विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद?

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2017-06-15 · अंक 228

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद?
मधुश्रावणी कथा आ पाबनि मनुक्ख आ प्रकृति, लोक आ शास्त्र, स्त्री आ पुरुख,बूढ आ नव, प्रेम आ केलि, पारिस्थितिकी संतुलन केर सहज रुपे मिथिलाक अद्भुत परंपरा अछि। एकर जतेक चर्च हो से कम। एहि पाबनि के, एकर सब कथा, उपकथा, प्रसंग, उप-प्रसंग के नीक सं बुझनाई, कथा के मिथिलाक बिभिन्न क्षेत्र में उपलब्ध अंतर के संकलन, ओकर घमर्थन, समाजशास्त्रीय-मानवशास्त्रीय-मनोवैज्ञानिक विश्लेष्ण जरुरी अछि। दुर्भाग्य सं इतिहासकार, समाजशास्त्री, मानवशास्त्री, मनोवैज्ञानिक आर-त-आर साहित्यकार लोकनि सेहो एकर बहुत विवेचना नहि क सकलनि अछि। ई चिंताक विषय अछि।मानवशास्त्र में एक शब्द होइत छैक “enculturation” जकर अर्थ भेल जे लोक कुनो चीज, लूरि, ज्ञान, भाव, परंपरा आदि स्कूल अथवा क्लासरूम अथवा कुनो विशेष शिक्षक या शिक्षिका सं नहि बल्कि लोक व्यवहार के देखैत, ओकर अनुशरण करैत बिना बुझने आ प्रयत्न केने सिखने जैत अछि। नहि सिखबला/बाली के आ ने सिखाबय बला/बाली के एकर विशिष्ट भान होइत छैक मुदा ई सामाजिक ज्ञान के एक पीढ़ी सं दोसर पीढ़ी में हस्तांतरित निर्विघ्न रूप सं होइत रहैत छैक – चरैवेति-चरैवेति। अपन अल्पज्ञान सं मुदा मैथिली संस्कृति के सिनेह के कारण मधुश्रावणी पर हम किछु काज क रहल छी। प्रतिदिन नव बात ज्ञात होइत अछि। विवेचन नव दिशा दिस संकेत करैत अछि। इम्हर अपन माय लग पुनः तीन दिन धरि अहि कथा के बुझबाक प्रयत्न कैल। लागल, ई कथा आ पाबनि त पुरुख केर पूजाक एकाधिकार के सोझे-सोझ चुनौती द रहल अछि। कथा सुननिहारि महिला, कथा कहनिहारि महिला, कथा केर सामग्री, विध, विधान, सब किछु बताबय बाली महिला, पुरुख में मात्र अन्तिम दिन वर आ ओहो महिला के इसारा पर चलयबला यंत्रवत प्राणी! बाकि सब चीज़ में पुरुख के एन्ट्री बन्द। किछु लोक एक प्रश्नउठोलनि। ई जिज्ञासा पहिने बड़ प्रभावित नहि केलक सोचलहुँ, कथि लेल घमर्थन करु? लेकिन एखन भेल जे थोड़ेक सोची जे आख़िर ऐना कियैक छैक - गौरी आ छिनारि?
