उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलजीक ‘भकमोड़’मे परिवर्तनक स्वर
:: उमेश मण्डल
भकमोड़ (2013) :2013 इस्वीक समय छल, जहिया औरहा (मधुबनी) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 79म कथा गोष्ठी आयोजित भेल रहय। तथा ओहीठाम 80म आयोजनक निर्णय निर्मली (सुपौल) लेल सर्वसम्मतिसँ भेल छल। तीन मासपर सगर रातिक एहि गोष्ठीक आयोजन होइत रहल अछि। ताहि बीचक समयमे मण्डलजी एहि पोथीकेँ लिखलन्हि। औरहा आ निर्मलीक बीचमे भुतहा चौक अछि जाहिठाम रस्ता भकमोड़ छैक, तहिक आधारपर कथाकार एहि पोथीक नामकरण कएलनि, जे प्रस्तुत पोथीक आमुखमे कथाकार लिखने छथि- “औरहा निर्मलीक बीच एकटा भुतहा चौक अछि। रस्ता भकमोड़ छै, तेँ संग्रहक नाओं ‘भकमोड़’ छी।” निर्मलीक प्रसिद्ध चित्रकार स्व. मिलन सदाय केर स्मृतिमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क 80म कथा गोष्ठीमे एहि पोथीक लोकार्पण कराओल गेल छल। संगहि उक्त गोष्ठीक निमिते कथाकार अपन एहि पोथीकेँ समरपित सेहो कयने छथि।
द्रष्टव्य अछि हुनक लिखल पाँति- “ई संग्रह निर्मली गोष्ठी (कथा मिलन सदाय-सगर राति दीप जरय)केँ सेवामे समरपित...।”
प्रस्तुत पोथीमे आठ गोट कथा संग्रहित अछि, यथा-
1. एक धाप जमीन- शब्द संख्या :2505
2. ओझरी- शब्द संख्या :1970
3. मुसहैन- शब्द संख्या :2742
4. केलवाड़ी- शब्द संख्या :2685
5. स्वरोजगार- शब्द संख्या :2388
6. घूर- शब्द संख्या :2812
7. कनियाँ-पुतरा- शब्द संख्या :2335
8. वारंट- शब्द संख्या :1638
9. गामक मुँह फेर देखब- शब्द संख्या :3073
एकधाप जमीन’,कथामे कथाकार मनुक्खक विचारक संग व्यवहार-परिवर्तन कोना होइत छैक तकर विस्तारित रूपक वर्णन कएलनि अछि। ज्ञान प्राप्त कएला पछाति मनुक्खक जीवनमे जहिना वैराग्य अबैत छैक तहिना नीच काजक अभ्याससँ नीचसँ नीचतम कार्य दिसि ओकर जीवन बढ़ैत चलि जाइत छैक। जकर उदाहरण कथाकार एहि कथामे प्रस्तुत कएलनि अछि। दू भाँइक भैयारीमे जाहिठाम प्रेमसँ प्रेमास्पदक रूप एबाक चाही छल ताहिठाम मात्र एकधाप जमीनक हेतु, जाहिमे केराक एकटा बीटमे एक घौड़ केरा छैक, ओहि लेल दुनू भाँइमे जानलेबा मारि-पीट भऽ जाइत अछि।
दुनू भाँइ- दिनेश-महेशक परिचय कथाकारक शब्दमे, “महेश-दिनेशसहोदरभाए।ओनाअर्थरोगसँपीड़ितपरिवार, तँएगामकस्कूलछोड़िबाहरकस्कूल-कौलेजकनियमितविद्यार्थीनैरहलामुदाएम.ए; पी.एच.डी.कसर्टिफिकेटनइछैनसेहोनहियेँकहलजासकैए।समयतेहेनभऽगेलअछिजेपाइकखेलकोनोस्कूलकेँचमकारहलअछि, तँकोनोकेँधमकारहलअछि।ओना, बम्बैयाकलाकारजकाँदुनूभाँइचौबीसोघन्टामेकअपेमेरहैछैथ।एकरंगाचेहरादिन-रातिरहितेछैन।वएहआलरंगकअंगा, खौंरकी, कट्ठाडेढ़ेकसिनूरकढिमकाआबिनुकमाइलदेलहाकेश-दाढ़ीतँबनौनहिछैथ।दुनूभाँइतारा-ऊपरीछैथ, रहबोकेनानेकरता, दुनियाँकीकनियेँ-टाअछिजेदसकट्ठाअहाँजोतिएलेबतँदुनियेँजोताजेतइ।समाजकस्त्रीगणककौलेजकप्रोफेसरीनेमहेशकरैछैथ,मुदाअदहासँबेसीपुरुखककौलेजतँखालीएअछि।पारखीदिनेश, समाजेमेनोकरीताकिलेलैन।”
समाजक दृष्टि, आलोचनाक संग सरोकार- “भरिदिनपोथी-पतराकन्हेमेलटकलरहैछैनआअपनोदिन-बेरागननइबुझैछैथ।एकसाएबेरदरबज्जापरजाएब, तखनधोपचटमेगोटेबेरभेटजेता, एहेनउड़नबाजदुनूभाँइछैथ, तखनकहूजेकेनाकेराघौरकपारफोड़ादेलकैन।मुदाजेहौउ, समाजोकतँदायित्वअछि।तइसँएकबेरजाकऽहाल-चालपुछिलेबजरूरीएअछि।”
कथामे प्रश्न- (1) “अहींकहूजेईउचितभेलजेएकघौरकेरा-लेअपनोअस्पतालमेबरदाइआदोसो-महीमकेँबरदाबी।तहूमेकिकोनोहमरापहिनेकहिदेनेछलाजेएकघौरकेरा-लेदुनूभाँइमाइरकरब।”
कथामे प्रश्न- (2) “गाममेचोरअबैछेलैआकिआगिलगैछेलै, अवाजसुनितेओकराभगबै-मिझबैछेलौं।मुदाएहेननीकबेवहारमेआगिमिझौनिहारअगिलगौनआचोरभगौनिहारचोरिकरौनकसंगचोरबाकेनाबनल?”
कथामे प्रश्न- (3) “कियोपतिचरित्रसँबिगड़लछैथआपत्नीचरित्रवानछैथ, तखनदुनूकबीचकसम्बन्धकेहेनहोइ? कियोपत्नीघूसखोरीकविरोधमेरहैथआपतिदिन-रातिघूसलथितैठामपत्नी-पतिकपाइकउपयोगनैकरती?”
कथामे प्रश्न- (4) “तेहेनदुनूभाँइककिरिया-करमभऽगेलछैजेकहूदस-दसलाखकघरबनौनेअछि।तैपरदस-दसलाखबेटी-बिआहमेखर्चकरैछैथ! केतए-सँआनैछैथ? दुनूभाँइतेहेनबहुरूपियाबनिगेलछैथजेयएहसभसमाजमेभाए-भैयारीबनएदेथिन!”
