डॉ. बचेश्वर झा
विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि
जाहि समयमे विद्यापतिक आर्विभाव मिथिलामे भेल छल ओ संक्रमणक काल छल। सामाजिक विश्रृंखलताक कारणेँ किछु लोक काज-धन्धा करबासँ मुँह मोड़ने छल। जे केओ काजुल, परिश्रमी छलो ओहो ननुचमे परि कर्त्तव्यहीन जीवन बितेनिहार भऽ गेल छल। मिथिलामे खेती आ पशुपालनक सिवाय दोसर जीविकाक साधनो तँ नहि छलैक। सीमित साधनो अछैत खेती करनाइ असौकर्ज बुझि दिनानुदिन आर्थिक दुर्वलताक शिकार होइत रहल। इएह कारण भेलै जे एतुका लोकक आर्थिक अवस्था लचड़ि गेलैक। एतबे नहि, किछु लोक कृषिक उपेक्षा कऽ भीख मांगब श्रेयस्कर बुझए लागल। एहन लोककेँ समाज घृणाक दृष्टिसँ देखैत छल। तेँ एहि प्रवृतिक लोकक ध्यान खेतीक ओर आकृष्ट करबाक निमित कहबी चरितार्थ भेल-
“उत्तम खेती मध्यम वाण,
निषिद्ध चाकरी भीख निदान।”
तात्पर्य ई जे खेती करब सभसँ उत्तम मानल गेल। व्यवसाय करब मध्यम। नौकरी करब अधम मानल गेल। सभसँ अधलाह- भीख मांगब बुझल गेल। जहाँ तक नौकरीक गप्प छैक, आजुक समयमे नौकरियेकेँ प्राथमिकता भेटल छैक। ओ भलेँ सम्पन्न परिवारक किएक ने होथि, नौकरी हेतु अपस्यॉंत देखल जाइछ। एहनो समय छलैक जखन नौकरी कएनिहारकेँ समाजमे कुचर्चा होइत रहैक। एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे आत्म निर्भरताक शिक्षा देल जाइत छल।
महा कवि विद्यापति अपन रचना ‘लिखनावली’ आ ‘वर्षकृत्य’मे मिथिलाक कृषिक बहुविधिवर्णा कहल अछि। संगहि कृषिकेँ उपेक्षाक दृष्टिसँ देखनिहारकेँ एहि ओर आकर्षित करबा लेल अपना रचनामे शिव आ गौरीक माध्यमसँ उपदेश देल अछि। विद्यापतिक मात्र उद्देश्य अकर्मण्यताक अन्मूलन करब छल।
“बेरि-बेरि अरे शिव मो तोय बोलो,
कृषि करिअ मनलाई,
भिखि मांगिए पर गुण गौरव दूरिजाय,
निर्धन जन बोलि सबे उपहासे,
नहि आदर। अनुकम्पा।
तोहें शिव पाओल आक-धतूर,
हरि पाओल फूल चम्पा।।”
भूमिक अधिकता आ जन संख्याक न्यूनताक कारण खेती अदलि-बदलि कऽ होइत छलैक। जाहि खेतमे एहि वर्ष धान गृहस्थ करैत छल, ओकरा परती छोड़ैत छल। ई करलासँ साल भरिमे खेतक ऊपज शक्ति बढ़ि जाइत छलैक। भूमि तीन श्रेणीक मानल गेल छल।
विद्यापतिक समयमे पहिल श्रेणीमे गोचर, दोसर श्रेणीमे ऊपजाउ आ तेसर श्रेणीक वंजर।
