लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावणी – मानवशास्त्रीय विवेचन
एक बेर प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन एकाएक हमरा पुछलनि, "मिथिला में कुन चीज़ थिक जे लोक आ शास्त्र, सब कला के एक सङ्गे जोड़ने अछि?"
हमरा भेल की उत्तर देल जाय? संयोग सँ किछुए दिन पहिने मधुश्रावनी कथा माँ सँ सुनि रेकॉर्ड केने रही आ बाद में ओकरा लिखने रही। भेल ई एक उत्तर भ सकैत छैक। हम झट दनि कहलियन्ह , "मधुश्रावणी पावनि”।
हमर उत्तर सुनि प्रोफेसर जैन बहुत प्रसन्न भेला। कहलथि, "बिलकुल सत्य कहैत छी। यैह सही उत्तर अछि। अहाँक मिथिला में ई गजब के पावनि अछि जे अनेक तरहक ज्ञान, शिक्षा, कला, के सिखबाक प्लेटफार्म नव व्याहल लड़की लेल तैयार करैत अछि। ई एक एहेन पावनि अछि जे लोक आ शास्त्र के जोड़ैत अछि। अहाँक जवाब सँ हम संतुष्ट छी।"
बात पर हम अतेक गौर नहि केलौं। कतेक दिन सँ मधुश्रावणी पर किछु लिखबाक इच्छा अछि मुदा आलस आ किछु आन कारणे नहि लिख पाबि रहल छी। सविता झा खान केर एक प्रश्न ओहो अति लघु प्रश्न अनेक दिशा के दरबज्जा खोलि देने अछि। जबाब एक ठाम सँ भेटब असंभव। खेपे खेपे अनेक ठाम सँ आनय पड़त। सैह क रहल छी। अहि बात पर सविता जी कहलनि, "आब थोड़ेक मधुश्रावणी पर लिखू"। हुनका नहि कहबाक हिम्मत नहि भेल। माँ के कहल मधुश्रावणी कथा के फेर पढनाई शुरू केलौं। ओहि में प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन केर जिज्ञासा (अथवा खोज) आ सविता झा खान के जिज्ञासा केर तत्त्व ताकय लगलौं। पहिल बेर में लागल किछु छैक जरूर। फेर भेल, "कतेक छैक?"
कतेक छैक आ कत-कत छैक ताहि बातक रहस्य तकबा लेल ओहि कथा के अनेक बेर पढ़लौं। एक मैथिल समाजक सदस्य के नाते पढ़लौं। एक मानव विज्ञान केर छात्र के रूप में पढलौं। सब सँ पैघ बात ई जे एक जिज्ञासु के रूप में पढलौं। हमरा जे भेटल सँ हमरा जनैत अपूर्व बात छैक। अपन ज्ञान आ समझ के हिसाब सँ ओकर संक्षिप्त व्याख्या क' रहल छी।
मधुश्रावणी अपन मिथिला में विवाहक पश्चात 13-15 दिन धरि के पाबनि छैक। जाहि में नाना तरहक फूल, पात, फड़ लोढ्नाई, पूजा केनाई, गीत गेनाई,विध बेबहार के संपादन, नियम निष्ठा के पालन, आ प्रति दिन कथा केर एक अथवा अनेक प्रसंग के समूह में बैस सुननाइ शामिल छैक। बरखा ऋतु में भेलाक कारने एकर नाम मधुश्रावणी बहुत सार्थक लगैत छैक। अगर विस्तृत फलक पर उदार भाव सं देखबैक त कहि सकैत छी जे मधुश्रावणी अपन मिथिला में मिथिला बला स्टाइल के हनीमून छैक। बरसातक मधुमास आ ताहि के मधुराति के जे आनंद मिथिला में छैक से कहाँ – प्रेमानन्द, परमानन्द!
