विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव

डॉ. चित्रलेखा · 2020-10-01 · अंक 307

डॉ. चित्रलेखा
मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव
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एहि ‘मिथिला’ नामकरणक पाछॉं सेहो एकटा इतिहास रहल अछि जकर आधार पूर्णरूपेँण धार्मिक यज्ञ- अनुष्ठानक अछि जे एहि प्रकारेँ अछि-
“भारतमे ‘सूर्य’ नामक एकटा सूर्यवंशीय क्षत्रीय राजाक राज्य छल। ई वंश सम्पूर्ण आर्यावर्तमे विख्यात छल। एही वंशमे राम, कृष्ण आ बुद्ध सदृश्य महान लोकक जन्म भेल। सूर्यवंशीय ज्ञान पुरुष सूर्यक पुत्र ‘मनु’ भेलाह। ‘मनु’ महा मेधावी पुरुष छलाह। प्रत्येक मन्वन्तरमे अलग-अलग मनु भेल छथि। ओ ‘मनुस्मृति’ सन महान ग्रन्थक निर्माण कएलनि। ‘मनु’क पुत्र ‘इक्ष्वाकु’ अयोध्याक राजा भेलाह। ‘इक्ष्वाकु’क ज्येष्ठ पुत्र ‘विकुक्षि’ अपन पिताक उत्तराधिकारी भऽ कऽ अयोध्याक राजा भेलाह। ‘निमि’क वंशमे एक सएसँ अधिक व्यक्ति मिथिलाक राजा भेलाह आ हुनका लोकनिक उपाधि ‘जनक’ छल। ‘इक्ष्वाकु’क ज्येष्ठ पुत्र ‘विकुक्षि’ राजा छलाह आ छोट भाए ‘निमि’ अत्यन्त कुशाग्रबुद्धिक एवं दूरदर्शी पुरुष छलाह। ओ मने मन सोचलन्हि जे जीवन तँ क्षणभंगुर आ मृत्यु सनातन सत्य अछि, जे व्यक्ति राजा-रंक-फकीर एहि संसारमे आओत ओकर जाएब निश्चित छैक तथा ‘कीत्तिर्यस्य स: जीवति’क सिद्धान्तकेँ मनमे स्थिर कए दृढ़ संकल्प लेलन्हि जे हम एहन कीर्त्ति करब जाहिसँ हम सार्वभौम बनि जाएब।
मनमे दृढ़ निश्चयक ओ अपन कुलगुरु ऋषि वशिष्ठसँ निवेदन कएलन्हि जे- ‘हमरा एहने यज्ञ करा दिअ जाहिसँ हमहूँ ‘ईश्वरक सदृश्य सर्वत्र विराजमान रही’। कुलगुरुक वशिष्ठ निमिसँ कहलन्हि जे- हम पूर्वहिमे देवराज इन्द्रकेँ यज्ञ कराएब स्वीकार कऽ लेने छी। इन्द्रक यज्ञ समाप्तिक उपरान्त हम अहॉंकेँ यज्ञ करा देब। एहिपर ‘निमि’ मौन धारण कऽ लेलन्हि। कुलगुरु वशिष्ठ ‘निमि’क मौन स्वीकृति लक्षणम्’ बुझि कऽ इन्द्रक यज्ञानुष्ठानक हेतु प्रस्थान कऽ देलन्हि। ‘निमि’ सोचलन्हि जे जीवन क्षणभंगुर आ मृत्यु तँ सनातन सत्य अछि, पता नहि कखन की भऽ जाए। ‘निमि’केँ यज्ञानुष्ठानक तीव्र लालसा हुनका व्याकुल कऽ देलकन्हि ओ ‘शुभस्थ शीघ्रम् ‘अर्थात् शुभकार्यमे विलम्ब नहि करबाक चाही कारण-
“आदानस्य प्रदानस्य कर्त्तव्यस्य चकर्मण।
क्षिणमक्रियमानस्य काल: पिबति तद् रसम्।।”
एहि उत्कट इच्छाकेँ शीघ्र पूर्ण करबाक हेतु व्याकुल ‘निमि’अयोध्यासँ पूर्व दिशामे चलि पड़लाह आ चलैत-चलैत ओ मिथिला आबि गेलाह। मिथिलामे महर्षि गौतमक आश्रम छल। प्राचीन कालमे मिथिलाक भू-भागकेँ गौतमक ‘तवोबन’कहल जाइत छल। बादमे एकर ‘मिथिला’नामकरण एक अनुश्ठानक कारण पड़ल। ‘निमि’महर्षि गौतमक तप आओर तेजसँ अत्यधिक प्रभावित ओ आकर्षित भए गौतमक आश्रमपर यज्ञानुष्ठानक अपन लालसा प्रकट कऽ महर्षि गौतमसँ यज्ञ करा देबाक प्रार्थना कएलन्हि ताकि ओहि यज्ञक फलसँ ओ (निमि) सर्वत्र व्याप्त भऽ जाथि। महर्षि गौतम ‘निमि’क उत्कट इच्छाकेँ शान्त कए यज्ञ करा देबाक आश्वासन देलन्हि।
