ध्यान आ लोकज्ञान के प्रति अभिमानक कारने हमर प्रिय, सम्मानित आ अभिभावक तुल्य विद्वान आ गायक रहल छथि। हुनका संग आत्मीय लगाव १९९२ ईस्वी सं जे शुरू भेल से ४ जनवरी २०११ अर्थात हुनकर देहावसान दिन तक शाश्वत रहल। नित प्रगाढ़ होइत रहल। लगाव भौतिक आ शास्त्रीय ज्ञान दूनू कारने दुनू स्तर पर छल। भौतिक अहि हेतु जे जखन कखनो दिल्ली सं गाम जाई त हुनका सं भेंट अनिवार्य छल। सब तरहक गप्प – पारिवारिक शास्त्रीय। शास्त्रीय में साहित्य आ समाज; लोक आ शास्त्र दुनू के बीच परस्पर सामंजस्य, लेन-देन, आवाजाही। ओ एक के देह त दोसर के आत्मा बुझैत छला। भावुक होइत गप्प करैत छला। बीच-बीच में किछु गाबय लगैत छला। अतेक विषय सं लगाव रहैत छलनि जे बिना कहने हमहू भावुक भ जैत छलहुं।
प्रोफेसर चण्डेश्वर सं गप्प करैत ई अनुभूति होइत छल जेना ओ उपनिषद परंपरा केर ऋषि (गुरु) होथि आ हम घनघोर अज्ञानी शिष्य। हमर काज मात्र एक प्रश्न पुछब तक छल। ओ कनि गंभीर होइत शुरू भ जैत छला। उत्तर देथि। अपना आपके हमर मनोदशा में आनि जे हमर जिज्ञसा अथवा शंका भ सकैत छल तकरा बुझि जाथि आ कहथि, “कैलाशजी, अहांके एकर बाद एहनो प्रश्न भ सकैत अछि?” हम मंत्रमुग्ध होइत गरदनि हिला हाँ कहि दैत रहियैनआ ओ प्रश्नों केने जाथि आ ओकर निराकरण सेहो। ओहमरमनोदशा के ऐना हृदयंगम क लैत छला जे हम भाव विह्वल भ हुनका घंटों सुनैत रही। अहु चिंता सं मुक्त रही जे कुनो प्रश्न अथवा जिज्ञासा करबाक अछि। एकौ मिसिया समयक बरबादी नहि। भले हम विवेकानन्द नहि रही मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर झा कम-सं-कम हमर मोनक जिगेसा हेतु रामकृष्ण परमहंस सं एकौ रत्ती कम नहि छला। हमेशा अपन शोध, नव राग में अन्य रागक मिश्रण, निक गीतक रचना, फेर ओहि गीत के गेनाई, आदि विषय पर गप्प करैत छला। सेहो सहज आ निश्छल ह्रदय सं।
एक बात जे हुनका संगे भेलनि आ शायद ओ बात हुनका दीर्घायु नहि होमय देलकनि ओ बात छल विश्वविद्यालयकेर प्रबंधन आशिक्षक समुदाय केर तुच्छ राजनीति।एहि कारने ओ बहुत दुखी रहैत छला। अगर दरभंगा छोडि कोनो आन ठाम रहितथि त पद्मश्री कोनो पैघ बात नहि। मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर त ललित नारायण मिथिलायूनिवर्सिटी में बारिक पटुआ छला। लोक सभ जे शैक्षणिक कार्य में घासलेट आ तुच्छ राजनीति आ बितंडावाद में माहिर ओ सब हमेशा हिनकर संगीत साधना के वाधित करैत रहलथिन। कल्पना करू की जाहि यूनिवर्सिटी में एक जॉइंट रजिस्ट्रार अनेरे एक विद्वान प्रोफेसर केर विद्या क्षेत्र में बलगेंग करैक आ दोसर विद्वान सब इर्ष्या सं विद्वान के विपरीत जाथि ओत की भ सकैत अछि? सरस्वती भोकासी पारि कानती। सैह ने? सैह भेल। ओ मैथिली गीत, संगीत, लोक विद्या आदि पर बहु विषयक विद्वानक संग परियोजना करए चाहैत छला। कतेक बेर विश्विद्यालय अनुदान आयोग एवं अन्य संस्था सं अपन वैदुश्यक बल सं परियोजना हेतु धन सेहो आनि लैत छला मुदा विश्विद्यालय केर लोक सब हुनकर सब मनोरथ के अनेरे अड़ंगा लगा ध्वस्त क दैत छलनि.