म. म. राजनाथ मिश्र ओ तिथि निर्णय : एक अध्ययन
म.म. राजनाथ मिश्र प्रणीत ‘तिथि निर्णय:’ धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्रक समीक्षात्मक उत्कृष्ट कृति अछि। एहिमे विद्वान ग्रन्थकार प्रतिपदासँ लऽ कऽ अमावस्या धरिक कृत्यक सप्रमाण प्रतिपादन कएलन्हि अछि। विशेष रूपसँ स्वरूप निरूपण, सामान्य परिभाषा कथन, काल विभाग प्रतिपादन कृष्णाष्टमी व्रत निरूपण, नवरात्र निर्णय, रामनवमी विश्लेषण, दीपावली, महाशिवरात्री, होलिकादहनादिक जे विवेचन कएल गेल अछि से निश्चित रूपेण सुधी पाठकक मानसकेँ प्रमुदित कएनिहार अछि। आब प्रश्न उठैत अछि जे ‘तिथि की थीक?’ अत् (गमने) इथिन् विधानसँ पृषोदरादि सूत्रसँ वैकल्पिक ङीप् प्रत्यय लगलासँ दीर्घ भऽ कऽ तिथि शब्द बनैत अछि, जकर सामान्य अर्थ होइछ चन्द्रदिवस। अथवा तन् (विस्तारे) धातुसँ सेहो एकर निष्पत्ति मानल जाइत अछि। तदनुसारेँबढ़एवला अथवा क्षय होमएवला चन्द्रकलाकेँ जे विस्तारित करएवला काल विशेष ‘तिथि’ कहबैत अछि-
“तंत्र तिथि शब्ददस्तनोतेद्यतोर्निष्पन्न:। तनोति विस्तार यति वर्धमानां क्षीयमाणं वा,चन्द्रकला मेकां च कालविशेष: सा तिथि। यद्वायथोक्त कलयातन्यत इति तिथि:। तदुक्तं सिद्धांत शिरोमणै तन्यते कलया यस्मान्तस्मात्तास्तिथय स्मृता:।”
-कालमाधव पृ.- 92
एहि धारणाकेँ लक्ष्य कऽ स्कन्द पुराणमे कहल गेल अछि जे हे देवि! सोलह भागसँ विभक्त भऽ कऽ अमाक नासँ परिचित जे महाकला अछि, ओएह माया आओर परमा शरीर धारीक लेल शरीर धारण करैत अछि। हे सुन्दर मुखवाली! अमावस्यासँ लऽ कऽ पूर्णिमा धरि चन्द्रमाक जे कला अछि ओकरा तिथिकनामसँ अभिहित कएल जाइत अछि-
“अमाषोऽशभागेन देविप्रोक्ता महकला
संस्थितापरमा माया देहिनां देह धारिणी।
अमादि पौर्णमास्यन्त या एव शशिन: कला:
तिथियस्ता समाख्याता: षोडशैव वरानने।।”
- कालमाधव पृ.- 92
तिथि निर्णयकार पं. मिश्र ग्रन्थारम्भमे सर्वप्रथम गणेश, भगवती, सरस्वती, विष्णु, महादेव आओर गुरुकेँ प्रणाम कएलन्हि अछि-
“नव्वा ढुष्ढिं गिरं विष्णु निबन्धृन् गिरिशं गुरुन।
क्रियते राजनाथेन तिथिर्णय संग्रह:।।”
ग्रन्थकार तिथिकेँ अखण्ड विशेषकाल कहलन्हि अछि। विष्णुधर्मोत्तरक वचनकेँ उल्लेख कऽ कालक विशेषताक सेहो वर्णन कएलन्हि अछि। तदनुसार काल अनादि निधन अछि, रुद्र ओकर संकर्षण अछि, सभ प्राणीक कलना ‘नाश’ कऽ ओ काल नामसँ अभिहित अछि-
“अनादिनिधन: कालो रुद्र: संकर्षण: स्मृत:।
कलानात् सर्वभूतानां स काल: परिकीर्त्तित:।।”
सभ भूतक कर्षणसँ ई संकर्षण आओर शमन कएलासँ रुद्रनाम कीर्त्तित अछि। अनादि निधनक कारण ओ परमेश्वर अछि-
“कर्पणात् सर्वभूतानां स तु संकर्षण स्मृत।
सर्वभूतशमित्वाच्च सरुद्र परिकीर्त्तित:।।