गोचर भूमिमे अनेक प्रकारक घास लगाओल जाइत छल जे पशुपालनक हेतु प्रमुख छल। ई गोचर भूमि साधारण गाममे एक सय दंड, पैघ गाममे दुई सय दंड एवम् नगरमे चारि सय दंड छोड़ल जाइत छल। वंजर भूमिकेँ तोड़ि कऽ खेतीक योग्य बनाओल जाइत छल। एहन भूमिकेँ विद्यापति खील भूमि कहलखिन्ह। एहन प्रकारक भूमिमे खेती कएनिहार भू-स्वामीकेँ सात वर्ष धरि ऊपजक आठम भाग दैत छल। तत्पश्चात् भू-स्वामीक अनुसार उपजक स्वामीत्वमे परिवर्त्तन भऽ जाइत छलैक। एखनहुँ परती जमीनमे खेती कएनिहारकेँ सुविधा देल जाइत छैक। एहि सुविधाक समय निर्धारित नहि छैक। जगह-जगहपर अन्तर देखल जाइत अछि।
ओहि समयक समाज दू वर्गमे बँटल छल। एक वर्ग राजा महाराजाक सामन्तादिक छल। एहन वर्गक लोकक खेती-पथारी दूर-दूर धरि होइत छलनि। ओतए ओ लोकनिक खेती करबाक मिश्रित्त कर्मान्तिक अर्थात् कमतियाकेँ रखैत छलाह। एकर अतिरिक्त आरो अधिकारी वर्ग ओकर काजक निरीक्षण करबाक लेल राखल जाइत छल।
समाजक दोसर वर्ग दलित वर्ग छल जे स्वयं अपन खेती करैत छल। एहन वर्गकेँ खेतीमे अपन पत्नीसँ सेहो सहयोग भेटैत छलनि। खास कऽपशुक हेतु सभ प्रकारक व्यवस्था स्त्रीगणे द्वारा होइत छल। महादेवकेँ मैथिल होएबाक प्रमाण कहक ईहो भऽ सकैछ। हुनक सासु मैना स्पष्ट रूपसँ कहैत छथिन्ह-
“हमर धिया जखन सासुर जयतीह तखन ओ घास काटि लौती आ बसहा चरौती।”
खेती-पाती हर एवम् कोदारिसँ ओहू समयमे कएल जाइत छल। हरक व्यवहार विद्यापति साहित्यक संगहि तत्कालीन साहित्यमे सेहो कतेको स्थलपर कएने छथि। विद्यापति अपन वर्ष कृत्यमे हरक मुहुर्त्तक उल्लेख कएने छथि। ओहि दिन बरदक सिंहमे मक्खन गूड़ आदि रगड़ल जाइत छल। प्राय: ओहि दिन धनी-मनी व्यक्ति हरक-फारक आगूमे सोना लगबैत छल। विद्यापति कहैत छथि सोन लगायब एक विधान छल।
एक तरहक कहबी छैक वा लोक धारणा जे पंचमीक मुहुर्त्तमे हर जोतबा काल जौं बरद चित्कार करए वा मेमिया तँ चारि गुणा उपज होएबाक संकेत भेटैछ। ओहि दिन पाँच सिरोर जोतबाक विधान छलैक।
विद्यापतिक लिखनावलीक एक पत्रमे हरक हेतु धुरन्धर बरदक चर्चा आयल अछि। खगौट भेलापर गृहस्थ एहन धुरन्धर बरदकेँ बन्हकी रखैत छल। एहिसँ ओहि समयक समाजक लचरल अवस्थाक परिचय भेटैत अछि। सम्पन्न गृहस्थ हरबाह खेत जोतबाक निमित रखैत छल। हरवाहीक अलाबा अन्यो काज हरबाहसँ करबैत छलाह।
विद्यापतिक एक पद्यमे उल्लेख आएल अछि जे गौरी शिवसँ खेती करबाक लेल कहैत छथिन्ह, तखनुक ई पाँती अछि-
“खटंग काटि हर हर जे बनाविअ,
त्रीशूल तोड़ि करू फार।
बसहा धुरन्धर हर लए जोतीय,
खेत खोला पहाड़।”
