उमेश मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलजीक व्यक्तित्व
ओ कृतित्व एक अनुशीलन
श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक जन्म 1947 इस्वीमे 5 जुलाईकेँ बेरमा गामक एकटा किसान परिवारमे भेलन्हि। ‘बेरमा’ मिथिलांचल अन्तर्गत मधुबनी जिलाक झंझारपुर अनुमण्डल स्थित लखनौर प्रखण्डक एक पंचायत अछि जे उत्तरी-पच्छिमी कोणक अन्तिममे पड़ैत अछि। तीन पीढ़ीसँ श्री मण्डलजीक परिवार एकपुरखियाह रहलन्हि। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी कहैत छथि-
“दिनांक 5-7-1947 इस्वीमे जन्म भेल। भरल-पुरल परिवार। तीन पीढ़ीसँ एकपुरुखियाह परिवार चलि अबै छल। जहिना बाबा तहिना पिता छला। घर लग पोखैर-इनार रहने पानिक सुविधा रहल।”[1]
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जखन तीनियेँ वर्षक अवस्थामे रहथि तँ हुनक पिता कालकवलित भऽ गेलखिन। श्री मण्डलजी आगाँ कहैत छथि- “पिताक मृत्युक किछुओ नै यादि अछि, सिरिफ गाछीमे जरैत अछिया टा...। जखन तीन बर्खक रही। दू भाँइक भैयारीमे छह बर्खक भैया रहैथ। पिताजी करीब एक मास बीमार रहला। इलाजोक नीक बेवस्था नहि, ताबत दरभंगा अस्पताल नै बनल छेलइ। झाड़-फूकसँ लऽ कऽ जड़ी-बुटीक इलाज समाजमे चलै छल।”
मण्डलजीक पितास्व. दल्लू मण्डल अगुआएल विचारक लोक रहथिन्ह। “एक तँ वंशगतो आधारपर आ दोसर जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पितोक ऊपर परिवारिक-समाजिक प्रभाव पड़ल छेलैन जइसँ किछु अगुआएल विचार रहैन।”[2]
पाँच-छह वर्षक अवस्थामे जगदीश प्रसाद मण्डलजी लोअर प्राइमरी स्कूल (बेरमा) जाए लगलाह। 1956 इस्वीमे प्राइमरीसँ उत्तीर्ण भऽ 1957 इस्वीमे अपर प्राइमरी स्कूल (कछुबी) मे नाओं लिखेलन्हि। तकर पछाति 1960 इस्वीमे केजरीवाल (झंझारपुर) उच्च विद्यालयमे नाओं लिखौलन्हि। आवागमनक असुविधा रहने पएरे झंझारपुर जाइत-अबैत रहलाह। 1965 इस्वीमे हायर सेकेण्ड्रीसँ उत्तीर्ण भेलाक बाद बी.ए. पार्ट 1 मे हिन्दी ऑनर्ससँ उत्तीर्ण भेलाह। पछाति सी.एम. कॉलेज, दरभंगामे नामांकण करौलन्हि। हिन्दी ओ राजनीति शास्त्र विषयसँ एम.ए. कए मण्डलजी अपन जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यकेँ अपनौलन्हि। एहि प्रसंगमे मण्डलजी स्वयं अपन पहिल औपन्यासिक कृति- ‘मौलाइल गाछक फूल’मे ‘दू शब्द’मे लिखनहुँ छथि-
“जहिया एम.ए.क विद्यार्थी रही तहिए नोकरीसँ विराग भऽ गेल। आठ बीघा जमीन रहए। खेतीसँ जीवन-यापन करैक बिसवास भऽ गेल।”[3]
मण्डलजीकेँ खेती-किसानी कार्यसँ लगाव केर कारण की? एहि प्रश्नक उत्तरमे दू गोट महत्वपूर्ण बात सोझामे अछि। पहिल, आत्मनिर्भरताक संस्कार आ दोसर परिस्थितिवश। परिस्थिति ई जे जगदीश प्रसाद मण्डल जखन तीनियेँ वर्षक छलाह तँ हुनक पिता मरि गेलन्हि। ई बात लगभग 1950-51 इस्वीक थिक। मुदा ई गुण रहलन्हि जे पितेक अमलदारीसँ दू भाँइ पिसियौत रहैत छलखिन। (कोसीक उपद्रवसँ भागल पीसा बेरमे माने सासुरेमे रहि गेल रहथिन।) तत्काल गार्जनी हुनके दुनू भाँइपर छलन्हि। मुदा ओहो लोकनि अर्थात् दुनू “पिसियौत भाए 1960 ईस्वीमे अपन गाम ‘हरिनाही’ चलि गेला।”[4] मण्डलजीक परिवार बिनु पुरुष गार्जनक भऽ गेलन्हि। मण्डलजी कहैत छथि- “दुनू भाय, श्री कुलकुल मण्डल 1954 इस्वीमे आ हम 1957 इस्वीमे गामक स्कूलसँ निकैल अपर प्राइमरी स्कूल कछुबीमे नाओं लिखौने रही। 1960 ईस्वीसँ परिवारक बोझ पड़ल।”[5] स्पष्ट अछि जे तेरहे वर्षक अवस्थासँ मण्डलजीक लगाव पारिवारिक क्रिया-कलापसँ, खेती-बाड़ीसँ छन्हि। अर्थात् उपरोक्त प्रसंगक ईहो एक महत्वपूर्ण कारण थिक।
ओना, जगदीश प्रसाद मण्डलक माए साहसी रहथि, शिक्षाक प्रेमी रहथि। ओहन परिवारक रहथि, जाहि “परिवारमे मामा 1942 ईस्वीमे अंग्रेजक गोली खा चुकल छला।”[6] “अपन गहना, जमीन बेच देल बच्चाकेँ पढ़बै खातिर।”[7]अत: जगदीश प्रसाद मण्डलजी एम.ए.क अहर्ता सेहो प्राप्त कएलनि।
श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी संवेदनशील व्यक्ति छथि। हिनकापर पिताजीक प्रभाव सेहो छन्हि। स्वतंत्रता संग्रामक समयमे सामाजिक-आर्थिक स्थितिसँ उपजल विडम्बनाक प्रति साकांक्ष आ मंथनक प्रवृतिक व्यक्ति छथि। 1947 इस्वीमे स्वतंत्र भेल भारत मुदा ई स्वतंत्रता आधा स्वतंत्रता अछि- ई विचार हिनका छात्र जीवनहिसँ उद्वेलित करैत रहलनि अछि। समाजक स्थितिपर हिनकर मन सदैव उद्वेलित होइत रहलन्हि। “सामन्ती सोच आ सामन्त मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबारे जकाँ शासन पद्धति चलए लगल।”[8] ..खेतमे काज करैबला बोनिहारोक स्थिति बद-सँ-बदत्तर छल। समस्यासँ ग्रसित राज्य सभ छलैहे तेँ भूदान आन्दोलन सेहो उधियाएल।”[9]
