विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

बीहनि कथा—मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष

मुन्नाजी · 2020-06-15 · अंक 300

मुन्नाजी
बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष
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मैथिली कथा साहित्य मूलत: संस्कृत भाषा साहित्य सं अनुदित भ'अपन पएर पसारने छल।एकर बीजारोपन चन्दा झा द्वारा विद्यापतिक 'पुरूष परीक्षा' सं भेल छल।कालान्तर मे मैथिली कथाकार बाङला कथा माध्यमे पाश्चात्य कथासाहित्य सं परिचित भेला।तत्पश्चात मैथिली कथा लेखनक कथ्य,शिल्प आ विषय परिमार्जित भ' मैथिली कथा साहित्य के नव दृष्टि देलक आ ओ संस्कृतक शब्द ,कथा/गल्प नामे लिखाइत रहल।पछाति प्रो. रमानाथ झा सदृश्य
विद्वान/आलोचक ,अंग्रेजीक प्रभावे एकरा अंग्रेजी मे Short Story आ ओकर अनुवाद ' लघुकथा कहि संबोधित केलनि।तहिया सं इ कथा/ गल्प ,रचना त' ओही नामे होइत रहल मुदा विधागत ' लघुकथा ' (Short Story) विधाक अन्तर्गत मूल्यांकित होइत रहल।आ ताहि परिणामे मैथिलीक सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Short Story अनिवार्य रूपें लिखल भेटत।
तकर पछाति मैथिली साहित्यक इतिहासकार लोकनि सेहो कथा/गल्प नामक रचना कें लघुकथा विधाक श्रेणी मे राखि व्याख्या . करैत रहलाह।" संप्रति गल्प वा लघुकथा,उपन्यास सं अधिक लोकप्रिय भेल जा रहल ऐछ।तकर प्रबल कारण पाठक वर्ग मे क्रय शक्तिक क्षीणता वा पलखतिक अभाव, से नै जानि।" --डॉ. जयकान्त मिश्र-मैथिली साहित्यक इतिहास(प्रकाशक- साहित्य अकादमी)ऐ फरिछओठक पछाति अंग्रेजी साहित्यक विधाक पृष्ठभूमि मे ओहि विधा परिवारक अंग भ' स्थापित भेल। आगू ओकरा आओर फरिछबैत दुर्गानाथ झा श्रीश लिखै छथि--" आइ मैथिली साहित्यक एक मात्र उपलब्घि थिक लघुकथा(Short Story) पूर्वक कथाकार लोकनि गल्प आ उपन्यासक बीच शिल्पगत अन्तर नै बुझैत छलाह।मुदा आब इ स्पष्ट ऐछ।जाहि सं लघुकथा(कथा/गल्प नामे) विधागत स्वतंत्र परिचिति बना पओलक ऐछ।"--मैथिली साहित्यक इतिहास-दुर्गानाथ झा श्रीश।"
हमरा मैथिली प्रतिष्ठा वर्गक छात्र रहने मैथिली साहित्यक इतिहासक अध्ययनक अनिवार्यता छल। एहि अध्ययनक क्रमे मैथिली कथा के विधागत ' लघुकथा( Short Story)बुझबाक अवगति भेल। हम आश्चर्य चकित रही अग्रज सबहक हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरणक रूपें अंधानुकरण पर, ई की ?पहिने सं जे विधा विद्यमान आ स्थापित ऐछ(कथा/गल्प नामे) ' लघुकथा(Short Story)।तहन ओइ विधाक दोहरीकरणक की खगता ?माने पिता आ पुत्रक एकहि नामे पुकार ! जहन की दुनूक चरित्र,प्रकृति आ क्रियाकलाप एक दोसराक विपरीत। फेर नकल वा मिझ्झरक अज्ञानता किएक ? ओही अज्ञानता वा अंधानुकरण सं पार पएबाक आ विधाक शुन्यता के भरवाक लेल अवतरित भेल बीहनि कथा विधा (1995)।
सहयात्री मंच ,लोहना(मधुबनी)द्वारा भेल साहित्यिक बैसार मे सामूहिक रूपें सर्वसम्मति सं एहि विधाक अवतरण भेल छल। ऐ विधाक नाम की राखल जए ताहि पर बहसक पछाति श्री राज द्वारा ताकल नाम-" बीहनिकथा" पर सर्व सम्मति सं स्वीकृति द'आगू बढ़ाओल गेल।आ तहिया सं मैथिली कथा साहित्यक दू गोट विधा-पहिल,लघुकथा(Short Story)आ दोसर " बीहनि कथा(Seed Story)चलन सारि मे रहि गेल।
25 बरख सं कछुआ चालि सं चलैत बीहनि कथा विधा साहित्यिक छद्म खरहा सं टपि अपना के विजेता कहेबाक पात्रता आब हासिल क' लेने ऐछ।जन्मक पछाति ठेहुनिया मे कतेको के सैद्धांतिक पटकनिया दैत डेगा डेगी बढ़' लागल। तकर पछाति एकरा दबेवा/माटि मे गोड़बा लेल किछु तथाकथित/स्वघोषित विद्वान सक्रिय भ' गेला। फलत:एकर चालि बाधित होइत ठमकि सन गेल। सोझां मे ' एकला चलो रे' के उघैत करीब एक दशकक यात्रा एकरा हेरेबा लेल वेश रहल।2010 मे पुन: इ कान्ह उठेलक।आ ताहि मे पछिला सं जेरगर समूह नव आँखि-पाँखिक संग अंगेज पुन: सोझां आनि थिर केलनि।' विदेह , इ पाक्षिक' बनल राजपथ आ सारथी भेलाह संपादक-.गजेन्द्र ठाकुर आ सहायक संपादक-उमेश मण्डल। ऐ एक दशकक भीठ पड़ल साहित्यिक जमीन पर श्री राजक ' बीहनि कथाक साहित्यक बीराड़क बीहनि सं रोपनि भेल।तकरा हरियरी अनलनि गाम-घर, पत्रिकाक संपादक - शःरी रामभरोस कापड़ि भ्रमर।आ ऐ तरहें श्री राज भेलाह' वात्सल्य ' बीहनि कथा(2003)सं एकर पहिल प्रकाशनक स्वामी।
बीहनि शब्दक उत्पत्ति
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संस्कृतक ' ब्रीही ' शब्दक अर्थ होइछ बीज आ मैथिली मे बीहनि/बीहन/बीहैन सेहो ओही शब्दक मूलार्थ मे निहित।--प. भवनाथ झा
बीहनि कथाक अर्थ आ परिभाषा
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बीज/बीजम संस्कृत शब्द थिक।यथा-यज बीजै:सहस्त्राक्ष -महाभारत