‘ओझरी’,अपन देश 1947 इस्वीमे आजाद भेल आ देशक शासन प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे विकेन्द्रीकरणक माध्यमसँ चलैए। तँए, सभ स्तरपर अधिकारो आ कर्तव्योक विभाजन भेल अछि। मुदा जाहिठाम प्रजातांत्रिक व्यवस्थाक संग विकेन्द्रीकरणक विकास एकतंत्रीय रूपमे होइए ओहिठामक प्रजातांत्रिक सत्ताकेँ कोना गरदनि दाबल जाइत छैक, जाहिसँ सार्वजनिक संस्थासभक रूप विकृत भऽ जाइछ, तकर परिचय प्रस्तुत कथामे कथाकार नीक जकाँ करौलन्हि अछि। जे परिवर्तित स्वरूपकेँ देखार करैत अछि।
‘ओझरी’ कथासँ प्रस्तुत कथोपकथन- (1) “ओहुनादेखतेछहकजेदूटा-तीनटाचारिटानाओंलोकरखितेअछि, कियोअधकट्टीतँकियोगोलगोला, मुदाहमरासेनैभेल।गमैयानामकअधारपरभोँटरलिस्टबनल, भोँटरलिस्टकअधारपरपरिचयपत्रआराशनकार्डबनल।ओहीअधारपरबैंकमेखाताखुजल।मुदास्कूलकनाओंकागजे-कागजेवौआइतरहल।ओहीअधारपरचेकबनल।मैनेजरसाहैबसँपुछलयैनतँकहलैनजेएफिडेफीटलगाकऽनाओंचढ़िजाएत।संतोषभेल।चलिएलौं।दोसरदिनबैंकककाजछोड़िकऽकोर्टककाजदिसबढ़लौं।रबिरहनेएकदिनओहिनाचलिगेल।
..दोसरदिनएफीडेफिटबनेलौं।तेसरदिनबैंकपरगेलौंतँपतालागलजेमैनेजरसाहैबसस्पेंडभऽगेला।सातेदिननोकरीशेषछेलैनतहीबीचसस्पेंडभऽगेला।आश्चर्यभेलजेसेवानिवृत्तिहोइसँएकपनरहियाअपनेकागत-पत्तरसरियबैमेलगिजाइछइ।तखनघरमुहाँसँबहरमुहाँकेनाभऽगेला।कैसियरसँपुछलापरपतालगलजेइन्दिराअवासककमीशनमेगोल-मालभेलतँएसस्पेंडभेला।ऐगलासप्ताहधरिदोसरआबिजेता।ओतँपुन: घुमिकऽनहियेँऔताकिएकतँकेतबोजल्दीफरिछाएततँनिच्चाँ-ऊपरकरैतसप्ताहबीतिएजेतैन।सुनिचलिएलौं।”
(2) “दोसरसप्ताहगेलौं, तानवकामैनेजरआबिगेलरहैथ।असगरेबैसलरहैथ,जाकऽसभबातकहिकागतदेलिऐन।कागतदेखरखिलेलैन।परिचए-पातकगप-सप्पउठल।नीकसंस्कारीपरिवारकछैथ।कहलैन,ईतँमैनेजरकअधिकारककाजछीजेउर्फकरिकऽनाओंचढ़ालैतैथ।अनेरेएतेकरैककोनकाजछेलइ! चेकदेखकहलैनजेएकरसमैयेसमाप्तभऽगेल।
..सुनिचोटेघुमिकऽआबिकागतकबीचरखिदेलिऐ।”
‘मुसहैन’,कथाक आरम्भ मुसहैनिक परिचयसँ भेल अछि। धान वा गहुम वा कोनहुँ फसिलकेँ काटि जे मूस अपना बिलमे जमा करैत अछि ओकरा मुसहैन कहल जाइछ।
प्रस्तुत कथामे कथाकार मुसहैनिक परिचय करबैत एकटा अदना आदमी कोना अपनाकेँ स्वतंत्र बना स्वाधीन जीवन बीता सकैत अछि, यएह एहि कथाक परिवर्तित स्वरूप थिक जे बेलबाक माध्यमसँ कथाकार वैचारिक परिवर्तन आवश्यकता आ तकर क्रियागत महत्वकेँ ‘मुसहैन’मे समावेश कएलनि अछि। ‘मुसहैन’कथासँ प्रस्तुत कथोपकथन-
(1) “सगुनकेँदोखीकहाँकहैछिऐ, जँगुणसगुनभऽजाएतखनतँजरुरनीकभेल, मुदाजँकोनोकाजेकेतौविदाहोइआमाछ-दहीसँसगुनबनाबीएकराहमनीकनैकहबै?”
(2) “दुनियाँबड़ीटाछै, रंग-बिरंगकखेलचलैछैतँएअनकाछोड़ह, अपनेबातलएह।परसूजेछ-छपसेरीमुसहैनभेलहतेकराकीकहबहक?”
(4) “तूँसभभलेँजेकहकमुदाहमरमननैमानैए।तीनसालकबाढ़िमेधानतँउपैजगेलमुदामुसहैनकिएनिपत्ताभऽगेल।जेचीजेनिपत्ताअछिओसगुनकेनाभऽपौत?”