प्रश्न ई उठैत अछि जे एहेन संस्था के की हैत? परिणाम प्रत्यक्ष अछि।अकादमिक स्तर पर ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी के की हाल अछि से ककरो सं अज्ञात नहि अछि।
चण्डेश्वर जी मिथिलाक गामे गामे घूमि क लोक सब सं १५०० गीतक अद्भुत संग्रह केने छथि,विभिन्न राग पर आधारित एक सए सं अधिक गीतक रचना केने छथि।एकर अतिरक्त निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण सी. डी./ डी. वी. डी. (केसेट) केर निर्माण हिनकर मधुर स्वर में भेल छनि:
(अ) दुर्गति दूर करू माँ (सी. डी. एवं केसेट्स निर्माण)– २००५ ईस्वी
(आ)जागू गिरिजाजागू महेश (सी. डी. निर्माण) – २००६ ईस्वी
(इ) चंदा झा रचित मैथिली रामायण केर सुन्दरकाण्ड (सी. डी. निर्माण) – २००७ ईस्वी
मिथिला में रागक बात करैत चण्डेश्वर कहैत छला जे मैथिली साहित्य में धूर्त समागम पहिल रचना अछि जाहि में रागोल्लेख भेटैत अछि। उदाहरणस्वरूपरचना में राग एवं तालक विवरण प्रस्तुत अछि। प्रथम अंक में - विभास रागे गीतं, सालंगी रागे – पणिताले गीतम, वराली रागे – एकताली ताले गीतम, ललित रागे – एक ताली ताले गीतम, मालव रागे – एक ताली ताले गीतम, नटरागे – यति ताले गीतम, कानल रागे – प्रति ताले गीतम, द्वितीय अंक में – शालंगी रागे – यतिक त्रिताले गीतम, देशाख रागे – एकताली ताले गीतम, कोलाव रागे – परिमंठ ताले गीतम, धनछी रागे – एक ताली ताले गीतम अछि. एहि तरहें अगर प्रोफेसर चण्डेश्वर के मानी त मैथिली साहित्य में राग परंपराक यात्रा ज्योतिरेश्वर ठाकुर के समय सं प्रारंभ होइत अछि।
मुदा एक बात जे महत्वपूर्ण अछि ओ ई थिक जे एक तरह सं ओ स्वीकार करैत छथि जे मिथिला के इलीट या विशेष वर्ग में शास्त्रीय गीत आ संगीत केर परंपरा बहुत पहिने आबि गेल परन्तु जखन ओ गीत गबैत छथि त लोक सं अपना आपके जोडि लैत छथि आ वैह संपर्क, वैह सरोकार, वैह परिवेश आ अंत में आर त आर अपना आपके कतौं-कतौं नारी ह्रदय में घुसा लैत छथि। एकर निवारण हुनकर चारि गीत के जौ गंभीरता सं देखल जाय त स्वतः भ जैत।
आबएक-एक गीत पर कनि विचार करी:
प्रथम गीत प्राती अर्थात भोरक गीत छैक जे विद्यापति रचित थिक:
हे हरि हे हरि सुनिअ स्र्वन भरि, अब न बिलासक बेरा।
गगन नखत छल से अबेकत भेल, कोकुल कुल कर फेरा।
चकबा मोर सोर कए चुप भेल, उठिअ मलिन भेल चंद।
नगरक धेनु डगर कए संचर, कुमुदनि बस मकरंदा।
मुख केर पान सेहो रे मलिन भेल, अबसर भल नहि मंदा।
विद्यापति भन एहो न उचित थिक, जग भरि होएत निंदा।
