विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

पं. कुशेश्वर कुमर ओ पर्व निर्णय: एक समीक्षण

डॉ. ललन कुमार झा · 2020-10-15 · अंक 308

पं. कुशेश्वर कुमर ओ पर्व निर्णय: एक समीक्षण
धर्मशास्त्रीय निबन्ध ‘पर्व निर्णय’पं. कुशेश्वर कुमर द्वारा प्रणीत अछि। हिनक नाम मैथिल निबन्धकार लोकनिक बीच समादृत अछि। ई ज्योतिष शास्त्रमे तीर्थ एवं आचार्य छलाह संगहि काव्य (तीर्थ), धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण एवं मीमांसा (कर्मकाण्ड)क सेहो उद्भट्ट विद्वान छलाह। ज्योतिष आओर धर्मशास्त्र दुनूमे वैदुष्य रहबाक कारणेँ ई दुनू शास्त्रमे ग्रन्थक प्रणयन कएलन्हि अछि। मिथिला देशीय पंचागम् (1328-1338 साल पर्यन्त), वित्रिभ लग्न भ्रमणम्, गोल प्रवेशिनी, पंचागदीपिका, ज्योतिषरत्नावली, ज्योतिष शिशुबोध, शुद्धि बोधिनी हिनक ज्योतिष ग्रन्थ अछि। ई धर्मशास्त्रक व्यवहार मंजूषा कृत्य मंजरी, व्यवहार दीपिका, सदाचार चन्द्रिका आओर पर्व निर्णय ग्रन्थक प्रणेता सेहो छथि।
पर्व शब्दक व्यापक अर्थ अछि। ओना व्रत पर्व समानार्थक अछि, मुदा तत्वत: पर्वक अन्तर्गत व्रत अबैत अछि नहि कि व्रतक अनतर्गत पर्व। एहि पर्वक तिथि स्थिर करबाक लेल ज्योतिष शास्त्रक सहारा लेबए पड़ैत अछि। मिथिलामे पर्व निर्णयमे अनेक प्रकारक मतभिन्नता रहैत आएल अछि। एहि विषयकेँ ध्यानमे राखि कऽ महान् धर्मशास्त्री पं. कुशेश्वर शर्मा एहि सामाजिक मतभेदकेँ दूर कऽ एक निर्णयात्मक ग्रन्थक प्रणयनक विचार कएलन्हि। पं. शर्मा भिन्न-भिन्न पर्वक सम्बन्धमे निबन्ध ग्रन्थक अवलोकन कऽ समकालिक विद्वान लोकनिक विचार लऽ कऽ कोनो एक निर्णयपर पहुँचबाक विचार कएलन्हि। एहि हेतु ओ मिथिलाक विद्वान लोकनिसँ गामे-गाम घूमि कऽ सम्पर्क कएलन्हि। सभ विद्वान लोकनिक मतक संग्रह कऽ विभिन्न पर्वक हेतु ओ जे ग्रन्थक प्रणयन कएलन्हि ओएह आइ ‘पर्व निर्णय’क रूपमे अछि जाहिमे विभिन्न पर्वक निर्णय हेतु सम्पादक पं. कुशेश्वर शर्मा तेरासी विद्वान् लोकनिक निबन्धक संकलन कएलन्हि आओर सभ विद्वान लोकनिक निबन्धक तत्तपर्व निर्णय हेतु प्रस्तुत कएलन्हि। एहि तरहेँ श्रावण माससँ आरम्भ कऽ चैत्र कृष्ण प्रतिपदा धरिक विमर्श कएल गेल अछि। ग्रन्थारम्भक पूर्ण विषयानुक्रमणिका देल गेल अछि, जाहिमे भिन्न-भिन्न पर्वक निर्णय हेतु ओहि-ओहि विद्वान लोकनिक नाम सेहो देल गेल अछि।
मुख्य पर्व आइयो मिथिलामे पूर्ण श्रद्धा भक्तिसँ मनाओल जाइत अछि आओर किछु समाप्त प्राय। अछि जेना मिथिलाक प्राचीन पंचांग कहैत अछि जे अशून्यशयनव्रत जे भगवान विष्णुकेँ लक्ष्य कऽ मनाओल जाइत छल से समाप्तिक तरफ बढ़ल जाइत छल आओर आइ ओ अस्तित्वमे नहि अछि। स्त्री आओर पुरुष दुनू अपन शाश्वत संगक लेल एकरा मनबैत छल। सॉंपसँ रक्षाक लेल मौना पंचमी आओर नागपंचमी पर्व आइयो क्रमश: श्रावण कृष्ण आओर शुक्लपक्षमे मनाओल जाइत अछि।
