विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता

आशीष अनचिन्हार · 2020-06-15 · अंक 300

आशीष अनचिन्हार
लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता (आलोचना)
"सबद" मने शब्द। "मितारथ" मने मितार्थ। श्री कविराज विश्वनाथजी अपन पोथी "साहित्यदर्पण"मे तीन प्रकारक दूतक वर्णन केने छथि ताहिमेसँ "मितार्थ" दोसर प्रकारक दूत अछि आ एकर लक्षण ई जे कम बात कऽ जे ठीक काज कऽ लैत हो। मने कम बातमे बेसी काज। वेदमे एहन ॠचाकेँ धाय्या मानल गेल जे कि यज्ञ कालमे गाएल जाइत कोनो सूक्तमे अतिरिक्त रूपसँ जोड़ल गेल हो। धाय्या मने समिधा सेहो होइत छै "क्रोधाग्नौ निजतातनिग्रहकथाधाय्यासमुद्दीपिते"। समिधा मने fuel सेहो कि तँ सभ तरहँक। प्राचीन कालमे पत्नीक बहुत प्रकारक होइत छलै जाहिमे "महिषी"केँ सेहो धाय्या कहल जाइत छलै ( मूलतः भरण-पोषणक हिसाबें। हमर अनुमान अछि जे "धाय" शब्दक जन्म एही ठामक हएत। "सबद मितारथ धाय्या" अरविन्द ठाकुरजी द्वारा लिखल कविता संग्रह केर नाम अछि।
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पहिल कविता "सुनू जयद्रथ" अछि। प्रतीक रूपमे जयद्रथक तते ने प्रयोग भेल छै अछि जे एकर उपयोग करए बलाकेँ बहुत सावधानी राखए पड़ैत छै से सावधानी एहि कवितामे नै राखल गेल अछि। एहि कविताक अंतिम किछु पाँति एना अछि--
"सुनू जयद्रथ
एहि बेर कृष्णक मायाक मुँह नहि जोहल जाएत
शुरू करब अहाँ जँ समर
सूर्यास्त धरि प्रतीक्षा नहि करब हम"
आन प्रसंग बादमे पहिने तँ हम इएह कहब जे जाहि तेवरक संग ई पाँति अछि ताहिमे हमरा हिसाबें "मुँह" शब्दक उच्चारण सही नै छै। एहि कविताक पाठमे "मूँह" स्वतः एतै। बहुत संभव जे लोक एकरा वर्तनी दोष मानथि मानथि मुदा हम एकरा मैथिली कवितामे लय कोना उपेक्षित होइत अछि तकर उदाहरण मानि रहल छी। आब एहि कविताक पहिल किछु पाँति देखी--
"एकरा काठी जुनि देखायब कि
हमर कविताक अनगिनत पृष्ठ सभहक बीच
अखनि सूतल पड़ल अछि बारुद"
कविताक शुरूआतसँ पाठक बुझैत छथि जे ई कविक अपन मनोभाव छै मुदा अंतिम पाँतिसँ ई बुझाइत छै जे कविक भीतर बैसल अर्जुनक मनोभाव छै आ तँइ हमरा बुझने कविताक शुरुआत ओ अंतमे संबंध नै छै। ई पूरा कविता एही तरहँक अछि। एकटा सकांक्ष पाठक लेल ई कविता साधारण हएत तँ साधारण पाठक लेल जटिल।
दोसर कविता "हम हत्या करय चाहै छी" केर सभसँ नीक बात जे ई कविता कोनो स्थूल नायक लेल नै लिखल गेल अछि। ई कविता विभिन्न प्रवृतिपर लिखल गेल छै। आब ई अलग बात जे विभिन्न प्रवृति एकै नायकमे हो वा कि अलग-अलग नायकमे। ई तरीका कोनो कथनकेँ कविता बना दै छै खास कऽ ओहन स्थितिमे जखन कि कविता गद्यात्मक हो। एहि कविताक नकारात्मक पक्ष ई जे कवि हत्या करबा लेल तते ने व्यग्र छथि ( भने ई व्यग्रता चरम दुखसँ हो) जे ओ विभिन्न प्रवृतिकेँ साँप बनि सेहो डँसबाक लेल तैयार छथि। बदला लेबाक कोनो तरीका जायज भऽ सकैए मुदा कविसँ हम कहबनि जे साँप बनबाक क्रममे जहर तँ हुनकोमे आबि जेतनि तँइ बदला लेबाक लेल साँप बनबाक तरीका हमरा उचित नै बुझाइए।
तेसरसँ सातम कविता इनार सिरीज अछि। वस्तुतः कविता संग्रह हम एहीठामसँ शुरु मानैत छी। मितार्थ एहिठाम पहिल बेर आएल अछि। इनार-1 मे वैष्णव सन शांतिप्रिय विरल ओ बहुअर्थी अछि। इनार-2 मे इनारक लालाटपर जे लिखल छै से वस्तुतः इनारपर नै आजुक आर्थिक परिवेशमे कमजोर लोकक ललाटपर लिखल छै। इनार-3 मे "अनठीया बेंग", "रक्तहीन क्रांति" आ "ढोरिया साँप"क प्रयोग कविताकेँ अलग दिशामे लऽ जाइत अछि जाहि ठामसँ प्रवासक चिंता सामने अबैए। इनार-4 कविता एहि सिरीजक कमजोर कविता अछि कामी पुरुषक दोष इनारपर नै थोपल जेबाक चाही। इनार-5 अकादेमी राजनीतिकेँ देखार करैए मुदा एहि कविताकेँ आर धरगर बनाएल जा सकैए।
