विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष

उमेश मण्डल · 2019-10-01 · अंक 283

उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल साहित्यक अनेकहु विधामे रचना कएनिहार एक ओहन रचनाकार छथि जनिक लेखन अनवरत ओ अवाध गतिये चलि रहल छनि। जहिना गीत, कविता पद्य विधामे तहिना गद्यमेएकांकी, नाटक, कथा, बीहैन कथा, लघु कथा दीर्घ कथा, उपन्यास आदि नियमित रूपसँ लिखैत रहलाह अछि।‘जीबन-संघर्ष’ मण्डलजीक औपन्यासिक कृति छियनि।
जीवन संघर्ष उपन्यासमे समाजक विराटरूपक झलक उपन्यासकार प्रस्तुत कएलनि अछि। जे अविकसित समाजसँ लऽ कऽ विकसित समाज धरिक बीचक अछि। जीवनमे द्वन्द्व एलासँ संघर्षक वातावरणक निर्माण होइछ, ओही वातावरणसँ संघर्ष शुरू सेहो होइछ। जीवन-संघर्ष उपन्यासक आरम्भ समाजक अत्याचारसँ भेल होइए। बँसपुरा एकटा गाम अछि जकरा बगलमे सिसौनी गाम अछि। सिसौनी गाममे दुर्गापूजा होइए। जकरा देखए लेल पास-पड़ोसक गामक अनेको लोक जाइत अछि। ओहने देखनिहारमे बँसपुराक एकटा लड़की सेहो अछि। जकर उमेर करीब अठारह-बीस वर्ष अछि। ओहि लड़कीकेँ सिसौनीक पूजा समितिक तीन गोट सदस्य फुसला कऽ भण्डारघर लऽ जाइए आ ओकरा संग बलात्कार करैए।
भोरमे जखन ओहि लड़कीकेँ छोड़ि देल जाइए तखन ओ लड़की चुपचाप मेलासँ निकलि अपन गामक रस्ता पकड़ि विदा होइए। अपन गामक सीमामे पहुँचिते बपहारि काटि कानए लगैत अछि। जाहिसँ गामक लोक एक्के-दुइये पहुँच ओकरासँ पुछैत अछि। तखन ओ लड़की अपन बीतल रातुका सभ वृतान्त कहि सुनबैए।
उपन्यासकार समाजक विराटरूपक चर्च करैत कहैत छथि जे इलाकामे बँसपुरा गाम सभ गामसँ पछुआएल अछि। बँसपुरासँ अगुआएल गाम सिसौनी अछि। दुनूक तुलना करैत कहैत छथि जे बँसपुरामे सार्वजनिक रूपक कोनहु काज (समारोह) नहि होइए। जखन कि सिसौनीमे मिडिल तकक पढ़ाइक स्कूलो छैक आ सार्वजनिक रूपमे दुर्गोपूजा होइए आ मेला सेहो लगैए। ओना, बँसपुरामे सेहो अष्टयाम कीर्तन, भनडाराइत्यादि होइत अछि। मुदा ओ व्यक्तिगत रूपमे होइत अछि। जहिना बँसपुरासँ अगुआएल गाम सिसौनी अछि तहिना सिसौनीसँ अगुआएल बरहरबा अछि। बरहरबामे हाइ स्कूल तकक पढ़ाइ सेहो होइत अछि आ सार्वजनिक रूपमे आनहु-आन समारोह इत्यादि होइत अछि। तहिना बरहरबासँ अगुआएल कटहरबा अछि। जाहि गाममे हाइ स्कूल धरिक पढ़ाइयो होइए आ अस्पताल सेहो अछि तथा सार्वजनिक समारोह सेहो कतेको तरहक होइत अछि।
उपन्यासकारक दृष्टि ओहि बिन्दुपर छन्हि जे जाहि गाममे जतेक जीवनक बुनियादी जरूरतक पूर्ति होइए ओ गाम ओतेक अगुआएल भेल आ जाहि गाममे जतेक कम होइए वा नहि होइए ओ गाम ओतेक पछुआएल भेल। एहन दृष्टि उपन्यासकारक ओहिना नहि छन्हि, ओहि पाछू ईहो सत्य अछि जे जखनहि विद्यालय वा अस्पतालक प्रचार-प्रसार माने स्थापना होइए तखने ओहि गाम-समाजक लोककेँ लगमे सुविधा भेटिने लाभ होइते अछिजाहिसँ जीवन सुलभ बनिते अछि।
सत्तैर-अस्सी वर्ष पूर्व बँसपुरामे कोसी धारक बाढ़िक प्रवेश भेल। जे साले-साल बढ़ैत गाममे धार फोरि देलक। धार बनिते पानिक बहाव शुरू भेल जाहिसँ गामक खेत-पथारक जजात दहाए लागल आ घर-दुआर सेहो कटि-कटि धारमे विलीन भऽ गेल जाहिसँ गाम उपटि गेल। गामक लोक अपन जान लऽ लऽ आन गाममे सेहो बसलाह आ बेसी लोक नेपाल जा-जा नोकरी-चाकरी करय लगलाह। जिनका अपना सम्पति छलन्हि, जे सुभ्यस्त किसानक रूपमे बँसपुरामे छलाह, ओहो सभ आनठाम जा नोकरी-चाकरी करय लगलाह किएक तँ अपन सम्पति नष्ट भऽ गेलनि। तीस वर्षक पछाति बँसपुरा गामसँ कोसी आगू बढ़ल। माने कोसी धार दोसर मुँह बनौलक। कोसी आ कमला एहन धार अछि जे एकठाम अस्थिर नहि रहैए। बँसपुरा गामसँ कोसीकेँ हटिते गाममे बाढ़ि आएब कमल। गाम पुन: जागल। गामक माटिकेँ जागिते कास-पटेर, झौआ, राड़ी इत्यादिक बोन भऽ गेल जे गौंआँ सभ अर्थात् बँसपुराबला सभकेँ सेहो भाँज लगलन्हि। जे पीढ़ी गाम छोड़ि पड़ाएल छलाह ओहि पीढ़ीक गोटे-आधे लोक जीवित रहला बाँकी सभ मरि गेलाह। हुनका सबहक धिया-पुता, जे जवान भऽ भऽ विवाह-दुरागमन सेहो कऽ लेने छलाह, धिया-पुता सेहो भऽ गेल छलन्हि, अपन बाप-दादाक गाम सुनि बँसपुरा आबि-आबि बसय लगलाह आ गामक बोन-झाड़केँ काटि-काटि खेत-पथार बनौलन्हि। वएह गाम बँसपुरा थिक।
बँसपुरा गामक पहिलुका सभ किछु नष्ट भऽ गेल। अर्थात् गाछी-बिरछी, इनार-पोखरि, घर-दुआर इत्यादि सभ किछु। पुनर्जन्म गामक भेल।
सिसौनी दुर्गास्थानक घटनासँ बँसपुराक सभक मनमे आक्रोश भेल। सभ कियो सिसौनीबलासँ बदला लइक खियालसँ एकमुहरी विदा भेल। गामक सभसँ बुढ़ मनधन बाबा छथि। मनधन बाबाकेँ अस्सी वर्षक जीवनक अनुभव छन्हि। ओ सोचलनि जे दू गामक विवाद छी। अनेकहु नव घटनाक जन्म हएत, जाहिसँ दुनू गाम नष्ट भऽ जाएत। अत: बीच-बचाव करैत मनधन बाबा सभकेँ रोकि चारि बजेमे बैसारक समय निर्धारित कएलनि।
गाम ज्वालामुखीक आगि जकाँ धधैक रहल छल। चारि बजेक बैसारमे मर्द-औरत सभ एकत्रित भेलाह। बैसारमे रंग-बिरंगक विचार उठल। सभक मन अगियाएल रहनि। मरदसँ बेसी जनिजातिक मन अगियाएल रहनि। ओना, बैसारमे मरद एकभाग बैसलाह आ जनाना दोसरभागमे बैसलीह। दुनूकेँ एकठाम बैसैक विचार मनधन बाबा देलनि।
एखन धरि समाजक बीच पुरुखेटाक बैसार होइत आबि रहल अछि। पुरुख-जनानाक बीच बैसार भेल। ई बैसार गामक विराटरूपमे दृष्टिपात भेल।मनधन बाबाक विचार मानि सभ कियो अर्थात् मरद-जनाना एकठाम बैसल। सभक मनमे आगि पजरले छलै तेँ सभ कियो अपन विचार राखए लेल तनफन कय रहल छल। जनानाक रूप देख मनधन बाबा पुन: अपन विचार रखैत बजलाह जे समाजक बैसार छी, तेँ जौं सभ अपने-अपन विचारमे घघौंज करब तखन काज आगूमुहेँ केना ससरत। ओना, मनधन बाबाक मनमे ई विचार रहनि जे जाबत धरि समाजमे लोक अपन अत्याचारकेँ अपनहि नइ रोकए लेल तैयार हएत ताबत धरि ओ अन्याय-अत्याचार रूकि कोना सकैए, तेँ समाजक लेल ई शुभ संकेत अछि। मनधन बाबाक मनमे ईहो विचार नाचि रहल छलैन जे कोन गाम एहन अछि जाहि गाममे लड़का-लड़कीक एहन घटना नइ होइए। नारी प्रति अन्यायिक कोनहु ई पहिल घटना छी, सभ गाममे होइए। अत: घटनाकेँ दोसर दिशामे मोड़ैत मनधन बाबा बजलाह जे कोनहु सबालक जवाब एहन नहि हुअए जे वास्तविक घटना तर पड़ि जाए आ आने-आन घटना विकराल रूपमे उपस्थित भऽ जाए। ताहि बीच बाबाक मनमे पछिला एकटा घटना मन पड़ि गेलनि। ओहि घटनाक चर्च करैत बजलाह-
“एकटा नढ़ियाक खातीर बेला आ मैनही गामक शिकार खेलनिहारक बीच मारि भेल। धमगज्जर‍ मारि। परिस्थि‍तियो अनुकूले पड़लै। पाबैन मनबए सभ लाठी, सोहत, तीर-धनुष लऽ लऽ शिकार खेलए गेले रहए। ने लोकक कमी आ ने मारि करैक वस्तुक। मुद्दो तेहने भारी, एकटा मुइल नढ़िया। मुदा प्रतिष्ठाक प्रश्न तँ गामक रहबे करइ। अही प्रतिष्ठा लऽ कऽ केतेको लोकक कपार फूटल, केतेकोकेँ हाथ-पएर टुटल आ दुनू दिस एक-एकटा खूनो भेल। कियो केकरो देखैबला नै रहल। जे जेतइ से तेतइ कुहरैत रहए। केकरा के उठा कऽ लऽ जाइत आ इलाज करबैत। हो-ने-हो तहिना..!”