कथा सेहो संस्कृत शब्द थिक।यथा-कथासरित्सागर ।
अर्थात् बीहनि कथा पूर्णत: संस्कृत शब्दक उत्पत्ति थिक।जेना- लघुकथा
मुदा साहित्यिक विधाक रूपें जाँची त' इ विधा मूलत:स्वतंत्र आ पूर्ण रूपे मैथिली साहित्य मात्रक विधा थिक।आयातित/ नकल नै।
बीहनि माने बीज/बीया।जाहि मे विकास करबाक गुण निहित होइछ।मुदा ओ अविकसित रहैत ऐछ।समय अएला पर विकसित होइत ऐछ।ओकरा मे एक सं अनेक होएबाक गुण रहबाक चाही।बीहनि कथा-एहेन कथा,जे अनेक कथा(कथा/उपन्यास)के जन्म देबाक क्षमता राखए ओ बीहनि कथा भेल/हएत।अन्यथा नै।
तें बीहनि कथा मे निष्कर्ष नै हेबाक चाही।---डॉ. भवनाथ झा
बीहनि कथा विधाक नामकरण कर्ता श्री राजक मतानुसार--
बीहनि कथा,ओइ बीयाक समान ऐछ जकरा मे झमटगर/पूर्ण गाछक संभावना हो।मुदा ओ गाछ पीपर/पाकैड़ नै,पौध रूप मे हो।परञ्च बोनसाइ नै।
पौध रूप सं तात्पर्य जे कथ्य/शिल्पें गसल मुदा शब्दक संख्ये सए सं डेढ़ सए धरि हुअए।मुदा बन्हन मे बान्हल नै।
रचनान्त निकसगर(निस्तार देने)नै हुअए।निष्कर्ष पाठक पर।
बीहनि कथाक चर्चित आ लोक प्रिय कथाकार, संपादक आदरणीय घनश्याम घनेरो ऐ विधा के परिभाषित करैत कहै छथि---
कोना बुझबै जे इ रचना बीहनि कथा भेलै:--
(क)शब्दक मानक औसत सव सौ हो
(ख) विषय मारक ,आ सोचबा पर विवश करैत हो।
(ग) कथ्य एहेन,जेना लगैत हो कथा/उपन्यास वा कोनो गद्यक सार हो।
(घ) कथा मे निष्कर्ष नै हो।
कथा साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर श्री राजकुमार मिश्र जीक विचारें---
(क) आकारगत छोट सं छोट हो
(ख) कथ्ये फरिछएल आ गसल हो
(ग) संपूर्ण गद्यक संभावना निहित हो
(घ) ऐ सं इतर, अव्यवस्थित रचना फोंक हएत।ओ बीहनि कथा नै।
बीहनि कथा विधाक मानकीकरणक आधारभूत इकाइ
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गद्य साहित्य, मूलत: कथा विधाक मानकता तयकरणक आधार अंग्रेजी साहित्य ऐछ।अंग्रेजी साहित्यक अनुसार विश्व भरिक कथा ,अंग्रेजीक Flash fictionक अन्तर्गत निहित ऐछ।इ फ्लैश फिक्सन छ: खण्ड मे विभाजित ऐछ जकर तेसर खण्ड टेलब्रा(Tellbra )क अन्तर्गत मैथिलीक बीहनि कथा विधाक नियामकता सन्निहित ऐछ।
फ्लैश फिक्सन(टेलब्रा)पर आधारित बीहनि कथा मापनक महत्वपूर्ण बिन्दू :-
01-कथ्य/शिल्पें पुष्ट जाहि कथाक न्यूनतम शब्द स. 20 आ अधिकतम 150 हो।
02-कथा साहित्यिक मानकताट परिपालक हो।यथा कोनो संस्मरण वा शब्द संग्रह मात्र बीहनि कथाक श्रेणी मे नै राखि सकैछ।
03-कथा,एकटा बीजक कथाक प्रतिदर्श हो।अर्थात एहेन कथा जाहि सं कथा/उपन्यास आदिक सर्जनाक संभावना प्रबल हो।
04कथा, निकस पर जा स्थिर नै हो। अन्त खूजल मुदा भावपूर्ण हो।
05-संपूर्ण कथा कोनो संदेशप्रद वा सकारात्म्क उद्देश्यक हो।शब्दक स्थूलकाय मात्र नै।
उपरोक्त मानकता पर ठाढ़ रचना बीहनि कथा विधाक रचनाक रूपें अपन जग्गह पेबा मे सक्षम भ' पाओत।तकर पहिल मूल्यांकन लेखकक,पछाति संपादक ओ आलोचकक हाथ ऐछ।
"कोनो नव सफलता हासिल करवा लेल पुरान मे पैस' पड़त।,खंघार'पड़त।तहन परिमार्जित फल सोझां आओत।जे भविष्यक नव बात गढ़ि मोकाम धरि ल' जएबा मे सक्षम बना पाओत।'
एहि तरहें मैथिलीक लघुकथा विधा(कथा/गल्प)नामे लिखाइतक पछाइत बीहनि कथा विधा वैश्विक कथा मापदण्डें एकटा नव प्रतिमान गढ़ि,मैथिली साहित्य मे मैथिलीक अपन एक मात्र विधाक रूप मे स्थापित भेल।इ कोनो आन आयातित/नकल,विधाक विधान्तरण वा नामान्तरण नै।स्वयं मे मानक स्वतंत्र विधा हेबाक परिचिति कायम केलक।
एहि प्रकारें मैथिली कथा साहित्यक दू टा स्वतंत्र विधा अपन अस्तित्व कायम क' रखने ऐछ।पहिल-लघुकथा (Short story)जे कथा/गल्प नामे लिखाइछ।ठीक ओहिना जेना कि अंग्रेजीक Poetry,मैथिली मे 'काव्य' नामक विधान्तर्गत-गीत,गजल,,कविता, हाइकु,क्षणिका आदि स्वतंत्र नामे/क्रियाकलापें/चारित्रिक गुणे अपन- अपन परिचिति बनौने ऐछ।मुदा विधागत सबटा काव्य परिवारक अंश वा अंग थिक।
दोसर-बीहनि कथा(Seed Story)
उपरोक्त दुनू विधा मध्यआओर कोनो वैध/अवैध विधाक लेल जग्गह वाँचल नै ऐछ। मुदा लघुकथा नामे बलधकेली मे हिन्दी लघुकथा विधाक नकल मैथिली अवतरण के घोसियेबाक असफल प्रयास ठाम ठीम क' मैथिली साहित्य के उकरू बनेबाक षडयंत्र जारी ऐछ।इ भ्रम वा द्वन्द ऐ द्वारे भेल जे किछु मैथिली रचनाकार लघु कथा माने आकारे छोट कथा बूझि नकल करैत रहलाह।ध्यातव्य महत्वपूर्ण बात जे लघुकथा एकटा शब्द मात्र नै,ओहि नामक एकटा स्वतंत्र विधा थिख।जे मैथिली मे अदौ काल सं कथा/गल्प नामे लीखाइत पहिने सं स्थापित ऐछ।आब तहन विचार करी मैथिली सं इतर हिन्दी भाषा साहित्यक अपन विधा " लघुकथा "क मैथिली अंधानुकरण पर।
कोनो व्यक्ति,विषय,बौस्तक गुणक अनुसरण/अनुकरण बेजए नै।मुदा अंधानुकरण कतेक उचित ?
