उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘अकास गंगा’
अकास गंगा (2020): श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक पद्य रचनामे प्रस्तुत पोथी एकदम टटका कृति छियनि। एहि संग्रहमे कुल 39 गोट रचना संग्रहित अछि। ‘नजैर-नजैरमे तफरका भैया’ शीर्षक रचनासँ एहि पोथीक आरम्भ भेल अछि ‘सुफल काज’ नामक रचनाक संग अन्त। मण्डलजीक दृष्टिकोणक विषयमे एक-पर-एक विद्वतजन अपन-अपन विचार व्यक्त कएलनि अछि जे हिनक नव दृष्टिकोण मैथिली साहित्य लेल अनुपम अछि। प्रस्तुत संग्रहक किछु रचनाक संक्षिप्त परिचयात्मक वर्णन करबाक कोशिश कय रहलहुँ अछि।
‘नजैर-नजैरमेतफरकासभदिनहोइतएलैए।कहियोनावपरगाड़ीआकहियोनाव गाड़ीपरचढ़ैतएलैए।’ सामान्य जनकण्ठ प्रचलित एहि सत्यकेँ कवि परिवर्तन करैत प्रस्तुत काव्यक माध्यमसँ लोकक समक्ष उपस्थित कएलनि अछि-
“नजैर-नजैरमेतफरकाभैया
सभदिनहोइतएलैए।
कहियोनावपरगाड़ी
तँकहियोनावचढ़ैतएलैए।
नजैर-नजैरमेतफरकाभैया
सभदिनहोइतएलैए।”
वएह गारि सुनि ककरो दुख होइ छैक आ वएह गारि सुनि ककरो तकलीफ, मुदा बुधियार लोक गारि आ कुगारिक बीच हँसैत चलैत रहैत छथि-
“केकरोगारिसुगारिबनि-बनि
केकरोगारिकुगारिबनैछइ।
सुगारि-कुगारिबीचबुधियारि
बीचो-बीचहँसैतचलैछइ।
बीचो-बीचहँसैत...।”
समाज द्वारा लोककेँ स्वतंत्रता भेटबाक चाही। मुदा एखन एहेन परिवर्तन भऽ गेल अछि जे समाज बान्ह-छेक कऽ रहल अछि। आ से परिवर्तन होइत एहेन स्थितिमे पहुँचि गेल अछि जे घरे-घर सभ कियो घोड़-छानमे बन्हा गेल अछि-
“जेकराखुजलसमाजकहैछी
बान्ह-छेकसँभरल-पड़लछइ।
बान्हो-छेककिबान्ह-छेकजकाँ
घरे-घरघोड़छानबनलछइ।
घरे-घरघोड़छान...।”
एहि पाँतिमे कविक परिवर्तनक स्वर देखल जा सकैछ। जे विद्वान-समाजक पूजा नहि करैत अछि हुनक कोनहुँ माइन नहि। समाजक हितमे जे कार्य करत ओकरहि समाज पूजा कऽ सकैत अछि। तहिना जे गाम उजड़ल अछि, ओहि गामक कोनहुँ महत्व नहि-
“जइसमाजकगामउजड़ल
ओइगामकमानियेँकी
जेविद्वानसमाजनइपूजल
ओइविद्वावनकमानियेँकी?
ओइविद्वानकमानियेँकी?
ओइपोखरिकमानियेँकी?
ओइपोखरिक...।”
‘नवका बास’मे कवि कहैत छथि जे समाजक बीच समाज बसल अछि। मुदा ओकरा देखय लेल विचार आ व्यवहारक जरूरत अछि। जाधरि ओहन व्यवहार नहि करब ताधरि ओकर दर्शन सम्भव नहि, ठीक एकर विपरीत जखन ओहन विचार-व्यवहार कियो करैत अछि तँ सद्य: ओहि दृश्यक अवलोकन भऽ जाइत छैक-
“समाजकबीचसमाजगाम-बास
विचार-विचरणकरएलगैछइ।
विचैड़-विचैड़, विचारि-विचारि
कोने-कानीदेखएलगैछइ।
जहिनाखेतककोन-कान
तहिनासमाजोककोन-कानबनैछइ।
कोने-कानी, कोन-कानताकि
सम्पन्नबाससमाजबसैछइ।
सम्पन्नबाससमाजबसैछइ।
बिनुबसल-बसाएलधरतीपर
नवघरबसिबासबनैछइ।”
असंख्य व्यक्तिसँ लोकक सम्बन्ध रहैत अछि मुदा असली संगी वएह कहबैत अछि जे जिनगीमे संग पुरैत अछि-
“जिनगीमेजेसंगपुरैए
संगीवएहकहबैतचलैए।
