‘मौलाइल गाछक फूल’क लेखक श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ हम साधुवाद दैत छियन्हि जे हिन्दी आ राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्त होइतहुँ अपन मातृभाषाक प्रति अटुट सिनेह राखि मैथिलीमे लेखन करबाक भगिरथी प्रयास कएल अछि। ओना तँ मैथिलीमे अनेकानेक साहिन्यकार लोकनि चेष्टा कएल अछि। हुनका लोकनिक भाषामे फेंट-फाँट भेटल अछि, किन्तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि। प्रान्जल भाषा गमैया भाषाक आगाँ घुटना टेक दैत अछि, जन साधारण अल्पो शिक्षितकेँ गुद-गुदीक संग विषय अन्तस्थलीकेँ छुबि लैत अछि। वैचारिक दृढ़ता एवम् हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीशजीमे विरल अस्तित्वक परिचय दैछ। उपन्यासक प्रत्येक लेखपर माने उपकथापर दृष्टि दैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्यक्षदर्शी भऽ विषयक निरूपण कएल अछि।
ओना तँ शिक्षाक सीढ़ीकेँ पार कऽ लेखक कलाक बलवती इच्छा राखि मैथिलीक वाटिकाकेँ पल्लवित-पुष्पित करक भरपूर प्रयास कएलनि अछि। गाम ठामक बिलक्षण चित्रण हिनक लेखनीक विशेषता ऐ पोथीमे देखल जाइछ। हिनका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सिनेही कही तँ सर्वथा उपयुक्त होएत। ऐमे सामाजक ओइ वर्गक समीक्षा कएल अछि जकरापर आइधरि कियो सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीक मैथिलीमे समाहित कएने छथि।
हमरा तँ लगैत अछि माए मैथिली लेखकक माथपर चढ़ि कऽ एहन चमत्कारी उपन्यास लिखक हेतु प्रेरित कएल अछि। फणिश्वर नाथ रेणु आ यात्रीजीक उपन्यासमे सामाजिक रहन-सहन वैचारिक भिन्नता अर्थाभावक कारणे स्वाभिमानक हनन जौं देखबामे अबैत अछि तँ सम्प्रति उपन्यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्यक्ष दिग्दर्शन अति मार्मिक अन्तर मोनकेँ सोचवाक लेल उत्प्रेरित करैछ।
मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे जन्म नेनिहार लेखक एतेक सुन्दर, सुवोध आ सुगम्य ढंगसँ विषएकेँ निरूपित कऽ पाठकक जिज्ञासाकेँ अन्त धरि बढ़बैत गेल छथि जे चिक्कन, चोटगर आ चयन लेल वाध्य करैत अछि। मैथिली साहित्याकाशक ई ज्योर्तिमान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृद्धता अनबामे योगदान कएल अछि।
ओना तँ औपन्यासिक विचारानुसार ऐ उपन्यासमे त्रुटि अछि। एकरा उपन्यास कहल जाए वा सामजिक निबंध तइ परिप्रेक्ष्यमे विद्वान पाठके निर्णए कऽ सकैत छथि। मुदा हमरा तँ लेखकक ऐ उपन्यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चित्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि जेना- एक ओर अनुप वोनिहारक बेटा बौएलाल भूख-पियाससँ आकुल अछि इनारक पानि भरबामे डोरी डोलक प्रयोजन छैक तँ दोसर दिसि रमाकान्त आ हीरालालकेँ आधुनिक कालमे शराब चुस्कीक चर्चा होइत अछि तँए उपन्यासक विषए-वस्तु समए बद्ध नै रहलासँ औपन्यासिक दोष लक्षित होइत अछि। स्वीकार करए पड़ैत अछि जे हिनक ई उपन्यास विषय-वस्तुकेँ तइ रूपेँ समेटने अछि जेना सितुआमे समुद्र समाएल हो।
लेखक जगदीश प्रसाद मण्डलजीक प्रयास आ आयास दुनू साराहनीय छन्हि। हम माँ मैथिलीसँ प्रार्थना करैत छी जे हिनकामे स्फूर्ना बनल रहनि जाहिसँ मैथिली साहित्यक सम्वर्द्धन होइत रहए।
मूल विदेह अंक / Original issue
Videha Digital Research Archives — preserved releases
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