धनी-मनी व्यक्तिक ओहिठाम कमतियाक ऊपर महत्म होइत छल जकरा निरीक्षक समान पद होइत छलैक। कामत परक खेती-पथारीक सभ प्रकारक खबरि कमतियासँ लैत रहैत छल। कोन खेतमे कोन तरहक अन्न उपजाओल जाय संगहि खेत कोना जोतल जाय, कोन खेतमे आरि ऊँच्च कए बान्हल जाय संगहि कोन खेतमे कतेक लागत लगाओल जाय इत्यादि इत्यादि तकर जिज्ञासा महतम कमतियासँ करैत छल।
विद्यापतिसँ पूर्व मैथिली डाक आ घाघ भेल छलाह जनिका मिथिलाक कृषि कार्यक उद्गेता कहल जाइछ। मै. डाककेँ प्रकृतिक गहन अध्यययन छलन्हि। एखनहुँ डाक वचनावलीक अनुसार मिथिलाक गृहस्थ कृषि कार्यक समीक्षा कऽ सचेत भऽ जाइत छथि। डाकक कहब छल- गृहस्थ छोट-क्षीण बरद नहियोँराखथि मात्र दुई गोट धुरन्धर बरद कीनि खेती करथि। अपन खेती भेलापर अनको खेतीक हेतु मंगनी देथि। हुनक शब्दमे-
“नाटा बरद बेचि कए, दुई धुरन्धर कीन,
अपन खेती करि कए आनकेँ मंगनी दीन।”
एतबे नहि, ओ कहने छथि खेतक उपजा जोतपर निर्भर करैत अछि।
थोड़ के जोतिए अधिक महिमविह अविए,
ऊँच के बान्हिए आरि।
जौं खेत तैयो नहि उपजए तँ
डाक के परिह गारि।
एहि लेल विद्यापतिकालीन महत्तम कमतियाकेँ सलाह दैत छलाह जे हरसँ तैयार कएला बाद खेतकेँ कोदारिसँ साधब उत्तम होइछ।
मिथिलाक कृषिमे पर्याप्त वर्षाक अभाव प्राग ऐतिहासिक कालहिसँ रहल अछि। मानसून एतुका हेतु जुआवाजी कहल गेल अछि। किएक तँ अति वृष्टि अनावृष्टि आ दुर्भिक्षक शिकार एतुका गृहस्थ होइत रहलाह अछि। तेँ पटौनीक प्रभाव समय-समय पर होइत छलैक।
विद्यापति साहित्यमे सेहो पटौनीक उल्लेख भेटैत अछि। पटेबाक एक यंत्र विशेषक चर्चा कएने छथि। यथा- रहट संस्कृत अरधदृ आ प्राकृतिक अरहट्ठ। एहि यंत्रसँ अहुखन इनारवा कूपसँ पानि बहार कएल जाइछ। एकर अतिरिक्त चर, चॉंचर, डबरा, खत्ता आ पोखरिसँ करीन द्वारा पटौनीक काज लेल जाइत छल। तत्कालीन राजा द्वारा बड़का-बड़का पोखरि खुनाओल गेल छल।। मिथिलामे एहन अनेको पोखरि विद्यमान अछि, जकर सकल आब बदलि गेल छैक। एहि तरहक पोखरि रजोखोरि कहबैत छल। किवदन्ति छल जे दैत्य द्वारा एहन विशाल पोखरि खुनल गेल छल।
विद्यापति तँ मात्र नदीक उल्लेख कएने छथि- गौरी जखन शिवसँ खेती करबाक आग्रह कएलनि तँ शिव कहलथिन्ह-
“सभ बात मानल मुदा पानिक अभाव भेलापर की होयत?तखन खेती तँ करब असौकर्ज होएत।”
एहिपर गौरी उत्तर देलनि-
“पाटय सुसरि धारा।”
एहिसँ ज्ञात होइत अछि जे तत्तयुगीन मिथिलामे पटौनीक काज गंगानदीसँ कएल जाइत छल।
ओहि समयक कृषकमे प्रगाढ़ प्रेम होइत छलनि। एक-दोसरक हित चिन्तनक संग अति आदरक भाव रखैत छलाह। खेतसँ उपज निर्विघ्न घर आबए तेँ बाधक हेतु रखवार राखल जाइत छल। अहुखन मिथिलाक गाममे रखवार रखबाक प्रथा अछि। रखवारकेँ विशेष अधिकार गृहस्थक द्वारा देल गेल छल। कहुखन ई रखवार खेतक पूर्ण उपजकेँ हथिया लैत छल जे विद्यापतिक पदसँ ज्ञात होइछ-
