विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नारी शब्दक लेल किछु प्रमुख शब्दक विवेचना

डॉ. अर्पणा · 2020-10-15 · अंक 308

नारी शब्दक लेल किछु प्रमुख शब्दक विवेचना
नारी- नारी शब्द नृ अथवा नरसँ बनल अछि। (नृ+अस+दीप= नारी। यास्क नारीकेँ ‘नृतू’सँ मानलनि अछि। एहि विशेषणक आधारपर स्त्रीकेँ नारी कहल गेल अछि, मुदा ऋग्वेदमे ‘नृ’क प्रयोग वीरताक काज करब दान देब तथा नेतृत्व करबाक अर्थमे भेल अछि आ नर शब्दक प्रयोग सेहो वीर दाता तथा नेताक अर्थमे प्रयुक्त भेल अछि। स्त्रीक नारी नाम सेहो एहि विशेषताक कारण पड़ल होएत। ब्राह्मण ग्रन्थमे कतहु कतहु ‘नारी:’पाठ भेटैत अछि मुदा सायणृक मतसँ नारिक भाव नरक उपकारकसँ अछि।
वामा- स्त्री सौन्दर्यताक कारणेँ वाम कहबैत अछि। ‘वयति सौन्दर्यम’। प्रतिकूल बात कहलासँ सेहो ‘वामा’कहबैत अछि। जेना- हक बदल। नहीं, वामाक दुर्गनाम सेहो अछि।
अवला-‘अवला शब्द नारीक शारीरिक संरचनाक ध्यानमे राखि प्रयोग कएल गेल अछि। कारण पुरुष जकॉं स्त्रीमे बल नहि होइत अछि। यद्यपति नारीक मानसिक उड़ानकेँ लोहा वैदिक ऋषि सेहो मानैत छलाह आ ओकरा वशमे करब असाध्य मानैत छलाह।
सुन्दरी- सु+उन्द= गिल्लकरब+डीप= सौन्दर्यवती नारी एहि हेतु कहल जाइत अछि जे जकरा देखलासँ मात्र पुरुषक हृदय गिल्ल भऽजाइत अछि। चित्त द्रवित भऽ उठैत अछि अथवा ‘सुष्ठानुन्दयति इति नैरुक्ता:।
वस्तुत: ‘सुन्दरी’शब्द ऋग्वेदक ‘सुनरी’शब्दक विकसित रूप प्रतीत होइत अछि। ऋग्वेदमे उमाक लेल ‘सूनरी’शब्दक प्रयोग भेल अछि। ‘सुनरी’क तात्पर्य-शोभाशाली सुन्दी।
प्रमदा- प्रमदक भाव होइत अछि हर्षा ‘प्रमद समदौ हर्ष च।’अतवएब हर्षित, पुलकित स्वभाव होवाक कारणे सेहो स्त्रीकेँ ‘प्रमदा’कहल गेल अछि। अपन हाव-भावसँ पुरुषकेँ उत्तेजित कऽ देब नैसिर्गक विशेषता होएवाक कारणेँ ओ प्रमदा कहवैत अछि।
ललना- ई शब्द सेहो स्त्रीक एक मनोवैज्ञानिक पक्षकेँ प्रकट करैत अछि। ओ मान करबाक प्रिय होइत छथि- रूसैत छथि। अतएव मानिनी छथि। मानिनीक एकगोट आरो पक्ष होइत अछि- ओ अछि स्वाभिमान आत्म-सम्मानक भावना। ओकर सौन्दर्य गुण, कार्य आदि कोनोक प्रतिकूल आलोचना ओकरा वाण जकॉं बेध दैत अछि तेँ ओ मानिनी भेल।
महिला- पूज्या होएवाक कारणेँ स्त्रीक नाम महिला पड़ल। मह्+इलत+आ= महिला।मह्क अर्थ होइत अछि पूजा। उपर्युक्त शब्दक व्युत्पत्ति नारीक सामान्य स्वरूपक अभिव्यंजना करैत अछि। नारी सम्बन्ध विशेषक द्योतक शब्दक परिचय अधोलिखित अछि-
दूहिता- यास्कक अनुसार दुहिता शब्दक व्युत्पत्ति- ‘दुहिता दुर्हिती, दूरेहिता’। दुर्गाचार्य एकरा स्पष्ट करैत लिखैत छथि दुहिता कारण ओ जतय कतहु देल जाइत छथि ओकर स्वागत नहि होइत अछि, ओ सर्वत्र दुत्कारल जाइत छथि। अथवा बेटीकेँ दूर चलि गेलापर पिताकेँ चैन भेटैत अछि। यास्क दुहिता शब्दकेँ ‘दूह’धातुसँ सेहो बनौलनि अछि आ पिताकेँ प्रसन्न कए सदिखन किछु ने किछु धन लैत रहैत छथि तेँ दुहिता भेला। वस्तुत: दुहितृ शब्द दुह्-दुहना धातुसँ बनल अछि, सम्भवत: प्राचीनकालमे कन्या अपन पिताक घर गाय दुहल करैत छलीह। फलत: हुनक नाम दुहिता पड़ल।