मधुश्रावणी वस्तुतः एक सम्पूर्ण पाबनि छैक जाहि में लोक आ शास्त्र, पुरुष आ प्रकृति, मनुख के प्रकृति केर अवयव जेना पानि, नदी, पोखरि, गाछ, झाड़-पात, लत्ती-फत्ती, फूल-फल; जीव-जंतु, सांप, कीड़ा; धरती-अकास, समतल आ पहाड़ आदि के बीच कोना साम्य बनबैत सबहक संगे कोना जीबी, कोना रही तकर शिक्षा, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा देल जैत छैक। कोना स्थानीयता के सम्मान करैत समग्रता के भाव के स्वीकार करी, से शिक्षा देल जैत छैक। शिक्षा क्लास रूम सं अधिक ओपेन थिएटर जकां परिवेश में देल जैत छैक। जतय एक मांजल कथा वाचिका अपन कथा के ज्ञान सं आ अहु सं अधिक कथा कहबाक शैली सं नव व्यहिता के एक-एक कथा के खोइंछा छोड़ा-छोड़ा सुनबैत रहैत छथि। जखनओ कथा वाचिका कथा कहैत छथिन त ओ हरेक पात्र के अपना में समाहित क लैत छथिन। कथा केर पात्र जकां हंसनाइ, गेनाई, नहु-नहु बजनाई, जोर सं चिचियेनाइ, नाना तरहक जीव जंतु केर आवाज निकालनाइ, कहबाक शैली में उपर नीचा के भाव व्यक्त केनाई, सब किछु सर्वोत्तम। अभिनय केर पराकाष्ठा। ई एक एहेन स्टेज होइत छैक जाहि में स्त्री, पुरुख, देवता, दानव, जीव-जंतु, सबहक भूमिका मात्र एक कलाकार के करय पड़ैत छैक – वैह एक्टर, वैह डायरेक्टर। बीच में कुनो ब्रेक नहि। कतौं सं कुनो सहयोग नहि। मुदा बाह रे परंपरा मिथिला भूमि के आ बाह रे मैथिलानी! हरेक कथा वाचिका अपन दायित्व केर पालन बेजोड़ दंगे उत्कृष्ठता सं करैत छथि। अतेक प्रभावी ढंग सं जे, जे पूजैत छथि से त कथा सुनबाक हेतु बैसते छथि हुनका संगे आनो स्त्रीगन सब सुनैत रहैत छथि। जेहने कलाकार तेहने दर्शक – दुनू के बीच परफेक्ट हारमनी। आ कनिया के की कहब ओ चुपचाप एक गंभीर शिष्या जकां कथा वाचिका के हरेक शब्द के ज्ञानरूपी अमृत के एक एक बूंद मानि पिबैत रहैत छथि।
एहि में भूमि-चित्रण अर्थात अरिपन केर ज्ञान भेनाई सेहो आवश्यक छैक। मधुश्रावणी केर अरिपन में वर्गाकार बॉर्डर के भीतर सुरुज, चान, कलश, पुरहर,पातिल, साठी (षष्टिका), मैना पात, नागक लटपटाएल जोड़ी, नवग्रह, नौमात्रिका आ कमल फुल के बिम्ब के रूप में गौरी, कुसुमावती, पिंगला, लीली आ चनाई आदिक समावेश बहुत व्यवस्थित ढंग सं कैल जैत छैक। एक गोट नव डाबा पर माटि आ गोबर सं पांच टा साँप बना साटि देल जैत छैक। पांचो सांपक थुथुन में दुभि खोईस देल जैत छैक। अरिपन काढब अथवा पारब में सब बिम्ब के स्थान, दिशा, कोण, स्वरुप आदिक ज्ञान आ शैली में निष्णात भेनाई अनिवार्य होइत छैक। चूँकि ई पाबनि अहिबात, वंश बृद्धि एवं वर आ कनिया के शुभ सँ जुड़ल छैक तांहि परफेक्शन में कनिकबो कोताही के गुंजाइश नहि रहैत छैक।
