उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक अर्द्धांगिनी कथा संग्रह
(2013) : ‘अर्द्धांगिनी’ बीस गोट कथाक संकलन अछि। एहि पोथीक पहिल संस्करण, 2013 ईस्वीमे श्रुति प्रकाशन- नई दिल्लीसँ प्रकाशित भेल अछि। प्रसिद्ध कथाकार श्री दुर्गानन्द मण्डलजीक द्वारा एहि पोथीक लोकार्पण, ‘सगर राति दीप जरय’क80म कथा गोष्ठी- मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, निर्मली, (सुपौल),मे 30.11.2013क भेल अछि।
एहि पोथीक कथा सभमे नोकरिहाराक जीवनक संत्रास, परिश्रमी कृषकक उल्लास, सांस्कृतिक पावनि-तिहारमे पैसल अन्धविश्वासक, ग्राम्य जीवनमे जातीय व्यवसायक महत्व, क्रमश: टुटैत सम्बन्ध-बन्ध, सामाजिक जीवनक विभिन्न समस्या तथा ओकर समाधानक बाट आदिक सूक्ष्म विश्लेषण लोकमंगलक कामना देखबामे अबैत अछि।
एहि संग्रहक आमुखकार डॉ. योगानन्द झा छथि। डॉ. योगानन्द झा हिनका विषयमे कहैत छथिन- “युगीन समस्या ओ समस्याक कारण एवम् तकर समाधानक प्रति चिन्तनशीलता हिनक वस्तु-विन्यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि अछि जाहिमे परम्परित कथाधाराक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूपेँ प्रस्फुटित देखि पड़ैछ। मिथिलाक लोकजीवनक उत्थानक प्रति सम्वेदनात्मक अभिव्यक्ति कौशलक कारणे मण्डलजीक कथा सभ हिनका आधुनिक कथाकार लोकनिक अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ कऽ देलकनि अछि।”
वर्तमानमे चारिम संस्करण उपलब्ध अछि। चारिम संस्करण, पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल) सँ प्रकाशित भेल अछि। ‘गामक जिनगी’ पोथीक बाद कथाविधामे मण्डलजीक ई तेसर पोथी छियनि। एहि पोथीमे 20 गोट कथा अछि। जकर विवरण क्रमानुसार कथाक शीर्षक, शब्द संख्या सहित निम्नांकित अछि-
1. दोहरी मारि- शब्द संख्या : 1368
2. केना जीब? - शब्द संख्या : 1039
3. नवान- शब्द संख्या : 2306
4. तिलासंक्रान्तिक लाइ- शब्द संख्या : 2056
5. भाइक सिनेह- शब्द संख्या : 1201
6. प्रेमी- शब्द संख्या : 2526
7. बपौती सम्पैत- शब्द संख्या : 2350
8. डंका- शब्द संख्या : 2401
9. संगी- शब्द संख्या : 1849
10. ठकहरबा- शब्द संख्या : 2349
11. अतहतह- शब्द संख्या : 2486
12. अर्द्धांगिनी- शब्द संख्या : 3057
13. ऑपरेशन- शब्द संख्या : 1616
14. धर्मनाथ- शब्द संख्या : 1968
15. सरोजनी- शब्द संख्या : 1810
16. सुभद्रा- शब्द संख्या : 1922
17. सोनमाकाका- शब्द संख्या : 1572
18. दोती बिआह- शब्द संख्या : 1822
19. पड़ाइन- शब्द संख्या : 1970,
20. केतौ नै- शब्द संख्या : 1203
‘दोहरी मारि’, एहि कथामे अवकाश प्राप्त प्रोफेसर गुलाबक मनोविश्लेषण भेल अछि। प्रो. गुलाब कतेको वर्षसँ चीनी रोग तथा ब्लड-प्रेसरसँ ग्रस्त छथि। गामक सभ सम्पतिक संग घर-घराड़ी सहित बेचि शहरमे पति-पत्नी एकाकी रहैत छथि। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहैत छन्हि। हिनकालोकनिक सुधि लेनिहार परिवारमे कियो ने छन्हि। शहरी जीवनक चाकचिक्यसँ सम्मोहित भऽ प्रो. गुलाब शहरी जीवनकेँ अपनौलन्हि। शुरूमे तँ बड्ड नीक लगलन्हि मुदापछाति जखन शहरी वातावारणक भान भेलन्हि, चोरी-डकैती, लूट-पाट, अपहरण, गन्दगी आदि समस्यासँ ग्रस्त शहरी वातावरणसँ रू-ब-रू भेलाह तखन ग्राम्य जीवनक सौहार्दपूर्ण वातावरणक प्रति आकर्षण जगलन्हि। जखन पुत्र द्वारा ई समाद भेटैत छन्हि जे पौत्रक मुड़न घरपर नहि भऽ कऽ वैष्णो देवीमे होएतनि, जइ लेल हुनकोलोकनिकेँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटैत छन्हि आ ओ अपनाकेँ अशक्य बुझैत छथि। टुटल स्वरमे गुलाबबाबू बजैत छथि-
“मोबाइल छोड़ि असिरवादो केना दऽ सकब। तीन दिनसँ बजारमे करफू लागल अछि। सिपाहीसँ सड़क भरल अछि। एहेन स्थितिमे घरसँ केना निकलब?”