अनादिनि धनत्वेन समहान् परमेश्वर:।।”
-कालमाधव पृ.- 16
पं. मिश्र सामान्य परिभाषात्मक तथा काल विभाग प्रकरणमे सभ तिथिक विशेषता तथा ओहि तिथिक कर्तव्यताक विषयमे सेहो वर्णन कएलन्हि अछि। तिथिक लक्षण सेहो कहल गेल अछि। तदनुसार ओकर तीन लक्षण खर्व, दर्प ओ हिंसा अछि-
“खर्बो दर्पस्तथा हिंसा त्रिविधन्तिथि लक्षणम्।
धर्मा धर्म व शादेव तिथिस्त्रेधा विवक्षिता।।”
-तिथि निर्णय पृ. 03
अर्थात् खर्ब-साम्य (सम तिथि) वर्धित होमएवला आओर हिंसा क्षय युक्त तथि कहबैत अछि। तिथिक संदर्भमे ई बुझब आवश्यक अछि जे प्रतिपदासँ लऽ कऽ पूर्णिमा अथवा अमावस्या पर्यन्त पन्द्रह तिथि होइत अछि। नाड़ीसँ उत्तर तिथिकेँ बाधित करैत अछि। सभ प्रकारक ई वेध व्रतोपवासक दूषक अछि तथा अरुणोदय कालिक वेध वैष्णवक लेल मानल गेल अछि।
एहि तथि निर्णय ग्रन्थक अध्ययनसँ ज्योतिषशास्त्रक तिथिक आन सांकेतिक नामक सेहो पता लगैत अछि। ई संभवत: शब्दलाधवक लेल प्रयोगमे मनीषी लोकनि द्वारा आनल गेल छल होएत। एकरा अनुसारेँ भिन्न-भिन्न तिथिक ज्येातिष शास्त्रीय नाम एहि प्रकारेँ अछि-
पंचमी-वाण आओर नाग, दशमी- दिग् चतुर्दशी भूत, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी आओर पंचमी- भुग्मातिनग्न,भुत-षष्ठी, सप्तमी-पण्मुनि,अष्टमी-नवमी-वसुरन्ध्र, एकादशी युक्त द्वादशी-रुद्रेण युक्ता द्वादशी, पंचमी युक्त षष्ठी नागविदा एकादशी विद्ध द्वादशी-रुद्रविद्ध दिवाकर, तृतीया चतुर्थी युता- गौरी विनायकोपेत, नवमी सहिता दशमी-सँ दुर्गा दशमी। पंचमी दशमी पूर्णिमा (अमावस्या) पूर्णा।
एहि तरहेँ तिथि निर्णय ग्रन्थोपयोगी विषय ध्यान देबाक योग्य अछि। सर्वप्रथम नन्दा भ्रद्रोद शब्द ककर व्यापक अछि, ई सभ ग्रन्थ विषयवगमक लेल आवश्यक अछि। एहि शब्दकेँ एहि प्रकारेँ जानल जा सकैत अछि-
प्रतिपदा षष्ठी एकादशी- नन्दा
द्वितीया सप्तमी द्वादशी- भद्रा
तृतीया अष्टमी त्रयोदशी- जया
चतुर्थी नवमी चुर्दशी- रिक्ता
पंचमी दशमी पूर्णिमा (अमावस्या)- पूर्णा
सामान्य तिथि विषयक परिभाषाक बाद ‘काल विभाग’क विवेचन प्रस्तु कएल गेल अछि। एहि क्रममे ओ ब्रह्मवैवर्त पुराणगत वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि। तदनुसारेँ प्रात: चारि दण्ड पर्यन्तक समय अरुणोदयक अछि। ई सन्यासीलोकनिक स्नानक समय अछि, जखन सरोवरक जल गंगाजलक समान पवित्र रहैत अछि- “चतस्रो घटिका प्रातररुणोदय उच्चयते।
यतीनां स्नानकालोऽयं गंगाम्भ: सदृश: स्मृता।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 06