ई गीत शृंगार आ भक्ति के सोन्हगर आंच में पाकल प्राती थिक। एकर चुनाव बहुत गंभीरता सँ चण्डेश्वर जी केलनि अछि। अपन बोलक उतार चढ़ाव सँ भोरक भान करबैत छथि। पुरुष स्वर में नारी मनोदशा के चित्रण केने छथि। से तखने संभव छैक जखन ओहि भाव आ संवेदना के आत्मसात कैल जाए। एक गायक के रुप में ओ नारीक ह्रदय के तह में प्रवेश क जाइत छथि। गीत पुरुष के बुझना जाइत मुदा अंतर्मन स्त्रीगण केँ। भोरक अनुभूति जखनो कखन एहि गीतके सुनब तखने हैत। गीत केवल ऑडियो छैक तकर लाभ श्रोता के ई भ सकैत छनि जे आँखि मुनि गीत सुनथि आ भाव के स्वप्नलोक में भ्रमण करथि। सुरुज केर इजोत, कोइली के बोल,भोरक सुगंध, नव् ऊर्जा सब किछु त भेटबे करत ओकरा संगे प्रेम, सृंगार आ भक्ति के अनुपम समंजस्यक भान अलग। एहि गीत में शास्त्रीय आ लोक दुनु केर मध्य आश्चर्यजनक मिश्रण भेटैत छैक। बुझना ऐना जाइत जेना ई गीत लिखले अछि प्रोफेसर चण्डेश्वर झा के गेबाक लेल। गीत सुनला बाद मोन में बैकुंठक शान्ति भेटैत छैक।
दोसर गीत:
सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे।
हमरा कियै बिसरय छी हे माताहमरा कियै बिसरय छी हे।
छी हम पुत्र अहीं के जननीसे तऽ अहाँ जनय छी हे।
एहेन निष्ठुर कियै अहाँ भेलौंकनिको दृष्टि नै दय छी हे।
क्षण-क्षण पल-पल ध्यान करय छीनाम अहीं के जपय छी हे।
रैन दिवस हम ठाढ रहय छीदरसन बिनु तरसय छी हे।
छी जगदम्बा जग अवलम्बातारिणी तरणि बनय छी हे।
हमरा बेरि कियै न तकय छीपापी जानि फेरय छी हे।
सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे।।
उपरोक्त गीत में जे की एक भक्ति गीत छैक जाहि में एक भक्त आर्त भाव सं भक्ति में लीन भेल भगबती सं अपन सम्बाद गीतक रूप में क रहल छैक,में एक नूतन प्रयोग ई छैक जे एहि में कनि झटकारकेर गति छैक मुदा संतुलन यथावत छैक। गति एहेन जे गायक एकरा बटगमनी के बाट देखबैत आड़िये धुडिये जेना भक्ति में लीन कुनो मंदिर दिश जा रहल होथि। भक्ति भावना में कोनो कमी नहि। अहि गीतक एक अद्भुत अनुभूति जँ पहिल गीत जकाँ एकरो आँखि मुनि आ कान खोलि क सुनब त अनुभूति हैत जेना एक भक्त स्नान ध्यान सँ निबृत भ अपन हाथ में अछिन्जल आ नाना तरहक फूल आ बेलपात सँ भरल फुलडाली लए भगबनाक ध्यान में लीन भेल गीत गबैत कुनो मंदिर में भगबती जगदंबा केर पूजा अर्चना के हेतु जा रहल हो। एकपेडिया रास्ता संगे शरीरक संग गीतक संतुलन बनएबाक हेतु गीत जेना कनि दौड़ैत हो। मुदा गति सँ गीत सुगीत बनैत छैक। एकर भाव आरो प्रबल भ जाइत छैक। भक्त केर आर्त भाव स्पष्ट होइत रहैत छैक। श्रोता अपना आपके गायक संगे ताल में ताल मिला ई गीत सुनि आ गाबि सकैत अछि।
बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल।
पहिरन में शिव के पीताम्बर देल।
सेहो छोड़ि शिवजी मृगछाला ओढ़ि लेल।