विचारमे मोड़ दैत मनधन बाबा फेरि बजलाह- “भाय लोकैन‍! अपना गामक भाए-बहिन आन गामक मेलामे जा बेइज्जत होइए‍। एकर की कारण छइ? कारण छै जे अपना गाममे कोनो तेहेन सार्वजनिक काजे ने होइए‍। जखने अपनो सभ तेहेन काज करब तँ अनेरे आन गाम बलाकेँ दहसैत‍‍ हेतइ। वएह दहसैत‍ गामकेँ उजागर करत, प्रतिष्ठि‍त बनौत। गोसाँइ जी रामायणमे कहने छैथ‍‍, बिनु भय होइ न पीरिति।”
मनधन बाबाक विचार सुनि गौंआँ सभ विचार कएलनि जे जहिना दुर्गापूजाक उत्सव सिसौनीबला करैए, तहिना अपनो सभ कालीपूजा करी। विचारकेँ सभ कियो, अर्थात् बैसारमे आएल सभ कियो मानि गेलाह, राजी भऽ गेलाह। लगले पूजाक आयोजनक कार्यक्रम दिस सभ कियो बढ़लाह। एकटा समितिक गठन भेल। एहि पूजा समितिमे सभ जातिक लोक सदस्य भेलाह। एखन धरि जाहि समाजमे किछु मुँहगर-कन्हगर लोक अगुआ बनि सार्वजनिक काज करैत छलाह ताहि जगहपर बँसपुरामे समाजक सभ जातिकेँ समान अधिकार भेटल जे समाजक विराट रूपमे ठाढ़ भेल।
ओना, सिसौनी गाममे भेल घटनाक प्रतिक्रिया स्वरूप सेहो बैसार भेल। जकर अगुआ प्रो. दयानन्द भेलाह। ओहि बैसारमे मारि-पीट सेहो भऽ गेल जाहिसँ अत्याचारीक बीच दहसैत सेहो बनल।
एहि अंकमे उपन्यासकार एकटा मसोमातक वर्णन कयने छथि। जनिक नाओं अछि दुखनी। सभ तरहेँ दुखनी गरीब लोक अछि। ओना, दुखनीकेँ दूटा सनतान सेहो अछि। एकटा बेटा आ एकटा बेटी। बेटी सासुर बसैत छन्हि। आ बेटा जे तीन साल पूर्व परदेश गेलनि ओ ने कहियो एकोटा पाइ पठौलकनि आ ने गाम एलनि। मुदा तैयो दुखनी अपन जीवन-यापन कए रहली अछि। दुखनीक घरमे जारनि नहि छल, दिवाली पावनिक दिन छल। देखू दुखनीक वर्णन उपन्यासकारक शब्दमे-
“नीन टुटिते दुखनीक मनमे, ओछाइनेपर उपकल- आइए दीयोबाती छी आ गाममे काली-पूजाक मेलो। बेटी मन पड़लै। एना कऽ श्यामाकेँ समाद देने छेलिऐ जे एक दिन पहिनहि धिया-पुताकेँ नेने अबिहेँ, से कहाँ आएल‍। ओहो वेचारी की करत? अन-पानि घरमे हेतै मुदा तीनू तूर जे मेला देखत तइले तँ दसो-बीस चाही। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे से नइ होइ तेकरो इंजाम ने करय पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरियान नै भेल होइ। हँ, हँ, भरिसक सएह भेल हेतइ।
ओना, आइ भरि अबैक समैयो छै, बेरो धरि एबे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैआ नेने आएत मुदा जारैन तँ नै आनत। अखन धरि हमहूँ तँ जारैनक कोनो ओरियान नहियेँ केलौं हेन। आब कहिया करब? भने मन पड़ि गेल। सोचने छेलौं जे श्यामा औत तँ घर-अँगनाक काज सम्‍हारि देत सेहो नहियेँ भेल। भरिये दिनमे की सभ करब। घरो छछारैले अछि, ओलतियो ओहिना पड़ल अछि। केना असगरे एते काज सम्हरत? ओलतीमे माटि भरब, आकि घर छछारब आकि जारैन‍ आनब..?”
क्रमश: दुखनी जारनि तोड़ए गलीह। चारि बोझ सुखल ठौहरी तोड़ैत-तोड़ैत दुखनीकेँ दुपहर भऽ गेलनि।
प्रस्तुत अंकमे उपन्यासकार दुखनीक मनोविश्लेषण एहि रूपे कयने छथि जे एकटा नि:सहाय गरीबक जीवन होइए। बेर झुकैत-झुकैत बेटी श्यामा सेहो दुनू बच्चाक संग पहुँचैए। आ बेटा ‘भुखना’ सेहो परदेशसँ आबि जाइत अछि।
उपन्यासकार दुखनीक माध्यमसँ ओहन चित्र प्रस्तुत कएलनि अछि जाहिमे ई देखबामे अबैत अछि जे निराश लोकक मनमे कोना आशा जागैत अछि। बेटा-बेटी, नाति-नातिनकेँ देखि दुखनीकेँ अतिशय खुशी होइत अछि।
अगिला अंकमे उपन्यासकार बँसपुरा समाजक ओ रूप प्रस्तुत कएलनि अछि जे विराट-सँ-विराटतम गाम-समाजक थिक। समुच्चा गौंआँ एकठाम बैस कालीपूजा आ मेला हेतु एहि तरहेँ निर्णय कएलनि-
(1) गामेक कारीगर माने मूर्ति बनौनिहार मूर्ति बनबए। ओना, एक-पर-एक कारीगर दुनियाँमे अछि मुदा पूजाक मूर्तिमे कला नै देवी-देवताक स्वरूप देखल जाइए‍। दोसर जँ हम अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधला कहब तँ गामक कलाकार आगू केना ससरत? तँए जे गामक कला अछि ओकरा सभ मिलि प्रोत्‍साहित करी।
