विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गीतांजलि’

उमेश मण्डल · 2019-11-01 · अंक 285

उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गीतांजलि’
गीतांजलि (2013/2020): पद्य विधामे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक प्रस्तुत पोथी ‘गीतांजलि’, पाँचम कृति छियन्हि। मण्डलजीक काव्यधारा अपने-आपमे फराक स्थान निरूपित करैत अछि। जाहिठामक काव्यधारा मुख्य रूपसँ या तँ भक्तिपरक चिन्तनधारा वा शृंगारपरक चिन्तनधारासँ ग्रसित छल, ओना गौण रूपमे प्रकृतिपरककाव्यक संग मिथिलाक पावनि-तिहार, समाजक रीति-रिवाज धरिमे अपन विकासवादी गतिये चलि रहल छल, ताहिठाममानवीय मूल्यकेँ यथार्थपरक रूपमे नव दृष्टिकोण तथा नव-भाव-भूमिक संग मण्डलजी अपन जीवनक क्रियागत-अनुभवक आधारपर काव्यक सृजन कएलनि अछि।
प्रस्तुत पद्य संग्रहमे कुल 37 गोट रचना संग्रहित अछि जाहिमेप्रथम पद्य- ‘हाल-बेहाल’ थिक। एहि रचनाक माध्यमसँ कवि कहैत छथि जे उसर भूमिमे सेहो जखन हाल डगडगाइत अछि तँ नव फूलक सिरजल भऽ जाइछ-
“डगडगाएलहालपाबिउसरक
फूलउस्‍सरसिरजैतरहैछै।
घूरिताकिनैभरमएभौरा
दिवारसराजकहबैतरहैछै।
हाल-बेहालदेखिरंगराही
कुशलफूल...।”
कवि कहैत छथि जे केहनो परिस्थितिमे शीलकेँ नहि छोड़बाक चाही मुदा वर्तमानमे शीलक स्थिति देखि हंस कानि कऽ कहि रहल अछि-
“शीलाशीलदेखि-देखि
हंस‍कानिकहैतएलैए।
एकशीलश्रृंगचढ़ि-चढ़ि
दोसरश्रृंगारबनैतएलैए।
शीलाशीलदेखि-देखि
हंसकानि...।”
भावक अभाव भेलासँ कुभाव बनि जाइत अछि आ कुभाव बनि प्रेम गीत लिखाइत रहैत अछि-
“भाव-अभाव कुभाव बनि-बनि
गीत प्रेम लिखाइत रहै छै।
रंग सियाही रोशनाइ बनि-बनि
रेहे-रेह...।”
दिन घटैत अछि राति चलि आबैत अछि। दिन-राति बदलैत मौसम बदैल जाइत अछि। चलैत ई क्रम वर्षमे बदैल जाइत अछि। प्रकृतिक लीला बदलैत रहैत अछि-
“दिनघटतैकिरातियौभैया
मौसममुस्कीदइछै
सालेदिनकसमैयेकेते
रंगलीलाकबदलैछै..।”
ताल-ताल मिलि बेताल भऽ बाँहि आवाज भरि रहल अछि आ तन-मनसँ उठैत आगि छातीमे मुक्का मारि कहैत अछि-
“उठितेआगितनैकमन
मुक्काछातीमारिकहैछै
ताल-तालमिलाबेताल
संगबाँहिआवाजभरैछै।
उठितेआगितनैकमन
मुक्काछातीमारिकहैछै
मुक्का...।”
हे कौआ छप्परपर बैसल किए कुचड़ै छह। लग आबि नैहराक हाल-चाल, परिवार आ गाम-समाजक सोखर सुनावह-
“छप्परकिएकुचड़ैछहहेकौआ
छानिपरकिएबैसलछह।
लग-आबिसमादसुनाबह
नहिराकसोखैरगाबि‍सुनाबह
भैया-भौजीकहाल-चालसंग
गाम-समाजकहालसुनाबह।
छानिकिएकुचड़ैछहहेकौआ
छानिपर...।”
‘गामसँ किएडरै छी’ गीतक माध्यमसँ कवि प्रवासी लोककेँ सचेत कएलनि अछि। ओ कहैत छथि जे एक दिसि अपन बाप-पुरुखाक पुरुषार्थक गीत गाबै छी आ दोसर दिसि गामसँ डरे शहर दिसि भागि रहल छी-