समस्याक प्रति सजग व्यक्तित्व जगदीश प्रसाद मण्डलपर सामाजिक अवस्थाक प्रभाव पड़लन्हि आ 1967 इस्वीक चुनावी दौरमे जनवरी 1967मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक सदस्यता ग्रहण कएलनि। 1967 इस्वीमे कामरेड भोगेन्द्र झा संसद सदस्य भेला पछाति हुनकर पहिल आम सभा सकरीमे भेल छल जाहिमे पन्द्रह-बीस व्यक्तिक संग लाल झण्डा लऽ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो गेल छलाह। “अढ़ाइ-तीन घन्टाक पछाइत सभा विसर्जन भेल। सभामे भाग लेनिहार चारूकातक लोक चलि गेला। ..स्टेशनेपर भोगेन्द्रजीसँ पहिल भेँट भेलन्हि।”[10] ई क्रम मण्डलजीक कम्युनिस्ट पार्टीसँ लगावक पहिल स्तंभ अछि। मण्डलजी ओहिना कम्युनिस्ट दिसि अग्रसर नहि भेलाह। एकरा पाछू समाजक दीर्घ समस्या सभ छलन्हि जकर क्रमवार परिचय निम्न तरहेँ अछि।
सृजनकर्त्ता संवेदनशील होइत छथि। ओ कतेको तरहेँ अनुभव करैत छथि- ‘पोथीसँ’, ‘प्रकृतिसँ’, ‘समाजसँ’ आ ‘समाज-देशसँ उठैत समस्यासँ’, सुरुजक सौन्दर्य आ तापक अनुभव सभ व्यक्ति करैत अछि। मण्डलजी समस्याकेँ नीक जकॉं अनुभव कएलनि आ ओहि समस्यासँ प्रेरित होइत रहलाह। यएह प्रेरणा हिनक धरोहर बनलनि।
किसानक समस्या- बाढ़िक समस्यासँ किसान त्रस्त होइत छल। ऊचगर जमीनपर बसब आ खेती लेल जंगल-झाड़केँ साफ कय उपजाऊ जमीन बनाएब किसानक कार्य। बाढ़िसँ गामक गामकेँ घेरा जाएब आ फसलक बर्बादीसँ उपजल कष्टसँ परित्राणक आकांक्षा जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ जोर मारैत रहलन्हि। “मधुबनी जिलाक सीमा-कातमे हरिनाहियो आ हर्ड़ियो गाम बसल अछि। तइ बीचमे एकटा मरना धार अछि जे हरिनाहियो आ हर्ड़ीओ दुनू गामकेँ उपटौने छल।”[11]
चुनावमे धान्धली- स्वतंत्रता प्राप्तिक पछाति सत्तापर कब्जा कय सुख-भोगक प्रवृत्तिक उदय भेल। ताहि लेल चुनावमे धान्धली पसरल- “चुनावमे जिला भरिक बूथपर खूब धाँधली भेल। ओना, जहिना खूब धाँधली भेल तहिना गामे-गाम मारियो-पीट खूब भेल आ केसो-मोकदमा खूब बढ़ल।”[12] ..पूर्व बिहार सरकारक छह गोट मंत्रीक विरुद्ध अय्यर साहेब रिपोर्ट देने छलाह। करोड़ोक लूट साबित भेल छल। द्रष्टव्य अछि हुनक शब्दमे- “बैद्यनाथ राम ‘अय्यर’, सुप्रीम कोर्टक जज छला। दक्षिणक छैथ। करीब पनचानबे-छियानबे बर्खक छैथ। जीविते छैथ। पूर्व बिहार सरकारक छहटा मंत्रीक विरूद्ध अपन जाँच रिपोर्ट दऽ देलखिन। करोड़ोक लूट साबित कऽ देने रहथिन।”[13] सामन्ती प्रथा टुटि रहल छल। देशमे लोक सभा आ विधान सभाक चुनाव लाठी हाथे शुरू भेल। जकरा जतेक हँसेड़ी ओकर जीत निश्चित होइत रहय। दलित आ कमजोर वर्गकेँ भोँट खसबैये ने देल जाइत छल। मालिकक हुकुम ईश्वरक हुकुम मानल जाइत छल। एतबहि नहि, गिनतीमे धान्धली होइत रहल- “बहुमत अल्पमतमे नामो बदैल देल जाइ छल।”[14] एहि प्रकारेँ देशमे राजनीतिक पराभव भेल। एहिमे स्वार्थ आ जाति भेद मुख्य आधार बनल। विशेष रूपसँ सामन्तवादी प्रथाक नव रूप सोझॉं आएल।
जीव हत्या- पौराणिक परम्परा छल जे मनौतीमे जीवक बलि हुअए, कोनहु पुल, कोनहु मकान आ दुर्गापूजाक समयमे बलि देल जाइत छल आ कतौ-कतौ बलि देलो जा रहल अछि। तात्पर्य जे देवताकेँ प्रसन्न रखबाक लेल बलि प्रदानक चलन अछि। हिनकर अर्थात् जगदीश प्रसाद मण्डलक गाममे, बेरमामे दूर्गापूजाक आयोजन होइत छल। गाम दू भागमे बँटल। एक भाग सामन्ती व्यवस्थासँ अनुप्राणित छल। तकर विपरित गामक छोट लोक (दलित-पिछड़ा) आनठाम पूजाक विचार कएलनि। “दोसर प्रश्न उठल बलि प्रदानक। बेरमा गामक परोपट्टामे दुर्गापूजा दुनू ढंगक चलैत, वैष्णव दुर्गा सेहो- जेतए बलि प्रदान नै होइत। माने किछु ठाम बलि प्रदानो होइत आ किछु ठाम नहियोँ होइत। गप ओझरा गेल। एक मतक गाममे दुनू मत पनपल। जहिना बैसार एक मतसँ शुरू भेल तहिना दू मतमे विभाजित भऽ गेल। बलि प्रदानक पक्षसँ अधिक लोक विपक्षक भऽ गेल।”[15] ..घमर्थन होइत-होइत बलि प्रदान रूकल।”[16] एहि प्रकारेँ बलि प्रदानक विरोध समाजमे जीव-हत्यासँ उपजल कुरीति दिसि संकेत भेल।