(2) काली मण्डप गामेक घरहटिया बनबैथ‍‍। जिनका घर बनबैक लूरि छैन ओ मण्डप किए ने बना सकै छैथ‍‍। संगे ईहो हएत जे गामक अधिक-सँ-अधिक लोकक सहयोग सेहो होएत।
(3) मनोरंजन-ले गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटैन‍। संगे बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा आनल जाए जेहेन ऐ परोपट्टामे नै आएल हुअए।
(4) पूजा-ले, परम्परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटैन‍ जे पूजाक प्रेमी छैथ‍‍।
(5) गामक जेते गोरे काज करैथ‍ ओइमे नीक केनिहारकेँ पुरस्कृत आ अधला केनिहारकेँ आगू मौका नै देल जाइन।”
एहि तरहक निर्णयसँ समाजक महत्तेटा नहि बढ़त बल्कि समाजक गुणमे विराटपन सेहो आओत। जखनहि समाजमे सार्वजनिक काजमे जखन समाजक लोकक कलाक अर्थात् लूरिक पुछ हएत तखनहि ने गामक कलामे विराटपन आओत। से भेल। तहिना गामक मेला छी, ओना बाहरी व्यापारी सेहो अपन दोकान-दौरी करय लेल एबे करताह, ताहूमे मेलाक ततेक प्रचार भऽ गेलजे...। मुजफ्फरपुरक नाटक, वृन्दावनक रास, मेल-फीमेल कौब्बालीक संग महिंसोथाक मलिनिया नाच सेहो आओत। जाहिसँ परोपट्टाक लोकअर्थात् मेला देखिनिहारक भीड़ हेबे करत, ताहि संग गामक जे दोकान-दौरी करैबला छथि हुनकहु सभकेँ प्रोत्साहित कएल जाएत। एहिठाम दोकान-दौरी केनिहारक माध्यमसँ उपन्यासकार समाजक नव जागरण दिसि इशारा कएलनि अछि। मनुक्खमे नव चेतनाक संचार कएलनि अछि। जाहिसँ सुतल चेतनामे जागरूकता आओत। जखनहि सुतल चेतनामे जागरूकता अबैए तखनहि लोक आगू बढ़ि किछु करय चाहैत अछि।
बँसपुराक मरदा-मरदी गामक सभ कियो अपन-अपन घरक काज अपन पत्नी वा आन समांगकेँ सुमझा, कालीपूजाक व्यवस्थाक पाछू भिनसरेसँ लागि जाइत गेलाह। व्यक्तिगत विचारकेँ समाजीकरण करैत, काली स्थानसँ लऽ कऽ गामक जतेक रस्ता-पेरा टुटल अछि तकरा सभकेँ मरम्मति करैत, काली स्थानक मैदानकेँ चिक्कन-चुनमुन बनबए लगलाह।
मेलाक बीच दुनू रंगक बाजारक चर्च उपन्यासकार कयने छथि। नव फैशनक दोकानक संग पुरान ढर्राक दोकानक चर्च सेहो कएलनि अछि। जे सभदिना व्यापारी छथि ओ नव-नव वस्तुक दोकान कयने छथि मुदा गामक जे नव-नव लोक छथि ओ पुराने ढर्ड़ाक दोकान कएलनि अछि। ताहिमे ताड़क पातक झुनझुनाबला बुढबा सेहो अछि। जे चालीस वर्षसँ ऊपरेसँ गाममे झुनझुना बेचैत आबि रहल अछि। झुनझुनाबला बुढ़बाक विषयमे उपन्यासकारक वर्णन द्रष्टव्य अछि- “तोरा तँ कनी कऽ चिन्है छिअ हौ झुनझुनाबला?”
“बौआ चसमा लगौने छी तँए धकचुकाइ छह। पहिने चसमा नै लगबै छेलौं। आँखियो नीक छेलए। दू साल पहिने आँखि खराप भऽ गेल, अही बेर लहानमे आँखि बनेलौं।”
मुदा झुनझुनावाली परेख‍ कऽ कहलक- “बौआ सोनमा रौ? जहियासँ परदेस खटए लगलेँ तहियासँ नै देखलियौ। तूँ हमरा चिन्है छेँ?”
“नहि।”
“तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्के ठीन अछि, अँगने-अँगने झुनझुनो आ बिऐनो-पटिया बेचै छी। अहीसँ गुजर करै छी। आब तँ भगवान सभ किछु दए देलैन‍। दूटा बेटा-पुतोहु अछि। सातटा पोता-पोती अछि। दुनू बेटा घर जोड़ैया करैए, राज मिस्‍त्री छी। खूब कमाइए। आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा दुनू परानी तँ जिनगी भरि यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना, दुनू भाँइ मनाहियोँ करैए। मगर हाथ-पर-हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लगत। तँए जाबे जीबै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्चेसँ बहिना लगल अछि। जहिया तोरा घर दिस जाइ छी तहिया बिना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि दिहैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि। तोरा कएटा बच्चा छौ?”