प्रात: कालक बाद तीन दंड धरि संगव कहबैत अछि, तीन मुहूर्त्त आगू धरि मध्याह्न आओर ओकर बाद उपराह्न होइत अछि। ओकर बाद तीन मुहूर्त्त पर्यन्त सायंकाल होइत अछि जाहिमे श्राद्ध वर्जित अछि। ई राक्षसी वेला कहबैत अछि जे सभ कर्मक लेल गर्हित समय मानल गेल अछि। एकरा मिथिलामे व्यवहारिक भाषामे ‘गदहबेर’सेहो कहल जाइत अछि। दिनक पन्द्रह मुहूर्त्त मानल जाइत अछि जाहिमे आठम् भाग कुतपकाल तथा नवम् रोहिणी कहबैत अछि। ई दुनू काल पितरक लेल अक्षय पुण्यप्रद मानल जाइत अछि-
“प्रात: कालो मुहूर्त्तांस्त्रीन् संगवस्तावदेव हि।
माध्याह्ननस्त्रिमुहूर्त्त: स्यादपराह्लस्तत: पर:।
सायाह्नस्त्रिमुहूर्त्त: स्याच्छाद्धं तत्र न कारयेत्।
राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु।।
अठ्लोमुहूर्त्ता विख्याता दशपंच च सर्वदा।
तत्राष्टमो मुहूर्त्तो य: स काल: कुतुप: स्मृत:।।
रौहिणो नवम: प्रोक्त: पितृणामुभयं हितम्।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 07
पितरक एकोदिष्ट हेतु धर्मशास्त्रमे कुतपक अत्यधिक महत्व अछि जे दिनक आठम मुहूर्त्त होइत अछि, जाहि समय सूर्य अपन छायामे प्रवेश कऽ खड्गक तरह दृश्य होइत अछि। दिनमे पन्द्रह मुहूर्त्त होइत अछि आओर आठम मुहूर्त्त कुतप अछि। पं. राजनाथ मिश्र सेहो कुतप कालक उपस्थापन एहि रूपेँ कएलन्हि अछि-
“द्वौ यामौ घटिकान्यूनौ द्वौ यामो घटिकाधिकौ।
स काल: कुतुपो ज्ञेय: पितृणां दत्तमक्षयम्।।”
एहिठाम यामक अर्थ तीन घन्टा अछि आओर घटिकाक अर्थ चौबीस मिनट अछि। ओहिना पं. मिश्र सेहो ‘पूर्वाहणों वै देवानां मध्यन्दिनं मनुष्यानामपराहण: पितृणाम्’वचनक पदस्थापन कऽ दिनकेँ तीन भागमे बॉंटि देने छथि। निबन्धकार एहि तरहेँ नक्षत्र (तारा) ‘दर्शनात् नक्तं (राति) प्रदोषोऽस्तमनादूर्ध्व घटिकाद्वमिष्यते’ कहि कऽ प्रदोषक परिभाषा सेहो कएलन्हि अछि। प्रदोश तथा रातिक सम्बन्धमे ग्रन्थकार मिथिलेश शुभंकर ठाकुर तथा वर्धमान उपाध्यायक वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि। तदनुसार उदयसँ दू घड़ी पूर्व प्रात: संध्या तथा सूर्यास्तक बाद तीन घड़ी तक सायंकाल कहबैत अछि। एहि तरहेँ सूर्यास्तक तीन मुहूर्त्त धरि प्रदोष आओर तदनन्तर रातिक उल्लेख कएलन्हि अछि-
“उदयात्प्राक्तनी सन्ध्या घटकाद्वय मिष्यते।
सायं संध्या त्रिघटिका अस्तादुपरि भास्वत:।।
त्रिमुहूर्त्त: प्रदोष: स्याद् भानावस्तंगते सति।
तत्परा रजनी प्रोक्ता तत्र कर्म परिव्यजेत्।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 08
‘प्रदोषो रजनीमुख:’वचन सेहो प्रचलित अछि। रातिक बाद ग्रन्थकार निशाभागक उल्लेख सेहो कएलन्हि अछि। तदनुसार सूर्यास्तक तीन घन्टा बीत गेलापर निशा भाग आओर अड़तालीस मिनट आओर बीति गेलाक बाद राति निशा भाग अछि।
