फकड़ाक संग याLा करैत मैिथलानीकमनोदशाक : मानवशाkLीय िववेचना
डॉ कैलाश कुमार िमe [1]
लोकक सँसार अनंत महासागर जक अिछ। लोक जखन िमिथलाक लोक हो अथवा मैिथिलक लोक हो तऽ
एकर िवkतार कnपना सँ बाहर भऽ जाइत छैक। िमिथलाक लोकक जिड़ छिथ मैिथलानी। हुनक जीवन
आइओ लोक सँ छिन, लोक सँगे छिन। आजुक भौितक आ वैिªक समाज मे सेहो मैिथलानी लोक कR धेने
छिथ: लोक मैिथलानी सँ बढैत अिछ, मैिथलानी लोकक गित सँग गितमान छिथ। गित मुदा िदशाहीन निह
अिछ। गित एहेन अिछ जे जिड़सँ जुड़ल अिछ। ओकरा उड़ब, घुमब, दौड़ब, बाहर-भीतर करब नीक लगैत
छैक मुदा ओ अbततः अपन जिड़ लग बेर-बेर आिब जाइत अिछ। ठीक ओिहना जेना Dवासी िचरै एक वष<
मे 40,000 िकलोमीटर अपन पािरिkथितकी सँ दूर उड़ला, घुमला आ Dवास केलाक बाद पुनः अपन भूिम
अथत मूल पािरिkथितकी मे आिब जाइत अिछ।ओिहना जेना सूरदास (1478 – 1573) केर जहाजक िचरै
बेर-बेर उड़लाक बाद जहाज पर अबैत रहैत अिछ:
“जैसे उिड़ जहाज कौ पंछी पुिन जहाज पै आबै”
िमिथलाक अथवा आजुक वैिªक युग मे मैिथलक लोकक Dथा, पर6परा, खान-पान, िबध-बेबहार, गीत-नाद,
अनुPान, पूजा-पाठ, वÒत-पाबिन, िखkसा-िपहानी, फकड़ा, सब िकछु अिधक|शतया मैिथलानी बचा कऽ रखने
छिथ। ताहू समय मे जिहया हुनका पढबाक kवतंLता पु°ष जक निह छलिन अथवा नाम माL मिहला कR
छलिन तिहयो इ सब लोक पर6परा कR अपन भावना – Dेम, िवरह, वेदना, कÊ, यातना, «ान, उÓेग, शोषण,
दोहन, आिथ<क िबपता, पु°षक उ³पात, आिद – ©य²त करबाक पिलक kपेस केर प मे ©यवहार करैत
छलीह। ओ kपेस एहेन kपेस छल जािह मे िहनकालोकिन कR अपन कÌय ©य²त करबाक kवछंदता छलिन,
बिnक एखनो छिन। पु°षक कोनो दखलbदाज़ी ओिह kपेस पर निह छलैक आ ने आइओ छैक।इ बात किन
गंभीर िलखा गेल आ मानवािधकार सँ शु होइत नारी kवतंLता, नारीवाद आ kLी िवषयक अÀययन, िववेचन
िदस टघिर गेल। बात अनेड़े बहुत पैघ kव°प लऽ सकैत अिछ। ओना एिह बात पर मंथन आ घमथ<न केर
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ज°रत अपन मैिथल समाज मे अिछ लेिकन तािहलेल इ ¢लेटफाम< हमरा उिचत निह लािग रहल अिछ।
तखन की हो? िकछु निह, बात कR लोकक जा त मनःिkथित मे रािख आगा बिढ़ जाइ। जखन अध<जा ित
सँ पूण< जा ित िदस Àयान जेतिन तऽ अिह पर िवचार शु हएत। िवचारक घमथ<न असगरे नारी निह
करती, पु°ष सेहो ओिह भाव, इितहास, िपतृसा³मक समाजक सँरचना आ ओिह सँरचना मे कालक अनुप
पिरवत<न आिद लेल उदार हेताह आ kLी-पु°ख दूनू िमिल जीवनक गाड़ीक दू पिहया बिन एकर स6यक िनदान
िदस अ सर हेताह।
बात पर अबैत छी जे कोना लोकक एक िवधा फकड़ाक माÀयम सँ मैिथलानी अपन सब तरहक मनोभाव कR
अदौ सँ ©य²त करैत आिब रहल छिथ। फकड़ा कR ‘कहबी’, ‘लोकोि²त’ सेहो कहल जाइत छैक। सबसँ
पिहने इहो जानब आवÄयक जे फकड़ा’क अथ< की भेल? एकर कोनो सव<माbय पिरभाषा सेहो भऽ सकैत
अिछ की? सव<माbय पिरभाषा अिछ तऽ मैिथली लोक सँसारक फकड़ा ओिह वैिªक पिरभाषा सँग कतऽ धिर
चिल पेबा मे सJम अिछ?
फकड़ा ख|टी लोकक वkतु िथक – लोकक उि²त अथत “लोकोि²त”। लोकक कहब अथत “कहबी”।
लोक पुरान फकड़ा कR सहेजने रहैत अिछ आ नवक िनमण करैत ओकरा ठोसगर आधार दैत रहैत अिछ
जािह सँ आजुक गढ़ल फकड़ा भिव´य मे साव<भौिमक बिन सकय।सँkकृत मे “लोकोि²त” अलंकारक एक
भेद सेहो मानल गेल अिछ। अं ेजी मे फकड़ा अथवा लोकोि²त कR Proverb कहल जाइत छैक। तािह
«ाने अं जी Proverb केर पिरभाषा िकछु अिह तरह करैत अिछ:
“A proverb is a saying without an author.”
एकर अथ< भेल फकड़ा एहेन उि²त अिछ जकर कोनो रचनाकार निह होइत छिथ। मैिथली लोक मे ©या¢त
फकड़ा कR देखला सँ इ «ात होइत अिछ जे मैिथिलक फकड़ा अपन kव°प मे एिह सँ अिधक ©यापक
अिछ। हमरालोकिन अनेक एहनो फकड़ाक Dयोग करैत छी जकर रचनाकारक नाम हमरा सबकR «ात रहैत
अिछ: गोनू झा, िव\ापित (1352-1448), तुलसीदास (1511-1623), मीराबाई (1498-1557), कबीरदास
(1398- ?) आिद। रामचिरतमानस सँ अनेक दोहा क िमिथला आ िमिथला सँ बाहर फकड़ा’क प मे
©यवहार होइत अिछ। जेना िक
“यह न लागै राउर माया”
अथवा
“लंका िनिसचर िनकर िनवासा
यह कह स¡जन केर बासा”
इ दूनू तुलसीदासक
रामचिरतमानस सँ लेल गेल अिछ।
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अिह तरह
“पु°खक निह िवªासे”
“एकसर तारा िकयो निह देख
िलखल कुमास अमंगल लेख”
“भनिह िव\ापित सुनू हे सुनयना
सब बेटी सासुर जािथ”
महाकिव िव\ापितक रिचत पद सँ लेल गेल अिछ।
िकछु फकड़ा गाम िवशेष आ kथान िवशेष मे Dचिलत होइत अिछ। ओिह फकड़ाक िनमण मे गामक कोनो
िवशेष घटना अथवा ओिह घटना सँग ©यि²त िवशेषक नाम जुड़ल रहैत अिछ। उदाहरण लेल मधुबनी िजलाक
अरेड़ गाम मे 55 वष< पिहने नाथ बाबू नामक एक आशु किव आ सभालोचन भेलाह। ओ अपन D³यु³पमित
लेल िवयात छलाह। ओ िकछु-िकछु एहेन पदक रचना केलिन जे फकड़ा बिन गेल। सब फकड़ा हुनक
नाम सँ जानल जाइत अिछ। नाथ बाबू कR तीन बीघा खेत छलिन। एकबेर ओ अपना खेत मे मौथा घास
उखाड़ैत छलाह। बाट चलैत गामक लोक पुिछ देलकिbह:
गामक लोक: “नाथ! की करैत छी?”