कोबर में शिब के जे तेल फुलेल देल।
सेहो छोड़ि शिबजी जे भसम लोपि लेल।
भोजन में शिबके खीर पूरी देल।
सेहो छोड़ि शिबजी जे भांग पिब लेल।
बड़ अजगुत भेलगिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल।।
ई लोककंठ में बसल महेशबानी अछि। एहि विलक्षण महेशबानी के गेबाक हेतु चयन कैल गेल अछि। गीत सुनब त मोनक घबराहट, बेमेल विवाहक पीड़ाक सँग-सँग भक्तक भगबान सँ स्नेहाधिक्य केर स्वतः आवेगक अप्रतिम अनुभूति भेटत। भावक सँग शब्दक उतार-चढ़ावक सँग लय में सेहो उतरब चढ़ब केर परंपरा में चलि जैब। शास्त्रीय राग चलैत छैक लेकिन एखुल्ला नहि लोकक ताल आ व्यवहारक सँगे। भाव भक्तिक आह्लाद केर अनुभूति हैत, खिदांश नहि। हिनक स्वरक पक्ष अतेक प्रवल छनि जे तमाम भाव के पाछा छोड़ैत आगु बढ़ैत जाइत छैक। गीतक आखर-आखर मोन में छपल जाइत छैक। शब्दक अर्थ छिलका जकाँ बाहर भेल जाइत छैक। तमाम अवगुणक सँग शिब प्रशंशनीय, वंदनीय, आ सहज स्वीकार्य छथि। शब्द कखनो काल भले भावना केर संप्रेषण में कमजोर भ गेल हो परंतु चण्डेश्वर जीक स्वर, हुनक सतत संगीत साधना आ शोधक कारणे एक एक शब्द के कान में जेना मिशरी के घोल जकाँ घुसा दैत हो। वाद्य यंत्र बोलक सहचर अछि, गीतक प्राबल्य छैक हुनकर सधल स्वर।
अन्तिम गीत पुनः विद्यापतिक रचित एक महेशबानी छैक:
आगे माई , जोगिया मोर जगत सुख दायक , दुख ककरो नहि देल।
दुख ककरो नहीं देल महादेव, दुख ककरो नहि देल।
एहि जोगिया के भांग भुलेलक, धतुर खोआए धन लेल।
आगे माई, कातिक गणपति दुइजन बालक , जग भर क नहि जान।
तिनका अभरन किछुओ न थिकईन, रतिएक सोन नहि कान।
आगे माईसोना रूपा अनका सुत अभरनअपन रुद्रक माल।
अपना सुत लए किछुओ ने जुरइनिअनका लए जंजाल।
आगे माईछन मे हेरथि कोटि धन –बकसथि
ताहि देबा नहि थोर।
भनहि विद्यापतिसुनुहे मनाईनथिका दिगम्बर भोर।।
अहु गीतक अन्तस में प्रवेश क जैत छथि गायक-साधक चण्डेश्वर झा. स्वर साधना में अतेक प्रवीन जे बिना कुनो अवरोध के गबैत रहैत छथि। गीत घुसकैत नहि दौरैत अछि।शब्दक अनुरूप आरोहन अवरोहन अवश्य होइत छैक मुदा भावना के सम्प्रेषण त बेजोड़ छैक। गायक गीत संगे न्याय करैत छथि, विद्यापति संगे न्याय करैत छथि, आ अंततः गीतक भाव संगे न्याय करैत छथि।
स्पष्ट किनाई आवश्यक अछि जे हिनकर उपलब्ध सी. डी. अथवा डी. वी. डी. केर सम्बन्ध में हम कुनो छंद, ताल, मात्रा, अथवा रागक व्याकरण आ गणित केर सूत्र के आधार पर नहि लिखने छी। अहेन नहि त हमर शिक्षा अछि आ नहिये हमर सामर्थ्य। हमर प्रयास गीत सुनि, बुझि जे गीतक कोग्निटिक आ बोल केर भाव आ गायन के प्रति सामान्य श्रोता केर भाव जैत छैक तकर सम्बन्ध में वार्तालाप करब। सैह एहि में कएल गेल अछि।

गजेन्द्र ठाकुर
मैथिली सी.डी. एल्बम