एहि तरहेँ प्रात: संगव अधान अपराह्न प्रदोष राति निशा भाग, अति निशा भागक वर्णन कऽ पं. मिश्र पक्षीक पन्द्रह तिथिक वर्णन सेहो कएलन्हि अछि। प्रतिपदा द्वितीय, तृतीया, चौठ, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी आओर पूर्णिमा ई पन्द्रह तिथि अछि मुदा कृष्णपक्षमे पन्द्रहम् तिथि अमावस्या कहबैत अछि।
प्रथम तिथिक रूपमे प्रतिपत् वा प्रतिपदाक नाम अबैत अछि जकरा सम्बन्धमे पूर्व तिथिसँ युक्तक ग्राह्यताक अनुशंसा कएल गेल अछि। ‘सा पूर्वयुताग्राह्य’एहिठाम ग्रन्थकार पैठीनसिक वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि-
“पंचमी सप्तमी चैव दशमी च त्रयोदशी।
प्रतिपन्नमी चैव कर्त्तव्या सम्मुखी तिथि:।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 19
सम्मुखीक अर्थ सायाह्न व्यापिनी मानल गेल अछि। मुदा आश्विन शुक्ल प्रतिपदाकेँ पख्यापिनी किंवा द्वितीयासँ युक्त रहबाक अनुशंसा कएल गेल अछि। मुदा जँ अमावस्या युक्त प्रतिपदाकेँ नवरात्रमे केओ कलश स्थापना करैत अछि तँ ओहिमे देवी दुर्गा शाप दऽ कऽ भष्मशेष कऽ दैत अछि-
“यो मां पूजयते भक्तया द्वितीया यां गुणान्विताम्।
प्रतिपच्छारदीं ज्ञात्वा सोऽश्नुते सुखमक्षयम्।।
यदि कुर्भाद्मायुक्त- प्रतिपप्स्थापनं मम।
तस्मै शापायुतं दत्वा भस्मशेषं मम।।”
-तिथि निर्णय- पृ. 09
प्रथमा तिथिक बाद द्वितीया तिथिक निर्णय करैत म.म. रज्जे मिश्र स्मृतिकार पैठीनसि स्मृतिक वचनोल्लेख कएलन्हि अछि जे तृतीयायुक्त द्वितीयाक ग्रहणानुशंसा कएलन्हि अछि। पैठीनसि युग्म नियमक अवलम्बन कऽ परतिथियुत तिथिक अनुमोदन कएलन्हि अछि-
“एकादश्यष्टमी पष्ठी द्वितीया च चतुर्दशी।
त्रयोदश्यप्यमावास्या उपोष्या: स्यु: परान्विता।।”
-तिथि निर्णय पृ. 11
तृतीया निर्णयक प्रसंगमे पं. मिश्र सर्वप्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया विवेचन कएलन्हि अछि। ई तृतीया उदयव्यापिनी अनुशंसित कएल गेल अछि। एहि प्रसंगमे देवी पुराणक वचनोल्लेख कएल गेल अछि। एहि वचनक अनुसार पार्वती प्रिया (तृतीया) सूर्योदयक अपेक्षा रखैत अछि, तिथि युग्मताक कोनो बात नहि-
‘युगाद्यावर्षवृद्धिश्च सप्तमी पार्वतीप्रिया।
सूर्योदयमपेक्षन्ते न तत्र तिथियुग्मता।।’
चौठ (चतुर्थी) गणेश चौठ मातृ विद्धा अर्थात् तृतीय वृद्धा प्रशस्त अछि जँ मध्याह्न व्यापिनी होअए तँ दोसर दिन (पंचमी युक्त) मे कर्त्तव्य अछि-
“चतुर्थी गणनाथस्य मातृविद्धा प्रशस्यते।
मध्याह्नव्यापिनी चेत्स्यात्परतश्च परेऽहनि।।”
पंचमी तिथि पूर्वयुता ग्राह्य अछि। तेँ पं. रज्जे मिश्र ब्रह्म पुराणक- ‘पंचमी च प्रकर्तव्या चतुर्थी संहिता प्रभो’तथा हारीतक- ‘चतुर्थी संयुता कार्या पंचमी परया न तु’वचनकेँ उद्धृत कऽ अपन मन्तव्य व्यक्त कएलन्हि अछि। मुदा नागपंचमी षष्ठी युता अनुशंसित कएल गेल अछि- ‘नागपंचमी तु परैव’ ब्रह्मवैवर्त्त पुराण सेहो षष्ठी युता पंचमीक अनुशंसा कएलक अछि-
