उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गामक जिनगी’
‘गामक जिनगी’ एक पोथीक नाओं थिक। एहि पोथीक लेखक छथिश्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी। मण्डलजीक ई पहिल कथा संग्रह छियनि। एहिमे 19 गोट कथा संग्रहित अछि।
भैंटक लावा कथासँ एहि संग्रहक आरम्भ भेल अछि। एहि कथाकेँमण्डलजी 2004 इस्वीमे लिखलन्हि। पुस्तकाकार रूपमे पोथीक पहिल संस्करण, श्रुति प्रकाशन- नई दिल्लीसँ 2009 इस्वीमे प्रकाशित भेल छन्हि। प्रसिद्ध ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर आ डॉ. सुभाष चन्द्र यादवजी एहि पोथीक आमुखकार छथि। कथा एवं कथाकारक विषयमे लिखने छथि-
“वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कथा भिन्न अछि। कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। मण्डलजीजीवनमे प्राप्य जिजीविषा, मानवीयता एवं आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनर्प्रष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्राणित छथि।”
लेखक मिथिलाक वृन्दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनिहार तथा नव विहान अननिहारलेल एहि पोथीकेँ समर्पित कयने छथि।
‘गामक जिनगी’ पोथीकलोकार्पण प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’क70म कथा गोष्ठी, कबिलपुर, दरभंगामे, 12.06.2010क डॉ. श्रीमती कमला चौधरी, प्रसिद्ध लेखिका एवम् मैथिली विभागाध्यक्ष, बी.आर.ए.बी.यू. मुजफ्फरपुर द्वारा भेल अछि। वर्तमानमे पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल),सँ एहि पोथीक अग्रिम संस्करण सेहो उपलब्ध अछि।
मैथिली साहित्यक एकल पुरस्कार- ‘टैगोर साहित्य पुरस्कार’ एवम् पहिल ‘विदेह साहित्य सम्मान’सँ एही पोथीपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ सम्मानित कएल गेल छन्हि।
गामक जिनगी’ पोथीक अन्तिम पृष्ठपर ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षित ई-पत्रिकाक सम्पदकश्री गजेन्द्र ठाकुरजी लिखलन्हि अछि-
“१९४२-४३क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइला (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओइमे नै भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाएल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ ऐ विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, तइ कारणसँ अमर्त्य सेन जकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओत्ते प्रभावित नै भेल हेता। आ एतऽ जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैए।”
‘गामक जिनगी’ कथा संग्रहक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकार श्री मन्त्रेश्वर झा लिखने छथि- “गामकजिनगीकसभकथाग्राम्यजीवनकेँकिछुअनछुअलप्रसंगकेँमार्मिकचित्रणकरैतअछि।”
प्रस्तुत पोथीमे 19 गोट कथाकेँ कथाकार समायोजित कयने छथि। शब्द संख्या सहित सभ कथा-लेखनक विवरण क्रमानुसार निम्नांकित अछि-
1. भैंटक लावा- शब्द संख्या :3100
2. बिसाँढ़- शब्द संख्या :2516
3. पीरारक फड़- शब्द संख्या :2064
4. अनेरुआ बेटा- शब्द संख्या :3369
5. दूटा पाइ- शब्द संख्या :3294
6. बोनिहारिन मरनी- शब्द संख्या :3412
7. हारि-जीत- शब्द संख्या :2373
8. ठेलाबला- शब्द संख्या :2572
9. जीविका- शब्द संख्या :3655
10. रिक्साबला- शब्द संख्या :3963
11. चुनवाली- शब्द संख्या :2452
12. डीहक बटबारा- शब्द संख्या :4789
13. भैयारी- शब्द संख्या :4026
14. बहिन- शब्द संख्या :2688
15. घरदेखिया- शब्द संख्या :4021
16. पछताबा- शब्द संख्या :2663
17. डाक्टर हेमन्त- शब्द संख्या :4407
18. बाबी- शब्द संख्या :2167
