विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नवका पोखैर

रवीन्द्र नारायण मिश्र · 2017-08-01 · अंक 231

नवका पोखैर
“हर-हर महादेव।
जानह हे महादेव!
हमरा मोनमे किछु छ: पाँच नहि अछि।
तूँहीं जानह हे महादेव..!”
“अहाँकेँ जे बुझाए मुदा हम तँ अपना भरि सभकेँ सभ दिन केलिऐ...।”
“आ हम केकरा नहि केलिऐ..?”
पंचमुखी महादेवपर जल ढारैतकाल महिला सभ आपसमे अहिना चिरौरी करैत रहै छेली...।
एक हाथ महादेवक निमोलपर आ दोसर हाथे जल ढारि रहल महिला सभ बीच-बीचमे मौका पबिते फदका पढ़ए लगैथ। जे कियो आएल, महादेवक ऊपरसँ जल ढारलक। जाड़ होइ आकि गरमी, सभ मौसम जलढरी अनवरत चलैत रहै छल। रच्‍छ छल जे दुपहरियामे ई भीड़ कम भऽ जाइत रहै जइसँ महादेव चैनक अनुभव करैत हेता। कम-सँ-कम घरेलू तथा परिवारिक झमेल सभ सुनबासँ तँ मुक्‍ति होइते रहैन। चारि बजे भोरेसँ नवका पोखैरपर स्‍नानार्थी सभ तपकए लगैत छल। ओइमे नियमित पाँच गोटे टोलसँ अबैत छला जइमे तीन गोट महिला छेली। टाइमक सोलहन्नी पाबन्‍द रहैन। भोरे-भोर ‘हर-हर महादेव!’ किछु वृद्ध नवका पोखरिक कोणपर बसल परिवारमे सँ सेहो भोरे स्‍नान करएबला लोक सभमे शामिल रहिते छला।
स्‍नान, ध्‍यान एवम्‍ आराधनाक संग महादेवक अनवरत जलढरी चलैत रहै छल, आ तैसंग गपाष्‍टक जे आनन्‍द छल, तेकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। कहि नहि, महादेवकेँ ई सभ केतेक पसिन्न पड़ैत हेतैन! खाएर.., मुदा लोक सभ तँ तृप्‍त लगिते छला। सभ अपना-आपमे मगन, सभ अपने-आपमे आनन्‍दित।
नवका पोखैर ओइ समयमे हमर गामक नाक छल। मूलत: हमर पित्ती–स्‍व. वंगट मिश्र–ओइ स्‍थानक दिन-राति देख-देख करैत छला। नवका पोखरिक दच्‍छिनबरिया महारपर भगवान शिवक पंचमुखी मूर्तिबला मन्‍दिर छल। नवका पोखैर तथा ओइठामक मन्‍दिरक निर्माण हमर सबहक समस्‍त दियाद सभ मिलि कऽ केने रहैथ। मन्‍दिरक प्राण-प्रतिष्‍ठा हमर पितामह–स्‍व. श्रीशरण मिश्र–द्वारा भेल रहए। पोखरिक जाइठ पड़ैकालक खिस्‍सा सभ हम सभ बच्‍चामे सुनिऐ। ओइ समयमे पोखैर-इनार खुनाएब बहुत मान-मर्जाक बात बुझल जाइत छेलइ। ओना, गाममे पहिनेसँ कएटा पोखैर रहै, जइमे तीनटा पोखैर तँ हमरा सबहक टोलेमे बुझू। तेकर अलाबा कुट्टी लगक पोखैर सेहो एकटा। तथापि आरो पोखैर सुनौल गेल, तेकर तात्‍पर्य बुझल जा सकैत अछि...।
नवका पोखैर प्राय: सभसँ बादमे बनल छल तँए ओकरा ‘नवका पोखैर’ कहल जाइत अछि। पोखरिक दच्‍छिनबरिया भीरपर मन्‍दिरक संग रंग-रंगक फूल सभ लगौल गेल छल। जेना- चम्‍पा, मालश्री, कामिनी, करबीर, अड़हुल इत्‍यादि। चम्‍पा, करबीर आ अड़हुलक बड़का-बड़का गाछ छल। सम्‍पूर्ण परिसरक सफाइ स्‍व. वंगट काका करैत छला। वंगट काका असगरे जीवन पर्यन्‍त ओइ काजकेँ पूर्ण भक्‍ति-भावसँ करैत रहला। कहियो थाकैथ नहि। निस्‍वार्थ, स्‍वान्‍त: सुखाय ऐ काजकेँ करैत ओ तत्‍कालिने समाजक नहि अपितु अखनो समाजक बीच दृष्‍टान्‍त छैथ।