मिथिलाक सुप्रसिद्ध पर्व मधुश्रावणी श्रावण शुक्ल तृतीयाकेँ नवविवाहित कन्या आओर वरक द्वारा मनाओल जाइत अछि। विवाहक प्रथमे वर्ष एकरा उत्साहक संग मनाओल जाइत अछि। एहि पर्वकेँ मनएवाक मुख्य उद्देश्य अछि सर्प जातिसँ कोनो प्रकारक क्षति नहि होमए। श्रावण शुक्ल पूर्णिमाकेँ रक्षा बन्धन पर्व केवल मिथिले टामे नहि लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारतमे मनाओल जाइत अछि।
मैथिल आचारानुसार भद्रा रहित उदय गामिनी पूर्णिमाकेँ रक्षा बन्धन पर्व मनाओल जाइत अछि। भाद्र कृष्ण चतुर्थीकेँ बिहुला पूजा आइयो प्रचलित अछि। मिथिलामे कृष्ण अष्टमीकेँ कृष्णाष्टमी मनाओल जाइत अछि, अन्यत्र विशेषत: वैष्णव सम्प्रदायवला जयन्ती व्रत करैत अछि। भाद्र मासीय अमावस्याकेँ कुशोत्पाटनक मिथिलामे परम्परा अछि। पितृविहीन लोक सभ जातिक, विशेष रूपसँ पितृकर्मक लेल कुश अवश्य उखारैत अछि, किएक तँ बिनु कुशक कोनहुँ क्रिया नहि होइत अछि-
“बिना दर्भेण या सन्धया पिंतृदेव क्रियाश्च या:।
सफला विफला यस्मात् तस्मात् कुशयुतो भवेत्।।”
- पर्व निर्णय- 64
हरिताली-हरितालिका :-
भाद्र शुक्ल तृतीया हरिताली या हरितालिका व्रतक नामसँ प्रसिद्ध अछि जे स्त्री लोकनिक लेल यावज्जीवन सुन्दर पति आओर सौभाग्यक लेल अनुष्ठेय अछि। माली (सखी)क द्वारा ह्त भऽ जएबाक कारणेँ हरिताली नामसँ प्रसिद्ध अछि। स्त्रीक लेल तृतीया व्रतक बड़ पैघ महत्व अछि। जेना श्रावण शुक्ल तृतीया मधुश्रावणी, भाद्र कृष्णक कञ्जली आओर शुक्ल पक्षीय हरितालिका व्रत बड़ श्रद्धाभावसँ स्त्रीलोकनि अनुष्ठान करैत छथि। बेशी काल ई चतुर्थी संयुक्ता ग्राह्य अछि-
“सा च तृतीया परयुतैव ग्राह्या-
रम्भाख्या वर्जयित्वा तु तृतीया द्विजसत्तम।
अन्येषु सर्वकार्येषु गुणयुक्ता प्रशस्यते।।”
-पर्व निर्णय- पृ.- 68
चतुर्थीचन्द्र (चौठचन्द्र) :-
मिथिलामे एहि पर्वक बेशी प्रचलन अछि। चतुर्थी चन्द्रक दर्शन पं. जीवनाथ राय निषिद्ध मानलन्हि अछि, मुदा धात्रेयिका वाक्यक पाठ कऽ दर्शन कएल जा सकैत अछि। ब्रह्म पुराणक अनुसारेँ-
“नारायणोऽभिशप्तस्तु निशाकरमरीचिषु।
स्थितश्चतुर्थ्यामद्यापि मनुष्यानापतेच्च स:।।
अतश्चतुर्थ्याचन्द्रन्तु प्रमादाद् वीक्ष्य मानव:।
पठेद् धात्रेयिकावाक्यं प्राङमुखो वाऽप्युदङमुख:।।”
-पर्व निर्णय- पृ.- 70
धात्रेयिका वाक्य स्यमन्त कोपारधानमे एहि प्रकारेँ अछि-
“सिह: प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक:।।”
अनन्त पूजा :-
भाद्र शुक्ल चतुर्दशीकेँ भगवान विष्णुक अनन्त रूपक पूजा कएल जाइत अछि, जे पूर्णिमायुता ग्राह्य अछि-
“तृतीयैकादशी षष्ठी शुक्ल पक्षे चतुर्दशी।
पूर्वविद्धा न कर्त्तव्या कर्त्तव्या परसंयुता।।”
-पूर्व निर्णय- पृ.- 78