19. कामिनी- शब्द संख्या :2289
‘भैंटक लावा’, कथाकेँ 3100 शब्दमे कथाकार लिखने छथि। कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल मिथिलाक गाममे रहैत छथि। मिथिलाक बहुसंख्य लोकक जीवन कृषि कार्यपर निर्भर अछि। मण्डलजी सेहो किसान छथि, हिनकहु जीविकोपार्जन कृषि छियन्हि। अत: ई अपन पहिल कथा लिखलनि ‘भैंटक लावा’, जाहिमे मिथिलाक किसान-मजूदरक सभसँ पैघ समस्याकेँ चिह्नित कएल गेल अछि। सभकियो जनैत छी जे सभदिनसँ मिथिलांचल बाढ़ि-रौदीक चपेटमे पड़ैत रहल अछि। एहिठाम जहिना रंग-रंगक बाढ़िक रूप अछि, माने बाढ़िक एकरूपता नहि अछि तहिना रंग-रंगक रौदी सेहो अछि। अर्थात् जहिना बाढ़ि नम्हरो होइए आ छोटो होइए तहिना रौदीक सेहो अछि। रामायणिक हिसाबसँ रौदी बारह वर्ष धरिक भेल अछि। किएक तँ बारह वर्षक रौदीक पछाति राजा जनकजी हर जोतने छलाह जाहिमे सीताक जन्म भेल छलन्हि। मिथिलांचलमे अनेको तरहक पहाड़ी नदी सभ बहि रहल अछि। संख्याक हिसाबे करीब दू दर्जन धार (नदी) अछि जे मिथिलाक भूभागमे उत्तरसँ प्रवेश करैत दच्छिन मुहेँ बहि रहल अछि। जाहिमे किछु वरसाती धार अछि बॉंकी अधिकतर धार बारहो मास बहैबला अछि। अर्थात् जहिना बाढ़ि मिथिलांचलक किसानकेँ तोड़ैत रहल अछि तहिना रौदी सेहो किसानक जिनगीकेँ तबाह करैत रहल अछि। जाहिसँ एहिठामक किसानक उन्नैतिक दिशा अवरूद्ध भेल पड़ल अछि। मुदा किछु-किछु ओहन लोक एखनहुँ छथिए जे लाख समस्याक बावजूदो अपन किसानी संस्कृतिकेँ पकड़ि चलि रहला अछि।
प्रस्तुत कथा- ‘भैंटक लावा’क लेखन कथाकार 1987 इस्वीक बाढ़िक रूप-रंगकेँ अपना आँखिसँ देखि कऽ कयने छथि। तँए, बाढ़िक एतेक सजीव चित्रण कथाकार कयने छथि। ओ कहैत छथि- “पैछला बाढ़ि मोन पड़िते देह भुटैक जाइए। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइए। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैए। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रूप बना नृत्य करैत। केकरा कहूँ बड़की धार आ केकरा कहूँ छोटकी, सभ अपन-अपन चीन-पहचीन मेटा समुद्र जकाँ बनि गेल। जेमहर देखू तेमहर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दच्छिन-मुहेँ दौगल जाइत। केतेक गाम-घर पजेबाक नइ रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखैर, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल। एहेन भयंकर दृश्य देख लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नइ भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भँसल। जेहने दुरगैत घरक तेहने गाइयो-महींस, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक।”
प्रस्तुत कथा मुसना आ जीबछीक माध्यमसँ गढ़ल गेल अछि। मुसना आ जीबछी ओहन परिवारक अछि जकरा सम्पतिक नामपर किछु ने छैक। मात्र अपन हूनरअर्थात्लूरि आ श्रम करैक शक्तिटा छैक। जाहिक बले मुसना आ जीबछी जीवन-यापन करैए। दुर्कालकचलते गामक कतेको लोक आन-आनठाम जा कऽ जीवन-यापनक जोगार करैए मुदा मुसना दुनू परानी गामहिमे रहि अपन भोजनक जोगार ताकि लइए। ई कथाकारक खास विशेषता छन्हि। जे हिनकर पात्र कोनहुँ स्थितिमे भटकैत नहि अछि। एहि प्रसंगमे प्रसिद्ध आलोचक डॉ योगानन्द झा लिखने छथि- ‘मिथिलामे उपलब्ध प्राकृतिक उपादानक उपयोगितापर विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। बाढ़ि आ सुखारसँ पीड़ित मिथिलाक जनसमुदाय अपन जीवन रक्षाक हेतु कोन तरहेँ भैँट, बिसाँढ़, पीरार आदिकेँ अपन मेहनतिक बलेँ खाद्य पदार्थक रूपमे ग्रहन करैत रहल अछि तथा एहिठामक प्राकृतिक संसाधनक उपयोग द्वारा कोना मिथिलाक भूखमरी ओ बेरोजगारीकेँ दूर कएल जा सकैछ, एकर आर्थिक विकास कएल जा सकैछ तकर चित्र एहि तीनू कथामे भेटैत अछि। श्रमपर विश्वास, इमानदार प्रयास, कर्मण्यता ओ चातुर्यक संबलसँ विपन्नतापर विजयक ई गाथा सभ मिथिलाक लोकजीवनमे व्याप्त उत्साह ओ संघर्षक मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करैत अछि।
कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी प्रस्तुत कथामे समाजक अन्तिम व्यक्तिकेँ अगुआ माने ओहन पात्रकेँ आगाँ आनि निराशाक जीवनसँ निकालि आशावान बना जीवनक चर्च कयने छथि, जकरा अपना किछु ने छैक।
2. ‘बिसाँढ़’कथा गामक जिनगी संग्रहक दोसर कथा थिक। एहि कथाकेँ 2516 शब्दमे लिखल गेल अछि।एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार रौदीक विषद चर्च कयने छथि। जहिना रंग-रंगक बाढ़ि होइएमाने छोटो, मध्यमो आ नम्हरो होइए तहिना रौदी सेहो रंग-रंगक होइए। एहनो रौदी होइए जे एक मौसममे माने वरसातक मौसममे मौनसूनी वर्षा नहि भेने सालक बारहो मासकेँ प्रभावित करैए तँ एहनो रौदी होइते अछि जे दू-साल-तीन-साल धरिकेँ प्रभावित करैबला होइए। जहिना बंगालक 1942 इस्वीक रौदी छल तहिना बिहारमे 1966-67 इस्वीक रौदी सेहो भेल। जाहिसँ मिथिलांचलक किसाने टा प्रभावित नहि भेलाह, किसानक संग बोनिहारो आ मालो-जाल, गाछो-बिरीछ आ चिड़ैयो-चुनमुनी प्रभावित भेबे कएल। बहुतो किस्मक चिड़ै-चुनमुनीक उपटान भऽ गेल। तहिना गाम-गामक मालो-जाल आ गाछो-बिरीछ सुखि गेल जाहिसँ इलाकाक (मिथिलांचलक) चेहरा कुरुप भऽ गेल।
प्रस्तुत कथामे कथाकार डोमन आ सुगियाक चर्च कयने छथि।एहि दुनू व्यक्तिक माध्यमसँ रौदीक विषद चर्च करैत कथाकार निराशासँ भरल जिनगीकेँ आशावान बनौलन्हि अछि। कथाकार एक दिसि रौदी-सुखारसँ त्रस्त भऽ गामक लोक ढाका, दिनाजपुरओ मोरंग आदि स्थानपर जा अपन जीविकोपार्जनक तालाश करैबला लोकक चर्चा कएलन्हि अछि तँ दोसर दिसि डोमन ओ सुगियाकेँ गामहिमे रहबाक आ सुगियाक मनक विश्वासक चर्च सेहो कएलन्हि अछि- “जे भगवान जन्म देलैन आ मुँह चीरने छैथ, अहारो तँ वहए ने देता।”
तथा ओ रास्ता तखन साफ भऽ जाइत अछि जखन डोमनकेँ मोन पड़ैत छन्हि जे जहिना माटिक तरमे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ रहै छैक तहिना पुरैनक जड़िमे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनासुरती मुहसँ निकललै-
“बाप रे! बाबन बीघाक पोखैरमे तँ केते-ने-केते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनैमे माछो भेटत।”
एक पंथ दू काज। मनमे खुशी अबिते डोमन हाक पाड़ि अपन पत्नीकेँ कहलन्हि- “भगवान बड़ीटा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीव-जन्तुकेँ जन्म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।”
श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एहि ‘बिसाँढ़’ कथाकेँ लेखन-बिम्बपर ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षित ई-पत्रिकाक सम्पदाक, गजेन्द्र ठाकुरजीअपन ‘प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना’ (भाग-२) मे लिखलन्हि अछि-
“१९४२-४३क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइला (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओइमे नै भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाएल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ ऐ विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, तइ कारणसँ अमर्त्य सेन जकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओत्ते प्रभावित नै भेल हेता। आ एतऽ जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैए।”
एहि कथाक प्रसंगमे समीक्षक शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ अपन पोथी- ‘अंशु’ नामक प्रबन्ध-निबन्धमे लिखने छथि-
