विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

पं. तेजनाथ झा ओ संस्कार : एक समीक्षा

डॉ. ललन कुमार झा · 2020-10-15 · अंक 308

पं. तेजनाथ झा ओ संस्कार : एक समीक्षा
वास्तवमे विधिपूर्वक संस्कार साधनसँ दिव्य ज्ञान उत्पन्न कऽआत्माकेँ परमात्माक रूपमे प्रतिष्ठिते करब मुख्य संस्कार अछि आओर मानव जीवनक सार्थकता सेहो एहिमे सन्निहित अछि। संस्कार शब्द शब्दत: वैदिक साहित्यमे नहि भेटैत अछि। मुदा सम्क संग कृ धातु तथा संस्कृत शब्द बहुधा मिलि जाइत अछि। ऋग्वेद (5/76/2) मे संस्कृत शब्द धर्म (बरतन)क लेल प्रयुक्त भेल अछि। जेना दुनू अश्विन पवित्र मेल बरतनकेँ हानि नहि पहुँचबैत अछि। शतपथ ब्राह्मण (1/1/4/10)मे आयल अछि जे- ‘स इदं देवेम्यो हवि: संस्कुरु साधु संस्कृत संस्कुर्वित्येवैत दाह।’ पुन: अछि (3/2/1/22) मे आएल अछि जे- तस्मादु स्त्री पुमांसं संस्कृते तिण्डन्तभ्येति अर्थात् स्त्री कोनो संस्कृत (सुगठित) घरमे ठाढ़ पुरुषक लग पहुँचैत अछि। जैमिनिक (3/1/35) मे संस्कार शब्द ‘उपनयन’क लेल प्रयुक्त भेल अछि।
संस्कारसँ आत्मा-अन्त:करण शुद्ध होइत अछि। संस्कार मनुष्यकेँ पाप आओर अज्ञानसँ दूर राखि कऽ आचार-विचार आओर ज्ञान-विज्ञानसँ संयुक्त करैत अछि आओर व्यक्ति कार्य विशेषक लेल अहर्ता प्राप्त करैत अछि। एही लेल मीमांसाकार शबर संस्कार शब्दक अर्थ बतबैत कहलन्हि अछि जे- ‘संस्कारो नाम स भवति यस्मिन जाते पदार्था भवति योग्य: कस्य चिदर्थस्यं- अर्थात संस्कार ओएह अछि जाहिसँ कोनो पदार्थ वा व्यक्ति कोनो कार्यक लेल योग्य भऽ जाइत अछि। तन्त्रवार्तिकक अनुसारेँ ‘योग्यतां चादधाना: क्रिया संस्कारा इत्युच्यन्ते’ अर्थात् संस्कार एहन क्रिया तथा रीति अछि जे योग्यता प्रदान करैत अछि। ई संस्कार मुख्यत: दुइ प्रकारक होइत अछि- (1) मलापनयन आओर (2) अतिशयाधाना। कोनो दर्पणपर पड़ल गरदा आदि सामान्य मलकेँ वस्त्रादिसँ पोछब, हटाएब वा स्वच्छ करब मलापनयन अछि आओर फेर जँ कोनो रंग वा तेजमय पदार्थ द्वारा ओहि दर्पणकेँ विशेष चमत्कृत वा प्रकाशमय बनाएव ‘अतिशयाधान’ कहबैत अछि। दोसर शब्दमे ओकरा हीनभावना, प्रतिचरण वा गुणाधान संस्कार कहल जाइत अछि। एहि तरहेँ संस्कार मानव जीवनक एक आवश्यक अंग अछि जकरा बिनु ओ अपूर्ण रहि जाइत अछि। जेना जन्मसँ केओ शुद्रे रहैत अछि, मुदा जखन ओकर कर्ण वेधोपनयन संस्कार भऽ जाइत अछि तखन ओ द्विज भऽ जाइत अछि।
‘जन्मना जायते शुद्र: संस्काराद्द्विज उच्यते।
मातुर्यदग्रे जायन्ते द्वितीय मौञ्जिबन्धनात्।
ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेते द्विजा: स्मृता:।।