भाद्र पूर्णिमा ऋषि अगस्त्यक तर्पणक लेल प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे काश पुष्प हाथमे लऽ कऽ तर्पण करबाक विधान अछि। आश्विन कृष्णपक्षमे क्षयतिथिकेँ पार्वण करबाक विधान अछि। कमसँ कम कर्म पर्व (अमावस्या)केँ तँ अवश्ये पार्वण करबाक चाही। ओना पं. कुमर प्रतिदिन पितृपक्षमे श्राद्ध करबाक समर्थन कएलन्हि अछि। ब्रह्मपुराणक अनुसारेँ जँ पितृपक्षमे एको दिन श्राद्ध (पार्वण) कऽ लेल जाए तँ वर्ष पर्यन्त पितर तृप्त रहैत अछि-
“यो वै श्राद्धं नर: कुर्यादेकस्मिन्नपि वासरे।
तस्य संवत्त्रय यावत् संतृप्ता: पितरो ध्रुवम्।।”
-पर्व निर्णय, पृ.- 84
जीवित पुत्रिका :-
महिलालोकनिक सभसँ प्रिय व्रत जीवित पुत्रिका आश्विन कृष्ण अष्टमीकेँ मनाओल जाइत अछि। महिलालोकनि अपन सन्तान विशेषत: पुत्रक कल्याणार्थ एकर अनुष्ठान श्रद्धाभक्तिसँ करैत छथि। भविष्य पुराणक अनुसारेँ आश्विन कृष्णक जीमूतवाहन व्रत सौभाग्य प्रदान कएनिहार अछि। प्रदोष एकर मुख्य पूजाकाल अछि। जाहि प्रदोष कालमे अष्टमी पड़ैत अछि ओएह समय अनुष्ठेय अछि। सप्तमी विद्धा अष्टमी व्यात्र्य मानल गेल अछि। अष्टमी तिथि पर्यन्त निराहार तथा बिनु जलक उपवास कऽ नवमीमे पारण कएल जाइत अछि, भनहि अष्टमी दोसर दिन कतेको विलम्ब तक किएक नहि रहए। ‘पारणान्तं व्रतं ज्ञेयम्’क अनुसारेँ नवमी तिथिकेँ पारण करबाक विधान अछि। कोनहुँ स्थितिमे अन्न जलादिक सेवन हितकारी नहि होइत अछि-
“आश्विनस्यासिताऽष्टम्यां या: स्त्रियोऽन्नं च भुज्जते।
मृतवत्सा भवेयुस्ता विधवा दुर्भगा ध्रुवम्।।”
-पर्व निर्णय, पृ.- 93
नवरात्र :-
आश्विन शुक्ल प्रतिपदासँ नवमी पर्यन्त शारदीय नवरात्र उत्तर भारतक हिन्दूलोकनिक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पर्व अछि। द्वितीया युता प्रतिपदा मान्य अछि-
“यो मां पूजयते भक्त्या द्वितीया दिगुणान्विताम्
प्रतिच्छारदीं ज्ञात्वा सोऽश्नुते सुखमक्षयम्।।”
-पर्व निर्णय, पृ.- 99
अमावस्या युता प्रतिपदा निन्दनीय मानल गेल अछि-
“यदि कुर्यादमायुक्ता प्रतिपत् स्थापने मम।
तस्मैशापायुतं दत्त्वा भस्मशेषं करोम्यहम्।।”
-पर्व निर्णय, पृ.- 99
कोजगरा :-
आश्विन शुक्ल पूर्णिमाकेँ कोजगरा पर्व ब्राह्मणक लेल विशिष्ट महत्त्व रखैत अछि। देश भेदसँ ई चन्द्रोदय व्यापिनी वा निशीय व्यापिनी दुनू ग्राह्य अछि। ‘को जागर्ति महीतले’ एहि जज्ञासासँ लक्ष्मी रातिमे घुमैत अछि। प्रदोष कालमे लक्ष्मीक पूजाक विधान अछि।
दियावाती (सुखरात्रि, दीपावली) :-
कार्तिक कृष्ण अमावस्याकेँ श्यामापूजाक निशीथ कालमे पूजाक विधान अछि। प्रदोषकालमे उल्का भ्रमणानन्तर लक्ष्मीक पूजा आ गोसाउनिक घरक पूजाक विशेष रूपसँ विधान अछि। पितृपक्षक अन्तिम दिन रहलासँ महालयाक अन्तिम दिन मानल जाइत अछि। सायंकाल उल्काभ्रमणसँ मर्त्यलोकमे आएल पितरकेँ हुनक पुत्रादि उल्का दीपसँ स्वर्गलोक पठा दैत छथि। दिनमे चतुर्दशी होअए तथा रातिमे अमावस्या होअए ओहि दिन लक्ष्मीक पूजा करबाक चाही इएह सुखरात्रि कहबैत अछि।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भातृ द्वितीया) :-