“बिसाँढ़ कथाक इतिश्री सुखारक मध्य एहेन फलक शोधक रूपमे कएल गेल जकरा विषयमे बहुत कम लोक सोचने हेताह।”
बिसाँढ़ पुरनि (कमलफूल) गाछक जड़िक सीरमे फड़ैए। जकरा लोक खाइए। ओही बिसाँढ़केँ खा डोमन आ सुगिया रौदीसँ अपन त्राण पबैए।
3. ‘पीरारक फड़’, ई कथा ‘गामक जिनगी’क तेसर कथा थिक। एहि कथाकेँ लगभग 2064 शब्दमे कथाकार गढ़लन्हि अछि। अहू कथामे ओहन लोकक जिनगीकेँ कथाकार सोझमे अनलन्हि अछि जकरा देहक अलावा किछु ने छैक। पिचकुन आ धनिया दुनू परानी पीरारक फड़ आ अनेरूआ माछसँ अपन आर्थिक तंगीकेँ दूर करैत अछि आ जीवनमे सभ किछु जोड़बाक प्रयास सेहो करैत अछि। कथाकेँ पढ़लापर बुझना जाइत अछि जे वास्तवमे प्रकृति अनेको चीज ओहन मनुक्ख लेल उपलब्ध कराओने अछि जकरासँ पाबि मनुक्ख जीवन जीवि सकैए। मुदा मनुक्ख स्वयं ओहन-ओहन चीजसँ बिमुख अछि।
एकटा पीरारक गाछक प्रति कथाकारक जे नजरि छन्हि आ ओकर जे वास्तविक रूप अपना एहिठाम छैक तकरा देखल जाए- “एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोरि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकैड़-छुकैड़ गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोल्होअना देखभाल भगवानेक ऊपर। तँए पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे केकरो एहसान रूपी कर्ज जिनगीमे नै लेलौं। हरिदम पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झूमैत...। पहिने पाँचो गाछक फूल फुला फड़ बनि झड़ि जाइत, पछाइत फड़ पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अन्तिम अवस्थामे आबि पवन रूपी नौतहारीकेँ पठा चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा-बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धरम रहल।
...ओइ गाछसँ हटिए कऽ लोक अपन खेतक जोत-कोर आदि करैत जे ओइ गाछपर सुगबा साँप रहैए। सुगबा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छै किएक तँ ओ हरिअर-लत्ती जकाँ होइए। जेकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइ छइ। बीचमे केतौ कोनो रूकाबट नै होइए।”
सम्पूर्ण कथाकेँ पढ़लापर स्वत: भान होइत अछि जे जौं मनुक्ख लगनसँ कार्य करय तँ सभ किछु सम्भव छैक। एहि कथाक पात्रसभ अछि- धनियाँ, पिचकुन, मुनेसरीआ सोमनी दादी।
4. ‘अनेरुआ बेटा’, 3369 शब्दक कथा अछि। गरीब गृहस्त परिवारक कथा थिक। लगभग पचास वर्षक सन्तानहीन गंगाराम एहि कथाक पात्र अछि। गंगाराम हाटसँ अबैकाल जखन एकटा जनमौटी अनेरूआ बच्चाकेँ सड़कक कातमे फेकल देखि कोरामे लऽ कऽ घर अबैत अछि आ घरवालीकेँ कहैत छैक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि।” तँ अनायास दुनू परानीक बीच प्रसन्नताक माहौल बनि जाइत अछि। क्रमश: ओइ बच्चाकेँ अपन बेटा जकाँ पोसए-पालए लागल। ओहि बच्चाक नाओं ‘मंगल’ राखल जाइत अछि। आर्थिक विपन्नताक कारणे मंगल चाहक दोकान खोलि लैत अछि। दोकानदारीक संग मंगल अपन पढ़ाइ सेहो करैत अछि। अपन जीवनक अन्तिम समयमे गंगाराम अक्षरस: मंगलकेँ ओकर जन्मक सभ बात सुना देने रहैक। मंगल किताबक संग-संग समाजक बेबहारक अध्ययन सेहो करय लागल। पछाति मंगल एकटा उपन्यास लिखैत अछि, जकर शीर्षक अछि ‘मरल गाम’, जाहि सम्बन्धमे एक गोट पत्रकार मंगलक बात सुनैत छथि आ ओकरा छापि दैत छथिन। मंगल द्वारा लिखित ‘मरल गाम’क विषयमे सुनि सुनयना नामक एकटा पढ़ल-लिखल नायिका मंगल लग अबैत छथि आ मंगलक प्रतिभासँ प्रभावित भऽ अपन वकील पितासँ दलील दऽ मंगलसँ विवाह करय लेल पिताक सोझमे प्रस्ताव रखैत छथि।
एहि कथामे कुल सात गोट पात्र अछि-1. गंगाराम, 2. भुलिया, 3. कबुतरी, 4. मंगल, 5. सम्पादक, 6. सुनयना, 7. ओकील साहैब।