(5) “यएहनेकहलयहजेदुनियाँमेकेनाउनटा-पुनटाहोइछै, जेमहिलाशरीरसँपुरुखकअपेछानिरबलहोइएओकराकारखानाकइंजनआपुलिसकलाठीहाथमेथम्हादइछैआजेपुरुखसबलहोइएओकराहाथमेकागत-कलमथम्हादइछइ।एहनेरीतकेँनेवसन्तरीतकहैछइ!”
(5) “अनेरेसमुद्रउपछैककोनचिड़ौड़ीमेलागलछह, ठनकाजेकरामाथपरखसैछैसेबुझैछैठनकाकगुण।चलह, अनेरेमनमेखुट-खुटीरखनेछह।कौल्हुकाकाजकाल्हिदेखलजेतइ।चेनसँखाएब, भगवानकनाओंलऽनिचेनसँसुतनाइछोड़िअनेरेकौल्हुकाचिन्तामेकिएमाथधूनब?”
(6) “ठकुरवारीठाकुरसबहकछिऐआकिहमरछीजेओकरदेखौंसकरब।हमरतँयएहसंगतियासभनेछीजेकरासंगेजीबै-मरैछी।”
‘केलबाड़ी’,एहि कथाक माध्यमसँ केरा-खेतीक विषयक अपन अनुभवात्मक ज्ञानक साझा कथाकार कएलनि अछि। मिथिलांचलमे परम्परासँ जे केराक खेती होइत आबि रहल अछि, जे एहिठामक तीनू मौसम (जाड़, गरमी, बरसात)क अनुकूल रहल अछि।मुदा ओहि किस्मक जगह नव किस्मक केरा आएल, अर्थात् बौना किस्म, जकरा सिंगापुरी सेहो कहैत छिऐक, जाहिसँ मिथिलांचलमे जे पूर्वसँ अबैत केरा छल ओ उपैट गेल। मुदा ओ बौना किस्म, जे आन-आन देशक छल, अपन मिथिलांचलक माटि-पानिक अनुकूल नहि भेने विकास नहि कय सकल। जाहिसँ पुन: परम्परासँ अबैत जे अपन केरा छल, ओ अपन स्थान बना लेलक। उक्त विषयक विश्लेषणसँ प्रस्तुत कथामे अनुकूल परिवर्तन स्वर प्रस्फुटित भेल अछि।
‘केलबाड़ी कथासँ प्रस्तुत कथोपकथन- (1) “जहिनादेखबहकजेजामुनकमासमेलोकजामुनकबीआरोपैए, आमकमासमेआमरौपैए, अनारसकमासमेअनारसरौपैएतहिनाअपनाऐठामसरसठिकरौदीकपछाइतजेउथल-पुथलभेलताहिमेकेरोकखेतीआएल।बाहरीकिस्मककेरा, एक-मौसमी।जहपटारलोकअपनपुरनाकरजानसभउपटा-उपटालगालेलक।जेकेराअपनाऐठामबहुतपहिनेसँहोइतचलिआबिरहलछल, ओउपैटगेल।रोपाएलओजेसमायानुकूलनैछल, अपनोगेलआजेहोआएलसेहोगेल।जेकरफलभेल- मिथिलांचलककेदलीवनमहराइगाबएलगल!”