मन्‍दिरक आगूमे धरमशाला छल। फूसक दरबज्‍जानुमा घर जे चारूकातसँ खुजल छल। कियो थाकल-ठेहियाएल पथिक ओतए रहि सकैत छला। ओ समस्‍त परिवारक आतिथि होइत छला। हुनकर सभटा बेवस्‍था होइत छल। हमरा मोन पड़ैत अछि जे एकबेर एकटा महात्‍मा आएल रहैथ। ओ बाजैथ नहि। सिलेटपर लिखि कऽ अपन इच्‍छा, अपन मन्‍तव्‍य प्रकट करैथ। हुनकासँ भेँट करक हेतु लोकक करमान लागल रहैत छल। सौंसे देह बभूति रमौने, जौरक डोराडोरि पहिरने, जटा जूट धारी भेष हुनक आकर्षणक केन्‍द्र रहैन।
माथक भयानक ठंढ हो आकि जेठक तप्‍त रौद ओ देहपर एकटा गमछा मात्र रखैत छला। अपना समयक नामी पहलमान सेहो रहैथ। नवका पोखरिक उत्तरबरिया भीरपर अखाड़ा छल। ओइठाम युवक सभकेँ कुश्‍तीक प्रशिक्षण दैत छला, डंड बैसक करैत छला। किलोक किलो आखाड़ाक माटि देहमे औंसने घामसँ तर-बत्तर भऽ जाइत छला। तेकर बाद बड़का खर्ड़ासँ सम्‍पूर्ण परिसरकेँ अपने हाथे साफ करैत छला। प्रात: स्‍नान करैबला लोक सभकेँ तरह-तरह केर हिदायत दैत रहै छेलखिन। पोखरिक पानि स्‍चच्‍छ बनल रहए, तइले सतत सतर्क रहैत छला। पोखरिमे साबुनसँ कपड़ा खिचनाइ मना छल, ऐ लेल ऊपरमे बेवस्‍था छल। ओइ समयमे कियो-कियो पोखरिमे साबुनसँ कपड़ा खींच लेथि, मुदा जँ पकड़ल गेल तँ भगवाने मालिक। नवका पोखरिक दिन-प्रति-दिनक देख-रेखक सम्‍पूर्ण दायित्‍व ताजीवन वंगठ काका बिना कोनो स्‍वार्थक उठौने छला। घन्‍टो ओइ परिसरक विकासक हेतु काज करैत रहला। हुनका बाद ओइ स्‍थानक पूर्ति नहि भऽ सकल, भाइयो नहि सकैत छल।
गाम-घरमे एहेन साफ-सुथरा रमणीक पार्कनुमा स्‍थान भेटब कठिन। ओना तँ खेत-पथार सभ हरियर कंचन रहिते अछि, थाल-कादोक अपन स्‍वाद सेहो छइहे, मुदा तहू माहौलमे जे अध्‍यात्‍मिक, सांस्‍कृतिक केन्‍द्रक रूपमे नवका पोखरिक बेवस्‍था जे छल आ बहुत दिन धरि जेना चलैत रहल ओ अद्भुत ओ बेमिसाल कहल जा सकैत अछि।
नवका पोखरिक निर्माणमे हमरा लोकनिक परिवारक समस्‍त लोकक योगदान छल। सोदरपुरिये मानिक मूलक हमरा लोकनिक पर्वज छला जे सात पुस्‍त पूर्व वैवाहिक सम्‍बन्‍धोपरान्‍त गाममे बसल रहैथ। आइ गामक आधा जनसंख्‍यामे सभ सहभागी छैथ।
वंगट काका मूलत: पहलमान रहैथ। गाम भरिमे धाक रहैन। कोनो पर-पंचैतीमे हुनका अबस्‍स बजौल जाइत रहैन। धिया-पुता कुश्‍ती लड़ए, खेती-बाड़ी करए, माल-जालक सेवा करए, महींस राखए जइसँ डोलक-डोल शुद्ध दुधक सद्य: लाभ होइक–तइ विचारक पोषक छला वंगट काका छला। कए दिन हुनका बाबूसँ माने हमरा पिताजीसँ विवाद भऽ जाइन। विवादक मुद्दा रहैत छल जे पढ़ाइ-लिखाइ करब सार्थक थिक आकि निरर्थक? आब कियो सुनत तँ हँसत। मुदा वंगट काका अपन विचार जोर-सोरसँ बजैथ-
“पढ़ो पूत चण्‍डी, जार्स चले हण्‍डी।”
कहक सरांश- खेती-बाड़ी करू, ऐमे सद्य: लाभ अछि। पढ़ाइ-लिखाइमे कहिया की हएत से के देखलक!
