विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मुड़ियाएल घर’

उमेश मण्डल · 2020-04-15 · अंक 296

उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मुड़ियाएल घर’
मुड़ियाएल घर (2016) :एहि पोथीमे संग्रहित कथासभक लेखन 6 सितम्बर 2016 सँ 28 नवम्बर 2016 धरिक समयावधिमे कथाकार कयने छथि। ‘मुड़ियाएल घर’ कथा संग्रहक पहिल संस्करण 2016 इस्वीमे पल्लवी प्रकाशन, तुलसीभवन, जे.एल.नेहरूमार्ग, वार्डनं. 06, निर्मली, जिला- सुपौलसँ प्रकाशित भेल अछि। एहि पोथीक लोकार्पण दिनांक 31.12.2016क श्री अजय कुमार दास ‘पिन्टु’जीक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क 92म कथा गोष्ठी- नवानी (मधुबनी)मे मंचपर उपस्थित समस्त साहित्यकार एवम् साहित्य प्रेमीगणक द्वारा सामुहिक रूपे भेल अछि।
उक्त पोथीमे संग्रहित सभ कथाक संक्षिप्त विवरण- कथाक शीर्षक, शब्द संख्याआलेखन तिथिनिम्नांकित अछि-
1. बगदल गाम- शब्द संख्या :2405, तिथि : 6 सितम्बर 2016
2. बत्तीसोअना- शब्द संख्या :890, तिथि : 8 सितम्बर 2016
3. कचहरिया रोग- शब्द संख्या :1651, तिथि : 12 सितम्बर 2016
4. दिन घटि गेल- शब्द संख्या :2425, तिथि : 5 अक्‍टुबर 2016
5. मुड़ियाएल घर- शब्द संख्या :2352, तिथि : 11 अक्‍टुबर 2016
6. गामक सुरता- शब्द संख्या :2265, तिथि : 19 अक्‍टुबर 2016
7. खतियाएल घर- शब्द संख्या :2057, तिथि : 09 नवम्बर 2016
8. बात-कथा सुनौलक- शब्द संख्या :1889, तिथि : 15 नवम्बर 2016
9. अनका बेर ओंघी- शब्द संख्या :2233, तिथि : 20 नवम्बर 2016
10. देव उठान- शब्द संख्या :2297, तिथि : 24 नवम्बर 2016
11. नमहर घरक चोरि- शब्द संख्या :2397, तिथि : 28 नवम्बर 2016
बगदल गाम’,कथा ‘मुड़ियाएल घर’क पहिल रचना थिक। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी सोच ओ अन्धविश्वाससँ जकड़ल समाजक चित्रकेँ प्रस्तुत करैत अछि। समाजक ओहन व्यक्ति तथा सोचकेँ रेखांकित करैत अछि जे मिथिलाक किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृतिकेँ कमजोर करैत रहल अछि। प्रस्तुत कथाक पात्र- घुरनकेँ देखि ओहि चीजकेँ अकानल जा सकैछ।
घुरन, मनहि-मन सोचने छलजे पढ़ाइ समाप्त कएला बाद नोकरी नहि करब। जतेक अपन खेत-पथार अछि, बपौती सम्पति अछि ओहिमे रमि अपन परिवारकेँ ठाढ़ राखब। मुदा से नहि भऽ सकलैक। कारण, कोनहुँ चीजकेँ जाधरि अनुकूल परिस्थित नहि भेटैछ ताधरि ओकर विकास कोना सम्भव भऽ पाओत? ई शाश्वत सत्य थिक। खाएर.., पढ़ल-लिखल घुरन जखन खेतमे पहुँचला कि रंग-बिरंगक कुटि-चौल समाजमे चलए लागल..!
खेती-किसानीक विरूद्ध मिथिलामे जे सामाजिक वातावरण रहल ओ किनकहुसँ छिपल नहि अछि। उदाहरणक रूपमे किसानक जिनगी आ खेती-बाड़ीक स्थिति सबहक सोझमे अछिए। ओना, वैचारिक दौरमे अपना एहिठाम कृषि संस्कृतिकेँ बहुत ऊपर मानि लेल गेल अछि। मुदा व्यवहारिक स्थिति ठीक विपरीत अछि। घुरनकेँ छीतन कहलकन्हि-
“अहाँ तँ पढ़ल-लिखल छी, अहूँ जखन घासे छिलबै तखन हमरा सन मुरुख आ अहाँ सन पढ़ल-लिखलमे की अन्तर भेल?”
खेती-किसानीक संग गाम-घरकेँ छोड़ि घुरन परदेस चलि जाइत अछि। छीतनक बात घुरनकेँ अपना प्रभावमे आखिर लऽ कोना लैत अछि? ई विचारणीय थिक।
‘बत्तीसोअना’,एक पढ़ल-लिखल यात्री गाय-घी लऽ कऽ कुशेश्वर स्थान विदा होइत छथि। ओहिठाम पहुँचए लेल नाहपर चढ़ि कोसी धार टपए पड़ैत छैक। नाहपर बैसल ओ यात्री आ मल्लाह दुइए व्यक्ति रहैत छथि। यात्री पुछलखिन खेबैयाकेँ- “भैया, तूँ फिजियोलोजी जनै छह?”