“एक्केटा अछि।”
“एकटा झुनझुना बौआ-ले नेने जाही।”
“ओहिना नै लेबौ मौसी। अखन हमरो संगमे पाइ नै अछि आ तहूँ दोकान लगैबते‍ छेँ। बिकरी बट्टा थोड़े भेल हेतौ।”
“रओ बोहैनक सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बिद करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइले बोहैनक काज अछि। ले नेने जाही।”
दोसर दोकान रमेसरा बढ़ीक छी, जे लोहोक समान आ लकड़ियोक समानक अछि। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरिया, कुरहैर‍, खनती, चक्कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्चा सबहक तीन पहिया गाड़ी इत्यादिक दोकान लगौने अछि। तहिना रौदिया भैया, जे गौंए छथि ओहो चाहक दोकान कएलनि अछि। तहिना कुम्हारक दोकान सेहो अछि जे माटिक वर्तनक दोकान कएलनि अछि। तहिना डोमक अछि जे अपन सभदिना कारोबार बाँसक छिट्टा, पथिया, कोनियॉं-सूप इत्यादिक दोकान कयने छथि।
साँझू पहर, जखन पूजा शुरू नहि भेल छल, मुदा मेलाक रूप-रंग तँ तैयार भइये गेल छलैक। नाच-तमाशाक स्टेज सभ तैयार भऽ गेल छल, सभ पार्टी स्टेजपर जाइ लेल तैयारी कइये रहल छल, दर्शकक भीड़ लागि चुकल छल कि एकाएक मेघ उठल आ झॉंट-पानि सभ शुरू भऽ गेल। जहिना तेज हवा चलि रहल छल तहिना घनघोर बरखा सेहो भेल। गौंआँ-घरूआ तँ भागि-भागि, भीजैत-तीतैत अपन घर पहुँचि गेल मुदा अनगौंआँ फँसि गेल। ओना, किछु अनगौंआँ सेहो भागि-भागि गौंआ सबहक एहिठाम पहुँच गेल, मुदा अधिकतर अनगौंआँ मेलेमे अपन जान बँचबैक खियालसँ जहॉं-तहॉं अपन गर लगौलक। वृन्दावनक रासक मंच किछु बेसी खड़ा छल जकरा निच्चॉं माने तरमे लोक भरि गेल। ताहि संग मंचक ऊपरोमे, मंचक ऊपर तिरपाल-पर्दा लागल छल, ताहूपर तेते लोक चढ़ि गेल जे मंचे टुटि कऽ खसि पड़ल। जाहिसँ तरक लोककेँ हाथो-पएर टुटल आ कतेको मरबो कएल।
मेलाक दृश्यक पछाति उपन्यासकार बँसपुरा गामक समाजक चर्च कएलनि अछि। झॉंट-पानि तेज रहने गामक घरो-दुआर खसल आ अनेकहु तरहक नोकसान सेहो भेल। रूपलालक घर खसि पड़ल। घरक तरेमे रूपलाल अपने पड़ि गेल। पत्नी दोसर घरमे, रहने बुझबे ने केलीह। झॉंट-पानिक तते अवाज होइत छलै जे घरक अवाज दबि जाइत रहैक। पत्नी (मुनेसरी) बुझबे ने केलीह।
सजना मेला देखए गेल छल। ओहो तीतैत-भीजैत घरपर आबि गेल। दुनियॉंलाल आ रूपलाल सहोदार भाय मुदा दुनू भीन अछि। जीह-जानसँ दुनियॉंलाल आ बेटा सजनो दुनू बापूत मिलि कऽ मेहनत कय रूपलालकेँ घरसँ निकाललक। ओना, रूपलालकेँ चोट लगल रहैक मुदा शरीरक किछु अवघात नहि भेल छलैक। शान्त भेला पछाति जखन दुनू भाँइक बीच गप-सप्प शुरू भेल तखन दुनियॉंलाल तँ अपन दायित्व बुझलक मुदा रूपलालक मनमे सहोदर भाइक सिनेह उमैड़ पड़लैक। आ बाजए लगल-
“भैया, धरमागती बात कहै छिअ। दुरागमनक पछाइत‍‍ जे विदागरी करबैले पठौने रहऽ, ओइ दिनक बात कहै छिअ। अपनो सासु आ टोलोक मौगी सभ आबि कऽ लगमे बैसल‍। अपना बुझि पड़ए जे जहिना वृन्दावनमे कृष्ण गोपी सबहक संग बैस कऽ गप-सप्प करै छला तहिना हमहूँ छी। एक-मुहरी सभ स्‍त्रीगण कहए लगल जे अहाँक भाए बड़ छनकट अछि। केतबो कमाएब तँ भाभन्स हुअ देत। अहाँ दुनू परानी कमाएब आ ओ कोसल करत। जखन हाथ-मुट्ठी गरमा जेतै तखन भीन कऽ देत। अखन दुनू परानी जुआन छी, कमाइ-खटाइ छी। अखन नै किछु बना लेब तँ जखन धिया-पुता हएत खरचा बढ़त, तखन कएल हएत। तँए नीक कहै छी जे अखने भीन भऽ जाउ। नै तँ पाछू पचताएब।”रूपलाल ईहो बाजल जे आइ बुझै छी जे सहोदर भाय की छी।
प्रस्तुत घटनाक माध्यमसँ उपन्यासकार सहोदर भाइक प्रति की सिनेह हेबा चाही आ सामाजिक परिवेशमे की बनि गेल अछि तकर चर्च विस्तारसँ कएलनि अछि। विस्तारित रूपकेँ दृष्टिपात कएल जाए-
“कियो जे तोरा किछु कहलकौ आ तूँ मानि गेलेँ से अपन बुधि केतए गेल छेलौ। तूँ नै देखै छेलही जे दुनू भाँइ संगे बोइन करैले जाइ छेलौं आ आँगनमे भौजाइ भरि दिन अँगना-घरक काज सम्‍हारि जारैन-काठीक ओरियान करै छेलखुन। तैपर एकटा नाङैरक घास-भूसा, खुऔनाइ-पीऔनाइसँ लऽ कऽ आश्रमी भानस-भात कऽ बरतन-बासन धरि मँजै छेलखुन, से सभ अपना आँखिए नै देखै छेलही। तोंही कह जे सत् बात की छेलै आ मौगी सबहक कान भरने तूँ की बुझलीही!”