"अलिखित कविता सभहँक पक्षमे" नामक कवितामे ओहन साहित्य सभकेँ अकानल गेल अछि जे कि मुद्रित नै भऽ सकल, अथवा पुरस्कृत नै भऽ सकल। ई नीक गप्प मुदा ईहो कविता अपन बात मुद्रित भैए कऽ कहि रहल अछि। बहुत संभव जे भविष्यमे पुरस्कृत सेहो भऽ जाए। किछु दिन पहिने रवीश कुमार नामक हिंदी टी.वी पत्रकार सेहो टी.वीक माध्यमे बजैत छलाह जे टी.वी नै देखल जेबा चाही। खएर माध्यम जे हो वंचितक पक्षमे बाजब बेसी जरूरी छै।
"बुद्धिबोर्धलक्षणा" नामक कवितामे कवि टी.वी चैनल आ अपन पोतीक माध्यमे स्क्रीनक पाछूक अन्हार देखेबाक प्रयास केलाह अछि। एहि कविताक नीक पक्ष ई जे आन कवि जकाँ जबरदस्ती नै देखने छथि। कवि ई स्वीकार करै छथि जे आने जकाँ हमर पोती सेहो एहि अन्हारमे फँसल अछि मुदा कविकेँ उम्मेद छनि जे एक दिन हमर पोती एहि अन्हारकेँ जरूर जानत। जँ हम पोती बदला पाठक पढ़ी तँ ई कविता आन अर्थ दिस लऽ जेबामे सेहो सक्षम अछि।
"हलफनामा" कविता मैथिलीक आधुनिक कविताक सर्वथा विपरीत अछि आ एकरा हम बहुत नीक मानै छी। एहि कविताक माध्यमसँ कवि मम्मट (प्राचीन आचार्य)केँ नकारै नै छथिन बल्कि मम्मटक विचारसँ आगू बढ़ए चाहै छथि। मैथिलीक कथित प्रगतिशील कवि अरविन्द ठाकुरकेँ पारंपरिक आ जड़ कहि सकै छथिन कारण ई कथित प्रगतिशील सभ बिना जड़िक नवीनता चाहै छथि। एहि कवितामे जे सत्तामे कील ठोकबाक बात कहल गेल छै ताहि लेल बहुत कथित प्रगतिशील कवि अरविन्दजीकेँ साधुवाद देताह मुदा हमर अनुभव ई अछि अधिकांश कविक लिखल क्रांति पोथिए धरि रहि जाइत छै मुदा आलोच्य कविक तेवर जे कवितासँ बाहर रहल अछि ताहिसँ उम्मेद जरूर जागल अछि जे ई कवि सत्ताक माथमे कील जरूर ठोकताह।
"बुद्धिजीवी सन ओ-1" नामक कवितामे कवि कोनो सुनिश्चित आशंकासँ दहलल ओ सिहरल छथि मुदा एकटा पाठकक तौरपर हम ई कहब जे जँ कविक आशंका सच भेल तँ कविकर्म लेल सौभाग्यदायक रहत। मितार्थ फेर आएल अछि "बुद्धिजीवी सन ओ-2" नामक कवितामे। भारतीय समाजमे बहुधा देखल जाइए जे कुकुरक अवशेषपर मजार अथवा गहूँम आदि अँकुरा कऽ मंदिर-मजार बना देल जाइत छै। एहि कवितामे "लाल लंगौटी" अपन एही अर्थमे अछि। जेना किछु दबंग उपरोक्त विधिसँ मंदिर-मजार बना अपन आय निश्चित कऽ लैत अछि जेहिते किछु बुद्धिजीवी अपन पिता-संबंधी-गुरूक ओ नायाब लाल लंगौटी पहीरि बुद्धिजीवी बनि अपन नाम-इनाम निश्चित कऽ लैत अछि। जरूरी नै जे ई लाल लंगौटी मात्र बुद्धिजीवी पहिरै छथि सत्ता ओ बेपार दूनूमे इएह लंगौटी पहिरल जाइए। मैथिली कविताक इतिहासमे "लाल लंगौटी" प्रतीक विरल अछि।
"हमर चेहरा पर हिंदुस्तान" नामक कवितासँ हम प्रभावित नै भऽ सकलहुँ आ ई हमर सीमा सेहो भऽ सकैए। जरूरी नै छै जे माथपर टोपी, गट्टामे ताग आ कन्हापर किछु रहत तखने अहाँ सर्वधर्म समावेशी कहाएब। महात्मा गाँधी बिना ई सभ केने सर्वधर्म समावेशी छलाह एवं आजुक नेता ई सभ कइयो कऽ कट्टर छथि।