खेबैया बाजल जे ‘नहि जनै छी’, ताहिपर यात्री कहलकनि, तखन तोहर 25 प्रतिशत जिनगी पानिमे चलि गेलह। ..एहिना आरो-आरो ओहन प्रश्न यात्री पुछैत रहल जाहिसँ ओ वेचारे अवगत नहि छल। यात्री कहैत-कहैत 75 प्रतिशत धरि कहि देलकैक जे तोहर जिनगी बेकार भऽ पानिमे चलि गेलह। किछुकालक बाद मौसमक रूखि बगदने नाहक स्थिति बिगड़ए लागल। खेबैया बाजल- “भाय साहैब, तैयार भऽ जाउ, हेलए अबैए?”
यात्रीक मुहसँ ‘नहि’ सुनि खेबैया पुन: बाजल- “भाय साहैब, जिनगीक धार उकड़ू-सुकड़ू दुनू चलैए। हम तँ बारहेअना डुमब, मुदा अहाँ बत्तीसोअना डुमब! किए तँ अहाँकेँ पढ़ैओमे बहुत खर्च भेल अछि!!”
एहि तरहेँ ‘बत्तीसोअना’ कथा बेस मार्मिक चित्र प्रस्तुत करैत ओहि मानसिकताक विरूद्ध ठाढ़ होइत अछि जे ज्ञानक अर्थकेँ अनर्थ करैत हीनभावनासँ ग्रस्त छथि।
‘कचहरिया रोग’, एहि कथामे मुख्यत: तीन गोट पात्रक चर्च अछि। पहिल श्रीकान्त, दोसर गौरी आ तेसर कथाकार। कथाकार अपनहुँ एक पात्र छथि। श्रीकान्त हालहिमे मोटर साइकिल किनलक ओकरे ड्राइवरियो लाइसेंस आ गाड़ियोक लाइसेंस बनेबाक छेलै, वएह पुरान कचहरिया बुझि हिनका लग (कथाकार लग) आबि कहलकनि जे कनी मधुबनी चलू। मधुबनीमे हिनकर एक संगी कोर्टमे मुंशीक काज करैत छथिन। जनिक नाओं अछि गौरी। कथाकारकेँ गौरी मोन पड़ैत छथिन। मोन पड़िते हुनकापर तामस चढ़ि जाइत छन्हि। तीस वर्ष पहिने गौरी आ कथाकार समेत गामक 28-30 व्यक्ति जमीनक आन्दोलनमे भाग लेने छलाह। ओहि समय गाम-गाममे जमीनक लड़ाइ चलि रहल छल। ईहो सभ जमीनक हेतु लड़ाइ लड़ला केस-मुकदमा चलल। ताहि क्रममे गौरी संकल्पित भेल छलाह जे गामहिमे रहि खेती करब। मुदा कोर्टक दौड़-बड़हासँ लिखै-पढ़ैक लूरि भऽ गेलन्हि आ ओ (गौरी) मुंशीक काज करय लगलाह। यएह सभ चीज कथाकारक स्मृतिमे आबि गेने मोने-मन तामसो उठि जाइत छन्हि। मुदा एक तँ श्रीकान्त भातिज छथिनआ दोसर विवाहमे दहेज नहि लेबक विचार सेहो हिनकर मानि लेने रहनि। दुनू व्यक्ति मधुबनी जा गौरीसँ भेँट कए काज करबैत छथि। आ सॉंझ धरि घुमि कऽ घर आबि जाइत छथि।
‘मुड़ियाएल घर’, उदयपुर गामक जागेश्वर काका आ रमणी काकीक बीचक ई कथा थिक। वाणीश्वरी भगवतीक दर्शनक हेतु दुनू परानी विदा होइत छथि। संगहि उदयपुरक आरो किछु लोक वाणीश्वरी भगवतीक दर्शनक संगबे भऽ जाइत छन्हि। सबा रूपैआ दक्षिणा दए जागेश्वर काका फुटे अपना दुनू परानी लेल एकटा कोठरी भाड़ापर लैत छथि। राति भरि रूकि भोरे स्नान कएडाली सजा भगवतीक पूजा करैत छथि। फलाहार कएला बाद गाम अबैत छथि। कथाक सामान्य पाठ यएह थिक।
मुदा कथाक उद्देश्य बेस व्यापक अछि। वाणीश्वरी भगवतीक भक्त वएह छथि जनिक वाणीमे विवेक छन्हि, जनिक स्वर कर्मसँ बान्हल छन्हि। ई चीज कथामे तखन स्पष्ट होइत अछि जखन जागेश्वर काकाकेँरमणी काकी पुछलकन्हि जे गामेक कए गोटे संगे जाए चाहैत अछि वाणीश्वरी भगवतीक स्थान। ताहिपर जागेश्वर काका अपन विचार व्यक्त करैत छथि ओहिमे वाणीश्वरी भगवतीक महात्म्यसँ झलैक उठैत अछि। ओ कहैत छथि- “कहैले तँ सभ (गौंआँ) वाणीश्वरी भगवतीक दर्शन करय जेता मुदा घरसँ बाहर धरिक जे बोली-वाणीक रूप बना नेने छैथ, से की अपने वाणीश्वरी भगवतीक दर्शन करता, ओ तँ अप्पन दर्शन भगवतीकेँ देथिन। मुदा जे हौउ, एके गाममे सभ रहै छी, मुदा...।”

Suggested citation: उमेश मण्डल. “जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मुड़ियाएल घर’.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 296, 2020-04-15. https://www.videha.co.in/research/2020/296/जगदीश-प्रसाद-मण्डलक-मुड़ियाएल-घर.htm

मूल विदेह अंक / Original issue