मैथिली साहित्य मे विद्यमान " बीहनि कथा " विधा सं इतर सब विधा कोनो ने कोनो अन्य भाषाक विधा सं आयातित ऐछ।मुदा जत' सं आयातित भेल,ओइ मे आ मैथिली मे अपन मानकता वा प्रामाणिकता सिद्ध केने ऐछ। हिन्दीक लघुकथा विधा जे स्वयं मे आइयो मानक वा प्रामाणिक सिद्ध नै भ' पावि घड़ीक पेण्डूलम जकां डोलि रहल ऐछ।ओइ मे आइयो कते शब्दक वा कोन रचना ओइ विधाट रचना ऐछ की नै,तै पर मंथन चलिये रहल ऐछ।एते दशकक लेखनक पछातियो मूल्यांकन मे लघुकथाक जग्गह लघुकहानी सं जोइर व्याख्या होइछ।जतेक मुड़ी ततेक पीरी बला गप्प।एहेन अव्यवस्थित विषय/बौस्तक अंधानुकरण ,हास्यास्पद आ कि उठल्लूपन ? "अपने आँखिगर रहैत, अन्हरा के सहारे बाट ताकब कतेक उत्कीर्णा बला बात।"
हिन्दी लघुकथा विधाक अंधानुकरणक प्रबल पक्ष रहल हएत,हमर सबहक सामान्य शिक्षाक हिन्दी माध्यम।हम सब एकेडमिक शिक्षा ग्रहण सामान्यतया हिन्दी भाषा माध्यमे केलहुँ।किताब,पत्र/पत्रिका क पाठनक भाषा हिन्दी रहलाक कारणे हिन्दी साहित्यक विषय-वस्तु पर निर्भर स्वाभाविक छल।तें हिन्दी साहित्यक संतान(विधा)कें पोसपूतक रूप मेअवैध रूपें अंगेज लेब अस्वाभाविक नै।ओही देखाँउसे वा नकल क'मैथिली मे लघुकथा संग्रह नामे 1972 मे आयल पहिल पोथी-" जे की ने से "--डॉ. हँसराजक।आ ,1975 मे तत्कालीन नवतुरिया कथाकार डॉ. अमरनाथक " क्षणिका "।दुनू पोथीक रचनाकार(आमुख मे)ऐ संग्रहक एको टा रचना ,कोनो पत्र/पत्रिका मे प्रकाशित नै हेबाट बात स्वीकारने छथि।ऐ सं इ स्प्ष्ट ऐछ जे मैथिली मे एकर कोनो अस्तित्व नै रहै।इ तहिया के घटना/बात छैक जहिया मैथिली सं इतर अन्य भाषा मे कथ्य/शिल्पें मजगूत मुदा आकारगत छोट रचनाक एकटा स्वतंत्र विधाकरूपें/नामे सृजन भ' रहल छलै।यथा-संस्कृत -लघ्वी,हिन्दी-लघुकथा,पंजाबी-मिन्नी कहाणी/कथावां,उर्दु-अफसांचे,ओड़िया-क्षुद्रकथा......आदि।
मैथिली मे हिन्दी विधाक अंधानुकरण क शुभारंभ क' किछु मैथिली कथाकार स्वघोषित विद्वान हेबाक दंभ पोसलनि।तकर करीब पचीस बरख धरि अंधानुकरणित लेखन सेहो सुषुप्त वा शुन्य रहल।पुन: 1997 मे लघुकथा संग्रह नामे दू गोट पोथी,शिलालेख-तारानन्द वियोगी आ खण्ड-खण्ड जिनगी -प्रदीप बिहारीक आयल।से ताहि अवस्था मे जाहि सं दू वर्ष पहिने(1995 मे)मैथिलीक अपन एक मात्र विधा बीहनि कथा अवतरित भ' चूकल छल।ऐ विगत पचीस वर्षक नमहर अन्तराल मे अंधानुकरणित हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरण पर मैथिली मे कोनो मानकता तय नै भेल छल।(आइ एकैसम सदीक दोसर दशक धरि नै भेल)।जेना पहिने मिथिला मे सत्यनारायण भगवानक पूजन पर सुनता उपासक चलनि छल।तहिना मैथिली रचनाकार लघु कथा शब्द सुनि मात्र लघु कथा लिखबाक नकल करय लगलाह।जहन की हिन्दी मे लघु कथा शब्द मात्र नै,ओहि भाषाक एकटा स्वतंत्र विधा ऐछ।आ मैथिली मे कथा/गल्प नामे लिखाइत लघुकथा विधा पहिने सं विद्यमान छल।आब नकल क' लिखल जाइ बला रचना-जे बीस शब्द सं आठ सौ धरिक ऐछ।तखन प्रश्न उठैत जे कतेक लघु,ककरा सं लघु ?ऐ पर प्रकाशित कोनो तय मानकता नै छल(ऐछियो नै)जाहि सं इ सुनिश्चित कएल जए सकए जे कोन रचना लघुकथा विधान्तर्गत स्वीकार वा अस्वीकार कएल जा सकए।प्रसिद्ध कथाकार ओ इतिहासकार डॉ. मायानन्द मिश्र एकरा नकारैत लिखने छथि--" मैथिली मे लघुकथा नामे एक अन्य कथा लेखनक विकास भेल ऐछ जे समकालीन कथा/गल्प नै,अपितु चुटुक्काक निकट ऐछ।"--मैथिली कथाक विकास(संपादक- बासुकीनाथ झा)साहित्य अकादमी -2003
आधार हीन लेखने मठोमाठ हेबाक/कहेबाक परम्पराक निवहता मे किछु रचनाकार लीन रहलाह।जहन कि बेसुरा तान सं प्रसिद्धि पेनिहार गायक जकां बिना मानकताक लेखन मे लीन रहनिहार अपना के प्रयोगवादी आ प्रतिष्ठित बुझनिहारक रचना आ ओ तथाकथित विधा स्वय: खारिज ऐछ।ताहि लेल अदखोइ-वदखोइ आ माथा पच्चीक खगते कोन?