गाममे कियो लुंगी पहीरिलक तँ ओ (वंगट काका) जोरदार विरोध करैथ। समय बीतलाक बाद आब कहल जा सकैत अछि जे पढ़ाइ-लिखाइक समर्थन करब सही छल, विरोध गलत। गाममे वा केतौ जे पढ़लक-लिखलक से आगू भऽ गेल। ओहू समयमे किछु गोटे कहैथ-
“पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नबाब।”
निसचित रूपसँ ओ सभ नश्‍चय अग्रसोची रहैथ।
नवका पोखैर परिवारक गौरवसँ जुड़ल छल। केकरो कुटुम अबितैथ तँ नवका पोखैरपर हुनका अबस्‍स आनल जाइत। ओइठाम स्‍नान, ध्‍यान होइत, गप-सराका चलैत। धरमशालामे बैस कऽ आराम सेहो कएल जा सकैत छल। वंगट काका नित्‍य दुपहरियामे ओइठाम धर्मग्रन्‍थ पढ़ैथ। सायंकाल भगवान शिवक आरती-पूजाक संग नाचारी सेहो गाओल जाइत छल। ओइमे नियमित अनेको वृद्ध लोकनि भाग लैथ।
नवके पोखरिक पच्‍छिम-दच्‍छिन भागमे सोदरपुरिये सरिसव मूलक किछु परिवार बसल छला। ओइ परिवारक बादशाह बाबा–स्‍व. ......– शिव मन्‍दिरक पूजाक बहुत दिन धरि बेवस्‍था देखैत रहला। सायंकालक नाचारीमे ओ तँ रहिते छला जे हुनका संगे ओही परिवारक कएटा आरो वृद्ध सभ सेहो नाचारी गायनमे भाग लऽ सुर-मे-सुर मिलबैत छला। हमर बाबा एवम्‍ वंगट काका तँ रहिते छला। ‘बाबा केतए सुतल छी औ बालक वनमे केतए-सँ अएला, कियो नहि हुनकर सथिया...।’ आदि नाचारीक स्‍वर अखनो हमर कानमे गुंजित होइत रहैत अछि।
नवका पोखरिक मालश्री गाछक छाहैरमे हम केतेको दिन बैस कऽ प्रतियोगिता परीक्षा-सबहक तैयारी करैत रही। बीच-बीचमे पानि ओ अन्‍य आवश्‍यकताक पूर्ति ओइठाम रहनिहार नारायणजी करैथ। केतेको दिन हम अपन मित्र लाल बच्‍चा (स्‍व. प्रो. विष्‍णुकान्‍त मिश्र)क संग साँझक समयमे ओतए बैस गप-सप्‍प करी, भविसक योजना बनाबी।
स्‍वच्‍छ, निर्मल वातावरणमे गाम-घरक झंझटिसँ दूर नवका पोखैरपर बैस कऽ एकटा स्‍वर्गीय आनन्‍द होइत छल। हम नियमित भोर-सॉंझ ओइठाम जाइत रही। प्राय:काल नित्‍यकर्म- स्‍नान, पूजा एवम्‍ व्‍यायाम आदि ओतइ होइत छल।
नित्‍य सायंकाल गप-सप्‍प करबाक हेतु कएक गोटा भेट जाइथ। पूजा-पाठ तँ होइते छल। संग-संग एकटा स्‍वस्‍थ मनोरंजनक तथा अध्‍यात्‍मिकताक अनुभूति सेहो ओइठाम होइत छल।
गाममे हमरा फरिखमे जँ केकरो देहान्‍त होइ तँ ओकर श्रद्धकर्म ओहीठाम होइत छल। हमर बाबा एवम्‍ बाबूक श्राद्ध-कर्म सेहो ओहीठाम भेल छेलैन। वैदिकी श्राद्ध-क्रर्ममे बछराकेँ दागल गेल। ओकर करूण क्रन्‍दन अखन तक हमरा रोमांचित करैत रहैत अछि। हमरा विचारासँ ई अमानवीय प्रयोग अछि, ऐसँ स्‍वर्गक सीढ़ी कियो केना चढ़त से हमर समझसँ बहार अछि। आर जे अछि से अछि, मुदा ई काज औअल दर्जाक क्रूड़ता अछि। एकटा जीवित प्राणीकेँ सरी धीपा कऽ दागि देब, केतौसँ मनुष्‍यत नहि थिक। नइ चाही एहेन स्‍वर्ग, जइ हेतु एकटा निरीह, निर्दोष जीवक संग क्रूड़ताक पराकाष्‍ठा कएल जाए। ओनाहू आब गाम-घरमे एकर विरोध भऽ रहल अछि, कारण साँढ़ द्वारा जजात चरि गेलासँ क्षतिक संग अन्‍यान्‍य कारण सभ सेहो अछि।
