उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहसा चौरी’
श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहसा चौरी’ पद्य विधाक 9म पोथी छियनि। एहि पोथीक प्रकाशन 2019इस्वीमे भेल। रहसा चौरीक माध्यमसँ कवि मिथिलांचलक ओइ भूभागक चित्र प्रस्तुत कएलनि अछि जे भूभाग सालक छअसँ नअ-दस मास धरि पानिमे डुमल रहैए। जाहिमे उपज हएब असम्भव रहैए। एहन भूभाग गाम-गाममे अछि जे गामक कुल जमीनक तिहाइ-चौथाइ अछि। जाहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे मिथिलांचलक तिहाइ-चौथाइ भागक जमीन उपजाक दृष्टिसँ नगण्य अछि। जखन तिहाइ-चौथाइ भाग गामक वा मिथिलांचलक उपजबे ने करत तखन ओहिठामक किसानक आर्थिक स्थिति केहन हएत। अही स्थितिक जिक्र कवि जगदीश प्रसाद मण्डल अपन प्रस्तुत काव्य ‘रहसा चौरी’मे कएलनि अछि। ओना, पानिसँ डुमल धरती सेहो उत्पादित सम्पति भऽ सकैए मुदा तकर कोनहुँ समुचित व्यवस्था नहि रहने बेकार भेल पड़ल अछि। चौरीक दृश्य देखबैत कवि कहलनि अछि-
“भीतरमिथिलाकओभूभाग
चौड़गरएकटाचौरीछै।
दूर-दूरधरिपसरल-पसरल
बिसवासूखेतीकभूमिनइछै।
नअमासपानिएगुड़गुड़ा
हिआ-हारिकनबोकरैए।
माटिओककर्मकफलतेहने
अपनेबेथेचिचिआरहल-ए।”
जखन धरतीक एहन रूप रहत तखन धरतीवानक अर्थात् किसानक केहन गति हएत? यथार्थवादी कवि अपन दृष्टि एहने भूमि दिस नजैर देलनि अछि।
सर्वविदित अछि जे मिथिलांचल एक सघन अवादीबला क्षेत्र थिक। ओना, देशक अनेको शहर सेहो सघन आवादी अछि। ग्रामीण अवादीकेँ समेटने अछि।मुदा ग्रामीण क्षेत्रमे मिथिलांचल सेहो सघन अवादीबला जगह अछि। जाहिसँ बेरोजगारी परमान चढ़ल अछि। आ से आइये नहि, सभ दिनसँ रहल अछि। तँएमिथिलांचलवासीकेँ पलायन करब अनिवार्य भइये गेल अछि। जँ से नहि करता तँ जीवन-यापन करब कठिन छन्हिहेँ। अही विचारकेँ कवि रेखांकित करैत ‘बेरोजगारी’कवितामे प्रस्तुत कएलनि अछि-
“बेरोजगारसँदेशभरलछै
बौसबिनाकंगालबनलछै।
तैबीचरोजगारेहेराएल
तमसगीरतमाशादेखरहलछै।”
लोक निराश भऽअपन भाग्यकेँ कोसैत हारल-थाकल भेल पड़ल अछि।
पलायनवादी सोचक लोकजे लोक छथि, जनिक व्यवहार किछु आर उद्देश्य किछु आर तथा बजैत छथि किछु आर, ओहन व्यक्ति लेल कवि कहैत छथि-
“गामकमाटिकजँदशाएहेन
मिथिलाराजकेहेनहेतइ।
बाहरे-बाहरकसुसकारीसँ
गहुमनकबीखकेनाझड़तै।
विचारइमानककेकराकहबै
खोलिदेखूमातृकोष।
अपने-आपप्रश्नपुछि
विचारकरूसम्हारिहोश।”
वैचारिक दौरमे सभ कियो तँ नीक्के चाहैत छी नीक्के बजैत छीमुदा दुनियॉंक बीच अपन स्थिति किए एहन अछि? एहन प्रश्नकेँ कवि एहि रूपेँ ठाढ़ करैत छथि-
“सभछीशुभचिन्तकदेशेक
सभविचारकसंगनेताकी।
मुसहरबीचमूसहेराहेराएल
धीया-पुताकाल्हिखेतैकी?”