हिन्दी विधाक मैथिली अवतरण लघुकथा नामक रचना आइ धरि बसात मे बौआइत ऐछ।जमीन पर अनबाक कहियो कोनो निश्तुकी प्रयास नै भेल।ओ तथाकथित विधा/रचना स्वत: खारिज होइत चेतना शुन्य भ' गेल।किएक त' जहन जमीन पर उतरबाक प्रयास केलक तहन आधारहीन हेबाक कारणे सूपक भाटा सन ओंघराइत रहल किएक त' स्थिरताक आधार पहिने सं नदारद!किछु स्वघोषित वा परपोषित विद्वान सब--" डाँरि पारि के ओकरा लक्ष्मण रेखा बुझ' लगलखिन,मुदा डाँरि सोझ भेल की वक्र तकरा सं दूर धरि सरोकार नै।"प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री कुणाल ,कथा प्रसंग लिखल अपन आलेखक अन्तिम अनुच्छेद मे लिखै छथि--"आब मैथिली मे लघुकथा नामे किछु रचना सेहो देखाइछ,जे मैथिली साहित्य मे आधार हीन ऐछ।तें ओकर चर्च करब व्यर्थ सन।"--अंतिका-रजतजयन्ती अंक(2008)संपादक- अनलकान्त।
लघुकथा नामित रचनाक भविष्य ?
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जेना अंग्रेज़ी मे पोएट्री,मैथिली मे " काव्य ' विधा ऐछ।आ ऐ काव्य विधान्तर्गत--गीत,कविता ,गजल,क्षणिका, हाइकु आदि स्वतंत्र नामे आ स्वतंत्र अस्तित्वे छैक।मुदा विधागत सब एकहि परिवार "काव्य "क अंग छै।तहिना अंग्रेजी क शॉर्ट स्टोरी विधा छै ,आ कथा/गल्प ओकर अंग।
मैथिली मे लघुकथा सं इतर दोसर कथा विधा छै " बीहनि कथा "(Seed Story),हिन्दीक अंधानुकरणे लघुकथा नामे सृजित रचना बीहनि कथा विधान्तर्गत ग्राह्य ऐछ।परञ्च बीहनि कथाक तय मानकता पर ठाढ़ होइ बला रचना मात्र।से ओ लघु कथा नामे होइ वा बीहनि कथा नामे।
बानगी स्वरूप देखल जए डॉ. सत्येन्द्र झा जीक लघुकथा नामे दू टा रचना-
इसकूल--
ओहि गाम मे एकटा दोकान नै छलै।तीन किलोमीटर जाय पड़ै छलै छोटो छीन चीज किनबा लेल।जे कियो कहियो दोकान फोलबाक साहस केलक ओकरा दोकान मे दोसरे -तेसरे राति चोरि भ' जाय आ तकर बाद दोकान बन्न भ' जाय।चोरवा गामक नाम सं परोपट्टा मे जानल जाइत छल ओ गाम।मुदा नरेशक साहस कहू वा दु:साहस ओ बाहर सं आबि दोकान फोललक ओहि गाम मे।घर मे पिता आ पत्नी विरोध कयलनि मुदा ओ ककरो नै सुनलक।दोकानक स्टाफक रूप मे सभ सँ सेसर चोर के रखलक।ओ चोर सेहो निश्चिंत छल जे जखने बेशी समान जमा होयत कि चोराक सभ किछु ल' जायब।।नरेश तीन सए टाका ओहि चोरकेँ दै छल।शहर सँ समान अनबाक हेतु नरेश ओही चोरबाकेँ पठबै छल। क्रमशः चोरवा कोन समान मे कते लाभ होइत छल सेहो धरि बुझय लागल।
आइ ओहि दोकान मे समान भरल छल।आजुके राति चोरबा अपन संगी सभहक संग चोरिक योजना बनौलक।जखन दोकान बन्नक' नरेश चलि गेल तँ चोरबा अपन संगी सभहक संग दोकान मे घुसल।बोरा मे समान सब कसय लागल।एकटा संगी पुछलकै -" कते दामक समान हाथ लागल ?"
दोसर चोर कहलकै-"पांच हजार सँ कम के नै हेतै।"
"मुदा एहि पांच हजार मे तँ मालिक के पांच सयसँ बेशीक फयदा नै हेतै।साढ़े चारि हजार तँ मूलधन छै।"--चोरबा बाजल---फेर ओहिमे हमरो तीन सय के हिस्सा हेतै।" चोरबाक म़ोन तीत भ' गेलै।ओ अपन मित्र चोर सभके बुझबय लागल--चोरि त' तखने जायज होइछ जखन हमर हक छीनि क्यो अपन घर भरय,मुदा नरेश बाबू तँ ओतबे कमाइ छथि जतेक उचित अछि।ओ नाजायज लाभ कहाँ लै छथि ?"
