पुत्र ओ पितृकर्म
पिता पुत्रक सम्बन्ध अनुकूल नहि रहलासँ सामाजिक व्यवस्थामे गतिरोध उत्पन्न होएब स्वाभाविके अछि। पुत्रक प्रति पिताक कर्तव्यकेँ नकारल नहि जा सकैछ तँ पुत्रक कर्त्तव्यमे सेहो गुरुतर भारमे वृद्धि भऽ जाइत अछि जे पिताक प्रति अनुकूल व्यवहार करए, किएक तँ पिता तँ गुरुओक गुरु होइत अछि। तेँ जीवितावस्थामे पुत्रक कर्त्तव्य विशेष महत्त्व रखैत अछिकारण हुनक ऋणसँ पुत्र मृत्युपरान्त मुक्त नहि होइत अछि। जीवितावस्थामे पुत्र पिताक कहब मानए ओ मृत्युपरान्त हुनका निमित्त पिण्डदान करए एहिमे ओकर पुत्रता अछि, ई शास्त्रीय वचन अछि।
‘जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्।
गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता।।
‘पुत्’ नामक नरकसँ मुक्ति दिएवाक कारणेँ पुत्र कहबैत अछि। एकरा सम्बन्धमे स्मृतिकार बौधायन कहने छथि जे ‘पुत्’ शब्द नरकक पर्याय अछि आओर दुख तँ नरक अछिए। एहि नरकसँ त्राण दिआबएवला पुत्र होइत अछि। तेँ पिता इहलोक ओ परलोक दुनूक लेल पुत्रक कामना करैत अछि।
‘पुदिति नरकस्यारण्या दु:खंच नरकं विदु:।
पुत्रस्त्राणात्तत: पुत्रमिच्छन्ति परत्र च।।’
एहि सम्बन्धमे मनु सेहो कहलन्हि अछि जे पिताकेँ पुत् नामक नरकसँ त्राण दिअएबाक कारणहि सुत पुत्र सेहो कहबैत अछि, एकरा साक्षात ब्रह्मा कहलन्हि अछि।
“पुंनाम्नो नरकाह्यस्मात्त्रायते पितरं सुत:।
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्त: स्वयमेव स्वयंभुवा।।”
मनुस्मृति- 9/138
पुत्त्र शुद्ध रूप अछि पुत्रक जकर प्रयोग पुत्र मात्र भऽ गेल अछि। पुत्रहीन व्यक्तिक लेल पुत् नामक नरक सुरक्षित कएल गेल अछि। ‘आत्मा वै जायते पुत्र’ एहि शास्त्र वचनानुसार पति स्वयं अपन पत्नीक गर्भसँ पुनर्जन्म लैत अछि जाहिमे हुनका असीम आनन्द होइत छन्हि। पिता सभ दुखकेँ बिसरि जाइत अछि जखन हुनका पुत्ररत्न प्राप्त होइत छन्हि संगहि पुत्र पिताक सभ क्लेशकेँ दूर कयनिहार होयबाक चाही। जहिना नाव अथाह सागरकेँ पार कराए दैत अछि ओहिना पुत्र इहलोक ओ पारलौकिक दुनू लोकसँ मुक्ति दिआए दैत अछि। इएह कारण अछि जे आनादिकालहिसँ एहिठाम पुत्र जन्मक कामना करैत देखल जाइत अछि। कहल गेल अछि जे- ‘अपुत्रस्य गतिर्नस्ति। भारतीय सनातन धर्मानुसार पितरक लेल प्रतिदिन तर्पण करबाक चाही। एहि तर्पणसँ पितर मृत्युक उपरान्त कोनो योनिमे किएक नहि होथि हुनका सर्वविध तृप्ति भेटैत छन्हि। नित्य जल तर्पणक कामना पितर अपन सन्तानसँ करैत छथि एवं बड़ प्रसन्नतासँ ओकरा ग्रहण करैत छथि। पुत्रहीन पितरकेँ जलक बड़ दुख होइत अछि ओ अश्रुक रूपमे पिबैत छथि। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’मे महाकवि कालिदास राजा दुष्यन्तक पुत्रहीनताक व्यथा व्यक्त कएलन्हि अछि। राजा दुष्यन्त शापवशात् गर्भवती पत्नी शकुन्तलाक त्याग कऽ देने छलाह आ पुत्रहीनताक शंकासँ परम खिन्न छलाह। हमर पितर सन्तानहीन प्राणीक द्वारा देल गेल तर्पणक जलकेँ नोरक रूपमे पिउताह।
‘अस्मात्परं वत यथाश्रुतिसंभृतानि को न: कुले
निवपनानि नियच्छतीति।
नूनं प्रसूतिविकलेन मया प्रसिक्तं धौताश्रुशेषमुदकं
पितर: पिबन्ति।।
अभिज्ञान शाकुनतलम्- 6/25
एहने सन भाव महाकवि कालिदास रघुवंश महाकाव्यमे व्यक्त कएलन्हि अछि। राजा दिलीप वशिष्ठसँ इएह प्रार्थना करैत छथि जे पुत्रहीन हमरा बाद पितृ तर्पण जलकेँ दुर्लभ बूझि हमरासँ देल गेल तर्पण जलकेँ हमर पितृ, पितामहादि पितरगण अपन-अपन श्वांस-प्रश्वाससँ ईषत् गरमकेँ पिबैत छथि- ई सत्य अछि किएक तँ दुखी व्यक्तिक नोर तथा श्वांस दुनू गरम-गरम निकलैत अछि।
“मत्परं दुर्लभं मत्वा नूनमावर्जित मया।
पय: पूर्वे: स्व नि:श्वासै: कवोष्ठमुप भुज्यते।।”
रघुवंश- 1/67
राजा दिलीप निवेदन कएलन्हि जे पुत्रहीन हमरा बाद श्राद्ध पिण्डक भावी लोप देखएवला हमर पूर्वज पितृगण दुखी भेलासँ हमरा द्वारा प्रदत्त स्वधा-स्वधान्त पितृमन्योत्सर्ग पितृभोज्य पदार्थक संग्रहमे तत्पर भेलापर सेहो पर्याप्त रूपसँ भोजन करएवला नहि होइत छथि।
“नूनं मत्त: परंवश्या: पिण्डविच्छेददर्शिन:।
न प्रकामभुज: श्राद्धे स्वधा संग्रहतत्परा:।।”
रघुवंश- 1/66
पुत्रक एहि महत्तापर विचार करैत नारद इक्ष्वाकुवंशीय पुत्र राजा हरिश्चन्द्रसँ गर्हस्थ्य मोंछ, दाढ़ी एवं तपस्यादिसँ वारण करैत केवल पुत्रक इच्छा करबाक कहलन्हि-
‘पुत्रं ब्रह्मण मिच्छत्वं सर्वलोकोऽवदादद।’
-हरिश्चन्द्रोपाख्यान- अध्याय, 33/गाथा- 04
ऐतरेय ब्राह्मणक एहि अध्यायमे नारद पुत्रक प्राप्तिकेँ अनिवार्य मानलन्हि-
“नापुत्रस्य लोकोऽस्तीति।”– गाथा, 09
एवं प्रकारेँ एहि जगतमे पुत्रक विशिष्टता अछि जे पिताकेँ इहलोक तथा परलोक दुनूसँ पार कराए दैत अछि। तेँ पिता-पुत्रक प्राप्तिक लेल व्याकुल रहैत छथि। कोनो पिता प्राथमिक रूपसँ पुत्रेक कामना करैत छथि। पुत्री कतेको गुणवती किएक नहि होअए पिताकेँ पुत्र चाही। जतए अपुत्र व्यक्तिक मृत्युसँ पूर्व कर्ता पुत्र बनबैत अछि आओर मृत्युक पश्चात् ओ कर्ता निमंत्रण पत्रमे ‘मत्पुत्रत्वकर’ वा स्त्रीपक्षमे ‘मत्पुत्रत्वकरी’क प्रयोग करैत अछि। एहन विशिष्ट पुत्रकेँ धर्मशास्त्री लोकनि अधिकारक संग कतिपय कर्त्तव्य निर्धारित कएलन्हि अछि।