कर्मकाण्डक विरोध- समाजमे एखन धरि कर्मकाण्डक प्रथा प्रचलित अछि। एहिमे आर्यसमाजी, गायत्री परिवार, ओशो परिवारक सदस्य आ प्रगतिशील विचारधाराक लोक एखनहुँ एहि पद्धतिकेँ नहि मानि रहल अछि। पण्डीजीक सम्भाषण जे अहॉं जे देब हम मृतककेँ पहुँचा देब। ई मिथक रसे-रसे टुटि रहल अछि। बेरमामे कपिलेश्वर राउतक घरमे मृत्यु भेला पछाति पुरोहित आ कर्मकाण्डीसँ अनवन भेलनि, समाजक लोक अपने विधि-विधान सम्पन्न करौलन्हि, ताहिमे एकटा प्राणी श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो छलाह।
“कियो बजै छल जे जखन मुरदा जरौला पछाइत पोखैरमे नहेलौं, आँगन आबि लोह-पाथर छुलौं, अपना ऐठाम आबि सोहराइ वा मिरचाइ खा नहा कऽ कपड़ा बदैल लेलौं तखन छुतका केतेटा अछि जे तैयो लगले रहि गेल?”[17] “बिना पनचैतीए पनचैती भऽ गेल जे केशमे किछु लागल रहै छै जिनकर मन मानए कटाउ, नइ मन मानए तँ नै कटाउ।”[18]
गाम-घरमे भोजक औत्सुक्य बेसी रहै छैक, बिना पुरेाहित आ कर्मकाण्डी ब्राह्मणक मन्त्रोचारण कर्म समाप्त भेल मुदा भोजक प्रथापर सहमति बनल रहल। पुरोहितकेँ कर्ममे नहि अएलापर ‘रामअवतार राउतकेँ पुजबैक भार देल गेलैन आ बिदेसर ठाकुर सहयोगी बनि पुजा देथिन।’[19]
खेतीसँ लगाव- 1960 इस्वीमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी खेती दिसि अग्रसर भेलाह। हिनकर अधिकतर कथा, उपन्यास, नाटक, एकांकीतथा पद्य-रचनामे सेहो प्रकृति प्रदत्त पानि, रौद, मेघ, बाढ़ि आ गाछ-बिरीक्षक वर्णन अछि। कुशल ज्ञानवेता सदृश समस्त प्राकृतिक उपादानक वर्णन ओकर लाभ-हानि सभ किछु हिनका रचनामे अछि। कोन मासमे कोन फसल हएत। जौं फसल बाढ़िमे भॉंसि गेल ताहि बीचमे कोन फड़ कोन जड़िमे भेटत, जकरा खाकऽ जीवन निर्वाह हएत, एकर पूर्ण ज्ञान मण्डलजीकेँ छन्हि। खेतीसँ जीवनमे कोना परिवर्तन होयत आ कोन फसिल नगदी हएत आ कोन पारम्परिक, तकर विशद् वर्णन हिनक रचना सभमे छन्हि। हिनकर ई ज्ञान अनुभवसँ उपजल अछि। हिनक सम्पर्क कामरेड भोगेन्द्र झासँ रहनि। हुनकर विविध देश-परदेशक ज्ञानसँ जगदीश प्रसाद मण्डलजी लाभान्वित भेलाह- “जगदीश प्रसाद मण्डल खेतीसँ थोड़-बहुत जुड़ि गेल रहैथ। मिरचाइ, भट्टा, कोबी, अल्लू इत्यादि खेती शुरू केलैन। धान, मरूआ, रब्बी-राइक खेती जने हाथे हुअ लगलैन।”[20] ..भोगेन्द्रजीक सम्पर्कमे एला पछाइत जगदीश प्रसाद मण्डलजीक खेतीक प्रति आरो जिज्ञासा तेज भेलैन। तेज ऐ दुआरे भेलैन जे जर्मनी, जापानक खेतीक बात ओ मनमे बैसा देलखिन। हिसाब जोड़ैथ तँ दस कट्ठा खेत एक परिवारक (पाँच गोरे) लेल बेसीए बुझि पड़ैन।[21] एक तँ अपन हाथक पूजी खेत, दोसर जखन राजनीतिसँ जगदीश प्रसाद मण्डलजी जुड़ि गेलैथ तखन तँ काजो बढ़ि गेलैन। ..पूसा मेलासँ खेती-बाड़ीक किताब कीनि-कीनि आनए लगला। तैसंग किसानक जे कार्यक्रम होइ तइमे सेहो जाए-आबए लगला।”[22] विस्तृत अनुभवक उपयोग कय मण्डलजी खेती करय लगलाह। एखनहु हिनक बास आ परोपट्टाक जमीन लागल गाछ-बिरीछ आ अनेको रंगक फल, अनेको रंगक तरकारी, दरबज्जापर गाए-माल इत्यादि मण्डलजीक खेती-किसानीक प्रति लगाव केर उदाहरण अछि।
जातिवादी प्रथा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी समरस समाजक समर्थक छथि। हिनक रचनामे जातिगत विद्वैष नहि देखल जा सकैछ। सभक प्रति नम्र आ आदरपूर्ण व्यवहार देखल जा सकैछ। तखन तँ पूर्वसँ जकड़ियाएल समाज अछि। एकाएक मलेरिया-रोग जकॉं दवाइसँ भगाओल नहि जा सकैछ। हिनक रचनामे जातिगत स्वार्थक आकलन अछि। एहि वर्णनसँ जगदीश प्रसाद मण्डलजी समाजकेँ सावधान करैत छथि। ओतहि टुटैत जाति-प्रथाक समर्थन सेहो करैत छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजी सभ विचार केलैन जे समाजक उत्थानमे जातिक कट्टरपन बाधा छी। ओना, जौं जातिक बीच कथा-कुटुमैती होइत अछि तँ ओ दू समाजक बीचक प्रश्न बनि जाइत अछि। मुदा समाजक बीच जातिक छूआ-छूत बहुत नमहर खाधि बनबैए...। तँए महिनामे एकबेर बैसार करब आ ओ करब टोले-टोल घुमि-घुमि, ई सबहक विचार भेलैन। बैसारमे कोनो बेसी जोगारक प्रश्न नहि, मुदा टोलबैयाक विचारसँ, जौं ओ सभ खाइ-पीबैक बेवस्था करैथ तँ सेहो बढ़ियाँ, सभ खाएब, ई सबहक विचार भेलैन।”[23] ई विचार समरसता आ जाति प्रथाकेँ तोड़बाक हेतु एकगोट सुलभ तरीका खोजलन्हि जे मण्डलजीक समरस विचारक द्योतक थिक।