चोरबा चोरि करबाक विचार बदलि लेने छल।संगी सभ ओकर निर्णय पर सहमति व्यक्त कयलक।बोरा खोलि चोरबा सभ सामान केँ पहिने जकाँ सैंतय लागल।नरेश एकटा कोन मे ठाढ़ भ' ई सभ देखैत रहल।ओकरा बचझना गेलै जे ओ कोनो दोकान नहि,एकटा इसकूल खोलने हो।
विश्लेषण--उपरोक्त रचना शब्द संख्ये नमहर ऐछ!माने टेलब्राक निर्धारित शब्द संख्या-150 सँ उपर।
कथ्य-प्रेरक,पंचतंत्रक कथा समकक्ष।प्रारम्भिक लेखनक करीब बाझल।
शैली- कथा बला,सेहो पूर्ण नै।छेंट सन।
तें बीहनिकथाक परिधि सं बाहर ऐछ।
दोसर बानगी
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मौअति
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ओ ईमानदार छल।तेँ लोकसभ ओकरा मारय छल।लोकसभ कहलकै- तोरा कुकुरक मौअति मारबौ।ओ चुप्प छल,मुदा प्रसन्न।कारण- ओ मनुक्खक मौअति नहि मरय चाहैत छल।
विश्लेषण-इ रचना निर्धारित शब्द संख्या मे बान्हल ऐछ।
मुदा कथ्य - भाषण वा आदेशक हिस्सा मात्र।
शैलीगत-निष्कर्ष पर पहुँचा देल गेल छैक।
तें इहो बीहनिकथाक हद मे नै रहि रहल।
उपरोक्त दुनू रचना--सत्येन्द्र कुमार झाक लघुकथा संग्रह-अहींकेँ कहै छी(2007)।पृष्ठ- 30/31 सँ उद्धृत।
आब अही लेखकक इ तेसर कथा क बानगी नीचाँ ऐछ जे हुनकर नवका संग्रह-"जँ अहाँ सुनितहुँ"(2020) सँ ऐछ ।
भेटब डूबब
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" अहाँक जीवन मे सभ सँ नीक की लगैत अछि ?"
"अहाँके भेटब...."
"आ अहू सँ नीक.....?"
" हमरा हेरा जएब...?"
उपरोक्त रचना लिखल त' गेल ऐछ लघुकथा नामे मुदा बीहनिकथाक मानकताक करीब ऐछ।
यथा-निर्धारित शब्द संख्या(अधिकतम-150)क भीतर
कथ्य आ शिल्पें गसल।
निस्तार विहीन।
तें इ रचना पूर्णत: बीहनि कथा विधाक अंग मानल जा सकैए।शेष निंघेस सदृश्य।ठीक ओहिना जेना कोनो एक कक्षा मे पढ़ैत सब विद्यार्थी परीक्षा समय समान प्रश्न हल करैछ।परिणाम मे न्यूनतम अंक 30% प्राप्ति बला विद्यार्थी मात्र सफल आ शेष असफल घोषित होइत ऐछ।
आब एहने बानगी बीहनि कथा नामे लिखल रचना सँ....
डागदर साहेब-- मिथिलेश सिन्हा
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बड्ड दिन सँ पत्नी कहैत छलीह जे,हमरा पर किछु धियाने नै दैत छी।खाली मोबाइल मे खुटूर-पुटूर करैत कविता-कहानी रचैत रहैत छी.....जखन बेमारी बढ़त,पलंग पकड़ि लेब...तखन सबटा कविगिरि घुसरि जएत।
एहेन धमकी पर के नहि डरतै यौ?पत्नी केँ होमियोपैथिक दवाई पर पूर्ण विश्वास छैन्ह।पिछला मंगल दिन शहरक बड्ड पुरान एगो बंगाली डागडर ठाम हुनका ल' गेलहुँ।
सांझुक बेर,लगभग आठ-नौ गोट रोगी बैसल छलाह।डागदर साहेब बयस सँ लगभग अस्सी-पचासीक हेताह।एकटा रोगी पर आधा घंटा पूछताछ करैत,अपन डींग डांग सँ रोगी आओर परिजनकेँ अपन बड़प्पनक खिस्सा कहैत समय आगाँ खींचि रहल छलाह।हमर नम्बर दोसरे छल,मुदा घंटा भरि डागदर साहेब लागल रहलाह।
अगल-बगल मे बैसल आन रोगी अकछय लागल।आब हमर नम्बर आएल।
" किनको देखाना हाय ?"
" जी,हमर पत्नी केँ...।"
" हूँ,इधर आइए"
" हम हरि बाबूक बालक थिकहुँ.."
"ओहो,तुम इंजीनियर का बेटा है ।
ओ हमसे ही अपना इलाज कराता था..कैसा है ओ..?"--आन रोगी दीसन तकैत बजलाह।
" जी,ओ मरि गेलाह..."
" ओ गॉड...,तोमहारा माई कैसा है?"
"जी,ओहो मरि गेलीह...।"
हमर जवाब सुनि क' बेंच पर बैसल आन मरीज,बहन्ना बना ससरय लागल....।---डागडर साहेब,आश्चर्यचकित भाव सँ खन हमरा,खन रोगी सबकेँ ससरैत देखय लगलाह।
विश्लेषण:-
उपरोक्त रचना बीहनि कथाक मानक शब्द स. सँ बाहर ऐछ।
कथा मे उप कथाक समावेश।
कथ्य-शिल्पें कथाक छेंट सन लघु कथा।
----मिथिलांगन,अंक-38-39
निर्वहन--कल्पना झा
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--माय गे! दादी त' हाथे सँ लपे लप तिल-चाउर परसै छलीह,मुदा तों त' चम्मच सँ परसै छें ?
--धुर्र ! ताहि सँ की हेतैक ?
--नहि हेतैक की...?हमरो सबकेँ नीक रस्ता भेटल।
--से की ?
--"इएह जे ' निर्वहन 'मे सेहो 'चम्मच ' लगाओल जा सकैछ।
मिथिलांगन---36-37
विश्लेषण:-
इ रचना कथ्य-शिल्प आ शब्द स.मादे पूर्ण मुदा कथा सारक संग बन्न भेल।माने निकस पर कसैत।तें इहो कथा विधागत झूस ऐछ।
बेटा निगम। --घनश्याम घनेरो
लावारिस लहास पुछलकै :
-- बेटा! नगर निगम?
-- हम तोहर बेटा नहि, कर्मचारी छी।
-- हमरा लेखा तोहीं बेटा।
-- ठिक्के! लोक केँ लोक सँ मतलब नहि रहलै तँ...
-- पहिने हमरा घिसिएबह आ की कुकूर केँ?
-- तोरा।
-- पहिने हमरे किए?
-- एत्तेक मनुक्खता अखन छैक, तैं!
-- मनुक्खक लहास केँ बादमे आ कुकूर पहिने कहिया सँ घिसिएल जेतै?