"मुंबइमे स्वतंत्रता दिवस-1 एवं 2" नामक दूटा कविता अछि जकरा जोड़ि कऽ एकै कविता बूझब जरूरी बुझाएल हमरा। एहि दू कवितामे कवि अपन आ रेलिंगपर चहचहाइत फुद्दी बीचक स्वतंत्रताक वर्णन केने छथि आ अपनासँ बेसी स्वतंत्र फुद्दीकेँ मानै छथि। आगू बढ़बासँ पहिने हम पाठककेँ हिंदीक उपन्यास "चित्रलेखा" केर ओ अंश पढ़ए कहब जे कि नायक बीजगुप्त आ सहनायिका यशोधराक बीच भेल छै। कविए जकाँ यशोधरा सेहो कहै छथिन जे चिड़िया सभ कतेक आनंदसँ रहैत अछि ताहिपर बीजगुप्त कहलखिन जे चिड़िया सभ सेहो इएह सोचैत हेतै जे देखियौ आदमी सभ कतेक सुख-सुविधासँ रहैत अछि। आ ई नमहर कथन छै से देब अहिठाम संभव नै। कविकेँ एहि दुनियाँमे कतेक स्वतंत्रता भेटल छनि सेहो आकलन करब जरूरी।
"वाहक महान घटनाक" नामक कविता किनको चरित्रगत खसबाक प्रक्रियापर अछि आ से नीक अछि मुदा किछु पाँति बेसी बेर एलाक कारणसँ प्रभाव कम भेलैए--
"सोचय छी
सोचैत रहै छी
उठबाक हुअए कूबत त
खसैक खतरा मोल लएमे कोनो बुराइ नहि"
ई पाँति सभ कवितामे दू बेर प्रयोग भेल अछि जे कि प्रभाव कम करैत छै।
समझ कवितामे आएल भाव जे "केकरो बुझाबक लेल कनियों ओकरा सन होमए पड़तै" ताहिसँ हम सहमत छी।
"अन्यपुरुष" केर नामसँ 5टा कविता अछि। अन्यपुरुष-1 मे कांता, प्रभु, आ सुहृद ई तीनी शब्द एहि कविताक जान अछि जकर फैलाव निच्चासँ उपर धरि होइत अछि क्रमशः "सेक्ससँ सेंसेक्स" आ "शिलाजीत-मुसली" धरि पहुँचैत अछि। ओना हम कनी-मनी आयुर्वेद शास्त्रक जानकारी राखैत छी तँइ हम पाठककेँ कहबनि जे शिलाजीत-मुसली-अश्वगंधा मात्र यौन रोग लेल नै समान्य दुर्बलता हटेबाक लेल सेहो देल जाइत छै तँइ एहि सभहँक अर्थ मात्र यौने रोग धरि नै राखथि।
अन्यपुरुष-2 ब्राह्मणवाद विरोधी कविता अछि आ एहन समयमे एहने कविता लिखल जेबाक चाही। जे लोक ब्राह्मण आ ब्राह्मणवादकेँ एकै बूझै छथि तिनका लेल ई कविता पढ़बा योग्य नै अछि।
अन्यपुरुष-3 नामक कविता दरभंगाक भूतपूर्व मठाधीशक वर्तमान पुत्र सभ लेल लिखल गेल अछि कि 60 बर्खमे किछु नै भेलै से प्रलाप करए बला राजनीतिक दल लेल से कहब कठिन अछि मुदा मितार्थ एहिठाम चरमपर अछि आ तकर परिणित अन्यपुरुष-4मे भेटत।
अन्यपुरुष-4 नामक कविताकेँ हम वास्तु ओ ज्योतिषक किछु समान्य शब्दक माधयमसँ देखाएब। वास्तुमे दिशा तँ ज्योतिषमे ग्रह केर प्रधानता छै। वस्तुक हिसाबें हरेक दिशा लेल देवता आ ग्रह निर्धारित छै जकर विवरण निच्चा अछि--
उत्तर दिशा-देवता कुबेर, ग्रह बुद्ध
ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व कोना) देवता शिव, ग्रह वृहस्पति
पूर्व दिशा-देवता इंद्र, ग्रह-सूर्य
आग्नेय दिशा (पूर्व-दक्षिण कोना) देवता अग्नि, ग्रह-शुक्र
दक्षिण दिशा-देवता यम, ग्रह मंगल
नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम कोना) देवता राक्षस, ग्रह राहु-केतु
पश्चिम दिशा-देवता वरुण, ग्रह शनि
वायव्य दिशा (उत्तर-पश्चिम)-देवता वायु, ग्रह चंद्र
ऊर्ध्व -देवता ब्रह्मा, ग्रह उल्लेखित नै
अधो-देवता शेषनाग, ग्रह उल्लेखित नै
ई कविता ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व कोना) कोनसँ शुरू होइत अछि। एहि कोनक देवता शिव छथि ग्रह गुरू जे ज्ञानक प्रतीक छथि। एकर बाद वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा अछि जकर देवता वायु छथि आ ग्रह चंद्र जे कि गुरूक पत्नी संग व्यभिचार केने छथिन। एकर बाद नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम कोना) अछि जकर देवता राक्षस ओ ग्रह राहु-केतु छथि। राहु-केतु चंद्रक दुश्मन। जँ राजनीतिकेँ मानी तँ दुश्मनक दुश्मन दोस्त होइत छै अर्थात बृहस्पति आ राहु-केतु दोस्त भऽ सकै छथि चंद्रक विरुद्ध। मुदा ई बृहस्पतिसँ शुरु कएल ई कविता