अपसोच कऽ मुड़ी डोला रूपलाल मिरमिराइत बाजल- “हँ भैया, ई तँ ठीके कहै छह।”
“अपने आँखिसँ जे देखै छेलही से झूठ बुझि पड़लौ आ जे झूठ बात सुनलेँ ओकरा सत् मानि लेलही। एकरे कहै छै मौगयाही भाँज। तोरे जकाँ आनो-आन मौगयाही भाँजमे पड़ि कुल-खानदानक नाक-कान कटबैए। नैहरसँ सासुर जाइ काल जे मौगी सभ कानि-कानि बजैए से की कहै छै से बुझै छीही? ओ कहै छै जे जहिना बाप-माइक घराड़ीपर हम कनै छी, तहिना बाप-दादाक घराड़ीपर घरबलाकेँ कनाएब। अरे! एतबो ने बुझै छीही जे दुनियाँमे सभ कुछ मिलि सकैए मुदा सहोदर भाए नै मिलै छइ। भाइक खातिर लक्ष्‍मण स्‍त्री, परिवार आ समाज सभ छोड़ि देलखिन मुदा भाइक संग अन्तिम समय धरि रहलखिन। आइ तोरा के काज दइले एलौ। कनियोँ जँ हमरा मनमे पाप रहैत तँ तोरा घरेमे मरैले नै छोड़ि दैतियौ। नै तँ झीक‍-झाकि कऽ ठाठ देहेपर खसा दैतियौ। नइ मरितेँ मुदा हाथो-पएर तँ टुटबे कैरतौ।”
नमहर साँस छोड़ैत रूपलाल अपन सिमसल आँखिकेँ मिड़ैत बाजल- “भैया, आइ बुझि पड़ैए जे सभ ठकि लेलक!”
“कान पाथि कऽ सुनि-‍ले। जहिना मनुख सभसँ पैघ जीव ऐ धरतीपर अछि, जे बड़का-बड़का चमत्कारी काजो करैए‍, तहिना छुतहरो अछि। देखबीही जे जेकरा कनी बुधि-अकील छै ओ सदिकाल बुड़िबक सबहक कमाइ ठकि-ठकि मौजसँ खाइए, खेबेटा नै करैए‍ ओकर बोहु-बेटीक संग कुत्ता-बिलाइ जकाँ इज्जतो संग बेवहार करैए।”
“भैया, आइ बुझि पड़ैए जे हमर बाप मरल नै जीबते अछि।”
पिताक रूपमे अपनाकेँ पाबि दुनियालालक हृदय पसीज गेल। बाजल- “बौआ, जे समय बीत गेल ओ आब थोड़े घुमि कऽ औत। मुदा जाबे जीबैत रहब, तैबीच जे समय अछि ओ तँ बँचल अछि। हमरा तूँ मोजर दे आकि नै दे मुदा अपन सीमा तँ हमहूँ बुझै छी किने। अपन कमाइ खाइ छी, अपने औरूदे जीबै छी। तइले दोसराक कोन आश। अपन काज दुसैबला नै करब। जँ केकरो नीक कएल नै हएत तँ अधले किए करबै। तोरा प्रति जे काज अछि सएह ने करब।”
एहि तरहेँ उपन्यासकार आगू अनुपक चर्च सेहो कएलनि अछि। अनुप ओहन किसान अछि जे खेतीक संग महींस सेहो पोसने अछि। जाहि दिन मेलाक आरम्भ भेल छल ताहिसँ एक दिन पहिने अनुपक महींस उठल, पाल खाइ लेल। चारि बजे भोरमे महींस लऽ कऽ अनुप पाड़ा ताकए विदा भेल। वौआइत-वौआइत बेरू पहरमे पाड़ा भेटलैक, जे महींसकेँ गछाड़ि लेलक। भूखे-पियासे अनुप लहालोट भऽ गेल मुदा करितए की। दोसर कोनहु उपाय रहबे ने करैक। जखन झॉंट-पानिमे अनुप पड़ि गेल छल। घरपर अबैत-अबैत मन खराव भऽ गेलैक। माने धाह-बोखार लागि गेलैक। पत्नीकेँ अनुप कहलक अही महींसक परसादे गुजरो चलैए आ हाथ-मुट्ठीमे दूटा पाइ सेहो रहैए।
अनुपक अतिरिक्त उपन्यासकार राजेसर भाइक चर्च सेहो कएलनि अछि। राजेसर जरसी गाए रखने अछि जे ठाँठ भऽ गेल छैक। तेँ डॉक्टर लग मधेपुर लऽ गेल छल। अबेर भऽ गेलैक। झॉंट-पानि रस्तेमे पकड़ि लेलकैक मुदा कहुना-कहुना घरपर आबि गेल। घरपर एला बाद गाए मरि गेलइ। गाए मरैक कारण भेलैक जे झॉंट-पानिमे भीजब आ अकान्त हएब।
कानैत राजेसर बेटाकेँ कहलक जे बौआ, गाए मरि गेल तेकर सोच ओते नहि अछि मुदा बैंकक कर्ज केना चुकाएब चिन्ता तेकर अछि। प्रस्तुत प्रसंगक विस्तारित रूप, जे उपन्यासमे आएल अछि। राजेसर बाजल-
“गाए मरि गेल तेकर दुख ओते ने अछि जेते बैंकक करजाक अछि। एक तँ सरकार लोककेँ मदैत करैए आकि गरदैनमे फाँस लगबैए। जखन गाए नै नेने रही तखन कहलक जे तेकरी सरकार देत आ बाँकी दू हिस्सा बैंकसँ करजा भेटत। काज सुगम देख लेलौं। बुझबे ने केलिऐ जे गरदैनमे फँसरी लगबैए। छूट-ले बैंकबला कहलक जे मधमन्नीसँ कागत आनि कऽ दिअ तखन ओइ रूपैआक मिनहा लोनमे भऽ जाएत। जाबे तक ओ कागत नै देब ताबे तक सोल्‍होअना रूपैआक सूदि चलैत रहत। अपने देखल-सुनल नहि। कोटक मंशीकेँ जा कऽ सभ बात कहलिऐ तँ ओ तैयार भऽ कऽ ओइ ओफिस गेल। पाछूसँ अपनो गेलौं। ओफिस जखन गेलौं तँ कहलक जे पान साए रूपैआ लगत, तखन कागत देब। अहिना दौड़-बड़हा करैमे हजारसँ ऊपरे खर्च भऽ गेल। रूपैआक किस्त नै देने छेलिऐ। बैंकमे जखन हिसाब करबए लगलौं तँ कहलक जे छह मासक सूदि मूरमे जमा भऽ गेल, आब ओकरो सूदि लगत। तैबीच गाइयो मरि गेल! आब की करब?”