-- ई काज हमर अगिला पीढ़ी करत।
घिसिया क' ठेलापर चढ़बैत काल लहासक आँखि कुकूर दिस छलैक।
इ रचना ऐ विधाक सब मानकता यथा- निर्धारित शब्दक भीतर।फरीछएल कथ्य आ गसल शिल्प मे निस्तार रहित पूर्ण ऐछ!
अन्तत:मैथिली साहित्यक दू भाग भेल -लघुकथा (SHORT STORY)आ बीहनि कथा ,(SEED STORY )इ दुनू निर्धारित रूपें निरन्तरता बनौने रहत।शेष फोंक मात्र।
--"पहिने बीहनि कथा,सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ैत रहल।
आ आब................पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ैत रहत।
# मुन्ना जी #

केशव भारद्वाज
कल्पवास (खिस्सा)
दहन बाबु के आंगन सं बड्ड ईच्छा रहईन - " एक बेर कल्पवास करितऊं "।
उनकर नैहरे- सासुर सब मास दिनक लेल कल्पवास केने छलईन।ओई कल्पवासक समय भोगल जिनगी, संत महात्मा के बोल- वचन, लोकक भीड़, सात्विक जीवन, साधु संतक बड़का बड़का टेंट, कुंभ में लोकक रेला, ओ मोरक पंख, लोहाक हांसु, लोक के हरेनाई आ हरेला पर तकनाई, सरकारक बेबसथा, हड्डी गलबअ बाला जार, भीजल जारईन, ईंटाक चुल्हा, सांझक बजार, तरकारी बाली सबहक मोल मोलई , ओ मोटरा- मोटरी, ओ ठगहा स्वामी, ओ वस्तुजातक चोरी, अहीना कतेक रास खिस्सा पिहानी ओ सुनने छईथ।
सासुर के लोक गेल होईथ वा नैहर के, खिस्सा एकरंगाहे। कल्पवास उनका अपना दिश सम्मोहित करई छलईन। ओ एक दु बेर पहिनेहो मोने मोन जाय के तैयारी केनहो छलीह लेकिन ऐन मौका पर कोई न कोई विघ्न बाधा सामने ठार भअ गेलईन। नई जा सकलीह, मोन मसोईस कअ रही गेलीह। अपने के मनेलीह- ओना अखईन तेहन बुढ़ थोरबे भेल छईथ, कल्पवास कोन भागल जाई छई।
आब सब जिम्मेदारी सं मुक्त भेली अईछ। ओना त भईर जीवन किछु ने किछु लगले रहई छई।दुनु बेटी अपन सासुर बसई छईन। बेटा के नीक नौकरी छईन। दु बरखक पोतो छईन। दिल्ली में बेटा-पुतोहु रहई छईन।नाईत, नतनी आ पोता भेलाक बाद उनका लागअ लगलईन जे आब बुढ़ भअ रहल छईथ।
ओना देह- दशा सं नीक छईथ। कियो नई कहतईन जे घरबाला नौकरी सं रिटायर कअ गेल छथीन। ओना ई दहन बाबु के उपराग में कहितो छथिन- आहां रिटायर भेल छी, हम नई। से मोन राखु।
कहलो गेल छई जे पोता भेलाक बाद स्वर्गक रस्ता सीधा खुईज जाई छई।
ईयाह स्वर्ग सुनला पर तअ कल्पवासक धुन सवार भेल छईन।अई बेर सोईच लेने छलीह जे किछु भअ जाय माघ में प्रयागराज जेबे करतीह।एक दु टा धरम करम बाली बुढ़ी सब के दोसराईत लेल पुछबो केलखिन, लेकिन ओ सब नई तैयार भेलखिन।अंत में हाईर कअ दहन बाबु के कहलखिन- " आहां हमरा कल्पवास में जा कअ छोईर देब आ फेर एक महीना बाद लअ आनब"।
से कियैक?
हम कै गोटे के कहलियनि, कियो संग दई लेल नई तैयार भेल।
अरे हम छी ने। हम संग देब!
सकारात्मक ज़बाब भेटला पर दहन बाबु के कनिया कनी आर जोशेली। बजलीह-
से तअ हमरा बुझल अईछ जे आहां संग हमर देबे करब।ओही सं त कहलऊं।
मूदा हम छोईर कअ नई आयब?
कियैक?
डर होईया। आहां कोनो बहुरूपिया साधु के नई पिछोड़ धअ लेबई।
आब कतअ जायब। ओतअ हम धरम करअ जाई छी। एहनो नई छी जे कियो बहला फुसला लेत हमरा।
बात बात में दहन बाबु अपनो कल्पवास जयबाक ईच्छा जतेलखिन।
आब की छलई। उनकर कनिया तअ खुशी सं झुमअ लगलीह। सब बेटा बेटी के अपन जाय के बारे में बतेलखिन।
सब बयस भेला पर बदलईत अईछ।दहन बाबु घरो में कहियो पुजा पाठ नई केलाह, ओ मास दिनक लेल कल्पवास करअ जा रहल छथि। सब के अचरज लगलई।
अगिले दिन इलाहाबाद बाला ट्रेन में रिजर्वेशन के टिकट अबिती- जयती के करा लेलाह। समान सबहक लिस्ट बनअ लागल। जे बुढ़ी सब पहिने कल्पवास केने छथि, उनका सब सं ब्रीफिंग पर ब्रीफिंग दहन बाबु के कनिया लअ रहल छलीह।जाय सं एक हफ्ता पहिनेहे सब जरूरत के समान कीना गेल छलईन। इलाहाबाद में एकटा सीधा संबंधी तअ नई, लेकिन जोड़ुआ तअ अबस्से कहबईन, ऊनकर पता आ फोन नम्बर सब लअ लेने छलाह। उनका सं एकदिन फोन पर गप्प सेहो भअ गेल छलईन। हुनका अपन आबअ के प्रोग्राम बता देने छलखिन। कोना की स्टेशन सं गंगा कात जेबाक छई, कतेक की भाड़ा लगतई, कोना आ कत्ते पाई में टेंट भेंटतई, सब बुईझ- सुईझ लेने छलाह।
दहन बाबु के कनिया के होईन की आब तअ ओ सोझे स्वर्गे जेतीह। ओकरे लेल रस्ता सब बईन रहल छई।
जाय सं एकदिन पहिने सब धीया- पुता के " आल द बेस्ट आ हैप्पी जर्नी" बाला फोन सेहो एलईन। आई ओ नानी-दादी बाला खाड़ी में अपना के असली में बुईझ रहल छलीह।
जखईन घर सं बिदा भेलीह तअ भईर दियाद बिदा करअ आयल छलईन।बुझा रहल छलईन जे कोनो जंग में जा रहल छईथ। लोक सब कुंभ आ कल्पवासक सुनल सुनायल गप कहईन आ डरबईतो रहईन। दहन बाबु के कनिया पर अकर एक नबको असर नई छलईन। उनका दहन बाबु के अफसर बाला रौब पर भरोसा छलईन। जे काज ओ हाथ में लई छलाह, सफलता भेंटते छलईन। चाहे बच्चा सबहक एडमिशन होई, ट्रेन में जतरा होई, बेटी सबहक कथा वार्ता होई, सब जगह ई गोटी लाल क कअ घुरल छलाह।
रेलवे टीशन पर छोड़अ लेल एकटा भातिज आ उनकर कनिया मोटर सं आयल छलखिन।एसी बोगी में रिजर्वेशन छलईन। बेशी भीड़भाड़ नई छलई। अपन आराम सं दुनु बेकती रिजर्व सीट पर बईस गेलाह।
जखईन अगिला दिन भोरे इलाहाबाद पहुंचलाह त देखईत छईथ जे एक गोटे उनका सब के लेबई लेल स्टेशन पर ठार छथि। ई ऊयाह व्यक्ति छलाह जिनकर पिता सं दहन बाबु के गप भेल रहईन।ओतअ सं ओ सब सीधा संगम गेलाह, जतअ कल्पवासक लेल टेंट सब लागल छलई। पहिनेहे सं इनका सबहक लेल एकटा टेंट ठेकनायल रहईन।ओ व्यक्ति फाइनल अई सं नई केने छलाह, ईनका सब के केहन नीक लगतईन?