आग्नेय कोन धरि नै पहुँचि सकल आ एकर कारण थिक जे आग्नेय कोनक ग्रह शुक्र छथि आ बृहस्पति ओ शुक्र दूनू दुश्मन दूनू दू ध्रुव। अकारण नहि जे कवि अपन कविताकेँ अध-सीझल कहै छथि। ई कविता विशुद्ध रूपसँ लोकक अपन मानसिक द्वंदक व्याख्यान कहैए। कविता अन्यपुरुष (5) मे सहज-सरल रहबाक कामना छै मुदा सहज-सरल रहब एते सरल कहाँ छै। "जँ अहाँ गुरू छी" ई कविता स्थूल भऽ गेल अछि। साफे-साफ पता चलि जाइत छै जे ई गुरूघंटाल सभपर लिखल गेल छै। एहि कविताक अंतिम पाँति अधिकांशतः फूसि थिक। असली चेला कहियो गुरू छोड़ि इजोत दिस नै जा सकै छथि। असली चेला रूकल रहै छै गुरुक वध कऽ गुरूआइक आसन लेल। लाल लंगोटी कविता मोन पाड़ू। "उन्टा साँस लैत लोक आ विद्यापति" एहि विषयपर बहुत विचार विभिन्न विधामे आएल अछि आ भरिसक तँइ प्रभावति नै कऽ सकल हमरा। पृष्ठ 49 सँ 61 धरि 11 टा कविता दरभंगाक विभिन्न भंगिमापर अछि मुदा काजक कविता मात्र पहिल कविता (दरभंगा राज आ ओकर विरासति) अछि। दरभंगापर दोहा सेहो अछि। किछु दोहामे मात्रा ओ यति-गति सही अछि मुदा किछुमे गड़बड़।
"सहज सुमति माँगलनि विद्यापति" ईहो कविता सहज-सरल विषयपर अछि। हमरा विचारे ई कविता "अन्यपुरुष-5 सँ नीक अछि। आब फेर आएल अछि मितार्थ। दुर्योधनक कनियाँक नाम रहनि भानुमती आ भानुमती केर प्रयोग करैत 16 टा कविता अछि पृष्ठ 64 सँ 82 धरि। "तिरहुत आ भानुमती" नामक कवितामे मिथिलाक कथित महानता ओ मान्यतापर आक्षेप कएल गेल अछि। आ एकटा नमहर बहसक माँग करैत अछि। एहि कवितामे जँ "रिंग लीडर" शब्दक बदला "किंग मेकर" रहितै तँ बेसी नीक।
"भानुमतीक लिंग" नामक कवितामे मितार्थ जुत्ता पालिशसँ चंडी पाठ धरि कऽ रहल अछि। कवि लेल भानुमतीक लिंग चाहे जे हो मुदा एकटा पाठकक तौरपर हमरा लेल भानुमतीक लिंग "गरीब आ प्राइभेट" नौकरिहारा अछि। पाठक समुदाय एहि कविताकेँ पढ़िए कऽ मजा लऽ सकै छथि।
"भानुमती आ चुनाव" नकली वामपंथी सभपर अछि जे चुनाव वा आर कोनो तात्कालिक फायदा लेल अपन पुरुखाकेँ गरिआबैए। आ कविक मोताबिक भानुमती चुनाव लड़बा लेल एहन करैए। ओना बहुत बेर भूतकालक गलतीकेँ उजागर करबाक प्रक्रियाकेँ गरिआएब वा उकटब बूझि लेल जाइत छै। पाठक एहि कवितापर बिलमि एहि बिंदुपर सोचथि।
"भानुमतीक पुश्तैनी क्रम" वस्तुतः एकट्ठे हमरे सभहँक क्रम अछि। ई कविता मितार्थक अद्भुत नमूना अछि। "भानुमतीक हँसब" एहि कवितापर जाएसँ पहिने हमरा एकटा लोककथा मोन पड़ल। एकटा गरीब बच्चा कोनो राजा लग सभ दिन जाइक आ राजा ओकरा लग सोना आ चानीक सिक्का राखि दै ओ बच्चा चानीक सिक्का उठा चलि दै। राजा ओ दरबारी से देखि हँसै जे देखियौ केहन निर्बुद्धि छै जे सोना रहितो चानी उठबै छै। एक दिन ओकर माए वा बाप पुछलकै जे सोना किए ने उठबै छीही तँ ओ बच्चा जबाब देलकै जे जहिया हम सोना उठा लेबै तहियेसँ ई खेल खत्म भऽ जेतै। तँइ हम मूर्ख बनि चानी उठा लैत छी। आब कवितापर आबी। कविताक अंतिम पाँति अछि "हँसी सन पवित्र वस्तुओ भानुमती सन चंगला लग आबि धंधा भऽ जाइत अछि। आ एहिठाम आबि पाठक बूझि सकै छथि जे कवि कोन खेलक रचना कविता माध्यमसँ केने छथि। एहि कवितामे भानुमती कियो भऽ सकैए लोकथाक बच्चा सेहो, गरीब सेहो आ चमचा सेहो। बेसी बुझबाक लेल पाठक कविता पठथि।