महर्षि गौतम यज्ञार्थ-
याज्ञवल्क्य, भृगु, वामदेव, उशित, कण्व, अगस्त्य्, भारद्वाज, वाल्मिकि आदि जितेन्द्रिय ऋषि लोकनिकेँ आहूत कऽ निश्चित समयपर यज्ञ प्रारम्भ कऽ देलन्हि। ‘वृहद विष्णु पुराण’क मिथिला महात्म्यमे एकर वर्णन उपलब्ध होइछ। एहि जितेन्द्रिय ऋषि लोकनिक द्वारा ‘निमि’क दीर्घकालीन यज्ञानुष्ठान संकल्पित भए ओहि यज्ञक श्री गणेश भऽ गेल।
यज्ञक पूर्णाहुति होएबासँ पूर्वहि इन्द्रक यज्ञ समाप्त कऽ कऽ कुलगुरु जगद्रवंद्य ऋषि वशिष्ठ अयोध्या लौटलाह। ऋषि वशिष्ठकेँ जखन एहि बातक जानकारी भेलन्हि जे ‘निमि’ हुनक (कुलगुरुक) बिना प्रतीक्षा कएलनहि दोसर ऋषि लोकनिक सहयोगसँ यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कऽ देलन्हि। एहि अवज्ञाक कारण ओ क्रोधित भऽ निमिक यज्ञस्थ्ज्ञलपर अएलाह तथा कुलगुरुपर विश्वास नहि करबाक हेतु ओ (कुलगुरु) ‘निमि’केँ दण्डस्वरूप विदेह भऽ जएबाक शाप दऽ देलन्हि। एमहर संकल्पित यज्ञ समाप्तो नहि भेल छल कि ‘निमि’ प्राणहीन भऽ गेलाह। आब उपर्युक्त सभ ऋषि लोकनिक हेतु एकटा विचित्र समस्या ठाढ़ भऽ गेल। किन्तु ‘अध्वर्यु’ (ऋत्विक) बनल ऋषि गौतम सभ ऋषि लोकनिसँ आग्रह कएलन्हि जे हम सभ अपन-अपन तपबलसँ एहि प्राणहीन ‘निमि’क शरीरक मंथन करी। मंत्रोच्चार एवं ऋषि तपबलक कारण मंथनसँ एक भव्य राजकुमार बालकक आविर्भाव भेल। मंथनसँ उत्पन्न होएबाक कारणें ओहि राजकुमारक नाम ‘मिथि’ पड़ल। तथा ऋषि लोकनि ओही ‘मिथि’सँ शेष यज्ञक कार्य पूर्ण कएलन्हि। मंथनसँ आविर्भूत ‘मिथि’क द्वारा बसाओल गेल नगर ‘मिथिला’ नामे प्रसिद्ध भेल।
सम्पूर्ण संसारमे अनादिकालहिसँ मिथिले एकटा एहन पावन प्रदेश अछि, जाहिठामक सांस्कृतिक महत्ता एवं विद्वता अतुलनीय अछि। वेद-वेदान्त, पुराण, उपनिषद्, धर्मशास्त्र आ तंत्र-मंत्र विद्या एवं संसारक मानव चिन्तनक इतिहासमे ई अपन महत्वपूर्ण भूमिकाक लेल सुविख्यात अछि। मिथिलाक भूमि जनक, याज्ञवल्क्य, न्यायसूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद, मीमांसाक प्रस्तोता जैमिनि तथा सांख्यदर्शनक संस्थापक कपिल आदिक जन्मभूमिसँ उर्वर रहल अछि। एतबे नहि छठम शताब्दी ओ तकर परवर्ती कालमे ई महान साहित्यिक एवं दार्शनिक क्रियाकलापक केन्द्र बनल रहल अछि। उद्योतकर मण्डन,वाचस्पति, उदयन, गंगेश, पक्षधर मिश्र प्रभृति विद्वान अपन प्रखर प्रतिभासँ मिथिलाकेँ विभिन्न युगमे परिभाषित कएलन्हि अछि जाहि कारणेँ ई भारतीय संस्कृतिक केन्द्र बनल रहल।
मिथिलाक हेतु प्रयुक्त ‘विदेह’एवं ‘मिथिला’नामक उत्पत्तिकेँ विशुद्ध रूपेँ पौराणिक कहल जा सकैत अछि। राजा विदेध माधवक आगमनक पश्चाते एकर ‘मिथिला’नाम पड़ल। ई लोकनि सरस्वतीक तटपर निवास करैत छलाह। ‘शतपथ ब्राह्मण’क अनुसारेँ सदानीरा (गण्डकी) क तटपर आबि ई लोकनि अग्नि प्रज्वलित कए एहि भूमिक शोधन कएलन्हि। संगहि हिनका लोकनिक संग अनेक ब्राह्मण सभ आबि कऽ खेती-बारी प्रारम्भ कएलन्हि तथा यज्ञक माध्यमसँ अग्निकेँ संतृप्त कएल गेल।