(2) “बौआ, केचुआछोड़ैकलूरिजेकरारहैछैवएहऐधरतीकसुखबुझैए।अपनाऐठामकेराकखेतीअदौसँहोइतआबिरहलअछि।जेहनेगुणगरतेहनेपेटभर।मुदाऐठामतँपौष्टिकवस्तुकउत्पादनहोइवानैहोइ, मुदाजन-जनकेँपोष्टिकअहारभेटरहलछइ।जइसँस्वस्थशरीरकनिर्माणभऽरहलछइ।”
‘स्वरोजगार’,कथामे रविशंकर मुख्य पात्र अछि। रविशंकर स्नातक अन्तिम वर्षक विद्यार्थी अछि जे अपन परीक्षा छोड़ि घर चलि अबैत अछि। किए चलि अबैत अछि?यएह एहि कथाक विषय थिक। कथाकार काफी सचेत भऽ कऽ एहि कथाकेँ गढ़लनि अछि। रविशंकरक अलाबेएहि कथामे ‘भागेसर’, ‘राधा’ आ ‘चेतानन्द’ सेहो पात्रक रूपमे आएल छथि।
प्रजातांत्रिक शासन पद्धतिक अनुकूल शासन व्यवस्था नहि भेने जे सार्वजनिक संस्थासभमे विकृतिपन आबि जाइएजाहिसँ ओकर कार्यप्रणाली प्रभावित हुअ लगैत छैक।भेल तहिना छल। रविशंकर जाहि युनिवर्सिटीमे पढ़ैत छल ओकरहु कार्यप्रणालीमे जे विकृतता आबि गेल, ओहि विकृतिसँ क्षुब्ध भऽ स्नातक अन्तिम वर्षक रहितो रविशंकर अपन परीक्षा छोड़ि दैत अछि आ घर एबाक हेतु चलि दैत अछि। मनमे अनेकहु प्रश्न उठि जाइत छैक। जाहिमे महत्वपूर्ण प्रश्न अछि भक्ति कालक विकास प्रक्रियासँ सम्बन्धित। अर्थात् भक्तिकालक (साहित्यक भक्तिकाल)क विकास प्रक्रियाक अनुसार रीतिकाल अर्थात् शृंगारकाल आरो नीक हेबाक चाही छल से नहि भऽ ठीक विपरीत दिशामे परिवर्तित भऽ गेल।
प्रस्तुत अछि रविशंकरक मनोविश्लेषण, कथाकारक शब्दमे- “विश्वविद्यालय स्तरक कार्यक्रम भेल, बेकती-विशेषक नै छल, तखन किए ने बुझलौं? ..ने प्रश्नक जड़ि भेटै आ ने विचार आगू बढ़इ। मुदा तैयो बाढ़िक पलाड़ी जकाँ बहबे करइ। मन बहकलै, इन्दिरा अवासक जेकरे पक्का घर रहै छै हथियाक झटकीमे खसल घरक अनुदानो तेकरे भेटै छइ। सएह ने तँ भेल। की अहिना भोजे-भातक शिक्षण संस्थान बनल रहत? धू:! अनेरे मनकेँ बौअबै छी। ठीके लोक बताह कहैए! एहने-एहने बतहपनी सोचने ने लोक बताह होइए! अनेरे हमरे किए एते सोग अछि। ‘जानए जअ आ जानए जत्ता।’ लसिगर होइ आकि खढ़हर से ओ जानए। हमहीं की बजितौं जे अनेरे माथ धुनै छी। बड़ बजितौं तँ यएह ने बजितौं जे साहित्य जगतमे मध्यकालीन युग स्वर्णिम रहल। भक्तिमय साहित्यक सृजन एते कहियो ने भेल, मुदा भक्ति साहित्यक पछाइत वैराग्य अबैत आकि श्रृंगार? एबाक चाहै छल ‘वैराग्य’ से नइ आबि ‘श्रृंगार’ आबि गेल! समैयो मुगले शासनक छल। विश्वविद्यालय सर्वोच्च शिक्षण संस्थान छी। जे मिथिलांचल ऋृषि-मुनिक बास स्थल अदौसँ रहल आकि ओतबे गनल-गूथल छैथ जेतेकेँ दोरिका छाप भेट गेलैन! विश्वविद्यालयक दायित्व बनैत अछि जे जिनकर रचना दिवारमे सड़ि गेलैन, पानिक चुबाटमे गलि गेलैन ओहनो-ओहनो रचनाकारक खोज हुअए।”
प्रस्तुत संग्रहमे क्रमश: ‘घूर’, ‘कनियाँ-पुतरा’,‘वारंट’ आ‘गामक मुँह फेर देखब’ कथासभ सेहो अछि।