नाथ:
“नाथ बाबू छिथ काल िगरहkत
तीन बीघा केर जोता
सबहक खेत मे धान उपजैत अिछ
नाथक खेत मे मौथा”
तिहया सँ इ फकड़ा DिसÔ भऽ गेल:
“सबहक खेत मे धान उपजैत अिछ
नाथक खेत मे मौथा”
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अिह तरह िमिथलाक अिधक|श गाम मे िकछु ने िकछु लोक भेल छिथ जे फकड़ा िनमण केने छिथ आ ओ
फकड़ा गाम मे Dचिलतं अिछ। ओिह फकड़ा सँग ओकर िनमता सेहो गामक लोकक कंठ मे रचल बसल
छिथ। उदाहरण हमरा लग अनंत अिछ मुदा िवषय सँ िवषय|तर निह होई तािहं आगा बढब ज°री।
वृहद् िहंदी कोश मे लोकोि²त केर पिरभाषा किन िवkतार सँ भेटैत अिछ:
“िविभ Dकार के अनुभवॲ, पौरािणक तथा ऐितहािसक ©यि²तयॲ एवं कथाओं, Dाकृितक िनयमॲ और लोक
िवªासॲ आिद पर आधािरत चुटीली, सारगिभ<त, सँिJ¢त, लोकDचिलत ऐसी उि²तयॲ को लोकोि²त कहते ह®,
िजनका Dयोग िकसी बात िक पुिÊ, िवरोध, सीख तथा भिव´य-कथन आिद के िलए िकया जाता है।”
एिह सँ एक बात िदस kपÊ सँकेत इ भेटैत अिछ जे हमरा लोकिन अपन िमिथला मे उपलध फकड़ा के
देखैत एक kथानीय अथवा काजक पिरभाषा बना ली। इ पिरभाषा हम अपन «ान, मानवशाkL, लोकिव\ा
(फोकलोर) मे DिशJण आ िमिथला सँ Dा¢त फकड़ाक सँचयन आ ओकर सँरचना के आधार पर गढ़बाक य¿
कऽ रहल छी:
“मैिथली फकड़ा जकरा लोकोि²त सेहो कहल जा सकैत अिछ, लोकक Óारा Dचिलत एहेन कथन अिछ जे
पौरािणक कथा, bथ, धम<शाkLक दृÊाbत, घटना िवशेष सँ िवकिसत िशJा, हास, पिरहास, मनोभाव, दुःख-
दद<, Dेम, अपन³व, िलंग भेद, जातीय अथवा सामुदाियक kवाभाव आ गुण, छोभ, वैरा§य, उदासी भाव, Dकृित
सँ तारत6य, जिड़सँ जुड़ाव, पूव<ज सँ िसनेह, «ानक सँचरण, आिद भाव ©य²त कएल जाइत अिछ।”
फकड़ा कR kव°प कR अगर गंभीर बिन देखी तऽ kपÊ हएत जे फकड़ा’क उÔरण देमय बला लोक ओिह
सँग ©यि²त अथवा पिरिkथित कRओिहना सीब लैत अिछ जेना कोनो मिहला सुई मे ताग घुसा ओिह सँ कोनो
वkतु अथवा कलाक िनमण करैत अिछ। तीनू – सुई, ताग आ वkL – आपस मे एना गुथा जाइत अिछ जे
तीनूक अलग-अलग अिkत³व ताकब दु´कर। तीनूक सम अिkत³व सँ कला बनैत छैक। सएह भेल
फकड़ा। फकड़ा क एकाएक उमडल मनोदशाक स6Dेषण सेहो कहल जा सकैत अिछ जािह मे स6Dेषण कR
अिधक Dमािणक आ Dभावो³पादक बनेबा लेल उÔरणक मदित लेल जाइत छैक।
किन फकड़ा केर kव°प आ ओकर अनेक प पर िवचार सेहो करक चाही। िमिथला मे ©या¢त फकड़ा कR
kव°प आ उपलधता देखैत कहल जा सकैत अिछ जे फकड़ा कR चािर भाग मे िवभ²त कएल जा सकैत
अिछ:
(क) वैिªक फकड़ा
(ख) अिखल भारतीय kव°पक फकड़ा
(ग) िमिथलाक फकड़ा
(घ) kथानीय फकड़ा
आब किन उपव<िण<त फकड़ाक kव°प पर िवचार करैत छी।
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(क)वैिªक फकड़ा
वैिªक फकड़ा, जेना िक नाम सँ kपÊ अिछ, एहेन फकड़ा भेल जे समkत िवª मे Dचिलत अिछ। अिह
तरहक फकड़ाक Dयोग मैिथली मे मूल फकड़ा कR अनुवाद कए होइत अिछ। उदाहरण हेतु:
Rome was not built in a day। -“रोमक िनमण एक िदन मे निह भेल”
Child is the father of a man।- बचा पैघ लोकक िपता होइत अिछ
Necessity is the mother of invention।- “आवÄयकता अिव´कारक जननी होइत अिछ”।
वैिªक फकड़ा अपन वैिªक kवभावक कारणे आ स|kकृितक आदान-Dदानक कारणे मैिथली आ आन भाषा आ
सँkकृित मे सदैव Dयु²त होइत रहल अिछ। लोकक िविभ देश मे Õमण, दोसर देश आ सँkकृितक मÀय
आदान-Dदान, सािह³य आ भाषाक अÀययन आिद एकर फैलाव आ ©यवहारक कारण बनैत छैक।
(ख) अिखल भारतीय kव°पक फकड़ा
अिह तरहक फकड़ा समkत भारत आ ताहू मे िहंदी बहुल JेL मे Dयु²त होइत अिछ। िमिथला मे सेहो
ओकर मूल प मे एकर Dयोग होइत अिछ। कखनोकल भाषाक अनुवाद सेहो कऽ देल जाइत छैक। िकछु
उदाहरण देखैत छी आ ओकर िववेचना करैत छी:
ना राधा को नौ मन घी होगा ना राधा नाचेगी – निह राधा के नौ मोन घी हेतिन ने राधा नचती।
ऊंट के मुँह मे जीरा – “ऊंटक मुँह मे जीरक फोड़न”
ऊपर के उदाहरण मे मूल िहंदी फकड़ा के मैिथली मे अनुिदत कए कहल गेल अिछ।
आब दोसर देखू:
“लेना देना कुछ नही मुहबत एक चीज़ है।”
“का वष जब नदी सुखाने/ समय चुक पुिन ²या पछताने”
“किबरा खरा बाजार मे िलए लुकाठी हाथ/ जो घर ज़ारे आपना चले हमारे साथ”
“ढ़ाई आखर Dेम का पढ़े सो पिÎडत होय”
“बड़े िमया तो बड़े िमया/ छोटे िमया सुभानअnलाह”
“िमया की जुी िमया का सर”
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उपरो²त सब फकड़ा अपन भाषा आ ओकर सँkकार सँग िमिथला मे अबैत अिछ। मैिथली भाषी एकर Dयोग
अपन भाषा आ ©यवहार मे एकर मूल प मे िबना कोनो जोड़-तोर केने, िबना कोनो अनुवाद कR करैत छिथ
आ एकर भाव सेहो िबना कोनो झंझट कR kपÊ होइत जाइत छैक। अिखल भारतीय फकड़ा मे कोनो भाषा
जेना मगही, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली, अवधी, उदू< आिदक फकड़ा आिब सकैत अिछ। अिखल भारतीय
कहक अथ< िहंदी माL निह लागक चाही।
(ग) िमिथलाक फकड़ा
िमिथलाक फकड़ा कहब कR ता³पय< भेल जे कोनो फकड़ा जे समkत िमिथला JेL मे बाजल जाइत अिछ
(ओ देवघर, सँथाल परगना, दुमका, भागलपुर, मुंगेर सँ लऽ कऽ नेपालक मैिथली भाषी JेL धिर पसरल
