उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहै जोकर परिवार’मे
परिवर्तनक स्वर
रहै जोकर परिवार (2020) :एहि पोथीमे संग्रहित कथासभक लेखन 12 मार्च 2020 सँ 20 अप्रैल 2020 धरिक समयावधिमे कथाकार कयने छथि। ‘रहै जोकर परिवार’ कथा संग्रहकेँ पल्लवी प्रकाशन, तुलसीभवन, जे.एल.नेहरूमार्ग, वार्डनं. 06, निर्मली, जिला- सुपौलसँ प्रकाशित कराओल गेल अछि। उक्त पोथीमे संग्रहित सभ कथाक संक्षिप्त विवरण- कथाक शीर्षक, शब्द संख्याआलेखन तिथिनिम्नांकित अछि-
1. दहिबरी- शब्द संख्या : 2560, तिथि : 12 मार्च 2020
2. सघन बन- शब्द संख्या : 2697, तिथि : 17 मार्च 2020
3. हुसैत लोक- शब्द संख्या : 2602, तिथि : 23 मार्च 2020
4. हुसि गेलौं- शब्द संख्या : 2574, तिथि : 28 मार्च 2020
5. झूठक झालि- शब्द संख्या : 2352, तिथि : 01 अप्रैल 2020
6. दुष्टपन- शब्द संख्या : 2317, तिथि : 06 अप्रैल 2020
7. रहै जोकर परिवार- शब्द संख्या : 2297, तिथि : 15 अप्रैल 2020
8. परिपक्व निरलज- शब्द संख्या : 2232, तिथि : 20 अप्रैल 2020
क्रमश: सभ कथाक इंगित परिवर्तनक स्वर निम्नांकित अछि-
1.‘दहिबरी’,कथामे चैतक रान्हल बैशाखमे खेबाक जे परम्परा अपना एहिठाम अदौसँ आबि रहल अछि, तकर गुण-दोषक चर्च कथाकार कएलनि अछि। पूर्वमे जखन अविकसित लोकक अविकसित समाज छल, ताहि समयमे एहि परम्पराक चलैन शुरू भेल। मुदा आजुक समय आधुनिक अछि, जकरा वैज्ञानिक युग सेहो कहल जाइछ। वैज्ञानिक युगमे कोनहुँ वस्तुकेँ व्यवहारिक कसौटीपर देखल जाइत अछि, अर्थात् कोनहु चीजक नीक-बेजाकेँ देखब, वैज्ञानिक दृष्टिकोण सेहो कहबैत अछि। अत: वैज्ञानिक दृष्टिऍं बाइस-तेबाइस भोजनकेँ शरीरक लेल अहितकर मानल गेल अछि। वएह अहितएहि कथाक मूलमे अछि जे परिवर्तनक स्वर बनि गुंजित भेल अछि।
2. ‘सघन बन’,कथामे मनुक्खक अविकसित अवस्थासँ विकसित अवस्था लेल परिवर्तित स्वरक गूंज अछि। जेना-जेना मनुक्खमे जिनगीक विकासक सघनता बढ़ैए, तेना-तेना मनुक्ख साधारण जीवनसँ विशिष्ट जीवनक लेल अग्रसर होइत, विशिष्ट जीवन प्राप्त करैए। ओना, साधारणसँ विशिष्ट बनबाक जे प्रक्रिया अछि ओ सरपट नहि अछि, ओहिमे अनेको अवरोध सेहो अबैत छैक, जकरा प्रस्तुत कथामे नीक जकाँ कथाकार व्यक्त कयने छथि। निष्कर्षत: मनुक्खक साधारण-सँ-विशिष्ट जीवनक जे परिवर्तित स्वरुप अछि ओ एहि कथामे प्रदर्शित भेल अछि।
3. ‘हुसैत लोक’,कथाकेँ कथाकार वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ लिखलन्हि अछि। एखन धरि जे परिवार वा समाज रूढ़िवादी विचारसँ ग्रस्त चालिमे चलैत आबि रहल अछि, जाहिसँ परिवारक संग समाजक नोकसान सेहो होइत रहलैक, तकरा प्रस्तुत कथामे चित्रण करैत आजुक जे परिवेश अछि ताहि परिवेशक अनुकूल कोना परिवार आ समाजक गठन होयतताहि दिशामे कथाकार परिवर्तनक इशारा करैत कहलन्हि अछि- “कानून केहनो मोट-मोट किताबक किए ने हुअए जे ‘वयस्क भेला पछाइत अर्थात् अठारह बरख पुरला पछाइत, अपन-अपन विचारक मालिक सभ होइए, एहि लेल दोसरकेँ एतराज नइ हेबा चाही। मुदा की समाजोमे सएह अछि?”
