विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बजन्ता-बुझन्ता’

उमेश मण्डल · 2020-02-15 · अंक 292

उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बजन्ता-बुझन्ता’
बजन्ता-बुझन्ता (2013) :प्रस्तुत पोथी कथाकारक द्वितीय बीहैन कथा-संग्रह थिक। एहि पोथीक पहिल संस्करण; श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ 2013 ईस्वीमे प्रकाशित भेल अछि। 30.11.2013क शनि दिन 80म कथा गोष्ठी- निर्मलीमे अनुमण्डल पदाधिकारी श्री अरूण कुमार सिंहजीक, डॉ. बचेश्वर झा, डॉ. रामाशीष सिंह, प्रो. धीरेन्द्र कुमार, श्री रामजी प्रसाद मण्डल, डॉ. अशोक अविचल आदि विद्वानक संग कथाकार जगदीश प्रसाद मण्डलजीक समक्ष एहि पोथीक लोकार्पण भेल अछि। पछाति, पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल)सँ सेहो अग्रिम संस्करण प्रकाशित होइत रहल; वर्तमानमे चारिम संस्करण (2018) उपलब्ध अछि।
प्रस्तुत संग्रहक प्रत्येक कथा अलग-अलग सामाजिक मुद्दाकेँ लए कऽ बुनल गेल अछि। आजुक परिवेशमे भऽ रहल सामाजिक परिवर्तन ओ उथल-पुथलकेँ एहि संग्रहक सभ कथा किछु-ने-किछु रेखांकित करैत अछि। कहल जा सकैछ,‘बजन्ता-बुझन्ता’ व्यक्तिगत ओ सामाजिक स्तरपर भऽ रहल उथल-पुथलक एकटा दस्तावेज थिक।
एहि संग्रहमे 68 गोट बीहैन कथा (Seed Stories) आएल अछि। क्रमश: सभ कथाक शीर्षक निम्नांकित अछि- ‘कचोट’,‘काँच सूत’,‘बुधनी दादी’,‘खि‍लतोड़’,‘मुँह-कान’,‘अनदिना’,‘अपन काज’,‘दूरी’,‘पुरनी भौजी’,‘छुटि गेल’,‘काल्हि‍ दिन’,‘अप्पन हारि’,‘कनफुसकी’,‘मुँहक बात मुहेँमे’,‘कनीटा बात’,‘गति-गुद्दा’,‘बिसवास’,‘कचहरिया भाय’,‘गोहाइर’,‘शिवजीक डाक-बाक्’,‘सोग’,‘पनचैती’,‘कनमन’,‘अजाति’,‘पटोर’,‘फुसि‍याह’,‘गति-मुक्‍ति’,‘चौकीदारी’,‘झगड़ाउ-झोटैला’,‘घबाह ट्यूशन’,‘दादी-माँ’,‘पटोटन’,‘मुसाइ पण्‍डित’,‘भरमे-सरम’,‘देखल दिन’,‘फज्झैत’,‘अकास दीप’,‘बुधि-बधिया’,‘पहाड़क बेथा’,‘उमकी’,‘बजन्‍ता-बुझन्‍ता’,‘चर्मरोग’,‘शंका’,‘ओसार’,‘छोटका काका’,‘सीमा-सरहद’,‘रमैत जोगी बोहैत पानि’,‘गंजन’,‘सजए’,‘घटक बाबा’,‘आने जकाँ’,‘दान-दछिना’,‘उड़हैड़’,‘मत्हानि’,‘मेकचो’,‘झुटका विदाइ’,‘मुँहक खतियान’,‘कोसलिया’,‘हूसि‍ गेल’,‘पोखला कटहर’,‘सरही सौबजा’,‘तेरहो करम’,‘डुमैत जिनगी’,‘चोर-सि‍पाही’,‘दूधबला’,‘टाइपि‍स्ट’,‘समदाही’ आ अन्तिम कथा अछि- ‘बुढ़ि‍या दादी।’