"भानुमतीक उत्स" हम एहि कविताकेँ दू भागमे बाँटब। पहिल--- "गाछक जड़ि..........कंठस्थ कए उदरस्थ कएने अछि" आ दोसर- " जखनि कखनिओ उठैत अछि-----एकाकार भऽ जाइत अछि भानुमतीमे"। हमरा हिसाबें पहिले भाग कविता अछि। दोसर भाग एहि रचनाकेँ एकपक्षीय बना देलकै। जँ कवि एहि रचनाकेँ पहिले भागपर खत्म करतथि तँ ई दुनियाक हरेक भानुमतीक प्रतिनिधित्व करितै ओतबे शब्दमे मुदा एकर दोसर भाग आबि एहि रचनाकेँ एक भानुमतीपर केंद्रित कऽ कमजोर बना देलकै।
"कवि भानुमती" नामक कविता जाहि विषयपर अछि ताहिपर बहुत रास व्यंग्य, चुटकुला आदि रचल जा चुकल अछि। आ प्रस्तुत कविताक शिल्पो तेहन नै जे आकृष्ट करए।
"भानुमती आ काछु" नामक कविताक वएह दिक्कत जे ई दू भागमे अछि आ मात्र पहिले भाग कारगर अछि (काछु चारि इंचक-----कतेको साल तक)। जँ एहि कवितासँ दोसर भाग ( एहि धरतीपर---अपसियाँत भेल अछि भानुमती) हटा देल जाए तैयो एहि कविताक अभीष्ट पूरा भऽ रहल छै। "भानुमती आ घोंघा" नामक कवितामे भानुमतीकेँ घोंघा अपन लोक बुझाइत छै कारण घोंघेक दाँत सन भानुमतीक दाँत छै जाहिसँ ओ दुनियाँक हरेक वस्तुक भक्षण कऽ सकैए।
"भानुमतीक चिन्ता" ईहो कविता दू भागमे अछि आ हमरा हिसाबें एकर पहले भाग (नवकी बहुरिया बिना गहना... नहि जीबि सकैत अछि किन्नहुँ) कारगर अछि आ एकर दोसर भाग (परम बूड़ि अछि ई प्रधानमंत्री...चिन्ताक हमशकल भेल भानुमती) एहि कविताकेँ एकपक्षीय बना दैत छै।
"भानुमती आ समाजिक न्याय" एहि कवितामे भानुमती ओहन लोकक अवतारमे अछि जे लोकतंत्रमे समतावादकेँ पचा ने सकल। कविताक अंत एहिसँ होइत अछि जे तमाकू खाएब राड़-रोहियाक अमल छै आ एहिसँ हम ई मानैत छी जे कवि 95 कथित ब्राह्मणकेँ राड़-रोहिया मानै छथि एहि अमलक कारणे। "कापरेटिभ भानुमती" नामक कवितामे भानुमती जोगाड़ीक रूपमे अछि। आब ई जोगाड़ी कोनो क्षेत्रमे पहुँचि सकैए। पाठक अपन क्षेत्रक हिसाबें एकर व्याख्या कऽ सकै छथि। "इतिहासवेत्ता भानुमती" ई कविता भानुमतीक ओहन रूपपर अछि जाहिमे ओ अतीतजीवी बुझाइत अछि। मुदा जेना-जेना कविता अंत दिस बढ़ैत अछि तेना-तेना बुझबामे आबि जाइत छै जे भानुमती अतीतक आवरण वर्तमानक अपन स्वार्थपूर्ति लेल केने अछि। एहि कवितामे मितार्थ चरमपर अछि। भानुमतीक ई रूप कोनो राजनीतिक दल सेहो लऽ सकैए। "भानुमती आ खबासी" ई कविता मठ ओ मठशिष्यपर अछि। कविताक अंत एना अछि "जखनि जखनि नेत्रपट खोलताह / श्री कृष्णरूपी मठाधीश/ तँ पहिने देखथिन ओकरे युधिष्ठिर रूप" मुदा ई तथ्य तँ दुर्योधन-अर्जुन ओ कृष्णक बीचक छनि एहिमे युधिष्ठिर कोना एलाह से शोधक बात। बहुत संभव जे भावनामे बहि गेल हेता कवि। वा ईहो भऽ सकैए जे आर आन कोनो मिथक हेतै जे कि हमरासँ छुटि गेल हो। पाठक एहि कविताक एहि मिथकपर धेआन राखथि। "भानुमती आ बतहबा" ई कविता भानुमतीक ओहन रूपपर अछि जे कि कोनो अवसरपर किछु पाँति मैथिली बाजए बलाकेँ देवता मानि लैत अछि। पाठक एकर विस्तार कोनो संस्थाक वार्षिक आयोजनसँ लऽ कऽ चुनावी सभा धरि कऽ सकै छथि। "अयनामे भानुमती" एहि कवितापर एबासँ पहिने विश्व साहित्यमे अंतरात्माक अवाज देखी तँ पता लागत जे जे मात्र किछुए नीक लोक अपन अंतरात्माक अवाज सुनि सकलथि आ बहुत खराप लोक अपन अंतरात्माक अवाजकेँ अनठा देलाह। एखनो वएह स्थिति छै आ बादोमे वएह रहतै। एहि कवितामे भानुमतीकेँ सेहो आयनामे आएल अपने रूप पसंद नै पड़लै। बात पुरान छै मुदा कहबाक शैली नव, इएह एहि कविताक विशेषता भेल। "सूर्यकेँ चिन्हह भानुमती" नामक कवितामे कवि भानुमतीक डर दूर कऽ रहल छथिन मुदा कोन डर से अज्ञात अछि। समान्यतः डर वा तँ शारिरिक कमोजरकेँ होइत छै वा नैतिक कमजोरकेँ। भानुमती कोन तरहक कमजोर अछि से पाठक अपना समयपर जानि सकताह। "जाउ महाप्रकाश" एवं "कुमार शैलेंद्र" संस्मरणपरक कविता अछि आ मैथिलीमे एहन कविताक आवश्यकता छै। "प्रतकेँ मुक्ति चाही" ईहो कविता कुमार शैलेंद्रजीपर केंद्रित अछि मुदा एहि कविताक किछु पाँति पूरा संसार लेल बनल अछि--