बटेदारी प्रथा- पुरातन कालसँ जमीन्दार गरीब लोककेँ जमीन बटाइपर दैत रहल अछि। जमीन्दारक ओहि जमीनपर खेती करत बटेदार। ऊपजामे बाटल जाएत। उपजा बॉंटक भिन्न-भिन्न प्रथा। जमीन्दारक शोषण कायम रहल। समाजमे ई भावना उठय लागल रहैक जे ‘कमाइबला खाएत’ मुदा जमीन्दारक शोषणसँ आहत बटाइदारमे रसे-रसे विद्रोहक भावना उठल, जकरा दबाबय लेल लठैत हँसेड़ीक प्रचलन चलल। ‘जकर लाठी तकर भैंस’, एहि तथ्यकेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी एहि रूपे वर्णन कयने छथि- “हल्ला सुनिते-देरी जे जेत्तै रहए से तत्तैसँ लाठी लऽ कऽ दौगल। टोल आ दोकानक बिच्चेमे मारि फँसि गेल। जबरदस मारि भेल। केते गोरेकेँ कान-कपार फुटल। केस-फौदारी आ जहलक भय समाप्त भऽ गेल छेलइ। एकतीस दिनक भीतर अट्ठाइसो मुदालहक जमानत भऽ गेलैन। जमानतक पछाइत जमीनक दखल-दिहानी शुरू भेल। गड़बड़ भऽ गेल रहै जे, जे असल बटेदार रहै ओ केस नै केलक आ जे बटेदार नै रहै ओ केस केलक।”[24] बटाइदारी कानूनक पछातियो समाजमे ई प्रथा रहल जे अवसानक करीब-करीब पहुँचि चुकल अछि। छूआछूत सेहो समाप्त भऽ चुकल अछि। सुलभ शौचालयमे सभ वर्णक लोक काज करैत अछि। स्वरूचि भोजनमे परसयबलाकेँ जाति नहि पुछल जा रहल अछि।
भूदान आन्दोलन- विनोबा भावेक द्वारा चलाओल आन्दोलन सामन्तक कौर भऽ गेल रहय। जकरा पाइ-जमीन रहैक ओकरो भूदानक जमीन दिअ लगलय। घूसक कुप्रथा लागू भऽ गेल रहैक। जगदीश प्रसाद मण्डलजी एहि कुप्रथाकेँ अपना सोझमे देखने छथि। हिनकापर एकरहु प्रभाव पड़लन्हि- “भूदानी आन्दोलन अपन स्वरूप बिगाड़ि पाइक अड्डा बनि गेल, जइसँ मामला आरो ओझरा गेल। ओझरा ई गेल जे एक्के जमीनक पर्चा तीन-तीन गोरेकेँ भेटल। जइसँ जमीनबलाक झगड़ा जमीन लेनिहारोक बीच फँसि गेल।”[25]
भ्रमण एक अनुभव- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक बेसी जिनगी गामे-घरमे बीतल छन्हि। एकर नीक लाभ ई भेलन्हि जे हिनक अनुभूति-अनुभवक संसार पैघ छन्हि। कोन पावनि कहिया हएत, कोन मासमे कोन फसल लगाओल जाएत, कोन गाछक की उपयोगिता छैक, कोन गाछक रोगक की उपाय होयतआदिक संग गाम-घरक दंगा-फसाद, जमीनक झंझटि-विवाद इत्यादि हिनक अनुभावात्मक संसार छन्हि, जकर क्षेत्रफल बहुत पैघ छन्हि। एकदिन मण्डलजीक मनमे एलन्हि जे कोन राज्य कतय अछि? एहि हेतु ओ एटलस बहार कय ताकय लगलाह। एहिसँ हिनका मनमे भ्रमणक इच्छा जगलन्हि आ बहरा गेलाह भ्रमणक हेतु। हैदरावाद, त्रिपुरा, अगरतला, असमआबंगालक भ्रमण कएलनि। भ्रमणेटा नहि कएलनि बल्कि ओतुक्का संस्कृति, भाषा, परिवेश, लोकरंग इत्यादिकेँ सेहो एक जिज्ञासु सृजनकर्त्ताक रूपमे दर्शन कएलनि।
“असामसँ उत्तर-पूबसँ लऽ कऽ दच्छिन धरि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड राज्य अछि। ट्रेनक रस्ता थोड़ेक आगू धरि अछि। ऐठामक मुख्य सवारी बस-ट्रक छी। जंगल-पहाड़सँ भरल इलाका। हजारो किस्मक गाछ-बिरीछ। उपजाऊ जमीन कम। ओना, जैठाम रंग-रंगक गाछ-बिरीछ अछि तैठाम खाइबला फल सेहो हेबे करतै। ठढ़िया साग बाध-बोनक घास जकाँ उपजल।”[26]
“कनियेँ आगू बढ़लापर रबड़क गाछ देखलैन। पतियानी लगा रोपल छल। गाछक आकारसँ बुझि पड़लैन जे पनरह-बीस बर्खक हएत। बहुत भारी नहि। छाती भरि ऊपरमे खोधल, जइमे सँ लस्सा (दूध) निकलैत।”[27]
“जूटक एकटा कारखानाक संग लघु उद्योगक रूपमे बाँसक छत्ताक बेंट (डंटा), बाँसक बनल आरो-आरो वस्तु बनौल जाइत अछि।”[28]
“पूर्वांचल (असाम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरूणाचल, नागालैंड आ सिक्किम) मिला अपने-आपमे एक देश छी। जंगल, पहाड़, झील, नदी घाटीक समूह। भाषाक दृष्टिसँ सेहो बहुभाषी अछि। अपन-अपन क्षेत्रक भाषा सेहो छइ। मोटा-मोटी बंगला, अंगरेजी, हिन्दी, खासी, गारो, ककवार्क, मणिपुरी, मिजो, आओ, कोंयक, अंगामी, सेमा, लोथा, मोंपा, अका मिजू, शर्दुकमेन, निशि, अपतनी, हिलमिदि, तगिन, अदी, इदु, दिगारू, मिजिखम्री, सिंगफू, तंगला, नोक्टे, वांचू, लोपचा, भोटिया, नेपाली लिंबू इत्यादि।”[29]
एहि प्रकारेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ आन-आन क्षेत्रक भौगोलिक, सामाजिक, आचार व्यवहार आ प्राकृतिक रूपकेँ दर्शन भेलन्हि।