‘द्विर्जायत इति द्विज: निर्वचनमे इएह भाव गौण अछि। एही भावनासँ प्रेरित भऽ कऽ वीर मित्रोदय संस्कारक परिभाषा एहि प्रकारेँ देल गेल अछि- ई एक विलक्षण दुइ प्रकारक अछि- (1) जकरा द्वारा व्यक्ति आन कर्म (जेना उपनयन संस्कार, वेदाध्ययन आरम्भ होइत अछि) क अहर्ता प्राप्त करैत अछि तथा (2) दोष (जेना जातकर्म संस्कारसँ वीर्य एवं गर्भाशयक दोष मोचन होइत अछि) सँ मुक्त भऽ जाइत अछि। इएह कारण अछि जे हिन्दू धर्मशास्त्र संस्कारकेँ मानव जीवनक वांछनीय नहि अपितु अपरिहार्य अंग मानल अछि। ई ध्यातव्य अछि जे संस्कार सेहो पुरुषक जीवनमे अनिवार्य कहल गेल अछि जतए मन्त्रपूर्वक ओकर निष्पादन होइत अछि। स्त्री लोकनिक विवाह संस्कार मात्रक ओतेक महत्त्व जे मन्त्रपूर्वक होइत अछि। आन क्रिया तँ बिनु मन्त्रक सेहो भऽ सकैत अछि।
‘तूष्णीमेता: क्रिया स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक:।
एता जातकर्मादिका: क्रिया: स्त्रीणां तूष्णी
विनैव मन्त्रैर्यथाकालं कार्या:।
विवाह: पुन: समन्त्रक: कार्य:।।- मिताक्षरा
नवैता: कर्णवेधान्तामन्यवर्ज क्रिया: स्त्रिया:
विवाहोमन्त्रतस्तस्या: शूद्रस्यामन्त्रतोदयश।।
-व्यास स्मृति- 1/15-16
स्मृतिकार हारीतक अनुसारेँ संस्कार दू कोटिमे विभाजित अछि- ब्राह्म आओर दैव। गर्भाधानादि संस्कार जे मात्र धर्मशास्त्रमे वर्णित अछि, ब्राह्म कहल जाइत अछि। पाक यज्ञ (पकाओल भोजनक आहुति) एवं सोमयज्ञ आदि जकरा संस्कार कहल जाइत अछि। एहि तरहेँ हिन्दू लोकनिक बीच संस्कार घूलि-मिलि गेल अछि। एकरा बिनु पूर्णता वा जीवनक सार्थकता नहि अछि।
संस्कारक संख्याक विषयमे स्मृतिकार लोकनिमे मतभेद रहल अछि। गौतम (8/14-24) चालीस संस्कारक वर्णन कएलन्हि अछि। वैरवानस अठारह शरीरक संस्कार गनाओल अछि। व्यासक अनुसारेँ सोलह संस्कार अछि ओ आइ एकरे मान्यता अछि। मनु संख्याक परिगणना तँ नहि कएलन्हि अछि, मुदा कहलन्हि अछि जे निषेक (गर्भाधान)सँ श्मशान धरि संस्कारक तरफ संकेत कएलन्हि अछि-
निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधि:।
तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्।।
-मनुस्मृति- 2/16
एहि संस्कारक उल्लेख कऽ मनु इहो संकेत देलन्हि अछि जे द्विजेटा एहि धर्मशास्त्रक अधिकारी अछि। एहि तरहेँ जीवनक प्रधान तत्त्व संस्कारक संख्याक विषयमे मतभेद अछि। मुदा स्मृतिकार व्यासक संख्या परक विचार सर्वथा मान्य अछि। हिनका द्वारा परिगणित सोलह संस्कार ई अछि- (क) गर्भाधान, (2) पुंसवन, (3) सीमन्तोन्नयन, (4) जातकरण, (5) नामकरण, (6)निष्क्रमण, (7) अन्नप्राशन, (8) वपन क्रिया, (9) कर्णवेध, (10) प्रतोदेश (उपनयन), (11) वेदारम्भ, (12) केशान्त (गोदान), (13) समावर्तन (वेद स्नान), (14) विवाह, (15) विवाहाग्नि परिग्रह आओर (16) त्रेताग्नि संग्रह।
“गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तनो जातकर्म च।
नामक्रियानिष्क्रमणेऽन्नाशनं वपन क्रिया।
कर्णविधो व्रतादेशो वेदारम्भ क्रियाविधि:।