4.‘हुसि गेलौं’,कथामे कथाकार जीवनक वर्णन करैत कहलन्हि अछि जे जीवन जीवन थिक। जीवनमे सम-विषम परिस्थिति अबैत रहैत छैक। जाहिसँ जीवन प्रभावित होइते अछि। आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक अनेकहु रंगक परिवर्तन जीवनमे होइत अछि। जेहेन परिस्थिति जीवनमे अबैए तेहने विचार आ व्यवहार सेहो बदैलते अछि। एही बिम्बकेँ पकड़ि प्रस्तुत कथामे जागेसर चर्च कएलनि अछि। जागेसर गरीबीक चलते अर्थात् आर्थिक मजबूरी भेलाक कारणे गामसँ दिल्ली गेलाह। किछु समयक पछाति पुन: गाम आबि गामहिमे रहैक विचार मोनमे रोपि लेलन्हि। जुगेसरक जीवनमे जे परिवर्तन भेल वएह एहि कथाक मूलमे अछि जकरा वैचारिक परिवर्तन कहल जा सकैछ।
5. ‘झूठक झालि’,कथाक माध्यमसँ कथाकार एकटा महत्वपूर्ण विचार दिसि इंगित कएलनि अछि। ओ विचार थिक जे आदियेकालसँ अर्थात् वैदिके युगसँ अपना एहिठाम सत्यकेँ छिपेबाक मनोवृत्ति विद्वत समाजक बीच रहल अछि। नारद, कालिदास, मण्डन मिश्र आ तुलसीदासकेँ आधार बना हुनका सभक प्रति जे झूठक प्रतिपादन होइत आबि रहल अछि तकरा चिह्नित करैत कथाकार ओहि झूठक जगह सत्यकेँ कोना स्थापित कएल जाए, ताहि दिशामे अपन विचार रखैत यथोचित परिवर्तनक स्वरकेँ इंगित कएलनि अछि। जाधरि समाजमे झूठक वर्चस्व बनल रहत ताधरि सत्यक संग अन्याय होइत रहत। जकर प्रभाव समाजक विचारधारापर पड़ैत रहत।
6. ‘दुष्टपन’,कथाक माध्यमसँ कथाकार समाजक ओहि मनोवृत्तिकेँ गहराइसँ पकड़ि अपन विचार प्रतिपादित कएलनि अछि जाहिमे दुष्टपनक क्रिया-कलापसँ इष्टपन प्रभावित होइत रहल अछि। आइये नहि, आदिये-कालसँ समाजमे एक दिसि जहिना इष्टपनक विचारधारा रहल अछि तहिना दोसर दिसि दुष्टपनक विचारधारा सेहो रहल अछि। दुष्टपनक जगह इष्टपन कोना स्थापित होयत, ताहि दिशामे कथाकार मण्डलजी गम्भीर चिन्तन-मननक संग महत्वपूर्ण परिवर्तनक विचार व्यक्त कएलनि अछि। ओ कहैत छथि जे जाबत धरि मनुक्खक संस्कारमे परतंत्र पकड़ने रहत ताबत धरि स्वतंत्र विचार दबल रहत जाहिसँ स्वतंत्र रूपे कियो अपन जीवन-यापन नहियेँ कय पाओत।
7. ‘रहै जोकर परिवार’,कथामे यात्राक वृतान्त अछि। एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार मिथिलाक समस्त समाजक ओहि मनोवृत्तिकेँ गहराइसँ पकड़ि प्रतिपादित कएलनि अछि जे मैथिल समाजक कोढ़-करेजकेँ खोखरि-खोखरि सभ दिनसँ खाइत रहल अछि। ओहि मनोवृत्तिसँ कोना समाजक इष्ट हएत, एही परिवर्तनक संग कथाक प्रारूप तैयार कएलनि अछि। कोना समाज अशान्तिसँ शान्तिक बाटपर औताह, कथाक मूल बिन्दु यएह थिक।
8. ‘परिपक्व निरलज’,कथामे कथाकार समाजक ओहि वर्गक लोकक जिक्र कएलनि अछि जे दोहरी चरित्र बना समाजमे अपनाकेँ ठाढ़ कयने छथि। ओहन लोकक विचार आ कार्य दुनूकेँ ताहि रूपेँ प्रतिपादित कएलनि अछि जाहिसँ परिवर्तनक दिशा केर रेखांकन भेल अछि। ओहन दोहरी चरित्रक लोक समाजक वैचारिक धरातलपर ताहि रूपेँ पसरल अछि जाहिसँ समाज दिनानुदिन कमजोर होइत अपन वास्तविक शक्तिसँ दूर भऽ गेल आ जेहो किछु बाँचल अछि सेहो दिनानुदिन क्षीण होइत जा रहल अछि। फलाफल समाजक अस्तित्व दिनानुदिन विकृत होइत जा रहल अछि।