20 गोट कथाक सामान्य अर्थ प्रस्तुत कएल जा रहल अछि। संग्रह पहिल कथा थिक‘कचोट’,एहि कथामे कथाकार स्वयं एक पात्र छथि आ दोसर पात्र छथि दिनेश। एहि कथामे मध्यम वर्गक मजबुरीकेँ हू-ब-हू देखाओल गेल अछि। ओहन परिवारमे पढ़बाक-लिखबाक इच्छा रहितो विद्यार्थीकेँ जीवन-यापन सम्बन्धी आन-आन काजक मजबूरीमे कोना बाझल रहए पड़ैत छैक, जाहि कारणे स्कूल नहि जा पबैत अछि।तकर नीक चित्रण एहि कथामे दिनेशक माध्यमसँ कथाकार कएलनि अछि।
2. ‘काँच सूत’, कथामे दू जातिक मित्रमे छोट-छीन बात लऽ कऽ आपसी मत-भिन्नताकेँ देखार करैत कथाकार एहि कथामे देखौलन्हि अछि जे एकठाम रहबाक कारणे दू जातिक लोकमे भिन्नता तँ अछि मुदा ओ काँच सूतमे बान्हल अछि जे कखनहुँ टुटि सकैए।
3. ‘बुधनी दादी’, कथामे कथाकार गामक बुढ़-बुजुर्गक दशाकेँ देखेबाक प्रयास कएलनि अछि। धिया-पुता बाहर कमा रहल छन्हि आ ओ बुढ़-बुजुर्ग सभ किछु अछैत असगरूआ जीवन जीबाक लेल अभिशप्त छथि। बुधनी दादी बजलीह- “बुच्ची, जीबैक मन होइए मुदा तेहेन-तेहेन आपैत-विपैत सभ अछि जे होइए तइसँ नीक भरमे-सरमे मरि जाइ।”
4. ‘खिलतोड़’,कथाक माध्यमसँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसैद्धान्तिक ज्ञान ओ प्रायोगिक ज्ञानक बीचक अन्तरकेँ बुझेबाक प्रयास कएलनि अछि। संगहि आधुनिक शिक्षा आ ज्ञान प्राप्त केनिहार लोकमे प्रायोगिक ज्ञानक कमी कोन तरहेँ व्याप्त अछि तकरा सेहो एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार चिह्नित कएलनि अछि। एहि कथामे दू गोट पात्र अछि- 1. दिनानाथ, 2. दयाकान्त।
5. ‘मुँह-कान’, कथामे आजुक आर्थिक युगमे कर्जाक चक्रव्यूहमे फँसैत लोकक दशाक वर्णन भेल अछि। सुनरलालआमनधन काका नामक पात्रक बीच एहि कथाकेँ गढ़ि कथाकार इशारा कएलनि अछि जे आर्थिक युगमे कर्जा लेब तँ आसान अछि, मुदा ओकरा वापस करब कठिन किएक भऽ जाइत अछि।
6. ‘अनदिना’, अनदिना कथा आजुक शिक्षा-व्यवस्थाक दुर्दशाक उद्धघाटित करैत अछि। एक तँ स्कूल सभ शिक्षक विहीन अछि आ जे शिक्षक छथियो, हुनकासँ पढ़ाइ-लिखाइसँ बेसी आन-आन काज लेल जाइत अछि, जाहिसँ पढ़ाइ-लिखाइ रसातलमे जा रहल अछि। चहुतरफा ह्रास एकर उदाहरण थिक। रामकिसुन आ अमरनाथ मास्टर साहैब, एहि दू पात्रक बीच कथाकेँ गढ़ल गेल अछि। रामकिसुन कहलकन्हि- “होउ, अहीं सबहक जुग-जमाना छी, जे काटब से काटि लिअ।” रामकिसुनक ‘काटब’ सुनि अमरनाथ अह्लादित होइत बजला- “ठीके ने अहाँ कहै छी। अपना सभकेँ जे सभसँ छोटका दिन अछि, ओइमे कथीक छुट्टी होइए से बुझल अछि?”, रामकिसुन बजलाह- “नहि।” मास्टर साहैब कहलखिन- “बड़ा दिनक!”