जाया- स्त्री ‘पत्नी’रूपक लेल जाया शब्दक प्रयोग कएल गेल। ऐतरेय ब्रह्मणमे जायाक व्युत्पति एहि प्रकारेँ कयल गेल अछि ‘तंज्जया जाया भवति यदस्यां जायते पुन:’। जाया एहि हेतु अछि जे पुरुष स्वयं ओहिमे पुत्रक रूपमे जन्म लैत अछि। ऋग्वेदमे जायाक प्रति अत्यन्त मधुर उद्गार व्यक्त कयल गेल अछि।
माता- वैयाकरण मातृ शब्दकेँ मान+तृणसँ बनवैत छथि। आ मातृ शब्दक अर्थ ‘आदरणीय’अछि। यास्कक मतसँ मातृक भाव ‘निर्मातृ’निर्माण करयवाला जननी सेहो अछि। मुदा ‘आदि युगसँ लय आइ धरि मानव जकरा असीम श्रद्धा प्रकट करैत अछि आ जाहिसँ अजस्त्र अक्षय स्नेह पबैत रहैत अछि, ओ मात्र जन्मदात्री नहि, ओ एहिसँ बहुत पैघ अछि। ओकर स्थान स्वर्गसँ सेहो उच्च आ गुरुसँ अधिक पूज्य होइत अछि। माय सदैव माय होइत अछि।
वेदमे सेहो नारीक लेल कुलयानी, सम्राज्ञी कल्याणी पुरन्धि, कुलपा आदि शब्दक प्रचुर प्रयोग भेटैत अछि। इन्द्राणी, उषा, अदिति, इला, श्रद्धासिनी, वाली, भारती, पृश्नि, वरूणानि, आख्यानि वाक, दयावा पृथ्वी, राका आदि रूपमे वैदिक संहिताक नारीक दृष्टि पथमे अवतरित होइत छथि। स्त्रीक हेतु एक स्थानपर कहल गेल अछि। ‘शुद्धा:’पूसा योषितो यज्ञिया इमा:’तथा हुनका पुरुषक हेतु अश्व, गायक हेतु शिव होयवाक बात कहल गेल अछि। सहोत्तरंस्म पुरानारी, समनं चावगच्छति’अर्थात् पहिले स्त्री यज्ञ आयुद्धमे जाइत छलीह। हुनक पुत्र शत्रुहण छथि। एक गोट स्थानपर स्त्री कहैत छथि हमरासँ अधिक केओ सौभाग्यशालिनी नहि छथि वैदिक अक्ष सूक्तमे एकगोट जुआरीकेँ ओकर सासु डटैत अछि आ पत्नी रोकैत अछि। वेद कहैत अछि ‘अनवया पतिजुष्टेवनारी’अर्थात् सच्चरित्रस्त्री पतिकेँ प्रिय होइत छथि। अर्थवेद कहैत छथि ‘जायापत्नेमधुमतीवाचंवदति’।
वेदमे स्त्रीकेँ ब्रह्म सेहो कहल गेल अछि। तेँ वरदा वेदमाताकेँ वेदमे स्तुति कयल गेल अछि। आचार्य प्रियव्रत तँ सरस्वतीकेँ शिक्षाविभागक मंत्री कहलनि अछि। संहितामे वर्णित नारीक एहि उत्कृष्ट रूपक छाया हमरा सहितेतर वैदिक साहित्य (ब्राह्मण एवं उपनिषद्) मे प्रचुरतासँ उपलब्ध अछि।
ब्राह्मण साहित्यमे पत्नी तथा स्त्री विषयक अनेक सन्दर्भ प्राप्त होइत अछि जाहिसँ नारीलोकनिक गरिमा परिलक्षित होइत अछि। नारीकेँ सावित्रीक संज्ञासँ समलिंगीकृत कयल गेल अछि। स्त्री सावित्री (जैठव्रा., 4/27/17)। गृहपरिवारमे ओकर प्रधानताकेँ स्वीकार कयल गेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मण जायाकेँ गाईपत्य अग्निकरुपमे स्वीकार करैत अछि- ‘जाया गार्हपत्योग्नि:’। (ए.ब्रा, 8/24) पत्नी पतिक अर्द्धांगिनी मानल गेल अछि।