पं. कुशेश्वर शर्मा एहि द्वितीयाक प्रसंगमे पं. बदरीनाथ झाक निबन्धक आश्रय लेलन्हि अछि। एहिमे अशून्यशयन व्रत, यम यमुनाक पूजन, चित्रगुप्तक पूजा, भगिनी द्वारा भाएकेँ आदरपूर्वक भोजन प्रदान तथा भाए द्वारा सेहो बहिनकेँ वस्त्र-भूषणादिसँ संतोष प्रदान करब ई चारिटा कृत्य कहल गेल अछि। ई द्वितीया पूर्व विद्धा आओर परविद्धादुनू समयानुसार प्रचलित अछि।
षष्ठी निर्णय :-
व्रतानुष्ठानमे षष्ठीक बड्ड महत्त्व अछि। ई बारह प्रकारक मानल गेल अछि। सप्तमी विद्वा षष्ठीए मान्य अछि। पंचमी विद्धा गर्हित अछि आओर एकरा कएनिहारक धन ओ सनतानक हरण होइत अछि।
अक्षय नवमी :-
ई युगारम्भ तिथिक रूपमे मान्य अछि। ई नवमी युगादि कृत्यक लेल दशमी विद्वा ग्राह्य अछि। वाचस्पति मिश्र कार्तिक शुक्ल नवमीकेँ अत्यन्त पुण्यप्रद मानलन्हि अछि- ‘कार्तिके शुक्लपक्षे तु त्रेताऽथनवमेऽहनि।’
रविव्रत निर्णय :-
पं. कुशेश्वर शर्मा रविव्रत निर्णयक प्रसंगमे पं. वासुदेव झाक निबन्धकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि। तदनुसार अग्रहण, माघ,वैशाख आओर आषाढ़ शुक्ल पक्षीय रविकेँ भगवानसूर्यक व्रत करबाक लेल कहल गेल अछि। निर्णयानुसार मेष शशिगत सूर्यक रहलेपर रविव्रत करए, जँ वैशाखमे मलमास होअए तइयो।
श्री जानकी महोत्सव :-
प्राचीन मैथिल परम्परामे अग्रहण शुक्ल पंचमीकेँ श्रीसीताक जन्मोत्सव मनाओल जाइत अछि।
श्री पंचमी (सिर पंचमी) :-
माघ शुक्ल पंचमी श्री पंचमी वा सिर पंचमी कहबैत अछि। ई चतुर्थी युता ग्राह्य अछि। उपवासादिक अतिरिक्त सभ पंचमी पूर्व विद्धा ग्राह्य अछि। एहि दिन शिष्टजन हल प्रवहण ओ ओकर पूजा करैत अछि।
माघ शुक्ल सप्तमी :-
ई सप्तमी स्नान माघ शुक्लक करबाक प्रसंग उदय व्यापिनी ग्राह्य अछि, जे सूर्यग्रहणक तुल्य अछि। सातटा आक, बैर आओर जौवक पातकेँ माथपर राखि स्नान करबाक चाही। पर विद्धा सप्तमी कदापि अनुष्ठेय नहि अछि।
होलिकादहन :-
होलिका दाह सायाम व्यापिनी भद्रा शुन्य फाल्गुन पूर्णिमाकेँ करबाक चाही। एकर मुख्य काल प्रदोष अछि-
“प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या फाल्गुनी पूर्णिमा सदा।” प्रतिपदानमे होलिकार्पण दोषावह होइत अछि। होलिका दाहक पश्चात् दिनमे फाल्गुनी पूर्णिमाकेँ सिन्दूर क्रीड़ाक विधान अछि।
रामनवमी व्रत :-
काल माधवमे पुनर्वसु नक्षत्र युक्त चैत्र शुक्ल नवमी मध्याह्न योग भेलासँ महापुण्य प्रदान कएनिहार होइछ। नवमीमे उपवास कऽ दशमीमे पारण कहल गेल अछि।
बैशाख शुक्ल तृतीया :-
बैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीयाक नामसँ प्रसिद्ध अछि। ई चतुर्थी युता ग्राह्य अछि।
वटसावित्री व्रतम् :-
ज्येष्ठ कृष्ण अमास्याक दिन मिथिलामे महिलालोकनि वटसावित्री व्रत करैत छथि। चतुर्दशी विद्धाअमावस्याक अनुशंसा कएल गेल अछि। ई अवैध्यक कामनासँ कएल जाइत अछि। प्रतिपदा युक्त अमावस्या ‘गर्हित’ मानल गेल अछि।