7. ‘अपन काज’, कथाकेँ भोला आ कपलेसर नामक दू पात्रक बीच गढ़ल गेल अछि। अपना एहिठामक खेती-बाड़ीक बदलैत परिदृश्यक जीवन्त वर्णन एहि कथामे कएल गेल अछि। किसान पारम्परिक खेती छोड़ि व्यवसायिक खेती दिसि बढ़ि तँ रहल अछि, बढ़ाओलो जा रहल छैक, नीक बात, मुदा ताहि लेल ज्ञानसँ वंचित रहबाक वा रखबाक स्थिति सेहो व्याप्त अछि। ताहू तरफ कथाकार इशारा कएलनि अछि।
8. ‘दूरी’, कथामे बाबा-आ पोताक बीच वार्तालापसँ पति-पत्नीक बीचक नाजुक सम्बन्धक झलक देखाओल गेल अछि। एहि कथामे ई बताओल गेल अछि जे दू अलग-अलग माहौलमे पलल-बढ़ल पुरुख आ स्त्री बीच एहन दूरी रहितो कोना एकहिठाम रहैत अछि।
9. ‘पुरनी भौजी’, एहि कथामे गामक जिनगीक बीच पोता-पोतीक संग एकटा दादी केर दुलार-मलाड़क वर्णन कथाकार कयने छथि। दादी लेल दस बर्खक पोताक प्रश्न- ‘मीरा माने की भेल, दाय’ सँकथाक अन्त होइत अछि। एहि प्रश्नक माध्यमसँ कथाकार इशारा कएलनि अछि जे कोना ज्ञानक सहजता प्रभावित भेल जा रहल अछि।
10. ‘छुटि गेल’, कथाकेँ सावित्रीआ काशीनाथ नामक पात्रक बीच कथाकार मण्डलजी गढ़ने छथि। एक दिसि तँ छोट बच्चीक बाल-सुलभ वार्त्ता छैक, जे अपन बाबा दिया लोकक बजनाइ अपना बाबाकेँ सुना रहल छै, तँ दोसर दिसि बाबाक आत्मज्ञानक वर्णन अछि जे गरियाएब छोड़ि देलखिन्ह। “अबै छेलौं तँ अहाँ-दे लोक सभ बजै छला जे ओ आब केकरो नै गरियबै छथिन।” …गारिक नाओं सुनि सावित्रीकेँ अनुकूल बनबैत काशीनाथ कहलखिन- “बुच्ची, केतेकेँ गरियाएब। अपने मुँह दुखा जाइए। छोड़ि देलिऐ तँए छुटि गेल।”
11. ‘काल्हि दिन’, कथामे कथाकारस्वयं दुनू परानी पात्र छथि। कथाकार एहि कथाक माध्यमसँई बतेबाक प्रयास कएलनि अछि जे छुद्र कारणेँ दूटा गाम अपनहि भीड़ जाइए, लड़ि जाइए। तकर फलाफल नुकसान होइत छैक, जे कतेको लोककेँ व्यक्तिगत आ सामाजिक स्तरपर सेहो भुगतए पड़ैत छैक। कथाकार पत्नीकेँ कहलखिन- “पैछला सालक भोँट दिन की भेलै से अखनो ने बुझै छी। एतबे देखै छी जे दुनू गामक बीच खूब मारि भेल। दुनू गामक लोक झोरा लऽ लऽ कोट-कचहरी करैए। चाहे जेकर गोटी लाल होइ तइसँ हमरा कोन मतलब। छगुन्तामे पड़ल छी जे मारि केलक कोइ, रोजी-रोटी हमर केना छीना गेल, एकठाम रहितो दुनू गामक आबा-जाही किए बन्न भऽ गेल? अपना खेत-पथार अछि जे अपने आगिए-पानियेँ निमहब!”
12. ‘अप्पन हारि’, कथामे कथाकार स्वयं पति-पत्नीक बीचक सम्बन्ध आ धिया-पुताक प्रति माए-बापक व्यवहारक वर्णन कयने छथि। कथाकार बहुत अल्पहि शब्दमे व्यवहारक पूर्ण विवरण प्रस्तुत कएलनि अछि।
32. ‘कनफुसकी’, कथामे गामक दू व्यक्तिक बीच दोस्ती आ ओहि दोस्तीमे नुकाएल अविश्वासकेँ रेखांकन भेल अछि। पहिल व्यक्ति सोहन नामक नवयुवक आ दोसर स्वयं कथाकार एहि कथाक पात्र रूपमे उपस्थित भेल छथि। जे दोस्तीमे नुकाएल नीक-बेजा केर छोट-छीन आलेख सदृश प्रस्तुत करबामे सफल भेल छथि।
13. ‘समदाही’,कथाक माध्यमसँ कथाकार दूटा पत्नी राखैबला लोकक केहन दुर्दशा होइत छै आ ओ कोना दॉंत तरक जीह जकॉं जीबैत अछि, तकर सटीक वर्णन करैत ओकरापर आक्षेप सेहो कएलनि अछि।
14. ‘मुँहक बात मुहेँमे’,कथामे दू गोट पात्र अछि पहिल- बहिरा माएआ दोसर घटक। कथाकार एहि कथामे एकटा माइक वारदुताकेँ देखेबाक प्रयास कएलनि अछि। संगहि गाम-घरमे अजीब आ अजगुत नाओं रखबाक प्रथा दिसि सेहो ध्यान आकृष्ट करयबाक भरपूर प्रयास कएलनि अछि।
