दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन आइ किएक भऽ रहल छइ? हिन्दी साहित्यमे सेहो ई आन्दोलन उठल रहइ। किछु मुट्ठी भरि लोक साहित्यक मंचपर अपन नाओं कमाइले ऐ तरहक प्रयास कएला। स्थिति एतए तक पहुँच गेलै जे कथासम्राट प्रेमचन्दोक रचना जरा देल गेल।
“प्रेमचन्द दलित साहित्य नहि लिखला, ओ दलितकेँ अपमान केला।”
ऐ तरहक अनेकानेक घटना आ वक्तव्य मिडियामे अबैत रहल। कोनो-कोनो निष्पक्ष रचनाकारकेँ ऐ हल्लामे शामिल कऽ लेल गेल। मुदा आइ हिन्दीमे केतौ ‘दलित विमर्श’क नाराक प्रयोजन देखबामे नइ आबि रहल अछि।
साहित्य राजनीति नै छिऐ। साहित्यमे राजिनीति विषय-वस्तु भऽ सकै छै मुदा राजनीतिकेँ साहित्यमे प्रवेश भेने साहित्य मरि जाइ छइ। धनिया आ पालकक कियारी नै छी साहित्य..! साहित्यक विस्तृत संसार छइ। ऐ साहित्यकेँ बाभन, कायस्थ, राजपूत, भूमिहार वा पिछड़ा, अत पिछड़ा, अनुसूचित जाति आदिक साहित्यमे विभाजित नहि कएल जा सकैत अछि। तँए हमरा बुझने दलित साहित्यकेँ फुटकेबाक कोनो प्रयोजन नहि।
मैथिली साहित्यक एकटा सभसँ बड़का दुर्भाग्य रहल अछि छिजे किछु लोक साहित्यकेँ अपन खानगी सम्पैत बुझि लेलखिन। हुनका सभकेँ भेलैन जे जँ कहीं ई भाषा अनका हाथमे चलि जाएत तँ हमर हाथे हेरा जाएत। परिणाम भेलै जे उमेरक हिसाबसँ मैथिली दुबराइत रहली। पजरा सटैत गेलैन, डाँर झूकैत गेलैन। ऐ रूपे भाषाकेँ पकड़निहार सबहक पीढ़ी-दर-पीढ़ीक हाथमे नचार भऽ बिलखैत रहली।
भाषा पौती-मौनीक वस्तु नहि। आकि मुनहर कोठी वा बखारीक जिनिस नहि। ई किनको मरौसी डीह वा खेत नहि।
भाषा साहित्य तँ झड़-झड़ बहैत झड़ना थिक। साहित्यक धार होइत अछि जे मात्र अपन किनछैरेटा मे नहि वरन् किनछैरक संग-संग अपन बान्हकेँ तोड़ैत केतौ-सँ-केतौ धरि हृदय रूपी भूलोककेँ आप्लावित कऽ दैत अछि।
भाषाकेँ सुनब, पढ़ब, लिखब आकि बाजबपर जे एकाधिकार बुझैत छला ओ हमर मैथिलीकेँ मात्र जीआ कऽ रखने छला। कागजक किछु पन्नामे सिकुड़ल प्लाष्टि साड़ी जकाँ जीवित भाषाकेँ स्त्री विमर्श, वा नारी विमर्श, दलित साहित्य वा दलित विमर्श, पिछड़ल साहित्य वा पिछड़ल विमर्श अथवा कोनो जाति वा बेकतीक विमर्शमे बाँटलासँ साहित्यक विकास अवरूद्ध भऽ सकैत अछि।
दलित विमर्शकेँ फुटकेबाक आधार की?
(क) जे दलित आक-धथूर लिखने जाइ छैथ सभकेँ साहित्य मानि लेल जाए?
(ख) जे दलित, दलित पात्रक चित्रण साहित्यिक दृष्टिसँ कऽ रहल छैथ ओकरेटा दलित साहित्य मानल जाए?
(ग) साहित्यक विविध विधा यथा- नाटक, एकांकी, उपन्यास, कथा, कविता, आलोचना, समालोचनादि सभकेँ अलग-अलग दलित साहित्यक खानामे राखि देल जाए?
(घ) उच्च वर्गक रचनाकार द्वारा दलित चिन्तनकेँ दलित विमर्शमे राखल जाए?
(ङ) उच्च वर्ग द्वारा लिखित साहित्यकेँ दलित साहित्यमे कोनो स्थान नहि देल जाए?
(च) उच्च जातिकजे दलित पात्र छैथ, हुनकासँ सम्बद्ध साहित्यकेँ दलित साहित्यमे राखल जाए अथवा नहि?