पूजा में व्यवहरित सामग्री सं पता चलैत छैक जे बालिका के अहू बातक प्रशिक्षण देल जैत छनि जे ओ सब बस्तु के जानि लेथि। प्रतीकात्मक गौरी बनेबाक हेतु हरदि, कुसुमक फूल, सिंदुर, पान आ मेथी के पीसिक’ एक गोल आकृति केर प्रतिमा बना नव ढोरल सरबा में ठाढ़ क देल जैत छैक। एकरा अलावे मैना पात,नेवो, नीम, दूध, केरा पात, फूल, काजर, अरबा चाउर, चुडा, चुडलाई, चीनी, लाबा, आम, कटहर, केरा, अंकुरी, दही, सुपारी, बड़की-छोटकी इलायची, जाफ़र,लौंग, बड़का छोटका हडरी, बहेड़ा, नीमक पात, अमतौआ अनार, पखुआ, कुश, धामिक पात आदि के प्रयोग होइत छैक। अहि में अधिकांश बस्तु के एक नव वस्त्र में राखि एक पोटरी बना देल जैत छैक जकरा बिनी कहल जैत छैक। एहि बिनी के गौरी आ बिषहरि के स्वरुप मानि भोर साँझ पूजा अनिवार्य रहैत छैक।
मधुश्रावणी पूजा आ कथा नागपंचमी दिन सं प्रारंभ भ जैत छैक। प्रतिदिन पूजा भेल आ स्त्रीगन सब पूजा सं पहिने आ पूजाक बाद गीत गेलथि। पूजा में संस्कृत आ मैथिली केर अद्भुत मिश्रण बला शब्द आ मन्त्र भेटैत छैक यद्यपि पण्डित जी के कुनो भूमिका एहि में नहि रहैत छनि। एक अनुभवी महिला अन्य महिला केर सहयोग सं एहि कार्य के संपादन में कनिया के निर्देशित करैत छथिन। सब चीज़ सटीक होइक तकर विशेष ध्यान रहैत छैक। गौरी पूजन केर एक मन्त्र देखू त संस्कृत आ लोक शब्दावली के सुखद जोग पर आनंदित हैब:
“ऐ गौरी! महामाये, चानन डारि तोडैत एलहुं, सोहाग-भाग बटैत एलहुं, फूलक माला अहाँ लिअ, सोहाग-भाग हमरा दिअ, स्वामी-पुत्र सहित गौर्ये नमः।”
फेर पूजा करक विधान आ ककर बाद ककर पूजा करी तकर विस्तृत व्याख्या आ रुपरेखा निर्धारित रहैत छैक। एहि क्रम में गौरी केर पूजा के बाद कलश केर पूजा, बिषहरि केर पूजा, तकर बाद लगातार वैरसिक, चनाइ नाग, कुसुमावती, पिंगला, लीली नाग, शतभगिनी सहित गुसाउनि नाग, साठि आदिक पूजा होइत छैक। पूजा केर समाप्ति पर अनेक विनती जकरा बीनी कहल जैत छैक केर गायन महिला सब उच्च स्वर में भक्तिभाव सं करैत छथि। पांच बीनी में अन्तिम बीनी ई प्रमाणित करबा लेल तर्कसंगत छैक जे कोना एहि पाबनि में सब वस्तु संगे सद्भाव आ संग रहबाक उक्ति व्याप्त छैक:
दीप-दीप हरा जाथु घरा। मोती-मानिक भरथु घरा।।
नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु। पांच बहिन बिषहरी बढ़थु।।
बाल बसन्त भैया बढ़थु। डाढी-खोंढी मौसी बढ़थु।।
आशावरी पीसी बढ़थु। बासुकी राजा नाग बढ़थु।।
राही शब्द लए सुती। कांसा शब्द लए उठी।।
होइत प्रात सोना कटोरा में दूध-भात खाई।।
साँझ सुती प्रात उठी पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी।।
ब्रह्माक देल कोदारि विष्णुक चांछ्ल बाट।।
भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा। ताहि बाट आओताह ईश्वर महादेब।।
पडल गरुड़ केर ढाठ। आसतिक- आसतिक, गरुड़-गरुड़ ..