15. ‘कनीटा बात’ कथामे विश्वासघातक परिणामकेँ रेखांकित कएल गेल अछि। कथाकार आ पढ़ुआ काका एहि कथाक पात्र छथि। बहुत कम शब्दमे पैघ गप्प रखबाक कलाक प्रदर्शन सेहो एहि कथामे कथाकार कएलनि अछि।
16. ‘गति-गुद्दा’, कथामे दू गोट पात्र अछि, पहिल सुखदेव आ दोसर खुशीलाल बाबा। ई कथा वर्तमान समयमे जे गामक किसानक दुर्दशाक अछि, तकर छोट-छीन दस्तावेज सदृश अछि।
सोलह वर्षपर आएल सुखदेवकेँ अपन हाल-चाल खुशीलाल बाबा सुनबैत छथि- “बौआ, ऐठामक गिरहस्तकेँ कोनो गति-गुद्दा अछि। धार माटि दुइर कऽ देलक! कोसी नहर ठीकेदार खा गेल! मौनसूनी बर्खाकेँ रौदी खा गेल! की कहबह..!” एहि कथामे कथाकार ईहो कहबामे पाछू नहि रहला जे खेती-बाड़ी छोड़ि गामसँ शहर पलायन कए नौकरी-चाकरी करैबला लोक आर्थिक रूपेँ किसानसँ बेसी नीक स्थानपर छथि।
17. ‘बिसवास’, कथाक माध्यमसँ कथाकार सम्बन्धक बीचक माया आ ममताकेँ नीक रेखाचित्र खींचलनि अछि। एकटा डॉक्टर जे पूरा दुनियॉंक रोगीक ऑपरेशन करैत अछिओ अपन सखा-सम्बन्धीक ऑपरेशन नहि कए सकैत अछि, किएक तँ शल्य-क्रियाक दौरान माया आ ममताक कारणे छाती दहलि सकैत छन्हि। ई सन्देह डॉक्टर परमेसरकजेठ भाय भागेसरकेँ भेलनि तँए ओ अपन भाएसँ ऑपरेशन नहि करा दोसर डॉक्टरसँ करबौलनि। पुछलापर कहबो केलखिन-
“बौआ, अहाँ साधारण श्रेणीक लोक नइ छी जे किछु कहि देब। दू रूपमे ज्ञान काज करै छइ। गुण आ निर्गुण। अहाँ छोट भाए छी, जखन पेट काटितौं तखन छाती दहैलियो सकै छल। मुदा देखैक जे भार देलौं से अही दुआरे जे अपन जेठ भाय बुझि नीकसँ तकतियान करब।”
18. ‘कचहरिया भाय’, कथामे दू गोट पात्र क्रमश: ‘कचहरिया भाय’ आ ‘नीरस’ नामक व्यक्तिक बीच जीवनक अन्तिम अवस्थामे गप्प-सप्प जीवनानुभवक साझा करबौलनि अछि। किछु लोक मोकदमाबाज होइत छथि से पूरा जिनगी ओहि मोकदमाबाजीमे बरबाद कऽ लैत छथि आ बाल-बच्चा सेहो एहि पाछाँ बरबाद भऽ जाइत छन्हि। जकर उदाहरण कचहरिया भाइकेँ बनबैत कथाकार सचेत कएलनि अछि जे कोनहु चीजक आदति नहि हेबक चाही, आदत पश्चातापक कारण होइछ।अत: आवश्यकता भरि मतलब राखक चाही।
19. ‘गोहाइर’, कथामे ‘भगत’क संग ‘कथाकार’ स्वयं एक पात्र छथि। अनुभवात्मक शैलीमे कथाक चित्र प्रस्तुत कए कथाकार देखौलनि अछि जे अन्ध-विश्वासक जालमे फँसल लोकक दशा केहन अछि। संगहि ओहि जालसँ निकलबाक छटपटाहट ओ संघर्षकेँ सेहो कथाकार रेखांकित कएल मुदा पूरा जतन कएलाक उपरान्तहुँ परिस्थितिवश लोक ओहि जालसँ निकलि नहि पबैत अछि, बल्कि उत्तरोत्तर ओहि जालमे ओझराएले रहि जाइत अछि।
20. ‘पनचैती’, कथामे आमजनक बेथा आ ओहि बेथाक मजा लैत सरकारी तंत्र आ राजनेताक खेलवाड़क नीक चित्रण एहि कथामे भेल अछि। प्रसिद्ध इन्दिरा आवास कार्यक्रममे सरकारी तंत्रक घूस-पेंचक सजीव चित्रण करैत कथाकार सोनेलाल बाबाकबेथाकेँ तखन सोझा अनलनि जखन प्रतिनिधि कहलकैन- “आइक युगमे बिना खुऔने-पीऔने काज चलै छइ?”ताहिपर सोनेलाल बाबा अपनाकेँ निहत्था बुझि बजलाह- “ई बात ओइ दिन किए ने कहलौं जइ दिन हमरो हाथमे भोँट छल।”

Suggested citation: उमेश मण्डल. “जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बजन्ता-बुझन्ता’.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 292, 2020-02-15. https://www.videha.co.in/research/2020/292/जगदीश-प्रसाद-मण्डलक-बजन्ता-बुझन्ता.htm

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