"आब किन्तु मरलाक बाद पछताइत छी / जीवैतमे कयल अपन ओहि करनीपर"
"जीवित प्रेत सभहक बनायल छल-छद्मक चक्रवातमे नहि फँसू"
"मानसिक खबासीक महापात्रीय मकड़जालसँ मुक्त होउ"................. आदि।
"श्रीमान् कपरगर" नामक कविता ओहन चरित्रपर लिखल गेल अछि जनिक बाहरी आवरण चिक्कन-चुनमुन मुदा भीतरक आवरण छल-छद्मक छनि। जेना जीवन बिंदुसँ बिंदु धरिक यात्रा अछि तेनाहिते ई कविता कपरगरसँ कपरजरू धरिक यात्रा अछि।
"शहादत" कविता बुझबाक लेल कुंडलिनी योग बुझए पड़त कारण एहिमे एहि योगसँ संबंधित शब्दावलीक प्रयोग भेल अछि। मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र। मूलाधार चक्र सभसँ नीचा होइत छै आ सहस्रार सभसँ उपर। ई चक्र सभ पीठक पाछू रीढ़क हड्डीमे होइत छै। एहि कवितामे कविक बिंदु विसर्ग (सहस्रार)पर एकटा मच्छर बैसि जाइन छनि आ कवि ओकरा आज्ञा चक्रक, विशुद्धि चक्रसँ खेहारैत मणिपुर चक्र लग ओहि मच्छरकेँ मारि दैत छथिन। कविकेँ आशंका छनि जे ई मच्छर हुनके स्वाधिष्ठान चक्रक कोनो कीड़ा छलनि। कुंडलिनी साधाना नीचासँ उपर होइत छै मने मूलाधार जागरण करैत साधक सहस्रार धरि पहुँचै छै। एकर मतलब ई जे जेना-जेना साधनाक ज्ञान उपर बढ़ैत छै तेना-तेना अज्ञानता नीचा घटैत छै। जँ एहि कवितामे मच्छरकेँ अज्ञानता-दुर्गुणक प्रतीक मानी तँ ई सूचित होइए जे ओ नीचाक दू चक्र धरि नहि पहुँचि सकल आ अप्रत्यक्ष रूपसँ ई देखबैए जे साधक केर साधना एखन दू चक्र धरि उपर नहि पहुँचल अछि मने साधक एखन विशुद्धि चक्रपर जा कऽ अटकल छथि हुनका एखन आज्ञा चक्र ओ सहस्रार चक्रक भेदन करए पड़तनि। योगी सभहँक मोताबिक विशुद्धि चक्र कंठक पाछू होइत छै। आ एकरा भेदन कऽ देलासँ अपार उर्जा भेटैत छै। साहित्य केर हिसाबसँ देखी तँ साहित्यमे बिना रीढ़ बला सभ साहित्यकार बेसी भेटताह तेहन स्थितिमे प्रस्तुत कवि ई साबित केलथिहए जे हम रीढ़क हड्डी मामिलामे पाँचम चेतना स्तरपर छी। योगक मोताबिक सांसारिक आदमी मूलाधार चक्रमे जीबि मरि जाइत छै तेनाहिते साहित्योमे साहित्यकार बिना रीढ़क हड्डीक मरि जाइत छै।"चेत सम्हार" कविता मैथिली भाषा मध्य विजातीय शब्दक घुसपैठकेँ रेखांकित करैए आ कवि ताहि लेल अपने घरक उदाहरण देलथि ई एकटा नीक पक्ष भेल। अपना ओहिठाम तँ सभ अपने घरकेँ बारि अनका घरक उदाहरणसँ शुरू करै छथि। "नागफनी पंडित" एहन कविता मैथिलीमे लगातार एबाक चाही। प्रायः जीवकांतजीक बाद कियो एहि तरहँक कविता नै लीखि पाबि रहल छथि। ई कविता कवि ओ प्रकृतिक बीच मौन संवाद अछि। "हम कए रहल छी गीर्वाण नृत्य" "हम कए रहल छी गीर्वाण नृत्य" एहि कवितामे प्रयुक्त शब्द गीर्वाण केर मतलब छै "देव-देवता" मने कवि देव नृत्य कऽ रहल छथि मुदा किए? प्रस्तुत कवितामे कवि सुगंध, स्पदन, तरलता आदि जमा कऽ रहल छथि, विश्वामित्रसँ नव-नव रचबाक प्रेरणा लऽ रहल छथि। अधम-निकृष्ट आदिकेँ बाहर फेकि रहल छथि आ कवि अपन आंतरिक आनंदमे मग्न छथि स्वाभावतः एहन परिस्थितिमे कवि देवे-नृत्य करताह मुदा की देवता नीके छलाह? जँ पौराणिक कथा सभ देखबै तँ देवि-देवताक छल-छद्म सभ सामने आबि जाएत तखन ई गीर्वाण नृत्य छल-छद्मसँ दूर कोना रहत। एकर विपरीत बहुतो एहन मानव भेटत जे छल-छद्मसँ दूर रहि नैतिकतामे देवतोसँ आगू गेलाह। कविसँ आग्रह जे धरतीपर सहज-सरल मानव नृत्यक आयोजन करथि ओ।