“बाप-पुरुखाकपुरुषार्थगाबि-गाबि
छाती-तानिहामीभरैछी
नानी-दादीकखिस्‍सा-पिहानी
सुना-सुनामोहैतरहैछी
तखनकिएगामबिसरैछी
गामसँकिएडरैछी
भाययौ...।”
अन्हार आ इजोत जिनगीक दुनू पक्ष संगहि चलैत अछि। दुखक सागरक बिच्चेमे सुखक सागर सेहो रहैत अछि। एक्कहि मासमे अमावसिया आ पूर्णिमा रहैत अछि-
“दोहरीपक्षजिनगीचलैछै
अन्हार-इजोतकहबैछै।
दुखसागरबीचसुखसागर
अमवसियापूर्णिमाकहबैछै।
एक्केमासकदुनूपक्षछी
बुझैकफेरचलैतएलैए
बेढ़बगीतगबैतएलैए
बेढ़बगीत...।”
जे व्यक्ति अपमान आ मान केर भेदकेँ बिसरि जाइत अछि ओ सुरधाम दिसि चलि जाइछ। एहि प्रसंग कवि ‘संग जिनगी’गीतक माध्यमसँ कहैत छथि-
“मान-अपमानभेदभुलि
संगमिलिसुरधामचलैछै।
घाट-बाटअटैक-मटैक
हारिजीतगुणगानकरैछै।
हारिजीतगुणगानकरैछै।
संगजिनगी...।”
‘सबहक जिनगी’ गीतक माध्यमसँ कहैत छथि जे सबहक जिनगी गीत गबैत छैक, ओ गीत नहिबल्कि सुख-दुख कहैत छैक-
“सबहकजिनगीगीतगबैछै
गीतकसंगसुख-दुखकहैछै।
केकरोसुखाएलसुख
तँकेकरोदुखाएल-सुखाएलकहैछै।”
कवि कहैत छथि जे सबहक जिनगीकेँ अपन-अपन तानी-भरनी होइछ जे समयक संग परीक्षा दैत चलैत रहैत अछि-
“पकैड़तानसभकजिनगी
घड़ीपरीक्षादैतचलैछै।
तीत-मीठगढ़ि-गढ़ि, मढ़ि-मढ़ि‍
दिन-रातिकहैतचलैछै..।”
‘पकैड़ पग’ गीतक माध्यमसँ कवि कहय चाहैत छथि जे प्रेमक पहुँची पकड़ि आगूक पथपर पग-पग चलैत चलू-
“पकैड़पगपएरे-पएरे
पग-पगपथपकड़ैतचलू।
पकैड़प्रेमपहुँचीपकैड़
संगजिनगीकचलैतचलू।
संगजिनगीकचलैतचलू।
पकैड़पगपएरे-पएरेपकैड़...।”
एहिठाम ककरो संच-मच कहाँ रहय दैत अछि। चिड़चिड़ी छीटि कऽ टिकमे ओझरी लगबैत रहैत अछि। रंग बदलि-बदलि एक-दोसरापर सियाही फेकैत रहैत अछि-
“रंग-सियाहीबदैल-बदैल
आँखिइजोतबदलैतरहैए।
यारयौ, संच-मंचरहएकहाँदइए।
भजारयौ...।”
बाढ़िक प्रलयकारी वातावरणमे सेहो मण्डलजीक चिन्ता मानवीय सरोकारेक छन्हि। कहैत छथि- कानि-कलपि के ककरा कहत, सभ अपनहि दुखसँ दुखित अछि..! के सुनत केकर बात, अपनहि सभ वौड़ा गेल अछि..! उक्त भावकेँ निम्न पाँतिमे देखल जाए-
“कानिकलैपकेकराकेकहतै
अपनेबेथेसभबेथागेल।
केसुनतकेकरनचारी
अपनेमनेसभवौड़ागेल।
अपनेमनेमेसभ...।”
चीनीक चोर जिलेबी चीनीकेँ चोरबैत-चोरबैत चीनीक बोरमे डुमि कऽ मरि जाइत अछि-
“रसरसियारसरचि-रचि
रसे-रसरसिआइतरहैछी
चीनी-बोरजिलेबीजहिना
बिनुओर-छोरेडुमिमरैछी
बिनुओर-छोरेडुमिमरैछी..।”
मीत यौ, मात्र अहींटा केँ नहि कहैत छीगहवरक बीच गुहारि सेहो करैत छी-
“मीतयौ, अहींकेँकहैछी
गहबरबीचगुहारिकरैछी।
दिशाचारूफेकिफूल
शंखअकासफूकैतरहैछी
देव-दानव-मानवकहि-कहि
अकासशंखफूकैतरहैछी
मीतयौ, गहबरबीचगुहारिकरैछी।”
अजीव-अजीव खेल चलि रहल अछि, ई खेल नहि बल्कि खाली खाली मन भरल जा रहल अछि-