आब एहि गीत संग मिथिला चलू। मिथिला में बरसात के समय में खेत-पथार, पोखरि इनार, कलम-गाछी सब किछु पानि सं भरि जैत अछि सावन-भादब में। आब साँप आ नाना तरहक कीड़ा-मकोड़ा पानि के डर सं उचगर आ रुख स्थान दिस आबय लगैत अछि। मालक घर, मनुखक घर, चार, दरबज्जा आ कत-कत नहि आबि जैत अछि। अयबाक उद्देश्य कुनो ककरो छति पहुचेबक नहि अपितु पानि सं प्राण रक्षा आ भोजनक ब्योंत रहैत छैक। आ ठीक अही समय में मधुश्रावणी पाबनि पूजल जैत छैक। एकर उद्देश्य छैक जे हे नाग आ आन कीड़ा-मकोरा सब जेना मनुखक वंश वृद्धि होइत छैक तहिना तोरो सबहक होब। मनुख आ तों एक संग दोसर के रक्षा करैत एहि पृथ्वी पर निवास करैत रह। तोरा खेबाक लेल वस्तु आ पीबाक हेतु हम दूध अर्पित करैत छी। हमरा, हमर पति के आ सगा-सम्बन्धी के तों क्षति नहि पहुचाबह. हे नाग आ कीड़ा मकोरा के स्वामी शिव, हम अहांके पूजा अर्चना करैत छी। हे तंत्र केर जन्मदाता, हम अहांके निवेदन करैत छी, अहाँक यशगान करैत छी जे सब संगे हमरो सबहक रक्षा करू। हे नाग अहाँ रक्षा करू, हे गरुड अहुं रक्षा करू। अहि गीत के अगर ध्यान सं सुनब त लागत जे ई गीत कम आ तंत्रक मन्त्र अधिक अछि। एकरा गेबाक अंदाज, स्वर सब किछु अलग छैक। महादेब संगे ब्रह्मा, विष्णु केर सेहो गोहरायल जैत छनि एहि गीत में।
गाय केर गोबर, दूध आदिक प्रयोग गाय केर उपयोगिता के देखबैत छैक ओतहि नाना तरहक वस्तु के प्रयोग सब में सामंजस्य। पाबनि त मूलतः ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ में होइत छैक मुदा एकर विधान आ सामग्री के जुटान में अनेक जाति के सहभागिता होइत छैक। उदहारण के रूप में सरबा, मङ्गल कलश कुम्हार सँ;डाला, बियनि, चंगेरा आदि डोम सँ; लहठी चूड़ी आ अन्य वस्तु लहेरनी सँ एवं अन्य सामग्री बज़ार सँ आनल जाइत छैक। ई सामंजस्य कथो में अनेक ठाम अनेक प्रसंग आ उप-प्रसंग में भेटैत छैक। कथा केर मूल नायक आ नायिका - बाला लखेंद्र आ बिहुला, बनिया अर्थात सौदागर समाज सँ छैक। तंत्र के ज्ञान, गूढ़ रहस्य जे बुझबैत छैक से धोबिन छैक, धामि केर चर्च सेहो होइत छैक जे छोट जाति केर छैक। कथा स्थानीयता के सीमा के सेहो तोरैत एकरा सार्वभौमिक बनबैत छैक। से कोना? ऐना जे चरित्र सब मिथिला सँ बाहर के सेहो छैक। कथा में अनेक देवता, देवी, गण के भूमिका छैक। सब एक व्यवस्थित आ समन्वय के विधान के निर्माण करैत छैक।
आब पूजा के विधिवत समाप्ति के बाद कथा प्रारंभ होइत छैक। एक अनुभवी महिला जिनकर स्मरण शक्ति, उच्चारण आ कहबाक शैली के संगे गीत आ फकरा सुनेबा में महारत रहैत छनि से एहि कार्य के संपादन करैत छथि। कथा पांचो बहिनी बिषहरि सं शुरू होइत छैक। कोना एक बुढ़िया एक चिकनी पात में लहलहाइत पांच सापक पोआ के देखैत अछि। आ बूढी के गाम आबि ओकर वृतान्त कहब सं पूजाक पद्धति प्रारम्भ होइत छैक। फेर बिषहरी के जन्म होइत छनि।