“खेत कएल रखवारे, लूटल ठाकुर सेवा भोर।”
यदा-कदा एहनो होइत छलैक जखन खेतीक समय बीति जाइत छल तखन वर्षा होइत छल। जेकर विद्यापतिक पदसँ पुष्टि होइछ-
“समय गेले मेघे वरिसब,
की दहु तेँ जलधार।”
एहना स्थितिमे वर्षाक पानिकेँ रोकबाक हेतु खेतमे ऊँच्च आरि बान्हल जाइत छल ताकि खेतसँ पानि ससरि नहि जाय। विद्यापतिक पद्यसँ संकेत भेटैछ-
“गेला नीड़निरोधक की फल।”
पुन: विद्यापति अपन रचनामे प्रेम रूपी फूलक हेतु शीलक आरि बान्हि मर्यादाक रक्षा कएने छथि-
“फूल एक फूलवारि लगाओल मुरारि,
जतने पटओलन्हि सुवयन वारि।
चौदिस वॉधलि सीलक आरि,
जीव अवलम्वन करू अवधारि।”
एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे लोक भूमिकेँ छोट-छोट टुकड़ीमे बाँटि खेती योग्य बनबैत छल। विद्यापतिक समयक कृषकक समस्त उपजाक अन्नक उल्लेख कतहु एकठाम नहि भेटैत अछि। तखन एतए मसूरी, राहड़ि, सरिसो, तिल जौ आदिक अवश्य उत्पादन होइत छलैक। जतेक प्रकारक अन्नक उल्लेख भेल अछि ओ सभ अन्न विभिन्न अवसरपर मिथिलामे विभिन्न देवी देवताक प्रसन्नताक हेतु दान कएल जाइत छल। एकर सांगोपांग वर्णन विद्यापतिक ‘वर्षकृत्य’मे भेटैत अछि।
अनुकूल समयसँ यथेष्ट उपज होइत छलैक। गृहस्थी नीक हालतमे भेलासँ मिथिलाक लोक बाहर नहि जा कऽ घरहि रहैत छल। कहबी छलै-
“कर खेती घरही भला।”
इएह कारण छल जे एतुका जनमानस वाह्य परिवेशक अनुभवसँ वंचित रहल। विद्यापतिक पूर्व जहिना गृहस्थीसँ उदास लोक छल तहिना कविक रचनाक प्रभावसँ गृहस्थीक ओर झुकाव भेल छल। खेतीसँ उत्पन्न अन्नक उपयोग मोला व्यवस्था द्वारा चलैत छल। मोलाक अन्तर्गत क्रय-विक्रयक विधान छल। एकरो उल्लेख विद्यपतिक लिखनावलीमे आयल अछि। तौल-नापक व्यवस्थामे टंक और मानी पांथी चलैत छल। 4 मानी एक टंक होइत छलैक। ओहि समयक 1 मानी आजुक 16 सेरक बरा-बर होइत छलैक।
खेतसँ पर्याप्त धानक प्राप्तिक प्रमाण छलैक जे पैघ गृहस्थ डेढ़िया वा सवाईपर कर्जा लगबैत छलाह। कर्जाक अदायगी अगहन मासमे नवका धान भेलापर होइत छलैक। विद्यापतिक लिखनावलीमे कृषि सम्बन्धी चर्चा विलक्षण ढंगसँ कएल गेल अछि।
अस्तु...!q
लेखन तिथि : 4 अगस्त 1993
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आकाशवाणी दरभंगासँ प्रसारित : 7 अगस्त 1993
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