मैथिलीक किछु सी.डी. अल्बमक लिस्ट प्रस्तुत अछि।
गुणक दृष्टिकोणसँ जागे महतो आ जागे राउत क संग बिरासी सदा बेछप छथि। धनीराम महतोक सल्हेश आदिक दरभंगा रेडियो स्टेशनपर रसास्वादन केनिहार केँ ओ मोन पड़ि जेता। आब धनीराम महत दरभंगा रेडियो स्टेशनपरसेहो अनुपलब्ध छथि, दरभंगा रेडियो स्टेशन अपन आर्काइवसँ हुनका निकालत तहूपर संदेह अछि।
मिथिलाक लोकसंगीतक अल्बमक एकटा छोट सूची प्रस्तुत अछि।
धनीराम महतो (सल्हेश आदि दरभंगा रेडियो स्टेशन- आब अनुपलब्ध- दरभंगा रेडियो स्टेशन अपन आर्काइवसँ एकरा निकालत तहूपर संदेह)
कारिक झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (गंगा कैसेट्स)
सोखा झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (टी सीरीज)
https://youtu.be/p-LQS2ZHJ9o?list=PLTwW4p11kfqqUeI442nSqvoKWQ5aFs9bo
https://youtu.be/gZsK3ZwXpYA
https://youtu.be/Vmmighmi3hk
https://youtu.be/sYT5iTsC3a4
गोविन्द झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (गंगा कैसेट्स)
गहील माता के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स)
काली माइ के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स)
भुइंया बाबा के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स)
गंगा माइ के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स)
भुइया बाबा -भगैत प्रसंग- रमाकान्त पजियार (गंगा कैसेट्स)
बाबा बख्तौर भुइया बाबा- सकलदेव दास आ साथी (सुप्रीम वीडियो)
भक्त ज्योति (भगैत प्रसंग)- रंजीत पजियार (नीलम वी.सी.डी.)
बैताली यादव- तपेश्वर यादव आ कामेश्वर यादव (गंगा कैसेट्स)
कुँवर बृजवान- (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी]
भुखना-भुखनी- राम खेलावन महतो, नेथल मण्डल, महीन्दर यादव, राम असेश्वर दास, हेमू मुखिया आ बिल्टु मुखिया [गीत मैथिली संवाद मैथिली]
रेशमा चूहड़मल- रामवृक्ष ठाकुर एण्ड पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद मैथिली आ हिन्दी]
राजा सल्हेश- विदेशिया नाच पार्टी, देवेन्द्र साहनी आ पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी]
आल्हा रुदल झगरू बध- - विदेशिया नाच पार्टी, देवेन्द्र साहनी आ पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी]
संत बाबा करू खिरहरी- रुदल पजियार (जयश्री कैसेट्स) [गीत मैथिली आ हिन्दी संवाद हिन्दी]
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Suggested citation: मनीष झा बौआभाइ. “वर्तमान मैथिली गीत-संगीत हमरा नजरिसँ.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 217, 2017-01-01. https://www.videha.co.in/research/2017/217/वर्तमान-मैथिली-गीत-संगीत-हमरा-नजरिसँ.htm

मूल विदेह अंक / Original issue