दोसर दिन केर कथा एक नव मोड़ लैत छैक कारण एहि में एकाएक मनसा के प्रवेश होइत छनि। मनसा के प्रवेश होइते मातर नाग आ तथाकथित पैघ देवता (ब्रम्हा, विष्णु एवं अन्य) के बीच आ दुनु के भक्त के बीच द्वन्द प्रारंभ होइत छैक। बिहुला आ चंदु सौदागर क्लासिक देवता के पूजक छथि जिनका मनसा जे मूल रूप सं नागक देवी छथि आ जिनका बारे में इहो कहल जैत छैक जे ओ शिबक मानस पुत्री छथि, केर संग द्वन्द। चंदु सौदागर मनसा के अस्तित्त्व के स्वीकार नहि कर चाहैत अछि फलस्वरूप मनसा अपन नाग-नागिन सं ओकर सब संतान के डंसि क ख़तम केने जा रहल छैक। ओकर अन्तिम बालक केर नाम बाला लखेन्द्र छैक जकरा बारे में ई छैक जे ओकर जाहि दिन विवाह हेतैक ओही दिन मनसा के साँप ओकरा डंसि लेतैक आ अहि तरहे चंदु सौदागर के वंश समाप्त। आब चंदु की करे ? धैर्य सं काज लैत अछि। चंदु के पता चलैत छैक जे बिहुला नामक एक लड़की छैक जकरा अखण्ड सोहागबती रहबाक वरदान छैक। चंदु अपन पुत्र बाला लखेन्द्र केर विवाह बिहुला सं कर दैत छैक। दुनू लेल एक शीशा के घर बनैत छैक। मुदा साँस लेबाक हेतु एकै रत्ती भूर छोडि दैत छैक। ओहि भूर सं अपन नाग के भेजि मनसा बाला लखेन्द्र के डंसि लैत छैक।
आब की हो? बिहुला कहैत छैक, “एक केरा के थामक नाव बना जरुरी के सामान राखि हमरा बैसा दिय। हम अपन पति के माथ अपन कोरा में ल नदी के प्रवाह संगे बहैत एकर कुनो समाधान करय चाहैत छी।” सैह व्यवस्था होइत छैक। बिहुला अपन पति के लाश लेने नदी में चलल जा रहलि अछि। लाश आब गलनाई शुरू भ गेलैक मुदा बिहुला के हिम्मत एखनो दृढ़ छैक। जैत-जैत एक ठाम देखैत छैक जे एक धोबिन नदिक कछेर में कपडा धो रहलि छैक। ओकर एक छोट बच्चा बेर-बेर ओकरा परेशान क रहल छैक। तंग आबि धोबिन अपन बच्चा के कंठ मचोडि दैत छैक। बच्चा मरि जैत छैक. आब धोबिन निश्चिन्त भ कपडा धोबैत अछि। बिहुला के बड़ आश्चर्य भेलैक! “कोना एक माय अपन संतान के छोट बात लेल जान मारि सकैत अछि?” बिहुला सोचैत छैक। बिहुला के होइत छैक जे जरुर अहि में कुनो रहस्य छैक। आब ओ अपन नाव के कात लगा दूर सं धोबिन के निरिक्षण करैत छैक। जखन कपड़ा धोआ जैत छैक त धोबिन नदी सं अँजुर में पानि ल मन्त्र पढ़ैत बच्चा पर फेकैत छैक. पानि परिते देरी बच्चा फुरफुरा क उठि जैत छैक। बिहुला बुझि जैत छैक जे ई धोबिन सामान्य महिला नहि अछि। ओकरा हांक लगबैत अपन व्यथा कहैत छैक। आब कहानी में अते सं तंत्रक पूर्ण यात्रा शुरू होइत छैक। धोबिन के कहला पर बाला लखेन्द्र के लाश के ओतय छोडि दुनू गोटे शिव लोक में जैत छैक। बीच में अनेक कथा आ कथा केर उपकथा अबैत छैक। बिषहरी के कथा आ हुनकर बारह नाम – जगत गौरी, मनसा, जरत्कारू, वैष्णवी,सिध्ह्योगिनी, नागेश्वरी, शैवी, जरत्कारू-प्रिया, नाग-भगिनी, आसतिक माता, बिषहरी एवं महाज्ञानयुक्ता।
कथा खेपे-खेपे चलैत रहैत छैक – मंगला-गौरीक कथा, पृथ्वीक उत्पति केर कथा, समुद्र-मंथन केर कथा, सतीक कथा, पतिव्रताक कथा, महादेब केर परिवारक कथा, गंगाक कथा, गौरीक जनम, गौरीक तपस्या, गौरीक विवाह, मैनाक मोह भांग, कार्तिक आ गणेश केर जन्म, संध्या केर विवाह आ लीली केर जन्म,पतिव्रता सुकन्याक कथा, बाल बसन्त केर कथा, गोसाउनिक कथा, श्रीकर राजा केर कथा, आ अंत में गणेश भगबान द्वारा सोहाग माथब।