बढ़िया जगह पर ओ टेंट लागल छलई। सब जगह ओतअ सं लगे छलई।थोड़ेक काल में ईनका सब के व्यवस्थित केलाह के बाद ओ व्यक्ति चईल गेलाह। उनकर अनुसार कल्पवासी के किछु काज आईब कअ ओ अपन खाता में धर्म के डेबिट कअ रहल छलाह।
कतऊ भी स्थानीय अपन लोक रहलाह पर सब किछु आसान भअ जाई छई। अखईन‌ प्रत्यक्ष में ई सब देखलाह।थोड़ेक काल में चुल्हा जड़ा कअ चाह बनबई गेलाह आ पीयई गेलाह। भानस भअ गेल, तअ बुझु सब भअ गेल। बदली बला सरकारी नौकरी में उनका सब के अकर अनुभव छलईन। सब सं पहिने, घर में घुसिते देरी ओ भंसे घर में जाई छलीह आ जै चुल्हा रहई, ओकरा पजाईर कअ चाह बनबईत छलीह। अतऊ ओहिना भेलई।
अगिला दिन स़ं अपन अई बालु परहक दुनिया शुरू भअ गेल छलईन। गंगाजी में प्रातः स्नान सं दिनचर्या शुरू होईन। दिनभर पुजा पाठ, भजन, खेनाई बनेनाई, आ गप्प सरक्का में बीतई। अद्भुते अनुभव रहलईन। केना भोर सं सांझ भअ जाई, कनियो नई बुझाई। कोनो तरहक विकार मोन में नई अबई। सुआईत ने लोक मास करअ अतअ अबई छई। दिन हो या राईत, चारु कात इजोते -इजोत, अलगे दुनिया छलई। कोनो ओहन सुविधा नई रहनेहो, खुब नींद होई आ भुख सेहो लगई। गंगा माई के कृपा ठीके अपरम्पार छईन, ओहिने उनकर महिमा।
सुर्यास्त सं पहिनेहे अतअ लोक रतुका भोजन कअ लई छल। ओकर बाद साधु संतक प्रवचन सब सुनईत छल। कतऊ कतऊ भंडारा सेहो लागल छलई। ईनका सब के पूर्वक संस्कार के कारण लंगर में के खेनाई खाईत ठीक नई बुझेलईन। ओना खाय बला प्रसादे कहई छल। ओ सब अपने बनबईत आ खाई छलाह।
पांचे सात दिनक बाद त कैक परिचित लोक भेटा गेलखीन। आब त सब कियो एकदोसरक टेंट में जाय आबअ लागल छलाह। ई कल्पबासीक नब दुनिया बईन गेल छलई। कियो साते दिन लेल आयल छल त कियो दु हफ्ता लेल, कियो किनको पहुंचाबई लेल त कियो कुशल क्षेम लेबअ लेल। सब अपन दुनिया में रमल छल।
दहन बाबु के कनिया के तअ कयेक टा मैथलानी चिन्हार परिचयबाली सब भेटा गेल छलखिन। पईंच उधारी सेहो गाम जेकां मऊगी महाल में शुरू भअ गेल छल‌‌‌। दहन बाबु चुपचाप सब देखईत रहई छलाह। उनका होईन जे अतऊ ऊनकर कनिया के सब ठईग रहल छईन।ऊमहर कनिया ऊनकर कल्पवास में दान-पुण्य करबाक चाही, सैह सोईच कअ देब लेब करई छलीह।
सांझ में एकटा संत के प्रवचन में ओ सब जाईत। ओ कहई-
ई संसार मिथ्या थीक। बेटा-बेटी,अपन आन सब भ्रम छई। जे सच छई। ओ आत्मा छई। ईयाह अचर, अजर, अमर छई।
कहियो ओ संत प्रवचन में कहई छई-
ई सब माया छई। आहां संग ई लोक तकने तक सटल अईछ, जाबईत ओकर स्वार्थ आहां सं जुड़ल छई। जहिये मतलब खत्म,ओ घुरियो नई ताकत।संग के रहत? ओ रहत अपन सद्कर्म। अही सद्कर्म के रस्ता पर कोना चलब? ओईलेल अपन सर्वस्व समर्पण के भाव जगाऊ भगवानक प्रति।
अहिना ओ संत तरह तरह के खिस्सा पिहानी सब कहई। ओकरा अनुसारे "अप्पन " किछु नई छई। जखन अई देहे के भरोस नई त आर दोसर कथी के,?