आगू कहैत छथि दिशाहीन रोजगार बनल छैक, रंग-बिरंगक दुनियॉं बनल छैक-
“दिशाहीनरोजगारबनलछै
रंग-बिरंगदुनियाँबनलछै।
केतौपेन्शनधारीकरोजगार
तँकेतौकरैबलापड़लछै।”
अपनदुख-दरदभायजाधैरअपनेनइबुझब।ताधरिकेनापाबिसकैछीनीकभविष्यकनीकसोचब।निच्चाँ-ऊपरसभबजैए-
“किसानेकदेशभारतछी
कटि-मरिकिसानेसभ
अँग्रेजोकेँभगौनेछी।
जरि-उजैरकेतेगाम
केतेलोकप्राणचढ़ौलक
पैंसैठबर्खकआजादीकी
पेटोकदुखमेटोलक।
जहिनाआजादीसँपहिने
चुसलकखूनराजा-रजवार।
तहिनातँआइयोहोइए
चुसैएदेशी-विदेशीकरखन्नादार।”
टुटैतजिनगीकबेथाघुमिपाछूदेखएपड़त।सैयौनहि,हजारोबर्खनहि,जड़िएसँदेखएपड़त-
“पाँचहजारबर्खकपुराण
हँसि-हँसिबाजिरहलअछि।
सुर-असुर, दानव-देवताक
ऐतिहासिकगाथासुनारहलअछि।
लगभगपौनेदूसाएबर्खपहिने
अँग्रेजआबिआसनजमौलक।”
जेकराभगितेऐठामकजन-गणआजादीकसाँसलेलक।मुदाएतबेनहि, कनेआगूचलू।हजारबर्षकीकहैए। चारूदिसभजारि-भजारि, तेकरापुछियौविवेकसँनिर्णयकीकरैए-
“स्वर्णिमइतिहासकस्वर्णकाल
ओझुकेभारतछलतहियो।
निचोड़ि-निचोड़ि, तर्क-वितर्क
निर्णयनिरमाबएपड़तआइयो।
निर्णयनिरमाबए...।”
बीतल बर्खक विदाइ दैत अन्तिम सत्कार सुनबैत कहैत छथि-
“अन्तिमसत्कारसुनूशिकारी
अन्तिमदिनकहैछी।
अन्तिमबातसुना-सुना
अन्तिमसत्कारकरैछी।
हँसैतरहूसदैतअहाँ
हमरोतँजीबएदिअ।
सभकिछुतँलैएलेलौं
एतबोतँबाजएदिअ।”
प्रस्तुत पोथीमे कवि ‘बाढ़िक सनेस’ सँ लऽ ‘ऐ पढ़बसँ मुरखे रहितौं’ धरिक शीर्षक मध्य 40 गोट रचनाक समायोजन कयने छथि। क्रमश: सभ रचनाक शीर्षक निम्नांकित अछि-
‘बाढ़िक सनेस’,‘अगो-लोढ़ा’,‘हथियाक झटकी’, ‘रहसा चौरी’,‘बेरोजगारी’,‘लीढ़ी पोखैर’,‘बकरी भेराड़ी’,‘महगी’,‘जरनबिछनी’,‘नव-फल’,‘पू-भर’,‘चौरीक धनकटनी’,‘किसान’,‘टुटैत जिनगी’,‘कविता’,‘बुड़िबकी’,‘गाछी भुताह’,‘वोनक आगि’,‘बीतल बर्खक विदाइ’,‘संगी’,‘बेथा’,‘धब्बा’,‘पितृपक्षक भोज’,‘ठनका’,‘झपासा’,‘शिवचरन’,‘चौरचनक छाँछी’,‘भरदुतिया’,‘फुसि’,‘चिक्कैन माटि’,‘झारू-बाढ़ैन’,‘मेवाक फल’,‘चपरासी भाय’,‘नोत’,‘लटुआ’,‘एकैसम सदीक देश’,‘मधुमाछी’,‘जुआनी’,‘तरंग’,‘ऐ पढ़बसँ मुरखे रहितौं।’
‘रहसा चौरी’ नामक एहि पोथीक आमुख डॉ. शिव कुमार प्रसाद, विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, एच.पी.एस. कॉलेज- निर्मली (सुपौल)लिखने छथि। ओहि आमुखमे रचनाकार- कविक सन्दर्भमे डॉ. प्रसाद कहैत छथि- “मैथिलीकसशक्तरचनाकारजगदीशप्रसादमण्डलजीमिथिलाकमाटि-पानिकरचनाकरछैथ।हिनकसभविधामेमिथिलाकमाटिपहिलपात्रकरूपमेअभरैतअछि।कथा,उपन्यास, नाटक, कविताआदिमेहिनकगाम, गामकमाटि, गामकलोक, बाड़ी-झाड़ी, खेत-खरिहॉंन, कलम-बँसबिट्टी, पाबैन-तिहार, माय, काकी, बाबी, बिधवा, सधवा, नचारइत्यादिकेँहमसहजेदेखसकैछी।हुनकहँसी-खुशी, वियोग-व्यथा, झगड़ा-झंझट, मुड़ण-उपनैन, बिआह-दुरागमन, मरण-हरणसभसमाजिक, पारिवारिक, आर्थिकतथामनोवैज्ञानिकभावकअभिव्यक्तिमण्डलजीकविविधविधामेविद्यमानछैन।आधुनिकजिनगीकछल-छद्मआ‘हमपीरमियॉंकभाव-बोधसँदूरकिसानीजिनगीजीबैतगतबीसबर्खमेसाएसँअधिकपोथीकप्रकाशनभऽचुकलछैन।”