एकरा कोना कही? जौं शास्त्र धेने रहब त एकर उत्तर असंभव। धर्माधिकारी सब आक्रमण करता। लोक सँ करब त समाधान के समिप आबि सकैत छी।
लोक आ शास्त्र में एक अंतर स्पष्ट छैक - शास्त्र फ्रेम में बज्र गांठ सनक बान्हल छैक। ओहि फ्रेम सँ बाहर एबाक कल्पनो असंभव। ठीक एकर विपरीत लोक फ्रेम में रहैत अछि लेकिन आवश्यकता भेला पर फ्रेम सं बाहर एबामे में कनिकबो संकोच नहि होइत छैक।
लोक प्रेम में भक्त आ भगवान मित्र जकाँ, नौकर मालिक जकाँ, प्रेमी-प्रेमिका जकाँ व्यवहार करैत अछि आ ओहि व्यवहार में शास्त्रक गुण, शिक्षा, संस्कार सम्मिलित रहैत छैक। लोक भगवान के आन नहि अपन बुझैत अछि। अपन नहि अपन परिवारक मनुख बुझैत अछि। सब निराकार सब गुणे साकार भ जाइत छैक। भगवान लोक में मनुखे जकाँ व्यवहार करैत छथि। ई बात शास्त्र में संभव नहि।
लोक महादेब के “उगना” बना दैत अछि। सबरी लोक अछि जे अपन निश्छल प्रेम मे राम के आठि वैर खुआबय में संकोच नहि करैत अछि। सधना जाट भगवान के पहिने भोजन करबैत अछि तखने अपने खाइत अछि। लिंगायत समाज के एक महिला हमरा कहलक: "देखू, महादेब के ने माय ने पिता; ने भाई ने बहिन! बेचारे बाल रूप में हमरा लग हमर गाय केर बछड़ा बनि हमर गौशाला में खुटेसल रहैत छथि। अगर सर्दी भ गेलनि, नाक सँ पानि बहै लगतनि त के पोछतनि? के तेलक मालिश करतनि? चलु छोड़ू सब के हे बाऊ महादेब। आई सँ हम अहाँके अपन बेटा बना लैत छी। हम तेल-कुर क देब, नाक पोछि देब, काढ़ा पिया देब”।
सब सँ पैघ बात ई जे ई महिला निर्विकार भाव सँ बजैत छलि। जे बजैत छलि सैह करबाक इच्छा सेहो छलैक।
ई भेल लोक अथवा फोक के शक्ति। एहेन बात अथवा व्यवहार शास्त्र के ज्ञाता अथवा विद्वान/विदुषि नहि सोचि सकैत छथि।
आब बात करी मधुश्रावणी पावनि आ कथा में ओ प्रसंग जाहि में गौरी लेल छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल अछि।
कथा के अनेक स्वरूप अछि। लेकिन सब स्वरूप में छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल छनि।
मधुश्रावणी के प्रयोजन नव विवाहित लड़की के जीवन के सब किछु के व्यवहारिक ज्ञान देनाई अछि। व्यवहारिक ज्ञान में शास्त्रीय ज्ञान सम्मिलित छैक।
अगर मधुश्रावणी के कथा के सब प्रसंग आ उपकथा के देखब आ गुनब त लागत जे किछु बाँचल नहि अछि। एक गृहणी के जतेक ज्ञान चाही सब किछु घोटि-घोटि एहि कथा के मादे सिखा देल जाइत छैक। गौरी देवी के भूमिका के छोड़ि एक आदर्श स्त्री के भूमिका में छथि जकरा सामान्य स्थिति में अनेक तरहक परिस्थिति के सामना कोना करक चाही तकर प्रैक्टिकल ज्ञान भेटैत छैक।
अहि प्रसंग में गौरी के भूमिका एक एहेन शिक्षिका के रूप में छनि जे नारी मनक द्वंद के समाधान करैत छथि। महादेब के भूमिका एक एहेन पतिक रूप में छनि जे पत्नी के भ्रम के दूर करैत छथि, अपन पत्नी के सम्मान करैत छथि आ हुनक सम्मानक आ शब्दक रक्षा करैत छथि। संगहि महादेब गौरी के मर्यादा के भान सेहो करबै चाहैत छथि।
