विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क साहित्य यात्रा

डा. सुभाष चन्द्र झा · 2020-10-01 · अंक 307

वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क साहित्य यात्रा
बौक बधिर वाचाल मनुज गंभीर ज्ञान गुण स्नातक
मूक पशु धरि भाव प्रेक्ष निश्नात होइछ सरीसृप जातक।।
वैधनाथ मिश्र "यात्री "क जन्म ओहि काल खण्ड जून 1911ई.में भेल जखन देश परतंत्रताक पीड़ा सं आजिज मुक्त हेवाक लेल छटपटा रहल छल। अनाचार अत्याचार सं दग्ध जनमानस निर्णायक संघर्ष पर उतारू छल, अंग्रेजी सत्ता के उखाडवाक प्रण लय गाम गाम शहर शहर आंदोलन तीव्रता सं पसरि रहल छल, ओहि प्रभाव सं हिमालयक तराई में बसल भारतक गौरवशाली सभ्यताक प्रतीक रहल मिथिला सेहो अछूत नहिं रहल, बाढ़ि अकालक जांत में पिसाइत पिसाइत मिथिलाक गौरवशाली समृद्ध अतीत मैलछौन भ गेल छल। सामंतवादी परिपाटी गरीबक जीवन दोजख कय राखि देने छल। अन्न अन्न लै रकटल प्राण शरीर के जीर्णशिर्ण कमजोर अशक्त कय राखि देलक। अभावक कारणें अनेको कुप्रथा जन्म ल चुकल छल, बालविवाह बहुविवाह छुआछूत नारी उत्पीड़न आदि ओहि समयक सामाजिक विवशता सं अंकुरित भय समाजक लेल कोढ़ बनि समाज के निम्नतर स्तर पर आनि पटकि देलक।
भेदभाव जातिवाद में मिथिला दिन पर दिन अपन सम्भ्रान्त अतीत सं विलग होइत गेल। जाहि मिथिला मध्य सम्पूर्ण भारतवर्षक चटिया लोकनि विद्याध्ययनक लेल सुदूर प्रांत सं चलि ज्ञानार्जन कय पुनः स्वपरान्त गमन करैत छलाह आ मिथिलाक विद्वान सं प्राप्त ज्ञान के प्रकाश सर्वत्र प्रकाशित करैत छलाह। ओ मिथिला अशिक्षा गरीबीक दलदल मे धंसल चल गेल। एहन विकट संक्रमण काल खण्ड में वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क जन्म प्रतिकूलताक अनुकुल स्वाभाविक प्राकृतिक घटना क्रम लगैछ, कारण जेहन कठिन सं कठिन आबोहवा हो प्रकृति ओहि वातावरण मे सार्थक पादप वा लताक लेल माकुल वातावरण तैयार क दैछ। शीत रौद छांह नमी शुष्क ठरल जबकल मृदा उर्वर सभ तरहक भूमि स्थल में जैव तत्व सक्रियता देखल जाइछ, गरीबी में जन्म लै, मैटुअर भय पिता सं उपेक्षित समाज सं
उपेक्षित भय वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" जीवन यात्राक प्रारम्भ कठिन दौर सं शुरू भय गेल। ज्येष्ठ मासक पूर्णिमा मेघ मे बादलक प्रताड़ना सहि अपन सौम्य प्रकाश के धरती तक पहुँचा क रहैछ तहिना मातृक सतलखा में जन्म लै यात्री तरौनी मधुबनी आवि पिता गोकुल मिश्रक संरक्षण में कहुना पालल पोषल जाय लगलाह ।शिक्षा दीक्षाक संग संस्कृत पंडित पिताक अध्यवसाय पंडिताई में सेहो डैन पूरैत अग्रसर होइत रहलाह। येनकेन प्रकारेण यायावार यात्री शिक्षा यात्रा क्रम में कलकत्ता बनारस आदि शहर में अपन अध्ययन पुर्ण कयल। बहुभाषाविद् यात्री संस्कृत पाली बंगला हिंदी मैथिली आदि में अनेको रचना कयल। पत्रकारिता कय घुमक्कड़ी जीवन के अपना बौद्ध भिक्षु बनि श्रीलंका आदि देशक यात्रा कय सामाजिक मनोविज्ञान के अपन लेखनीक आधार बनाओल ।
कवि यात्री दवल कुचलल अस्पृश्यक आवाज बनि ललकार लगौलनि समतावादी विचार के जगौलनि, ऊंच नीचक भेद के मेटौलन्हि, समाज में पसरल कुरीति के ऐना देखा मानवीय संवेदना के जगौलन्हि, विधवा विलाप, कविक स्वप्न, मुखर आवाज़ बनल अवला लाचार ओ गरीबक लेल।
प्रगतिवादी विचारधाराक पोषक अन्वेषक कुपोषण ओ भुख के अद्भुत रूपें चित्रित कयने छथि, यथा- मकड़ाक जाल सं बेधल ओय चुल्हाक मुँह, थारी गिलास सब बेच खा गेलय ऊंह।। कवि यात्री क रचना बहुआयामी समसामयिक परिस्थितिक दर्पण थीक। मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ मिथिलाक नग्न गरीबीक दस्तावेज थीक। और वर्तमान परिपेक्ष में ओहि सं सबक लेबाक नीक उपक्रम। साहित्य अकादमी सं पुरस्कृत उपरोक्त संग्रह समीचीन विवेचनात्मक तथ्य के सामने स्पष्ट करैछ। चित्रा सामाजिक परिस्थितिक भयावहता के सामने रखैछ। आरो अन्य रचना बलचनमा पारो सामाजिक विषमताक गवाही दै यात्रीक प्रगतिवादी सोच ओ अन्याय पूर्ण मानवीय दोष पर प्रहार करैत दृष्टिगोचर होइछ।
।।इति।।
अनुपम रैना, शोधार्थी, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर

Suggested citation: डा. सुभाष चन्द्र झा. “वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क साहित्य यात्रा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 307, 2020-10-01. https://www.videha.co.in/research/2020/307/वैद्यनाथ-मिश्र-यात्री-क-साहित्य-यात्रा.htm

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