मण्डलजीकेँ अपन पैघ अनुभवसँ अप्रत्यक्ष रूपे कम्युनिष्टक आकर्षण बढ़ैत गेलन्हि। वस्तुत: क्रिया रूपमे जखन अएलाह तँ पार्टीक मिटिंग, कार्यक्रममे सम्मिलित होइत रहलाह। गाम-घरमे जमीनक विवादसँ लऽ कऽ आनो-आन कतेको तरहक सामाजिक मुद्दासँ सम्बन्धित केस-मोकदमा लड़लाह। कतेको बेर जहलक यात्रा करय पड़लन्हि। “1999 ई. अबैत-अबैत आशा-निराशाक बीच संक्रमणक स्थिति बनए लगलैन। 1998 ई.मे दफा 307क केसमे सजाए भऽ गेल रहैन। हाइ कोर्ट अपील होइमे 20-25 दिन लागि गेलैन। तइ समयमे रामपट्टी जेलमे रहैथ। मने-मन आश्चर्य होनि जे बिना किछु केनौं जहलमे छैथ। तहियो आ अखनो मन नै मानि रहल छेलैन जे कोनो गलती हुनकासँ भेल हुअए। खाएर, अपील भेल, जमानत भेलैन।”[30]
2000 इस्वी धरि जगदीश प्रसाद मण्डलजी समाज सेवामे संलग्न रहलाह। रूढ़ि एवम् सामन्ती व्यवहारक खिलाफ लड़ाइ लड़ैत रहलाह, केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे हिनक लगभग चारि दसक समय बीति गेलन्हि, पछाति साहित्य लेखनमे एलाह।
एहि प्रसंगमे मण्डलजी स्वयं अपन पहिल औपन्यासिक कृति- ‘मौलाइल गाछक फूल’क ‘दू शब्द’मे लिखनहुँ छथि- “पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल।”[31]
श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पहिल रचना औपन्यासिक कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’ थिकन्हि जे 2004 ईस्वीमे लिखलाह। 2008 इस्वी धरिक अवधिमे पाँच गोट उपन्यास, एक नाटक तथा किछु कथादि लिखि चुकल छलाह। मुदा कोनहु पत्र-पत्रिकादिमे एकहु गोट रचना प्रकाशित नहि भेल रहनि। तथापि हिनक कलम, लिखबाक क्रम जारी रहलन्हि- प्रस्तुत अछि एहि प्रसंगमे हुनकहि लिखल बात-
“मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।”[32]
8 नवम्बर 2008 मे मिथिलाक प्रसिद्ध ‘सगर राति दीप जरय’क 64म कथा गोष्ठी डॉ. अशोक अविचलक संयोजकत्वमे हुनक गाम- रहुआ संग्राम (मधेपुर)मे आयोजित भेल छल जाहिमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी उपस्थित भऽ ‘भैंटक लावा’ कथा केर पाठ कएलनि। एहि गोष्ठीमे भाग लेबाक आग्रह डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’ कयने रहनि। ओना, सगर राति दीप जरयक गोष्ठीमे भाग लेबए लेल आयोजक/संयोजकक हकार अनिवार्य नहि होइछ। कोनहु माध्यमसँ पता चलल वएह थिक हकार। ‘वियोगीजी’सँ जगदीश प्रसाद मण्डलक पहिल भेँट 2008 इस्वीमे मधुबनीमे भेल छलन्हि।
साहित्य क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पहिल मंच रहुआ संग्राम 64 सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीकेँ कहल जा सकैछ। जाहिठामसँ हुनक रचना सार्वजनिक हएब शुरू भेल। ओना, पहिने बेरमा पंचायत आ रहुआ संग्राम, दुनू मधेपुर ब्लौकक अन्तर्गत पड़ैत छल। जे कि जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कर्म क्षेत्र रहल छन्हि। समर्पित समाजसेवीक क्रिया-कलाप रहल छन्हि। 8.11.2008 लक्ष्मीनाथ गोसाँइक स्थानमे कार्यक्रम भेल छल। ओना, केतेक बेर राजनीतिक मंचपर रहुआमे बाजि चुकल छलाह, कर्म क्षेत्र छलन्हि तँए कथा वचैमे संकोच नइ भेलन्हि।[33]
2008 इस्वीसँ पूर्व जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एकहु गोट रचना सार्वजनिक नहि भेल छलन्हि। कोनहुँ पत्र-पत्रिकादिमे प्रकाशित नहि भेल छलन्हि। पहिल रचना ‘घर बाहर- पटना’सँ प्रकाशित भेलन्हि। जाहि कथाक पाठ रहुआ संग्राममे कयने छलाह, आ प्रशंसा भेल छलन्हि। द्रष्टव्य अछि के सभ प्रशंसा कयने रहन्हि- “डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’जी ओ कथा मांगि लेलैन। किछुए मासक उपरान्त ‘घर बाहर’ पत्रिकामे प्रकाशित केलैन। सिद्ध पुरुषक स्थानमे प्रतिष्ठा भेटल। डायरी-कलम भेटल। गमछा-पाग भेटल। लक्ष्मीनाथ गोसाँइक मुर्ति सेहो भेटल।”[34]
घर-बाहरमे एक आर रचना (कथा) प्रकाशित भेलन्हि। पछाति ‘मिथिला दर्शन- कोलकाता’मे ‘चुनवाली’ नामक कथा प्रकाशित भेलनि। चुनवाली, भैंटक लावा आ बिसाँढ़, कथा प्रकाशित होइतहि ‘विदेह’क सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजीसँ सम्पर्क भेलन्हि। तकर बाद मण्डलजीक रचना सभ पुस्तकाकार रूपमे प्रकाशित हुअ लगलन्हि। एहि सन्दर्भमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी ‘अप्पन बात’मे लिखलन्हि अछि- “घर बाहरमे भैंटक लावा आ बिसाँढ़ छपल आ फेर मिथिला दर्शनमे ‘चुनवाली’ कथा पढ़िते अनेको बधाइ फोन आएल जेना- पञ्जीकार विद्यानन्द झाजीक। एकटा महत्वपूर्ण फोन श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक रहल। हिनकर फोन सुनिते जिनगीक ओहन चौबट्टी टपि गेलौं जे चौबीस घन्टाक खुशी मनमे आबि गेल।”[35]