लोकक फकड़ा), ©यवहिरत होइत अिछ से फकड़ा। इ फकड़ा सब कमोवेश एक kव°पक अिछ। अिहमे
य\िप एक बातक स6भावना भऽ सकैत अिछ जे िकछु फकड़ा जे अिखल िमिथलाक kवभावक अथवा Dकृित
कR अिछ तकर सँचयन सब मैिथली भाषी JेL सँ लोक पर6परा सँ िलिखत पर6परा मे निह भेल हो। अगर
से निह भेल अिछ तऽ मैिथली सािह³य आ सँkकृित के शोधकम एवं सािह³यजीवी लोकिन एिह बात कR
गंभीरता सँ लेिथ आ समkत िमिथला JेL सँ लोक पर6परा मे ©या¢त फकड़ा सबहक सँचयन कए ओकर
सँरचना आ ©यवहार पर शोध करिथ।
(घ) kथानीय फकड़ा
kथानीय फकड़ा ओ फकड़ा भेल जे कोनो िवशेष गाम अथवा ओकर अगल-बगल मे कोनो घटना िवशेष,
अथवा कोनो ©यि²त िवशेष Óारा रचल गेल हो आ ओिह परोपÖा मे लोक ©यवहार मे Dचिलत हो। kथानीय
फकड़ा के स6बbध मे एक बात कहब अिनवाय< जे कालक याLा सँग नहु-नहु मह³वपूण< फकड़ा िकछु समयक
बाद अिखल िमिथला आ बाद मे अिखल भारतीय आ कखनो काल अंितम डेग फानैत वैिªक फकड़ा सेहो
बिन जाइत अिछ। kथानीय फकड़ा केर उदाहरण शु मे देल गेल अिछ तािह एकरा फेरो सँ देमाक दरकार
निह अिछ।
अिह तरह दू बात एक सामाbय पाठक लेल kपÊ भऽ गेल:
· पिहल, फकड़ा की अिछ, एकर पिरभाषा िवशेषप सँ मैिथली भाषा आ सँkकृितक सbदभ< मे की
होबक चाही।
· दोसर, मैिथली सँkकृित मे Dचिलत फकड़ा के कतेक eेणी मे ब|टी देखल जा सकैत अिछ।
आब अिह Dारि6भक जानकारीक बाद अिह लेख कR आ³मा अथत फकड़ा Óारा मानवी या मैिथलानी के
मनोदशाक स6Dेषण कोना होइत अिछ। कोना ओ सब अपन मोनक भाव, उतार-चढ़ाव, नीक-अधलाह, Dेम,
वेदना, िवरह, सामािजक िkथित, उमंग, दुःख, आिथ<क िबपता, आिद क ©य²त करैत छिथ। ©य²त करब
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एक बात भेल आ ओिह अिभ©यि²त क बुझब आ ओकरा सँग आ³मसात करब दोसर बात। इ दूनू बात अगर
मैिथली फकड़ा आ नारी मनोदशा के देखब तऽ भेटत। भाव अिधक|श अवkथा मे एकक अथवा ©यि²त
िवशेषक निह अिपतु समkत नारी समाज लेल, तऽ कखनोकाल एक वग< िवशेषक नारी समाज लेल होइत
अिछ। समाजक सँरचना जे आइ तीवÒ गित सँ बदिल रहल अिछ तािह मे सामािजक-स|kकृितक-इितहािसक
आ जडर िडkकोस< कR Àयान मे रखैत अिह िवषय पर गहन शोधक दरकार अिछ। हम अपन सीिमत «ान
आ साधन कR िहसाब सँ अिह पर िकछु िलखबाक य¿ कऽ रहल छी।
िलखबा सँ पिहने इ kपÊ कऽ देनाइ आवÄयक जे समाज बदिल रहल अिछ। पिरवत<न अपन गित पकिड़
रहल अिछ। पिरवत<न सँग मैिथल मानिशकता सेहो बदिल रहल अिछ। लोक बेटा बेटीक िवभेद कम कऽ
रहल छिथ। सब JेL मे आन समाज जक िमिथलाक िधया सेहो Dगितक पथ पर साधल डेग दऽ रहिल
छिथ। हालिह मे िमिथलाक एक बेटी भारतीय वायु सेना मे पायलट कR प मे चयिनत भेलीह अिछ। हुनकर
चयन पर समkत मैिथल समाज अपना आपकR गविbवत अनुभव कऽ रहल अिछ। ओिह िधया कRचा िदस
सँ शुभकामना भेिट रहल छिन। इ घटना बदलैत मनःिkथितक पिरचायक अिछ। एकर अथ< इहो निह जे
सब िकछु ठीक भऽ गेल अिछ। िवª समुदायक बाते छोड़ी दी, भारतवष< मे सेहो हम सब बहुत समुदाय,
समाज, वग< आ रा¡य सँ नारी सँचेतना, िवकास मे एखनो बहुत पछुआएल छी।
समाजक सँरचना देखला सँ एहेन सन लगैत अिछ जे समाज माL बेटा लेल बनल अिछ। ककरो अनेक
बेटा भेलैक तऽ ओ भागवंत आ एकर िबपरीत िकनको अनेक बेटी भेलिन तऽ बड अधलाह। अिह िkथित
मे समाज ओिह बेटी सभक तुलना िपलुआ सँ करैत कहैत अिछ जे फल| िkLगन अथवा पु°ख कR “खद-
खद बेटी” छिन।kमरणीय तÌय इ अिछ जे खद-खद शद िपलुआ लेल कएल जाइत अिछ।
बातक अंत अतए निह होइत अिछ। स6मर गीत जे बेटीक िबआह सँ पिहने गाएल जाइत अिछ मे माय अपन
©यथा बतबैत कहैत छिथ, ‘बहुत भऽ गेल कोनो ढंगक बर निह भेट रहल अिछ। बेटीक जbम पहाड़ भऽ
गेल! की करी िक निह?’ बेटी मायक दुःख सँ vिवत होइत अपन नारी होबाक अवkथा सँ प¾ाताप करैत
गीत आ फकड़ा कR मादे कहैत छिथ ‘माय, अनेड़े हमरा जbम किथलेल देलहुँ? अिह सँ बिढय तऽ इ रहैत
जे हमरा अथत बेटीक जbम सँ पिहने चालीस पचास मरीच बुिक कऽ खा िलतहुँ जकर झ|स सँ बेटी गभ<िह
मे तुिब जाइत आ िजनगी भिर लेल िधयाक सँताप सँ मुि²त अहकR भेट जाइत!
“किथ लए आहे अ6मा िधयाक जनम देल
खैतहुँमिरच पचास
मिरचक झस सँ िधया दूिर जैतय
छुिट जाइत िधयाक सँताप”
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समाज एिह मानिशकता मे जीबैत अिछ जे बेटी घर मे अिधक भेलाक अथ< भेल धनक Jय आ ल×मीक
Dkथान। एक फकड़ा मे अिह बातक kपÊ Dमाण भेटैत अिछ:
“िवD टहलुआ मेष धन
या बेटीके बाढ़ी
ताहू सँ धन निह घटए
क पैघ सँ रािड”
इ फकड़ा Dमाणक सँग डंकाक चोट पर कहैत अिछ जे Çा6हणक बालक कR नौकर टहल िटकोरा करक हेतु
राखब सँ, छागर-बकरी पोसला सँ आ बेटीक सँया बढ़ला सँ धनक Jित होइत अिछ; तकर बादो अगर
स6पित ब|िच गेल तऽ अपना सँ पैघ हैिसयत केर लोक सँ लड़ाई ठािन िलय, स6पित बरबाद भऽ जेबे टा
करत।
फकड़ाक िववेचना सँ लगैत अिछ जे बेटी कR लोक िसनेह करैत अिछ, मुदा बेटी कोिख मे अबैक तकर
कामना निह करैत अिछ। भले बेटीक सुरJा िघबही घैल जक कएल गेल होइक मुदा ओकर ¢यार आ दुलार
बेटा जक केल जाइत छैक। अथ< भेल, बेटा अिधक मह³वपूण<। अbयथा, बेटी कR बेटी जक दुलार िकएक
निह?