ओ संतक बाणी में तअ मिठास घोरल छलई लेकिन ओकर शब्द दहन बाबु के कनिया के लोहछा दई छलईन।बाकी सब पर ओतेक रंज नई होईन, जखईन ओ बेटा-बेटी पर कहई, त ओ इनका कनिको नई गिराईन।
एकदिन ओ प्रवचन में कहई छल- " मनुक्ख अपन स्वार्थ लेल ई माय- बाप आ संतानक जाल बनबईत अईछ। जाल के फेर पोखईर में फेंकईत अईछ.......... जाबईत धईर ओकरा माछ फंसईत रहईत छई............जाल नीक बुझाई छई। जखने जाल में माछ नई फंसलई, ओ जाल के ऊल्टबअ- पल्टबअ लगईत अईछ। ओकरा होई छई जे जाल में कोनो दोख छई, ताहि लेल माछ नई फंसल। दोसर - तेसर जाल बदलईत रहईत अईछ।ओ पोखईर में नई तकईत अईछ जे ओई में माछ छई वा नई। माछ नई जाल में फंसलाक कारण पोखईर में माछक नई भेनाई सेहो भअ सकईत छई।
ओहिना ई संसार छई। जाल भेल स्वार्थ। जाबईत माछ जाल रूपी स्वार्थ में भेंटईत रहई छई.........ताबईत सब नीके छई। जखने नई भेटलई, ओ बदईल लईत अईछ।अतअ पोखईर अईछ आहांक सद्कर्म। ऊयाह आहांक काज पुरा करबईत अईछ। दोसर कियो किछ नई करईत अईछ।आहां ई झुठहा के मोह-माया सं निकलु। अई लोक के ज्यों नई सम्हाईर सकलऊं, त ओई लोक के सम्हारू। आहां जरूरतमंद के दियऊ, नई की अपन कहल सखा- संतान के। आहा़ं अखनो देख सकई छी। मूदा आहांके आंईख पर संतानमोहक पर्दा लागल अईछ.........ओ नई किछु देखअ देत।
अहिना ओई महात्मा के प्रवचन सुईन कअ दहन बाबु के कनिया के मोन कनी काल लेल हिल-डुल जाई छलईन।फेर मोन में अबईन, भअ सकईत होई अई सधुबा संगे बीतल होई, तैं अपन राग अलापईत रहईत अईछ। दहन बाबु त प्रवचनक समय टेंट में आराम कअ कअ बीतबई छलाह। ओ नई अई पचरा में फंसई छलाह।
समय कतऊ रूकलईया। कल्पवासक मास बीत गेलईन। आबअ काल में बैग में भंसाक समान भरल आ आब सनेश सं भरल। मोरक पंख, लोहाक वस्तुजात,कयेक जगहक निर्माल, प्रसाद, गंगाजल सं भरल बैग लअ कअ टीशन आयल छथि, ट्रेन पकड़ई लेल। तखईन पता चललईन जे ऊनकर ट्रेन तअ कुंभ लअ कअ कैंसिल भअ गेल छईन। आर जे कीछु चिन्हल जानल लोक सब छलखिन, ओ सब दिल्ली जा रहल छलाह। उनकर सबहक ट्रेन में रिजर्वेशन छलईन। ओ सब आग्रह सेहो केलखिन। दहन बाबु सोचलाह जे दिल्ली में उनको बेटा छथिने। अखईन अतई चईल जाई छी.......संगत अईछ। मास दिन नीक सं बीतल........ जतरो नीक रहत।ई जे सनेश सब छई, अखने दअ देबईन। ओ मंदिरक निर्माल माथ पर सब के टटका टटकी लाईग जेतईन।टिकट लेलाह आ दिल्ली ऊनकर सबहक संग आईब गेलाह।
आब दहन बाबु के कनिया दिल्ली टीशन पर सं बेटा के फोन केलखिन जे हम सब टीशन पर आयल छी।आईब कअ लअ जाऊ।
बेटा तामसे घोर भअ कअ फोने पर ज़बाब देलखिन-
हम सब दक्षिण भारत आई जा रहल छी। आहां सब के पहिने बतबअ के छलाय।एना कतऊ हुलेले होई छई। हमर सबहक ई टूर छह महीना पहिने बनल छल। आहांके गामक टिकट छल त ईमहर किया एलऊं।
जे बुझाईत अईछ करु।हम अपन यात्रा नई कैंसिल कअ सकईत छी।फोन पर पाछु सं पुतोहु के बरबराईत अस्पष्ट बात सेहो सुना रहल छलई।
दहन बाबु के कनिया के चेहराक भाव देख कअ पता लाईग चुकल छलई जे की ज़बाब भेटल छईन।
पटना के दोसर ट्रेन लागल छलई। दहन बाबु ओकर टीटी लग गेलाह। अपन परिचय दईत दु चाईर टा रेलवे अधिकारी सबहक बारे में कहलकिन। ओ टीटी, पटनाक टिकट दुनु गोटे के बना देलकईन आ अपनबाला सीट एसी बोगी में दअ देलकईन।
दहन बाबु के कनिया कहलखिन-
हमरा आहां पर भरोसा छल जे आहां रस्ता निकालबे करब।
हम आहांके नेने छोड़ब।अतऊ गोटी लाल करबे केलऊं।
आब दहन बाबु के कनिया के ओई साधु के प्रवचनक सब शब्द मोन पईर रहल छईन। सब स्वार्थक संग छई- संतान सेहो।कियो ककरो संग तखने तक छई, जाबईत स्वार्थ पूर्ति भअ रहल छई। निश्वार्थ ऊयाह परम ब्रह्म अईछ।ओकरा पर यश अपयश, नीक बेजाय, उचित अनुचित , लाभ हान सब छोईर दियऊ आ जतअ जेना जहीया तक राखय.....खुशी खुशी रहु।जीवन रेतक टीला अईछ, अई पर नई कोनो घमंड आ नई राखु कोनो भ्रम।
कल्पवास इनका सब के जीवनक पाठ पढ़ा देने छलईन। आब मोह माया सं अपना के परे बुझईत गाम घुईर रहल छलाह। कहिया तक ई कल्पवासक प्रभाव रहतईन, से नई जाईन।

Suggested citation: मुन्नाजी. “बीहनि कथा—मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 300, 2020-06-15. https://www.videha.co.in/research/2020/300/बीहनि-कथा-मानकीकरण-ओ-तुलनात्मक-पक्ष.htm

मूल विदेह अंक / Original issue