एहि सम्पूर्ण उपकथा में स्त्री आ पुरुख एक दोसरक पूरक छैक। दुनू के एक दोसरक मर्यादा के चिंता छनि। गौरी तीन स्वरूप - डाईन, चोरनी आ छिनारि - में ई संवाद स्थापित करय चाहैत छथि जे शंका आ जिज्ञासा मनुखक प्राकृतिक गुण छैक। एकर प्रमाणिकता के परीक्षा करब अनिवार्य। दोसर दिस महादेब अपन कृत्य सँ ई प्रमाणित करय चाहैत छथि जे पति-पत्नीक संबंध विश्वास पर टिकल रहैत छैक। अहि विश्वास के सम्मान आ रक्षा करब दुनू के सामूहिक जिम्मेदारी होईत छैक। अविश्वास सँ संबंध टूटैत छैक।
बात गौरी आ शिव के होईत छैक तांहि उपकथाक विषय वस्तु ओहने छैक। महादेब तंत्र के जनक छथि। तांहि बात डाईन के भ रहल छैक। गौरी डाईन बनय चाहैत छथि। महादेब ई कहैत छथिन जे ई कार्य सभक नहि छैक। गौरी के दक्षिण दिशा के गाम में जेबाक लेल मना करैत छथिन। गौरी कोना मानती? सिखनाई शुरू करैत छथि। बिना कहने महादेब साक्षी रहैत सब क्रिया के देखैत अपना कंट्रोल में लेने रहैत छथि। आ जखन गौरी चुपचाप डाईन केर सब मंत्र पढ़ि सिख जाइत छथि त गौरी अपन पुत्र गणेश आ कार्तिक के कोढ़ करेज देखै लगैत छथि। आब महादेब गौरी के पकड़ि लैत छथि आ कहैत छथिन: "हद भ गेल? हमरा मना केलाक बादो अहाँ गेलौं दक्षिण कोण में?”तामसे भेड़ महादेब कहैत छथिन जे पूरा तंत्र डाहि देथिन। तुरत गणेश एक-एक मंत्र लिखने जाइत छथि आ कार्तिक डाहने जाइत छथि। गौरी के होइत छनि जे तंत्र कम सँ कम मूल रूप में बचि जाइक। साबर मंत्र मात्र अढ़ाई आखर के होईत छैक जकरा कातिक सँ चुटकी में चोरा लैत छथि। चोरेबक उद्देश्य मंत्र अथवा परम्परा के रक्षण छैक आर किछु ने। हमरा एना बुझना जाइत अछि जे एहि प्रसंग के प्रासंगिकता एहि बात मे छैक जे एक सफल गृहणी के सब तरहे अपन घर आ गृहस्थी के रक्षा करक चाही।
आब गौरी चोरनी छथि ताहि प्रकरण पर आबि। बहुत बेजोड़ प्रकरण अछि। आ एकर आधार सेहो गौरी तैय्यार करैत छथि। गौरी महादेब सँ आग्रह करैत छथि जे अगर कियोक चोरी करैत अछि, किम्बा छिनरपन करैत अछि त ओकरा शरीर मे किछु एहेन चिन्ह अंकित भ जैक जाहि सँ जन-सामान्य के ई सिख भेट जाइक जे एहेन काज नहि करी। महादेब ना-नुकूर करैत गौरी के निवेदन मानि लैत छथि।
एक बेर पुनः गौरी मर्यादा के लाँघेत छथि आ महादेब के मना केलाक बाद एक गाम में भाटा चोरी करैत छथि। निशान के रुप मे जहिना-जहिना गौरी भाटा चोरबैत गेली तहिना-तहिना नागड़ि बढ़ैत गेलनि। जखन गौरी के भान होईत छनि त महादेब सँ निवेदन करैत पुनः ओकरा समाप्त करय कहैत छथि। फेर होईत छनि कनिक अवशेष चिन्हक रूप में रहक चाही। आ कहैत छथिन जे निशान मात्र ई जानवर में होबक चाही। सैह भेल।
आब छिनारि बला प्रकरण में अबैत छी। एक बेर पुनः महादेब के मना केलाक बाद नहरि कात में गेलनि। महादेब माल्लाह बनला। नाव पर राश्ता कटैत काल माल्लाह गौरी के कखनो गाल छुबि लैन।कखनो चुट्टी काटि लैन। भाव उत्तेजक भेल गेलनि। जेना-जेना केलि भाव मे गौरी मगन भेली तहिना-तहिना हुनकर माथ पर सिंग बढ़ैत गेलनि।
मल्लाह जाल खसेलक। गौरी माछ बिछलनि। एकर फायदा उठबैत मल्लाह गौरी सँग एमहर-ओमहर करैत केलि क्रिया के सेहो आनंद नहि-नहि करैत लैत रहल।
केलि होइत गेलनि आ सिंघ बढ़ैत गेलनि। आब गौरी के होश एलनि : "हे भगवान! ई की भेल? आब की हैत?”