केशान्त: स्नानन्मुद्वाहो विवाहग्नि परिग्रह:।
त्रेताग्नि संग्रहश्चेति संस्कारा: षोडशस्मृता:।।”
व्यास स्मृति- 1/13-15
मानव जीवनमे एहि संस्कारक बड़ महत्त्व अछि। एहि लेल स्मृतिशास्त्रक बाद निबन्ध ग्रन्थमे सेहो एकर उपादेयताक वर्णन कएल गेल अछि। पं. तेजनाथ झा प्रणीत वाजसनेयिनां विवाहादि संस्कार पद्धतिमे सेहो एहि संस्कारक वर्णन कएल गेल अछि। पं. तेजनाथ जनकल्याणक भावनासँ उक्त निबंध ग्रन्थक प्रणयन कएलन्हि। वाजसनेयी शाखावला ब्राह्मण केवल मिथिले टा मे नहि छथि, एहि बुद्धिसँ ओ एहि ग्रन्थक टीका सेहो हिन्दीमे लिखलन्हि जाहिसँ ई अत्यन्त व्यापक भऽ गेल अछि।
संस्कारक प्रकारक सम्बन्धमे जे मतवैभिन्न होअए, मुदा ग्रन्थकार मात्र तेरह संस्कारक आलोच्य ग्रन्थमे वर्णन कएलन्हि अछि। ई परम्परा विरुद्ध सर्वप्रथम विवाहक वर्णन कएलन्हि अछि। उक्त ग्रन्थमे वर्णित संस्कारावली एहि तरहेँ अछि- (1) विवाह (2) गर्भाधान (3) पुंसवन (4) सीमन्त्रोन्नयन (5) जातकर्म (6) नामकरण (7) निष्क्रमण (8) अन्नप्राशन (9) चूड़ाकरण (10) कर्णवेध (11) उपनयन (12) वेदारम्भ आओर (13) समावर्तन।
एहि ग्रन्थमे कुल उन्नैस विभाग कएल गेल अछि। सर्वप्रथम विवाहक पूर्व दिन रातिमे सीमन्त (सोंथ) आमन्त्रण आओर फेर विवाह दिन कन्यादानसँ पूर्व वरक आंगन अएलापर आदरभावसँ पूंगादि दानक वर्णन कएल गेल अछि। तदुत्तर अष्टमंगला विधिक वर्णन अछि, जे वर सहित आठ ब्राह्मण लोकनिक द्वारा सम्पादित होइत अछि। तेसर क्रममे मातृका पूजा- विधि आओर अनन्तर आभ्युदयिक श्राद्ध विधि वर्णित अछि। धर्मशास्त्रमे वर्णित आन संस्कार सभक क्रमबद्ध वर्णन किएक नहि कएल गेल अछि, एहि विषयमे ग्रन्थकार किछु नहि लिखलन्हि अछि। धर्मशास्त्रानुमोदित संस्कार क्रमक विचार कऽ प्रतिपादन कएल जाइत। एहि दृष्टिएँ सर्वप्रथम गर्भाधान संस्कारपर विमर्श प्रस्तुत कएल जाइत अछि।
गर्भाधान :-
गर्भाधान पहिल संस्कार कहल गेल अछि। विधिपूर्वक संस्कार युक्त गर्भाधानसँ उत्तम एवं योग्य सन्तान उत्पन्न होइत अछि। एहि संस्कारसँ वीर्य तथा गर्भ सम्बन्धी दोष, पाप दूर होइत अछि-
“निषेकादि बैजिकं चैनो गर्भिकं चापमृज्यते।
क्षेत्र संस्कार सिद्धिश्च गर्भाधान फलं स्मृतम्।।”
-स्मृति संग्रह
पुंसवन :-
पुत्रक प्राप्तिक लेल धर्मशास्त्रमे पुंसवन संस्कारक विधान कएल गेल अछि। ‘गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्व रूप प्रतिपादनम्’ (स्मृति संग्रह) एहि वाक्यक अनुसारेँ पुत्रोत्पत्तिक लेल पुंसवन संस्कारक कर्त्तव्यता स्वत: ज्ञात होइत अछि। जखन गर्भ तीन मासक भऽ जाइत अछि तखन पुंसवन संस्कारक विधान कहल गेल अछि। पं. तेजनाथ झा कहलन्हि अछि जे पुंसवन संस्कार गर्भधारण माससँ दोसर अथवा तेसर मासमे करबाक चाही।
सीमन्तोन्नयन :-