ओना तँ ई अन्वेषणक विषय थिक जे मिथिलाक उत्पत्ति कहिया भेल, मुदा प्राचीन ग्रन्थ सभक अध्ययन ओ अवलोकनोपरान्त एतबा तँ अवश्ये कहल जा सकैत अदि जे हिमालयक शृंखला एवं गंगाक बीचक स्थान (मध्य भू-भाग) मिथिलाक अन्तर्गत आबि जाइछ जे गंगा, ब्रह्मपुत्र आदि नदी-पहाड़क माटिकेँ आनि हिमालय आ गंगाक बीच जे एकटा समतल भू-भाग बनओलक सएह ‘मिथिला’थिक।
पौराणिक वंशावलीक आधारपर कहल जा सकैत अछि जे ‘मनु’क पौत्र ‘निमि’एहि यज्ञ भूमिमे पदार्पण कएलन्हि आ मन्थनोपरान्त ‘मिथि’नामक कारणेँ ओ अपनहि नामपर ‘मिथिला’राज्यक स्थापना कएलन्हि। जखन नगरक निर्माण भेल तँ ओ ‘जनक’नामसँ प्रसिद्धि पओलन्हि। हिनक उत्पत्ति मन्थनक पश्चात् भेल छल तेँ हिनक नाम ‘मिथि’उपयुक्त मानल गेल।
मिथिलाक उत्पत्तिक सम्बन्धमे पाणिनि कहने छथि- “मथ्यन्तेऽत्र रिपवो मिथिला नगरी :”अर्थात् जाहिठाम शत्रुक मर्दन कएल जाइछ से ‘मिथिला’थिक। ओना प्राचीन समयमे राजाक नामपर नगर बसएबाक परम्परा रहल अछि तेँ ई कहल जा सकैत अछि जे मिथिलाक सम्बन्ध राजा ‘मिथि’सँ अछि। भागवत् स्कन्ध अध्याय 133मे कहल गेल अछि-
“जन्मना जनक सोऽभूद्र: वैदेहस्यतु विदेहज:।
मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता।।”
अर्थात् राजा ‘मिथि’क द्वारा जाहि नगरक निर्माण कराओल गेल सएह ‘मिथिला’नामसँ प्रसिद्ध भेल।
मत्स्य पुराणक अनुसार ‘मिथिला’नामक एकटा तेजस्वी ऋषिक नामपर एहि नगरक ‘मिथिला’नाम पड़ल। डॉ. दिनेश कुमार झा अपन मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहासमे डॉ. मोती चन्द्रक कथनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि। हुनक कथन छन्हि जे- “जखन भारतमे एकटा मिश्रित संस्कृतिक विकास भऽ रहल छल तखने ‘तिरभुक्ति’ नाम लोक व्यवहारमे तिरोहित भऽ कऽ ‘तिरहुत (मिथिला) शब्दक निर्माण भेल।”
एतबे नहि किछु भू-वैज्ञानिक लोकनिक ईहो मान्यता अछि जे तिरहुतक भू-भाग सभसँ पाछॉं आबि कऽ बनल अछि। कहल जाइछ जे एक लाख वर्ष पूर्व एहिठाम समुद्र छल जकर विस्तार हिमालय एवं विन्ध्यपर्वत मालाक मध्य अरबक खाड़ीसँ बंगालक खाड़ी धरि छल। हिमालयसँ नि:सृत नदी सभक संग प्रवाहित माटिक संचयसँ एहि मध्य भू-भाग तैयार भेल तेँ एतए पहाड़क कोनो नामो-निशान नहि अछि। एहिठाम नदी सभक अधिकता अछि आ एकरा तीरपर ‘मिथिला’ अवस्थित अछि तेँ एकर नाम ‘तिरभुक्ति’ वा ‘तिरहुत’ भऽ गेल।
सम्पर्क-
एसोसिएट प्रोफेसर
मैथिली विभाग
यू.भी.के. कॉलेज, कड़ामा- आलमनगर
बी.एन.मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

Suggested citation: डॉ. चित्रलेखा. “मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 307, 2020-10-01. https://www.videha.co.in/research/2020/307/मिथिलाक-नामकरण-एवं-प्रादूर्भाव.htm

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