“घीबक घैला जक पोसलहु गे बेटी
बेटा जक कएल दुलार”
िमिथला मे कोनो मिहला लेल बेटाक कामना अतेक Dबल होइत छैक, तकर उर देब किठन। एक िचरै
बहुत का°िणक kवर उ³प करैत रहैत अिछ। ओिह िचरै कR स6बbध मे Dचिलत माbयता इ छैक जे कोनो
जbम मे ओ िचरै एक मानवी छिल। ओकरा अनेक बेटा होइत गेलैक आ सब मरल गेलैक जखन िक जतेक
बेटी भेलैक सब िजल गेलैक। जखन ओ मिहला मरिलतऽ बहुत िदन धिर ओकर आ³मा बेटा लेल भटकैत
रहलैक बाद मे ओकर kव°प बदिल गेलैक आ ओ िचरै बिन जनम लेलक। एखनो ओकरा पूव< जbमक बात
सब kमरण छैक तािहं ओ का°िणक kवर मे अपन ©यथा कथा कहैत रहैत अिछ:
“टी टी टी ितसी तेल
बेटा भेल मिर मिर गेल
बेटी भेल जीब जीब गेल”
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अगर वै«ािनक दृिÊकोण सँ उपलध फकड़ा सबहक िववेचन कएल जाय तऽ पता चलैत अिछ जे फकड़ा
त³कालीन समाजक दप<ण अिछ; समाजक ऐितहािसक दkतावेज अिछ। अिहबातक पुिÊ िनÙिलिखत फकड़ा
सँ होइत अिछ:
“जनक नगर सँ चलली हे सीता
अ6मा देलिन रोदना पसार
के मोरा सीता लए बिसया जोगेतै
के मुख करत दुलार”
इ फकड़ा जेना भw सँ लोकक आँिख खोलैत हो! इ कहैत अिछ जे ताज़ा, त¢पत भोजन खेबाक अिधकारी
बेटा अिछ, आँिठ, बिसया भोजन बेटीक भाग मे िलखल रहैत अिछ। बेटी जखन िबआह कR बाद सासुर जा
रहिल अिछ तऽ माय कनैत सोचैत छिथ, ‘आब सासुर मे हमर बेटी लेल इ बिसयो अ कR जोगा’क राखत
आ के एकर गाल पकिड़ दुलार करतैक?’ इ फकड़ा बहुत पैघ याLा लेल चिल पड़ैत अिछ। लड़की मायक
िचंता एिह फकड़ा मादे देखू। ओ कहैत छिथ जे आब हुनका बेटी लेल इ बिसयो भोजन ओकर सासुर मे कR
रखतैक? कR ओकरा सँ Dेम सँ बजतैक? यएह सब सोिच-सोिच मायक छाती बेर-बेर फािट रहल छिन।इ
फकड़ा बतबैत अिछ जे कोना लड़की सासुर जाइते देरी उरदािय³वक भार सँ दबा जाइत अिछ। इ फकड़ा
देखन मे छोटन लगे/ घाव करे गंभीर जक अिछ।
एक आर फकड़ा ऊपर विण<त फकड़ाक अथ< kपkट करैत अिछ आ बेटीक िबआह भेलाक बाद सासुर गेला
पर की िkथित होइत छैक तकर खाका खीचैत छैक:
“जब डािर चलल ससुर घर देस
घरक चालिन होयबो हे”
अथ< इ भेल जे आइ धिर जे िधया नैहर मे सुकुमािर छलीह से आब दोसर देस दोसर लोक मे जा रहिल
छिथ, ओतय िहनकर की गित हएत! काज करैत-करैत आ लोकक बात सुनैत-सुनैत अपिसयात रहतीह। मोन
चालिन जक अनेक खंड मे िवखिbडत भऽ जेतिन। मतलब, इ फकड़ा भिव´यक यातना िदस इशारा करैत
अिछ।
िमिथलाक नारी एक िविचL मनोदशा आ पिरवेश मे जीबैत छलीह। िकछुके जीवन मे पिरवत<न आिब रहल
छिन अिधक|श एखनो िपता, ¡येP Õाता, eेP एवं अिभभावक पर आिeत छिथ अथवा हुनक िनण<य कR
बलधकेल kवीकार करबा लेल िववश छिथ। आ¾य<क बात इ छैक जे लड़की कR कहेन लड़का चाही आ
ओकरा मोन मे की बात घुिम रहल छैक तकर वण<न सेहो गीतगाइन सब अपन गीत आ फकड़ाक माÀयम सँ
बजैत छिथ:
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“जखन चलला बाबा वर ताकय
आगा भए °ि²मणी ठािर हे
कर जोिड़ िमनती करै छी यौ बाबा
सुनू बाबा िमनती हमार यौ
जुिन बाबा ताकब चोर चंडाल के
जुिन आनब तपसी िभखािर यौ”
नाियका अपना लेल अपन eेP सँ एक सामाbय बर जे िसनेहक अथ< जनैत होिथ कR आक|Jा रखैत छिथ।
हुनका चोर, चंडाल, लुचा- लफंगा अथवा कोनो नंग धरंग साधू सbयासी निह चािहयिन।इ फकड़ा एक
मिहलाक दासताक जीबैत साJी अिछ।
फकड़ा पढ़ैत चलू आ समाजक गढ़िन देखैत चलू। फकड़ा एक-एक तह खोलैत चलत। िkथित इ भऽ
जाइत अिछ जे कोनो मिहला अिगला जनम मे फेरो मिहला निह बनए चाहैत छिथ। िदनकर दीनानाथ सँ
िनहोरा करैत कहैत छिथ जे आब किहयो हुनका ितिरया अथत नारी प मे जbम निह देिथ:
“बेर-बेर अरजलॱ हे दीनानाथ
दीनानाथ ितिरया जनम जुिन देहु”
िपLसा³मक समाज अपन मायाजाल मे तेना ने िkLगन कR फंसा लेने अिछ जे ओ सब छरपट- छरपट तऽ
करैत रहैत छिथ, मुदा ओिह मायाजाल के तोिड़ कह पबैत छिथ! समाज सु§गा जक रटा देने छिन, रिट
लेने छिथ:
“बेटी ससुरे नीक की सरगे नीक”
फेर की सब मैिथलानी इ मािन लैत छिथ जे कोनो िवषम पिरिkथित हो, Dताड़ना हो, शोषण हो, पित सौितन
लऽ अबैथ, भोजन स6मान भले ने भेटए, कोनो िkथित मे सासुर निह छोड़ी आ नैहर के तऽ चचÚ बेकार!