2009 सँ 2013 इस्वीक बीच जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल छन्हि। जाहिमे हिनका एक्कहु पाइ प्रकाशनक हेतु नहि देबए पड़लन्हि। ई चीज स्पष्ट होइछ दू ठामसँ, पहिल जे लेखक स्वयं अपन ‘तरेगन’ पोथीक ‘मनमनियाँ’मे लिखने छथि- “समय-समयपर गजेन्द्रजी (श्री गजेन्द्र ठाकुर, मेंहथ)क आग्रह आ सुझाव आ संगहि श्रुति प्रकाशनक श्री नागेन्द्र कुमार झा आ श्रीमती नीतू कुमारीक भरपुर सहयोग भेटलासँ लिखैक नव उत्साहो आ आशो मनकेँ सक्कत बना देने अछि।”[36]
आ दोसर-‘अंशु’ समालोचनाक पोथीमे श्री शिव कुमार टिल्लू लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लघुकथा ‘बिसाँढ़’ आ ‘भैंटक लावा’ घर-बाहरमे आ ‘चुनवाली’ मिथिला दर्शनमे प्रकाशित होइते मैथिली पत्रिकाक संपादक मण्डलक संग-संग प्रबुद्ध पाठकक मध्य हड़होरि मचि गेल। ‘पहिने आउ आ पहिने पाउ’क आधारपर विदेहक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर हिनक रचना सभकेँ अपन पत्रिकामे छपबए लेल हथिया लेलनि। ऐ प्रकारक शब्दक प्रयोग करबाक हमर तात्पर्य अछि जे जगदीशजी कोनो नव रचनाकार नै छथि, तिरसठि बर्खक माँजल साहित्यकार छथि, मुदा हिनक रचनाक प्रदर्शन नै भेल छल। समग्र रचना-संसार हिनक पुत्र श्री उमेश मण्डल जीक कम्प्यूटरमे ओझराएल छल किएक तँ छपबैले कैंचा केतएसँ आएत?”[37]
एहि तरहेँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आगमन मैथिली साहित्यक दुनियाँमे होइत छन्हि। बिनु पाइक अर्थात् बिनु खर्चेक पोथी प्रकाशन मैथिली साहित्यमे नव उदाहरण छल। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी एकसंग श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेलन्हि। वर्तमानमे ओहि तरहेँ पोथीसभक प्रकाशन पल्लवी प्रकाशन, निर्मलीसँ भऽ रहलन्हि अछि।
उपसंहार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन आस-पासमे होइत तमाम घटना, यथा-प्राकृतिक घटना, समय परिवर्तन, सामाजिक परिवर्तन, राजनैतिक परिवर्तन, लोक मानसक परिवर्तनकेँ साकांक्ष भऽ सर्वेक्षण करैत रहलाह, एकरहि परिणाम अछि जे हिनक रचनामे सभकिछुक दर्शन होइछ। कम्युनिस्ट पार्टीक उद्देश्य हिनका प्रभावित केलकन्हि। कम्युनिस्ट आन्दोलनक शीशा पानी, नूनथर, बराह क्षेत्रपर डैम आ कोशी नहरक निर्माण लेल सक्रिय भागीदारी देलन्हि। “पार्टी आन्दोलनक अन्तिम जेल यात्रा छेलइ। तेकर बाद जे जगदीश प्रसाद मण्डल गेबो केला तँ एक-दिना-दू-दिनामे। जे कएक बेर थानेसँ चलि आबैथ।..अपनो गाममे तेते मोकदमा भऽ गेल रहैन जे एक ने एकटा वारंट सभ दिन रहबे करैन।”[38]
जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ नव काल्हि देखैक इच्छा शुरूहेसँ रहलैन। से ओहिना नहि, कएला पछाति आरो मजगूत भेलन्हि। एहि प्रसंगमे श्री गजेन्द्र ठाकुर लिखित हिनक वायोग्राफीमे आएल अछि- “जेतए परिवारमे साधारण शिक्षाक आगमन भेल छेलैन। तैठाम मण्डलजी एम.ए. तक पढ़लैन। परिवारे नहि, गामेमे पहिल एम.ए. भेला। ओना, पैछला पीढ़ीमे संस्कृतक माध्यमसँ एक-पर-एक विद्वान बेरमामे भेला मुदा जेनरलमे जगदीश प्रसाद मण्डलेटा रहैथ। ..दोसर उदाहरण- बोरिंग-करौने खेतियोमे किछु नवता आबि गेल छेलै गाममे। दुनू रंगक खेती करै छला मण्डलजी। दुनू रंगकसँ मतलब- अन्नो आ नगदियोक। नगदी खेतीमे तरकारी आ फलक खेती सेहो करए लगला। ओना, जइ रूपे करए चाहै छला ओइ रूपे नै होइक कारण छल, किछु समैयोक अभाव आ किछु उपद्रवो। खेतीक एहेन उजाड़ि होइत रहैन जे जौं मारि-झगड़ा करए लगितैथ तँ दिनमे तीन बेर होइतैन। पैघ समस्याक आगू छोट गौण पड़ि जाइ छइ। मुदा मन तोड़ैक तँ अस्त्र भेबे कएल। उपद्रवो चाहे जेतए हउ मुदा मनकेँ प्रभावित तँ करिते अछि। तहूमे खेतीक उजाड़ि जइमे मेहनत आ पूजीक संग समैयक क्षति सेहो होइत।”[39]
हजारो बर्खक गाछ किछु-ने-किछु अपनामे नवीनता अनिते रहैए। चाहे नव टुसा हउ आकि नव मुड़ी आकि नव पात आकि नव कलश। मण्डलजी पहिने विपुल अनुभव प्राप्त कएलाह पछाति लेखन दिसि अगसर भेलाह।