संगससैर, घुसैक-पुसैकसंग
प्रेमीमित्रसंगीकहबैए।
जिनगीमेजेसंगपुरैए
संगीवएह...।”
परिवर्तनक कारणे एखनुक स्थिति एहेन भऽ गेल अछि जे दूध-फूलक बीच कोनहुँ भेद नहि रहि गेल अछि। फलाफल छुतहरो घरहर बनि गेल अछि-
“मिथिलामोहैनमथिमिथिला
कहिछुतहरघरहरिया।
दूध-फूलबीचभेदनेमानि
छुतहरोबनतैघरहरिया।”
निम्न पाँतिक माध्यमसँ आशुतोषकेँ उपराग देल गेल अछि जे सुख कहियो नहि भेटल, सभदिन दुखेक तरमे दबाएल रहलहुँ। मनुक्खक गति कहियो नहि भेटल-
“सभदिनदुखकतरदबेलौं
सुखकसुखकहियोनेपेलौं।
चुहैटहृदयतोषपकैड़
मनुखकगतिकहियोनेपेलौं।
हेआशुतोष...।”
मनमे फूल फुलाइत रहैत अछि। जहिना वसन्त कालमे भोरहबेमे मेघक रंग ललौन बनल रहै छै तहिना मनक फूल फुलाइत रहैत अछि-
“मनकफूलफुलाइतरहैछै
मनमेफूलफुलाइतरहैछै
भोरहरबेवसन्तजहिना
मेघललौनबनैतचलैछै।”
कवि कहैत छथि स्वार्थ आ अविश्वासक तेहन हवा बहि रहल अछि जे सच्चा इष्ट-मित्र बिड़ले भेटि सकैत अछि-
“दुनियाँकभवभँवरमे
मित्र-इष्टबिड़लेभेटैछै।
इष्ट, शिष्ट, अशिष्टबनि-बिगैड़
मुकतिकतेहनेमार्गपबैछै।
जेहनेशक्तिकरंग...।”
लोकक जिनगी दू तलपर चलि रहल अछि, बाहर किछु आर आ भीतर किछु आर..। ऊपरसँ खेल खेलि रहल छी आ भीतरसँ बपहारि काटि रहल छी-
“मन-मरदनकरैतरहैछी
खेलखेलौनाखेलदेखैछी
मने-मनबपहारिकटैछी।
खेलखेलौनाखेलदेखैछी।”
प्रेमी पियाक लेल ई उक्ति अछि- जे चीन्ह पहचीन्ह सभटा उड़िया गेल हवाक झोंकमे जिनगीक सभ चीज छिड़िया गेल...। आबो एकबेर नजरि उठा कऽ हमरा दिसि ताकू-
“चीन्ह–पहचीन्हसबउड़ियागेल
हवाझोंकपाबिसबछिड़ियागेल
आबोकनीनजैरउठा, दिअहमरोजिया
हेयौप्रेमीपिया...।”
मनकेँ बिसरबाक क्षमता होइ छैक। हेबाक चाही। तेँ अपना प्रियजनकेँ लोक ओहिना बिसरि जाइत अछि जेना गाछक फूल डारिसँ खसलापर बिसरि जाइत अछि। तहिना हे बहिना हमर मन अहॉंकेँ बिसरि गेल-
“बिसैरगेलमनतोरा
हेबहिनाबिसैरगेलमनतोरा
जहिनागाछकफूलझड़ैछै
झरि-झरिखसलहतोरा
हेबहिना, बिसैरगेलमनतोरा।
हेबहिना...।”
लोक दुखसँ भागि जाइत अछि, भूखसँ भागि जाइत अछि। मुदा भरल पेट तँ विचार करबाक चाही? आ से जखन भरलो पेट विचारकेँ ताखपर राखि देबैक तखन तँ..! आबो कनी विचार केर माध्यमसँ कवि यएह कहैत छथि। देखू निम्न पॉंतिकेँ-
“आबोकनीविचारू
भाययौ, आबोकनीविचारू।
भुखेभगलौं, सभजनैए
दुखेभगलौं, सभजनैए।
भरलपेटविचारू
आबोकनीविचारू
भाययौ...।”
वृद्धक प्रश्न अछि जे हम वृद्ध भेलहुँ, वृद्धसँ समृद्ध समाज बनैत अछि जकर कल्पना कएल गेल अछि, नीक समाजसँ अर्थात् समृद्ध समाजसँ-
“वृद्ध-सँ-समृद्धकहबए
समृद्धसमाजकल्पितछै
साजसिंगारसोल्होकला
रीतवसन्तसूरतानिकहैछै।
बुझियोकहाँपेलिऐ।
भाययौ, बुझियोकहाँपेलिऐ।
वृद्धकेना...।”
समय शान्त नहि अछि बल्कि समयमे भूचाल आबि गेल अछि, भूकम्प आबि गेल अछि आ ओहि भूकम्पक कम्पमे जिनगी बोहिया गेल अछि-
“समयकेरभूचालिमे
जिनगीबोहियागेल।