“पूर्वाहणे कृष्णपक्षे तु नागतोषकरी तिथि:।
पंचमी तु प्रकर्त्तव्या षष्ठ्या युक्ता तु नारद।।”
-तिथि निर्णय- 17
अन्यत्र चतुर्थीयुता कर्त्तव्य होइत अछि।
पं. रज्जे मिश्र स्कन्द षष्ठी व्रतकेँ पूर्व युक्त तिथिसँ विहित मानलन्हि अछि। एहि लेल स्मृतिकार वशिष्ठक वचनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि-
“कृष्णाष्टमी स्कन्दषष्ठी शिवरात्रि चतुर्दशी।
एता: पूर्वयुता ग्राह्यास्तिथ्यन्ते पारणंचरेत्।।”
एकर अतिरिक्त सप्तमी युता ग्राह्य अछि। तेँ स्मृति समुच्चयमे एहि सम्बन्धमे कहल गेल अछि-
‘षष्ठ्यष्टमी अमावास्या कृष्णपक्षे चतुर्दशी।
एता: परयुता ग्राह्या: परा: पूर्वेण संयुता:।।
‘ष. न्योरितियुग्मात्’इत्यादि वचनसँ सप्तमी षष्ठी युता ग्रहण करबाक योग्य अछि। सप्तमी नहि अष्टमी युक्त नहि सप्तमीसँ युक्त अष्टमी ग्राह्य अछि। षष्ठयष्टमी नागविद्धा इत्यादि पूर्वोक्त स्मृतिसँ एहन मन्तव्य देल गेल अछि। भविष्य पुराणक सेहो इएह वचन अछि जे सप्तमी षष्ठी युता सएह ग्राह्य अछि नहि कि अष्टमी युता।
अष्टमी नहि सप्तमी युता होएबाक चाही नहि सप्तमी सएह अष्टमी युता होअए। अष्टमी सर्वदा नवमी युता ग्राह्य अछि-
“तत्र नाष्टमी सप्तमीयुक्ता सप्तमी नाष्टमीयुता।
नवम्या सह् कार्या स्याद्ष्टमी सर्वदा बुधै:।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 20
ब्रह्मवैवर्त्त पुराणक अनुसारेँ नवमी अष्टमी विद्वा करणीय अछि। जँ व्रती फलक कामना करैत होअए, दशमी विद्धा कदापि नहि करए-
‘अष्टम्या नवमीविद्धा कर्त्तव्या फलकाङि क्षभि:।
न कुर्यान्नवमी तात दशम्या तु कदाचन।।’
-तिथि निर्णय, पृ.- 26
दशमी पूर्व वा बाद दुनू दिनमे विहित काल व्यापिनी ग्राह्य अछि। एहि सम्बन्धमे ग्रन्थ्ज्ञकार पक्षधर मिश्रक वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि, जाहिमे कहल गेल अछि जे फलक कामना करएवला व्यक्ति एकादशी विद्ध दशमी करए-
“दशम्येकादशीविद्धा कर्त्तवया फलकाङि क्षभि:।
दशमी चैव कर्त्तव्या सदुर्गा द्विजसत्तम।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 28
एकादशी उपवासदिमे द्वादशी युताक ग्राह्यता अछि। दशमी युता एकादशी कहियो नहि कएल जाए। एहि लेल पं. रज्जे मिश्र प्राचीन शास्त्रीय वचनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि जे-
“एकादशी दशविद्धा गान्धार्या समुपोषिता।
तस्या: पुत्रशतं नष्ट तस्मातां परिवर्जयेत्।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 29
द्वादशी उपवासादिकेँ संभव भेलापर एकादशी युता ग्राह्य अछि। ‘रूद्रेण द्वाद्वशी’एहि युग्म वाक्यक अनरोधसँ तथा ‘कामविद्धो भवद्विविष्णु’एहि त्रयोदशी वृद्धत्वक निषेधक वचनसँ सेाहे त्रयोदशी विद्धा द्वादशी त्याज्य अछि।