पञचाग्नि व्रत :-
ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रम्भा तृतीया कहबैत अछि। एहिमे महिलालोकनि पञ्चाग्नि व्रत करथि एहन शास्त्रीय विधान अछि। ई तृतीया द्वितीया युते करबाक चाही।
गंगा दशहरा :-
ज्योष्ठ शुक्ल दशमी गंगा दशहराक नामसँ जानल जाइत अछि। एहि दिन गंगा स्नानसँ दशविध पापक नाश होइत अछि।
एकादशी व्रत :-
शुद्धा एवं दशमी विद्धा नामसँ दुइ प्रकारक एकादशीक वर्णन कएल गेल अछि। अरुणोदय कालमे जँ दशमी रहए तँ ओहि दिनक एकादशी पाप मूलक उपवास युक्त विद्धा एकादशी कहबैत अछि। ई व्रत दुनू पक्षक एकादशी करए अथवा शुक्ल पक्षक एकादशी व्रतकेँ करए।
चतुर्दशी व्रत :-
चतुर्दशी शुद्धा आओर विद्धा नामसँ दुइ प्रकारक होइत अछि। चतुर्दशीमे उपवास कऽ चतुर्दशीयएमे पारणा उत्तम कहल गेल अछि। मिथिलामे कृष्ण चतुर्दशीएक ख्याति अछि।
पूर्णिमा कृत्य :-
ई पूर्णिमा चतुर्दशी विद्धा ग्राह्य नहि अछि, पर विद्धे ग्राह्य अछि। एहि तिथिमे अमावस्याक तरहेँ पितृ श्राद्ध आवश्यक अछि, अन्यथा नरकभाक होबए पड़ैत अछि।
सोमवारी व्रत :-
स्त्री लोकनिक हेतु मिथिलामे सोमवारी व्रत खूब प्रचलित अछि।
अतिचार :-
दैवज्ञ बान्धव ग्रन्थमे कहल गेल अछि जे वर्षकेँ पूर्ण नहि भेलापर जँ वृहस्पति पूर्व शशिकेँ छोड़ि पर राशिगत भऽ जाइत अछि तँ अतिचारक प्राप्ति होइत अछि। एहि अवधिमे विवाहादि कार्य नहि होइत अछि।
कुम्भ पर्व निर्णय :-
प्राचीने कालसँ हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन आओर नासिकमे कुम्भ पर्वक प्रचलन अछि। जँ सूर्य मेष राशि तथा वृहस्पति कुम्भ राशिमे होअए तँ हरिद्वारमे, सूर्य जखन मकर राशिमे होअए तथा वृहस्पति अजग (मेष राशि) मे होअए तखन प्रयागमे जखन वृहस्पति सिंह राशिगत होअए तखन उज्जयिनीमे आओर गुरु कर्क राशिमे होअए तथा सूर्य चन्द्रमा सेहो कर्क राशिमे होअए तखन नासिकमे कुम्भ योग होइत अछि।
दीक्षा ग्रहण :-
मिथिलामे मंत्र ग्रहणक अत्यधिक महत्त्व बताओल गेल अछि। यावत् पर्यन्त दीक्षा नहि ग्रहण कएल जाइत अछि तावत धरि बीज मन्त्रक उच्चारण नहि कएल जाइत अछि। मन्त्र ग्रहणकसम्बन्धमे कहल गेल अछि जे पिता, मातामह, कनिष्ठ भ्राता तथा शत्रु पक्षाश्रित व्यक्तिसँ मन्त्र नहि ग्रहण करबाक चाही। पारम्परिक मैथिल शिष्टाचारसँ दीक्षा देबाक लेल माता सर्वश्रेष्ठ मानल गेल अछि।
एहि तरहेँ पर्व निर्णयक सम्बन्धमे पं. कुशेश्वर शर्मा विभिन्न निबन्धक संकलन पर्व निर्णय सम्बन्धी जिज्ञासाक शान्तिक लेल सार्थक प्रयास कएलन्हि अछि।

Suggested citation: डॉ. ललन कुमार झा. “पं. कुशेश्वर कुमर ओ पर्व निर्णय: एक समीक्षण.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 308, 2020-10-15. https://www.videha.co.in/research/2020/308/पं-कुशेश्वर-कुमर-ओ-पर्व-निर्णय-एक-समीक्षण.htm

मूल विदेह अंक / Original issue