अहि बीच बिहुला केर कथा चलैत रहैत छैक। कथा सब में तंत्र छैक, बुझौअल, छैक, गीत छैक, सब किछु छैक। कथा में हिन्दू धर्म के बहुत मूल तत्व के ज्ञान सेहो छैक। स्त्रीगन के व्यवहार, ओकरा समाज में रहबाक लूरि, पति, संतान, श्रेष्ठ, देवता, पितर, आदिक सम्मान आदिक ज्ञान भेटैत छैक। ऊँच-छोट के भेद के कोना पाटिक जीवन के चलेबाक चाही तकर प्रशिक्षण देल जैत छैक। सब प्रमुख धार्मिक चरित्र आ आदर्श महिला के सम्बन्ध में विवरण देल जैत छैक। अहि तरहे मधुश्रावणी केवल पाबनि नहि अपितु 13-15 दिनक कार्यशाला होइत छैक जाहि में एक लड़की के ससुर जयबा सं पूर्व आ गृहस्थी सम्हारबा सं पहिने एक प्रशिक्षित महिला बना देल जैत छैक। ओ बच्ची सं दुलहिन आ फेर दुलहिन सं गुनमति नारि अथवा सम्पूर्ण मैथिलानी बनि जैत अछि।
मधुश्रावणी में नाग नागिन के मनुष्य स्वरुप में कल्पना कैल जैत छैक आ तदनुसार हुनका लेल वस्त्र, श्रृंगार, आभुषण सब किछु सं मोन में सुसज्जित के गीत गाबि स्मरण कैल जैत छैक। एक गीत देखू:
पियरी अँचरी बिषहरी के नामी-नामी केस।
घुमैत एली बिषहरी तिरहुत देस।
तोहरो सिंगार बिषहरी लाबा आ दूध।
हमरो सिंगार बिषहरी सिर के सिन्दूर।
तोहरो सिंगार बिषहरी कोर भरि पूत।
फल बीच गुअबा नवेद बीच पान।
देवी बीच बिषहरी मैया दोसर नहि आन।
मधुश्रावणी एक हिसाबे महिला के सत्ता के प्रतीक अछि. सब काज, विध, मन्त्र- पूजा महिला द्वारे प्रतिपादित होइत छैक। पुरुष केर कोनो भूमिका नहि। तंत्र के शक्ति एहेन जे छोट-पैघ सब एक ठाम आबि जैत अछि। सब तरहक देवता में आपसी सौहार्द्य के सूचक अछि मधुश्रावणी।
अंत में सब ठाम होइत नदी केर कछेर केर धोबिन संगे बिहुला वापस अबैत अछि. बाला लखेन्द्र के लाश में प्राण आबि जैत छनि। ओ आरो सुन्दर आ सोहनगर भ जैत छथि। चंदु सौदागर के सब बेटा आ सम्पति फेरो आबि जैत छैक। ओकर सब बेटा सेहो जिबित भ जैत छैक। चंदु आब आन देवता संगे अपन पुतहु के कहला पर बिषहरी आ मनसा के पूजा अर्चना शुरू क दैत अछि। सब किछु शुभ होमय लगैत छैक।
एहि पाबनि आ कथा के जे ध्यान सँ सुनल जाय आ एकरा गुनल जाय त पता चलैत छैक जे शास्त्र पर लोक जेना कतौ-कतौ भारी पड़ैत हो! अंततः, चंदू सौदागर के भले अपन पुतहु आ बेटा के कारणे, मनसा देवी आ विषहरी के प्रभुत्व मानबाक हेतु बाध्य होमय पड़ैत छैक। एहि कथा में एक बात स्पष्ट ई होइत छैक जे अगर बहुत बात शास्त्र मर्यादा के नाम पर बहुत बात अथवा क्रिया अथवा दृष्टान्त देबा लेल मना क दैत छैक मगर लोक ओही बात लेल ओकर व्यवहारिक पक्ष के देखैत उदार भ जाइत छैक। उदाहरण के रूप में लोके में ई हिम्मत भ सकैत छैक जे गौरी के छिनारि कहैंन; महा मर्यादित महादेव के मैथुन आ काम कर क्रिया में लिप्त देखा देनि। यद्यपि उद्देश्य शिक्षा ग्रहण करक होइत छैक। एकर एक अर्थ एहो भ सकैत अछि जे नव व्याहता के ई बता दी जे काम अथवा यौन क्रिया शाश्वत प्रक्रिया छैक। एकरा मनुष्य आ जिव जंतु के बाते छोड़ि दी देवता, देवी सब स्वीकार करैत छथि सृष्टि के चलेबाक हेतु अहि में संलग्न रहैत छथि। ई कदाचित सफल गृहस्थ जीवन जीबाक मूल मंत्र छैक।