गर्भक छठम वा आठम मासमे ई संस्कार कएल जाइत अछि। गर्भक शुद्धिए एहि संस्कारक आधार अछि। एहि संस्कारक वर्णन आश्वलायन, शांखायन, हिरण्यकेशीय, गोभिल, पारस्करादि विभिन्न गृह्य सूत्रमे कएल गेल अछि। पं. तेजनाथ झा पारस्करक मतक अनुसारेँ प्रथम गर्भमे एकर प्रासंगिकता कहलन्हि अछि। कर्कोपाध्याय दोसर गर्भमे सेहो एकर आवश्यकता पर जोर देलन्हि अछि, मुदा पं. झाक कहब छन्हि जे पारस्करक विचार सर्वथा मान्य अछि आओर स्मृतिकार हारीतक वचनक उल्लेख कऽ पारस्करक मतक पुष्टि सेहो कएलन्हि अछि-
“सकृच्च कृतसंस्कारा सीमन्तेन द्विजस्त्रिय:।
यं यं गर्भ प्रसूयन्ते स सर्व: संस्कृतो भवेत्।।”
-वाजसनेयिनाम्- पृ. 47
जातकर्म :-
जातकर्म संस्कार अति प्राचीन अछि। तैत्तिरीय संहिता (21215/3-4) मे आएल अछि जे जखन ककरो पुत्र उत्पन्न होइत अछि तँ ओकरा बारह विभिन्न पात्रमे पाकल रोटी (पुरोडारा)क बलि वैश्वानरकेँ देबाक चाही। बालकक जन्महोइतहि ई संस्कार कर्त्तव्य अछि। नालच्छेदनसँ पूर्व बालककेँ सोनाक शलाकासँ अथवा अनामिका आंगुरसँ मधु तथा घृत चटाओल जाइत अछि। बालकक पिता अथवा आचार्यकेँ बालकक कान लग ओकर दीर्घायुक लेल मन्त्रक पाठ करबाक चाही। पं. झा एकर क्रम सेहो स्थिर कएलन्हि अछि-
“ऊँ सजतु दशयास्यो गर्भोजरायुणास यथाथं वायु रेजति
तथा समुद्र रजति एवायन्दशमास्योऽस्रजरायुणा सह।”
नामकरण :-
एहि संस्कारक फल आयु तथा तेजक बृद्धि एवं लौकिक व्यवहारक सिद्धि कहल गेल अछि-
“आयुर्वचोऽभिवृद्धिश्च सिद्धिव्यवह्तेस्तथा।
नाम कर्म फलंत्वेत त समुछिष्टं मनीषिभि:।।”
(स्मृति संग्रह)
आचार्य मनुक अनुसारेँ जन्मसँ दशम वा बारहम दिन ज्योतिष शास्त्रमे कहल गेल शुभ तिथि, मुहूर्त्त आओर गुणयुक्त नक्षत्रमे बालकक नामकरण संस्कार होइत अछि। पं. झाक मन छन्हिजे दशम दिन (अशौचान्त) सूतिकाकेँ उठा कऽ ग्यारहम अथवा आन विहित दिनमे पिता द्वारा शिशुक नामकरण कएल जाए। ओ कहलन्हि अछि जे सर्वप्रथम मातृका पूजा आओर आभ्युदयिक कऽ ब्राह्मण भोजन कराए कऽ बच्चाकेँ स्नान कराए नवीन वस्त्र पहिराए स्वस्त्ययन कऽ पूर्वाभिमुख शिशुक दहिना कानमे ‘ऊँअमुक शर्मासि’ एहन तीन बेरि कहथि।
निष्क्रमण :-
मनुक अनुसारेँ नवजात शिशुकेँ सूर्यक दर्शनक लेल चारिम मासमे घरसँ निकालबाक चाही- “चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात्’ (2/34)
पं. झा मनुक अनुरूपे चारिम मासमे चन्द्र तरानुकूल दिनमे बच्चा आनि कऽ सूर्यक दर्शन “ऊँ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छक्रमुच्चरत्। पश्येम शरद: शतं, जीवेम शरद: शतं, शृणुयाम शरद: शतं, प्रव्रवाम शरद: शतामदीना: श्याम शरद: शतभ्यूयश्च शरद: शतात्” मन्त्रसँ करए।
अन्नप्राशन :-