"कविता लिखैत गेलहुँ" नामक कवितामे कवि अपन लिखबाक कारण दै छथि। ओना तँ सभ कवि कविता लिखबाक कारण मोनक शांति-आत्मसुख गनबै छथि। प्रस्तुत कविक मनोभाव एहने सन छनि जे हम हलाहल पिबैत गेलहुँ आ कविता लिखैत गेलहुँ। एकटा भिन्न कविताक रूपमे ई साधारण कविता अछि मुदा जखन अहाँ एही कविता संग्रहक दोसर कविता "हम हत्या करय चाहै छी"सँ जोड़ि कऽ देखबै तँ सुखद अनुभूति हएत। आखिर जे कवि शुरूमे हत्या करए धरि उताहुल छलाह से अंतमे आबि कहै छथि "पीबैत गेलहुँ सभटा हलाहल/ कविता लिखैत गलहुँ/ छोड़ैत गलेहुँ सभटा प्रमाण"। नकारात्मकसँ सकारात्मक दिस एबाक संकेत अछि। "दृष्टि"। राजस्थान उच्च न्यायालयक न्यायाधीश महेश चंद शर्मा द्वारा बयान देल गेल छल जे मजूरक नोर पीबि मोरनी गर्भवती होइत छै। पक्षी विशेषज्ञ सभ एकरा गलत कहलाह। बहुत संभव जे शर्माजी जनमानसमे पैसल भ्रमकेँ अपन बयान बना लेलाह। "दृष्टि" कवितामे कवि सेहो मोरनीक संबंधमे एकटा बात कहला जे ओ अपन पएरक कुरूपता देखि खूब कनैत छै। मिथिला क्षेत्रमे कियो पक्षी विशेषज्ञ हेताह तँ कहियो एहिपर अपन मंतव्य देता। ओना कोनो वस्तुक सुंदरता स्थिति आ ग्रहण करबाक क्षमतापर निर्भर छै आ ई बात सच छै से हमहूँ मानैत छी। "टिमटिम" ई कविता जतबे केकरो प्रयास, संघर्ष, जीजिविषा आदिकेँ देखार करैत अछि ओतबे सुविधा, षड्यंत्र, ईर्ष्या आदिकेँ सेहो। मुदा प्रश्न ई जे ई बात सभ जनितो दीप असावधान ओ आश्वस्त किए रहैए? "तीनहि टा कविता" कवि अपन पुत्रपर केंद्रित कऽ लिखने छथि। "धन्य कुशहा" ई कविता 18 अगस्त 2008मे आएल कोशी बाढ़िपर अछि। कोशी बाढ़िपर बहुत साहित्यकार द्वारा लीखल गेल अछि ताही सिरीजक एकरो बूझू। एहि कविताक मर्म वएह बूझि सकत जे कि बाढ़ि देखनो हो आ से प्रायः सभ मैथिल देखिते छथि। "बड़की माँक बक्सा" कविता संभवतः दाइ वा बड़की काकीपर रचित अछि। तेनाहिते "माँ देलनि ओलहन" माए केंद्रित कविता अछि। पहिल कवितामे कवि अपन बचपन लेल औनाइत छथि तँ दोसर कवितामे माए केर ओलहनसँ हुनक रचना संसारमे कोना वृद्धि भेल तकर वर्णन अछि। "टाइगर हिल पर सूर्योदय" ई कविता भ्रमण कविता अछि। मुदा अंत धरि अबैत कवि एहि कविताक माध्यमसँ अपन पिताक स्मरण कऽ लै छथि। "हमरा नहि छल बूझल" कविता मोह भंगक कविता अछि। से मोह भंग चाहे जीवनक हो, सुख-सुविधाक हो। एहि कविताक अंतमे कवि एक बेर फेर अपन बचपन लेल औनाइत देखल जाइत छथि। "आयु, अंक, अभिलाषा आ जीव" कविता आशा केर कविता अछि। कवि कोनो हालतिमे निष्क्रिय नै रहए चाहैत छथि। "अहाँ उठू, जागू" कविता कवियत्री प्रतिभा लेल अछि मुदा लागू हरेकपर होइत अछि। "विदा कालमे" ई कविता कवि अनाम मुदा चिन्हार लेल लिखने छथि। कवि ओहि अनामकेँ चीन्है छथिन ओकरा बारेमे किछु स्वीकार करए चाहै छथिन मुदा लीखि कऽ नै। ई कविता कविक क्षण-विशेषक कविता होइते सभहँक कविता अछि। सभहँक जीवनमे एहन समय आबै छै जखन ओ बहुत किछु कहए चाहै छै मुदा से कहि नै पाबैत छथि। एहन कविता मैथिलीमे बेसी लिखल जेबाक चाही। "स्मृति मित्र अछि" कवितामे कवि स्मृतिसँ मैत्री करबाक सलाह दै छथि। कहै छथि "समृतिमे हम सभ/ बीतल घड़ीकेँ फेरसँ जीबैत छी/ बेर-बेर जीबैत छी"। मुदा ई अनुभवसिद्ध गप्प अछि जे अवस्था भेलापर स्मृति बेसी जरूरी भऽ जाइत छै युवाक मोकाबिलामे। अतीतजीवी सेहो