नवका पोखरिक पच्‍छिम-दच्‍छिन कोणपर बसल किछु परिवार पहिने गामक बीचेमे छल। ओहो सभ भगिनमान छला। ओही परिवारक किछु गोटे गाममे शुरूए-मे बसि गेल छैथ। नवका पोखरिपर हुनका सभकेँ बच्‍चेसँ देखिऐन। सभ गोटे उद्यमी, संघर्षशील, परिश्रमी तथा संस्‍कारी छला। ओइठामक कएटा वृद्ध सबहक नाचारी महादेव मन्‍दिरपर सुनैत छेलौं। ओही परिवारमे उग्र संस्‍कार सम्‍पन्न, तेजस्‍वी स्‍व. रामनन्‍दन मिश्र भेला। उत्‍कृष्‍ट मेघा ओ उत्‍कट इच्‍छाक बाबजूद ओ बहुत आगू नहि पढ़ि सकला। खादी भण्‍डारमे नौकरी करैत निरन्‍तर गामसँ जुड़ल रहला। कोनो पाबनिमे ओ अबस्‍स गाममे उपस्‍थित रहैथ। हमरासँ हुनका अद्भुत सिनेह रहै छेलैन। कएक बेर नौकरीक दौरान जमशेदपुर एला। तेतबे नहि, कएक बेर दिल्‍लीमे आबि कऽ भेँट करैथ। अपन संघर्षककेँ सकारात्‍क रूखि दैत स्‍व. रामनन्‍दन मिश्र अपन परिवारक विकास यात्राकेँ एकटा निर्णयात्‍मक रूखि देबामे सफल रहला। परिणामत: आइ-काल्‍हि हुनकर परिवार गामे नहि, इलाकामे यशस्‍वी अछि, जानल जाइत अछि। आब ओइ स्‍थानमे कोठे-कोठा भऽ गेल अछि।
ओही परिवारमे स्‍व. उमेश मिश्रक पुत्र श्री शशिवोध मिश्र अपन परिश्रम ओ संघर्षसँ ओइ समयमे बी.एस-सी. कऽ रहिका उच्‍च विद्यालयमे विज्ञान विषयक शिक्षक भेला। अपन पूरा परिवारक ओ कायाकल्‍प कऽ देलाह। जखन हुनका लग बैसी तँ ओ अपन जीवन-यात्राक एक-सँ-एक अनुभव सुनबैथ।
पैछला चालिस बर्खमे नवका पोखरिक परिदृश्‍य एकदम बदैल गेल। ओतए बसल परिवारक अधिकांश लोक सकल विकास यात्राक उदाहरण छैथ।
नवका पोखरिसँ हमर बाबाकेँ बहुत लगाव रहैन। जीवनक अन्‍तिम समय तक ओ नवका पोखैर टहलैले अबस्‍स जाइत छला। हाथमे छड़ी लेने रोडपर चलैत एक बेर हुनका एकटा साइकिलबला टक्कर मारि देने रहैन। ओहू अबस्‍थामे एक्के हाथे साइकिलकेँ घिसिएने-घिसिएने अपन दरबज्‍जापर लऽ आएल रहैथ।
संभवत: १९६७-६८ इस्‍वीक गप थिक। हमरा लोकनि नवका पोखरिपर पुस्‍तकालय बनेबाक हेतु बैसार केलौं। गामक तमाम गणमान्‍य लोक सभ बैसारमे रहैथ। ओइसँ पूर्व गाममे एकटा पुस्‍तकालय बहुत पहिनेसँ छल, जे कोनो कारणसँ अव्‍यवस्‍थित भऽ गेल छल। एक समयमे ओ पुस्‍तकालय गामक प्रतिष्‍ठित संस्‍थान छल। १९६२क चीन-भारत युद्धक समाचार सुनबाक हेतु ओइठाम सौंसे गामक लोक जमा होइत छल। सटले खादी भण्‍डार छल ओ धिया-पुताक खेल-धूपक सामग्री सेहो छेल। मुदा की भेलै जे सभ गतिविधि कमश: ठप्‍प जकाँ भऽ गेल। नव पुस्‍तकालय बनेबाक बैसारमे किछु प्रवुद्ध लोकक विचार रहैन जे ओही पुस्‍तकालयकेँ जीर्णोद्धार कएल जाए। यद्यपि हम सभ ओइ प्रस्‍तावक समर्थन नहि केने रही, मुदा आब लगैत अछि जे ओ सही राय छल।