एहि संस्कार द्वारा माताक गर्भमे मलिन भक्षण जन्य दोष बालकमे आबि जाइत अछि, ओकर नाश भऽ जाइत अछि। जखन बालक छ: सात मासक होइत अछि आओर दॉंत निकलए लगैत अछि, पाचन शक्ति प्रवल होवए लगैत अछि तखन ई संस्कार कयल जाइत अछि। पं. झाक अनुसारेँ बच्चाक बाजव स्पष्ट करवाक कामनासँ माछ, वायुक कामनासँ कृकलासक व्रह्मवर्चसक नाटिकाक, मांस एवं सभ फलक कामनासँ उपर्युक्त सभ मांस खोएबाक चाही।
चूड़ाकरण :-
आचार्य मनुक अनुसारेँ सभ द्विजाति बालकक चूड़ाकरण संस्कार वेदक अनुसार पहिल वा तेसर वर्षमे करबाक चाही। पं. झा स्पष्ट रूपसँ एहि कर्मक समय निर्धारित कएलन्हि अछि जकरा अनुसारेँ वर्षाभ्यन्तर वा तेसर, पॉंचम वा उपनयनक संगे शुद्ध समयमे सूर्यक उत्तरायण रहलापर शुक्ल पक्षमे गुरु शुक्रास्तादि दोष नहि रहलापर रिक्ता तिथि (चौंठ, नवमी, चतुर्दशी) छोड़ि कऽ सोम, बुध, गुरु, शुक्र मे सँ कोनो दिन विहित नक्षत्र युक्त विहित तिथिमे आचार्य द्वारा करवाक चाही।
कर्णवेध :-
पं. तेजनाथ झा धर्मशास्त्रानुमोदित जन्मसँ तेसर अथवा पॉंचम वर्षमे विहित नक्षत्र तथा विहित तिथिमे पूर्वाह्न समयमे पिता अथवा आन श्रेष्ठ व्यक्ति पूर्वाभिमुख बैसि कऽ कुमारक दहिना कानमे यजुर्वेद (25/21) क मन्त्र पढ़ए। तहिना दोसर मन्त्रसँ वामा कानक अभिमन्त्रण करबाक चाही। तदनन्तर कानक मध्य भागकेँ देखि कऽ कानमे छेद कराबए।
उपनयन :-
पं. झा गृह्य सूत्रक वचनकेँ आधार बना कऽ लिखलन्हि अछि जे आठम वर्षमे अथवा गर्भाष्टम वर्षमे ब्राह्मणक उपनयन करबाक चाही। उचित अवधि धरि उपनयन नहि भेलापर द्विज व्रात्य भऽ जाइत अछि, जकर निराकरणक लेल विशेष यज्ञक व्यवस्था अछि।
वेदारम्भ :-
सूत्र ग्रन्थक चर्चा करैत ग्रन्थकार कहलन्हि अछि जे ओना तँ सूत्र ग्रन्थकार लोकनि वेदारम्भक समय विशेषक सम्बन्धमे किछु नहि लिखलन्हि अछि, मुदा याज्ञवल्क्यक कहब छनि जे गुरु शिष्यक उपनयन संस्कार कऽ ओकरा महाण्याहृतिक संग वेद पढ़ावए आओर शौचक नियमक शिक्षा देअए-
‘उपनीय गुरु: शिष्यं महाव्याहृति पूर्वकम्।
वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत्।।
-याज्ञ. 2/15
समावर्तन :-
वेदारम्भक पश्चात् समावर्तन कर्म कएल जाइत अछि। नियमानुसार विद्याध्यययनक उपरान्त स्नान कर्म तथा गुरु गृहसँ अबैत समयक संस्कार स्नान वा समावर्तन कहल जाइत अछि। याज्ञवल्क्य सेहो समावर्तनक एहि अर्थमे प्रयोग कएलन्हि अछि। ओ कहलन्हि अछि वेदाध्ययन वा व्रतकेँ समाप्त कऽ अथवा दुनू समाप्त कऽ गुरुकेँ यथाशक्ति दक्षिणा दऽ कऽ हुनक आज्ञासँ समावर्तन करए-
“गुरुवे तुवरंदरवा स्नायाद्धा तदनुज्ञया।
वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा हयुममेव वा।।”
-याज्ञ. 1/51

Suggested citation: डॉ. ललन कुमार झा. “पं. तेजनाथ झा ओ संस्कार : एक समीक्षा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 308, 2020-10-15. https://www.videha.co.in/research/2020/308/पं-तेजनाथ-झा-ओ-संस्कार-एक-समीक्षा.htm

मूल विदेह अंक / Original issue