“अजीब-अजीबखेलचलैछै
खाली-खालीमनभरैछै।
अजीब...।”
हाल विकराल बनल अछि। मुँहगर-कन्हगर लोकक बीच केकरा के देखत-सुनत? तेँ हारल-मारल हेराएल चलि रहल छी-
“हाल-गालविकरालबनलछै
मुँहगर-कन्हगरबीचपड़लछै
केकेकरादेखतै-सुनतै
हारल-मारलहेराएलचलैछै।”
जाहिठामक प्रजातांत्रिक सत्ता केन्द्रीकरण भऽ संचालित-प्रसारित होइत अछि ताहिठामक जनगणक स्वरकेँ कवि प्रस्तुत पद्यक माध्यमसँ कहैत छथि जे कखनहुँ दौड़ैत तँ कखनहुँ ठमकैत आशाक केर आश धयने घिसियाइत चलि रहल छी-
“कखनोदौड़, कखनोठमैक
आशा-आशघिसियाइतचलैए
सतरंगगीतगबैतचलैए।”
बाल आ जुआनी, चित्त आ चेतन सभटा हेरा गेल..! बाढ़िक विभिषिकासँ त्रस्त भऽ कवि लिखैत छथि-
“बालदहाजुआनीजुड़ि-जुड़ि
चित्तचेतनसेहोहरागेल
मितयौ, बाढ़िमेसभकिछुदहागेल।”
असली वानिकेँ अर्थात् असली चालिकेँ छोड़ि जे कुवानि धरत माने कुचालिकेँ पकड़ि कऽ चलत तँ ओ भ्रममे भरमैत रहत।
...उक्त भावकेँ कवि एहि तरहेँ व्यक्त कएलनि अछि-
“बानिछोड़िकुबानिपकैड़
चीज-बौसबनबैछी।
भरैमभरमभरि-भरि
भरमैतकिएरहैछी।
निरमोहीबौआ...।”
‘अपना गतिये’शीर्षक पद्यक माध्यमसँ कवि कहैत छथि जे जिनगी तँ एकटा परीक्षा थिक, जकरा सभकियो अपना गतिये पग-पग परीक्षा दैत जिनगी चला रहल अछि-
“अपनागतिएसबहकजिनगी
पगपरीक्षादैतचलैछै।
तीत-मीठसुआदसिरैज
राति-दिनकहैतचलैछै।
पग-पगपरीक्षादैतचलैछै।”
जाहिठामक प्रीतक रीति कुरीत बनि गेल अछि, कुरीतकेँ सुरीति कोना बनाएबआ जाहिठाम घर-दुआरि थाल-खिचार बनल अछि ओहिठामक कल्पनाक कल्पवृक्ष कोना रोपब-
“प्रीतिकरीतिकुरीतबनलछै
रीति-सुरीतिकेनाबनापेबै।
थाल-खिचारघर-द्वारबनि
वृक्षकल्पकेनारोपिपेबै।
हेबहिनाहेसंगी, हेप्रेमी
सुरतकेनाबदलबै
हेबहिना...।”
सुखक जे धारा अतृप्त होइत अछि ओहि धारामे जिनगी भँसिया गेल अछि आ मन कलपैत-कलपैत कानि रहल अछि-
“सुक्‍खकअतृप्तधारमे
भँसियागेलैजीवन।
भँसि-भँसिभँसियाभँसिया
कानि-कलैपकहैएमन।”
कवि ओहन व्यक्तिकेँ, जे ठकि-फुसिया पनिया कऽ अनका जिनगीक संग खेल खेलाइत अछि, नढ़ड़ा हेल हेलैत रहैत अछि। ओहन व्यक्तिकेँ सचेत करैत कहैत छथि- अहॉं अनका नहि, अपनहि जिनगीक संग खेलै छी-
“नढ़ड़ाहेलहेलैछी, भाययौ
नढ़ड़ाहेलहेलैछी।
ठकि-ठकि, फुसिया-पनिया
जिनगीसंगखेलैछी, भाययौ
जिनगीसंगखेलैछी।
नढ़ड़ाहेल...।
जुगछलजमानाछल
कलैपकूशनेलागैछेलै
सोझ-साझफुलैक-फलैक
चालिखिखिरधेनेछेलौं।
चालिखिखिरधेनेछेलौं।
नढ़ड़ाहेल...।”
असमानताक भेद-भावकेँ देखि कवि क्षुब्ध भऽ गेल छथि तेँ कहैत छथि- चलू उचितपुर देश जाहिठाम सबहक सभ किछु समान होइक अर्थात् जतय समानताक भाव होइक-
“चलूउचितपुरदेश
यौ-भैयाचलूउचितपुरदेश।
नैअछिभेदभावओतएकिछु
नै‍अछिचोर-बैमान।
नै‍अछिऊँच-नीचकिरदानी
सबहकएक्केभेष।