प्रस्तुत अछि मण्डलजीक आइ धरिक प्रकाशित पोथीक सूची, जाहिमे क्रमश: कथा, उपन्यास, कविता, गीत आ नाटक-एकांकी अछि-
कथा- 1. गामक जिनगी (2009), 2. तरेगन (2010), 3. बजन्ता-बुझन्ता (2013), 4. शंभुदास (2013), 5. उलबा चाउर (2013), 6. अर्द्धांगिनी (2013), 7. सतभैंया पोखैर (2013), 8. गामक शकल-सूरत (2014), 9. अपन मन अपन धन (2015), 10. समरथाइक भूत (2014), 11. अप्पन-बीरान (2014), 12. बाल गोपाल (2014), 13. भकमोड़ (2013), 14. रटनी खढ़ (2014), 15. पतझाड़ (2014), 16. लजबिजी (2014), 17. उकड़ू समय (2015), 18. मधुमाछी (2015), 19. पसेनाक धरम (2015), 20. गुड़ा-खुद्दीक रोटी (2015), 21. फलहार (2015), 22. खसैत गाछ (2015), 23. एगच्छा आमक गाछ (2016), 24. शुभचिन्तक (2016), 25. गाछपर सँ खसला (2016), 26. डभियाएल गाम (2016), 27. गुलेती दास (2016), 28. मुड़ियाएल घर (2016), 29. बीरांगना (2017), 30. स्मृति शेष (2017), 31. बेटीक पैरुख (2017), 32. क्रान्तियोग (2017), 33. त्रिकालदर्शी (2017), 34. पैंतीस साल पछुआ गेलौं (2017), 35. दोहरी हाक (2018), 36. सुभिमानी जिनगी (2018), 37. देखल दिन (2018), 38. गपक पियाहुल लोक (2018), 39. दिवालीक दीप (2018), 40. अप्पन गाम (2018), 41. खिलतोड़ भूमि (2019), 42. चितवनक शिकार (2019), 43. चौरस खेतक चौरस उपज (2019), 44. समयसँ पहिने चेत किसान (2019), 45. भौक (2019), 46. गामक आशा टुटि गेल (2019), 47. पसेनाक मोल (2019), 48. कृषियोग (2020), 49. हारल चेहरा जीतल रूप (2020), 50. रहै जोकर परिवार (2020), 51. गढ़ैनगर हाथ (अपूर्ण), 52. अपन काज अपने चिन्हू (अपूर्ण)
उपन्यास- 1. मौलाइल गाछक फूल (2009), 2. उत्थान-पतन (2009), 3. जिनगीक जीत (2009), 4. जीवन-मरण (2010), 5. जीवन संघर्ष (2010), 6. नै धाड़ैए (2013), 7. बड़की बहिन (2013), 8. ठूठ गाछ (2015), 9. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं (2017), 10. लहसन (2018), 11. पंगु (2018), 12.आमक गाछी (2018), 13. सधवा-विधवा (अपूर्ण), 14. भादवक आठ अन्हार (अपूर्ण), 15. सुचिता (जारी... )
पद्य- 1. इन्द्रधनुषी अकास (2013), 2. राति-दिन (2013), 3. तीन जेठ एगारहम माघ (2013), 4. सरिता (2013), 5. गीतांजलि (2013), 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ (2013), 7. सतबेध (2018), 8. चुनौती (2019), 9. रहसा चौरी (2019), 10. कामधेनु (2020), 11. मन मथन (2020), 12. अकास गंगा (2020)
नाटक/एकांकी- 1. मिथिलाक बेटी (2009), 2. कम्प्रोमाइज (2013), 3. झमेलिया बिआह (2013), 4. रत्नाकर डकैत (2013), 5. स्वयंवर (2013), 6. पंचवटी (2013), 7. कल्याणी (2015), 8. सतमाए (2015), 9. समझौता (2015), 10. तामक तमघैल (2015), 11. बीरांगना (2015)
साहित्यक प्रति हिनक दृष्टिकोण जे छन्हिओ द्रष्टव्य अछि- “मैथिली साहित्य जगत समाजसँ एते दूर हटि गेल अछि जे जोड़ब असान नै अछि। ओना, ई सिरिफ मैथिलीए-मे नहि, आनो-आन साहित्यमे भरपूर अछिए। जेना- कबीर दासक चर्च मैथिली साहित्यमे कम अछि मुदा कबीर दासक जे जिनगीक (जीवन पद्धति) इतिहास प्रस्तुत कएल गेल अछि ओ विवेकपूर्ण जकाँ नै अछि। विवेकपूर्ण नै हेबाक कारणे कबीर दर्शन समाजसँ हटि गेल अछि। जेहो सभ दर्शनक प्रचार-प्रसार कऽ रहल छैथ। ओहो सभ या तँ अपनो गुमराहे छैथ, नहि तँ लाथी छैथ, जे गुमराह केने छैथ।
तहिना तुलसी दास ‘गोस्वामी’ कहबै छैथ, मुदा केतेक गाए पोसने छला? जरूरत अछि युगानुसार साहित्यक निर्माण करब।
तहिना जाधैर मैथिलियो साहित्य समाजक वस्तु (समाजक साहित्य) नै बनत ताधैर के केकरा की कहै छिऐ से भाँज थोड़े लगत। तँए शुभेक्षु साहित्यकारक दायित्व बनैए जे एक आँखि समाजपर रखि दोसर आँखि जखन कागत-कलमपर रखता तखन मैथिली साहित्ये नहि मिथिलाक कल्याण हएत। राज्यक अर्थ जौं राजधानीक एकटा कार्यालयसँ लइ छी तँए मिथिलाक समाज छुटि जाइए। मिथिलाक समाजिक पद्धति वैदिक पद्धतिसँ आगू बढ़त तखने सर्वांगीन विकास हएत।”[40]
जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ समय-समयपर सम्मान/पुरस्कार सेहो भेटैत रहलनि अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा ‘गामक जिनगी’ लघु कथा संग्रह लेल ‘विदेह सम्मान- 2011’, बाल प्रेरक बीहैन कथा संग्रह ‘तरेगन’ लेल ‘विदेह बाल साहित्य पुरस्कार-2012’, तथा ‘नै धारैए’उपन्यास लेल ‘विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014-15’, ‘गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- ‘टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011’, मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- ‘वैदेह सम्मान- 2012’, मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- ‘वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ सम्मान- 2016’, रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- ‘कौमुदी सम्मान- 2017’, मैथिली साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा ‘कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015’, आ मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा ‘स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018’ इत्यादि।
एहि तरहेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अनवरत लेखन ने मात्र मैथिली साहित्य जगत बल्कि भारतीय भाषा साहित्यक बीच सेहो अपन स्थान निरूपित करैत अछि।
[1]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 07
[2]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 07
[3]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[4]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[5]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[6]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[7]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[8]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 18
[9]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 21
[10]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 42
[11]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 37
[12]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 40
[13]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 40
[14]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 88
[15]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 26
[16]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 27
[17]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 67
[18]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 67
[19]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 69
[20]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 60
[21]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 61
[22]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 62
[23]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 63
[24]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 80
[25]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 82
[26]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 99
[27]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 98
[28]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 101
[29]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 103
[30]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 123
[31]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[32]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09
[33]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 10
[34]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 10
[35]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 10
[36]तरेगन, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 06
[37]अंशु, शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, पृष्ठ संख्या- 53
[38]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 112
[39]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 124-125
[40]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 127
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