मधुश्रावणी पाबनि केर लिंक सूत्र छैक मनसा आ विषहरी केर आराधना। मनसा अर्थात नागक देवी। मनसा आर्थत ओहेन देवी जिनका शक्ति त छनि मुदा हुनकर सत्ता मानबाक लेल मुख्यधारा के देवी देवता केर भक्त सब सहज भाव सँ तैयार नहि अछि। मनसा एक एहेन देवी छथि जे अपन छोट स्वरुप अर्थात स्थानीय स्वरुप के विस्तार अखिल भारतीय स्वरुप में करय चाहैत छथि। मनसा के इच्छा छनि जे हुनका सब वर्ग, जाति आ समाज के लोक पूजा करय, हिनकर गुणगान करय। मुदा ई काज ओतेक सहज नहि अछि। छोट जाति के लोक हिनकर सत्ता के स्वीकारि लेलक। स्त्रीगण सेहो ओही दिस बिदा भेली मुदा पुरुख कोना मानत? ई कनि पैघ प्रश्न अछि। मनसा हिमालय सँ चलैत छथि आ नेपाल, तराई बला मिथिला, भारत बला मिथिला, असम, बांग्लादेश, बंगाल, ओड़िसा, होइत फेरो मध्य आ उत्तर हिमालय धरि व्याप्त रहैत छथि - उत्तराखंड, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश धरि। मनसा संगे बिहुला केर कथा नेपाल, मिथिला, बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा धरि मूल कथा सँग डारि-झारि में कनि-मनि फेर बदल सँग चलैत रहैत अछि। उत्तराखंड आ हिमाचल में मनसा केर अनेक कथा प्रचलित अछि। साँप के प्रभाव आ भय के स्वीकार करैत लोक वर्ग, समुदाय, लिंग आ जातिक सीमा सँ उपर उठैत मनसा देवी के समक्ष नतमस्तक होइत छथि। यैह प्रभाव मिथिला में सर्वहारा वर्ग में आ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ केर स्त्रीगण में भेटैत अछि।
मुदा हमरा अगर हम समाजशास्त्रीय ढंग सं मधुश्रावणी केर विवेचन करैत छी त ऐना लगैत अछि जे पितृसत्तात्मक समाज किछु अनरगल प्रभाव एहि में बिध आ पूजा के नाम पर घुसा देने छैक जाहि सं मानशिक स्तर पर महिला सब ओहि परम्परा के नाम पर अपना के स्वयम शोषित आ प्रतारित करैत रहैत छथि। अनेक ठाम सती केर महत्त्व के गुणगान कथा सब में अनेक बेर अबैत छैक। धर्म, पूजा-पाठ, गिरहस्ती, प्रेम-अनुराग, तंत्र-मन्त्र, पितृ, देवता, प्रकृति, प्रकृति केर अवयव – फुल, पात, साँप, चिरै, धर्म ग्रन्थ केर सार; निक आ अधलाह में अंतर करब, पुन्य आ पापक बीच अंतर आ निक मार्ग केर चुनाव, मानवधर्म केर पालन,स्त्री धर्म केर निर्वहन, आर ने जानि की की मुदा एहि पाबनि केर अन्तिम दिन जे कनिया के ठेहुन टेमी सं दगबक प्रथा अछि से बड़ अमानवीय। बल्कि ई कहि सकैत छी जे सती प्रथा के बांचल हिस्सा जकां अछि। सब महिला, माय, पितियाईन, दाई, सखी-बहिनपा एहि बात सं दुखी रहैत छथि जे कोना एहि जरैत टेमी के सेहो एक बेर नहि तीन-तीन बेर धाह केर घाव के वर्दाश्त करती! परन्तु परंपरा लाचार केने छनि। की क सकैत छथि? अगर निक सं फोका हेतनि त अचिर सोहागबती हेती। पति के सब किछु निक हेतनि। ताहि ओकर पालन हेबे करत। आब एकहि उपाय रहि जैत छनि जे सुरुज भगवान सं निवेदन कैल जाय जे ओ अपन रौशनी में श्निग्धता आनथि, अग्नि कोमल भ जाथि, पानक पात ओना त शीतल होइत अछि मुदा ओ आरो शीतल भ जाय जाहि सं दागै काल बेटी शीतल के कम वेदना होनि,पाहून मधुर हाथ सं आंखि झापथि, गंगाजल आ आन जल खूब ठंढक प्रदान करय, टेमी के धाह मधुर-मधुर जरै, चानन केर लेप आरो शुशितल भ जै जाहि सं परम्परा के निर्वहन करैत कनिया के ठेहुन दागल जा सकै:
शीतल बहथु समीर दहो दिश शीतल लथु उसासे।
शीतल भानु लहुक लहु उगथु शीतल भरल अकासे।
शीतल सजनी गीत पुनि शीतल शीतल बिध बेबहारे।
शीतल मधुश्रावणी बिधि हो शीतल बसन सिंगारे।
शीतल घृत शीतल वेरु बाती शीतल कामिनी अंगे।
शीतल अगर सुशीतल चानन शीतल आबथु माँगे।
शीतल कर लय नयन झँपाबह शीतल देलहुँ पाने।
शीतल हो अहिबात कुमर सँग शीतल जल असनाने ।।
गीत, बिध-बबहार सब किछु शीतल होबक चाही। वर अपन कोमल हाथ सँ आँखि झापथि, घी, बातिक सङ्गे टेमिक अग्निक सेहो शीतल भ जाय, पवन शीतल मंद भ बहै, वस्त्र आ सिंगारक सामग्री सेहो शीतल होइक जाहि सँ बेचारी नायिका अहि प्रथा के पालन करैत अपन ठेहुना के दगबा सकैथ।
एक गीत में त कनिया केर माय आ आन महिला सङ्गे हुनकर कुमर अर्थात वर सेहो अपन हाथ सँ ओना त नायिका के आँखि झाँपने रहैत छथि मुदा वेदना देखि द्रवित भ जाइत छथि। ह्रदय केर वेदना दुनू आँखि सँ नोर भ झहरै लगैत छनि:
आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख कियै पड़ल उदासे।
अम्बा मुख हेरय किये कामिनी पल पल लैह उसासे।
कुमर नयनसँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते।
बड़ अजगुत मधुश्रावणी विधि परम कठिन इहो रीते।
मधुश्रावणी केर विध-बेभहार त सब के विध्वंसक आ स्त्रीगन के शारीरिक आ मानशिक शोषण केर एकटा वीभत्स परंपरा बुझना जा रहल छनि। धिया के दर्द हेतनि से बेचैनी सेहो छनि। बिधक पहिने आ विधक बादक दर्द हेतनि से जानि बहुत चिंतित रहैत छथि। मुदा विध के त्याग भला कोना सकैत छथि? एहि में धिया के कल्याण छनि – अचिर सौहाग्यवती होबाक कल्याण, पुत्रवती होबाक कल्याण। अतेक सुन्नर पाबनि में मात्र ई बिध कनि अन्कच्छ्ल लगैत अछि। एकरा समाप्त क देबाक चाही।
समय बदलि रहल छैक। आबलड़की सब सेहो प्रतिकार करक अवस्था में छथि। बाल विवाह मिथिला में समाप्तप्राय अछि।ठेहुन दगबा के प्रतीक में केवल टेमी धाह उपर सं देखा विध पूरा कैल जा सकैत अछि। अतेक निक पाबनि के मात्र ई छोट सन बिध जाहि में धिया के सब उमंग आतंक में बदलि जैत अछि, हमरा कोनादन लगैत अछि। अहि टेमी बला पर स्त्रीगन, पुरुष, संस्कृत के विद्वान मिल शीघ्र निर्णय लय एकरा समाप्त करथि अथवा प्रतीक मात्र राखथि। ओना कियोक भावुक कहि सकैत अछि, मुदा हमरा ऐना बुझना जैत अछि जेना बिना कुनो कसूर के सीता के अग्नि परीक्षा लेल जैत अछि। सीता के माँ, पितियाइन, जेठ बहिन, भौज सब मौन भेल तरपैत सीता के देखैत छथि! बड्ड भेल, एहि पर सोच आवश्यक।
निक आ अधलाह त सब परंपरा में रहैत छैक।जे हो मधुश्रावणी एक बहुत उत्तम पाबनि अछि। एकर निर्वहन होबाक चाही। ई अतेक पैघ विषय थिक जकरा पर पूरा पोथी लिख सब बात पर गंभीरता सं विचार राखल जा सकैत अछि। मुदा सब बात अगर एत लिखब त फेर पढ़नाइ दुर्लभ। ताहि अतय विराम दैत छी।
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