अगिला घटना कुम्हारक अछि। जे अपन श्रमबलसँ खपड़ाक कारोबार ठाढ़ कयने छल। पावनिक शुभ दिन बुझि सुरतिया खपड़ाक भट्ठा लगौलक। खेला-पीला पछाति भट्ठामे आगि देलक। आगि जखन पजरि गेलैक तखन झॉंट-पानिक चलैत सभटा खपड़ा गलि गेलैक, माटि भऽ गेलैक। मास दिनक मेहनतकेँ डुमैत देखि सुरतियाक मन छहोंछित भऽ गेलैक। ओना, एहि घटनाकेँ सुरतियाक पत्नी डाइन-जोगिनक दोख लगबैत खूब गरियाबए लगलीह। मुदा तकरा रोकैत सुरतिया कहलक जे एक तँ मास दिनक मेहनत गेल तइपर अनेरे अहॉं की समाजमे दुश्मनी बढ़बै छी।
ताहिसँ आगूक एक घटना फदनाक अछि। जे दूटा पोखरिमे माछ पोसने अछि। एकटा तँ बँचलै मुदा दोसर दहा गेलैक, एहि पोखरिमे महार नहि छलै। दुनू परानीक बीचक यथावत वार्त्तालापकेँ देखल जाए- “गलती अपनो सबहक भेल जे पोखैरक मुँह मजगूतसँ नै बान्हि देलिऐ। जँ से बान्हल रहैत तँ एहेन दिन थोड़े देखतौं। काल्हि‍‍ भोरे पाँचटा टल्लाबला जन कऽ कऽ मजगूतसँ मुँह बान्हि देबइ। अखन कातिके छी बहुत समय अछि। बैशाख-जेठमे मछहैर‍ हएत। भने पोखैर उपो-उप भरि गेल।”
पत्नीक बात सुनि फुदना बाजल- “जँए एते पूजी लगेलौं तँए थोड़े आरो लगा देबइ। दू मन खैर आनि कऽ सेहो दइए देबइ। ओना, देखै छिऐ जे केते गोरे खादो दइए। मुदा अपना तँ ओते ओकाइत नइए। ऐ साल कहुना-कहुना कऽ लिअ। ऐगला सालसँ नीक जकाँ करब। कोनो की अग्‍गह-बिग्‍गह पोखैरे जोतलासँ थोड़े होइ छै, जेतबे करब नीक जकाँ करब।”
तकर अगिला घटनामे भोलाक चर्च उपन्यासकार कएलनि अछि। कोबी, भाँटा, मिरचाइ इत्यादि बीहनिक कारोबार भोला करैए। ऊपरका खेतमे तेहन दनार फोड़लकैक जे सभ बीआ भँसियाएल माटिक तरमे परि कऽ झँपा गेल। भोलाक परिचय दैत एहि घटनाक प्रसंगमे उपन्यासकार लिखने छथि- “मंचक घटना सम्‍हारि भोला घरपर आबि बीरार देखए गेल। बीरारमे बिहैनक दशा बिगड़ल देख निराश भऽ गेल। आमदनीक आशा टुटि गेलइ।”
जहिना भोला छोट किसान तहिना छोट कारोबारियो। पनरहे कट्ठाक आँट-पेटक किसान। मुदा दुनू परानी एहेन मेहनती जे सात गोरेक परिवार हँसी-खुशीसँ चलबैत। ओना, चारिटा बच्चा लिधुरिया रहै मुदा जेठका बारह बर्खक। जेठ बेटा बलदेब मिड्ल स्कूलमे पढ़बो करैत आ घर-गिरहस्तीक काजमे संगो-साथ दइत। स्कूलोक दशा तेनाहे सन। पाँच साए विद्यार्थीक स्कूलमे तीनिटा शिक्षक। तहूमे एकटा नेतागिरिये करैत। पढ़बै-लिखबैसँ ओते मतलब नहि, जेते आँफिसक दौड़-बड़हासँ। सिरिफ लोकेक काजे ऑफिस नै जाए, बल्‍कि‍ स्‍टाफो सबहक काज करैत। जइसँ आमदनियोँ नीक आ पैघ लोकक बीच बैस समैयो गूदस करैत। स्कूलसँ ओतबे मतलब जे मासो दिनक हाजरी बना दरमाहा उठबैत। समाजमे केकरो किछु कहैक साहसे नहि। थाना-बहानासँ लऽ कऽ कोट-कचहरी धरिक धुड़फन्दा लोक, तँए कियो आँखि केना उठा सकैए। तहूमे सरकारी पार्टीक नेतागिरी करैत।
स्कूलक ढील-ढालसँ भोला खुशीए रहए। किएक तँ बलदेब माल-जालक पूरा भार उठा नेने। कुट्टी काटब, खाइले देब, पानि पियाएब, घर-बाहर करब, थैर खर्ड़ब, गोबर उठाएब बलदेवक बान्हल ड्यूटी‍। अइले ने पिताकेँ अढ़बैक जरूरत‍ आ ने कोनो चिन्ता। मुदा तँए की बलदेव पढ़ए नहि? पढ़बो करए। भरि दिन ने माल-जालक नेकरम करै मुदा बारह घन्‍टाक राति तँ बँचइ। दोसैर साँझ होइते भोला मुस्‍तैज भऽ धिया-पुता लग बैस नजैर‍ रखैत।