शुक्लपक्षीय त्रयोदशी द्वादशी युता ग्राह्य अछि। एहि प्रसेंग पं. मिश्र एक शास्त्रीय वचनक उद्धरण देलन्हि अछि-
“पंचमी सप्तमी चैव दशमी च त्रयोदशी।
प्रतिपन्नवमी चैव कर्त्तव्या सम्मुखी तिथि:।।”
तथा-
“कृष्णाष्टमी वृहत्तल्पा सावित्री वटपैत्रकी।
कामत्रयोदशी रम्भा उपोष्या: पूर्वसंयुता:।।”
तथा-
“शुक्ला त्रयोदशी रम्भा नोपोष्या परसंयुता:।।”
शुक्ल पक्षक चतुर्दशी पूर्णिमा युता ग्राह्य अछि। एहि सम्बन्धमे चतुर्दश्याथ पूर्णिमा, एकादश्यष्टमी इत्यादि वचन समर्थक अछि। एहि तरहेँ उदयक बाद तीन मुहूर्त्त धरि सेहो चतुर्दशी रहलाक बाद पूर्णिमा रहए तँ ओ ग्राह्य अछि। ई मुख्य रूपसँ अनन्त पूजाक लेल प्रासंगिक अछि। भविष्य पुराणक वचनकेँ उद्धृत करैत पं. मिश्र प्रकारान्तरसँ अपन विचार प्रस्तुत कएलन्हि अछि। स्कन्द पुराण सेहो एहि उक्तिक पुष्टि करैत अछि-
“कृष्णपक्षेऽष्टमी चैव कृष्णपक्षे चतुर्दशी।
पूर्वविद्धा तु कर्त्तव्या परविद्धा न कहिंचित्।।”
-काल माधव पृ.- 360
अमावस्या प्रतिपदा युक्त ग्राह्य अछि। पैठीनसि प्रभृति स्मृतिकार लोकनि ‘एकादश्यष्टमी षष्ठी अमावस्या चतुर्थिक। उपोष्या: पर संयुक्ता: परापूर्वेण संयुता:’ एहि वचनसँ पुष्ट कएलन्हि अछि। मुदा कार्त्तिक अमावस्याक अवसरपर लक्ष्मीपूजा प्रदोष व्यापिनी ग्राह्य अछि। पं. रज्जे मिश्र एहि प्रसंगमे भविष्योत्तर पुराणक वचनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि-
“प्रदोषे पूजयेद्देवी पद्महस्तां- हरिप्रियाम्।
तथा च प्रदोषसमये लक्ष्मी पूजयित्वा यथाविधि।
ब्राह्णान् भोजयित्वा तु भोजयेच्च बुभुक्षितान्।।”
-तिथि निर्णय पृ.- 37
स्नान दानादिक क्रिया ‘उदयव्यापिनी पूर्णिमामे होइत अछि, आन काज चतुर्दशी युता ग्राह्य अछि-
“चतुर्दश्याथ पूर्णिमा’। फाल्गुनी पूर्णिमा” होलिका दाहक प्रसंग प्रदोषव्यपिनी ग्राह्य अछि-
“सायाह्ने होलिकां कुर्यात् पूर्वाहणे क्रीडनङ्गवाम्।
दीपं दद्यात्प्रदोषे तु एष धर्म: सनातन:।।”
श्रावणी पूर्णिमा उपाकर्मादिक प्रसंग उदय कालिकी ग्रहण योग्य अछि। भाद्री पूर्णिमा ऋषि तर्पण आदि कर्ममे उदयव्यापिनी ग्राह्य होइत अछि। ईहो कहल गेल अछि जे षष्ठी, एकादशी, अमावस्या, सप्तमी विद्धा अष्टमी तथा परविद्धा पूर्णिमा ग्राह्य नहि अछि-
“षष्ठयेकादश्यामावास्या पूर्वविद्धा तथाष्टमी।
पूर्णिमा परविद्धा तु नोपोष्य तिथि पंचकम्।”
-तिथि निर्णय – 44
एवं प्रकारेँ म. म. राजनाथ मिश्र शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष दुनू तिथिक प्रतिपदासँ पूर्णिमा एवं अमावास्या तिथि धरिक समीचीन, संक्षिप्त एवं वांछनीय वर्णन कएलन्हि अछि।