जी-वनवनजीवनबीच
बोहिआएलबाटबटियागेल।”
भगवतीसँ लोक आशीर्वाद मांगैत अछि मुदा एहिठाम परिवर्तन ई भेल अछि जे भगवतीकेँ उपराग दैत कहैत अछि जे राति-दिन सुखल रोटी आ आलू केर सन्नाक रोग वियाधिकेँ हमरे दिस पठाबैत छी-
“सुखलरोटीअल्लूसनिसानि
दिन-रातिकिएखुएलौं
बाँकीभगा-भगाकऽ
रोग-वियाधिपठेलौं
एनाकिए...।”
कियो अनकहि बोझ उठबैत तबाह अछि तँ कियो अपने बोझ उठेबामे अपसियाँत अछि। ध्यान रखबाक अछि जे आनक बोझ उठबैत काल अपन बोझक जुन्ना ने ससरि जाए..! एहि भावकेँ कवि अपन ‘आनक बोझ’काव्यमे अनुभवात्मक शैलीमे एहि तरहेँ प्रस्तुत कएलनि अछि-
“आनकबोझउठाबैखातिर
अपनोबोझभड़ैकगेलइ।
दबि-दबि, उनैर-उनैर
जुन्नेबीचससैरगेलइ।
मीतयौ, जुन्नेबीचससैरगेलइ।”
आजादीक बाद तँ एकरा सुरक्षित रखबाक चाही आर आगू बढ़ेबाक चाही, उपाय खोजबाक चाही किन्तु एहिठाम आजादीक उमंग तेहन चढ़ल जे घाटे-बाटे वौआ रहल अछि, छिछिया रहल अछि-
“आजादीकउमंगउमैक
घाटे-बाटछिछियागेलौं।
सत्त-समुद्रपहाड़बीच
डेगे-डेगवौआगेलौं।
भाययौ, डेगे-डेगबौआगेलौं।
घाटे-बाट...।”
जतय जिनगीक रस सुखा जाइत अछि ओतय वुधि सेहो बोझिल भऽ जाइत अछि। जिनगी तँ सरस हेबक चाही जाहिसँ सदिखन परिवर्तित होइत आगाँ बढ़ैत रहए-
“रस-जिनगीकसोंखागेलै।
जिनगीरससोंखागेलै।
जिनगीएहरागेलै।
भाययौ, बुधियेबोझियागेलै।”
संसार सिर्फ आनन्द आ भोगक जगह नहि थिक बल्कि समर भूमि सेहो थिक। जँ से नहि तखन जिनगीमे जिनगानी कोना आओत आ जाहि जिनगीमे जिनगानी नहि ओहि जिनगीक कोन मोल? कवि अही भावकेँ निम्न पाँतिमे रखलन्हि अछि-
“जिनगीबिनुजिनगानीवएह
कोनसुरमुहेँगाबिपेबै।
कोनसुरमुहेँगाबिपेबै।
जाबौआ...।
नइजापुरूखपनापुरुखमे
नीनतोड़िबटबानिगेबै।
बिनुभौकेभकुआइएरहि
जीताजीजड़ाइतगेबै।
जीताजीजड़ाइतगेबै।
जाबौआ...।
समरभूमिसंसारमे..।”
जखन धारमे पानि रहैत अछि तँ ओ अपन अकार ग्रहण करैत अछि, मुदा एहिठाम परिवर्तन ई भेल अछि जे धार सुखि गेलाक बादहु अपन अकार-सकार धेने अछि-
“सुखाएलधारसुखा-सुखा
अकार-सकारधेनेरहैछै।”
एहि पोथीमे मण्डलजी कुल 39 गोट पद्य रचनाक समायोजन कयने छथि। संग्रहित सभ रचनाक शीर्षक निम्नांकित अछि-
‘नजैर-नजैरमे तफरका भैया’,‘अपने मन ठकैए’,‘केकरो गारि सुगारि’,‘साँझ-भोर’,‘समाजक बान्ह छेक’,‘दियादी’,‘ओइ पोखरिक मानियेँ की?’,‘नवका बास’,‘जिनगीमे जे’,‘हे बहिना केनाकऽ जेबै ओइ घरिया’,‘हे आशुतोष’,‘मनक फूल’,‘फूल मनक’,‘बेकाल-काल’,‘जेहेन जेकर’,‘समय-साल’,‘संग मान-समान’,‘जेहने शक्तिक रंग रहै छै’,‘खेल खेलौना’,‘प्रेमी पिया’,‘बिसैर गेल’,‘आबो कनी विचारू’,‘सुआगत अपनेक’,‘वृद्ध केना’,‘समय केर’,‘भगवती गीत’,‘आनक बोझ’,‘अड़कन-मरकन’,‘हाल-बेहाल’,‘आजादीक उमंग’,‘बुधिये भोतिया गेल’,‘घर-घरा’,‘जा बौआ’,‘लत-लत लत्ती’,‘पीड़ित रीति’,‘अकार-सकार’,‘टेनशन बीच पड़ल छी’,‘आन्ही-अन्हर’,‘सुफल काज।’