पढ़ैमे बलदेव ओते चन्सगर नहि, रहबो केना करैत? जखन स्कूलेकेँ केन्सर धेने रहत, तखन हाथ-पएर केते क्रि‍याशील रहत। मुदा तँए कि बलदेव सोलहन्नी भुसकौले रहए से नहि। इमानदारीक छह घन्‍टाक मेहनतसँ कियो इंजीनियर तँ कियो डॉक्टर, कियो ओकील, तँ कियो प्रोफेसर बनि जाइए‍, तँ तीन‍ घन्‍टाक मेहनतसँ बलदेव किए ने पास करत। साले-साल किलास टपिते रहए। भोलो खुशी, किएक तँ बच्चेमे बाबाक मुहेँ सुनने रहए जे- ‘उत्तम खेती।’ नोकरी आ गुलामीमे की अन्तर छइ। कमा कऽ जिनगी जीबैक लूरि जँ भऽ जाए तँ ऐसँ बेसीक जरूरते की‍। जहिना राजतंत्रमे रजेक बेटा राजा होइत तहिना ने प्रजातंत्रोमे मंत्रियेक बेटा मंत्री आ हाकिमेक बेटा ने हाकिम बनत। तइले आनक सेहन्ता, सेहन्ता नै तँ आरो की भऽ सकै छइ?”
पछाति सिसौनी गाममे सेहो काली पूजाक संग मेलाक आयोजन होइत अछि। मेलाक बीच जे नव-नव लोक, अर्थात ओहन-ओहन लोक जे एखन धरि कोनहु कारोबार नहि कयने छलाह, ओहनो लोक सभ व्यवसाय दिस बढ़ला। मुदा पानि-बिहारिक चलैत जे कारोबार असफल भऽ गेलैक। ताहि असफलताकेँ देखबैत उपन्यासकार ओहि असफल व्यक्तिक बीचक प्रतिक्रियाकेँ सेहो रेखांकित कएलनि अछि। दू तरहक प्रतिक्रिया भेलैक। पहिलप्रतिक्रियामे लोक अपन भाग्यकेँ कोसए लगल जे भाग्यमे लिखल जएह रहत सएह ने हएत। अर्थात जे काज जकरा भाग्यमे लिखल रहैत छैक ओ ओकरे भऽ सकैत छैक। मुदा सामुहिक रूपमे घटना भेलासँ, अर्थात घटनाक प्रभाव एकरंग भेलासँ लोकक मनमे दोसर प्रतिक्रियाईहो भेलैक जे जँ हमरेटा एहेन भेल रहैत तखन ने, से तँ ओकरो भेल जे जीवनी कारोबारी अछि।
प्रस्तुत उपन्यासमे उपन्यासकार नव चेतनाक संग परिवर्तित होइत जीवनक विषद रूपमे चर्च कएलनि अछि। ताहिसंग साहित्य समाजक दर्पण थिक, जे एखन धरि मैथिली साहित्यमे एकाकी रूपमे आबि रहल छल ओकरा विराट रूपमे अर्थात् समाजक सभ वर्गक लोककेँ समाहित करैत उपन्यास गढ़लैन अछि। जे साहित्यक्षेत्रक लेल एकटा नव उपलब्धि सेहो कहल जा सकैए।
जीवन-संघर्ष उपन्यासमे जे कोनहु घटनाक चर्च भेल अछि ओ जीवनक भविष्य दिस सेहो इशारा करैए। ताहि संग समाजमे जे वैमनस्यक रूप एक-दोसराक बीच सभ दिनसँ अबैत रहल अछि ओकरा सामंजस्य करैक भरपूर प्रयास भेल अछि। जाधरि समाजमे प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहि बनत ताधरि नव समाजक निर्माण कोना हएत। जाधरि समयानुकूल नव रूपमे समाज ठाढ़ नहि हएत ताधरि समयक संग समाज चलि कोना सकैए।
‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यासक नामक सार्थकता सिद्ध करैत संघर्षक महत्वकेँ देखबैत उपन्यासकार संघर्षक मुख्य कारक तत्वकेँ सेहो प्रदर्शित कएलनि अछि। संघर्षक कारण द्वन्द्व होइत अछि। ओना, द्वन्द्व दुनू दिशामे होइए। माने सकारात्मक सेहो होइए आ नाकारात्मक सेहो होइते अछि। नकारात्मक द्वन्द्व पतन दिस बढ़बैत अछि जखन कि सकारात्मक द्वन्द्व उत्थान दिस बढ़बैत नीकसँ नीक दिशामे, उन्नतिसँ उन्नति दिशामे बढ़बैत अछि।

Suggested citation: उमेश मण्डल. “जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 283, 2019-10-01. https://www.videha.co.in/research/2019/283/जगदीश-प्रसाद-मण्डलक-जीवन-संघर्ष.htm

मूल विदेह अंक / Original issue