ऐ तरहेँ दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक लेल अनेक विवादित विमर्श उपस्थित भऽ सकैत अछि। ओना एकटा विद्वान दलित विमर्शक मादे किछु नामक अनुशंशा केला अछि जे निम्नवत अछि[1]-
“विलट पाससान विहंगम, डॉ. बुचरू पासवान, डॉ. महेन्द्र नारायण राम, डॉ. फूलो पासवान, डॉ. तारानन्द वियोगी, डॉ. सुभाष चन्द्र यादव, डॉ. सत्य नारायण मेहता, डॉ. राजाराम प्रसाद, डॉ. लालपरी देवी, डॉ. अमोल राय,डॉ. रविन्द्र कुमार चौधरी, डॉ. जयनारायण यादव, डॉ. अशोक कुमार मेहता, डॉ. मेघन प्रसाद, डॉ. देव नारायण साह,डॉ. राम सेवक सिंह, श्रीमती विभा रानी, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री उमेश मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, डॉ. भुवनेश्वर गुरमैता, श्री राम भरोस कापड़ि भ्रमर, डॉ. रामावतार यादव, डॉ. अभय कुमार, सुश्री मंजू कुमारी, डॉ. ओम प्रकाश भारती, श्री कपिलेश्वर यादव, श्री विरेन्द्र कुमार यादव, श्री मोहन यादव, श्री नन्द विलास राय, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री उमेश पासवान, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’, श्री राम प्रवेश मण्डल, श्री संजय कुमार मण्डल, श्री अच्छेलाल शास्त्री, श्री राम विलास साहु, श्री बलराम साह, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री मिथिलेश मण्डल, श्री सुधीर कुमार ‘सुमन’ श्रीमती मुन्नी कामत, श्री ललन कुमार कामत, श्री फागु लाल साहु, श्री उपेन्द्र प्रसाद यादव।”
किछु रचनाकारक नाओं ओ रचना निम्नवत् अछि जे हमरा विचारे दलित विमर्शक सूची प्रस्तुत केनिहार समीक्षकेँ नजैरपर जनु नहि पड़लैन अछि। हमरा बुझने ऐ कोटिमे घनेरो कवि-कथाकार छैथ, जइमे किछु निम्नवत् अछि-
(1) सर्वश्री विभूति आनन्दक- ‘स्वाद’, ‘जानवर’, ‘काठ’ आ ‘खुल्ला’ कथा।[2]
(2) अनमोल झाक- ‘चेतना’, कुमार मनोज काश्यपक- ‘जरल पेट’, ‘जीतक आगू’, डॉ. शम्भु कुमार सिंह रचित-‘जेठ’ आ ‘पूस’, ‘गरमी’ आदि।[3]
(3) मनोज कुमार कर्ण ‘मुन्नाजी’क कथा- ‘रिलिफ’, ‘आरक्षित’, ‘काँट’ आदि।[4]
ललितक ‘पृथ्वीपुत्र’, धूमकेतुक ‘मोड़पर’, रामानन्द रेणुक- ‘दूध-फूल’, धीरेश्वर धीरेन्द्रक- ‘कादो ओ कोयला’,‘ठुमकि बहू कमला’, मनिपद्मक उपन्यास- ‘राजा सलहेस’, ‘नैका बनिजारा’, कथा- ‘फूटपाथ’, लिलि रे रचित-‘पटाक्षेप’, विद्यानाथ झा विदितक- ‘विप्लवी बेसरा’, ‘कौसिलिया’, गजेन्द्र ठाकुरक- ‘सहस्त्र शीर्षा’ आदि-आदि।
आइ सभसँ पैघ प्रश्न अछि, साहित्यकेँ फुटकबैबला राजा प्रधानमंत्री वा मुख्यमंत्री तथा हुनक मन्त्री मण्डलक सदस्य किनका मानल जाएत। हम जे कही ओ अहाँ मानि लेब? आकि अहाँ जे कहब ओ हम मानि लेब? नहि..!
हमर मैथिली भाषा आ साहित्य अखनो अल्प विकसित अछि। साहित्यक विकास हेतु संसाधनक धोर संकट अछि। मुट्ठी भरि लोक अपन कैंचा-कौड़ी जोड़िया-जोड़िया किछु पोथीक प्रकाशन करबा रहल छैथ। प्रकाशक रूपैआ लऽ कऽ पोथी तँ प्रकाशित कऽ दइ छथिन मुदा पोथीक प्रचार-प्रसार आ बिक्री केन्द्र आदिक असुविधासँ अथवा अपन भाषाक पोथी खरीदबाक अरूचिक कारणे हमर मैथिली सर्वव्यापी नहि भऽ पाबि रहल अछि।
संगे-संग ऐ आलेखक माध्यमसँ ईहो आग्रह करए चाहै छी जे जइ बेकती वा समूह द्वारा मैथिली साहित्यक सेवा आकि विकासक कार्य भऽ रहल हो हुनका सम्मान देल जाए, हुनका सहयोग कएल जाए। साहित्य सबहक सम्पैत छिऐ। साहित्यकेँ बेकती-विशेष, वर्ग विशेष आकि जाति विशेष वा समुदाय विशेषक बीच विभक्त नहि कएल जाए।◌ जय मिथिला- जय मैथिली।
[1] मैथिलीक दलित साहित्यकार, आलेख- ‘सम्प्रति’ दलित साहित्यकारक सूची- डॉ. शिव कुमार यादव, सम्प्रति अध्यक्ष मैथिली विभाग, मारवाड़ी कौलेज, भागलपुर। यू.जी.सी. संपोषित संगोष्ठीमे पठित आलेखक संचयन- पृ. १६६-१७०
[2] कथा संग्रह- काठ (विभूति आनन्द)
[3] विदेह विहनि कथा संग्रह- श्रुति प्रकाशन दिल्लीसँ प्रकाशित। पृष्ठ- 82, 83, 105
[4] विहनि कथा संग्रह- ‘प्रतीक’ (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) पृष्ठ- 60, 45, 39
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