संहिता एवं ब्राह्मण साहित्यक विपरीत उपनिषदकालीन नारीलोकनिक समुन्नत अवस्थाक परिचय भेटैत अछि।
केनोपनिषद् मे हेमवती उमाक आध्यात्मिक ज्ञान, ब्राह्मवादिनी, वाचकनवी गंर्गी आ मैत्रेयीक वर्णण ओकर आघ्यात्मिक ज्ञानक पराकाष्ठाकेँ सन्दर्भशित करैत अछि। मैत्रेयीक ई कथन जे ‘येनाहंनामृतास्याम किंकुर्याम्’हुनक ज्ञान पराकाष्ठाक दिग्दर्शन करैत अछि। एहि काल पिता सेहो पंडितापुत्रीक इच्छा करैत छलाह।
उपनिषद् साहित्यमे स्त्रीलोकनिक मातृत्व पक्षकेँ सेहो चित्रित कयल गेल अछि। ऐतरेय उपनिषद् मे गर्भ धारण करयवाली स्त्री व्यावयित्री एवं भावियितव्या कहल गेल अछि। एहिकालमे स्त्रीकेँ यद्यपि छायाधिकारक स्पष्ट रूपसँ वर्णन नहि कयल गेल अछि, मुदा वृहदारण्यक उपनिषद् मे सन्यास गमन करैत याज्ञवल्कय द्वारा अपन भार्याकेँ वित्त विवरण करब हुनक पतिक सम्पतिमे अधिकार होयवाक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। स्वैनिणी नारीक उदाहरण हमरा छन्दोग्यमे (4/42/2) देखल जाइत अछि।
सूत्र साहित्यकेँ अवलोकन कयला पर एहि युगमे स्त्री लोकनिक स्थान प्रत्येक दृष्टिसँ समुन्नत अवस्थाकेँ प्राप्त दृष्टिगत होइत अछि। आ विद्या सम्पन्न होइत छलीह तथा विद्यालयमे उपाध्याय। आ आचार्यहुपर प्रतिष्ठित होइत छलीह। मैत्रेयी, बहवा, प्राचितेयी, गार्गी, वाचकनवी, सुलभा आदि ऋषिकाकेँ रूपमे उल्लिखित छथि। गोभिल गृहसूत्रमे स्त्रीलोकनिक उपनयन संस्कारक सेहो निर्देश अछि (2/1/19)
एतएव सूत्रकालमे स्त्री शिक्षा सुव्यवस्थित रूपमे छल।
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[1]आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ कविनवतिका, मैथिली मन्दिर, राजकुमारगंज, दरंभंगा, 1984
[2]कर्णामृत (जुलाई-सितम्बर, स्मृति विशेषांक), 2000, कोलकाता
[3]सम्पादक विजयनाथ ठाकुर, जयन्ती, पृ- 131, चेतना समिति, पटना, नवम्बर- 2004
[4]तत्रैव
[5]लालदास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण (बालकाण्ड), पृ- 4, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, दरभंगा, सम्वत 2011
[6]लालदास, रमेश्वर चरित मिथिला रामायण (पुष्करकाण्ड), पृ- 437, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1999
[7]डॉ. मुरलीधर झा- चन्दा झा ओ लालदास रामायण तुलनात्मक अध्ययन, पृ- 174, मिथिला रिसर्च सोसाइटी, लहेरियासराय, दरभंगा, 2006

Suggested citation: डॉ. अर्पणा. “नारी शब्दक लेल किछु प्रमुख शब्दक विवेचना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 308, 2020-10-15. https://www.videha.co.in/research/2020/308/नारी-शब्दक-लेल-किछु-प्रमुख-शब्दक-विवेचना.htm

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