नवका पोखरिक धरमशालामे पुस्‍तकालयक स्‍थापना हेतु प्रयासकेँ आगू बढ़बैत कएकटा बैसार आरो भेल। पुरान पुस्‍तक सभ घरे-घरसँ ताकि-हेरि कऽ आनल गेल। पुस्‍तक सभ रखबाक हेतु लकड़ीक रैक बनौल गेल।
पुस्‍तकालयक उद्घाटन हेतु डा. शुभद्र झाजी केँ आमंत्रित कएल गेल। ओइ समयमे सेवा निवृत भऽ ओ गामेमे रहए लागल रहैथ। हाथमे बेंत लेने मिरनई पहीरिने ओ पुस्‍तकालयक उद्धघाटन कार्यक्रममे आएल रहैथ। हमरा लोकनि हुनकासँ किछु बजबाक आग्रह कएल। ओ कहला जे भाषण करब हुनका एकदम पसिन नहि अछि। तथापि ओ अपन बात कहैत पुस्‍तकालयक संचालनमे होमयबला बेवहारिक असुविधा सबहक वर्णन करैत अपन जीवनक अनेकानेक अनुभवक चर्चा सेहो केलैन। ओ पुस्‍तकालय अल्‍पजीवी भेल। संशाधनक अभावमे किछुए दिनक बाद सभ किछु ठप्‍प पड़ि गेल।
नवका पोखैर अपना-आपमे एकटा संस्‍था छल। अध्‍यात्मिकताक संग ग्रामीण संस्‍कारकेँ सेहो प्रज्‍वलित केने रहैत छल। मुदा सभ खिस्‍साक केतौ-ने-केतौ आ कहुना-ने-कहुना अन्‍त होइते अछि। नवको पोखरिक संग सेहो सएह भेल। जहिना प्रत्‍येक मनुखक जीवनमे उत्‍थान-पतन होइत अछि तहिना ऐ संस्‍थाक संग सेहो भेल। जखन वंगट काका स्‍वर्गीय भऽ गेला तेकर पछाइत कियो एहेन बेकती नहि भेल जे नवका पोखरिक संग हुनका जकॉं एकात्‍म भऽ सकए। केकरो ओ रूचियो नहियेँ रहइ। जइ फुलबाड़ीमे एकटा पात नहि खसल भेटैत छल से क्रमश: कूड़ा, कर्कटसँ भरल रहए लागल। पोखरिक देख-रेख सेहो ढील भऽ गेल। जेतेक टा परिवार ऐ पोखैर एवम्‍ आसपासक परिसरक हिस्‍सेदार छैथ जे एकर एक स्‍वरमे रक्षा ओ विकास करबाक बजाय आपसेमे कचर-बचर होइत रहल। ढनमनाइत, ढनमनाइत मन्‍दिर खसि पड़ल। पोखैर सबहक व्‍यापारीकरण भऽ गेल। पोखरिक पानि नहाइ-जोकर नहि रहि गेल। कालान्‍तरमे किछु युवक लोकनिकेँ ऐपर धियान गेल। जइसँ मन्‍दिरक जीर्णोद्धारक प्रयास भऽ रहल अछि। आर-आर सकारात्‍मक प्रयास भऽ रहल अछि।
मन्‍दिर भगवानक घर थिक, जेतए लोक अपन-अपन अहंकारक विसरजन कए ईवश्वरक शरणमे पहुँचैत अछि। अस्‍तु एकर पुनर्निर्माण ओ रखरखावमे जँ ऐ बातक धियान राखल गेल जे ओ परिवार विशेषक नहि अपितु समस्‍त आस्‍थावान लोकनिक वस्‍तु बनि सकए, तँ निश्चय ई कल्‍याणकारी हएत आ नवका पोखैर फेरसँ अपन गौरव प्राप्‍त कए सकत।

तिथि : ३.७.२०१७

Suggested citation: रवीन्द्र नारायण मिश्र. “नवका पोखैर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 231, 2017-08-01. https://www.videha.co.in/research/2017/231/नवका-पोखैर.htm

मूल विदेह अंक / Original issue