सबहकएक्केभेष।
चलूउचितपुर...।
सबहकचालि-ढालिएक्के
अछिसबहकमान-समान
मन-मनुखबनि-बनिसभ
भरैएसूर-तान, यौभैया
भरैएसूर-तान
जेहेनदेसतेहेनभेष
चलूउचितपुर...।
आगि-पानिकभेदकोनोनै‍
सबहकएक्केउदेस।
पढ़ै-लिखैकएक्केरस्‍ताअछि
सबहकएक्केसनेस।
चलूउचितपुर...।”
आशाकेँ जिनगी कहल जाइछ मुदा ओहि आशापर पानि फेरि गेल अछि। मुदा हारि कोना स्वीकार करब, तेँ आशाक डोर पकड़ि पाछू-पाछू घिसियाइत चलि रहल छी-
“गामेमेहराएलछी
रंग-बि‍रंगअन्न-पानि
नीकसँछिड़ियाएलछी।
नीकसँछिड़ियाएलछी।
कानिकलैपकेतेकहब
..तैपरपानिफेराएलछै
तैयोआशकडोरपकैड़
पाछू-पाछूघिसियाएलछी।
कानिकलैपकेतेकहब”
हँसैत, गबैत, नाचैत कहुना अहॉंक दुआरि पहुँचबे करब मुदा मकरजालक फाँस तँ रहबे करत-
“हँसैत, गबैत, नचैत, भसैत
पहुँचबतोरदुआरि
मुदा, फाँसफँसिमकरजालमे
मेटागेलसभचौपाड़ि
हेमइये...।”
जहिना वंशी पानिक मध्य घात लगौने रहैत अछि आ बोरक गन्धसँ शिकार फँसि जाइत अछि तहिना वर्तमान कालखण्डक स्थिति अछि, एहि प्रसंगमे कवि कहैत छथि-
“तिनकमियाबंशीबनि-बनि
पानिबीचघतियापड़लछै।
गन्धबोरसुगन्धकहि-कहि
मुँहमध्यअवघातबनलछै।
घातलगौनेघातलगलछै।”
जाहि व्यक्तिकेँ नमहर टाँग छैक आर्थात् जनिक आधार पैघ छैक वएह आड़ि-धूर (बाधाकेँ) टपि सकैत अछि-
“देहमेनमहरटाँगजेकर
आड़ि-धूरवएहकुदिटपैछै।
टपिटपानहाथोकहैत
राहीराहपकैड़चलैछै।
देहमेनमहरटाँगजेकर
आड़ि-धूर...।”
निष्कर्षत: कहल जा सकैछ जे एखन धरिक काव्यधाराजे मध्ययुगीन काव्यधारासँ प्रभावित चिन्तनधारामे चलि रहल छल, ओहिसँ हटि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्यधारामे विषयो-वस्तु आ यथार्थवादी दृष्टिकोणक झलक सेहो अछि।
एहि पोथीमे कुल 37 गोट पद्य संग्रहित अछि, यथा- ‘हाल-बेहाल’,‘शीला शील’,‘रंग सियाही’,‘दिन घटतै’,‘उठिते आगि’,‘छप्‍पर किए’,‘गामसँ किए’,‘बेढब रूप’,‘संग जिनगी’,‘सबहक जिनगी’,‘सुन मैया गे’,‘पकैड़ तान’,‘भोरे’,‘कनी जगा देब’,‘पकैड़ पग’,‘संच-मंच रहए कहाँ दइए’,‘ओस बनि’,‘बाढ़िमे सभ’,‘हेराएल-ढेराएल’,‘मीत यौ अहींकेँ कहै छी’,‘अजीब-अजीब’,‘अपने ताले’,‘पग-पग’,‘मीत यौ’,‘निरमोही बौआ’,‘अपना गतिये’,‘भजार यौ’,‘हे बहिनी’,‘हे बहिना, हे दीदी’,‘सुक्‍खक अतृप्त’,‘नढ़ड़ा हेल हेलै छी’,‘अहीं कहू’,‘चलू उचितपुर देश’,‘कानि कलैप’,‘बुधिये बाट’,‘जुग-जुग’,‘घात लगौने’,‘देहमे नमहर।’

Suggested citation: उमेश मण्डल. “जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गीतांजलि’.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 285, 2019-11-01. https://www.videha.co.in/research/2019/285/जगदीश-प्रसाद-मण्डलक-गीतांजलि.htm

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