यैह सोचैत गौरी अपन सिंघ के साड़ी सँ झपैत गेली। मुदा सिंघ बढ़िते गेलनि। अंततः महादेब सँ निवेदन केल्थिन: "गलती भ गेल हमरा सँ। ई मलहबा अपन सीमा नाघि गेल। छू-छाप हमर प्रतिशोध के बादो करिते रहल। एकरा केलि कहनाय उचित नहि। गलती सँ हम कहि देलौं जे चिन्ह द दियौक। एकर उपाय अहाँ बताऊ?"
महादेब कहलथिन: "हे गौरा, हम त कहने रही अहाँके जे निशान के चक्कर मे नहि परु। मुदा अहीं जिद ठानि देलौं जे द दियौक। लेकिन अहाँ चिन्ता जूनि करु। ओ मलहबा कियोक आर नहि छल। हम रही। ताहिं अहाँ छिनारि नहि भेलौं”।
महादेब बजिते रहलनि: "हमरा बुझा गेल जे अहाँ तथ्य के जानय चाहैत छी। हम सोचलहुँ, से त ठीक मुदा कहीं ऊंच-नीच भ गेल त की हैत? सैह सोचैत स्वयं मलहबा बनि अहाँ लग गेल रही। अहाँक चरित्र बाँचल अछि। अहाँ अनेरे चिंता जूनि करु”।
गौरी के भेलनि जे ओ अनेरे महादेब पर शंका केलनि। कहलथिन गौरी: "हे महादेब! हमरा सँ गलती भेल। आब अहाँ एकर उपाय करु। सिंघ त कोनादन लागि रहल अछि”?
गौरी दिस देखि हँसैत महादेब आब सिंघ के समाप्त करय लगला। गौरी कहलथिन :"एक काज करु, कनि नाममात्र सिंघ रहय दियौ जे मृतभुवन में जानवर के सिंगार बनत”। गौरी के बातक सम्मान करैत महादेब नाममात्र के सिंघ रहय देलथिन जे कथाक अनुसार आजुक जुग में जानवर सब में भेटैत अछि।
लोक व्यवहार के अनुरूपे अगर कथा के विवेचना करब त लागत जे गौरी एक सामान्य हाड़-मासक महिला बनि शिक्षा दैत छथिन। गौरी कदाचित सब महिला के ई सिख दैत छथिन: "एखन धरि जे गलत-सलत केलौं से बिसरि जाउ। आब अपन दाम्पत्य जीवन मे संलग्न होउ। पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, विश्वास बनल रहक चाही। इतिहास के छोड़ि वर्तमान आ भविष्य के चिंता होबक चाही”। शास्त्र केर गौरी भले एहेन बात सोचि नहि सकैत छथि, लोकक गौरी अपने समाजक महिला बनि समाज के जन सामान्य महिला के मानशिक अवस्था के देखबैत चोरनी, डाईन आ छिनारि बनि एक नव सिखक परम्परा स्थापित करैत छथि। एकर नाम जे द दी – यथार्थवाद(realism), लोक परंपरा केर शक्ति, व्यवहारिकता, पुरुख-प्रकृति के समावेश अथवा आरो किछु। समग्र रुपे ई अद्भुत परंपरा अछि।
हाँ, मिथिला में मधुश्रावणी पाबनि केएक बात कनि कचोट करैत अछि आ एकर सार्वभौमिकता पर भले खिड़की दोगे कथिलेल नहि मुदा चैलेंज करैत अछि: “ई कुन कारण सं मिथिला के सब जाति में समाविष्ट नहि भ सकल आ ब्राह्मण मात्र में नुकायल रहि गेल?” भले ई प्रश्न छोट लगैत हो लेकिन एकर उत्तर देनाई अतेक सहज नहि अछि। उत्तर तकला सं एकर एक नव आयाम ठाढ़ भ सकैत अछि?
पूरा कथा सुनलाक आ बेर-बेर मनन आ विवेचन केलाक बाद अहि निष्कर्ष तक यात्रा कैल. पाठक के भावक प्रतीक्षा रहत।
आभार: अपन माता श्रीमती शिवदुलारी देवी के कहल कथा के आधार पर एहि प्रसंग पर चर्चा कएलहुँ अछि।

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद?.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 228, 2017-06-15. https://www.videha.co.in/research/2017/228/गौरी-चोरनी-गौरी-डाईन-आ-गौरी-छिनारि-मधुश्रावणी-कथा-केर-द्वंद.htm

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