बेटीक डाला नैहर सँ सासुर लेल उठैत अिछ आ सासुर सँ बेटीक लाशक डोली उठक चाही। फेरो एकरा
समािजक सँरचना सँगे जोिड़ देल जाइत अिछ। िबआह होइते देरी नैहर मे बेटीक अिधकार समा¢त आ
भाउजक वच<kव Dार6भ। अगर िबआहिल आ सासुर बसैत बेटी नैहर मे िकछु दखल देलिन तऽ इ अमाbय।
फकड़ा एकरा एिह तरह Dमािणत करैत अिछ:
“घर आँगन भौजी के
छल छल करिथ ननदो”
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अथ< kपÊ भेल आब जे बेटी िबआह सँ पूव< िपताक घर पर अपन अिधकार बुझैत रहैत छलीह से हुनकर
निह अिपतु हुनक भाउजक भऽ चुकल छिन। ओ अिधकारहीन भऽ चुकिल छिथ। कोनो पु°ख ज अिह
बातक अनुभव करए चाहैत छिथ तऽ एकबेर इ कnपना माL कऽ लेिथ जे िबआहक बाद एकाएक हुनका
स6पित सँ बेदखली कऽ देल जाइत छिन, सामािजक ©यवहार मे ओ िन´कािसत भऽ जाइत छिथ। फेर कहेन
अवkथा मे रिह सकैत छिथ। इ कnपना माL हमरा सबके कÊकारी लगैत अिछ आ तकरा एखनो धिर
मैिथलानी जीब रहिल छिथ से कतेक दुखक बात! आ अिह बातक भान फकड़ा कोना खोिलकऽ kपÊ करैत
कहैत अिछ।
एक अवkथा एहेन होइत छैक जखन एक मिहला अपना आपकR असहाय पबैत अिछ आ लगैत छैक जे सब
सँkथा, सामािजक मयदा, िबआह-दान, कुल-पिलवार सब िकछु बेकार छैक! लोक अनेड़े मायाक बंधन मे
बbहा जाइत अिछ! इ सोच कखन होइत छैक? तखन जखन ओ Dसवक वेदना सँ लहालोट भेल इमहर-
ओ6हर ओंघिरया मारैत रहैत अिछ। तखन ओकरा लगैत छैक जे अिह सँ बिढय ओ िबआह निह केने रहैत
आ िपता-िपतामाहक घर मे जीवन भिर कुमािर बनल रहैत:
“किथलेल बाबा िबयाहलिन देलिन ससुर घर रे
ललना रे रिहतहुँ बारी कुमािर दरद निह जिनतॱ रे”
अनेड़े बाबा हमर िबआह करा ससुर घर भेज देलिन। नीक रहैत जे कुमािर भेल नैहर मे रिहतहुँ। कम सँ
कम अिह DचÎड दद< सँ बंिच तऽ जैतहुँ!
िमिथलाक सब िkLगन अपना आपम सीता देखैत छिथ। हुनका सबके लगैत छिन जे सीता सँगे रामक
©यवहार उिचत निह रहलिन। अतेक कोमल सीता कR कोना कठोर भेल राम नाना तरहक यातना देलाह!
एहेन राम सँग िबआहक की लाभ? िजनगी भिर सीता कR सुख कह भेटलिन:
“राम िबयाहने कोन फल भेल
सीता जbम अकारथ गेल”
आ अbततः सीता कR राम धोबी कR कहला पर तखन घर सँ भगा देलिथन जखन सीता रघुकुलक कुल
दीपक कR जbम देबा लेल गभ< सँ छलीह! एहनो कहॴ कतौ भेलैक अिछ:
“राम िबयाहने कोन फल भेल
सीताक जbम िबयोगे गेल”
बात अतए समा¢त निह होइत अिछ। कहल जाइत अिछ जे जखन सीता वेदनाक अिधकता सँ भिर गेलीह
आ राम हुनका बाnमीिक आeम सँ लव कुशक सँग अयोÀया चलबा लेल िजद ठािन देलिथन तऽ सीता पुिछ
देलिथन: “हमर अयोÀया मे आब िक Dयोजन, हमरा तऽ अह िनकािल देने छी?”
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एिह बात पर राम उर दैत छिथन: “अहक िबना हमर अªमेध य« सँभव निह अिछ।”
सीता: “फेर एखन धिर अह कोना करैत रही अªमेध य«?”
राम: “अहक कोनो उदेस हमरा लग निह छल। हम मािन लेने रही जे अहक िनधन भऽ चुकल अिछ।
एहेन अवkथा मे शाkL इ िवधान दैत अिछ जे यजमान सोनाक प¿ी बना य« पर बैस सकैत अिछ। हम
सएह कएल। सोनाक सीता बना अªमेध य«क वेदी पर बैसल रही।”
रामक इ बात सुिनतिह सीताक करेज फािट गेलिन। आँखी नोरा गेलिन। भेलिन, ‘रामो सन पित अतेक
मतलबी भऽ सकैत छिथ!’ भावावेश मे अबैत सीता बािज उठलीह: “एकर मतलब इ भेल जे अह हमरा अपन
य«क लोभे अयोÀया लऽ जेबा चाहैत छी?”
राम चुप रहला।
सीता फेरो बजलीह: “एकर अथ< तखन इ भेल जे अहक य« मे हमही वाधक छी?”
राम एखनो चुपे छलाह।
आब सीता िनण<य दैत बजलीह: “ठीक छैक, हम अहक समkयाक तुरत समाधान करैत छी।”
राम किन गंभीर तऽ भेलाह मुदा मौन भेल रहलाह।
सीता धरती माता िदस हाथ जोिड़ बैस गेलीह आ िनवेदन केलिन: “हे धरती म! अिहंक कोिख सँ हमर
जbम भेल अिछ। हम आब अिधक वेदना निह बरदाÄत कऽ सकैत छी। अह आब हमर उपाय त³Jण
क। फाटू! एखन फाटू! अतए फाटू! हमरा अपन कोरा मे सुता िलय। आब हम अिह लोक सँ उिब गेल
छी!”
वनदेवी सीताक गोहार धरती माता तुरत kवीकार केलिन। धरती मे तुरत दरार पिर गेलैक। जाबेत राम
सीता कR रोकैथ तावेत सीता धरती मे Dवेश कऽ गेलीह। धरतीक पुLी धरती मे िवलीन भऽ गेलीह। धरती
पुनः यथावत भऽ गेलीह। एखनो जखन कोनो मैिथलानी कÊ सँ भिर जाइत छिथ तऽ एकाएक हुनका मुँह
सँ िनकिल पड़ैत छिन: “फाटू हे धरती”। से किहते ओ सीताक िमिनएचर भऽ जाइत छिथ।
फकड़ा Dकृित सँ उÔिरत सेहो होइत अिछ। कखनोकाल जखन िkLगन अपन सँतान आ पित सँ तंग भऽ
जाइत छिथ तऽ अपन तुलना काकोर सँ करैत छिथ। तिहना जेना अनेक बचा सबके जbम दैत काल
काकोर अपन जान गमा दैत अिछ तिहना मैिथलानी सब बाल-बचा, पित आ पिरवार लेल अपन शरीर आ
इछा कR गला लैत छिथ। दुखक भार बढ़ला पर बािज उठैत छिथ:
“क़कोरबा िबयान क़कोरबै खाय”
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मिहला मनक मनोदशा नहुँ-नहुँ अनेक तरहR फकड़ा माद Dवािहत होइत रहैत अिछ। दुख मे, सुख
मे, आनंदाितरेक मे, वेदनाक सघनता मे मैिथलानी kवतःkफूत< होइत अपन पिरिkथित कR कोनो ने कोनो फकड़ा
सँ जोिड़ लैत छिथ। तथाकिथत िनÙ जाित अथवा समुदायक लोक सँ ओना तऽ तथाकिथत उच वग<क
लोक सामािजक मेल िमलापक दूरी रखैत छिथ अथवा सीिमत अवkथा मे करैत छिथ लेिकन जखन Dहसन
अथवा मजाक Dदिश<त करबाक होइत छिन तऽ ओिह समाजक kLी सँ साि6पयक आक|Jा रखैत छिथ आ
मयदाक अितमण करबा मे सेहो सँकोच निह करैत छिथ। मिहला सेहो बुईझ लैत छिथ जे पु°खक इछा
आ आक|Jा की छिन। जखन पु°ख मयदा कR ³याग करैत छिथ तऽहुनका इहो भान निह रहैत छिन जे ओ
मिहला िहनका गाम अथवा समाजक Dचिलत मानदÎड पर भाउज,भावहु, पुतोहु अथवा की हेतिन! अिह Jण ओ
िkLगण हुनका भाऊज सन लगैत छिन जकर बहुत मुंहतोड़ जवाब फकड़ा दैत अिछ:
'रारक बहु सबहक भौजी"
अिह दशा कR देखैत िव\ापितक एक पद Äमरण अबैत अिछ जािह मे अkपृÄय सुिर युवतीक पित िबदेस
गेल छैक, सासु बिहर तऽछैके, ओकर आँिख मे रतॱधी सेहो भेल छैक। ओना तऽसमाजक उच जाितक उच