स्मृतिक मित्रे होइत छथि। "खांहिस" कवितासँ पहिने हमरा शिकायत छल जे एहि संग्रह किछु कविता दू भागमे बाँटि देल गेल अछि जाहिमे ओकर पहिले भाग कारगर अछि। मुदा ई कविता "खांहिस" एकै भागक छोट कविता अछि आ अपन अर्थ देबामे समर्थ अछि। ई कविता कविक नास्तिक स्वरक अछि मुदा कवि एहि शर्तपर आस्तिक बनि सकै छथि जे केकरो वैधानिक संग हुनका अगिला जन्ममे सेहो भेटनि। एहि कवितासँ ईहो पता चलैए जे कविक अभीष्ट कवि लेल बहुत महत्वपूर्ण छनि अन्यथा के अपन वैचारिकताकेँ छोड़त। एहि कविताक दोसर अर्थ ईहो भऽ सकैए जे जँ अभीष्ट पूरा हो तँ वैचारिकताकेँ छोड़ल जा सकैए मुदा एहि कवितामे आएल "वैधानिक" शब्द कविताकेँ नैतिक उर्जा दैत अछि। "दू मित्र" कवितामे एकटा मंच भोगी तँ दोसर एकांत सेवी छथि। मंचभोगीक मोकाबिलामे एकांत सेवीक क्रियाकलापसँ साबित होइए जे दोसर बेसी संवेदनशील छथि आ असल कविता लेल इएह संवेदनशीलता चाही। "बजारसँ घुरैत काल" जँ पाठक एहि कवितामे आएक शब्द बजारक बदला जीवन पढ़थि तँ अर्थविस्तार हएत। बजारक हवा जँ गूँह-मूत-घामसँ गन्हाइत अछि तँ जीवन विभिन्न कुकर्मसँ। एहि कविताक अंत ओतेक समाधनल नै अछि। "जँ अहाँ कवि छी" नामक कवितामे कविक मंतव्य छनि जे वृद्धावस्था अबिते शारिरिक तौरपर लोक कमजोर होइत अछि मुदा जँ कियो कवि छथि तँ ओ मानसिक तौरपर बलगर भऽ जाइ छथि। बहुत संभव जे एहन होइत हो मुदा मैथिली भाषामे कतेक ताहि प्रश्नपर मंथन करब उचित। ई कविता एहि संग्रह अंतिम कविता अछि।
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मैथिली भाषाक परंपरानुसार विभक्ति सटबाक चाही, मैथिलीक सहोदरी भाषा (सहोदरी शब्द राजनैतिक बला नै)मे सेहो विभक्ति सटै छै,, एतए धरि जे गीता प्रेस, गोरखपुरसँ प्रकाशित सभ हिंदी किताबमे सेहो विभक्ति सटल रहै छै। प्रस्तुत संग्रहमे "पर" छोड़ि सभ विभक्ति मूल शब्दमे सटल अछि मुदा पता नै किए "पर"केँ छोड़ि देल गेलै। बहुत लोक मानै छथि (हमरा सहित) जे रचना सहज सरल भाषामे हेबाक चाही तँ बहुत लोक क्लिष्ट भाषाक प्रयोग सेहो करै छथि। ओना ई तँ निश्चिते कहल जा सकैए जे क्लिष्ट भाषाक एकटा फायदा ईहो जे ओकरा बुझबाक लेल मेहनति करए पड़ैत छै आ अंततः ई अध्य्यन पाठक-आलोचक सभ लेल नीक होइत छै। प्रस्तुत कविता संग्रहमे अधिकांशतः क्लिष्ट भाषाक प्रयोग भेल अछि। प्रायः एहन भाषा बला कविता संग्रह वा पद्य संग्रह बहुत कम प्रकाशित भेल अछि 1990 केर बाद (अपवादमे विजयनाथ झाजीक गजल संग्रह अछि जे कि 2008मे प्रकाशित भेल)। बहुत वर्तनी क्षेत्रीय उच्चारणक हिसाबसँ अछि आ कमसँ कम मैथिलीक हितमे अछि। बहुधा देखल जाइए जे कवि सभ अपन क्षेत्रीय उच्चारणकेँ बिसरि केंद्रिय उच्चारणपर बल देबए लागैत छथि (कारण जे हो) मुदा एहि संग्रहमे क्षेत्रीय उच्चारणकेँ राखल गेल अछि। हरेक लोकमे किछु ने किछु गुण-अवगुण रहिते छै, कवि सेहो लोके होइत अछि तँ कविक रचनामे सेहो गुण-अवगुण रहबे करतै। प्रस्तुत संग्रहमे सेहो नीक-साधारण कविता दूनू अछि। किछु कविताकेँ पुनर्लेखन कएल जेबाक चाही तँ किछु कविता मैथिलीक विरल कविता बनि कऽ आएल अछि। गुण-अवगुण समेत ई कविता संग्रह वर्तमानक नै भविष्यक अछि आ एकर अन्य पाठ निर्धारण बीस-पचीस बर्खक बाद संभव हेतै।

Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 300, 2020-06-15. https://www.videha.co.in/research/2020/300/लाल-लंगौटी-केर-पहचान-करैत-कविता.htm

मूल विदेह अंक / Original issue