‘नवान’,ई कथा अर्द्धांगिनी नामक पोथीमे तेसर स्थानपर अछि। नवान कथामे परिश्रमी कृषकक गाथा आएल अछि। अपन परिश्रमक बलेँ अपन भाग्यक निर्माण करैत अछि। एहि कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विभिन्न खण्डचित्र उपस्थित कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल फड़ देवताकेँ चढ़ायब, गाए बिआएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभिषेक करब आदि। ग्राम्य जीवनमे पसरैत जातीय ओ साम्प्रदायिक विद्वेष दिस सेहो एहिमे संकेत कएल गेल अछि। मुदा एहि कथामे मिथिलाक लोकजीवनक आर्थिक स्थितिकेँ बदहाल करएबला जइ समस्यापर विशेष दृष्टिनिक्षेप कएल गेल अछि, से थिक बाढ़िक समस्या। एहि समस्याक कारणे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त भऽ जाइत अछि। तथापि एहि कथाक नायक आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति अपनाए नव किस्मक धान उगबय लगैत अछि, तीमन-तरकारीक नगदी फसिल उपजाबय लगैत अछि आ नूतन नस्लक माल-जाल पोसि अपन जीवनकेँ खुशहाल बना लैत अछि।
‘नवान’ कथाक विश्लेषणक क्रममे आमुखकार कहैत छथि- “वस्तुत: एहि वैज्ञानिक पद्धति द्वारा मिथिलाक कृषकक जीवन समुन्नति भऽ सकैत अछि, से संदेश देब कथाकारक उद्देश्य छन्हि।”
‘तिलासंक्रान्तिक लाइ’,एहि कथाक माध्यमसँ ग्राम्यजीवनमे पसरल अन्धविश्वासपर प्रहार कएल गेल अछि। तिलासंक्रान्ति एकटा एहन पावनि थिक जे मिथिलाक घर-घरमे मनाओल जाइत अछि। एहि दिनसँ सूर्य उत्तरायण भऽ जाइत छथि आ क्रमश: शीत ऋृतु वसन्त आ गृष्म दिस बढ़य लगैत अछि। मुदा एहि पर्वक प्रसाद ग्रहण करबाक हेतु प्रात: स्नान जरूरी बूझल जाइत छैक। मिथिलामे ई अपवाद सेहो पसरल छैक जे एहि दिन जे कियो भोरे नदी वा पोखरिमे डूब दैत छथि हुनका नदी-देवता तत्काले लाइ धरा दैत छथिन।
एही अपवादपर विश्वास कऽ गोपाल नामक एकटा नेना बारहे बजे रातिमे नदीमे डूम देबए चल जाइत अछि आ ठंढसँ ग्रस्त भऽ जाइत अछि।
एहि कथाक मादे आमुखकार लिखैत छथि- “ग्राम्यजीवनक अन्धविश्वासी समाजकेँ एहि कथाक माध्यमसँ ई संदेश देल गेल अछि जे वस्तुत: ई पावनि प्रकृति-परिवर्त्तनपर आधारित अछि आ एहिमे बिनु पाखण्ड कयने लोककेँ अपन सामर्थ्यक अनुसार समैपर स्नान करबाक चाही, नहि कि अन्धविष्वासमे पड़ि रोगग्रस्त भऽ जएबाक चाही।”
‘भाइक सिनेह’,कथामे शिष्टदेव आ विचारनाथ दुनू भँइ एक दोसराक प्रति अगाध श्रद्धा, भक्ति ओ बन्धुत्वक भाव रखैत छथि मुदा देयादिनी लोकनिक बीच खट-पटसँ परिवारमे भिन्न-भिनाउज भऽ जाइत छन्हि। भिन्न-भिनाउजक मूलमे अर्थसत्तापर कबजा रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक मनमे परस्पर प्रेमक भाव जगैत छन्हि तँ दुनू एकदोसराक दु:ख बँटबाक हेतु तत्पर भऽ जाइत छथि।
आमुखकार लिखैत छथि- “भाइक सिनेह कथामे कृषक जीवनमे पारस्परिक सहयोग, सद्भाव ओ शक्तिक अनुकूल श्रमपर आधारित संयुक्त परिवारक उपयोगिताक परम्परित अनुगायन देखि पड़ैछ।”