लोक, पु°ख ओकर देह सँ सटब पाप बुझैत छिथ लेिकन राित मे वएह पु°ख ओिह कािमनी सँग अपन काम
िपपासा शाbत करबा लेल उताहुल छिथ, ओिह Jण लेल ओ मिहला हुनक सजाित भऽजाइत छिन:
"अिधयन कर अपराधहुँ साित
पु°ख महते सब हमर सजाित"
महाकिव िव\ापित आगा बढ़ैत कहैत छिथ:
"भनिह िव\पित एिह रस गाब
उिकतहुँ अबला भाव जगाब"
िव\ापित तऽअतेक आगा बढ़ैत ई तक बािज लैत छिथ जे लोक अनेड़े हुनका रिसक किव कहैत
छिन, Dेमक-eृंगार, िमलन-अिभसार आ रितिया कR किव कहैत छिन; असली रस तऽओ शोिषत आ अथ<हीन
युवतीक दुखक बयान करब छिन। ओ अबलाक भाव कR Dदिश<त करए बला किव छिथ:
"भनिह िव\ापित एिह रस गाब
उिकतहुँ अबला भाव जगाब"
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कखनोकाल िkथित एहेन भऽजाइत अिछ जे दद< आ भावना³मक शोषण आ दोहन सँ जखन मैिथलानी भिर
जाइत छिथ, िह6मत जखन जवाब देमय लगैत छिन,माथ जखन िभाय लगैत छिन, तखन ओ अपन भड़ास
िनकलैत बजैत छिथ:
"नहुँ नहुँ मुती तऽस-स उठय"
उपरो²त फकड़ा Dदिश<त करैत अिछ जे जखन चा° िदस सँ मोनमे नाना तरहक Óbद चलैत रहैत
छिन, शोषणक अिधकता एकठाम ढ़ेर भेल जाइत छिन, एक िनि¾त अविधक बाद ओ अपन भड़ास िनकािल
लैत छिथ। ओ कतऽकरतीह। लोकपटल पर लोक धारणाक हेतु। सएह करैत छिथ।
एक अवkथा एहेन होइत अिछ जखन िकयोक अपन बैभव कR बारे मे अनेड़े बखान करैत छिथ, तािह Jण
िकछु घोर स³यवादी मिहला कR अनेड़े फुइसक बड़ाई अथवा पदबड़ाई अनसोहत लगैत छिन। बात जखन
बहुत आगा बिढ़ जाइत छैक तऽबािज उठैत छिथ:
"गरी कहलक पटोर पिहरने रही
आँिख कहलक सÛे रही"
उपरो²त फकड़ा यथाथ< आ फेकब मे अंतर kपÊ करैत अिछ। नारी मानिशकताक यथाथ< आ किnपत
मानिशकता केर Óbद kपÊ करैत अिछ। एक सँ दोसरक पिरkपधक िववेचन करैत अिछ, समाजक
मानिशकता देखबैत अिछ।
कोनो मिहला (अथवा िवशेष अवkथा मे पुष) जखन ©यथ<क शोर आ अनघोल करैत छिथ, अपन कृ³य
(अथवा कुकृ³य) कR झपबाक य¿ मे नीक अथवा भv मिहला कR दोख तकैत छिथ तऽउिचतव²ता kवभावक
मैिथलानी हुनका पर तंज कसैत बािज उठैत छिथ:
"बट हगनी ने लजाय
उपराग देमय जाय"
गुनमंती मैिथलानी नारीक मह³व नीक जक बुझैत छिथ। हुनका «ात छिन जे मायक भूिमका माL माय िनभा
सकैत छिथ। िपता अथत पु°ष तऽमतलबी होइत अिछ, भमरा होइत अिछ। पु°ख कR सँतित सँग प¿ी सेहो
चाही। मिहला कR सँतित आगा िकछु निह। कोनो तरहक बात भेला पर पु°ख लेल िनÙिलिखत फकड़ा पढ़ल
जाइत अिछ:
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"माय मुइने बाप िपितया"
अथ< भेल मायक मरैत मातर िपताक ©यवहार सँतानक Dित बदिल जाइत छिन। िपता दोसर प¿ी केर जोगार
मे लािग जाइत छिथ।
िपता कतबो क°णाशील होिथ मायक kथान लेब असँभव छिन। एक फकड़ा देखु तऽअथ< kपÊ भऽजायत:
"जे मायक दूध सँ निह हएत
से बापक आंड़ चटने कतऽहएत"
ई फकड़ा जखन कखनो सुनैत छी तऽ िहंदी िसनेमाक एक गीत kवतः Äमरण आिब जाइत अिछ:
"बाप का जगह म ले सकती है
म की जगह बाप ले नही सकता
लोरी दे नहॴ सकता
सो जा सो जा"
बेटी सामाbयतया मायक गुण आ बेटा िपताक गुण आ kवभाव िकछु ने िकछु kवतः हण करैत अिछ। एकर
Dमाण िनÙिलिखत फकड़ा सँ भेटैत अिछ:
"माय गुण धी िपता गुण घोर
निह िकछुओ तऽथोड़बो थोड़"
दोसर फकड़ा माय आ बेटीक बात करैत कहैत अिछ जे मायक गुण बेटी सहजे हण करैत अिछ:
"भनिह िव\ापित बसक टोटी
जकर जेहन माय तकर तेहेन बेटी"
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आब पु°खक बारी अबैत अिछ आ फकड़ा कहैत अिछ जे जिहना मायक गुण बेटी करैत छिथ तिहना बापक
गुण बेटा हण करैत छिथ:
"भनिह िव\ापित बसक टोटा
जकर जेहन बाप तकर तेहेन बेटा"
मिहलाक़R जतेक अिधकार अपन पित पर रहैत छिन ततेक पुL अथवा पुLी पर निह। पितक स6पित आ
टाका पर हुनका पूण< अिधकार, सव<L kवतंLता रहैत छिन,ने रोक ने टोक। लेिकन बेटाक स6पित आ रािश
पर मायक अिधकार एकाएक जेना सीिमत भऽजाइत छिन।
अिह बातक पुिÊ िनÙिलिखत फकड़ा सँ होइत अिछ:
"सइय| राज अ° राज
बेटा राज मुहतककी"
िपतृसा³मक समाजक सँरचना लोकक मोन मे ई धारणा kथािपत कऽदेने अिछ जे बेटी आ बेटीक लोक -
पित आ पुL - आन होइत अिछ, अपन निह। यएह बात फकड़ा सेहो kथािपत करैत अिछ। िनÙिलिखत
फकड़ा देखला सँ ई बात नीक जक फ़िरछा जाइत अिछ:
"धी, जमैÜया भिगना
ई तीनू ने अपना"
मैिथलानी सेहो सहज मोन सँ एकरा kवीकार कऽलैत छिथ।
वैधवयक जीवन बहुत दुःखद होइत रहल अिछ। महादेब बर, भंिगया िभखारी Dवृिक वर सदैव मैिथलानी कR
िवशेष प सँ ÇाÈण बािलका कR भेटैत रहलिथbह अिछ। बेमेल िबआह एखनो कतौ-कतौ दृिÊगोचर होइत
अिछ। हालिह मे हम एक िववाह मे गेल रही। लड़की बहुत सुbदिर, देहगिर, कटगर, देखनूत रहैक। लड़का
किन दब। ऊपर सँ एक हाथ मे किन समkया। राित भिर कतेक बेर िkLगण सब चािर पंि²त केर गीत
गबैत रहली आ प¾ाताप करैत रहलिन। गीतक दू पंि²त हमरा जीवन भिर लेल kमरण भऽगेल जे फकड़ा
जक ©यवहिरत होइत रहैक:
"लोहा मे जिड़ गेल सोना
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हम िजबै कोना"
«ात©य इ जे अतए लोहा बर आ सोना किनया छैक।
Dसँग िवधवाक छल। चलू अिह िदशा मे चच< करैत छी। वैध©यक िkथित बहुत खराप होइत छल। अगर इ
घटना ÇाÈण अथवा कण< कायkथ अथवा आन उच वग< मे होइत छल तऽ िkथित भयावह भऽ जाइत
छल। बारह, तेरह, पbvह वष<क लड़की िवधवा कतेक ठाम भऽ जाइत छिल। िवधवा होइतिह पुनिव<वाहक तऽ
कnपनो निह कएल जा सकैत छल, उपर सँ ओिह लड़कीक सब सुख-िसंगार, नीक भोजन आिद छीना जाइत
छलैक। कतेक ठाम तऽ िवधवा कR अं ेजी दबाई तक हण करबाक आज़ादी निह छलैक। ओकरा सुगिधत
तेल, साबुन, आिदक ©यवहार करब पर Dितबंध लािग जाइत छैक। ओ केश िवbयास निह कऽ सकैत अिछ,
नव ©याहल बर किनयाक चुमान करब तऽ दूर, ओकरा लग ठाढ़ तक निह भऽ सकैत अिछ। जेिहना Dथम
स|झ मे असगर तारा देखब अशुभक ल×ण अिछ तिहना तऽ िवधवा सेहो आब असगर तारा बिन गेल छिथ!
समkत हाहाकार मचल अिछ। यएह िkथित कR देखैत िव\ापित िलखैत छिथ:
“असगर तारा केओ निह देख
अमंगल लेख”
िवधबा पर Dितबंधक झड़ी लािग जाइत छिन। ¢याज-लहसुन, माछ-म|स के पुछैत अिछ गिरÊ भोजन तक
करबाक आज़ादी निह रहैत छिन। हुनक जीवनक ऋतुच जेना एक रंगाह भऽ जाइत छिन जािह मे सब
ठाम दुखक डंका बजैत रहैत छैक! िनÙिलिखत फकड़ा के देखला सँ िkथित kपÊ भऽ जाइत छैक:
“िवधवा घर मे सभ िदन भादब
िनरधन घर मे काितक
राजा घर मे सभिदन अगहन
फागुन घर अिहबाितक”
अिह तरहक िवपिक सामना करैत िवधवाक करेज करािह उठैत छैक। कुहेस फािट कानए लगैत अिछ।
आ भगवान सँ कहैत छिन कोन पापक कÊ ओ भोिग रहल अिछ? ओ अपन वेदना ककरा कहतैक:
“हे भगवान कोन कसूर िवधना भेल बाम
कहब दुःख ककरा सँ”
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एकर िवपरीत पु°ख लेल कोनो Dितबंध निह। प¿ीक िनधन भेलाक बाद ओ सब िकछु खा सकैत अिछ।
फेरो िबआह कऽ सकैत अिछ। प¿ी मरलैक तऽ की भेलैक! फेर दोसर िबआह भऽ जेतैक। दोसरो प¿ी मिर
गेलैक तऽ िचंताक कोनो Dयोजन निह, फेरो िबआह भऽ जेतैक! प¿ीक िkथित अखरा नोनक ढेप सन होइत
छैक – खिस पड़ल तऽ उठा िलय:
“नोनक ढेप खसल
उठा लेब”
अित वृिÊ आ अनावृिÊ सँ िमिथला अदौ सँ परेशान रहैत आिब रहल अिछ। लोक भूखे रहैत छल।
िkLगणक दशा तऽ आरो दयनीय छलिन। ओ बाहर जा निह सकैत छलीह। भीख कोना मंगती? कखनो
कुअ, कखनो साग पात, कतेक स|झ उपास करैत जीवन चलबैत छलीह। अिह तरहक िkथितक िवभ³सता
दश रहल अिछ िनÙिलिखत फकड़ा:
“िबपि जािन के आनल बजाय
अिरपन के चाउर गेली िचबाय”
िkथितक गंभीरता देखू। घर मे िkLगन नाना तरहक कÊ सहैत रहैत छिथ। अतेक खाराप िkथित भऽ
जाइत छिन जे अिरपन लेल जे चाउर राखल छिन सेहो िचबा जाइत छिथ।
कोनो मिहला कR अगर िकयोक अनेड़े मजाक अथवा तंग करैत छिन आ हुनका लग काजक, मूलप सँ
गृहकाय<क तऽ ओ बािज उठैत छिथ:
“घरबला सँ फुरसत ने
देओर मगए चु6मा”
बाल िववाह एक समय मे बहुत पैघ समkया बिन गेलैक। बेमेल िववाह जेना पसिर रहल छलैक। तकर
िववरण कोना फकड़ा दैत अिछ से देखू:
“ितिरया तेरह, मरद अठारह
कbयाक चमकए आँिख, िबआह होअय तमाम
छौड़ी बेर-बेर देखए अएना”
एक फकड़ा इ इंिगत करैत अिछ जे कोना मिहला कुअ खा अपन Dाणक रJा करैत छिथ आ कोना बूढ़
सँ िबआह कए िबआहक पितया छोड़ा लैत छिथ:
“गुडा-खुÞी खेलॱ उपास भंग भेल
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बूढ़ िबआहलक कुमािर पद गेल”
बेमेल िववाहक पिरिणित नीक निह होइत छैक। िkLगन जीवन पय<bत ओिह वेदना आ सामािजक उपहासक
पाL भऽ जाइत छिथ। अनेड़े हुनका सँ पैघ उमेिर कR लोक- kLी आ पु°ख सब हुनका जेठ किह
अपमािनत करैत छिन।एहने मनोदशाक िचLण िनÙिलिखत फकड़ा मे देखाएल गेल अिछ:
“हम निह बूिढ गे हम निह बूिढ
बूढबा िबआहलक त हम बूिढ”
अथ< kपÊ अिछ, ओ मिहला बूिढ निह छिथ, पिरिkथित जािह करणे हुनक िववाह बुढ़बा सँ भऽ गेल छिन
तािहं ओ बूिढ छिथ। उपरो²त फकड़ा नारी मनोदशाक ओिह िवशेष अवkथाक गूढ़ मनोवै«ािनक स6Dेषण
छैक।
नारी मनोदशाक अनेक परत होइत छैक। अपन कÊक स6Dेषण एक मिहला लोक माL मे लोक ©यवहार
माL सँ कऽ सकैत छलीह। लोक ©यवहार हुनका लेल लैकबोड< छलिन। ओ माL हुनक kपेस छलिन।
मिहला लोक आ िकछु पु°ष बचा माL हुनक eोता। वेदनाक अिधकता सँ जखन करेजक कुहेस फाटैत
छिन तऽ kLीक द§धल छाती सँ eाप िनकलैत छिन:
“जे मोरा खेलिन खीिरया पुिरया
ितनको होइहनु नाश”
आर ओ की कऽ सकैत छलीह। हुनका लगैत छिन जे पु°खक एहने कुकृ³य, अहँकार, िनरंकुश ©यवहार सँ
संसार मे अकाल, महामारी आिद भऽ रहल अिछ। इ बात लोक सँ कखनोकाल मैिथली सािह³य मे सेहो
अपन kथान बना लैत अिछ। बै\नाथ िमe “याLी” आ काशीक|त िमe “मधुप”क रचना मे लोक जेना चिढ़
कऽ बजैत हो! लोक भाव सािह³यक Dबल पJ बिन उठैत अिछ। याLीक कलम नोर आ शोिणतक धार
बहबए लगैत अिछ। नारी आ िवधवा मनोदशा मे जेना ओ तह धिर घुइस जाइत छिथ। एक-दू-सौ-सैकड़ा कR
पुछैत अिछ, हजारक हज़ार िवधवा हुनक माथ पर अपन ©यथा लेने सवार भऽ जाइत छिन। “िबलाप”
किवता मे याLी स³यक अbवेषण करैत किवता िलखैत छिथ। यथाथ< चार चिढ़ बाजय लगैत अिछ। कR निह
कनैत अिछ! पाठक, समाज आ किव सब बहाबैत अिछ नोरक धार:
“िवधवा हमरे सन हज़ारक हज़ार
बहौने जा रहिल अिछ नोरक धार
ओिह मे ई मुलुक डूिब ब° जाय
ओिहमे लोक-वेद भिसया ब° जाय
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अगड़ाही लगौब° बß खसौ
एहेन जाित पर ब° धसना धसौ
भूक6प हौक ब° फटो धरती
म िमिथले रिहये क’ की करती!”
याLी निह °कैत छिथ दोसर-तेसर-चािरम िववाह करयबला बूढ़बा बर सब पर कलम उठा लैत छिथ। अ§गब
सामािजक कुरीित पर Dहार करैत रहैत छिथ। नारी शोषण कR पाठक हेतु पढबाक साम ी बनबैत छिथ।
हुनक दोसर किवता “बूढा वर” सेहो एकर Dमाण अिछ। मुदा िkLगन अपन बात ताबेत धिर लोक पटल
माL पर करैत रहलिन।
जिमbदारक शोषण सँ तंग भेल बुचनीक Dितिनिध बिन अपन अमर रचना “घसल अठी” मे मधुप बुचनीक
मुँह सँ कहा लैत छिथ जे शोषण आ अbयाय कR चलते जगत मे भऽ रहल अिछ अकाल। इ लोकक
अिभ©यि²त निह तऽ की भेल? घसल अठी केर बुचनी डरल ज°र रहैत छैक लेिकन अपन बात आ eाप
दुनू ©य²त करैत अिछ:
आहा! देह तोिड़ क’ कएल काज
सुपथो न बोिन अिछ भेटी रहल
त जगमे ई पड़लै अकाल
उठिबतिहं डेग लागए अbहार
मिर जाएब एतइ
ककरा कहबै?
िहत ²यो ने हमर
अनुिचतॲ पैघ जनके शोभा
भगवान आह!”
मधुप नारी शोषण कR देखैत छिथ, अनुभव करैत छिथ, अपन ±दय मे ओिह पिरिkथित कR आ³मसात करैत
छिथ, आ कलम हुनका िkLगणक kपोकपस<न बना दैत छिन। किवता बिन पड़ैत अिछ।
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मैिथली लोक पर6परा मे फकड़ा अनंत अिछ – िवपुल िनिध जक। कतबो तािक लेब तैओ बहुत रिहये
जाएत। लेिकन लोक ©यवहार मे ताकब तऽ कोनो िनरथ<क निह लागत। इ भेल फकड़ाक Dयोजन आ
उपयोिगता। जखन मिहला कोनो वेदना सँ vिवत होइत छिथ आ हुनक बात िकयोक निह बुझैत छिन तऽ
अनायास बािज उठैत छिथ:
“गुड़क मािर धोकड़े बुझैत अिछ”
इ फकड़ा कतेक साथ<क छैक तकर अनुभूित या तऽ मिहला कऽ सकैत छिथ अbयथा ओ जे नजदीक सँ
ओिह वेदनाक D³यJदश रहल अिछ।
िकछु एिह तरहक भाव िनÙिलिखत फकड़ा मे कहल गेल छैक:
“समाठक माइर उखैरे बुझैत छै”
kमरण इहो राखब ज°री जे सब भाव अधलाहे निह होइत छैक। मनोदशा Dेमक सेहो होइत छैक। लोक
जखन अिधक उिधयाइत अिछ तऽ कहल जाइत छैक:
“िटटही टेकल पहाड़”
अथ< भेल अपन औकात सँ अिधक ने बाजी ने करी।
कतेकबेर पित प¿ी अथवा िकयोक आर अपन kवयम कR जीवन आ Dेम अथवा ©यवkथा मे अतेक लीन भऽ
जाइत छिथ जे हुनका दोसरक जीवन अथवा सामािजक मयदा केर भान ख³म भऽ जाइत छिन। एहन लोक
लेल िनÙ फकड़ा कतेक सटीक होइत छैक:
“हम सुनरी की िपया सुनरी
गामक लोक बनरा बनरी”
उदाहरण अनेक अिछ – बहुत अ«ात आ कतेको «ात। सबहक समावेश केनाइ पहाड़ सन लगैत अिछ।
एिह पर गंभीर काज करक दरकार छैक। इ िवषय अनंत महासागर जक अिछ। अिह पर सािह³यक
अितिर²त समाजशाkL, मनोिव«ान, नारीवाद िव«ानं, मानवािधकार, मानवशाkL, राजनीितशाkL, इितहास
आिदक शोधकम के िविभ उदेÄय आ पिरकnपना संग काज करक चाही। इ एक अलग संसारक रचना
कऽ सकैत अिछ। हमर आलेख कR अनंत महासागर मे खसल िकछु बुंद माL मानल जा सकैत अिछ जकर
समय पड़ला पर अपन उपयोग भऽ सकैत अिछ।
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सbदभ<:
िमe, कैलाश कुमार (2017). “मैिथली लोकगीतमे नारी-दुद<शाक िचLण”, घर-बाहर , वष< 17, अंक 61,
जुलाइ-िसत6बर: 11-17.
िमe, कैलाश कुमार (2018). “िमिथलाम अथत लोक सँkकृित: एक पिरचय” तीरभुि²त , वष< 1, अंक 1,
जुलाइ-िसत6बर: 29-35।
िमe, पंचानन (2017). “मैिथली लोकोि²तमे kLी-जीवन”, घर-बाहर , वष< 17, अंक 61, जुलाइ-िसत6बर:
18-20.
वम, रामचbv (2009).
लोकभारती बृहत् Dामािणक िहbदी कोश . िदnली: लोकभारती Dकाशन.
याLी, बै\नाथ िमe (--). “िबलाप”, किवता कोश : kavitakosh.org
याLी, बै\नाथ िमe (--). “बूढ़ा वर”, किवता कोश : kavitakosh.org
मधुप, काशीक|त िमe (---) “घसल अठी”: गजेbv ठाकुरक सँ किवता भेटल
[1] डॉ कैलाश कुमार िमe मानवशाkL, समाजशाkL, मानवािधकार, फोकलोर(लोकिव\ा) आ कला इितहास कR
िविभ पJ पर kवतंL लेखन करैत छिथ; अं ेजी, मैिथली आ िहंदी तीनू भाषा मे िलखैत छिथ। भारत
सरकार कR kवाkÌय आ पिरवार कnयाण मbLालय[Department of Population Genetics and
Human Development (PGHD), National Institute of Health and Family
Welfare]; संkकृित मbLालय [Indira Gandhi National Centre for the Arts], अंतर´¥ीय
संगठन[South-South Solidarity; Society for Health Education and Learning Package
(HELP); UNESCO; UNDP; READ Global ] आिद मे 27 वष< सँ िबिभ शोधपरक आ तÌयपरक
काज करबाक अनुभव छिन। यूिनविस<टी ऑफ़ नेÇाkका (The University of Nebraska), जयपी
यूिनविस<टी ऑफ़ टेâोलॉजी (Jaypee University of Information Technology), एिमट ी
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यूिनविस<टी (Amity University),िkवनबन< यूिनविस<टी ऑफ़ टेâोलॉजी(Swinburne University of
Technology), गु° गोिबंद िसंह इbvDkथ यूिनविस<टी (Guru Gobind Singh Indraprastha
University) केर बहुत रास अकादिमक आशोध काज मे संल§न छलाह। िहनक लगाव भारतक लोक
कला, मूत< आ अमूत< कला, ा6य आ आिदवासी जीवन, सामािजक पािरिkथितकी आ जीवन तंL, जडर
िडkकोस<, मानवािधकार, सामािजक िवकास, संkकृित के अनेक पJ, इितहास आ सािह³य सँ छिन।स6Dित
Çैनकोठी आ आर.आइ.आर.के.सी.एल.आर.सी. केर चेयरमैन छिथ आ िकछु संkथा सभक kवतंL कंसnटसी
करैत छिथ. डॉ िमe मैिथली-भोजपुरी अकादमी िदnली कR सदkय सेहो छिथ। िहनक स6पक<: Dr. Kailash
Kumar Mishra, Chairman- Brainkothi; B-2/333, Tara N agar, Old Palam Road,
Kakrola, Sector 15, Dwarka, New Delhi 110078. Mob: +918076208498,
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